EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / کٲشُرКыргызKurdîKʋsaalLëblaŋoлаккулезгиLugandaLingálaລາວلۊری شومالیlüüdidxʷləšucidmadhurâमैथिलीŊmampulliMalagasyKajin M̧ajeļമലയാളംМонголᠮᠠᠨᠵᡠManipuriма̄ньсиဘာသာမန်mooreमराठीမြန်မာ閩南語 / Bân-lâm-gú閩南語(漢字)閩南語(傳統漢字)Bân-lâm-gú (Pe̍h-ōe-jī)Bân-lâm-gú (Tâi-lô)KhoekhoegowabNorsk (bokmål)नेपालीनेपाल भाषाli nihanawdmNorsk (nynorsk)ngiembɔɔnߒߞߏSesotho sa LeboaThok NaathChichewaNzemaଓଡ଼ିଆਪੰਜਾਬੀPiemontèisΠοντιακάⵜⴰⵔⵉⴼⵉⵜTarandineрусскийसंस्कृतсаха тылаᱥᱟᱱᱛᱟᱞᱤ (संताली)सिंधीکوردی خوارگDavvisámegiellaKoyraboro SenniSängöⵜⴰⵛⵍⵃⵉⵜတႆးසිංහලᠰᡞᠪᡝSlovenčinaСрпски / srpskiSesothoSENĆOŦENSundaSvenskaŚlůnskiதமிழ்ತುಳುతెలుగుไทยትግርኛትግሬцӀаӀхна мизSetswanaChiTumbukaTwiⵜⴰⵎⴰⵣⵉⵖⵜудмуртУкраїнськаاردوOʻzbekchaꕙꔤTshiVenḓaVènetoWaaleWolofLikpakpaanlYorùbá中文中文(中国大陆)中文(简体)中文(繁體)中文(香港)中文(澳門)中文(马来西亚)中文(新加坡)中文(臺灣)Help इस समाचार को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें नैनीताल, 5 अक्टूबर 2018। इन दिनों नैनीताल सहित पर्वतीय क्षेत्रों से दूधिया रोशनी की तरह आकाशगंगा का बेहद खूबसूरत नजारा दिखाई दे रहा है। आकाशगंगा शाम होने के बाद दक्षिण-पश्चिम दिशा में सैगिटेरियस यानी धनु राशि के तारामंडल के पास नजर आ रही है। खास बात यह भी है कि शनि, प्लूटो व मंगल ग्रह भी इसके करीब नजर आ रहे हैं। नगर में छायाकार डीएसएलआर कैमरों से आकाशगंगा के चित्र लेकर रोमांच पैदा कर रहे हैं। उनका कहना है दशकों बाद इस तरह आकाशगंगा इस तरह साफ व चमकती हुई नजर आ रही है। हालांकि एरीज के वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमाार का कहना है कि इस मौसम में आकाशगंगा का इस तरह साफ दिखना सामान्य बात है। इस वर्ष 13 सितंबर को हुई बारिश के बाद 14 सितंबर से मौसम खुल गया है। लिहाजा खुले मौसम में आकाशगंगा का नजारा कम रोशनी वाले स्थानों से बहुत साफ नजर आ रहा है। नगर के शेरवानी होटल में ईवेंट प्रबंधक दिनेश पालीवाल ने बताया कि उन्होंने शेरवानी के पास ही हंस निवास क्षेत्र से आकाशगंगा के कई चित्र अपने डीएसएलआर कैमरे से सफलता से खींचे हैं। सम्बंधित लिंक क्लिक करके यह भी पढ़ें : चंद्रग्रहण के बहाने धरती की सेहत जांचने में जुटे भारत व जापान के वैज्ञानिकमनुष्य की तरह पैदा होते, साँस लेते, गुनगुनाते और मरते भी हैं तारेआधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञानपांव तले पावर हाउस भारतीय उपमहाद्वीप के 5700 वर्षों के मानसून के आंकड़े हुए तैयारअब बच्चों को लगेगा केवल एक “पेंटावैलेंट टीका”कामयाबी: देवस्थल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ‘डॉट” स्थापितभूकंप : नेपाल से कम खतरनाक नहीं उत्तराखंडबदल रहा है भूगोलः दो साक्षात्कार मानसून : उत्तराखंड-हिमांचल में और भी बुरे रहेंगे हालात नैनीताल में पारा सारे रिकार्ड तोड़ने की ओरफिर भी ‘हिमालय’ सा अडिग है हिमालयसंबंधित पोस्टः सवा पांच करोड़ साल का हुआ अपना ‘हिमालय’ हिमालय पर ब्लैक कार्बन का खतरा ! बेमौसम के कफुवा, प्योंली संग मुस्काया शरद, बसंत शंशय मेंक्या गलत हैं न्यूटन के नियम ! गुदड़ी के लाल ने किया कमाल, घनमूल निकालने का खोजा फॉर्मूलाआदमखोरों की होगी डीएनए सैंपलिंग मापी जाएगी टेक्टोनिक प्लेटों की गतिशीलता कुमाऊं विवि के भौतिकी विभाग को “सेंटर फॉर एक्सीलेंस” वाह क्या खूब, मोबाइल फोन से बना डाली पूरी फिल्मदुनिया की नजरें फिर महा प्रयोग परसूखाताल से आता है नैनी झील में 77 प्रतिशत पानी बारिश का पानी बचाने पर उत्तराखंड देगा ‘वाटर बोनस‘कैंब्रिज विवि का दल जुटा सूखाताल झील के परीक्षण मेंडायलिसिस” से बाहर आ सकती है नैनी झीलसमय से पता लग जाएगा कैंसर, और हो सकेगा सस्ता इलाज‘मीथेन सेंसर’ खोलेगा मंगल में जीवन की संभावनाओं का राज दुनिया की ‘टीएमटी” में अपनी ‘टीएमटी” का ख्वाब भी बुन रहा है भारतसूर्य पर भी मनाई जा रही ‘बड़ी दिवाली’, उभरा पृथ्वी से 14 गुना बड़ा ‘सौर कलंक’बेहद खतरनाक हो सकता है किसी और का रक्त चढ़ानायहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleयह भी पढ़ें : मनुष्य की तरह पैदा होते, साँस लेते, गुनगुनाते और मरते भी हैं तारेजीवन के लिए सबसे बेहतरीन ग्रहकेप्लर 22 बी है एक और दावेदारकेपलर 62 से भी है उम्मीदनयी ‘पृथ्वी’यों पर जीवन की संभावनाओं के प्रति बहुत आशान्वित नहीं हैं वैज्ञानिकप्रोक्सिमा-बी का सूरज पृथ्वी के सूरज के मुकाबले सात गुना छोटा और इसकी अधिकतम रोशनी भी पृथ्वी की सुबह और शाम जैसीहमारी ‘क्षीर गंगा’ से चार गुना बड़ी आकाशगंगा मिली वैज्ञानिक उत्साहित, बताया चुनौतीपूर्णनये खोजे गये ग्रह प्रोक्सिमा-बी के बारे मेंएरीज भी तारों के अध्ययन की क्षमता हासिल करने की ओर‘टीएमटी’ के निर्माण में भारत व एरीज की भागेदारी तयLike this:Relatedयह भी पढ़ें : मनुष्य की तरह पैदा होते, साँस लेते, गुनगुनाते और मरते भी हैं तारे-जोहान्सवर्ग यूनिवर्सिटी के प्रो. क्रिस एंजिलब्रेथ्ट ने अपने ‘म्यूजिक ऑफ दि स्टार’ लेक्चर के जरिये समझाया तारों का संगीतप्रो. क्रिस एंजिलब्रेथ्टनवीन जोशी, नैनीताल। कहा जाता है मानव और पृथ्वी की उत्पत्ति मूलत: तारों से हुई। आज भी जब किसे प्रियजन की मृत्यु होती है तो बच्चों को समझाया जाता है, की वह तारा बन गया है। तारे टिमटिमटाते हैं तो लगता है कि वे सांस ले रहे हैं, और उनका दिल धड़क रहा है। लेकिन अब वैज्ञानिक भी यह कहने लगे हैं कि तारे न केवल टिमटिमाते हुए सांस ही लेते हैं, वरन गुनगुनाते भी हैं। वैज्ञानिकों ने इनके गीतों यानी सुरों को समझने का भी दावा किया है। दक्षिण अफ्रीका के विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिये कार्य करने वाले जोहान्सवर्ग यूनिवर्सिटी में कार्यरत अंतरिक्ष विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस एंजिलब्रेथ्ट बकायदा जगह-जगह जाकर अपने ‘म्यूजिक ऑफ दि स्टार’ लेक्चर के जरिये तारों के संगीत को समझाते हैं। उत्तराखंड प्रशासनिक अकादमी में आयोजित कार्यशाला में भी प्रो. क्रिस ने अपना व्याख्यान दिया, और बताया कि ब्रह्मांड में मौजूद तारे भी बिल्कुल संगीत के उपकरणों की तरह व्यवहार करते हैं, और संगीत की ध्वनियां निकालते हैं। ‘एस्ट्रोसिस्मोलॉजी’ उपकरणों की मदद से तारों के इस संगीत को सुना जा सकता है। इससे तारों के रहस्यों और उनकी आंतरिक संरचना और गतिशीलता को समझने में भी मदद मिलती है। प्रो. किस ने बताया कि तारों के बहुत दूर होने के कारण उनकी आवाज सुन पाना संभव नहीं है। खुलासा किया कि हर तारे की अपनी अलग ध्वनि होती है। सूर्य भी अपनी आवाज में गर्जना करता है, जिसे रिकार्ड भी किया जा चुका है। इससे पूर्व वैज्ञानिकों ने तारों के टिमटिमाने की ‘पल्सेशन’ यानी दिल के धड़कने की तरह सांस लेने के रूप में भी व्याख्या की। वहीं इस दौरान वैज्ञानिकों ने आकाशगंगाओ में नए तारों की उत्पत्ति एवं आखिर में ब्लैक होल में समाकर खत्म होने की अवधारणाओं पर भी प्रकाश डाला, तथा एरीज के तहत बेल्जियम के सहयोग से देवस्थल में स्थापित हुई एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप यानी डॉट और शीघ्र स्थापित होने जा रही विश्व की अनूठी चार मीटर व्यास की इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेक्नोलॉजी यानी आईएलएमटी से इस दिशा में सितारों और अपनी आकाशगंगा-मिल्की वे तथा ब्रह्मांड की अन्य आकाशगंगाओं पर बेहतर शोध किये जाने का विश्वास जताया।यह भी पढ़ें : एम्स ऋषिकेश में चमोली के दंपति ने नौ दिन के मृत नवजात का देहदान किया, चिकित्सा शोध को मिला मानवता का बड़ा योगदानपृथ्वी जैसे किसी अन्य गृह पर जीवन की संभावना के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। वैज्ञानिकों ने तीन ऐसे ग्रह खोजने का दावा किया है जो धरती जैसे हैं। दरअसल ट्रेप्पिस्ट-1 नाम के तारे के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते सात ग्रहों को खोजा गया है। इनमें से तीन ग्रह जिनका नामकरण अभी एफ, जी और एच किया गया है को बसने के लायक माना गया है। 1995 में पहली बार वैज्ञानिकों ने सौरमंडल के बाहर ग्रह खोजा था। उसके बाद से लेकर अब तक करीब 725 ग्रह खोजे जा चुके हैं।केपलर-186 एफ नारंगी रंग के एक तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह तारा धरती के सूरज के आकार और वजन में आधा है। यह अपने तारे की परिक्रमा 130 दिन में करता है।हब्बल दूरबीन के अन्वेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि ब्रह्माण्ड में करीब 125 अरब आकाशगंगाएं हैं।जीवन के लिए सबसे बेहतरीन ग्रहअब तक जितनी भी जीवन योग्य ग्रहों-उपग्रहों की खोज हुई है उनमें ये तीनों ग्रह सबसे ज्यादा उपयुक्त माने जा रहे हैं। ट्रेप्पिस्ट-1 के आकार में छोटा और ठंडा तारा होने के कारण इसके ग्रहों पर जीवन की मौजूदगी मानी जा रही है। बेल्जियम यूनिवर्सिटी ऑफ लेज के जाने माने वैज्ञानिक माइकल गिल्लन कहते हैं कि ट्रेप्पिस्ट-1 के सातो ग्रह अपने तारे से काफी नजदीक हैं। इनकी स्थिति अपने सौर मंडज के ग्रह बृहस्पति के आसपास मौजूद चंद्रमाओं से मिलती है। माइकल के अनुसार तारे का तापमान अपेक्षाकृत कम गर्म है। यह छोटा भी है। इसलिए माना जा रहा है कि इसके सातों ग्रहों का मौसम समषीतोष्ण है। इसका अर्थ यह है कि वहां तरल पानी हो सकता है। इसके तीन ग्रह को खगोलविज्ञानियों की परिभाषा के अनुसार पारंपरिक आवासीय इलाकों में माना गया है। यहां की सतह पर पर्याप्त वायुमंडलीय दवाब के कारण पानी हो सकता है। ट्रेप्पिस्ट-1 का अध्ययन करने में वैज्ञानिकों को इसलिए आसानी हुई कि इसकी चमक बाकी तारों की तुलना में कम है। अब वैज्ञानिक यहां ऑक्सीजन और मीथेन जैसे महत्वपूर्ण गैसों के बारे में पता लगा रहे हैं। हो सकता है कुछ ही दिनों में एक और सकारात्मक खबर सुनने को मिले। ‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। केप्लर 22 बी है एक और दावेदारकेप्लर 22 बी भी जीवन की संभावना के दसवेदार ग्रहों में सबसे अगली श्रेणी में है। धरती से करीब ढाई गुना बड़े इस ग्रह के भार का पता अब तक नहीं चल पाया है। धरती से यह 600 प्रकाश वर्ष दूर है। ऐसे में इसकी वजन का आकलन भी संभव नहीं। लेकिन अंतरिक्ष विज्ञानी मानते हैं कि यहां का वातावरण काफी कुछ धरती जैसा हो सकता है। वैसे कुछ वैज्ञानिकों का आकलन है कि यह नेप्यचून जैसा ग्रह है और इसका चट्टानी कोर द्रव से घिरा है। ट्रेप्पिस्ट-1 तारा धरती से 40 प्रकाशवर्ष दूर है। एक प्रकाशवर्ष की दूरी तकरीबन 6 खरब मील के बराबर होती है।केपलर 62 से भी है उम्मीदयह तारा जब आसमान में दिखता है तो एकबारगी लोग इसे इग्नोर कर देते हैं। कारण इसकी चमक कम है। यह छोटा है और इसका रंग भी मटमैले पीले जैसा है। लेकिन आज यह तारा अपना चक्कर लगाने वाले पांच खास ग्रहों के कारण चर्चे में है। इनमें से दो धरती के आकार के हैं, साथ ही वे अपने तारे के जीवन की संभावना योग्य क्षेत्र में हैं। ये दोनों ग्रह हैं-केपलर 62 ई और केपलर 62 एफ। ये धरती से आकार में बस थोड़े बड़े हैं। आकार और तापमान दोनों के अनुसार दोनों ग्रह अपनी सतह पर जल के द्रव्य अववस्था में रहने योग्य क्षेत्र में हैं।एक और ग्रह जो जीवन की संभावना से है भरपूरदो साल पहले नासा के केपलर दूरबीन के जरिए एक ग्रह खोजा गया था-केपलर-186 एफ। यह ग्रह धरती से करीब 500 प्रकाश वर्ष दूर सिगनस तारामंडल में मौजूद है। इसके बारे में बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया के खगोलशास्त्री ज्योफ मार्फी कहते रहे हैं कि यह भी जीवन के लिए सबसे बेहतरीन ग्रहों में है। इसके भार और तत्वों के बारे में अभी तक पता नहीं चला है, लेकिन एक दावा यह है कि यहां की सतह चट्टानी है। केपलर-186 एफ नारंगी रंग के एक तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह तारा धरती के सूरज के आकार और वजन में आधा है। यह अपने तारे की परिक्रमा 130 दिन में करता है। यह ग्रह धरती से ठंडा और इसके आकार से दस प्रतिशत बड़ा है। इसके वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड धरती से ज्यादा है। यह धरती की तरह अपने तारे से न ज्यादा दूर है और न ज्यादा करीब इसलिए यहां ऑक्सीजन होने की संभावना जताई जा रही है।नयी ‘पृथ्वी’यों पर जीवन की संभावनाओं के प्रति बहुत आशान्वित नहीं हैं वैज्ञानिक-कहा, अभी न सही, कभी तो यह खोज अपने मुकाम पर पहुंचेगी -जीवन हुआ भी मानव को वहां तक पहुंंचने में लग सकते हैं लाखों वर्ष नवीन जोशी। नैनीताल। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पृथ्वी के सौरमंडल से बाहर ट्रेपिस्ट नामक लघु तारे के गिर्द पृथ्वी जैसे ही आकार और जीवन की संभावनाओं वाले सात ग्रहों की खोज कर रिकार्ड बनाने का दावा किया है। दावा किया गया है कि चूंकि इन ग्रहों का टे्रपिस्ट-1 नाम का तारा यानी सूर्य हमारे सूर्य से करीब 200 गुना कम चमकीला यानी एक ड्वार्फ स्टार यानी बौना तारा है, और मिले ग्रह उससे हमारे बुध ग्रह जितनी दूरी पर तथा आस-पास मौजूद हैं। इसलिये माना जा रहा है कि मजबूत चट्टानों वाले ये ग्रह शीतोष्ण मौसम वाले और हो सकते हैं, और इन ग्रहों पर तरल पानी और जीवन की संभावनाएं हो सकती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इनमें से एक ग्रह बिल्कुल पृथ्वी जैसे हालात पेश कर रहा है। अलबत्ता, इन तथ्यों से बहुत अधिक आशान्वित न होते हुए और सीधी प्रतिक्रिया से बचते हुए एरीज के वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी न सही, कभी तो पृथ्वी के वैज्ञानिकों की दूसरी पृथ्वी खोजने की खोज अपने मुकाम तक जरूर पहुंचेगी। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी से इतर दूसरी पृथ्वी और पृथ्वी के अलावा किसी ग्रह पर एलियन सरीखे जीव होने की कल्पना तो करीब एक सदी पुरानी है, और इधर करीब दो दशक से वैज्ञानिक ऐसे ग्रहों की खोज में लगे हुए हैं, और बीते वर्ष ऐसे ही एक ग्रह प्रॉक्सिमा-बी सहित अभी तक सौरमंडल के बाहर 3,500 ग्रहों को खोज चुके हैं। अलबत्ता, वहां जीवन की संभावनाओं पर अध्ययन अब तक धरती पर स्थित दूरबीनों और प्रयोगशालाओं में बैठकर ही तथा अनुमान के आधार पर ही किया जाता है। नासा के वैज्ञानिकों ने दो दिन पूर्व पृथ्वी से एरीज के वैज्ञानिक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि अब तक पृथ्वी के वैज्ञानिक अपने सौरमंडल के भी कुछ ही ग्रहों तक अपने उपकरण भेज पाये हैं। जैसा कि इन ग्रहों के करीब 39-40 प्रकाश वर्ष दूर होने से ही स्पष्ट है, वहां से करीब तीन लाख किमी प्रति सेकेंड की गति से सर्वाधिक गतिमान प्रकाश को ही पृथ्वी पर आने में 39-40 वर्ष लग सकते हैं तो अपने सबसे करीब केवल 3.84 लाख किमी दूर स्थित उपग्रह चंद्रमा (जहां तक पृथ्वी से प्रकाश को पहुंचने में एक सेकेंड से कुछ ही अधिक समय लगता है) पर अपने ईगल यान से करीब 102 घंटों यानी पांच दिन में पहुंच पाये मानव को इन ग्रहों तक पहुंचने में लाखों वर्ष लगने तय हैं।यह भी पढ़ें : नैनीताल में फर्जी गाइड ने पर्यटक की कार लेकर की क्षतिग्रस्त, मालरोड पर पेड़ और डस्टबिन से टकराकर हुआ फरार, पुलिस तलाश में जुटीप्रोक्सिमा-बी का सूरज पृथ्वी के सूरज के मुकाबले सात गुना छोटा और इसकी अधिकतम रोशनी भी पृथ्वी की सुबह और शाम जैसीइस पर खतरनाक एक्स-रे और अवरक्त किरणों पृवी के मुकाबले 100 गुना अधिकप्रोक्सिमा-बी केवल 11.2 दिन में लगा लेता है अपने सूर्य का चक्कर, यानी 11.2 दिन का ही है इसका वर्षनवीन जोशी, नैनीताल। वैज्ञानिकों ने बीते बुधवार यानी 24 अगस्त को पृथ्वी के अब तक के सबसे करीब एक ग्रह ‘प्रोक्सिमा-बी’ को खोजने के साथ वहां जीवन की संभावना होने का दावा किया है। इसके उलट नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के वैज्ञानिक प्रोक्सिमा-बी की खोज को, खासकर इस लिहाज से कि अपने सूर्य से इतर अन्य तारों के ग्रहों के किसी उपग्रह की गतिशीलता को भी धरती से पहली बार माप लिया गया है, बेहद महत्वपूर्ण खोज तो मानते हैं, किंतु इस ग्रह पर जीवन की संभावना होने के प्रति बहुत अधिक आशान्वित नहीं हैं। उनकी यह आशंका इन तथ्यों के मद्देनजर है कि प्रोक्सिमा-बी का सूरज पृथ्वी के सूरज के मुकाबले सात गुना छोटा है और इसकी अधिकतम रोशनी पृथ्वी की सुबह और शाम जितनी ही है। साथ ही यह केवल 11.2 दिन में ही अपने सूर्य का चक्कर लगा लेती है। यानी इसका एक वर्ष 11.2 दिन का ही है। इसके अलावा भी इस पर खतरनाक एक्स-रे और पराबैगनी किरणें पृथ्वी के मुकाबले 100 गुना अधिक हैं। हालांकि जीवन की संभावना देखने के लिए आगे इस पर चुंबकीय क्षेत्र है अथवा नहीं, सहित अनेक अन्य गुणधर्मो को भी देखना जरूरी होगा। तभी इस पर एक्स-रे व पराबैगनी किरणों से बचने की क्षमता उपलब्ध होगी अथवा नहीं होगी। उल्लेखनीय है कि मानव के लिए किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की सम्भावना, एलियंस का वजूद तलाशना पुराना शगल रहा है। इसी कोशिश में वैज्ञानिक बीते मई माह में 39 प्रकाश वर्ष पूर्व तीन ग्रहों को खोजकर वहां जीवन की संभावना बता चुके हैं, लेकिन अभी किसी ग्रह में भी ऐसी पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इधर केवल 4.246 प्रकाश वर्ष दूर ही प्रोक्सिमा-बी ग्रह की खोज को अब तक की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है।हमारी ‘क्षीर गंगा’ से चार गुना बड़ी आकाशगंगा मिली वैज्ञानिक उत्साहित, बताया चुनौतीपूर्णधरती से 40 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर यह आकाशगंगा हब्बल स्पेस टेलीस्कोप से खोजी गयी, यूजीसी-12591 दिया गया है नाम नवीन जोशी। खगोल विज्ञान की दुनिया में सबसे ताजा खबर है एक ऐसी आकाशगंगा का मिलना, जोकि हमारी ‘क्षीर गंगा’ यानी ‘मिल्की वे’ से से चार गुना बड़ी है, तथा धरती से 40 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है। इतनी दूर तथा इतनी बड़ी एक आकाशगंगा को धरती से खोजा जाना जितनी बड़ी बात है, उतनी ही वैज्ञानिकों में इसके प्रति उत्सुकता और इसका अध्ययन करने की चुनौती बढ़ गयी है। इसके अलावा भी इस आकाशगंगा के बारे में जो बात प्रकाश में आई है, वह यह कि यह करीब 18 लाख किलोमीटर प्रति घंटे की यानी कल्पना से भी कहीं अधिक तेज गति से घूम रही है, और इसकी भुजाएं इसके केंद्र के पास ही संकुचित हैं। इससे भी खगोल वैज्ञानिक इसके बारे में और अधिक जानने के प्रति उत्सुक हो गये हैं।यूं तो ब्रह्माण्ड का विस्तार अपार है। यह कितना बड़ा है, इस बारे में कोई ठीक से नहीं जानता। तो भी खगोल विज्ञान जगत में कहा जाता है कि हमारी आकाशगंगा-मिल्की वे, यानी जिस आकाशगंगा में सूर्य, पृवी और हमारा सौरमंडल स्थित है, उसमें 10 की घात 11 यानी करीब 10 अरब से भी अधिक तारे हैं, और ब्रह्माण्ड में करीब इतनी ही यानी 10 अरब आकाशगंगाएं हैं। इनमें से करीब दस हजार आकाशगंगाओं को अब तक वैज्ञानिक खोज पाये हैं। इतनी सारी आकाशगंगाओं के बीच अब तक यह साम्य देखा गया है कि अधिकांश आकाशगंगाओं के आकार हमारी आकाशगंगा के ही बराबर और इनमें मौजूद अधिकांश तारों के आकार हमारे तारे यानी हमारे सूर्य के ही बराबर आकार के हैं। इस तरह जब भी वैज्ञानिक एक नयी आकाशगंगा को खोज पाते हैं तो पता चलता है कि उसका आकार करीब हमारी अपनी आकाशगंगा के कमोबेश बराबर ही होता है। लेकिन इधर हब्बल स्पेस टेलीस्कोप से जिस यूजीसी-12591 नाम दी गयी आकाशगंगा को खोजा गया है, उसे ‘‘मैसिव गैलेक्सी’ की श्रेणी में रखा गया है।स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोधा संस्थान यानी एरीज के खगोल वैज्ञानिक और देवस्थल स्थित एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप यानी डॉट के प्रभारी डा. बृजेश कुमार ने बताया कि खोजी गयी यूजीसी-12591 मिल्की वे से चार गुना बड़े आकार की आकाशगंगा है। धरती से 40 करोड़ दूर स्थित इस गैलेक्सी को धरती से खोजा जाना, और खासकर इसकी अत्यधिक घूर्णन गति को देखते हुए वैज्ञानिकों के लिए इसका अध्ययन बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है। यह एक से अधिक आकाशगंगाओं के मिलने से बनी हुई है, अथवा कैसे इतनी बड़ी बन गयी है, यह बहुत बड़ा रहस्य बना हुआ है।यह भी पढ़ें : किसान सुखवंत सिंह प्रकरण में उधम सिंह नगर पुलिस पर बड़ी कार्रवाई, आईटीआई कोतवाली प्रभारी सहित 2 उप निरीक्षक निलंबित और 10 पुलिसकर्मी लाइन हाजिरनये खोजे गये ग्रह प्रोक्सिमा-बी के बारे मेंप्रोक्सिमा-बी ग्रह का तारा यानी सूरज प्रोक्सिमा सेंचुरी, सेंट टोरस तारामंडल में स्थित है। एरीज के वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमार बताते हैं कि 10 की घात 11 यानी 1 ख़रब तारों युक्त एवं करीब एक लाख प्रकाश वर्ष त्रिज्या वाली हमारी आकाशगंगा की भुजाओं में नए तारे बनते रहते हैं। हमारा सौरमंडल और हमारा सूर्य भी इसकी एक भुजा पर आकाशगंगा के केंद्र से 27,710 प्रकाश वर्ष दूर है। ऐसी ही एक अन्य भुजा पर ‘सेंट टोरस’ नाम के तारामंडल में धरती से करीब 4.2 प्रकाश वर्ष की दूरी पर धरती से कमोबेश एक ही स्थान पर एक गुच्छे में एक-दूसरे से बेहद करीब तीन तारे नजर आते हैं। इनमें से पहला करीब सूर्य के 14 लाख किमी के बराबर ही आकार के पीले रंग का तारा एल्फा सेंचुरी-ए, दूसरा सूर्य से छोटे आकार का नारंगी रंग का एल्फा सेंचुरी-बी और तीसरा सूर्य (व्यास 14 लाख किमी) से करीब सात गुना छोटे यानी करीब दो लाख किमी आकार का परंतु सूर्य से 40 गुना अधिक घनत्व का ‘प्रोक्सिमा सेंचुरी’ नाम का है। अपने छोटे आकार व ऊष्मा व रोशनी के कारण इसे ‘रेड ड्वार्फ स्टार’ यानी लाल रोशनी वाला बौना तारा भी कहते हैं। इसकी अधिकतम रोशनी हमारे सूर्य की सुबह-शाम लाल रंग का नजर आने के दौरान जितनी ही है। इस कारण ही इस तारे के ही नए खोजे गए ग्रह ‘प्रोक्सिमा-बी’ पर तापमान इतना कम है कि यहां कोई तत्व द्रव्य अवस्था में रह सकता है। इस आधार पर ही इसके खोजकर्ता वैज्ञानिक इस पर पानी और जीवन की संभावना जता रहे हैं। अलबत्त्ता अन्य प्रारंभिक वैज्ञानिक तथ्यों को देखने पर पता चलता है कि इस पर जीवन की संभावनाएं कमोबेश नहीं हैं। डा. कुमार कहते हैं की बावजूद ‘प्रोक्सिमा-बी’ की खोज खगोल विज्ञान जगत के लिए बहुत बड़ी खोज है। क्योंकि ‘प्रोक्सिमा-बी’ पृथ्वी का सबसे करीब, करीब 4.2 प्रकाश वर्ष ही दूर गृह है, इसलिए यहां पहुंचने की कल्पना की जा सकती है। और पहली बार मानव ने किसी दूसरे तारे के ग्रह के बारे में उसकी क्रियाशीलता, उसकी कक्षा और आकार आदि के बारे में जान लिया है। वे बताते हैं कि ‘प्रोक्सिमा-बी’ पृथ्वी के कमोबेश बराबर आकार और करीब 1.3 गुना द्रव्यमान का होने की वजह से कठोर चट्टानों वाला ग्रह है। खास संयोग है कि इस ग्रह की उम्र की 1370 करोड़ वर्ष के ब्रह्माण्ड में पृथ्वी के बराबर ही यानी करीब 50 करोड़ वर्ष और इसके सूर्य की उम्र भी पृथ्वी के सूर्य जितनी ही यानी करीब 500 करोड़ वर्ष की है। हालांकि यह भी समझना होगा कि पृथ्वी के वैज्ञानिक अब तक केवल करीब दो प्रकाश वर्ष दूर स्थित शनि ग्रह तक ही अपने प्रोब उपकरण उतार पाये हैं। इसलिए 4.2 प्रकाश वर्ष दूर ‘प्रोक्सिमा-बी’ तक पहुंचना मानव के लिए कितना दूर है, इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। यह भी दिलचस्प है कि बेहद करीब बताये जा रहे ‘प्रोक्सिमा सेंचुरी’ नाम के तारे को 1915 में खोज लिया गया था, और इसके करीबी ग्रह ‘प्रोक्सिमा-बी’ को अब 111 वर्षों के बाद 2016 में खोजा जा सका है।एरीज भी तारों के अध्ययन की क्षमता हासिल करने की ओरनैनीताल। ज्ञात हो कि बीते मार्च माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेल्जियम से एरीज में स्थापित की गई एशिया की सबसे बड़े 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन का उद्घाटन कर चुके हैं। इससे एरीज और देश के वैज्ञानिकों की पहुंच भी तारों के अध्ययन तक हो गई है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि केवल दूरबीन के भरोसे तारों का समग्र अध्ययन संभव नहीं है। इस हेतु एरीज के वैज्ञानिकों ने कम एवं मध्यम क्षमता के ऑप्टिकल स्पेक्टोग्राफ तो इस दूरबीन के साथ देवस्थल में स्थापित कर लिये हैं, जिनसे दूसरी आकाशगंगाओं के तारों को देखा जा सकता है। इसके बाद अब यहां के वैज्ञानिकों ने ‘हाई रेजोल्यूशन ऑप्टिकल स्पेक्टोग्राफ’ स्थापित करने की शीर्ष स्तर पर कोशिश शुरू कर दी है। एरीज के निदेशक डा. वहाब उद्दीन ने कहा कि अभी यह प्रस्ताव प्रारंभिक स्तर पर है। इसके निर्माण में दो से तीन वर्ष लग सकते हैं। इसके लगने के बाद यहां वैज्ञानिक तारों की क्रियाशीलता का अध्ययन कर पाएंगे।‘टीएमटी’ के निर्माण में भारत व एरीज की भागेदारी तयदुनिया की अतिमहत्वाकांक्षी दूरबीन होगी ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप’नैनीताल। दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास की आप्टिकल दूरबीन के निर्माण में दुनिया के पांच देशों के साथ भारत भी भागेदारी देगा। खास बात यह है कि नैनीताल का आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज इसमें योगदान देगा। एरीज के वैज्ञानिकों के दिशा-निर्देशों पर भारतीय उद्योगों से इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए विभिन्न उपकरण बनाए जाएंगे। गत 18-19 अप्रैल को अमेरिका की वल्टेक आब्जरवेटरी की पसेदीना नगर में आयोजित संगोष्ठी में इस महायोजना की जिम्मेदारियां इसके भागीदारों, अमेरिका, जापान, कनाडा, चीन व भारत में बांटी गई। वहां से लौटे एरीज के निदेशक प्रो. रामसागर ने बताया कि इस 1.3 बिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट में भारत करीब 800 करोड़ रुपये का योगदान देगा, जिसमें से 600 करोड़ रुपये के उपकरण अवयव भारत से भेजे जाएंगे। एरीज भारतीय उद्योगों में बनने वाले लैंस सहित अन्य यांत्रिक अवयवों की गुणवत्ता आदि की निगरानी करेगा। भारत में सर्वाधिक 50 फीसद कार्य भारतीय तारा भौतिकी संस्थान बेंगलुरु के हिस्से आए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले दो वर्षो में पहले चरण के यह कार्य कर लिये जाऐंगे। उल्लेखनीय है कि यह दूरबीन प्रशांत महासागर स्थित हवाई द्वीप में होनोलूलू के करीब ज्वालामुखी से निर्मित 13,803 फीट (4,207 मीटर) ऊंचे पर्वत पर वर्ष 2018 में स्थापित होने जा रही है। इस दूरबीन में अल्ट्रावायलेट (0.3 से 0.4 मीटर तरंगदैध्र्य की पराबैगनी किरणों) से लेकर मिड इंफ्रारेड (2.5 मीटर से 10 माइक्रोन तरंगदैध्र्य तक की अवरक्त) किरणों (टीवी के रिमोट में प्रयुक्त की जाने वाली अदृश्य) युक्त किरणों का प्रयोग किया जाएगा। यह हमारे सौरमंडल व नजदीकी आकाशगंगाओं के साथ ही पड़ोसी आकाशगंगाओं में तारों व ग्रहों के विस्तृत अध्ययन में सक्षम होगी।अगले साल तक स्थापित होगी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीननैनीताल। एरीज नैनीताल जनपद के देवस्थल में वर्ष 2012 के आखिर तक एशिया की सबसे बड़ी बताई जा रही 3.6 मीटर व्यास की नई तकनीकी युक्त ‘पतले लैंस’ (व्यास व मोटाई में 10 के अनुपात वाले) स्टेलर दूरबीन भी लगाने जा रहा है। एरीज के निदेशक प्रो. राम सागर ने बताया कि इस दूरबीन का लेंस रूस में बन रहा है, अगले तीन-चार माह में यह बेल्जियम चला जाऐगा, जहां दूरबीन के अन्य अवयवों का निर्माण भी तेजी से चल रहा है। बताया कि इस वर्ष के आखिर तक लेंस एवं सभी अवयवों के निर्माण का पहला चरण ‘फैक्टरी टेस्ट’ के साथ पूर्ण हो जाएगा।एरीज और यूकोस्ट मिल कर करेंगे कार्यनैनीताल। एरीज के निदेशक प्रो. राम सागर व उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद-यूकोस्ट के हाल में महानिदेशक बने डा. राजेंद्र डोभाल ने मिलकर कार्य करने का इरादा जताया। बुधवार को एरीज में पत्रकारों से वार्ता करते हुऐ डा. डोभाल ने कहा कि एरीज में मौजूद संसाधनों का उपयोग कर बच्चों एवं आम जनमानस को खगोल विज्ञान व खगोल भौतिकी से रोचक तरीके से रूबरू कराया जाऐगा। बच्चों के साथ ही शोधार्थियों के लिऐ भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाऐंगे।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationउत्तराखंडी लालों का कमाल : हरिमोहन ने मैजिक पजल्स में बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड ओपिनियन पोल-नैनीताल : यहां ऑनलाइन वोट करके बताएं-जानें कौन बनेगा नैनीताल नगर पालिका का अगला अध्यक्ष
You must be logged in to post a comment.