नवीन समाचार, नई दिल्ली, 23 मार्च 2026 (DME Fuel and Smokeless Stoves-LPG)। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों व तकनीकी संस्थानों से प्राप्त जानकारी के अनुसार देश में रसोई गैस (LPG) पर निर्भरता के बीच दो नए विकल्प तेजी से चर्चा में हैं—डीएमई यानी डाइमेथाइल ईथर (Dimethyl Ether-DME) ईंधन और बायोपैलेट (Biopellet) आधारित धुआं रहित चूल्हा। एक ओर जहां डीएमई को बड़े स्तर पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता का समाधान माना जा रहा है, वहीं कम लागत वाला चूल्हा आम परिवारों के लिए व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।
ऊर्जा विकल्पों का नया परिदृश्य और भारत की चुनौती
उल्लेखनीय है कि भारत अपनी घरेलू जरूरतों के लिए लगभग 65 प्रतिशत एलपीजी का आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया (West Asia) से आता है। वैश्विक तनाव, समुद्री आपूर्ति मार्गों में बाधा और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण यह निर्भरता देश की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती रही है। ऐसे में DME को एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
डीएमई क्या है और क्यों महत्वपूर्ण
डाइमेथाइल ईथर (DME) एक स्वच्छ ईंधन है, जिसे मेथेनॉल (Methanol) से तैयार किया जाता है। यह मेथेनॉल को 250-300 डिग्री सेल्सियस तापमान पर उत्प्रेरक (Catalyst) की सहायता से संशोधित कर बनाया जाता है। इसे कोयला, बायोमास (Biomass) या भविष्य में हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) और कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) से भी तैयार किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार डीएमई की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे मौजूदा एलपीजी ढांचे में मिलाया जा सकता है। उपभोक्ताओं को चूल्हा या नियामक (Regulator) बदलने की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वच्छ नीली लौ के साथ जलता है, जिससे कालिख, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन कम होता है।
आर्थिक दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण है। यदि एलपीजी में केवल 8 प्रतिशत डीएमई मिलाया जाए तो लगभग 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत संभव है, जबकि 20 प्रतिशत मिश्रण पर यह बचत 23 से 24 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
पर्यावरण और नीति से जुड़ा महत्व
पारंपरिक एलपीजी के अधूरे दहन से उत्पन्न ब्लैक कार्बन हिमालयी (Himalayan) ग्लेशियरों के पिघलने को प्रभावित करता है। इसके विपरीत डीएमई बिना कालिख के जलता है, जिससे वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम किया जा सकता है। यदि इसका उत्पादन हरित तकनीकों से हो, तो यह लगभग कार्बन-न्यूट्रल ईंधन बन सकता है।
हालांकि वर्तमान में इसकी लागत अधिक है और बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यह तात्कालिक समाधान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक विकल्प है, जिसमें भारतीय वैज्ञानिक संस्थान जैसे सीएसआईआर-एनसीएल (CSIR-NCL) और ऊर्जा कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल (Indian Oil) तथा ओएनजीसी (ONGC) महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
कम लागत वाला धुआं रहित चूल्हा भी बना विकल्प
इसी बीच उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के कानपुर (Kanpur) स्थित हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (Harcourt Butler Technical University-HBTU) के प्रो. जितेन्द्र भास्कर (Jitendra Bhaskar) और उनके पुत्र जतिन भास्कर (Jatin Bhaskar) द्वारा विकसित 800 रुपये लागत का धुआं रहित चूल्हा भी सामने आया है।
यह चूल्हा बायोपैलेट पर आधारित है, जो कृषि अवशेष और गोबर से तैयार जैविक ईंधन है। इसकी लागत लगभग 10 रुपये प्रति घंटे है और एक परिवार का भोजन आसानी से तैयार किया जा सकता है। इसका डिजाइन दो हिस्सों में विभाजित है, जहां गैस उत्पन्न होकर ऊपर जलती है और धुआं लगभग समाप्त हो जाता है।
आगे क्या बदल सकता है
DME और बायोपैलेट आधारित चूल्हा दोनों अलग-अलग स्तरों पर समाधान प्रस्तुत करते हैं—एक राष्ट्रीय ऊर्जा नीति और आयात निर्भरता को प्रभावित करता है, तो दूसरा आम नागरिक के दैनिक जीवन और खर्च को। क्या भविष्य में ये विकल्प एलपीजी पर निर्भरता को कम कर पाएंगे?
यह स्पष्ट है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और किफायती विकल्पों की दिशा में भारत में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
