EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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लेकिन ऐसा नहीं है। नाम में बहुत कुछ रखा है। नाम संज्ञा है। हर व्यक्ति, स्थान, वस्तु आदि की पहचान है। व्यक्ति का नाम उसके जन्म के समय की सूक्ष्म गणना के आधार पर रखा जाता है। एक नाम विशेष से ही व्यक्ति को पूरे जीवन पुकारा जाता है। हालांकि लोगों के नाम बाद में बदलते भी रहते हैं। बचपन में उन्हें उनके नाम से जुड़े छोटे उपनामों से पुकारा जाता है, बाद में उसके नाम में श्री व जी या साहब जैसे शब्दों के साथ ही भाई, बहन, चाचा, ताऊ व दादा जैसे शब्द भी जुड़ जाते हैं। कई लोग मूलांक, भाग्यांक व नामांक के आधार पर या अन्य कारणों से भी अपने नाम में बदलाव करते हैं, और यह स्पष्ट दिखाई भी देता है कि नाम में इन छोटे परिवर्तनों के साथ व्यक्ति के व्यक्त्वि व भाग्य में भी परिवर्तन आता है। यह भी पढ़ें : बाबा नीब करौरी, जिन्होंने नैनीताल की फल पट्टी के सेब को चख कर बना दिया दुनिया का ‘एप्पल’, बाबा व उनके कैंची धाम के बारे में पूरी जानकारी अब सोचें कि किसी मीठी अच्छी वस्तु का नाम नीम या करेला रख दें तो क्या होगा ? कोई आप को नीम या करेला या आपके प्रिय संत को नीम-करेला या इससे मिलते-जुलते ‘नीम करौली’ शब्द से बोलने लगे तो आपको कैसा लगेगा या लगना चाहिए ? वह भी तब जबकि उनका इस शब्द या नाम से कोई संबंध न हो। फिर भी आम लोग तो दूर, अच्छे पढ़े-लिखे लोग और स्वयं उन संत के नाम से बनी वेबसाइट में भी उनका गलत नाम ‘नीम करौली’ लिखा जाए। यह भी पढ़ें : विराट-अनुष्का सहित हजारों श्रद्धालुओं ने किए बाबा नीब करौली के दर्शन आप समझ ही गए होंगे कि हम यह पूरी भूमिका बाबा नीब करौरी के बारे में बना रहे हैं, जिन्हें स्वयं उनके कैंची धाम की वेबसाइट में और उनके श्रद्धालुओं के द्वारा बाबा नीम करौली के नाम से पुकारा जा रहा है। उनके सही नाम की जगह उनके नाम का अपभ्रंस लेकर पुकारा जा रहा है। इंटरनेट सोशल मीडिया पर उनके सही नाम नीब करौरी की जगह नीम करौली शब्द अधिक प्रयोग और सर्च किया जा रहा है। यह भी पढ़ें : बाबा नीब करौरी की कृपा से महिला विश्व चैंपियनशिप में जड़ा ऐतिहासिक ‘गोल्डन पंच’बाबा जी व उनके नाम के बारे में सही जानकारी:बाबा जी के बारे में सही जानकारी यह है कि उनका जन्म आगरा के निकट फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर में जमींदार घराने में मार्गशीर्ष माह की अष्टमी तिथि को हुआ था। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मण दास शर्मा था। इस नाम से अब उत्तर प्रदेश के जिला फर्रुखाबाद में एक रेलवे स्टेशन भी है। यह भी पढ़ें : नाम के पहले अक्षर से जानें किसी भी व्यक्ति के बारे में सब कुछ बताया जाता है कि उनका 11 वर्ष की उम्र में विवाह हो गया था। इसके बाद बाबा जी ने जल्दी ही घर छोड़ दिया और करीब 10 वर्षों तक घर से दूर रहे। कहा जाता है कि उन्हें मात्र 17 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त हो गया था। गुजरात के बवानिया मोरबी में बाबा जी ने साधना की और वे वहां ‘तलैयां वाले बाबा’ के नाम से मशहूर हो गए और वृंदावन में वे ‘महाराज जी’ व ‘चमत्कारी बाबा’ के नाम से भी जाने गए। उनको ‘लक्ष्मण दास’, ‘हांड़ी वाला बाबा’, ‘तिकोनिया वाले बाबा’ व ‘भगवान जी’ आदि नामों से भी जाना जाने लगा। ऐसे में एक दिन अचानक उनके पिता उनसे मिलने पहुंचे और गृहस्थ जीवन का पालन करने को कहा। पिता के आदेश को मानते हुए वह घर वापस लौट आए और दोबारा गृहस्थ जीवन शुरू कर दिया। वे गृहस्थ जीवन के साथ-साथ धार्मिक और सामाजिक कामों में भी सहायता करते थे। गृहस्थ जीवन के दौरान उनके दो बेटे और एक बेटी हुई। लेकिन, कुछ समय बाद पुनः उनका घर-गृहस्थी में मन लगना बंद हो गया। इसके बाद 1958 के आस-पास उन्होंने फिर से घर त्याग कर दिया। यह भी पढ़ें : काम की बातें : अपने नाम में ऐसे मामूली सा बदलाव कर लाएं अपने भाग्य में चमत्कारिक बदलाव…बाबा ऐसे बने साधु व मिला ‘नीब करौरी नाम कहते हैं कि इस दौरान एक दिन बाबा ट्रेन में बिना टिकट के यात्रा कर रहे थे। अंग्रेज टीटी को पता चला तो उन्होंने उन्हें ‘नीब करौरी’ नाम के गांव के पास ट्रेन से उतार दिया। लेकिन यह क्या, बाबा के उतरने के बाद ट्रेन लाख प्रयत्नों के बावजूद यहां से चल नहीं सकी। बाद में एक स्थानीय एक हाथ वाले मजिस्ट्रेट से बाबा की महिमा जान रेलकर्मियों ने उन्हें आदर सहित वापस ट्रेन में बैठाया, जिसके बाद बाबा के ‘चल’ कहने पर ही ट्रेन चल पड़ी। तभी से इस स्थान पर ‘नीब करौरी’ नाम से रेलवे का छोटा स्टेशन बना। कहते हैं कि फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गाँव में ही वह सर्वप्रथम साधू के रूप में दिखाई दिए थे, इसलिए उन्हें ‘नीब करौरी’ बाबा कहा गया। यह भी पढ़ें : नैनीताल के हरदा बाबा-अमेरिका के बाबा हरिदासबाबा नीब करौरी के कैंची धाम की वेबसाईट के अनुसार भी जब महाराज-जी करीब 30 वर्ष की आयु के थे। कई दिनों तक, किसी ने उन्हें खाना नहीं दिया। भूख ने उन्हें निकटतम शहर के लिए ट्रेन में चढ़ने के लिए मजबूर कर दिया। जब कंडक्टर ने देखा कि एक युवा साधु प्रथम श्रेणी के कोच में बिना टिकट के बैठे हैं, तो उन्होंने ट्रेन का आपातकालीन ब्रेक लगा दिया और ट्रेन रुक गई। इसके बाद कुछ मौखिक बहस के बाद, महाराज जी को अनायास ही ट्रेन से उतार दिया गया। जिस स्थान पर ट्रेन रुकी थी वह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले का नीब करोरी गाँव था। ट्रेन से उतरने के बाद महाराज जी एक पेड़ की छांव में बैठ गए। यह भी पढ़ें : धनी बनना चाहते हैं तो जानें बाबा नीब करौरी द्वारा बताए धनी बनने के तीन उपाय‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। उन्हें उतारकर जब ट्रेन को चलाने का प्रयास किया गया तो ट्रेन हर संभव प्रयास करने के बाद भी चल नहीं पायी। इस पर महाराज-जी को जानने वाले एक हाथ वाले एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने रेलवे के अधिकारियों को सुझाव दिया कि वे उस युवा साधु को वापस ट्रेन में बिठा लें। शुरू में अधिकारी इसे अंधविश्वास मान रहे थे, लेकिन ट्रेन को आगे बढ़ाने के कई निराशाजनक प्रयासों के बाद उन्होंने इसे आजमाने का फैसला किया। यह भी पढ़ें : बाबा नीब करौरी के बताये उन संकेतों को जानें, जिनसे आपके जीवन में आने वाले हैं ‘अच्छे दिन’इस पर कई यात्री और रेलवे के अधिकारी महाराज-जी के पास प्रसाद के रूप में भोजन और मिठाई लेकर पहुंचे। उन्होंने अनुरोध किया कि वह ट्रेन में चढ़े। उन्होंने दो शर्तों पर सहमति व्यक्त की। रेलवे अधिकारियों को नीब करोरी गाँव के लिए एक स्टेशन बनाने (उस समय ग्रामीणों को निकटतम स्टेशन तक कई मील पैदल चलना पड़ता था) और रेलवे को साधुओं के साथ बेहतर व्यवहार करने की शर्त रखी। अधिकारियों ने अपनी शक्ति से यथासंभव करने का वादा किया। इसके बाद महाराज जी ट्रेन में सवार हो गए। तब उन्होंने महाराज-जी से ट्रेन चलाने के लिए कहा। महाराज-जी ने कहा, ‘उसे जाने दो।’ उनके ऐसा कहने पर ट्रेन आगे बढ़ गई। इसके बाद जल्द ही नीब करोरी में एक रेलवे स्टेशन बनाया गया और साधुओं को अधिक सम्मान दिया जाने लगा। कोई साधु बिना टिकट हो तो उसे इस तरह नहीं उतारा जाने लगा। यह भी पढ़ें : भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली तभी से उनका नाम ‘नीब करौरी बाबा’ पड़ गया। उनके कैंची धाम के मुख्य गेट पर भी यही नाम अंकित है। लेकिन उनका यह नाम कैसे, कब और क्यों नीब करौरी से ‘नीम करौली’ हो गया, इसकी किसी को सही जानकारी नहीं है। इसके पीछे एक ही कारण नजर आता है कि शायद नीब करौरी शब्द अधिक लोगों की समझ में नहीं आता होगा, और समाज में नीम-करेला शब्द तथा बहुत बुरे लोगों या वस्तुओं के लिए प्रयोग किए जाने वाले मुहावरे ‘एक तो करेला-ऊपर से नीम चढ़ा’ के बहुतायत में प्रयोग होने तथा नीब करौरी से मिलते -जुलते होने के कारण नीम करौली हो गया होगा। और समय बीतने के साथ अब यही शब्द देश-दुनिया में प्रचलित हो गया है। और यह कहना भी गलत नहीं होगा कि स्वयं कैंची धाम की वेबसाइट भी, जिस पर सही जानकारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, वह भी यही नाम दुष्प्रचारित कर रही है, या कहें कि बाबा जी का नाम बिगाड़ रही है। यह भी पढ़ें : भगवान राम की नगरी के समीप माता सीता का वन ‘सीतावनी’यहां हम यह भी कहना चाहते हैं कि नीम और करेला दोनों वनस्पतियां अपने कड़वे स्वाद के अलावा अत्यधिक गुणवान व लाभदायक भी हैं। लिहाजा बाबा नीब करौरी के नाम पर बनी भ्रमपूर्ण स्थिति को मंदिर प्रबंधन को भी दूर करना चाहिए। बताना चाहिए कि क्या बाबा जी का नीम करौली या नीम करेला से कोई संबंध रहा है। या कि मानें कि बाबा जी किसी तरह की कड़वी लेकिन गुणवान गोली या सलाह दिया करते थे, जिस कारण उनका नाम नीम करौली पड़ा। इस पर बनी भ्रम की स्थिति को दूर किए जाने और नाम को सही रूप में ही प्रयोग किए जाने की आवश्यकता है। यह भी पढ़ें : सच्चा न्याय दिलाने वाली माता कोटगाड़ी: जहां कालिया नाग को भी मिला था अभयदान(डॉ. नवीन जोशी) आज के अन्य नवीन समाचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationजानें स्त्री व पुरुषों के शरीर के दाएं और बाएं अंगों के बारे में बेहद रोचक जानकारी, जिससे बेहतर कर सकते हैं अपना जीवन… खुल गए बाबा केदारनाथ धाम के कपाट, यहां करें लाइव दर्शन…
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