देहरादून में गहराया जीवनसाथी का संकट: 35 हजार युवकों पर मात्र 11 हजार युवतियां, बिन शादी किए हो रहे बूढ़े

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नवीन समाचार, देहरादून, 10 अप्रैल 2026 (Crisis of Finding Spouse in Dehradun)। उत्तराखंड (Uttarakhand) जिसे विश्व स्तर पर एक सुरम्य विवाह गंतव्य (Wedding Destination) के रूप में जाना जा रहा है, वहाँ के स्थानीय युवाओं के लिए अपना घर बसाना अब एक दुरूह चुनौती सिद्ध हो रहा है। राजधानी देहरादून (Dehradun) से प्राप्त जिला अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग (Department of Economics and Statistics) की नवीन रिपोर्ट ने समाज की एक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत की है। आंकड़ों के अनुसार, जनपद में विवाह योग्य पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या में इतना भारी अंतर आ चुका है कि प्रत्येक तीन युवकों में से दो के लिए जीवनसाथी मिलना लगभग असंभव प्रतीत हो रहा है।

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Crisis of Finding Spouse in Dehradun देहरादून में कुंवारों के लिए खतरे की घंटी, शादी के लिए नहीं मिल रही लड़कियांरिपोर्ट के अनुसार, यह संकट अब केवल पिथौरागढ़ (Pithoragarh) या चम्पावत (Champawat) जैसे सीमावर्ती जनपदों तक सीमित नहीं रहा, जहाँ लोग विवाह हेतु पड़ोसी देश नेपाल (Nepal) पर निर्भर हैं, अपितु अब देहरादून (Dehradun) में भी लिंगानुपात (Sex Ratio) का असंतुलन चरम पर पहुँच गया है। सांख्यिकी विभाग के तथ्य उन धारणाओं को भी खंडित करते हैं जिनमें कहा जाता था कि लड़कियां पहाड़ों में रहने से मना करती हैं; वास्तविकता यह है कि विवाह योग्य आयु वर्ग में युवतियों की संख्या ही अत्यंत न्यून है।

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आंकड़ों का विश्लेषण: आयु वर्ग के अनुसार गंभीर असंतुलन

सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट में जनसंख्या के असंतुलन को स्पष्ट करने हेतु चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं:

  • 25 से 29 वर्ष: इस आयु वर्ग में विवाह की प्रतीक्षा कर रहे युवकों की संख्या 35,000 से अधिक है, जबकि युवतियों की संख्या मात्र 11,836 है।

  • 30 से 34 वर्ष: यहाँ 10,103 युवक अविवाहित हैं, जिनके सापेक्ष युवतियों की संख्या केवल 3,031 रह गई है।

  • 35 से 40+ वर्ष: जनपद में 7,025 ऐसे पुरुष हैं जिन्होंने विवाह की प्रतीक्षा में 35 वर्ष की आयु पार कर ली है। इनमें से 3,281 युवक तो 40 की दहलीज भी लांघ चुके हैं, जिससे उनके सामाजिक और पारिवारिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

बुजुर्गों का एकाकी जीवन और सामाजिक प्रभाव

यह समस्या केवल युवाओं तक सीमित नहीं है, अपितु वृद्धों के जीवन को भी प्रभावित कर रही है। आंकड़ों के अनुसार, देहरादून (Dehradun) में 60 से 80 वर्ष की आयु के 5,714 पुरुष पूर्णतः एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी आयु वर्ग में अकेले रहने वाली महिलाओं की संख्या 2,968 है। सेवा निवृत्ति (Retirement) के पश्चात जीवनसाथी का न होना वृद्धों के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

रिपोर्ट के इन निष्कर्षों पर राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तीव्र हो गई है। उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल (Ganesh Godiyal) ने इस स्थिति हेतु लिंगानुपात के साथ-साथ बेरोजगारी (Unemployment) और पलायन (Migration) को उत्तरदायी ठहराया है। उन्होंने तर्क दिया कि स्थायी आय और रोजगार के अभाव में युवा विवाह के निर्णय लेने में असमर्थ हैं। दूसरी ओर, विशेषज्ञों का मानना है कि बेटियों पर लगने वाले यह आरोप कि वे केवल नगरों में घर चाहने वाले वर चुनती हैं, पूर्णतः आधारहीन हैं क्योंकि मूल समस्या जनसंख्यात्मक असंतुलन (Demographic Imbalance) की है।

भविष्य की चुनौतियां और नीतिगत आवश्यकता

विवाह योग्य जनसंख्या में यह भारी अंतर आने वाले समय में सामाजिक संरचना को प्रभावित कर सकता है। क्या शासन और प्रशासन इस घटते लिंगानुपात और युवाओं के एकाकीपन को दूर करने हेतु कोई प्रभावी नीति (Policy) निर्मित करेंगे? यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, अपितु एक व्यापक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट का रूप ले रही है, जिसके समाधान हेतु शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जागरूकता के स्तर पर सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

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