जलवायु परिवर्तन से नैनीताल के बलिया नाला जलग्रहण क्षेत्र के जल स्रोतों पर असर, कुमाऊं विविद्यालय के शोध में सामने आए तथ्य

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मार्च 2026 (Climate Change Impacts Balia Nala)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का प्रभाव स्थानीय जल स्रोतों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कुमाऊं विश्वविद्यालय (Kumaun University) में प्रस्तुत एक शोध में सामने आया है कि नैनीताल के बलिया नाला (Balia Nala) जलग्रहण क्षेत्र में स्थित जल स्रोतों का जलस्तर घट रहा है और कई पारंपरिक स्रोत सूखने की स्थिति में पहुंच गए हैं।

अध्ययन के अनुसार बदलते तापमान, वर्षा के पैटर्न में बदलाव और अतिवृष्टि की बढ़ती घटनाओं के कारण क्षेत्र की नदियों, आर्द्रभूमियों और पारंपरिक जल प्रणालियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

बलिया नदी और सहायक नदियों के जलस्तर में कमी

(Climate Change Impacts Balia Nala)सुभाष चंद्र बोस राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (Subhash Chandra Bose Government Postgraduate College) रुद्रपुर की भूगोल विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. पूनम साह गंगोला (Dr. Poonam Sah Gangola) के निर्देशन में शोधार्थी वसीम अहमद (Wasim Ahmed) ने “Impact of Climate Change on Water Resources: A Case Study of Balia Catchment District Nainital” विषय पर अपना शोध प्रस्तुत किया।

पीएचडी की अंतिम मौखिक परीक्षा के दौरान उन्होंने बताया कि बलिया नदी (Balia River) और उसकी सहायक नदियों कुरिया गाड़ (Kuriya Gad) तथा नलेना गाड़ (Nalena Gad) में जलस्तर लगातार घट रहा है। अध्ययन के अनुसार क्षेत्र में पारंपरिक जल स्रोत जैसे धारे और नौले सूखने लगे हैं।

19 प्रतिशत जल स्रोत सूखे, 24 प्रतिशत मौसमी

शोध के निष्कर्षों में बताया गया कि अध्ययन क्षेत्र में लगभग 19 प्रतिशत जल स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि लगभग 24 प्रतिशत जल स्रोत मौसमी बनकर रह गए हैं।

इसके साथ ही आर्द्रभूमियाँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में सिमार और गजार कहा जाता है, भी धीरे-धीरे सिकुड़ रही हैं। इससे क्षेत्र के प्राकृतिक जल संतुलन और पारिस्थितिकी पर प्रभाव पड़ रहा है।

कृषि, बागवानी और आजीविका पर प्रभाव

अध्ययन में यह भी सामने आया कि क्षेत्र में तापमान में वृद्धि हो रही है और वर्षा का स्वरूप बदल रहा है। वर्षा के दिनों की संख्या कम हो रही है, जबकि कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं।

इन परिवर्तनों का असर कृषि, बागवानी और पशुपालन गतिविधियों पर पड़ रहा है। इससे स्थानीय लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और खाद्य सुरक्षा पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना जताई गई है।

समुदाय आधारित जल प्रबंधन की जरूरत

शोधार्थी वसीम अहमद ने सुझाव दिया कि जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए समुदाय आधारित जल प्रबंधन (Community-Based Water Management) को अपनाना आवश्यक है।

उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से जल स्रोतों के संरक्षण, रिचार्ज क्षेत्रों की सुरक्षा और जल प्रबंधन की प्रभावी रणनीतियों पर जोर दिया।

शोध को बताया महत्वपूर्ण

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (Jawaharlal Nehru University – JNU) नई दिल्ली से आए बाह्य परीक्षक प्रो. प्रवीण कुमार पाठक (Prof. Praveen Kumar Pathak) ने इस अध्ययन को हिमालयी क्षेत्रों के जल संसाधनों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बताया।

इस अवसर पर प्रो. आरसी जोशी (Prof. RC Joshi), डॉ. मनीषा त्रिपाठी (Dr. Manisha Tripathi), डॉ. मोहन लाल (Dr. Mohan Lal), डॉ. पीसी चन्याल (Dr. PC Chanyal), डॉ. विनीता (Dr. Vinita), डॉ. देवेंद्र (Dr. Devendra) और डॉ. दीपक (Dr. Deepak) सहित अन्य शोधार्थी उपस्थित रहे।

कुमाऊं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (KUTA) के अध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी (Prof. Lalit Tiwari) ने वसीम अहमद को पीएचडी उपाधि प्राप्त करने पर शुभकामनाएं दीं।

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