रामनगर में घर में डकैती व माँ के सामने 13-15 वर्षीय बच्चियों के सामूहिक दुष्कर्म के प्रकरण में बड़ा उलटफेर, उम्रकैद की सजा पाए पांच अभियुक्त दोषमुक्त

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नवीन समाचार, नैनीताल, 23 मार्च 2026 (Major Twist in Ramnagar Case from HC)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के जनपद नैनीताल (Nainital) के रामनगर (Ramnagar) में वर्ष 2016 की चर्चित डकैती और माँ के सामने नाबालिग बेटियों के साथ सामूहिक दुराचार प्रकरण में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय सामने आया है, जिसमें पूर्व में दोषी ठहराए गए अभियुक्तों को अब उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया है। यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया बल्कि साक्ष्यों की गुणवत्ता और जांच प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। साथ ही जांच और अभियोजन प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है?

(Major Twist in Ramnagar Case from HC) Maldhan chaur Ramnagar,Nainital,Uttarakhand | Ramnagarनैनीताल स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) से प्राप्त जानकारी के अनुसार न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी (Justice Ravindra Maithani) एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह (Justice Sidharth Sah) की खंडपीठ ने आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए शफीक कुरैशी (Shafiq Qureshi), रोहित (Rohit), आमिर मोहम्मद उर्फ छोटू (Aamir Mohammad alias Chhotu), निजामुद्दीन (Nizamuddin) और शौकीन मेवाती (Shaukeen Mewati) को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है।

2016 की रात, घर में घुसकर लूट और गंभीर आरोपों से दहला था क्षेत्र

अभियोजन के अनुसार 23-24 जुलाई 2016 की रात रामनगर के निकटवर्ती मालधनचौड़ (Maldhanchaur) क्षेत्र में 8 से 10 सशस्त्र बदमाश एक घर में घुसे, और परिवार के सदस्यों को बंधक बनाकर मारपीट की और नकदी व आभूषण लूटे। इसी दौरान माँ के सामने उसकी 13 व 15 वर्षीय दो नाबालिग बच्चियों के साथ गंभीर सामूहिक दुराचार के आरोप सामने आए, जिससे पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैल गया था।

2021 में सुनाई गई थी उम्रकैद की सजा

इस मामले में विशेष न्यायाधीश पॉक्सो (POCSO Court) हल्द्वानी (Haldwani) ने जनवरी 2021 में पांचों अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास सहित विभिन्न धाराओं में कठोर सजा सुनाई थी। उस समय इसे प्रदेश के चर्चित मामलों में गिना गया था।

पहचान में कमी और साक्ष्यों की कमजोरी से बदला पूरा मामला

“पहचान परेड नहीं, साक्ष्य कमजोर”—हाईकोर्ट का आधार

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा।

  • प्राथमिकी (FIR) में किसी अभियुक्त का नाम स्पष्ट नहीं था।
  • पीड़िताओं ने बताया कि हमलावरों के चेहरे ढके थे, जिससे उनकी पहचान संदिग्ध मानी गई।
  • न्यायालय में पहचान परेड (Test Identification Parade) भी नहीं कराई गई।

इन कारणों से अदालत ने कहा कि अभियुक्तों की पहचान विश्वसनीय रूप से स्थापित नहीं हो सकी।

चिकित्सा और बरामदगी साक्ष्य भी पाए गए कमजोर

अदालत ने यह भी पाया कि प्रारंभिक चिकित्सा परीक्षण में चोटों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, जबकि बाद की जांच में चोटें दर्ज की गईं। इससे साक्ष्यों पर संदेह उत्पन्न हुआ। इसके अलावा गहनों और हथियार की बरामदगी से जुड़े साक्ष्य भी विश्वसनीय नहीं पाए गए, क्योंकि प्रक्रिया में आवश्यक मानकों का पालन नहीं हुआ।

सभी अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश

अदालत ने आदेश दिया कि यदि अभियुक्त किसी अन्य प्रकरण में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें दण्ड प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code-CRPC) की धारा 437-ए के तहत बंधपत्र पर तत्काल रिहा किया जाए।

क्यों महत्वपूर्ण है यह निर्णय

यह फैसला न्यायिक प्रणाली में साक्ष्य की गुणवत्ता, जांच प्रक्रिया और अभियोजन की भूमिका को लेकर बड़ा संकेत देता है। प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या भविष्य में ऐसे गंभीर मामलों में जांच को और अधिक वैज्ञानिक और मजबूत बनाया जाएगा? इस निर्णय के बाद पीड़ित पक्ष, जांच एजेंसियों और विधिक विशेषज्ञों के बीच बहस तेज हो सकती है। यह मामला भविष्य में न्यायिक सुधार, पुलिस जांच और साक्ष्य संकलन प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।

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