नवीन समाचार, नैनीताल, 29 जनवरी 2026 (HC on Work Charge Employee)। नैनीताल (Nainital) स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) ने लोक निर्माण विभाग (Public Works Department) और सिंचाई विभाग (Irrigation Department) के नियमित वर्कचार्ज कर्मचारियों की पेंशन रोकने संबंधी वित्त विभाग (Finance Department) के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। यह आदेश लगभग दस हजार सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों तथा उनके आश्रितों को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा था। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से इस पूरे प्रकरण पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
मामले की सुनवाई अवकाशकालीन पीठ में न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय (Justice Subhash Upadhyay) की एकलपीठ के समक्ष हुई। याचिका सेवानिवृत्त कर्मचारी राम सिंह सैनी (Ram Singh Saini) सहित अन्य की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे वर्षों तक नियमित वर्कचार्ज कर्मचारी के रूप में सेवाएं देते रहे और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन का लाभ भी मिल रहा था, जिसे अचानक बंद कर दिया गया।
पृष्ठभूमि और विवाद का मूल
याचिका में बताया गया कि राज्य सरकार के वित्त विभाग ने 16 जनवरी 2026 को एक कार्यालय आदेश जारी कर पहली अक्टूबर 2005 के बाद नियमित किए गए वर्कचार्ज कर्मचारियों को पेंशन के दायरे से बाहर कर दिया। इस आदेश के आधार पर 2021-22 में सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों की पेंशन भी रोक दी गई, जबकि उन्हें पहले से यह लाभ मिल रहा था। साथ ही सेवारत कर्मचारियों को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (National Pension System – NPS) से जोड़ने की बात कही गई।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के वर्ष 2018 के स्पष्ट निर्णय के विरुद्ध है। प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (Prem Singh vs State of Uttar Pradesh) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि नियमित किए गए वर्कचार्ज कर्मचारियों की वर्कचार्ज सेवा अवधि को पेंशन गणना में जोड़ा जाएगा और उन्हें पेंशन सहित अन्य सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएंगे। इसके बाद वर्षों तक राज्य में 1980 से 2025 के बीच कार्यरत सेवानिवृत्त कर्मियों और मृतक आश्रितों को पेंशन का भुगतान किया जाता रहा।
मानवीय और सामाजिक प्रभाव
इस आदेश के कारण बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी प्रभावित हुए, जिन्होंने अपना पूरा जीवन विभागीय कार्यों में लगाया। पेंशन रुकने से बुजुर्ग कर्मचारियों और उनके परिवारों के समक्ष आजीविका और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याएं खड़ी हो गई थीं। यही कारण रहा कि इस मुद्दे ने न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया।
न्यायालय की टिप्पणी और आगे की प्रक्रिया
उच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया माना कि वित्त विभाग का आदेश पूर्ववर्ती न्यायिक निर्देशों के विपरीत प्रतीत होता है। इसी आधार पर पेंशन रोकने के आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया गया है। अब अगली सुनवाई में यह तय होगा कि राज्य सरकार अपने निर्णय को किस आधार पर उचित ठहराती है या फिर पेंशन व्यवस्था को पूर्ववत बहाल किया जाएगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जुड़े निर्णय का असर न केवल लोक निर्माण और सिंचाई विभाग तक सीमित रहेगा, बल्कि भविष्य में अन्य विभागों के नियमित वर्कचार्ज कर्मचारियों की पेंशन नीति पर भी पड़ेगा।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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