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नैनीताल की रामलीला की एक विशेषता यह भी, यहां 41 वर्षों से रामकाज कर रहे हैं भीम व विमल

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पिछले 41 वर्षों से रामलीला में रूप सज्जा कर रहे भीम सिंह कार्की अपने कार्य के दौरान।

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अक्टूबर 2021। नैनीताल की रामलीला की कई अनूठी विशिष्टताएं हैं। इन्हीं में दो व्यक्तियों भीम सिंह कार्की व विमल चौधरी का जिक्र करना भी जरूरी है। भीम सिंह पिछले 41 वर्षों से मल्लीताल की रामलीला में रूप सज्जा का कार्य संभाल रहे हैं, जबकि करीब इतना ही समय विमल चौधरी को यहां लगातार वस्त्र सज्जा करते हुए हो गया है। भीम सिंह बताते हैं इधर कुछ कुछ लोग इस कार्य में आ रहे हैं। रावण के पात्र कैलाश जोशी भी अपना अभिनय न होने पर मदद करते हैं, अन्यथा वह सभी पात्रों की रूप सज्जा का कार्य इतने वर्षों से लगातार रामकाज की तरह कर रहे हैं।

रामलीला के बीच बमुश्किल वह एक दिन नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किए जाने वाले राम-केवट संवाद के लिए निकालते हैं, जिसमें वह केवट की भूमिका में होते हैं। गौरतलब है कि नगर की तल्लीताल की रामलीला में सईब अहमद के पास रूप सज्जा की जिम्मेदारी रहती है। वह भी पूरे मनोयोग से पिछले कई दशकों से राम, रावण सहित अन्य पात्रों की रूप सज्जा करते हैं। देखें विडियो : राम-केवट नृत्य नाटिका

रामलीला में हुआ कुंभकर्ण-मेघनाद का वध, राम मंदिर का हुआ शुभारंभ
नैनीताल। सरोवरनगरी में पिछले आठ दिनों से चल रही रामलीला अपने मुकाम पर पहुंचती जा रही है। नगर के मल्लीताल में श्रीराम सेवक सभा के तत्वावधान में होने वाली रामलीला में बृहस्पतिवार को रावण-कुंभकर्ण संवाद, कुंभकर्ण वध, मेघनाद वध, सुलोचना सती आदि की लीला का मंचन हुआ। बताया गया कि आगे शुक्रवार को दशहरे के अवसर पर सभा भवन में रावण के पुतले का दहन शाम सात बजे से आतिषबाजी के साथ किया जाएगा। साथ ही होली महोत्सव पर आयोजित हुई फोटो प्रतियोगिता के विजेताओं को एकादशी यानी 16 अक्टूबर को पुरस्कृत किया जाएगा।

इससे पूर्व आज नवमी के दिन श्रीराम सेवक सभा का वार्षिकोत्सव भी मनाया गया। इस अवसर पर हवन, दुर्गा सप्तशती का पाठ किया गया, साथ ही सभा के सदस्यों की बैठक भी हुई। बैठक में सभा के कार्यों एवं आय-व्यय के ब्यौरे रखे गए। इसके अलावा सभा भवन में बनाए गए भगवान राम के सीता, लक्ष्मण व हनुमान जी की मूर्तियों युक्त मंदिर को संुदरकांड के पाठ तथा प्राण-प्रतिष्ठा के उपरांत श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। आयोजन में पंडित भगवती प्रसाद जोशी, राजस्थान सरकार के अपर मुख्य सचिव सुधांशु पंत व अपर मुख्य वन संरक्षक कपिल जोशी भी सपत्नीक शामिल हुए।

यह भी पढ़ें : यहां 28 वर्षों से लगातार बन रहे रावण के किरदार के लिए बजती हैं सीटियां, महिला कलाकार वर्षों से बनती हैं राम

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अक्टूबर 2021। सरोवरनगरी में इन दिनों शाम से लेकर मध्य रात्रि के बाद तक रामलीलाओं का मंचन हो रहा है और धार्मिक माहौल बना हुआ है। इस बार नवरात्र नौ की जगह आठ ही दिन के लिए हैं, इसलिए हर दिन लीला का कुछ अधिक मंचन कर एक दिन की रामलीला को शेष आठ दिनों में जोड़कर रामलीला की जा रही है। नगर के मल्लीताल स्थित श्रीराम सेवक सभा द्वारा आयोजित हो गई रामलीला की अपनी अलग पहचान, प्रसिद्धि और कलाकारों की वेशभूषा, मंच संयोजन, लाइटिंग एवं साउंड सिस्टम में भव्यता है। यहां कलाकारों का लंबा अनुभव भी उनके अभिनय में दिखता है। देखें विडियो : रावण व सीता का ऐसा संवाद कहीं और न देखा होगा….

परदे के पीछे रावण के लोकप्रिय पात्र कैलाश जोशी के साथ फोटो खिंचवाते राम-लक्ष्मण, मेघनाद व अक्षय कुमार बने कलाकार।

उदाहरण के लिए कैलाश जोशी पिछले 28 वर्षों से यहां एवं उससे पूर्व सूखाताल की रामलीला में रावण का अभिनय करते आ रहे हैं। ऐसे में उनके मंच पर आने पर सीटियां बजने लगती हैं। दर्शक मंच के आगे उनके चित्र व वीडियो लेने के साथ ही मंच के पीछे भी उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए लालायित रहते हैं। दर्शक ही नहीं राम-लक्ष्मण के पात्र भी यहां रावण के साथ फोटो खिंचवाते हैं।

नगर के मल्लीताल में आयोजित हो रही रामलीला का एक दृश्य।

इसके अलावा नैनीताल की रामलीला की एक विशेषता यह भी है कि यहां न केवल कमोबेश सभी महिला किरदार महिला कलाकारों के द्वारा निभाए जाते हैं, वरन राम-लक्ष्मण जैसे मुख्य पात्र भी महिला कलाकारों के द्वारा निभाए जाते रहे हैं। यहां सोनी जंतवाल पिछले कई वर्षों से राम का चरित्र निभा रही हैं।

नैनीताल में 1880 में हुई थी रामलीला की शुरुआत
नैनीताल। सरोवरनगरी में 1880 में रामलीला शुरू होने के साथ सवा सौ वर्ष से अधिक लंबा इतिहास है। यहां 1880 में नगर के दुर्गापुर-बीर भट्टी में नगर के संस्थापकों में शुमार मोती राम साह के प्रयासों से कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत हुई। वहीं शहर में 1912 में पहली बार मल्लीताल में कृष्णा साह ने अल्मोड़ा से कलाकारों को लाकर रामलीला का मंचन करवाया, जबकि स्थानीय कलाकारों के द्वारा 1918 में यहां रामलीला प्रारंभ हुई। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत भी नगर के तल्लीताल में होने वाली रामलीला कमेटी के प्रथम अध्यक्ष रहे।

यह भी पढ़ें : कुमाउनी रामलीला का इतिहास : 1830 में मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत

Ramlila-कुमाऊं की रामलीला की है देश में अलग पहचान
डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होने वाली कुमाउनी रामलीला की अपनी मौलिकता, कलात्मकता, संगीत एवं राग-रागिनियों में निबद्ध होने के कारण देश भर में अलग पहचान है। खास बात यह भी है कि कुमाउनी रामलीला की शुरुआत कुमाऊं के किसी स्थान के बजाय 1830 में यूपी के रुहेलखंड मंडल के मुरादाबाद से होने के प्रमाण मिलते हैं। वहीं 1943 में नृत्य सम्राट उदयशंकर और महामना मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों का भी कुमाउनी रामलीला से जुड़ाव रहा है। उदयशंकर के कल्चरल सेंटर ने पंचवटी का सेट लगाकर उसके आसपास शेष दृश्यों का मंचन तथा छायाओं के माध्यम से फंतासी के दृश्य दिखाने करने जैसे प्रयोग किए, जिनका प्रभाव अब भी कई जगह रामलीलाओं में दिखता है। वहीं महामना की पहल पर प्रयाग के गुजराती मोहल्ले में सर्वप्रथम कुमाउनी रामलीला का मंचन हुआ था। देखें विडियो : 

Devbhumi Sandesh, October 2014
देवभूमि सन्देश, अक्तूबर 2014, उत्तराखंड सरकार की पत्रिका

हालांकि कुमाऊं में रामलीला की शुरुआत 1860 में अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई थी, जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवीदत्त जोशी को जाता है। लेकिन यह भी बताया जाता है कि श्री जोशी ने ही इससे पूर्व 1830 में यूपी के मुरादाबाद में ऐसी ही कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत की थी। इसके 20 वर्षों के बाद 1880 में नैनीताल के दुर्गापुर-बीर भट्टी में नगर के संस्थापकों में शुमार मोती राम साह के प्रयासों से कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत हुई। आगे 1890 में बागेश्वर में शिव लाल साह तथा 1902 में देवी दत्त जोशी ने ही पिथौरागढ़ में रामलीला की शुरुआत की। दुर्गापुर नैनीताल का बाहरी इलाका है, इस लिहाज से नैनीताल शहर में 1912 में पहली बार मल्लीताल में कृष्णा साह ने अल्मोड़ा से कलाकारों को लाकर रामलीला का मंचन करवाया, जबकि स्थानीय कलाकारों के द्वारा 1918 में यहां रामलीला प्रारंभ हुई। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत 1903 में तल्लीताल रामलीला कमेटी के प्रथम अध्यक्ष रहे। 1910 के आसपास भीमताल में रामलीला का मंचन प्रारम्भ हुआ। 1907 से रामलीला को लिखित रूप में सर्वसुलभ बनाने के प्रयासों के अन्तर्गत रामलीला नाटकों को प्रकाशित करने का वास्तविक कार्य प्रारंभ हुआ। पंडित राम दत्त जोशी, केडी कर्नाटक, गांगी सााह, गोविन्द लाल साह, गंगाराम पुनेठा, कुंवर बहादुर सिंह आदि के रामलीला नाटक प्रकाशित हुए। रामलीलाओं में नारद मोह, अश्वमेध यज्ञ, कबन्ध-उद्धार, मायावी वध व श्रवण कुमार आदि के प्रसंगों का मंचन भी किया जाता है।

नैनीताल के प्रसिद्ध दशहरा में भव्य आतिशबाज़ी के शानदार नज़ारे :

पारसी थियेटर व ब्रज के लोक गीतों की भी मिलती है झलक

नैनीताल। कुमाऊं की रामलीला में बोले जाने वाले संवादों, धुन, लय, ताल व सुरों में पारसी थियेटर, नौटंकी, ब्रज की रास तथा कव्वाली पार्टियो का भी काफी प्रभाव दिखता है, जो इसे अन्य स्थानों की रामलीलाओं से अलग भी करता है। जानकारों के अनुसार कुमाउनी रामलीला में पात्रों के संवादों में आकर्षण व प्रभावोत्पादकता लाने के लिये कहीं-कहीं स्थानीय बोलचाल के व नेपाली के सरल शब्दों के साथ ही उर्दू की गजल का सम्मिश्रण भी दिखता है, जबकि रावण के दरबार में कुमाउनी शैली के नृत्य का प्रयोग किया जाता है। संवादों में गायन को अभिनय की अपेक्षा अधिक तरजीह दी जाती है। रामचरितमानस के दोहों व चौपाईयों पर आधारित गेय संवाद हारमोनियम की सुरीली धुन और तबले की गमकती गूंज के साथ दादर, कहरुवा, चांचर व रुपक तालों में निबद्ध रहते हैं। कई जगहों पर गद्य रुप में संवादों का प्रयोग भी होता है। रामलीला मंचन के दौरान नेपथ्य से गायन तथा अनेक दृश्यों में आकाशवाणी की उदघोषणा भी की जाती है। रामलीला प्रारम्भ होने के पूर्व सामूहिक स्वर में रामवन्दना “श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन“ का गायन किया जाता है। दृश्य परिवर्तन के दौरान खाली समय में ठेठर (विदूशक-जोकर) अपने हास्य गीतों व अभिनय कला से दर्शकों का मनोरंजन करता है।

अभिनय की पाठशाला भी :

कुमाउनी रामलीला कलाकारों के लिए अभिनय की पाठशाला भी साबित होती रही है। कोरस गायन, नृत्य आदि में कुछ महिला पात्रों के अलावा अधिकांशतया सभी पात्र पुरुष होते हैं, लेकिन इधर नैनीताल में मल्लीताल की रामलीला में राम जैसे मुख्य एवं पुरुष पात्रों को भी बालिकाओं द्वारा निभाने की मिसाल मिलती है। वहीं सूखाताल सहित अन्य जगहों पर बालिकाएं भी स्त्री पात्रों को निभा रही हैं। सामान्यतया रामलीला का मंचन शारदीय नवरात्र के दिनों में रात्रि में होता है, परन्तु जागेश्वर में गर्मियों में और हल्द्वानी में दिन में भी रामलीला मंचन होने के उदाहरण मिलते हैं। नैनीताल के साथ अल्मोड़ा के ‘हुक्का क्लब’ की रामलीलायें काफी प्रसिद्द हैं। हल्द्वानी में उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत और अपर जिलाधिकारी हरवीर सिंह द्वारा भी रामलीला में दशरथ व जनक के किरदार निभाए गए हैं। कुमाउनी रामलीला दिवंगत सिने अभिनेता निर्मल पाण्डेय सहित अनेक कलाकारों की भी अभिनय की प्रारंभिक पाठशाला रही है।

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है नैनीताल की रामलीला

अनवर रजा ऋषि विश्वामित्र के किरदार में।

नैनीताल। सरोवरनगरी में रामलीलाओं में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी देखने को मिलती है। नगर के सूखाताल की रामलीला में अनवर रजा जहां ऋषि विश्वामित्र सहित कई किरदार निभा रहे हैं। वहीं मल्लीताल की रामलीला में मो. खुर्शीद हुसैन श्रवण कुमार के पिता शांतनु व ब्रह्मा तथा जावेद हुसैन देवराज इंद्र के किरदार निभा रहे हैं, जबकि सूखाताल की रामलीला के आयोजन में सांस्कृतिक सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे नासिर अली भी शांतनु सहित कई किरदार निभा रहे हैं। वहीं तल्लीताल की रामलीला में मो. सईब पात्रों के मेकअप में योगदान देते हैं।

यह भी पढ़ें : रहीम बनाते हैं रावण, और सईब सजाते हैं रामलीला

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है सूखाताल की रामलीला

सूखाताल की रामलीला का एक दृश्य

-सीमित संसाधनों के बावजूद 60 वर्षों से अनवरत हो रहा सफल संचालन
नैनीताल। यूं सरोवरनगरी में रामलीलाओं का 1880 से चला आ रहा इतिहास है, किंतु सूखाताल क्षेत्र में वर्ष 1956 से अनवरत बेहद सीमित संसाधनों से हो रही रामलीला की अपनी अलग पहचान है। आदर्श रामलीला एवं जन कल्याण समिति सूखाताल के तत्वावधान में आयोजित होने वाली यह रामलीला जहां आज भी ग्रामीण क्षेत्रों की परंपरागत राग-रागिनियों युक्त कुमाउनी रामलीला की झलक पेश करती है, वहीं साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ ही समाज के सभी वर्गों को मंच प्रदान करने की मिसाल पेश करना भी इसकी अलग पहचान है। बीते वर्षों में कलाकारों पर हो रही मेहनत, नयी पीढ़ी को हस्तांतरित की जा रही इस संस्कृति के कारण भी सूखाताल की रामलीला नगर की पहचान बन गयी है।
शनिवार को यहां केकई मंथरा, केकई दशरथ व केकई राम के संवादों तथा श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ वन गमन के भावपूर्ण दृश्यों का देर रात्रि तक मंचन हुआ। राम के रूप में दीपक, लक्ष्मण कमल, सीता पूजा, केकई तुषार पंत, मंथरा मुकेश धस्माना व दशरथ के रूप में मोहन राम आदि ने अपने अभिनय से दर्शकों को देर रात्रि तक बांधे रखा। आयोजन में समिति के अध्यक्ष दीप चंद्र भट्ट, संरक्षक केसी पंत, उपाध्यक्ष सावित्री सनवाल, माया पंत व हेमा साह के साथ ही सचिव रितेश साह, महासचिव मोहित साह, कोषाध्यक्ष विनय चौहान, सह कोषाध्यक्ष नितेश पंत तथा सांस्कृतिक सचिव नासिर खान व भूमिका पंत के साथ ही भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य गोपाल रावत, पिंकी, प्राची बिष्ट, विनोद कुमार, आशीष सनवाल, पंकज पंत आदि भी उल्लेखनीय भूमिका निभाते हुए सहयोग करते हैं।

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देखें 7वें दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला :

देखें छठे दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला :

देखें पांचवे दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला : 

देखें चौथे दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला :

देखें तीसरे दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला : 

देखें दूसरे दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला :

देखें पहले दिन की पहली डिजिटल कुमाउनी रामलीला :

नवीन समाचार, नैनीताल, 18 अक्टूबर 2020। कोरोना काल के अनलॉक 5.0 के दौर में तमाम पाबंदियां समाप्त होने के बाद मंदिरों में आस्था एक बार पुनः उमड़ आई है। शुक्रवार को शारदीय नवरात्र शुरू होने के साथ मंदिरों में सैलानियों की पूर्व की तरह भीड़भाड़ रही। खासकर नगर की आराध्य देवी माता नयना देवी के मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का दर्शनार्थ तांता लगा रहा। मंदिर प्रशासन के द्वारा थर्मल स्कैनिंग एवं फेस मास्क एवं सैनिटाइजर के प्रयोग के साथ सैलानियों को दर्शनों की अनुमति दी गई। नगर के अन्य मंदिरों में भी इस दौरान श्रद्धालुओं ने पहुंचकर शीष नवाए जबकि अन्य बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घरों से भी प्रथम नवरात्र की पूजा-आराधना की। उल्लेखनीय है इस वर्ष वासंतिक नवरात्र पर लोग कोरोना का व्यापक प्रभाव एवं लॉक डाउन होने के कारण मंदिरों में प्रवेश नहीं कर पाए थे।

डिजिटल-ऑनलाइन माध्यम से शुरू हुई रामलीला
नैनीताल। सरोवनगरी में 1880 के दौर से शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन से दशमी तक रामलीलाओं के आयोजन की ऐतिहासिक परंपरा रही है। नगर में चार स्थानों-मल्लीताल, सूखाताल, सात नंबर एवं तल्लीताल में रामलीलाओं के आयोजन होते रहे हैं, जिनमें हजारों की संख्या में दर्शनार्थी देर रात्रि तक जुटते हैं। लेकिन इस वर्ष परंपरागत तरीके से रामलीलाओं का आयोजन नहीं हो पा रहा है। अलबत्ता, नगर वासी रामलीलाओं के दो आयोजनों को टीवी एवं ऑनलाइन माध्यम से देख सकेंगे। नगर की प्रयोगांक संस्था पहले ही जूम लेंड में डिजिटल रामलीला रिकॉर्ड कर चुकी है। इसका शनिवार शाम से केबल टीवी एवं डिजिटल माध्यमों पर प्रसारण किया जाना था। तकनीकी कारणों से पहले दिन प्रसारण प्रभावित रहा। अलबत्ता हम इसे यहां उपलब्ध करा रहे हैं। वहीं इसी तरह तल्लीताल की रामलीला इस बार पुराने रामलीला स्टेज में दिन में बंद कमरे में आयोजित होने के साथ इसका वीडियो रिकॉर्ड किया गया। आयोजक संस्था के अध्यक्ष रवि पांडे ने बताया कि रामलीला मंचन का परंपरागत तौर पर पूर्व अध्यक्ष भुवन लाल साह ने शुभारंभ किया। इस रिकॉर्डेड रामलीला का शाम को आठ बजे से केबल टीवी एवं ऑनलाइन माध्यम से प्रसारण किया जाएगा।

इस वर्ष दशमी पर नहीं होगा रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलों का दहन
नैनीताल। नवरात्र के दौरान हर वर्ष नगर में धार्मिक-सामाजिक संस्था श्रीराम सेवक सभा के तत्वावधान में ऐतिहासिक फ्लैट्स मैदान में रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन किया जाता रहा है। इस आयोजन में प्रति वर्ष 30-35 हजार तक लोग जुटते रहे हैं। श्रीराम सेवक सभा के महासचिव जगदीश बवाड़ी ने बताया कि इस वर्ष कोरोना के दृष्टिगत सामाजिक दूरी बनाने के उद्देश्य से आयोजित नहीं किया जा रहा है। इसकी जगह सभा के लोग प्रतिदिन शाम को श्री हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे एवं दशमी के दिन सुंदरकांड का पाठ किया जाएगा।

यह भी पढ़ें : विधायक ने सराहा ‘डिजिटल कुमाउनी रामलीला’ का प्रयास, नवरात्र में हर रोज घर बैठे देखी जा सकेगी..

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अक्टूबर 2020। कोरोना की महामारी के दौर में इस वर्ष 1830 से अनवरत आयोजित हो रही कुमाउनी रामलीला का क्रम टूटने की स्थितियों के बीच नैनीताल के रंगकर्मी एक नई ‘उम्मीद की किरन’ की तरह आगे आए हैं। यहां इस वर्ष एक अनोखा प्रयोग करते हुए प्रयोगांक सोसायटी फॉर सोशियल एंड इन्वारनमेंट डेवलपमेंट नैनीताल के कलाकारों के द्वारा ‘कुमाउनी रामलीला’ आयोजित होने जा रही हैं। डिजिटल प्रारूप पर ऑनलाइन एवं टीवी पर नजर आने वाली यह कुमाउनी रामलीला नवरात्रों में परंपरागत तरीके से प्रतिदिन प्रदर्शित की जाएगी। मंगलवार को स्थानीय विधायक संजीव आर्य ने भी डिजिटल रामलीला के मंचन में पहुंचकर आयोजक संस्था एवं कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
इस नए प्रयोग को आगे बढ़ा रहे निर्देशक संतोख बिष्ट ने बताया कि मात्र एक सप्ताह की तैयारी में, परंपरागत रामलीला इस वर्ष छूटने न पाए इस उद्देश्य से प्रयोगांक संस्था के द्वारा बेहद सीमित साधनों में इस रामलीला का आयोजन किया जा रहा है। रामलीला में परंपरागत राग-रागिनियों, चौपाई, छंद, दोहा व राधेश्याम वाचक आदि का प्रयोग किया जाएगा, साथ ही थियेटर की छवि भी मंचन में रखी जा रही है। वेषभूषा में सीमित संसाधनों की वजह से परंपरागत रामलीला से थोड़ा अलग वस्त्रों का प्रयोग किया जाएगा। उन्होंने एक दिलचस्प बात बताते हुए कहा कि इस रामलीला में नैनीताल की सभी सहित ज्योलीकोट की रामलीला कमेटियों का भी सहयोग मिल रहा है। खास बात रहेगी कि इस रामलीला में राम का चरित्र सूखाताल में राम का चरित्र निभाने वाले कलाकार निभाएंगे। इसी तरह लक्ष्मण तल्लीताल के, सीता राम सेवक सभा मल्लीताल की एवं बाणासुर व विभीषण ज्योलीकोट के होंगे।
रामलीला की क्रिएटिव टीम में मिथिलेश पांडे, मदन मेहरा, मुकेश धस्माना व कौशल साह जगाती, सहयोगी निर्देशक चारु तिवारी, सहायक निर्देशक पवन कुमार व वैभव जोशी, असिस्टेंट डायरेक्टर-द्वितीय सोनी जंतवाल, संगीत निर्देशक नरेश चम्याल, सहयोगी संगीत निर्देशक नवीन बेगाना, संगीत सहायक रवि व संजय, कैमरा निर्देशक दीपक पुल्स, सहयोगी कैमरा निर्देशक अदिति खुराना, सहायक कैमरा निर्देशक अमित विद्यार्थी, तकनीकी टीम में आकाश नेगी, अजय पवार, सौरभ कुमार व विनय राणा, स्टिल फोटोग्राफी अमित साह, वेषभूषा मदन मेहरा, सहायक सोनी जंतवाल व जावेद के साथ ही मेकअप में अनवर रजा, जावेद, सईब, सोनी जंतवाल व गंगोत्री के साथ ही उमेश कांडपाल ‘सोनी’, सागर सोनकर, शक्ति, लता त्रिपाठी, मो. खुर्शीद, डा. मोहित सनवाल, अमर, लक्की बिष्ट, बॉबी तथा श्रीराम सेवक सभा के अध्यक्ष मनोज साह, महासचिव जगदीश बवाड़ी व राजेंद्र बजेठा सहित अनेक अन्य लोग भी सहयोग कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें : 1830 में मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत

Ramlila-कुमाऊं की रामलीला की है देश में अलग पहचान
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होने वाली कुमाउनी रामलीला की अपनी मौलिकता, कलात्मकता, संगीत एवं राग-रागिनियों में निबद्ध होने के कारण देश भर में अलग पहचान है। खास बात यह भी है कि कुमाउनी रामलीला की शुरुआत कुमाऊं के किसी स्थान के बजाय 1830 में यूपी के रुहेलखंड मंडल के मुरादाबाद से होने के प्रमाण मिलते हैं। वहीं 1943 में नृत्य सम्राट उदयशंकर और महामना मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों का भी कुमाउनी रामलीला से जुड़ाव रहा है। उदयशंकर के कल्चरल सेंटर ने पंचवटी का सेट लगाकर उसके आसपास शेष दृश्यों का मंचन तथा छायाओं के माध्यम से फंतासी के दृश्य दिखाने करने जैसे प्रयोग किए, जिनका प्रभाव अब भी कई जगह रामलीलाओं में दिखता है। वहीं महामना की पहल पर प्रयाग के गुजराती मोहल्ले में सर्वप्रथम कुमाउनी रामलीला का मंचन हुआ था।

नैनीताल के प्रसिद्ध दशहरा में भव्य आतिशबाज़ी के शानदार नज़ारे :

Devbhumi Sandesh, October 2014
देवभूमि सन्देश, अक्तूबर 2014, उत्तराखंड सरकार की पत्रिका

हालांकि कुमाऊं में रामलीला की शुरुआत 1860 में अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई थी, जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवीदत्त जोशी को जाता है। लेकिन यह भी बताया जाता है कि श्री जोशी ने ही इससे पूर्व 1830 में यूपी के मुरादाबाद में ऐसी ही कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत की थी। इसके 20 वर्षों के बाद 1880 में नैनीताल के दुर्गापुर-बीर भट्टी में नगर के संस्थापकों में शुमार मोती राम साह के प्रयासों से कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत हुई। आगे 1890 में बागेश्वर में शिव लाल साह तथा 1902 में देवी दत्त जोशी ने ही पिथौरागढ़ में रामलीला की शुरुआत की। दुर्गापुर नैनीताल का बाहरी इलाका है, इस लिहाज से नैनीताल शहर में 1912 में पहली बार मल्लीताल में कृष्णा साह ने अल्मोड़ा से कलाकारों को लाकर रामलीला का मंचन करवाया, जबकि स्थानीय कलाकारों के द्वारा 1918 में यहां रामलीला प्रारंभ हुई। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत 1903 में तल्लीताल रामलीला कमेटी के प्रथम अध्यक्ष रहे। 1910 के आसपास भीमताल में रामलीला का मंचन प्रारम्भ हुआ। 1907 से रामलीला को लिखित रूप में सर्वसुलभ बनाने के प्रयासों के अन्तर्गत रामलीला नाटकों को प्रकाशित करने का वास्तविक कार्य प्रारंभ हुआ। पंडित राम दत्त जोशी, केडी कर्नाटक, गांगी सााह, गोविन्द लाल साह, गंगाराम पुनेठा, कुंवर बहादुर सिंह आदि के रामलीला नाटक प्रकाशित हुए। रामलीलाओं में नारद मोह, अश्वमेध यज्ञ, कबन्ध-उद्धार, मायावी वध व श्रवण कुमार आदि के प्रसंगों का मंचन भी किया जाता है।

पारसी थियेटर व ब्रज के लोक गीतों की भी मिलती है झलक

नैनीताल। कुमाऊं की रामलीला में बोले जाने वाले संवादों, धुन, लय, ताल व सुरों में पारसी थियेटर, नौटंकी, ब्रज की रास तथा कव्वाली पार्टियो का भी काफी प्रभाव दिखता है, जो इसे अन्य स्थानों की रामलीलाओं से अलग भी करता है। जानकारों के अनुसार कुमाउनी रामलीला में पात्रों के संवादों में आकर्षण व प्रभावोत्पादकता लाने के लिये कहीं-कहीं स्थानीय बोलचाल के व नेपाली के सरल शब्दों के साथ ही उर्दू की गजल का सम्मिश्रण भी दिखता है, जबकि रावण के दरबार में कुमाउनी शैली के नृत्य का प्रयोग किया जाता है। संवादों में गायन को अभिनय की अपेक्षा अधिक तरजीह दी जाती है। रामचरितमानस के दोहों व चौपाईयों पर आधारित गेय संवाद हारमोनियम की सुरीली धुन और तबले की गमकती गूंज के साथ दादर, कहरुवा, चांचर व रुपक तालों में निबद्ध रहते हैं। कई जगहों पर गद्य रुप में संवादों का प्रयोग भी होता है। रामलीला मंचन के दौरान नेपथ्य से गायन तथा अनेक दृश्यों में आकाशवाणी की उदघोषणा भी की जाती है। रामलीला प्रारम्भ होने के पूर्व सामूहिक स्वर में रामवन्दना “श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन“ का गायन किया जाता है। दृश्य परिवर्तन के दौरान खाली समय में ठेठर (विदूशक-जोकर) अपने हास्य गीतों व अभिनय कला से दर्शकों का मनोरंजन करता है।

अभिनय की पाठशाला भी :

कुमाउनी रामलीला कलाकारों के लिए अभिनय की पाठशाला भी साबित होती रही है। कोरस गायन, नृत्य आदि में कुछ महिला पात्रों के अलावा अधिकांशतया सभी पात्र पुरुष होते हैं, लेकिन इधर नैनीताल में मल्लीताल की रामलीला में राम जैसे मुख्य एवं पुरुष पात्रों को भी बालिकाओं द्वारा निभाने की मिसाल मिलती है। वहीं सूखाताल सहित अन्य जगहों पर बालिकाएं भी स्त्री पात्रों को निभा रही हैं। सामान्यतया रामलीला का मंचन शारदीय नवरात्र के दिनों में रात्रि में होता है, परन्तु जागेश्वर में गर्मियों में और हल्द्वानी में दिन में भी रामलीला मंचन होने के उदाहरण मिलते हैं। नैनीताल के साथ अल्मोड़ा के ‘हुक्का क्लब’ की रामलीलायें काफी प्रसिद्द हैं। हल्द्वानी में उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत और अपर जिलाधिकारी हरवीर सिंह द्वारा भी रामलीला में दशरथ व जनक के किरदार निभाए गए हैं। कुमाउनी रामलीला दिवंगत सिने अभिनेता निर्मल पाण्डेय सहित अनेक कलाकारों की भी अभिनय की प्रारंभिक पाठशाला रही है।

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है नैनीताल की रामलीला

अनवर रजा ऋषि विश्वामित्र के किरदार में।

नैनीताल। सरोवरनगरी में रामलीलाओं में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी देखने को मिलती है। नगर के सूखाताल की रामलीला में अनवर रजा जहां ऋषि विश्वामित्र सहित कई किरदार निभा रहे हैं। वहीं मल्लीताल की रामलीला में मो. खुर्शीद हुसैन श्रवण कुमार के पिता शांतनु व ब्रह्मा तथा जावेद हुसैन देवराज इंद्र के किरदार निभा रहे हैं, जबकि सूखाताल की रामलीला के आयोजन में सांस्कृतिक सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे नासिर अली भी शांतनु सहित कई किरदार निभा रहे हैं। वहीं तल्लीताल की रामलीला में मो. सईब पात्रों के मेकअप में योगदान देते हैं।

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सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है सूखाताल की रामलीला

सूखाताल की रामलीला का एक दृश्य

-सीमित संसाधनों के बावजूद 60 वर्षों से अनवरत हो रहा सफल संचालन
नैनीताल। यूं सरोवरनगरी में रामलीलाओं का 1880 से चला आ रहा इतिहास है, किंतु सूखाताल क्षेत्र में वर्ष 1956 से अनवरत बेहद सीमित संसाधनों से हो रही रामलीला की अपनी अलग पहचान है। आदर्श रामलीला एवं जन कल्याण समिति सूखाताल के तत्वावधान में आयोजित होने वाली यह रामलीला जहां आज भी ग्रामीण क्षेत्रों की परंपरागत राग-रागिनियों युक्त कुमाउनी रामलीला की झलक पेश करती है, वहीं साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ ही समाज के सभी वर्गों को मंच प्रदान करने की मिसाल पेश करना भी इसकी अलग पहचान है। बीते वर्षों में कलाकारों पर हो रही मेहनत, नयी पीढ़ी को हस्तांतरित की जा रही इस संस्कृति के कारण भी सूखाताल की रामलीला नगर की पहचान बन गयी है।
शनिवार को यहां केकई मंथरा, केकई दशरथ व केकई राम के संवादों तथा श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ वन गमन के भावपूर्ण दृश्यों का देर रात्रि तक मंचन हुआ। राम के रूप में दीपक, लक्ष्मण कमल, सीता पूजा, केकई तुषार पंत, मंथरा मुकेश धस्माना व दशरथ के रूप में मोहन राम आदि ने अपने अभिनय से दर्शकों को देर रात्रि तक बांधे रखा। आयोजन में समिति के अध्यक्ष दीप चंद्र भट्ट, संरक्षक केसी पंत, उपाध्यक्ष सावित्री सनवाल, माया पंत व हेमा साह के साथ ही सचिव रितेश साह, महासचिव मोहित साह, कोषाध्यक्ष विनय चौहान, सह कोषाध्यक्ष नितेश पंत तथा सांस्कृतिक सचिव नासिर खान व भूमिका पंत के साथ ही भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य गोपाल रावत, पिंकी, प्राची बिष्ट, विनोद कुमार, आशीष सनवाल, पंकज पंत आदि भी उल्लेखनीय भूमिका निभाते हुए सहयोग करते हैं

नवीन समाचार
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