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1830 में मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत

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Ramlila
Kumaoni Ramlila

-कुमाऊं की रामलीला की है देश में अलग पहचान
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होने वाली कुमाउनी रामलीला की अपनी मौलिकता, कलात्मकता, संगीत एवं राग-रागिनियों में निबद्ध होने के कारण देश भर में अलग पहचान है। खास बात यह भी है कि कुमाउनी रामलीला की शुरुआत कुमाऊं के किसी स्थान के बजाय 1830 में यूपी के रुहेलखंड मंडल के मुरादाबाद से होने के प्रमाण मिलते हैं। वहीं 1943 में नृत्य सम्राट उदयशंकर और महामना मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों का भी कुमाउनी रामलीला से जुड़ाव रहा है। उदयशंकर के कल्चरल सेंटर ने पंचवटी का सेट लगाकर उसके आसपास शेष दृश्यों का मंचन तथा छायाओं के माध्यम से फंतासी के दृश्य दिखाने करने जैसे प्रयोग किए, जिनका प्रभाव अब भी कई जगह रामलीलाओं में दिखता है। वहीं महामना की पहल पर प्रयाग के गुजराती मोहल्ले में सर्वप्रथम कुमाउनी रामलीला का मंचन हुआ था।

नैनीताल के प्रसिद्ध दशहरा में भव्य आतिशबाज़ी के शानदार नज़ारे :

Devbhumi Sandesh, October 2014
देवभूमि सन्देश, अक्तूबर 2014, उत्तराखंड सरकार की पत्रिका

हालांकि कुमाऊं में रामलीला की शुरुआत 1860 में अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई थी, जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवीदत्त जोशी को जाता है। लेकिन यह भी बताया जाता है कि श्री जोशी ने ही इससे पूर्व 1830 में यूपी के मुरादाबाद में ऐसी ही कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत की थी। इसके 20 वर्षों के बाद 1880 में नैनीताल के दुर्गापुर-बीर भट्टी में नगर के संस्थापकों में शुमार मोती राम साह के प्रयासों से कुमाउनी रामलीला कराने की शुरुआत हुई। आगे 1890 में बागेश्वर में शिव लाल साह तथा 1902 में देवी दत्त जोशी ने ही पिथौरागढ़ में रामलीला की शुरुआत की। दुर्गापुर नैनीताल का बाहरी इलाका है, इस लिहाज से नैनीताल शहर में 1912 में पहली बार मल्लीताल में कृष्णा साह ने अल्मोड़ा से कलाकारों को लाकर रामलीला का मंचन करवाया, जबकि स्थानीय कलाकारों के द्वारा 1918 में यहां रामलीला प्रारंभ हुई। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत 1903 में तल्लीताल रामलीला कमेटी के प्रथम अध्यक्ष रहे। 1910 के आसपास भीमताल में रामलीला का मंचन प्रारम्भ हुआ। 1907 से रामलीला को लिखित रूप में सर्वसुलभ बनाने के प्रयासों के अन्तर्गत रामलीला नाटकों को प्रकाशित करने का वास्तविक कार्य प्रारंभ हुआ। पंडित राम दत्त जोशी, केडी कर्नाटक, गांगी सााह, गोविन्द लाल साह, गंगाराम पुनेठा, कुंवर बहादुर सिंह आदि के रामलीला नाटक प्रकाशित हुए। रामलीलाओं में नारद मोह, अश्वमेध यज्ञ, कबन्ध-उद्धार, मायावी वध व श्रवण कुमार आदि के प्रसंगों का मंचन भी किया जाता है।

पारसी थियेटर व ब्रज के लोक गीतों की भी मिलती है झलक

नैनीताल। कुमाऊं की रामलीला में बोले जाने वाले संवादों, धुन, लय, ताल व सुरों में पारसी थियेटर, नौटंकी, ब्रज की रास तथा कव्वाली पार्टियो का भी काफी प्रभाव दिखता है, जो इसे अन्य स्थानों की रामलीलाओं से अलग भी करता है। जानकारों के अनुसार कुमाउनी रामलीला में पात्रों के संवादों में आकर्षण व प्रभावोत्पादकता लाने के लिये कहीं-कहीं स्थानीय बोलचाल के व नेपाली के सरल शब्दों के साथ ही उर्दू की गजल का सम्मिश्रण भी दिखता है, जबकि रावण के दरबार में कुमाउनी शैली के नृत्य का प्रयोग किया जाता है। संवादों में गायन को अभिनय की अपेक्षा अधिक तरजीह दी जाती है। रामचरितमानस के दोहों व चौपाईयों पर आधारित गेय संवाद हारमोनियम की सुरीली धुन और तबले की गमकती गूंज के साथ दादर, कहरुवा, चांचर व रुपक तालों में निबद्ध रहते हैं। कई जगहों पर गद्य रुप में संवादों का प्रयोग भी होता है। रामलीला मंचन के दौरान नेपथ्य से गायन तथा अनेक दृश्यों में आकाशवाणी की उदघोषणा भी की जाती है। रामलीला प्रारम्भ होने के पूर्व सामूहिक स्वर में रामवन्दना “श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन“ का गायन किया जाता है। दृश्य परिवर्तन के दौरान खाली समय में ठेठर (विदूशक-जोकर) अपने हास्य गीतों व अभिनय कला से दर्शकों का मनोरंजन करता है।

अभिनय की पाठशाला भी :

कुमाउनी रामलीला कलाकारों के लिए अभिनय की पाठशाला भी साबित होती रही है। कोरस गायन, नृत्य आदि में कुछ महिला पात्रों के अलावा अधिकांशतया सभी पात्र पुरुष होते हैं, लेकिन इधर नैनीताल में मल्लीताल की रामलीला में राम जैसे मुख्य एवं पुरुष पात्रों को भी बालिकाओं द्वारा निभाने की मिसाल मिलती है। वहीं सूखाताल सहित अन्य जगहों पर बालिकाएं भी स्त्री पात्रों को निभा रही हैं। सामान्यतया रामलीला का मंचन शारदीय नवरात्र के दिनों में रात्रि में होता है, परन्तु जागेश्वर में गर्मियों में और हल्द्वानी में दिन में भी रामलीला मंचन होने के उदाहरण मिलते हैं। नैनीताल के साथ अल्मोड़ा के ‘हुक्का क्लब’ की रामलीलायें काफी प्रसिद्द हैं। हल्द्वानी में उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत और अपर जिलाधिकारी हरवीर सिंह द्वारा भी रामलीला में दशरथ व जनक के किरदार निभाए गए हैं। कुमाउनी रामलीला दिवंगत सिने अभिनेता निर्मल पाण्डेय सहित अनेक कलाकारों की भी अभिनय की प्रारंभिक पाठशाला रही है।

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है नैनीताल की रामलीला

अनवर रजा ऋषि विश्वामित्र के किरदार में।

नैनीताल। सरोवरनगरी में रामलीलाओं में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी देखने को मिलती है। नगर के सूखाताल की रामलीला में अनवर रजा जहां ऋषि विश्वामित्र सहित कई किरदार निभा रहे हैं। वहीं मल्लीताल की रामलीला में मो. खुर्शीद हुसैन श्रवण कुमार के पिता शांतनु व ब्रह्मा तथा जावेद हुसैन देवराज इंद्र के किरदार निभा रहे हैं, जबकि सूखाताल की रामलीला के आयोजन में सांस्कृतिक सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे नासिर अली भी शांतनु सहित कई किरदार निभा रहे हैं। वहीं तल्लीताल की रामलीला में मो. सईब पात्रों के मेकअप में योगदान देते हैं।

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सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है सूखाताल की रामलीला

सूखाताल की रामलीला का एक दृश्य

-सीमित संसाधनों के बावजूद 60 वर्षों से अनवरत हो रहा सफल संचालन
नैनीताल। यूं सरोवरनगरी में रामलीलाओं का 1880 से चला आ रहा इतिहास है, किंतु सूखाताल क्षेत्र में वर्ष 1956 से अनवरत बेहद सीमित संसाधनों से हो रही रामलीला की अपनी अलग पहचान है। आदर्श रामलीला एवं जन कल्याण समिति सूखाताल के तत्वावधान में आयोजित होने वाली यह रामलीला जहां आज भी ग्रामीण क्षेत्रों की परंपरागत राग-रागिनियों युक्त कुमाउनी रामलीला की झलक पेश करती है, वहीं साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ ही समाज के सभी वर्गों को मंच प्रदान करने की मिसाल पेश करना भी इसकी अलग पहचान है। बीते वर्षों में कलाकारों पर हो रही मेहनत, नयी पीढ़ी को हस्तांतरित की जा रही इस संस्कृति के कारण भी सूखाताल की रामलीला नगर की पहचान बन गयी है।
शनिवार को यहां केकई मंथरा, केकई दशरथ व केकई राम के संवादों तथा श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ वन गमन के भावपूर्ण दृश्यों का देर रात्रि तक मंचन हुआ। राम के रूप में दीपक, लक्ष्मण कमल, सीता पूजा, केकई तुषार पंत, मंथरा मुकेश धस्माना व दशरथ के रूप में मोहन राम आदि ने अपने अभिनय से दर्शकों को देर रात्रि तक बांधे रखा। आयोजन में समिति के अध्यक्ष दीप चंद्र भट्ट, संरक्षक केसी पंत, उपाध्यक्ष सावित्री सनवाल, माया पंत व हेमा साह के साथ ही सचिव रितेश साह, महासचिव मोहित साह, कोषाध्यक्ष विनय चौहान, सह कोषाध्यक्ष नितेश पंत तथा सांस्कृतिक सचिव नासिर खान व भूमिका पंत के साथ ही भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य गोपाल रावत, पिंकी, प्राची बिष्ट, विनोद कुमार, आशीष सनवाल, पंकज पंत आदि भी उल्लेखनीय भूमिका निभाते हुए सहयोग करते हैं।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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