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Solar Lunar Eclipse

Astronomy : भारत ने रच दिया है इतिहास, चंदा मामा अब दूर के नहीं-बस एक टूर के

Chandrayan

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 अगस्त 2023 (Astronomy)। देश के लिए आज 23 अगस्त का दिन स्वर्णाक्षरों से इतिहास की अमिट पुस्तकों में लिखे जाने वाला है। भारत के चंद्रयान-3 ने दुनिया के किसी भी देश से पहले चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पदार्पण कर इतिहास रच दिया है। इसकी पूरे देश में दुवाएं की जा रही थीं, जो सफल साबित हुई है। आज के बाद देश के बच्चे-बच्चे के ‘चंदा मामा’ अब ‘दूर के’ नहीं, बकौल प्रधानमंत्री मोदी “बस एक टूर के” रह गए हैं। देश के हर खूबसूरत चेहरे से तुलना किया जाने वाला ‘चांद सा सुंदर चेहरा’ आंखों के सामने है, और बरसों से गाये जा रहे ‘चांद के पार चलो’ के गीतों की पंक्तियां भी बदल गई हैं, क्योंकि आने वाले भविष्य में शायद बहुत सारे लोग ‘चांद के पास चलो’ के गीत गायेंगे।

Astronomy, Chandrayaan 3 Moon Landing Update | ISRO Moon Mission Location Details In  Photos | अब उसकी चंद्रमा से सबसे कम दूरी केवल 150 Km, लैंडिंग 23 अगस्त को  होगी - Dainik Bhaskarइससे पहले उम्मीद की जा रही थी कि चंद्रयान-3 देश के ‘चंदा मामा’ पर पहुंचते ही उनके पैर छूकर उन्हें पूरे देश के बच्चों की ओर से प्रणाम कहेगा और अपनी कुशलता के समाचार के साथ पूरी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाएगा। ऐसे गौरवशाली पलों में आपका प्रिय, पसंदीदा एवं भरोसेमंद समाचार माध्यम ‘नवीन समाचार’ ने चंद्रयान के चंद्रमा पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का सीधा प्रसारण पर उपलब्ध कराया।

इधर नवीनतम अपडेट यह है कि चंद्रयान का चंद्रमा की सतह पर अवतरण तय समय 6 बजकर 4 मिनट पर कर दिया है। आज शाम 5 बजकर 20 मिनट से ‘नवीन समाचार’ के देश-दुनिया में मौजूद 12.7 मिलियन यानी 1.27 करोड़ से अधिक पाठक ‘नवीन समाचार’ के शीर्ष पर चंद्रयान के चंद्रमा पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का सीधा प्रसारण ‘नवीन समाचार’ पर समाचार पढ़ने के साथ देख सके। यहां फिर से देख सकते हैं चंद्रयान के चंद्रमा पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का पूरा वीडिओ:

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-गामा किरणों के विष्फोट से हुए किलोनोवा उत्सर्जन की खोज में दिया महत्वपूर्ण योगदान, अपनी तरह की अनूठी घटना पहली बार हुई रिकॉर्ड
(Astronomy) नैनीताल की दूरबीन ने रिकॉर्ड किया 1 अरब प्रकाश वर्ष दूर किलोनोवा उत्सर्जननवीन समाचार, नैनीताल, 7 दिसंबर 2022। (Astronomy) स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज की जनपद के ही देवस्थल नाम के स्थान पर स्थापित 3.6 मीटर ‘डॉट’ यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप ने सुदूर अंतरिक्ष में लगभग 1 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा के बाहरी इलाके से उच्च ऊर्जा प्रकाश के विस्फोट ‘जीआरबी 211211ए’ का पता लगाया है।

डॉट के द्वारा रिकॉर्ड की यह विश्व भर के खगोल वैज्ञानिकों के लिए पहली खगोलीय घटना है जिसमें एक लंबे जीआरबी के साथ किलोनोवा उत्सर्जन यानी न्यूट्रॉन सितारों के टकराने से होने वाला विशाल विस्फोट की अप्रत्याशित खोज हुई है। बताया गया है कि इस घटना ने वैज्ञानिकों की समझ को झकझोर कर रख दिया है। यह भी पढ़ें : बूढ़े ससुर से दरिंदगी करती कैमरे में कैद हुई महिला, हो रही तत्काल गिरफ्तारी की मांग

उल्लेखनीय है कि इंसानों की तरह सितारों का भी एक जीवन चक्र होता है। सितारे पैदा होते हैं, जीते हैं, और अंत में मर जाते हैं। कुछ बड़े सितारों की मृत्यु जीआरबी यानी गामा किरण विस्फोट के रूप में जाने जाने वाले ब्रह्मांड की सबसे चमकीले और सबसे विस्फोटक खगोलीय स्रोतों के रूप में होती है। इधर पिछले वर्ष 11 दिसंबर, 2021 को नासा की नील गेहर्ल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी और फर्मी गामा-रे स्पेस टेलीस्कोप ने लगभग 1 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित आकाशगंगा के बाहरी इलाके से उच्च ऊर्जा प्रकाश के विस्फोट ‘जीआरबी 211211ए’ का पता लगाया था। यह भी पढ़ें : कुमाऊं विश्वविद्यालय सहित प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों के परिसरों व महाविद्यालयों में 24 दिसंबर को होंगे छात्र संघ चुनाव…!

इस जीआरबी के बाद की चमक का अध्ययन करने के लिए, खगोलविदों ने अंतरिक्ष और पृथ्वी पर कई दूरबीनों का उपयोग किया, जिसमें स्थानीय एरीज आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज की 3.6 मीटर ‘डॉट’ यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप ने भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस बारे में विस्तृत अध्ययनों के बाद बुधवार को विश्व की सर्वोच्च मानी जाने वाली शोध पत्रिका ‘नेचर’ में शोध आलेख प्रकाशित हुआ है। इस आलेख मंे एरीज की डॉट का जिक्र होना यहां के वैज्ञानिक बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं। यह भी पढ़ें : महिला ने व्यवसायी पर लगाए थे शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप, अब व्यवसायी के एसएसपी को शिकायती पत्र देने के बाद आया मामले में सनसनीखेज नया मोड़

इस अध्ययन की टीम में शामिल एवं एरीज के शोध छात्र राहुल गुप्ता, अमर आर्यन, अमित कुमार और डॉ. कुंतल मिश्रा की टीम का नेतृत्व करने वाले एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे ने बताया कि 3.6 मीटर दूरबीन एवं इसमें लगे 4000 गुणा 4000 सीसीडी इमेजर द्वारा संगृहित डेटा में से आफ्टरग्लो योगदान को घटाने के बाद वैज्ञानिकों ने यह पाया कि बहुतरंग दैर्ध्य डेटा की अतिरिक्त वर्णक्रम द्वारा अच्छी तरह से व्याख्या किया जा सकता है और इस तापीय उत्सर्जन को किलोनोवा उत्सर्जन के संदर्भ में समझा जा सकता है। यह भी पढ़ें : उच्च न्यायालय ने दी 13 वर्षीय नाबालिग के 25 सप्ताह के गर्भ के गर्भपात की अनुमति…

उन्होंने बताया कि यह पहली खगोलीय घटना है जिसमे एक लंबे जीआरबी के साथ किलोनोवा उत्सर्जन यानी न्यूट्रॉन सितारों के टकराने से होने वाला विशाल विस्फोट की अप्रत्याशित खोज हुई है। इस घटना ने वैज्ञानिकों की समझ को झकझोर कर रख दिया है। उन्होंने बताया कि इस घटना में उच्च ऊर्जा विस्फोट लगभग एक मिनट तक चली, और 3.6 मीटर देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप के अनुवर्ती अवलोकनों में एक किलोनोवा की पहचान हुई। 3.6 मीटर देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप के प्रेक्षणों ने अभी तक के किलोनोवा के सबसे प्रारंभिक चरण की जानकारी प्रदान की है। यह भी पढ़ें : बिग ब्रेकिंग खुशखबरी: 1564 पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना अभी-अभी जारी

नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस वैज्ञानिक खोज में 3.6 मीटर दूरबीन द्वारा लिए गए प्रथम डाटा के अतिरिक्त हबल स्पेस टेलिस्कोप, मल्टीक इमेजिंग टेलेस्कोपस फॉर सर्वे एंड मोनस्ट्रोस एक्सप्लोसिओंस, कलर आल्टो ऑब्जर्वेटरी, देवस्थल ऑप्टिकल टेलिस्कोप एवं अन्य अंतरिक्ष और जमीन आधारित दूरबीनो का भी इस्तेमाल किया गया। इस खोज से ब्रह्मांड में भारी तत्वों के बनने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी। यह भी पढ़ें : महिला मित्रों के साथ घूमने वालों की वीडियो बनाकर उनसे ब्लेकमेल कर रुपए ऐंठने वाले गिरोह का पर्दाफाश, टीम को 5000 का ईनाम

डॉ. पांडेय ने बताया कि एक जीआरबी में में कुछ सेकेंडों के भीतर सूर्य के पूरे जीवन में उत्सर्जित की जाने वाली ऊर्जा से अधिक ऊर्जा उत्सर्जित होती है। उन्होंने कहा कि यह खोज जीआरबी की उत्पत्ति की बारे में हमारी वर्तमान समझ को चुनौती देती है और इस दिशा में नई संभावनाओं को जन्म देती है। एरीज के निदेशक प्रो. दीपांकर बनर्जी ने बताया की भविष्य में 3.6 मीटर देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप में इस तरह की बहुत सारी खोज करने की एक अद्वितीय क्षमता है। आगे ऐसी और बड़ी खोजें हो सकती हैं। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy) : आज विजयादशमी की रात खगोल प्रेमियों के लिए खास, आसमान की ओर देखिए, वहां चांद पर खुली आंखों से दिख रहा है ‘मून्स गोल्डन हैंडल’

Moon || Golden Handle || Part5 - YouTubeडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 5 अक्तूबर 2022। सूर्य और चंद्रमा हमेशा से पृथ्वीवासियों के लिए पृथ्वी से बाहर प्रत्यक्ष नजर आने वाले पिंडों के साथ ही देवताओं के रूप में भी विमर्श का केंद्र रहे हैं। खास कर चंद्रमा के बारे में बहुत सी जानकारियां मानव को हैं, चांद पर मौजूद कोटरों, गड्ढों, पर्वतों को लेकर भी काफी चर्चा होती है। आज हम आपको चंद्रमा पर नजर जाने वाले एक सुनहरे रंग के ‘मून्स गोल्डन हैंडल’ से परिचित कराने जा रहे हैं। चांद की इस विशेषता को दशमी की रातों में नग्न आंखों से भी देखा जा सकता है।

चंद्रमा का गोल्डन हैंडल मूल रूप से चंद्रमा की सतह पर मौजूदा जुरा नाम के पहाड हैं, जिसकी ऊंची चोटियां सूरज की रोशनी से जगमगा उठती हैं, और एक सुनहरे रंग के चमकदार चाप के रूप में दिखाई देते हैं। बताया जाता है कि चंद्रमा पर लावा के समतल और स्थिर-अंधेरे मैदान के सामने 422 किलोमीटर में फैली 2700 मीटर ऊंची यह पर्वत क्षृंखला अमावस्या और पूर्णिमा के बीच सूर्य की रोशनी के कारण पहले पखवाड़े के दसवें दिन सुनहरे रंग में चमकती हुई दिखाई देती है।

नैनीताल में स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे के अनुसार कुछ विशेष दिनों में शुक्ल पक्ष की दशमी की तिथि यानी अमावास्या के बाद दसवें दिन चंद्रमा के उत्तर पश्चिमी भाग पर जुरा पर्वत दिखाई देते हैं। सूरज की रोशनी इस पहाड़ को रोशन करती है और जब रोशनी कम होती है तो पहाड़ सुनहरे रंग में दिखता है।

इसलिए इस फीचर को गोल्डन हैंडल कहा जाता है। पांडे ने कहा कि गोल्डन हैंडल चंद्रमा की सुंदरता का एक अनूठा पहलू है। यह हर महीने केवल दो रातों को ही दिखाई देता है। इस बार यह विजयादशमी की रात को दिखाई दे रहा था। इसे चांद के उत्तरी सिरे पर देखा जा सकता है। हमें कमेंट बॉक्स में कमेंट करके बताइएगा कि क्या आप इसे देख पाए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy) : ‘नवीन समाचार’ एक्सक्लूसिव: नैनीताल के आसमान में दिखी रहस्यमय वस्तु, वैज्ञानिक ने बताया ‘यूएफओ’

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 28 सितंबर 2022 (Astronomy)। अपनी अनेक खूबियों के साथ साफ आसमान के लिए भी वैश्विक पहचान रखे जाने और इसी कारण यहां एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान तथा बीते वर्षों में यहीं पास में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन की स्थापना वाले नैनीताल नगर के आसमान में बुधवार को एक ‘यूएफओ’ यानी ‘अन आइडेंटीफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट’ यानी अज्ञात उड़ती हुई वस्तु देखी गई है।

एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.बृजेश कुमार ने इसे ‘यूएफओ’ बताया, एवं नैनीताल के खुले आसमान में इसके देखे जाने को विज्ञान के साथ ही सामरिक दृष्टिकोण से भी बड़ी एवं रहस्यमयी व रोमांचकारी घटना करार दिया है।

बुधवार को नगर के आसमान में खिली धूप के बीच अपराह्न करीब 4 बजकर 40 मिनट पर दक्षिण पश्चिमी आकाश में सूर्य के साथ करीब 45 डिग्री का एक त्रिकोण बनाती हुई जैसी स्थिति में यह अज्ञात रहस्यमयी वस्तु सर्वप्रथम दीपेश बिष्ट नाम के एक बालक ने देखी। उसकी सूचना पर अन्य लोग भी इसे देखने लगे। ‘नवीन समाचार’ के मोबाइल कैमरे में बमुश्किल इसकी फोटो भी कैमरे में कैद हुई। सफेद आकार का एक बिंदु से थोड़े बड़े आकार का नजर आ रहा यह यूएफओ पहले करीब एक मिनट तक सूर्य की यानी पश्चिम दिशा की ओर चलता हुआ दिखा, और फिर स्थिर हो गया। बाद में इसे उत्तर दिशा में देखे जाने का भी दावा किया गया।

जानकारी लेने पर एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बृजेश कुमार ने ‘नवीन समाचार’ द्वारा उपलब्ध कराए गए इसके चित्र को ‘गूगल लेंस’ के माध्यम से जांचा, साथ ही एरीज से किसी तरह की वैज्ञानिक खोज के लिए गुब्बारे आदि हवा में उड़ाए जाने जैसी संभावनाओं की भी भी जानकारी ली और अंततः इसके ‘यूएफओ’ होने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि इस तरह के अज्ञात यूएफओ कई बार सूर्य के प्रकाश में दिख जाते हैं। उन्होंने कहा कि एरीज एवं नगर में रक्षा प्रतिष्ठानों के भी करीब होते इसका नैनीताल नगर में देखा जाना एक बड़ी घटना है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy) : नैनीताल की रीतिका सहित चार भारतीय खगोल वैज्ञानिकों को दक्षिण कोरिया में मिले पुरस्कार…

दक्षिण कोरिया में दुनिया की सबसे बड़ी खगोल विज्ञान की बैठक में भारतीय  छात्रों ने जीते 4 पुरस्कारडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अगस्त 2022। नैनीताल सहित देश के भौतिकविदों और खगोलविदों ने दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में 2 से 11 अगस्त के बीच आयोजित अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन-आईएयू) के कार्यक्रम में शानदार प्रदर्शन किया। दुनिया की सबसे बड़ी हर तीन साल में आयोजित होने वाली खगोल विज्ञान बैठक कही जाने वाली आईएयू की महासभा में भारतीय पीएचडी छात्रों ने आईएयू महासभा तीन भारतीयों ने ‘पीएचडी एट-लार्ज’ पुरस्कार जबकि चौथे को ‘डिवीजन-ई (सन एंड हेलिओस्फीयर)’ में पीएचडी पुरस्कार मिला।

कोविड महामारी के कारण 2018 के बादएक साल की देरी से आयोजित हुए इस कार्यक्रम में कुमाऊं विश्वविद्यालय और एरीज यानी आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज नैनीताल की रीतिका जोशी ने सूर्य के क्रोमोस्फीयर (दिखने वाली सतह के ऊपर मौजूद वायुमंडलीय परत) में प्लाज्मा जेट और अन्य प्रकार की ऊर्जा फ्लेयर्स के अवलोकन पर अपने कार्य के लिए साल 2021 के लिए यह पुरस्कार जीता।

उनके अलावा भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु के गोपाल हाजरा, भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान कोलकाता से जुड़ी प्रांतिका भौमिक, बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स से एमटेक और ओस्लो विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाले सौविक बोस को भी पुरस्कार मिले हैं। बताया गया है कि विशालकाय मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (पुणे), भारतीय खगोलीय वेधशाला (हनले), देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (नैनीताल), और कोडाईकनाल और उदयपुर स्थित सौर वेधशालाओं को इस दौरान भारतीय पवेलियन में प्रदर्शित किया गया। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy) : एरीज के वैज्ञानिकों की बड़ी खोज: प्लूटो की सतह पर वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी से 80 हजार गुना कम

(Astronomy) Atmospheric pressure on Pluto's surface 80,000 times lower than on Earth:  Study – Original News | Original Newsडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 17 फरवरी 2022(Astronomy)। भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों सहित वैज्ञानिकों की एक टीम ने सौरमंडल की बिरादरी से हटाए गए क्षुद्र ग्रह-प्लूटो की सतह पर प्लूटो के वायुमंडलीय दबाव का सटीक मान निकाला है और बताया है कि यह पृथ्वी पर औसत समुद्र तल पर वायुमंडलीय दबाव से 80,000 गुना कम है।

बताया गया है कि नैनीताल स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वैज्ञानिकों सहित वैज्ञानिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम ने प्लूटो की सतह पर वायुमंडलीय दबाव का सटीक मूल्यांकन प्राप्त करने के लिए उत्तराखंड के देवस्थल, नैनीताल में स्थित देश की सबसे बड़ी 3.6 मीटर देवस्थल स्थित ऑप्टिकल टेलीस्कोप-डॉट और 1.3 मीटर व्यास की देवस्थल फास्ट ऑप्टिकल टेलीस्कोप-डीएफओटी का उपयोग कर 6 जून 2020 को प्लूटो पर वायुमंडलीय दबाव की गणना की।

इस दौरान 1988 और 2016 के बीच प्लूटो द्वारा किए गए ऐसे बारह स्टेलर ऑकल्टेशन्स यानी तारकीय प्रच्छादनों के संकलन ने इस अवधि के दौरान वायुमंडलीय दबाव में तीन गुना मोनोटोनिक वृद्धि दिखाई दी। यह पृथ्वी पर औसत समुद्र तल पर वायुमंडलीय दबाव से 80,000 गुना कम अर्थात 12.23 माइक्रोबार पाया गया। ‘एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स’ में प्रकाशित शोध से पता चला है कि 2015 के मध्य से ही प्लूटो का वातावरण अपने सर्वाधिक स्तर के करीब एक पठारी चरण में है एवं 2019 में प्लूटो वाष्पशील परिवहन मॉडल द्वारा पहले गणना किए गए मॉडल मूल्यों के अनुरूप उत्कृष्ट स्थिति में है।

अध्ययन पहले के उन निष्कर्षों की भी पुष्टि करता है कि प्लूटो पर बड़े डिप्रेशन के कारण यह ग्रह ऐसे तीव्र मौसमी सोपानों से ग्रस्त है जिन्हें स्पूतनिक प्लैनिटिया के रूप में जाना जाता है। प्लूटो के ध्रुव दशकों तक स्थायी सूर्य के प्रकाश या अंधेरे में 248 साल की लंबी कक्षीय अवधि में बने रहते हैं जिससे इसके नाइट्रोजन वातावरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है जो मुख्य रूप से सतह पर नाइट्रोजन बर्फ के साथ वाष्प दबाव संतुलन द्वारा नियंत्रित होता है।

इस शोध में ब्रूनो सिकार्डी, नागरहल्ली एम अशोक, आनंदमयी तेज, गणेश पवार, शिशिर देशमुख, अमेया देशपांडे, सौरभ शर्मा, जोसेलिन डेसमार्स, मार्सेलो असाफिन, जोस लुइस ऑर्टिज, गुस्तावो बेनेडेटी-रॉसी, फेलिप ब्रागा-रिबास, रॉबर्टो विएरा-मार्टिंस पाब्लो सैंटोस-सांज, कृष्ण चंद, और भुवन भट्ट शामिल रहे हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy): वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड की एक सेकेंड के दसवें हिस्से में निकली सूर्य से एक लाख वर्षों में निकलने जितनी ऊर्जा

-पहली बार स्पेन के साथ एरीज नैनीताल के वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड की यह अनूठी घटना, नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ शोध
Why Magnetars Should Freak You Out | Spaceडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 दिसंबर 2021 (Astronomy)। बीते वर्ष 15 अप्रैल 2020 को ब्रह्मांड में, पृथ्वी से एक करोड़ तीस लाख प्रकाश वर्ष दूर स्थित स्कल्पटर आकाशगंगाओं के समूह में एक ऐसी घटना हुई, जिसमें हमारे सूर्य द्वारा एक लाख वर्षों में विकीरित की जाने वाली ऊर्जा के बराबार ऊर्जा एक सेकेंड के दसवें हिस्से में उत्सर्जित की गई।

बड़ी बात यह कि इस दुर्लभ पल को स्पेन के अंडालूसिया शोध संस्थान के वैज्ञानिक प्रो. अल्बर्टो जे कास्त्रो-तिराडो के नेतृत्व में जिस वैज्ञानिक समूह ने देखा उसमें भारत के नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे भी शामिल रहे। इस वैज्ञानिक समूह की इस खोज को आज विश्व की सबसे बड़ी विज्ञान शोध पत्रिका नेचर ने प्रकाशित कर मान्यता दे दी है। माना जा रहा है कि वैज्ञानिकों की इस ताजा खोज के बाद इन खगोलीय पिंडों के बारे में अभी भी अल्पज्ञात विशाल चुंबकीय ज्वालाओं को समझना संभव हो जाएगा।

प्रो. अल्बर्टो के हवाले से डॉ. पांडे ने बताया कि जिन तारों का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत अधिक होता है, उन्हें मैग्नेटार कहा जाता है। इन मैग्नेटार तारों के 20 किलोमीटर व्यास का द्रव्यमान पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का लगभग पांच गुना अधिक हो सकता है। इससे इन मेग्नास्टार की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। अभी ब्रह्मांड में ऐसे 20 मैग्नेटार ही ज्ञात हैं। यह मैग्नेटार अपने अप्रत्याशित स्वरूप और करीब 3.5 मिली सेकेंड यानी एक सेकेंड के करीब दसवें हिस्से में ही नजर आने के कारण बहुत ही दुर्लभ होते हैं।

यह माना जाता है कि मैग्नेटार में विस्फोट उनके चुंबकीय क्षेत्र में अस्थिरता के कारण या उनकी लगभग एक किलोमीटर मोटी कठोर और लोचदार परत में उत्पन्न एक प्रकार के भूकंप के कारण हो सकता है। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर स्थित असीम नामक उपकरण द्वारा इस विस्फोट का पता लगाया गया था। इस खोज का अध्ययन बेहद कठिन था। इसमें मात्र एक सेकंड के डेटा के विश्लषण में एक वर्ष से भी अधिक समय लगा।

उन्होंने बताया कि आज तक हमारी आकाशगंगा में ज्ञात लगभग तीस मैग्नेटार तारौं में से केवल दो में ही इस प्रकार की चुंबकीय ज्वालाओं का पता अब तक लग सका है। यह खोज करने वाले वैज्ञानिक समूह में आईएए स्पेन के जेवियर पास्कुअल, बार्गेन विश्वविद्यालय नॉर्वे के डॉ. ओस्टगार्ड भी शामिल रहे है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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-धूमकेतु लियोनार्ड और जेमिनीड उल्कापात आकाश को रोशन कर रहे

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 13 दिसंबर 2021 (Astronomy)। नए वर्ष के स्वागत की तैयारी न केवल पूरी दुनिया में शुरू हो गई है, वरन आसमान में भी इस मौके पर खूबसूरत आतिषबाजी जैसे नजारे देखे जा सकते हैं। आने वाले दिनों का आकाश उल्कापात की दो प्रमुख घटनाओं से जगमगाने वाला है। हालांकि उल्काओं को बोलचाल की भाषा में शूटिंग स्टार या टूटता तारा कहा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार वास्तव में यह नाम सही नहीं है क्योंकि इसका तारों से कोई लेना-देना नहीं है।

इनमें पहला उल्कापात है सी-2021ए1 नाम का लियोनार्ड धूमकेतु। इसी वर्ष 3 जनवरी 2021 को खोजा गया यह धूमकेतु इस पूरे वर्ष का सबसे चमकीला धूमकेतु बताया जा रहा है। लगभग 80 हजार वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करने वाला यह धूमकेतु आंतरिक सौर मंडल और हमारे पास लगभग 80 हजार वर्षों के बाद आएगा। इस धूमकेतु का नाम इसके खोजकर्ता ‘द माउंट लेमोन ऑब्जर्वेटरी’ यूएसए के जीजे लियोनार्ड के नाम पर रखा गया है। यह धूमकेतु 12 दिसंबर को पृथ्वी के सबसे करीब से गुजरा और अब 3 जनवरी 2022 को सूर्य के सबसे करीब से गुजरेगा।

स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र यादव के अनुसार हालांकि लियोनार्ड धूमकेतु पिछले साल दिखाई दिए नियोवाइज धूमकेतु जितना चमकीला नहीं है, लेकिन यह दूरबीन और छोटी टेलिस्कोपों का उपयोग करके अब तक सुबह तड़के आकाश में दिखाई दे रहा था, और अब यह शाम के समय दिखाई दे रहा है। हालांकि शाम के धुंधलके में इसकी दृश्यता प्रभावित हो रही है। एरीज के पूर्व पोस्ट डॉक्टरेट फेलो और हिरोशिमा विश्वविद्यालय जापान के सहायक प्रोफेसर डॉ अविनाश सिंह ने धूमकेतु के हरे रंग के केन्द्रक और लम्बी पूंछ दिखाती हुई खूबसूरत छवि को एरीज के मनोरा पीक परिसर से कैमरे में कैद किया है।

दूसरी खगोलीय घटना है जेमिनीड उल्कापात। लगभग दो सप्ताह तक चलने वाला यह उल्कापात 13-14 दिसंबर को चरम पर होगा। इसका नाम जेमिनी यानी मिथुन राशि के तारामंडल में होने के कारण इसके नाम पर रखा गया है। इस उल्कापात के चरम पर प्रति घंटे 80 से 100 उल्का दिखाई देंगे। यह भारत से दिखाई देने वाले उल्कापातों में सबसे अच्छा उल्कापात है। उल्काओं को नग्न आंखों से देखा जा सकता है और इसके लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है। तड़के सुबह 2 बजे के बाद अँधेरे में कुछ समय के लिए खुले आसमान को धैर्य के साथ लेटकर देखने का अलग ही अनुभव हो सकता है।

इसलिए होता है उल्कापात
डॉ. यादव ने बताया कि जब धूमकेतु और क्षुद्रग्रह आंतरिक सौर मंडल से गुजरते हैं तो वे बादलों के रूप में बहुत सारी धूल छोड़ जाते हैं। जब पृथ्वी की कक्षा ऐसे किसी बादल के पास से गुजरती है, तो उस धूल के कई कण हमारे वायुमंडल में प्रवेश कर जाते हैं और 80 से 120 किमी की ऊंचाई पर घर्षण के कारण जल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रकाश की एक लकीर दिखाई देती है जो आमतौर पर कुछ क्षणमात्र के लिए ही होती है। इसे उल्का कहा जाता है।

अंधेरे और साफ आकाश वाली किसी आम रात में आकाश के विभिन्न हिस्सों में प्रति घंटे 8-10 उल्काएं दिखाई देती हैं। एक उल्कापात में यह संख्या अधिक होती है और अधिकांश उल्काएं आकाश के एक ही क्षेत्र से आते हुए प्रतीत होती हैं। इस क्षेत्र को रेडिएंट कहा जाता है। उल्कापात का नाम आमतौर पर उस तारामंडल या नक्षत्र के नाम पर रखा जाता है जिसमें रेडिएंट स्थित होता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 08 अप्रैल 2021 (Astronomy) मुख्यालय स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान में देश के अन्य शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से ‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर सोमवार से शुरू हुई राष्ट्रीय कार्यशाला बृहस्पतिवार को चौथे दिन भी जारी रही। इस दौरान एनसीआरए के प्रो जयराम चेंगलुर ने भारत की सबसे बड़ी दूरबीन जीएमआरटी पर बोलते हुए कहा कि इस अंतराष्ट्रीय सुविधा की भविष्य में एस्ट्रोफिजिकल जेटस के अध्ययन में उपयोगिता और अधिका बढ़ने वाली है।

एरीज के संस्थापक निदेशक प्रो रामसागर ने देश की सबसे बड़ी दृश्य प्रकाश में कार्य करने वाली एरीज की 36 मी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप-डॉट के निकट भविष्य में अवरक्त तंरगदैर्घ्य पर कार्यकरने की वैज्ञानिक क्षमता पर बात की। आईआईए के डा डी के साहू ने लेह स्थित विश्व की सबसे ऊंचाई में स्थित 2 मीटर व्यास की हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप-एचसीटी के बारे में, एरीज के गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष एवं एस्ट्रोसेट के प्रमुख अन्वेषक प्रो पीसी अग्रवाल ने भारत के अंतरिक्ष स्थित बहुतरंगदैर्घ्यी प्रेक्षण सुविधा एस्ट्रोसेट के एक्स-रे पर कार्य क्षमताओं, वरिष्ठ अभियंत्रण विशेषज्ञ डा एसएन टंडन ने एस्ट्रोसेट के परावैगनी तरंगदैर्घ्य पर प्रेक्षण क्षमताओं और इससे प्राप्त महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध परिणामों की चर्चा की। 

वहीं इसरो के डा. वी गिरीश के संचालन में आयोजन दूसरे सत्र में भाभा परमाणु केंद्र के के डा केके सिंह ने गामा-किरणों के विकिरण के अनुपूरक चेरेनकोव टेलीस्कोप पर, टीआईएफआर की डा वर्षा चिटनिस ने हेगर टेलीस्कोप एवं अन्य गामा किरणों पर काम करने वाली सुविधाओं, एनसीआरए के प्रो भाल चंद्र जोशी ने भारत और अंतराष्ट्रीय पल्सार टाईमिंग अरेय से गुरुत्व तरंगों के अनुसंधान में जीएमआरटी के योगदान, अयुका के आरसी आनंद ने 8 से 10 मीटर वर्ग की दूरबीनों द्वारा विज्ञान के संदर्भ में और डा देवेंद्र ओझा ने भी संबंधित विषय पर चर्चा की। आयोजक समिति के डा शशिभूषण पांडेय ने बताया कि 9 अप्रैल को ‘भविष्य की खगोलीय प्रेक्षण सुविधाओं और रणनीति‘ पर चर्चा होगी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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-‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का तीसरा दिन
नवीन समाचार, नैनीताल, 07 अप्रैल 2021 (Astronomy) मुख्यालय स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान में देश के अन्य शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से ‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर सोमवार से शुरू हुई राष्ट्रीय कार्यशाला बुधवार को तीसरे दिन भी जारी रही। इस दौरान टीआईएफआर के प्रो. सुदीप भट्टाचार्या की अध्यक्षता में आयोजित तीसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत करते हुए अयुका पुणे के प्रो. रंजीव मिश्रा ने अपने एक्स-रे बाइनरी-माइक्रो क्वाजार विषय पर व्याख्यान के माध्यम से बताया कि वर्तमान में भारत में इस विषय पर शोध और प्रेक्षण सुविधायें अत्यंत उन्नत अवस्था में है।

आगे कोलकाता से आए वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. संदीप चक्रवर्ती ने पिछले 3 दशकों में इस विषय पर हुए शोधों और ज्ञात चुनौतियों, आईआईटी हैदराबाद के मयूख पहाड़ी ने एक्स-रे और रेडियो तरंग दैर्घ्य पर हो रहे शोध कार्यों, आईसर मोहाली के डा. अरुण बेरी ने भारतीय अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट द्वारा एक्स-रे तरंगदैर्घ्य में प्राप्त परिणामों, एरीज के डा. इंद्रनील ने एक्स-रे बाइनरी के आसपास जेट्स की उपस्थिति, एरीज की शोध छात्रा शिल्पा सरकार तथा डा. दीपक देबनाथ और कौशिक चटर्जी कोलकाता ने एक्स-रे बाइनरी के द्वारा उत्पादित कृष्ण छिद्रों यानी ब्लेक होल्स पर चर्चा की।

वहीं पीआरएल अहमदाबाद के डा. सचिन नायक की अध्यक्षता में आयेाजित द्वितीय सत्र में आईआईटी गुवाहाटी के डा. संतब्रतादास ने एक्स-रे बाइनरी से उत्पादित कृष्ण छिद्रों के विभिन्न आयामों, आईआईटी कानपुर के प्रो. जेएस यादव ने भारतीय अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट द्वार ालिए गए माइक्रो क्वाजार के प्रेक्षणों और परिणामों के साथ ही तेजपुर विश्वविद्यालय की कविता डेका, क्राइस्ट विश्वविद्यालय बैंगलुरु की डा. स्नेहा मुदाम्बी, उस्मानिया विश्वविद्यालय की डा.मालुएवंडा श्रीराम और आईआईटी इंदौर की डा. इन्दु ने भी संबंधित विषय पर अपने शोध कार्यों को प्रस्तुत किया। आयोजक समिति के सदस्य डा. शशिभूषण पांडेय ने बताया की अब बृहस्पतिवार को भारत में वर्तमान में उपलब्ध खगोलीय प्रेक्षण सुविधायों के बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy) : गामा किरणों के महाविष्फोटों व सुपरनोवा के अंतरसंबंधों पर हुई वैज्ञानिक चर्चा

-‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का दूसरा
नवीन समाचार, नैनीताल, 06 अप्रैल 2021 (Astronomy) मुख्यालय स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान में देश के अन्य शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से ‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर सोमवार से शुरू हुई राष्ट्रीय कार्यशाला मंगलवार को दूसरे दिन भी जारी रही। इस दौरान दूसरे दिन के पहले सत्र का औपचारिक शुभारंभ करते हुए अयुका पुणे के वैज्ञानिक प्रो. दीपांकर भट्टाचार्या ने गामा किरणों के महाविस्फोटों (जीआरबी), सुपरनोवा और उनके आपसी सम्भावित संबंधों पर जानकारी दी।

उन्होंने संभावना जताई कि कुछ जीआरबी हाल में खोजे गए गुरुत्व तरंगो को उत्सर्जित करने वाले खगोलीय पिण्डांे से संबंधित भी हो सकते हैं। वहीं टीआईएफआर के हर्ष तेंदुलकर ने तेज रेडियो महाविस्फोट (एफआरबी) का जिक्र करते हुये उनके जीआरबी से संबंधो पर प्रकाश डाला। डा. पूनम चंद्रा द्वारा संचालित इस सत्र में अयुका की डा. शबनम ने जीआरबी के बहुत शुरुआती चरणों पर चर्चा की। एरीज की डा. कुंतल मिश्रा ने जीआरबी के आफ्टर ग्लो यानी उत्तर दीप्ति के चरणों की व्याख्या की।

चेन्नई के डॉ. केजी अरुण ने एक विशेष प्रकार के जीआरबी का गुरुत्व तरंग स्रोतांे के साथ सम्बंधों पर चर्चा की। एरीज के शोध छात्र राहुल गुप्ता, अमित कुमार और अंकुर घोष ने भी अपने शोध कार्यो को इस सत्र में प्रस्तुत किया।

वहीं रमन शोध संस्थान की डा. नयन तारा गुप्ता के संचालन में आयोजित द्वितीय सत्र में आईआईटी मुम्बई के डा. वरुण भालेराव ने जीआरबी और सुपरनोवा से गुरुत्व तरंगो के सम्भावित उत्सर्जन पर, एनसीआरए टीआईएफआर के शोध छात्र डा. ए जेनयना और सुरजीत मंडल तथा एरीज के डिम्पल, अमर आर्यन एवं डा. अंजशा आदि छात्र-छात्राओं ने अपने शोध कार्यो को प्रस्तुत किया। अंत में डा. शशिभूषण पांडेय ने बताया कि सात अप्रैलको एक्स बाइनरी-माइक्रो क्वासार विषय पर चर्चा होगी। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : एरीज नैनीताल में स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर देश की वैज्ञानिक सुविधाओं पर हुई चर्चा

-‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला हुई प्रारंभ
नवीन समाचार, नैनीताल, 05 अप्रैल 2021। मुख्यालय स्थित एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान में सोमवार से देश के अन्य शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से ‘एस्ट्रो फिजिकल जेटस् एवं प्रेक्षण सुविधाएं: राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य‘ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला प्रारंभ हुई। कार्यशाला में देश के लगभग 100 से अधिक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने वर्चुअल माध्यम से प्रतिभागिता की। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र का औपचारिक उद्घाटन करते हुए एरीज के निदेशक प्रो. दीपांकर बनर्जी ने बताया कि यह कार्यशाला खगोल शास्त्र के वैज्ञानिकों द्वारा ‘स्वतंत्रता के 75 वर्ष: आजादी का अमृत महोत्सव‘‘ की श्रृंखला में आयोजित किया जा रहा है।

आयोजक समिति के सदस्य डा. शशिभूषण पांडेय ने प्रतिभागियों को कार्यशाला के स्वरुप व पृष्ठभूमि के बारे में बताया। आगे एरीज के गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष प्रो. पीसी अग्रवाल ने अपने उद्बोधन में इस बात पर बल दिया कि भारत अपनी विभिन्न सुविधाओं के माध्यम से वर्तमान में बहुत अच्छी स्थिति में है और आने वाले समय में युवा पीढ़ी को इस दिशा में और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने विशेष रुप से एस्ट्रोसेट, जीएमआटी और 3.6 मी डॉट यानी नैनीताल जनपद स्थित देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप जैसी बहुतरंगदैर्घ्यीय परियोजनाओं के और अधिक दोहन पर बल दिया।

वहीं वरिष्ठ खगोलशास्त्री प्रो. अजित केम्भावी ने आने वाले समय में डीप लर्निंग, मशीन लर्निंग एवं आर्टीफिसीयल इंटेलीजेंस के महत्व को बताते हुए कहा कि आने वाले समय में इस प्रकार की उन्नत तकनीकों से खगोल शास्त्र में कई नये प्रकार के खोजें संभव है।

वहीं प्रथम औपचारिक सत्र में प्रो. केपी सिंह ने एम82 और एम87 नामक मंदाकिनियांे का उदाहरण देते हुए बहुतरंगदैर्घ्यीय भारतीय सुविधाओं जैसे कि एस्ट्रोसेट द्वारा लिए गए प्रेक्षण और उसके परिणामों का भी वर्णन किया। आगे आईआईटी इंदौर के प्रो. अमित शुक्ला ने ब्लेजार जेट्स और उनके परिणामों पर चर्चा की। एरीज के वैज्ञानिक डा. सुवेंदु रक्षित ने प्रथम सत्र का संचालन किया।

आगे आईएफआर के प्रो. गोपा कुमार टी द्वारा संचालित द्वितीय सत्र में डा. पंकज कुशवाहा, एरीज की वैदेही एस पलिया, विनीत ओझा, जामिया मिलिया इस्लामिया के मैनपाल, तेजपुर विवि के प्राणजुप्रिया, सुवेंदु रक्षित व एनसीआरए की सुमोना नंदी ने भी व्याख्यान दिए। समापन सत्र में विभिन्न प्रतिभागियों ने एजीएन व ब्लेजार के विषयों पर व्याख्यान दिए और शोध छात्रों द्वारा किये गये शोध कार्यो पर चर्चा की गई। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Astronomy): अब आप का नाम भी जा सकता नासा के जरिये मंगल ग्रह पर, आवेदन करने का तरीका जारी..

नवीन समाचार, नैनीताल, 23 फरवरी 2021। गत 19 फरवरी, 2021 को नासा का अंतरिक्ष यान मंगल की सतह पर उतरा है। नासा द्वारा भेजा गया रोवर लाल ग्रह पर मानव अभियान से पहले वहां प्राचीन समय में मौजूद सूक्ष्मजीवों के संसार और ग्रह के मौसम व भूगर्भ का पता लगाने के लिए भेजा गया है। खास बात यह भी है कि नासा का अंतरिक्ष यान दुनियाभर के अंतरिक्ष प्रेमियों के नाम भी अपने साथ मंगल ग्रह पर ले गया है। ऐसे खुशकिस्मत लोगों में नैनीताल जनपद के हल्द्वानी की रहने वाली दो ‘साइंस सिस्टर्स’ शिवानी व हिमानी मिश्रा भी शामिल हैं, जिनके नाम भी मंगल ग्रह पर पहुंचे हैं।

यह जानकर यदि आप भी खुद न सही, अपना नाम मंगलग्रह पर भेजने की सोच रहे हैं तो नासा आपको यह मौका दे रहा है। आप https://mars.nasa.gov/participate/send-your-name/future वेबसाइट से अपना नाम भी नासा के जुलाई 2026 में केप कार्निवाल एयर फोर्स स्टेशन फ्लोरिडा से मंगल ग्रह के ‘जेजरो क्रेटर’ पर जाने वाले अंतरिक्ष यान के साथ भेज सकते हैं। आप को बता दें कि इन शब्दों के लेखक ने भी नासा के अगले मार्स मिशन के लिए ‘बोर्डिंग पास’ प्राप्त कर लिया है। (https://mars.nasa.gov/participate/send-your-name/future/certificate/684015807396)
(Astronomy)

इस बारे में ‘साइंस सिस्टर्स’ शिवानी हिमानी ने लोगों को मंगल ग्रह पर अपने नाम भेजने की प्रक्रिया का बेहतरीन वीडियो तैयार कर यूट्यूब पर अपलोड किया है, जिसमें बहुत ही आसान तरीके से पूरी प्रक्रिया को समझाया गया है।

हिंदी माध्यम का लिंक है : https://youtu.be/yLK9e_YEQsE

अंग्रेजी माध्यम लिंक है : https://youtu.be/apAbAlDZCXU

उल्लेखनीय है कि शिवानी मिश्र हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज से भौतिक विज्ञान में शोध कर रही हैं तथा हिमानी मिश्र महिला महाविद्यालय से भौतिक विज्ञान में एमएससी कर रही हैं। साइंस सिस्टर्स शिवानी, हिमानी को विश्वास है कि भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो जल्द ही मानवयुक्त यान मंगल पर भेजने में कामयाब होगी। दुनिया हमें ज्ञान गुरु के रूप में तो जानती ही है, परन्तु अब हम भारतीयों को विज्ञान गुरु बनने की जरूरत है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : दर्शनीय रहा बृहस्पति और शनि का मिलना..

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 दिसम्बर 2020। मैदानी इलाकों में छाये घने कोहरे से इतर पहाड़ों पर खिले नीले आकाश में शाम ढलने के बाद दक्षिण-पश्चिम आकाश में क्षितिज के पास बृहस्पति और शनि ग्रह बेहद करीब नजर आए। दोनों को इस तरह साथ देखना जहां आम लोगों के लिए आकर्षक व दर्शनीय रहा, वहीं स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान में इस दौरान वैज्ञानिकों एवं शोध विद्यार्थियों ने 1.04 व 3.6 मीटर की दूरबीनों से कई सीसीडी कैमरों का उपयोग करते हुए इन पर नजर बनाए रखी तथा दोनों के बीच दूरी, चमक, सापेक्ष वेग आदि के अंतर का मापन किया।

एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. शशिभूषण पांडे ने बताया कि बृहस्पति ओर शनि की युति प्रत्येक 20 वर्षों में होती है। इससे पूर्व ऐसी लोकप्रिय खगोलीय घटना वर्ष 2000 में हुई थी। उन्होंने बताया कि बृहस्पति और शनि दोनों ही 20 दिसंबर की शाम को चंद्रमा के व्यास से अधिक करीब थे, और 21 दिसंबर की शाम सात बजे मैक्सिमा के समय उनके बीच की कोणीय दूरी इससे भी कम, लगभग 6 मिनट की रह गई। उन्होंने बताया कि दूरबीनों व कैमरों की मदद से इस दौरान के प्राप्त आंकड़ों का और विश्लेषण जारी है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : कल आकाश में दिखेगा ऐसा नजारा, जो इससे पहले मुगल काल में देखा गया…

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 दिसम्बर 2020। आगामी 21 दिसंबर 2020 का दिन अनंत ब्रह्मांड एवं अंतरिक्ष का रहस्य जानने के इच्छुक लोगों के लिए बेहद खास होने जा रहा है। इस दिन 397 साल बाद बृहस्पति और शनि ग्रह एक दूसरे के बेहद नजदीक नजर आने वाले हैं। इस दिन इन दोनों ग्रहों को धरती से खुली आंखों से भी देखा जा सकेगा। बताया जा रहा है कि सितंबर माह से ही दोनों ग्रह एक दूसरे के नजदीक बढ़ रहे हैं। ग्रहों का यह अद्भुत मिलन इन दिनों गत 16 दिसंबर से ही एक संयुक्त तारे की तरह चमकता दिखाई दे रहा है और आगामी 21 दिसंबर को दोनों ग्रहों की बीच की दूरी 75 करोड़ किलोमीटर होगी।

उल्लेखनीय है कि साल 2020 में इंसान बहुत सी खगोलीय घटनाओं का प्रत्यक्ष गवाह रहा है। इस पूरे साल दर्जन भर ऐस्टेरायड यानी क्षुद्र ग्रह धरती के पास से गुजर चुके हैं। वहीं पिछले दिनों उल्का पिंडों की बेहद सुंदर बरसात के भी लोगों को दीदार हुए। अब 397 साल बाद यानी मुगल काल के बाद दूसरी बार बृहस्पति और शनि ग्रह इतना नजदीक देखेंगे, कि एक चमकीले संयुक्त तारे की तरह नजर आयेंगे। नैनीताल स्थित आर्यभट्ट उपग्रह केंद्र के वैज्ञानिकों ने बताया कि पिछले दो-तीन माह से आकाश में क्षितिज के कुछ अंश ऊपर दो चमकीले पिंड दिखाई दे रहे हैं।

आगे-आगे बृहस्पति और उसके पीछे शनि चल रहा है। 21 दिसंबर की रात इन दोनों का अनूठा मिलन दिखाई देगा। वैज्ञानिकों ने बताया कि दोनों बड़े ग्रहों का एक दूसरे के इतना नजदीक आना ग्रेट कंजंक्शन कहलाता है। इस तरह की घटनाएं हर 20 साल बाद होती हैं। लेकिन 21 दिसंबर को दिखने वाला नजारा ग्रेट कंजंक्शन है। इसमें ग्रह आभासीय रूप से एक दूसरे के बेहद करीब आ जाते हैं। बृहस्पति, शनि और धरती के एक सीध में रहने से भी हमें ये नजदीक दिखाई देंगे। इसे खुली आंखों से या साधारण दूरबीन से भी देखा जा सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : बड़ी गौरवपूर्ण उपलब्धि : 11 किलोमीटर पैदल चलकर आये उत्तराखंड के 17 बच्चों ने अंतरिक्षयात्री से की ‘सीधी बात’

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की डबरालस्यूं पट्टी में पड़ने वाले तिमली स्थित श्री तिमली विद्यापीठ में निकटवर्ती पांच स्कूलों-राजकीय इन्टर कॉलेज देवीखेत, राजकीय इन्टर कॉलेज चेलुसैंण, सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या मन्दिर, आदर्श बाल भारती चेलुसैंण तथा श्री तिमली विद्यापीठ के छात्र-छात्राओं  को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (ISS) में मौजूद रिकी अर्नाल्ड से करीब 10 मिनट तक लाइव बातचीत करने का अभूतपूर्व मौक़ा मिला। 

ख़ास बात यह भी रही कि अंतरिक्षयात्री से सीधे बात करने का सौभाग्य हासिल करने वाले उत्तराखंड के सुदूर गांवों के इनमें से कई बच्चे 11 किलोमीटर पैदल चलकर भी विद्यालय पहुंचे थे। उनमें अंतरिक्ष को लेकर अपने हर सवाल का जवाब पाने की बेचैनी व खासा कौतूहल था। बच्चों ने अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद आर्नाल्ड से करीब 10 मिनट तक लाइव बातचीत की, और हर वह सवाल पूछा, जिसका उन्हें जवाब चाहिए था। मसलन बच्चों ने पहले से अंग्रेजी में तैयार प्रश्नों के जरिये अंतरिक्ष के अनुभव, स्पेसवॉक, ब्लैकहोल, एलियन को देखने जैसे सवाल पूछे।

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नैनीताल : भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीतने वाली प्रो. एंड्रिया का नैनीताल से है खास संबंध

-‘टीएमटी’ परियोजना के लिए भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीतने वाली एंड्रिया के सहयोगी रहे हैं एरीज नैनीताल के डा. पांडे नवीन समाचार, नैनीताल, 9 नवम्बर 2020। वर्ष 2020 का भौतिकी के लिए नोबल पुरस्कार ‘टीएमटी’ यानी ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप’ यानी दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास यानी फुटबॉल के मैदान जितनी बड़ी दूरबीन की … Read more

मौसम के बदले मिजाज के पीछे कोरोना के साथ सूर्य की ‘खराब सेहत’, आगे 10 दिन में 10 डिग्री बढ़ सकता है पारा !

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-इस वर्ष पर्यावरण साफ होने के साथ सौर सक्रियता ‘सोलर मिनिमम’ में अपने सबसे निचले स्तर पर
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मई 2020। इस वर्ष गर्मियों के मई माह तक शीतकाल से चला आ रहा बारिश व ओलावृष्टि का क्रम जारी है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तो अब भी बर्फबारी हो रही है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में अपेक्षित गर्मी नहीं है। मौसम का यह बदला मिजाज चर्चा में है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला कोरोना विषाणु की महामारी के कारण दुनिया भर में लागू लॉक डाउन की वजह से फैक्टरियों एवं वाहनों के काफी कम चलने से ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सर्जन से पर्यावरण में प्रदूषण का घटना एवं धरती के ऊपर ओजोन परत में सुधार आना, और दूसरे धरती पर ऊष्मा व ऊर्जा देने वाले सूर्य पर उसके 11 वर्षीय सोलर साइकिल यानी सौर चक्र के ‘सोलर मिनिमम’ यानी अपने निचले स्तर पर होना। उल्लेखनीय है कि सोलर मिनिमम को सूर्य की सेहत खराब होने के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि इससे सूर्य पर सौर भभूकाएं उठने की तीव्रता कम हो जाती है।
स्थानीय एरीज यानी आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन के अनुसार मौसम को अनेक घटक प्रभावित करते हैं। इनमें प्राकृतिक कारणों के साथ ही मानवजनित कारण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस वर्ष लॉक डाउन की वजह से मानव जनित कारणों में काफी कमी आई है। इस कारण क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोना ऑक्साइड व ओजोन आदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन काफी कम होने से धरतीवासियों की सबसे बड़ी चिता का कारण बनी ओजोन परत में सुधार आया है। वहीं दूसरी ओर सूर्य 2007 के आसपास अपनी सक्रियता के 11 वर्षीय सौर चक्र में शीर्ष पर रहने के बाद इधर अपने सबसे कम सक्रियता की स्थिति में है। मौसम में दिख रहे बदलाव का यह भी बड़ा कारण हो सकता है।

अगले 10 दिनों में 10 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान झेलेंगे मैदानी क्षेत्र

Pr.BS Kotliya
प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया

नैनीताल। बदले मौसम पर दीर्घकालीन मौसम पर शोधरत कुमाऊं विश्वविद्यालय में यूजीसी के प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया का भी मानना है कि मानव जनित कारण मौसम का काफी प्रभावित करते हैं। बावजूद उनका मानना है कि वर्तमान मौसमी बदलाव के पीछे मानवजनित कारणों से अधिक प्राकृतिक कारण हैं। उन्होंने कहा कि मई के पहले पखवाड़े तक सक्रिय रहा पश्चिमी विक्षोभ अब समाप्त हो गया है। इसके बाद अगले दो-तीन दिनों में ही गर्मी बढ़ने वाली है और मैदानी क्षेत्रों में अगले 10 दिनों में तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि यह बढ़ा हुआ तापतान दक्षिण पश्चिमी मानसून के आने तक बना रह सकता है। अलबत्ता, पर्वतीय क्षेत्रों में हाल में हुई बारिश की वजह से मौजूद नमी तापमान को अधिक बढ़ने नहीं देगी। लिहाजा पहाड़ों पर मौसम खुशगवार रह सकता है।

यह भी पढ़ें : ‘आर्द्रा नक्षत्र’ में हो सकता है महाविस्फोट ! क्या 26 ही रह जायेंगे नक्षत्र ?

-पिछले पांच वर्ष से तारे की चमक में कमी आने से वैज्ञानिक जता रहे सुपरनोवा विस्फोट की आशंका, जिसके बाद कुछ समय के लिए खत्म होने से पहले सूर्य व चंद्रमा जैसा तीसरा सबसे चमकदार तारा जैसा नजर जाएगा आर्द्रा नक्षत्र
Ardra nakshtraनवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। पृथ्वी से 700 प्रकाश वर्ष दूर एक आकाशगंगा में स्थित सूर्य से करीब 19 गुना भारी व नौ सौ गुना बड़े विशाल आकार वाले लाल रंग के तारे ‘बेटेल्गयूज’ (भारतीय नाम आर्द्रा नक्षत्र) पर दुनिया भर के खगोल वैज्ञानिकों की नजरें लगी हुई हैं। अभी यह सबसे अधिक चमक के मामले में आकाश गंगा का 11वां तारा है। लेकिन इधर पिछले पांच माह में इसकी चमक में 25 फीसद कमी आ गई है। वैज्ञानिकों का इस आधार पर ही मानना है कि जल्द ही सूपरनोवा विस्फोट के जरिये इसका अंत हो जाएगा। वहीं धार्मिक आधार पर देखें तो माता नंदा देवी के मेले का धार्मिक पक्ष निभाने वाले पंडित एवं शिक्षक भगवती प्रसाद जोशी कहते हैं कि धार्मिक तौर पर किसी नक्षत्र के समाप्त होने की परिकल्पना नहीं की गई है।

जानिये आर्द्रा नक्षत्र के बारे में:

आर्द्रा का अर्थ होता है नमी। आकाश मंडल में आर्द्रा छठवां नक्षत्र है। यह राहु का नक्षत्र है व मिथुन राशि में आता है। आर्द्रा नक्षत्र कई तारों का समूह न होकर केवल एक तारा है। यह आकाश में मणि के समान दिखता है। इसका आकार हीरे अथवा वज्र के रूप में भी समझा जा सकता है। कई विद्वान इसे चमकता हीरा तो कई इसे आंसू या पसीने की बूंद समझते हैं। आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में 6 अंश 40 कला से 20 अंश तक रहता है। जून माह के तीसरे सप्ताह में प्रातः काल में आर्द्रा नक्षत्र का उदय होता है। फरवरी माह में रात्रि 9 बजे से 11 बजे के बीच यह नक्षत्र शिरोबिंदु पर होता है। निरायन सूर्य 21 जून को आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है। इसे पृथ्वी पर नमी की मात्रा बढ़ने के रूप में भी देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में 0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है-अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती। 28वां नक्षत्र अभिजीत है। राहु को आर्द्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है। आर्द्रा नक्षत्र के चारों चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है।

इधर, स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमार के अनुसार सुपरनोवा विस्फोट के दौरान विशाल ऊर्जा के विकिरण से इसकी चमक कुछ समय के लिए काफी अधिक बढ़ जाएगी। इसके बाद यह यात्रि में कुछ समय के लिए आसमान में सूर्य व चंद्रमा के बाद तीसरे सबसे अधिक चमकते हुए तारे के रूप में नजर आयेगा। यह अवधि एक-दो माह से चार माह तक की हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बेटेल्गयूज मृग तारा समूह का 10 मिलियन वर्ष से कम पुराना तारा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके आकार के फैलने का सिलसिला लगभग 40 हजार साल पहले शुरू हो चुका था, जो अब विशाल आकार ले चुका है। इस तारे के बारे में वैज्ञानिकों को 1836 में पता चला था। तभी से इस तारे में वैज्ञानिक नजर रखे हुए हैं। यूरोपियन सदर्न आब्जर्वेटरी की वेरी लार्ज टेलीस्कोप इस पर नजर रखी जा रही है। इसके विस्फोट को लेकर निश्चित समय का आंकलन अभी नहीं किया जा सकता है।
बताया गया है कि किसी विशाल तारे में इस तरह का महाविस्फोट इससे पूर्व वर्ष 1006, 1054 व 1572 ईसवी सन मंे एवं आखिरी विस्फोट 1604 ईसवी सन में हुआ था। इसलिए सैकड़ों वर्षों में होने वाली इस दुर्लभ खगोलीय घटना को लेकर वैज्ञानिक काफी रोमांचित हैं। बेटेल्गयूज के विस्फोट से वैज्ञानिकों को पता चल सकेगा कि विस्फोट से पूर्व तारे की स्थिति क्या होती है। जिससे इस तरह के तारों के अंत समय की स्थिति के साथ आगे के अध्ययन में आसानी हो जाएगी।

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-14 जनवरी 2019 को हुए विशाल गामा किरणों के विष्फोट का देश के 20 देशों के वैज्ञानिकों के साथ किया स्पेन और पुणे की दूरबीनों से सफल प्रेक्षण
नवीन समाचार, नैनीताल, 20 नवंबर 2019। एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के दो वैज्ञानिकों डा. शशिभूषण पांडे एवं डा. कुंतल मिश्रा का शोध पत्र एक बार पुनः दुनिया की शीर्ष विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ पत्रिका के नवंबर माह के अंक में प्रकाशित हुआ है। दोनों वैज्ञानिकों का यह शोध पत्र ब्रह्मांड के सबसे बड़े-गामा किरणों के विष्फोट से संबंधित है, जिसका उन्होंने भारत के आईआईएसटी त्रिवेंद्रम की डा. एल रेसमी व उनके साथियों के साथ स्पेन और पुणे की दूरबीनों से गत 14 जनवरी 2019 को सफल प्रेक्षण किया।
बुधवार अपराह्न स्थानीय एरीज में आयोजित पत्रकार वार्ता में निदेशक डा. वहाब उद्दीन एवं डा. शशि भूषण पांडे व डा. कुंतल मिश्रा ने पत्रकार वार्ता में यह जानकारी दी। बताया कि 14 जनवरी को 22 सेकेंड के लिए गामा किरणों का विस्फोट जीआरबी 190114सी हुआ था। दुनिया के 20 देशों के वैज्ञानिक भी इसका प्रेक्षण कर रहे थे। बताया कि जीआरबी विस्फोट ब्रह्मांड के सर्वाधिक बड़े व भयावह विस्फोट होते हैं। गामा किरणों सबसे शक्तिशाली तरंगे होती हैं जो कि किसी लोहे के 26 इंच मोटे से मोटे कोलम से भी पार हो जाती हैं। इनकी तरंगदैर्ध्य परमाधु के आकार से भी छोटी होती है। लिहाजा ये इतनी घातक होती हैं कि परमाणु को भी अपनी ताकत से खत्म कर सकती हैं। यदि इनका रुख कभी किसी कारण पृथ्वी की ओर हो जाए तो इससे होने वाले नुकसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए वैज्ञानिक इनके अध्ययन में जुटे हुए हैं। हालांकि 14 जनवरी को रिकार्ड हुआ गामा किरणों का विस्फोट ब्रह्मांड में पृथ्वी से 4.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हुआ था। इससे पूर्व भी डा. पांडे व डा. मिश्रा का इससे अपेक्षाकृत छोटा जीआरबी 160625बी के विस्फोट का शोध भी नेचर पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि ऐसे विस्फोट ब्रह्मांड में हर रोज करीब एक होते रहते हैं।

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-धनतेरस की पिछली शाम वाशिंगटन से हुई है न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पहली बार घोषणा, एरीज के वैज्ञानिकों की भूमिका भी रही है इस खोज में
-इस खोज में एरीज के वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी रहे हैं शामिल
-इसी माह ब्लेक होल्स के आपस में टकराने से संबंधित एक अन्य खोज पर मिला है इस वर्ष का नोबल पुरस्कार
नैनीताल। महान वैज्ञानिक आंइस्टीन ने अपने जीवन काल में पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर अंतरिक्ष में होने वाली एक ‘बड़ी दीपावली’ की ओर सैद्धांतिक तौर पर इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि दो ‘न्यूट्रॉन स्टार्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलती हैं, जोकि ‘स्पेस टाइम’ यानी अंतरिक्ष के समय की गणना को प्रभावित करती हैं। पहली बार वैज्ञानिकों ने आइंस्टीन की इस मान्यता की उपकरणों की मदद से पुष्टि कर दी है। बीती 16 अक्टूबर यानी धनतेरस की पिछली शाम अमेरिका के वाशिंगटन डीसी से इसकी घोषणा की गयी। गर्व करने वाली बात है कि इस सफलता में भारत और नैनीताल के एरीज के वैज्ञानिकों की भी भूमिका रही है। एरीज के दो वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी इस परियोजना के अंतर्गत एक खास तरह की गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज में शामिल रहे हैं। खास बात यह भी है कि ऐसी ही एक अन्य खोज, जिसमें इसी तरह दो ‘ब्लेक होल्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पुष्टि हुई है, पर इसी माह इस वर्ष यानी 2017 का विज्ञान का दुनिया का सबसे बड़ा नोबल पुरस्कार दिया गया है। आगे एरीज में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ‘देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ यानी ‘डॉट’ में भी इस सफलता की मुख्य सूत्रधार उपकरण ‘लाइगो’ के लगने की संभावना है, जिसके बाद एरीज इस दिशा में और अधिक बेहतर परिणाम दे सकता है।
इस संबंध में मंगलवार को एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडेय ने पत्रकार वार्ता कर इस उपलब्धि की जानकारी दी। बताया कि न्यूट्रॉन स्टार्स तारों के जीवन पूरा होने के बाद शेष बचे अत्यधिक घनत्व वाले करीब 20 किमी व्यास के पिंड होते हैं। ये इतने भारी होते हैं कि इनकी एक चम्मच भर सामग्री माउंट एवरेस्ट से अधिक भारी होती है। इनके टकराने के बारे में अध्ययन लेजर तकनीक आधारित ‘अमेरिकी लेजर इंटरफेरमीटर गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला’ यानी लाइगो डिटेक्टर कहे जाने वाले उपकरणों से ही संभव होता है। यह लाइगो डिटेक्टर भारत में पुणे स्थित जॉइंट मीटर वेभ रेडियो टेलीस्कोप और लद्दाख स्थित हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप में लगे हैं। इनकी मदद से ही एरीज के दोनों वैज्ञानिकों ने इस खोज को करने में अपना योगदान दिया है। इनके अवलोकन में वैज्ञानिक सूर्य के द्रव्यमान के 1.1 से 1.6 गुना तक भारी इन खगोलीय पिंडों को 100 सेकेंड तक न्यूट्रॉन स्टार्स के रूप में चिन्हित कर सके। इनके टकराने से गामा किरणों का फ्लैश यानी एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी की कक्षाओं के उपग्रहों के द्वारा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के आगमन के सापेक्ष दो सेकेंड तक देखा गया। यह इस बात का पहला निर्णायक प्रमाण है कि अक्सर उपग्रहों से नजर आने वाला अल्प अवधि का गामा विकीरण विस्फोट वास्तव में न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से उत्पन्न होता है। इसका अनुमान एक शताब्दी पूर्व आइंस्टीन से लगाया था। इससे इस बात के संकेत भी मिले हैं कि गामा विकीरण के शक्तिशाली विस्फोटों से प्राप्त विलयनों में लोहे से ज्यादा घनत्व वाले सोना और सीसा जैसे तत्वों की 50 फीसद से अधिक मात्रा होती है। लिहाजा इस खोज से एरीज के वैज्ञानिकों में हर्ष की लहर है, और इसे मील का पत्थर और बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

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जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंग
जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंग

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2019। मंगलवार 19 फरवरी को भारतीय परंपरा के अनुसार माघ पूर्णिमा की रात आसमान में चांद कुछ खास स्वरूप में नजर आया। स्थानीय एरीज के खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार आज का चांद आम दिनों के मुकाबले 14 फीसद बड़ा और 30 फीसद अधिक चमकीला नजर आया। वैज्ञानिकों के मुताबिक पूर्णिमा के दिन चांद के के अपनी कक्षा में पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए पृथ्वी के अपेक्षाकृत सबसे करीब आ जाने के कारण इसका आकार और रोशनी आम पूर्णिमा के चांद के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है और इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘सुपर स्नो मून’ कहा जा रहा है। सरोवरनगरी में बादलों की लुका-छिपी के बीच इसे खुली आंखों से देखा गया। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह खास मौका रहा। बताया गया कि आगे ऐसा नजारा 2555 दिनों यानी करीब सात साल बाद 2026 में दिखाई देगा।
वैज्ञानिकों ने नासा के हवाले से बताया कि रात्रि 9 बजकर 23 मिनट पर चांद अपने सबसे बड़े व चमकीले बिहंगम स्वरूप में नजर आया, जब सूर्य चांद के ठीक 180 डिग्री यानी उल्टी दिशा में रहा होगा। बताया गया है कि फरवरी के माह में ऐसे बड़े व चमकीले दिखने वाले चांद को कई संस्कृतियों में सुपरमून तो दुनिया के कुछ देशों में इस खगोलीय घटना को स्ट्रॉम मून, हंगर मून व बोन मून भी कहा जाता है। इस दौरान समुद्री क्षेत्रों में आने वाले कुछ दिनों में ज्वार की स्थिति आने और ज्यादा ऊंची लहरें उठने की भी आशंका जताई जा रही है।

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वाशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मार्स इनसाइट लैंडर यान सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतारा गया। भारतीय समयानुसार सोमवार-मंगलवार की रात करीब 1:24 बजे इसे मंगल पर लैंड कराया गया। इनसाइट लैंडर यान को मंगल की रहस्यमयी दुनिया के बारे में जानकारी के लिए बनाया गया।वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मंगल ग्रह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मददगार होगा। इससे पृथ्वी से जुड़े नए तथ्य पता लगने की उम्मीद भी जताई जा रही है।

inside lander

जानकारी के मुताबिक, इनसाइट के लिए मंगल पर लैंडिंग में लगने वाला छह से सात मिनट का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान इसका पीछा कर रहे दोनों सैटेलाइट्स के जरिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर इनसाइट लैंडर पर रहीं। इन दोनों सैटेलाइट्स का नाम डिज्नी के किरदानों पर रखा गया है- ‘वॉल ई’ और ‘ईव’। दोनों सैटेलाइट्स ने आठ मिनट में इनसाइट के मंगल पर उतरने की जानकारी धरती तक पहुंचा दी। नासा ने इस पूरे मिशन का लाइव कवरेज किया। इनसाइट से पहले 2012 में नासा के क्यूरियोसिटी यान ने मंगल पर लैंडिंग की थी।

मार्स इनसाइट लैंडर यान कैसे काम करेगा 
नासा का यह यान सिस्मोमीटर की मदद से मंगल की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन करेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मंगल ग्रह पृथ्वी से इतना अलग क्यों है।

इनसाइट लैंडर की खासियत

  • इनसाइट का पूरा नाम ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस’
  • मार्स इनसाइट लैंडर का वजन 358 किलो
  • सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाला यान
  • 26 महीने तक काम करने के लिए डिजाइन किया गया
  • कुल 7000 करोड़ का मिशन
  • इस मिशन में यूएस, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप समेत 10 से ज्यादा देशों के वैज्ञानिक शामिल
  • इसका मुख्य उपकरण सिस्मोमीटर (भूकंपमापी) है, जिसे फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने बनाया है। लैंडिंग के बाद ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सेस्मोमीटर लगाएगा।
  • दूसरा मुख्य टूल ‘सेल्फ हैमरिंग’ है, जो ग्रह की सतह में ऊष्मा के प्रवाह को दर्ज करेगा।
  • इनसाइट की मंगल के वातावरण में प्रवेश के दौरान अनुमानित गति 12 हजार 300 मील प्रति घंटा रही।
  • इनसाइट प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ब्रूस बैनर्ट का कहना है कि यह एक टाइम मशीन है, जो यह पता लगाएगी कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने।

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-सूर्य पर धरती की ओर उभरा 8 लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ से खतरे की आशंका
-एरीज के सौर वैज्ञानिक के अनुसार सूर्य पर फिलहाल कोई सौर ज्वालाएं नहीं हैं
नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सूर्य के धरती की ओर की सतह पर बुधवार को आठ लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ यानी एक तरह का गड्ढा उभरने का दावा किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इससे 2 विशाल जी-1 श्रेणी की सौर ज्वालाएं रिकॉर्ड की गयी हैं। नासा ने आशंका जताई है कि इन विशाल सौर ज्वालाओं की वजह से उठा ‘सौर तूफान’ धरती के चुंबकीय क्षेत्र से टकरा सकता है। इसके नतीजे काफी बुरे हो सकते हैं। इसके धरती के वायुमंडल से टकराने की वजह से उपग्रह अव्यवस्थित हो सकते हैं। इसकी वजह से व्यवसायिक उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं, और जीपीएस सिस्टम भी अव्यवस्थित हो सकता है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसकी वजह से दुनिया के अनेक हिस्सों में बिजली भी गुल हो सकती है।
अलबत्ता, एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाबउद्दीन का ‘कोरोनल होल’ के उभरने की बात को स्वीकार करते हुए इससे इतर कहना है कि इन दिनों सूर्य अपने 11 वर्ष के सौर सक्रियता चक्र में शांत स्थिति में है, और सौर सक्रियता अपने न्यूनतम स्तर पर है। उनका कहना है कि कोरोनल होल की वजह से काफी सौर हवाएं आ सकती हैं। हो सकता है कि इसकी तीव्रता अधिक हो, किंतु सूर्य पर काफी समय से कोई बड़ी सौर ज्वाला और कोई सौर धब्बा नजर नहीं दिखी है।

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