EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / کٲشُرКыргызKurdîKʋsaalLëblaŋoлаккулезгиLugandaLingálaລາວلۊری شومالیlüüdidxʷləšucidmadhurâमैथिलीŊmampulliMalagasyKajin M̧ajeļമലയാളംМонголᠮᠠᠨᠵᡠManipuriма̄ньсиဘာသာမန်mooreमराठीမြန်မာ閩南語 / Bân-lâm-gú閩南語(漢字)閩南語(傳統漢字)Bân-lâm-gú (Pe̍h-ōe-jī)Bân-lâm-gú (Tâi-lô)KhoekhoegowabNorsk (bokmål)नेपालीनेपाल भाषाli nihanawdmNorsk (nynorsk)ngiembɔɔnߒߞߏSesotho sa LeboaThok NaathChichewaNzemaଓଡ଼ିଆਪੰਜਾਬੀPiemontèisΠοντιακάⵜⴰⵔⵉⴼⵉⵜTarandineрусскийसंस्कृतсаха тылаᱥᱟᱱᱛᱟᱞᱤ (संताली)सिंधीکوردی خوارگDavvisámegiellaKoyraboro SenniSängöⵜⴰⵛⵍⵃⵉⵜတႆးසිංහලᠰᡞᠪᡝSlovenčinaСрпски / srpskiSesothoSENĆOŦENSundaSvenskaŚlůnskiதமிழ்ತುಳುతెలుగుไทยትግርኛትግሬцӀаӀхна мизSetswanaChiTumbukaTwiⵜⴰⵎⴰⵣⵉⵖⵜудмуртУкраїнськаاردوOʻzbekchaꕙꔤTshiVenḓaVènetoWaaleWolofLikpakpaanlYorùbá中文中文(中国大陆)中文(简体)中文(繁體)中文(香港)中文(澳門)中文(马来西亚)中文(新加坡)中文(臺灣)Help इस समाचार को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें नवीन समाचार, नैनीताल, 3 अगस्त 2022। काठगोदाम से देहरादून आने-जाने के लिए अब दिन नहीं देखने पड़ेंगे। अब गाड़ी संख्या 14120/14119 देहरादून-काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस आगामी 8 अगस्त से देहरादून से व 9 अगस्त से काठगोदाम से सप्ताह में 5 दिन के स्थान पर हर दिन चलेगी। पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार सिंह की ओर से यह जानकारी दी गई है। उल्लेखनीस है कि यह गाड़ी काठगोदाम से देहरादून को शाम 7 बजकर 45 मिनट पर रवाना होती है और सुबह 4.20 पर देहरादून पहुंचती है। अब तक यह रेलगाड़ी सप्ताह में मंगलवार, बुधवार गुरुवार, शनिवार, रविवार को चलती थी।इसके अलावा विज्ञप्ति में बताया गया है कि मुंबई सेंट्रल-लालकुआं विशेष गाड़ी का संचालन आगामी 3, 10 व 17 अगस्त तथा 14, 21 व 28 सितंबर को मुंबई से 6 अतिरिक्त फेरों में किया जाएगा। इसी तरह इन तिथियों के अगले दिन यह रेलगाड़ी लालकुंआं से मुंबई के लिए चलेगी। इतना जरूर है कि यह गाड़ी काठगोदाम नहीं आएगी। इसके अलावा 14113 (सूबेदारगंज-देहरादून एक्सप्रेस) भी अब 7 अगस्त से और देहरादून’-सूबेदागंज एक्सप्रेस 10 अगस्त से से प्रतिदिन चलेगी। पहले यह ट्रेन भी सप्ताह में 5 दिन चलती थी। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleयह भी पढ़ें : यात्रीगण कृपया ध्यान दें : नियंत्रित व निरस्त रहेगी काठगोदाम से चलने वाली कुछ रेलगाड़ियांयह भी पढ़ें : चुनावी दौर में टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के फाइनल सर्वे की खबर उड़ी, ‘नवीन समाचार’ ने की पड़ताल….यह भी पढ़ें : बड़ी खुशखबरी: एक कदम और आगे बढ़ी टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन, फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए 28.95 करोड़ मंजूरयह भी पढ़ें : बागेश्वर रेल लाइन का प्रारंभिक सर्वे पूरा, 6967 करोड़ रुपए में बनेगी बागेश्वर तक 154 किमी रेल लाइनडा. जी0एल0 साह की प्रोजेक्ट रिपोर्ट : टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन (महत्वाकांक्षी हिमालयी रेल परियोजना) लंबा रहा है संघर्ष का इतिहास:बड़ा पिछड़ा क्षेत्र होगा लाभान्वितअपेक्षाकृत बहुत आसान होगा टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का निर्माणबिना सुरंग केवल चार पुलों से 610 मीटर ही चढ़ कर पहुँच जाएगी बागेश्वर !यह भी पढ़ें: खुशखबरी: पहाड़ चढ़ेगी रेलयह भी पढ़ें : लोक सभा चुनाव के असली मुद्दे-3 : उत्तराखंड में 131 साल से अधूरी है एक परियोजना, कुमाऊं के सपनों की रेल को अब भी लाल झंडी…यह भी पढ़ें : पंचेश्वर बांध: ‘न्यू इंडिया’ से पहले ही टूट रही है ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ की अवधारणा!रेलवे के हालात: यह भी पढ़ें 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बेतालघाट के लिए रेललाइन और गौलापार के लिए ओवरब्रिज की मांगयह भी पढ़ें : उत्तराखंड के स्टेशनों पर उर्दू के प्रयोग पर रेलवे ने साफ की स्थिति..पूर्व समाचार : उत्तराखंड में रेलवे से उर्दू की होगी रुखसती, संस्कृत से होगा अभिनंदन, जानिये वजह..Like this:Relatedयह भी पढ़ें : यात्रीगण कृपया ध्यान दें : नियंत्रित व निरस्त रहेगी काठगोदाम से चलने वाली कुछ रेलगाड़ियांनवीन समाचार, बरेली, 12 मई 2022। रेलवे प्रशासन ने गुरुवार को उत्तर रेलवे के हरिद्वार-देहरादून खंड पर हरिद्वार-मोतीचूर स्टेशनों के मध्य पुल सं-28 पर गार्डर कार्य हेतु ब्लॉक दिये जाने के कारण गाड़ियों का निरस्तीकरण एवं नियंत्रण करने का कार्यक्रम जारी कर दिया है। बताया गया है कि आगामी 17 मई को काठगोदाम से चलने वाली काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस 45 मिनट नियंत्रित कर चलायी जायेगी, और 20 मई को काठगोदाम से देहरादून एवं देहरादून को चलने वाली काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस दोनों ओर से निरस्त रहेगी। इसके अलावा 12 से 21 मई के बीच काठगोदाम-मुरादाबाद-काठगोदाम विशेष एक्सप्रेस भी निरस्त रहेगी। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।यह भी पढ़ें : चुनावी दौर में टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के फाइनल सर्वे की खबर उड़ी, ‘नवीन समाचार’ ने की पड़ताल….नवीन समाचार, टनकपुर, 22 नवंबर 2021। एक सदी से अधिक लंबे जन संघर्ष के टनकपुर-बागेश्वर ब्रॉडगेज रेललाइन पर असमंजस बरकरार है। केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में इस रेल लाइन निर्माण को मंजूरी देते हुए फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए 28.95 करोड़ रुपये का बजट भी जारी किया था। इधर हाल में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी कुमार से भी इस बारे में मुलाकात की थी।मंगलवार को रेलवे के कुछ लोगों ने टनकपुर में रेलवे स्टेशन से आगे रेल लाइन के अंतिम छोर तक कुछ सर्वेक्षण जैसा कार्य भी किया, अलबत्ता किसी ने भी इसके बारे में जानकारी नहीं दी। वहीं रेलवे के इज्जतनगर बरेली मंडल के पीआरओ राजेंद्र सिंह से ‘नवीन समाचार’ ने बात की तो उनका कहना था कि अभी इस मामले में कुछ भी ठोस बात नहीं है।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। उल्लेखनीय है कि मंगलवार को रेलवे के अधिकारियों की टनकपुर में सरगर्मी के बाद चर्चा शुरू हुई कि टनकपुर-बागेश्वर ब्रॉडगेज रेललाइन के फाइनल सर्वे का काम कार्यदायी संस्था नोएडा की इरकान इंफ्रास्ट्रक्चर एंड सर्विसेज लिमिटेड के जूलॉजिकल व एलाइंमेंटस के इंजीनियरों ने शुरू हो गया है। बताया गया कि रेलवे एवं लोक निर्माण विभाग के सहयोग से रेलवे स्टेशन परिसर की लोकेशन देखी जा रही है और रेल मार्ग के प्रस्तावित अनुरेखण (नक्शे) को चस्पा कर सर्वे की शुरुआत की जा रही है।बताया गया कि यह रेल लाइन शारदा नदी के किनारे होते हुए बागेश्वर तक जाएगी। करीब 154.58 किमी लंबे इस रेल मार्ग का 80 प्रतिशत हिस्सा पूर्णागिरि के ठुलीगाड़ क्षेत्र से आगे सुरंगों से होकर गुजरना है। गौरतलब है कि इस रेल मार्ग के क्षेत्र में पंचेश्वर बांध भी बनना है, इसलिए रेल मार्ग को लेकर संशय अभी भी बना हुआ है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।यह भी पढ़ें : बड़ी खुशखबरी: एक कदम और आगे बढ़ी टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन, फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए 28.95 करोड़ मंजूर-मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री और रेल मंत्री का जताया आभार नवीन समाचार, देहरादून, 11 अक्टूबर 2021। केंद्रीय रेल मंत्रालय ने टनकपुर-बागेश्वर के बीच नई ब्रॉडगेज रेल लाइन के फाइनल लोकेशन सर्वे को मंजूरी दे दी है। इस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का आभार व्यक्त किया है।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि रेल लाइन बनने से क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियां बढे़ंगी और लोगों को काफी सुविधा मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड से विशेष लगाव है। उनके कार्यकाल में उत्तराखंड में उल्लेखनीय विकास कार्य हुए हैं। विशेष तौर पर कनेक्टिविटी के क्षेत्र में चारधाम सड़क परियोजना, ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल परियोजना और एयर कनेक्टिविटी में ऐतिहासिक काम हुए हैं या गतिमान हैं। इससे आने वाले समय में उत्तराखंड की आर्थिकी में क्रांतिकारी परिवर्तन आएंगे।उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री और रेलमंत्री से नई दिल्ली में भेंट के दौरान विशेष रूप से 154.58 किलोमीटर की टनकपुर-बागेश्वर नई ब्रॉडगेज रेल लाइन के फाइनल लोकेशन सर्वे का अनुरोध किया था। इसी क्रम में इसे मंजूरी दी गई है। फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए 28.95 करोड़ रुपये की भी स्वीकृति दी गई है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।यह भी पढ़ें : बागेश्वर रेल लाइन का प्रारंभिक सर्वे पूरा, 6967 करोड़ रुपए में बनेगी बागेश्वर तक 154 किमी रेल लाइन-स्वर्गीय डॉ. जीएल साह ने केवल चार पुलों के साथ व बिना एक भी सुरंग के केवल 610 मीटर की चढ़ाई के साथ 137 किमी में टनकपुर से बागेश्वर पहुंचने की बात कही थी -सर्वे में प्रस्तावित रेल लाइन में बनेंगे 276 पुल और 72 सुरंगें डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 जून 2021। रेलवे बोर्ड ने प्रस्तावित टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का प्रारंभिक सर्वे पूरा कर लिया है। रेलवे बोर्ड के परियोजना और निगरानी निदेशक पंकज कुमार ने 18 जून को रेल विकास निगम के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक को भेजे पत्र में 154.58 किमी लंबी इस प्रस्तावित लाइन का प्रारंभिक सर्वे पूरा होने की जानकारी दी है।रिपोर्ट में बताया गया है कि इस रेल लाइन के लिए 873 करोड़ रुपये की 958 हेक्टेयर जमीन चाहिए। इस परियोजना में 276 पुल और 72 सुरंगों की जरूरत होगी। रेल लाइन के निर्माण में प्रति किमी 45 करोड़ की दर से कुल 6967 करोड़ रुपये खर्च होंगे। उल्लेखनीय है कि हाल ही में मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने रेल मंत्री पीयूष गोयल से दिल्ली में मुलाकात कर प्रस्तावित रेल लाइनों की मंजूरी देने और टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का सर्वे कराने की मांग की थी। रेलवे बोर्ड के निदेशक प्रोजेक्ट के इस पत्र को रेल मंत्री के एलान के क्रम में देखा जा रहा है और परियोजना की डिटेल सर्वे तथा रेल लाइन के निर्माण की ओर बढ़ता कदम माना जा रहा है। हालांकि देखना होगा कि आगे केंद्र सरकार इस रेल लाइन की उपादेयता के लिहाज से इतना खर्च कर इस रेल लाइन का निर्माण कराने में कितनी इच्छाशक्ति दिखाता है।गौरतलब है कि कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोलशास्त्री व मानचित्रकार स्वर्गीय डॉ. जीएल साह ने अपने सर्वेक्षण में बताया था कि प्रस्तावित रेल लाइन 1909-10 में स्थापित टनकपुर स्टेशन से बागेश्वर तक शारदा (काली) व सरयू के समानान्तर उतार-चढाव एवं मोडदार पथ पर स्टेशनों एवं पुलों से आगे बढती हुयी लगभग 137 किमी की होगी। पूरे मार्ग में केवल चार पुल होंगे, जबकि एक भी सुरंग नहीं होगी, और टनकपुर से बागेश्वर के बीच रेल लाइन केवल 610 मीटर की चढ़ाई ही चढ़ेगी। डॉ. साह के अनुसार पहला स्टेशन पोथ या चूका गांव पर टनकपुर से 46 किमी पर, दूसरा मदुवा लगभग 25 किमी पर, तीसरा लगभग 16 किमी आगे पंचेश्वर में, चौथा 19 किमी आगे घाट में, पांचवा 33 किमी आगे भैंसियाछाना या सेराघाट में तथा छठा 18 किमी आगे बिलौना या बागेश्वर में होगा।उन्होंने बताया कि 137 किमी की इस रेल लाइन में से करीब 67 किमी लाईन चीन व नेपाल की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के समानान्तर होगी। लिहाजा इससे सैनिक गतिविधि की निगरानी, सेना एवं भारी सैन्य सामग्री के लाने-ले जाने के लिए इसका उपयोग किया जा सकेगा, साथ ही निर्माणधीन पंचेश्वर बांध के निर्माण के लिए तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा, पूर्णागिरि धाम, उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों में पर्यटन व आधारभूत सुविधाओं के विस्तार के लिये भी यह मील का पत्थर साबित होगी। प्रदेश की करीब 55 लाख जनता को भी इससे लाभ मिलेगा। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।डा. जी0एल0 साह की प्रोजेक्ट रिपोर्ट : टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन (महत्वाकांक्षी हिमालयी रेल परियोजना) 1-पृष्ठभूमि: प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व 1888-89 तथा 1911-12 में क्रमशः अंग्रेजी शासकों द्वारा तिब्बत तथा नेपाल के साथ सटे इस पर्वतीय क्षेत्र के लिए आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति के अतिरिक्त इसकी भू-राजनैतिक उपयोगिता को ध्यान में रखकर तथा प्रचुर वन सम्पदा व सैनिकों के सरल प्रवाह के निमित्त टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाइन की योजना का कार्यान्वयन इस क्षेत्र में सर्वेक्षणों की श्रृंखला से प्रारम्भ किया गया था। रेल लाइन के सर्वेक्षण के साक्ष्य आज भी इस क्षेत्र में यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध की दीर्घ अवधि जनित समस्याओं के चलते घीरे-धीरे अंग्रेजी शासकों की यह योजना ठंडे बस्ते में जाती रही और बाद के योजनाकारों द्वारा विस्मृत कर दी गयी। सन् 1960-70 के दशक में गांधीवादी पदमश्री स्व0 देवकी नन्दन पाण्डे के नेतृत्व में स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी स्व0 राम लाल साह एवं तत्कालीन बागेश्वर विकास खण्ड प्रमुख स्व0 ईश्वरी लाल साह (लेखक के पिता) ने टनकपुर रेलवे लाईन के लिए अंग्रेजी शासकों द्वारा करायें गये सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए इस योजना को पुर्नजीवित करेने के प्रयास किये। 1980 के दशक में श्रीमती इदिरा गॉधी के बागेश्वर आगमन पर सौपे गये ज्ञापनों में टनकपुर रेलवे लाईन की चर्चा की गयी तथापि यह प्रभावशाली अभिव्यक्ति नही बन सकी। यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि इस क्षेत्र से जुडे विभिन्न राजनैतिक दलों के स्तरीय नेता भी इस महत्वकांक्षी योजना के लिए उत्साहवर्द्धक पहल करने में सदैव कंजूसी ही बरतते रहे,हॉं राष्ट्रीय नेताओं के यदाकदा इस क्षेत्र में आगमन पर इन रेलवे लाईनों के सर्वेक्षण की कार्ययोजनाओं पर ध्यान आकर्षित करना स्थानीय जनता ने कभी नही छोडा। यही कारण रहा कि लगभग 60 वर्षो से ठंडे बस्ते से निकल कर 1984 में इसके सर्वेक्षण के लिए सरकार द्वारा बजट आवंटित किया गया और टनकपुर- बागेश्वर रेल लाईन के लिए सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ हो गया। धीरे-धीरे फिर जनता के विश्वास की परीक्षा ली गयी और लगभग दो दशकों के अन्तराल में यह रेल-परियोजना पुनः नेपथ्य में चली गयी और अनेक सरकारों की सैद्धान्तिक सहमति के बावजूद रेल बजटों में स्थानीय जनता की आशा गुमराह होती चली गयी ।अनेक बार की झूठी घोषणाओं,आश्वासन, अधूरे पडे सर्वेक्षण तथा सरकारों की उदासीनता से आहत क्षेत्रीय जनता के सहयोग से बागेश्वर में कुछ उत्साही एव जुझारू युवाओं ने दिसम्बर 2004 में बागेश्वर-टनकपुर रेल मार्ग निर्माण संघर्ष समिति का गठन किया गया। पर्वतीय क्षेत्र में विकास की गति को बढाने ,पर्यटन ,परिवहन, माल ठुलाई,संसाधन उपयोग,व्यापार, वााणिज्य सामरिक महत्व आदि के विचारणीय पक्षों पर ध्यान देते हुए 2005 को संघर्ष समिति ने बागेश्वर-टनकपुर रेल मार्ग के साथ ऋषिकेश -कर्णप्रयाग तथा रामनगर-चखुटिया रेल मार्गो के निर्माण के लिए भारत सरकार को ज्ञापन दिये गये तथा उक्त प्रस्तावों के सापेक्ष पद या़त्राओं के द्वारा जनमत तैयार करने व आन्दोलन को धारदार बनाने के अनेक प्रयास किये। क्षेत्रीय एवं दिल्ली के जंतर-मंतर तक ( 2008 ,2,009 एवं 2010 ) में धरना, प्रदर्शन, अनशन एवं ज्ञापनों के शान्ति प्रिय माध्यमों द्वारा दस वर्षो में लगभग सैकडों ज्ञापनों को देकर संघर्ष समिति ने उत्तराखण्ड के विकास के लिए इस सोच को जिन्दा दफन होने से बचाये से रखा।यह भी पढ़ें : एम्स ऋषिकेश में चमोली के दंपति ने नौ दिन के मृत नवजात का देहदान किया, चिकित्सा शोध को मिला मानवता का बड़ा योगदानरेल मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव ने सन 2007 के अपने उत्तराखण्ड भ्रमण पर दीर्घ समय से लम्बित रेल परिवहन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं, टनकपुर- बागेश्वर एवं ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइनों के निर्माण के लिये त्वरित सर्वेक्षणों के आदेश देकर न केवल उत्तराखण्ड के कद्द्रावर नेताओं को ही हतप्रभ किया जो कि कभी भी इन महत्वकांक्षी योजनाओं के प्रस्ताव भी अपनी सरकार के समक्ष प्रखरता से प्रस्तुत करने का साहस कर सके वरन अपनी घोषणा से इस हिमालयी प्रदेश के विकास को एक नयी दिशा देने का यत्न किया है। रेल मंत्री की घोषणा की विश्वसनीयता की के चलते क्षेत्रीय जनता को यह उम्मीद बंधी किे दीर्घ अन्तराल के उपरान्त उत्तराखण्ड की महत्वकांक्षी रेल परियोजना निकट भविष्य में विकास के नवीन आयामों को छू लेगी। वर्ष 2012 के रेल-बजट में तत्कालीन रेल मंत्री, माननीय श्री मुकुल राय जी द्वारा इस पर्वतीय राज्य के जन आकांक्षाओं और जरूरतों के अनुरूप प्रस्तावित टनकपुर -बागेश्वर रेलवे लाइन को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देकर देश की चार रेल राष्ट्रीय परियोजनाओं ( National Project ) में सम्मिलित किया गया था। इसके साथ ही इन प्रस्तावित रेल-लाईनों के लिए प्रारम्भिक सर्वेक्षण कराये जाने की घोषणा की गयी थी।2-पहाड़ी नगरों में रेल सम्पर्कः अर्वाचीन इतिहास की बातें: औपनिवेशिक शासन की अवधि में भारत में अंग्रेजों की अधिसंख्य आबादी का संकेन्द्रण, राजनैतिक आर्थिक शक्ति के चार केन्द्रों क्रमशः बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली तथा मद्रास में रहा। फलत:शक्ति के इन्हीं केन्द्रों के समीप ऊँचाई एवं पहाडी क्षेत्रों में अंग्रेजों ने अपने लिए पर्वतीय सैरगाहों को बसाया गया । हिमालयी क्षेत्र में यूरोप के सदृश्य जलवायु पर्वतीय आकर्षण, सामाजिक-आर्थिक विविधता तथा सामरिक स्थिति ने इन केन्द्रों में सरल पहॅुच के लिए देश के प्रमुख नगरों से रेल एवं रोड संयोजन तथा अवस्थापना सुविधाओं की प्रगति प्रमुख आवश्यकता रही। इसी क्रम में सन् 1850 के दशक के बाद अंग्रजों ने उत्तरी हिमालयी प्रदेश एवं दक्षिण में निलगिरी एवं पश्चिमी घाट की पहाडियों में इन्हीं स्टेशनों के लिए छोटी रेल लाईनें बिछाने की चार महत्वकांक्षी पहाड़ी योजनाओं पर विचार किया। दक्षिण भारत की लगभग 100 वर्ष पुरानी नीलगिरी पर्वत खिलौना रेलगाड़ी तथा पश्चिमी घाट की पहाडियों में चलने वाली मथेरान लाइट रेलवे के साथहिमालयी क्षेत्र में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे खिलौना ट्रेन: (सिलीगुड़ी से 80 कि0मी0 दूर हिमालय में दार्जिलिंग (2127 मी0) को जोडने वाली यह दुनिया की सबसे कम दो फिट चौडी पटरियों वाले रेल पथ पर छोटी खिलौना गाड़ी सचमुच ही भारतीय हिमालय को रेल से जोड़ने की यह प्रथम महत्वाकाक्षी योजना रही जो कि सन् 1879 में क्रियान्वित और 1881 में पूर्ण हुयी। इसको हिमालय की प्रथम रेलगाड़ी का श्रेय भी जाता है।)कालका-शिमला खिलौना रेल- (अंग्रेजी शासन में हिमालयी नगरों को रेल सम्पर्क द्वारा आच्छादित करने की योजनाओं में सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना कालका-शिमला के मध्य रेल सम्पर्क की थी।यद्यपि इस योजना पर विचार विमर्श 1847 से पूर्व कर लिया गया था तथापि रेल लाईन बिछाने का कार्य 1898 में प्रारम्भ हो कर 1903 में यह पूर्ण हुआ । 98 कि0मी0 लम्बा रेलवे पथ कालका (640 मी0) को शिमला (2073 मी0) तक पहुॅचने में लगभग 1433 मीटर की उॅंच्चाई को पार करना पडता है। रेलवे लाइन की प्रवणता 1ः33 है। सम्पूर्ण घुमावदार एवं सर्पिल पथ (पटरियों के मध्य की दूरी मात्र 0.75 मीटर), 102 सुरंगों से गुजरता है जिनकी कुल लम्बाई 8 कि0मी0 है। ये रेलगाड़ियॉ न केवल तत्कालीन बेमिसाल इंजिनियरिंग का एक अनूठा उदाहरण है वरन आज भी पर्यटन विकास के ने आयामों को छू रही है तथा क्षेत्र की प्रगति की आधार स्तम्भ रही है। काठगोदाम -नैनीताल -असफल माउन्टेन ट्रेन परियोजना: दार्जिलिंग एवं शिमला के तर्ज पर उत्तराखण्ड़ हिमालय के इस नीली झील वाले पर्यटक स्थल नैनीताल के लिए भी अंग्रेज एक छोटी रेल सम्पर्क की सम्भावनाओं को तलाशने में जुटे रहे। 1882-84 के मध्य हल्द्वानी तथा काठगोदाम के लिए रेल सम्पर्क जुडने के बाद 1889 में कर्नल थामसन ने माउन्टेन ट्रेन की एक योजना रानीबाग -ज्योलीकोट-बल्दियाखान को जोडते हुए नैनीताल तक बनाई गयी । इस रेल लाईन के लिए प्रारम्भिक सर्वेक्षण में नैनीताल की कमजोर भूगर्भिक बनावट मुख्य भ्रंश की उपस्थिति तथा धरातलीय उच्चावचनों की तीव्र प्रवणताजनित अवरोधों के फलस्वरूप अन्ततोगत्वा यह योजना 1895 में काल कलवित हो गयी। अन्य हिमालयी रेल योजनाऐं स्वतंत्रता के उपरान्त व्यापारिक , आर्थिक एवं सैन्य अनिवार्यताओं को ध्यान में रखते हुए हिमालय के आन्तरिक भागों में रेल सम्पर्क स्थापना के अनेक प्रयास किये गये। इसमें हिमाचल प्रदेश की 164 कि0मी0 लम्बी कंागडा घाटी रेलवे, तथा कश्मीर में 53 कि0मी0 लम्बी जम्बू तवी उधमपुर रेलवे महत्वपूर्ण योजनायें है। उत्तराउत्तराखण्ड़ में रेल आगमन एवं प्रमुख रेल-पथरेल-पथ आगमन वर्ष 1-बरेली- हल्द्वानी- काठगोदाम 1882- 1884 2-लालकुऑ- काशीपुर 1900 3-काशीपुर-रामनगर 1905-06 4-पीलीभीत-मझौला-टनकपुर 1909-10 5-हरिद्वार-देहरादून 1903 6-नजीमाबाद-कोटद्वार 1904 8-बनबसा-महेन्द्रनगर(नैपाल) 1915-16 7-हरिद्वार-ऋषिकश 1930 8-सहारनपुर-लक्सर-हरिद्वार- अप्राप्त 9-मुरादाबाद-लक्सर-हरिद्वार-अप्राप्त3- प्रस्तावित टनकपुर-बागेश्वर रेल लाईन -एक सर्वेक्षण रिपोर्ट: भौगोलिक सूचना तंत्र (जी0आई0एस0) की कम्प्यूटर आधारित विधा के अनुप्रयोग द्वारा क्षेत्रीय उपलब्ध मानचित्र, उपग्रह चित्र ,भौतिक सर्वेक्षणों तथा क्षेत्रीय जनता से प्राप्त साक्षात्कार सूचनाओं के मिले-जुले परिणामों पर आधारित लगभग 137 कि0मी0 लम्बे इस रेलवे लाईन का मोटा खाका क्षेत्रीय जनता, नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर इस परियोजना से जुडे मंत्रालयों योजनाकारों के लिए लेखक द्वारा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। टनकपुर से बागेश्वर तक यह रेल लाईन सदैव शारदा (काली) व सरयू के समानान्तर उतार-चढाव एवं मोडदार पथ पर अनेक स्टेशनों एवं पुलों से आगे बढती हुयी सारे क्षेत्रवासियों को रेल के साथ विकास के पथ से भी जोडेगी। प्रस्तावित रेल लार्इ्रन की व्यवहारिकता का मूल्यांकन, मैंदान तथा भाबर के मध्य चलने वाली उत्तराखण्ड की रेल लाईनों से भी किया गया है ताकि उच्चावच्चनों की अनेक भ्रान्तियॉ दूर हो सके तथा योजना का तथ्यपरक मूल्यांकन सम्भव हो सके।संम्भावित रेलवे स्टेशनों के मध्य परस्पर दूरी, उँचाईयों के परास, प्रस्तावित छोटे बडे पुल, जनपद तहसील एवं विकास खण्ड़ स्तर पर लाभान्वित गॉव और अनुमानित जनसंख्या, पंचेश्वर बांध, पडोसी देश नेपाल के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के फलस्वरूप सामरिक महत्व तथा उत्तराखण्ड के रेलवे लाईनों की प्रवणता से तुलनात्मक विश्लेषण द्वारा इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लाभों एवं अंततोगत्वा विकास के लिए व्यवहारिकता का आकलन मुख्य लक्ष है। लेखक को आशा है कि यह नितान्त शैक्षिक एवं पक्षपात रहित प्रस्ताव इस परियोजना के अविलम्ब क्रियान्वयन को गति देगी। चरण एक-टनकपुर से पोथः तिमली ब्रहमदेव के नाम से वर्णित टनकपुर, आस्टिनगंज के नाम से वर्तमान स्थान पर सन् 1880 में बसाया गया। आस्टिनगंज शब्द लोक व्यवहार में नहीं रच पाने के कारण बाद में इसका टनकपुर नाम ही सर्व स्वीकार्य हुवा। शाारदा अथवा चूका नदी के किनारे पर्वतपदीय स्थिति तथा नेपाल के साथ सामाजिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक एवं अन्तराष्ट््रीय व्यापारिक सम्बन्धों के अतिरिक्त भोटिया व्यापारियों के मौसमी प्रवास का प्रथम विनिमय केन्द्र तथा भोटिया मंडी के रूप में विख्यात टनकपुर काली कुमाउॅ के पर्वतीय भू-भाग,सोर (पिथौरागढ) से संलग्न विशाल भोट प्रदेश का प्रवेश द्वार रहा है। समुद्र सतह से 800 फीट की उॅंचाई वाला यह स्थान अपने समीपवर्ती साल, शीशम तथा सागौन के सघन वनों से आच्छादित है। मझौला पीलीभीत जनपद से बरमदेव- (विस्तार) के नाम से मीटर गेज की रेलवे लाइन खटीमा, बनबसा होती हुयी 1909-10 में टनकपुर तक निर्मित की गयी । इस लाइन पर बनबसा से नेपाल के लिए ट््राम की एक लूप लाइन 1915-16 में बिछायी गयी जिससे बेल, जिमुवा तथा सोनाली बांधों के साथ शारदा चैनल गेट की निमाण सामग्री ढोने क अतिरिक्त इस क्षेत्र की अकूत एवं मूल्यावान वन सम्पदा का भरपूर विदोहन किया गया। इसके अवशेष आज भी बनबसा -शारदा नदी के मध्य यत्र-तत्र देखे जा सकते है। टनकपुर-बागश्वर महत्वाकांक्षी रेलवे परियोजना के प्रथम चरण में रेल लाइन टनकपुर से पोथ(चूका) के मध्य बिछेगी जिसकी दूरी लगभग 26 कि0मी0 होगी। टनकपुर से बृह्मदेव, उॅचालीगोठ के समतल नदी घाटी के छोटे गॉवों से बढते हुए यह रेलवे पथ भाबर की ठुलीगाड में पहले छोटे रेलवे पुल से शारदा नदी की संकरी शिवालिक घाटी में प्रविष्ट होगा। यहॉ पर पुण्यागिरी मंदिर के यात्रियों के लिए एक छोेटा रेलवे हाल्ट प्रस्तावित किया जा सकता है। इसकेे उपरान्त प्रस्तावित रेल पथ पुण्यागिरी के तीव्र ढाल वाले कगार के ठीक नीचे बढते हुए एक दीर्घ मोड द्वारा खलढूंगा के नीचे पहुॅचेगी। खलढूंगा के पश्चात नदी के समानान्तर यह लाइन अंततः अपने पहले स्टेशन पोथ पहुॅचेगी जो कि लधिया नदी के पार्श्व में बडा गॉव है। समुद्र सतह से लगभग 381 मीटर की उॅचाई में लधिया तथा काली के संगम पर स्थित पोथ गॉव रेल से जुडने पर लधिया घाटी के सैकडों असेवित गॉवों को रेल यातायात की सुविधा देगा शिवालिक का यह क्षेत्र सघन वनाच्छादित है। कहीं -कहीं नदी के किनारे कृषि के समतल क्षेत्र है। एकाकी घाटी गॉवों को छोड अधिकांश गॉव दूर-दूर पहाडियों पर बसे है।चरण दो: चूका (पोथ) से मदुवा : पोथ के उपरान्त द्वितीय चरण में रेलवे लाइन लघु हिमालयी क्षेत्र में प्रवेश करेगी ओर मदुवा गांव जो कि लगभग 25 कि0मी0 की दूरी पर होगा । रेल लाइन का द्वितीय प्रस्तावित स्टेशन होगा । चूका के उपरान्त लधिया पर रेलवे पुल का निर्माण किया जाना होगा। तदुपरान्त रेल लाइन अनेक गॉवों क्रमशः खरा, कम्यून तथा मोस्टागांव के समीप नदी के समानान्तर 5 कि0मी0 के एक दीर्घ मोड लेकर खनापत, अमोला ,तरवत, अमानी, बिलगोरा तथा काली नदी के सहारे स्पर्श करती हुयी लोहावती नदी के संगम के बायी ओर स्थित मदुवा गॉव की निचली घाटी में आयेगी जहॉ दूसरा रेलवे स्टेशन प्रस्तावित होगा। इससे पूर्व लोहावती नदी पर रेलवे पुल का निर्माण भी प्रस्तावित होगा। पोथ एवं मदुवा के मध्य 25 कि0मी0 की रेल यात्रा सच में जंगल में मंगल जैसी होगी। काली नदी की संकरी ,सर्पिल एवं सघन वनाच्छादित घाटी में उॅचाई पर स्थित पहाड़ी गॉव जहॉ विकास की नये रुप को देख बरबस आश्चर्य चकित रहेंगे, वही नदी के पार नेपाल के डाड़ेल धुरा अंचल में सघन नयनाभिराम वनाच्छादन प्रकति के मनोहारी सौन्दर्य के साथ मानव बसाव के प्रतिकूलता को प्रदर्शित करेगा तथापि उत्तर में बैतडी अंचल की सीमा में नेपाली गांवों की बहुलता मानव भूगोल प्रभावशाली पाठ रहेगा।चरण तीन-मदुवा से पंचेश्वरः लेाहावती एवं शारदा के संगम पर स्थित अपेक्षाकृत बडा गॉव मदुवा लोहाघाट विकासखण्ड के अर्न्तगत सम्मिलित है। लोहावती घाटी मानवीय दृष्टिकोण से काफी सघन है। गॉव संख्या तथा जनसंख्या में अपेक्षाकृत बडे है। मदुवा से पंचेश्वर के बीच रेल पथ की लम्बाई 16 कि0मी0 होगी। यह रेलवे लाइन शारदा नदी के किनारे अपेक्षाकृत सीधी रेखा में आगे बढेगी। यह रेलवे लाइन घाटी के लगभग 18 गॉवों को स्पर्श करेगी जिसमें पासम,रौसाल, दयोकाना, चमोली, बमोटी आदि पुराने एवं महत्वपूर्ण गॉव है। इस समूचे यात्रा पथ में नेपाल की ओर जो कि बैतडी अंचल का दक्षिण पूर्वी भाग है जहां मानव बसाव का सघन संकेन्द्रण है। पंचेश्वर के ठीक सामने नेपाल के मेलसिन, धनीकोटी, सनतोेला धरमघाट आदि बडे तथा उपजाउ कृषि क्षेत्र है। इसका कारण यह है कि यह समूचा क्षेत्र सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से भारत पर अधिक आश्रित है। दोनों देशों के मध्य स्वतंत्र आवागमन के फलस्वरूप अधिसंख्य नेपाली जनता की आर्थिकी भारतीयता से अधिक प्रभावित है।महाकाली तथा सरयू के संगम पर पंचेश्वर का प्रस्तावित रेल सम्पर्क अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए भी अधिक उपयोगी होगा । प्रस्तावित पंचेश्वर बॉध जो कि दो देशों के सहयोग से निर्मित किया जाना हैं ,निश्चित रूप से इस रेलवे का प्रथम वरदान सिद्ध होगा।चरण चार- पंचेश्वर से घाट:पंचेश्वर के उपरान्त रेलपथ सरयू के बायें छोर के समानान्तर 19 कि0मी0 की दूरी पार कर घाट तक पहुॅचेगा जो कि इस सम्पूर्ण मार्ग के बीच चौथा प्रस्तावित रेलवे स्टेशन होगा। घाट पिथौरागढ की सेार घाटी ,भोट प्रदेश तथा काली कुमाउॅ के बडे भू-भाग को टनकपुर तथा मैंदानी भागों से जोडने का मुख्य केन्द्र है, वहीं यह दन्या -गंगोलीहाट व बेरीनाग के आन्तरिक पर्वतीय भू-भाग को मोटर यातायात की पहुॅच देता है। पंचेश्वर के उपरान्तह,निदिल ,खैकोट ,काकडी ,सिमेला, चमरौली, वन्यूडी ,सिगदा एवं कुठेरा गॉव है जो अपनी स्थिति में अपेक्षाकृत उॅचाई वाले स्थानों पर बसेे है। यह सम्पूर्ण सरयू घाटी में सामान्य वन क्षेत्र मिलता है । घाटी की ओर ढालों में चट्टानी क्षेत्र पाया जाता है जिसमें वनस्पति आवरण अपेक्षाकृत न्यून है।चरण पॉच -घाट से भैंसियाछाना ( सेराघाट ): घाट के प्रस्तावित रेलवे स्टशन से सरयू नदी का प्रवाह दक्षिण पूर्वी है। अतएव द0पू0 से उत्तर पश्चिम की ओर नदी के समानान्तर 33 कि0मी0 लम्बे रेल पथ द्वारा भैंसियाछाना( सेराघाट ) प्रस्तावित रेलवे स्टेशन को परस्परजोडेगा। इस मार्ग में दो स्टेशनों के मध्य पर सर्वाधिक दूरी होगी। घाट से लगभग 4 कि0मी0 आगे रामेश्वर के समीप पनार नदी पर एक रेलवे पुल का निर्माण अपेक्षित होगा । तदुपरान्त धौलादेवी विकासखण्ड एवं भैंसियाछाना विकास खण्ड (अल्मोडा जनपद) के छोटे बडे लगभग 21 गॉवों की सीमा पार करते हुए यह लाईन सेराघाट पहुॅचेगी। सेराघाट गनाई गंगोली परगने का महत्वपूर्ण यातायात केन्द्र रहा है। जो कि सरयू तथा बागश्वर जनपद के बिलोरी के पनढाल से निकलने वाली जैगन नदी के संगम स्थल पर स्थित है।चरण छह -भैंसियाछाना (सेराघाट) से बिलौना ( बागेश्वर ): इस महत्वाकांक्षी रेल परियोजना के 18 कि0मी0 लम्बा अन्तिम चरण सेराघाट एवं बिलौना बागेश्वर के मध्य रेल सम्पर्क से पूर्ण होगा। बिलौना जो कि बागेश्वर नगरपालिका सीमा से लगभग 3 कि0मी0 दक्षिण दिशा में सरयू के किनारे एक छोटा ग्रामीण बाजार तथा अल्मोडा -बागेश्वर सडक मार्ग पर स्थित है, रेलवे स्टेशन के लिये आदर्श स्थान होगा ।4- मूल्यांकन एवं निष्कर्ष : 137 कि0मी0 लम्बी (जिसमें 67 कि0मी0 रेल लाईन अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के समानान्तर होगी) टनकपुर-बागेश्वर रेल परियोजना, उत्तराखण्ड के पूर्वी सीमान्त पर इस समूचे क्षेत्र के सर्वागीण विकास में मील का पत्थर साबित होगी। निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से लेखक द्वारा इस सम्पूर्ण परियोजा के व्यवहारिता के पक्ष में विस्तृत,सामाजिक,आर्थिक,पर्यावरणीय एवं तकनीकि पक्षों को प्रस्तृत करने का प्रयास किया गया है। 1- उत्तराखण्ड के पूर्वी सीमान्त पिथौरागढ़ जनपद से लगी चीन की समूची सीमा के साथ-साथ पश्चिमी नेपाल सीमा पर किसी भी सैनिक गतिविधि की निगरानी, सेना एवं भारी सैन्य सामग्री के लाने -ले जाने के लिए इस रेलवे लाईन की उपादेयता सर्वोच्च होगी। पिथौरागढ़ की नैनी-सैनी हवाई पट्टी की इस रेलवे लाईन में महज 30 कि0मी0 होगी, 21 वीं शदी के युद्ध नीति में इसका बहु आयामी उपयोग किया जा सकेगा। बिट्र्शि शासन काल में इस रेलवे पथ के सर्वेक्षण का उद्देश्य आज के युग में और अधिक व्यवहारिक एवं प्रभावशाली दृष्टव्य है। 2- अपने समूचे यात्रा पथ में महाकाली के सहारे टनकपुर से पंचेश्वर तक लगभग 67 कि0मी0 की यह रेल लाईन न केवल निर्माणधीन पंचेश्वर बॉध के लिए मील का पत्थर साबित होगी वरन धौलीगंगा सरीखे बडे तथा अन्य मध्यम व छोटी जल विद्युत एवं क्षेत्रीय संसाधन आधारित विकास के लिए प्रस्तावित परियोजनाओं के स्थापना सुविधा, मशीनरी , श्रम तथा उत्पादों के सरल एवं सस्ते परिवहन में इसकी भूमिका अतुलनीय होगी। चम्पावत तथा लोहाघाट (काली कुमाऊॅॅ) के अपेक्षित क्षेत्र में रहने वाली लगभग 15 लाख जनता को सरल, सुलभ एवं सस्ते यातायात द्वारा विकास को जायेगी। यही नही नेपाल के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के सहारे गतिमान इस रेलवे द्वारा पश्चिमी नेपाल से भारत में आर्थिक एवं सांस्कृतिक से जुड़े नेपाल के नागरिकों के प्रवाह द्वारा रेलवे की आर्थिकी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकेगा।3-सरयू एवं महाकाली के संगम से उत्तर की ओर डैªगन की सीमा से लगा समूचा ट्रान्स-हिमालयी भू-भाग उत्तराखण्ड का एक विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्र है जो कि भोट के नाम से जाना जाता है। भोटिया जनजाति यहॉ तीन नदियों की घाटियों के सहारे व्यास, चौदास तथा दारमा घाटियों में निवासित है। अत्यन्त मेहनतकश और सदियों से चीन के साथ अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के पुरोधा रही इनकी आर्थिक भेड़ पालन तथा ऊन से बनी वस्तुओं का क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का अत्यन्त महत्व रहा है। चीन तथा नेपाल के साथ बढ़ते व्यवसायिक सम्बन्धों तथा खुले सीमा द्वारों से न केवल देश का विदेशी व्यापार बढेगा वरन् रेलवे लाईन द्वारा इसकी आशातीत प्रगति होगी।4-कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पर्यटन छोटा कैलाश, पंचाचूली, नार्मिक ग्लेशियर के यात्रा पथ के खुलने से राष्ट्र्ीय एवं अन्तराष्ट्र्ीय पर्यटन की वृद्धि जिसका लाभ क्षेत्र को मिलेगा।व्यापार वाणिज्य की वृद्धि के साथ-साथ यह समूचा रेल पथ प्रारंभ में टनकपुर के समीप- पुन्यागिरी के लाखों स्वदेशी तीर्थ यात्रियों केलिए निर्वाध वर्ष भर प्रवेश ईश्वरीय वरदान से कम नहीं होगा। इसके साथ ही कुमाऊॅ की पूर्व राजधानी चम्पावत एवं संलग्न मायावती लोहाघाट एवं एबट माउण्ट जो कि अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर के लिए विलक्षण ही नही वरन् अप्रतिम महत्वपूर्ण है, के पर्यटन विकास के नये राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज खुलेंगे। घाट से सेराघाट के मध्य जहॉ यह रेल पथ एक ओर पश्चिम में दन्या, चौर्गखा, बाडेछीना और बिनसर (अभ्यारण्य) ताकुला, बसौली तथा झिरौली, छाना बिलौरी के विशाल जन क्षेत्र को समेटते हुए रेल सुविधा प्रदान करेगा, वही पूर्वी सीमा पर सघन बसे गनाई-गंगोली तथा बेरीनाग, गंगोलीहाट एवं थल समेत अनेक नव सृजित पहाड़ी नगरीय क्षेत्रों को व्यापार वाणिज्य की प्रगति में सम्मिलित करेगा। तथा विनसर, काली मन्दिर,पाताल भुवनेश्वर समेत अनेक प्राकृतिक एवं विशिष्ट प्राकृतिक भूवृत, धार्मिक पर्यटन स्थलों को भी नयी पहचान मिल पायेगी। अन्तिम चरण में सेराघाट बागेश्वर का पथ जहॉ उत्तर की ओर सैनिक बाहुल्य क्षेत्र दानपुर के अन्तिम गॉव खाती को यातायात विकास से रूबरू करेगा, वही पश्चिम की ओर सघन बसे खरही पट्टी, बरौरेो (सामेश्वर), लोद, कत्यूर कौसानी, गरूड, बैजनाथ तथा गढवाल (ग्वालदम,देवाल) की लगभग 15 लाख से अधिक जनसंख्या को सेवित करेगा। अनेकानेक पर्वतीय कस्बों जैसे सोमेश्वर ,ताकुला, कौसानी, गरूड, डंगोली ग्वालदम, देवाल, कपकोट, भराडी एवं सामा के लिए व्यापार वाणिज्य की वृद्धि के साथ-साथ यह पथ कौसानी, ग्वालदम, बेदनी बुग्याल पिन्डारी, कफनी, सुन्दर ढूंगा तथा नामिक ग्लेशियरों के लिए आने वाले राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों को सुलभ तीव्र यातायात सुविधा बढ़ाने में सहायक होगा।यह भी पढ़ें : लक्सर नगर पालिका ने आरटीआई के जवाब में विकास कार्यों की जगह गोलगप्पों की रेट लिस्ट भेजी, सोशल मीडिया पर हुई वायरल5-यह रेल लाईन इस क्षेत्र के खनिज संसाधन यथा मैग्नेसाइट, सीसा, स्लेट,चूनापत्थर की राष्ट्रीय उपयोगिता एवं क्षेत्रीय आर्थिक उत्पादकता, तथा रत्नगर्भा भंडारों के अन्वेषण तथा देशहित में इनके युक्तियुक्त उपयोग में भी सहायक होगी। 6-इससे क्षेत्र की ऊष्ण एवं ऊपोष्ण घाटियों में अत्यधिक उत्पादित विभिन्न फलों जैसे आम,नासपाती, अखरोट एवं अमरूद, संतरा, नारंगी तथा बहुतायत से उत्पादित मौसमी सब्जियों आलू,प्याज, टमाटर आदि को भी राष्ट्रीय पहचान एवं बाजार मिलेगा। 7-इस सबके अतिरिक्त बागेश्वर जनपद की कत्यूर दानपुर ,कमस्यार, खरही, अल्मोडा जनपद की रीठागाड एवं चौगर्खा की गनाई-गंगोली, चम्पावत जनपद की गुमदेश का एक बडा भू- भाग तथा चमोली जनपद का थराली,देवाल,वाण एवं ग्वालदम के सघन बसाव क्षेत्र की लगभग 25 लाख से अधिक जनसंख्या इस सरल एवं महत्वपूर्ण परिवहन तंत्र की सुविधा से सीधे रूप से आच्छादित हो सकेगी। अनेक निर्मित एवं निर्माणाधीन तथा प्रस्तावित सडक मार्गो के निमार्ण से उत्तराखण्ड के इस सघन तथा उपेक्षित भू-क्षेत्र को मैदानी क्षेत्रों से सुगम एवं सरल सम्पर्क देकर सर्वसुलभ पहुॅच के अन्तर्गत लाया जा सकता है जिससे निःसंदेह यह समूचा क्षेत्र ,प्रदेश तथा राष्ट्रीय विकास में अपनी मानव एवं प्राकृतिक संसाधनों को सहयोजित कर सकेगा । 8-टनकपुर -बागेश्वर रेलवे लाइन के तथ्य परक मूल्यांकन तथा इसकी उपादेयता के लिए निम्नांकित सारणी द्वारा उत्तराखण्ड की अन्य रेल लाइनों के उदाहरणों को इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि यह परियोजना का तकनीकि पक्ष जटिल नही है।9-सामान्यतया पर्वतीय क्षेत्रों में उचॅाई के तीव्र विपर्यास रेलवे निर्माण के लिए मुख्य अवरोधक सिद्ध होते है। जबकि टनकपुर जो कि समुद्र सतह से 244 मीटर की उॅ.चाई पर स्थित है से बिलौना-854मीटर (बागेश्वर) तक 137 कि0मी0 की दूरी में केवल 610 मीटर का उतार -चढाव होगा । इसकी तुलना में कालका-शिमला के मध्य 98 कि0मी0 की दूरी को पार करने में रेल को 1433 मीटर की उॅचाई पार करनी होती है। रूद्रपुर -काठगोदाम के मध्य यह उच्चता 342 मीटर है जबकि रेल पथ की दूरी मात्र 44 कि0मी0 है। इसके साथ ही यह विचारणीय पक्ष है कि यह तकनीकि 100 वर्षो से अधिक वर्ष की है जबकि भाप से चलने वाले इंजनों द्वारा रेल को खींचा जाता था।10- भारतीय हिमालय में स्वीकृत इसी प्रकार कांगडा घाटी रेल पथ (1291 मीटर),उ॰पू॰ की लूम्डिंग-हॉफलोंग-बदरपुर रेल लाइन (अधिकतम प्रवणता 1/37) कश्मीर में, जम्मू-बारामूला रेल पथ तथा जम्मू-पूंछ रेल मार्ग जो कि जम्मू पहा़डियों के सहारे गुजरेगा , बिलासपुर -मंड़ी-लेह रेल लाइन जो कि अपने सम्पूर्ण यात्रा पथ में महा हिमालय, जास्कर तथा लद्दाख पर्वत श्रेणियों की उॅचाइयों को पार करेगी तथा (जबकि संसार की सर्वाधिक ऊॅंची रेल लाइन होगी ), इसी प्रकार उत्तराखण्ड की 125 कि0मी0 लम्बी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाईन जो कि अपने सम्पूर्ण पथ में शिवालिक तथा लघु हिमालय पर्वत श्रेणियों को कोरते हुए जायेगी और सर्वेक्षण के निष्कर्षो के अनुसार लगभग 100 कि0मी0 सुरंगों द्वारा पहुॅचेगी, के सापेक्ष टनकपुर -बागेश्वर रेलवे लाइन अपेक्षाकृत तकनीकि स्तर पर सरल होगी। रेलवसर्म्पको के उपरोक्त उदाहरणों द्वारा इसकी व्यवहार्यता स्वयं सिद्ध है।11- भू-गर्भिक संरचना के सम्बन्ध में एक सामान्य तथ्य कहा जा सकता है कि सरयू तथा महाकाली दोनों नदियों अपने समूचे पथ में भ्रंश घाटियों में प्रवाहित नही होती। 12- इसी प्रकार रेल मार्ग के निर्माण में किसी भी प्रकार की सामाजिक विस्थापन का प्रश्न नही है और यह भी कि कुछ छोटे व आवश्यक रेलवे पुलों को छोड पूरे निर्माण में चार रेल पुलों का निर्माण होगा यहां यह तथ्य समीचीन होगाा कि इन प्रस्तावित पुलों की चौडाई मैंदानी तथा भाबर के नदियों के विशाल चौडाई की तुलना में अत्यन्त कम होगी।लंबा रहा है संघर्ष का इतिहास:गौरतलब है कि वर्तमान में उत्तराखंड के कुमाऊं मण्डल के काठगोदाम, रामनगर और टनकपुर और गढ़वाल मण्डल के कोटद्वार और ऋषिकेश तक ही रेलमार्ग हैं। यह सभी स्टेशन मैदानी इलाकों के अन्तिम छोर पर हैं, अर्थात पहाड़ों में एक किलोमीटर का भी रेलमार्ग नही है। आश्चर्यजनक बात यह है कि इन स्थानों तक भी रेलमार्गों का निर्माण आज से लगभग 70-80 साल पहले ब्रिटिश शासन काल में ही हो चुका था। स्वतन्त्र भारत में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में रेल पहुंचाने की कोशिश के अन्तर्गत एक मीटर भी रेल लाइन नहीं बिछ पाई। टनकपुर-बागेश्वर रेललाइन का सर्वे सन् 1912 में ही हो चुका था। पुनः सन् 2006 में इस मार्ग का सर्वे करवाया गया है। वर्ष 1960-70 के दशक में पद्मश्री देवकी नंदन पांडे ने पहाड़ों में रेलमार्ग बनाये जाने की मांग पहली बार उठाई थी, उसके बाद कई संघर्ष समितियां इस मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक, हर मंच पर पहाड़ की इस मांग को उठा चुकी हैं। बागेश्वर-टनकपुर रेलमार्ग संघर्ष समिति के सदस्य जन्तर-मन्तर में दो बार आमरण अनशन कर चुके हैं।बड़ा पिछड़ा क्षेत्र होगा लाभान्वितप्रस्तावित टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन के मार्ग में धौलीगंगा, टनकपुर और पंचेश्वर जैसी वृहद विद्युत परियोजनायें चल रही हैं। इसके अतिरिक्त इस मार्ग में पड़ने वाले अत्यन्त दुर्गम और पिछड़े इलाके जैसे-बागेश्वर के कत्यूर, दानपुर, कमस्यार, खरही अल्मोड़ा के रीठागाड़ और चौगर्खा, पिथौरागढ़ के घाट, गणाई और गंगोल और चम्पावत के गुमदेश और पंचेश्वर इलाके की लगभग 10 लाख जनता इस सुगम परिवहन से जुड़ सकेगी।अपेक्षाकृत बहुत आसान होगा टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का निर्माणप्रस्तावित टनकपुर-बागेश्वर रेल पथ का मानचित्रकुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के डा. जीएल साह ने टनकपुर से बागेश्वर तक तीन माह के अथक परिश्रम के बाद भूगर्भीय सर्वेक्षण करते हुए अपनी रिपोर्ट रेल मंत्रालय को भेजी थी। इस सर्वे में कंप्यूटर, उपग्रह चित्र और भौतिक सर्वेक्षणों को आधार बनाया गया था। बताया जा रहा है कि इस परियोजना के पूरा होने से बागेश्वर के साथ ही ट्रेकिंग के शौकीन सैलानियों के स्वर्ग पिंडारी, कफनी व सुंदरढूंगा ग्लेशियरों के लिए 142 किमी का फासला कम होगा। बताया गया है कि इस प्रस्तावित योजना में कुल 137 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन बिछाई जानी है, जिसमें से 67 किमी लाइन अंतराष्ट्रीय सीमा (भारत-नेपाल) के समानान्तर बननी है। पंचेश्वर के बाद यह रेलमार्ग सरयू नदी के समानान्तर बनना है। इस रेल लाइन के बिछाने पर विस्थापन भी नहीं के बराबर होना है, क्योंकि महाकाली और सरयू दोनों नदियां घाटियों में बहती हैं। ये घाटियां भौगोलिक स्थिति से काफी मजबूत हैं। इस प्रस्तावित योजना में सिर्फ चार बड़े रेल पुलों का निर्माण करने की जरूरत पड़ेगी। पर्वतीय रेल व सड़क योजनाओं में मुख्य तकनीकी पक्ष ऊंचाई ही है, लेकिन इस लाइन को टनकपुर (समुद्र तल से ऊंचाई 244 मीटर) से बागेश्वर (854 मीटर) तक पहुंचने में 137 किमी की दूरी में मात्र 610 मीटर की ऊंचाई ही पार करनी होगी। अन्य पर्वतीय रेल योजनाओं की ऊंचाई की तुलना की जाये तो कालका से शिमला तक से 98 किमी की दूरी तय करने में 1433 मीटर और रूद्रपुर-काठगोदाम के मध्य 44 किमी में 342 मीटर की ऊंचाई पार करनी पड़ती है। वहीं उत्तराखंड की 125 किमी लम्बी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाईन अपने सम्पूर्ण पथ में शिवालिक तथा लघु हिमालय पर्वत श्रेणियों को कोरते लगभग 100 किमी सुरंगों से गुजरेगी, जबकि टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाइन पर एक भी सुरंग बनाने की जरूरत नहीं होगी, और पुल भी केवल चार ही बनाने पड़ेंगे, और प्रस्तावित पुलों की चौडाई भी मैदानी तथा भाबर के नदियों की तुलना में काफी कम होगी। इससे स्पष्ट है कि तकनीकी रूप से भी टनकपुर से बागेश्वर रेलमार्ग का निर्माण करना इस युग में कोई दुष्कर कार्य नहीं होगा।बिना सुरंग केवल चार पुलों से 610 मीटर ही चढ़ कर पहुँच जाएगी बागेश्वर !-प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व 1888-89 में ही अंग्रेजों ने करा दिया था इस रेल मार्ग का सर्वेक्षण -137 किमी के इस रेल पथ में केवल 610 मीटर का ही उतार-चढ़ाव होगा, लग सकते हैं टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन को पंख नवीन जोशी, नैनीताल। गत दिवस केंद्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु द्वारा गैरसेंण में टनकपुर से बागेश्वर रेल लाइन के निर्माण पर वक्तव्य देने के बाद यह प्रस्तावित रेल पथ पुन: चर्चा में आ गया है। इस बाबत पूर्व में भी अपने अध्ययन के बाद बनाये गये प्रस्ताव को दिखा चुके कुमाऊं विश्व विद्यालय के भूगोल विभाग के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डा. जीएल साह ने दावा किया है कि उनकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर ही राष्ट्रीय महत्व की परियोजना के रूप में शामिल हुई और पुन: इसकी घोषणा हुई है। उन्होंने ही बीते दिनों रेल मंत्री सुरेश प्रभु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस रेल पथ के बारे में विस्तृत प्रस्ताव भेजा दिया था, जिसके आधार पर ही श्री प्रभु ने इस मार्ग के बारे में घोषणा की है।डा. साह ने बताया कि टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की महत्वाकांक्षी हिमालयी रेल परियोजना के बारे में प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व 1888-89 तथा बाद में 1911-12 में अंग्रेजी शासकों द्वारा तिब्बत तथा नेपाल के साथ सटे इस पर्वतीय क्षेत्र के लिए आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति के अतिरिक्त इसकी भू-राजनैतिक उपयोगिता तथा प्रचुर वन सम्पदा को ध्यान में रखकर व सैनिकों के सरल प्रवाह के निमित्त इस क्षेत्र में सर्वेक्षणों की श्रृंखला से प्रारम्भ किया था। इन सर्वेक्षणों के साक्ष्य आज भी इस क्षेत्र में मिलते हैं। हालांकि प्रथम विश्वयुद्ध के कारण उपजी समस्याओं के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में जाती रही और बाद के योजनाकारों द्वारा विस्मृत कर दी गयी। आगे स्वतंत्र भारत में 1960-70 के दशक में गांधीवादी पद्मश्री स्व. देवकी नंदन पांडे के नेतृत्व में स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी स्व. राम लाल साह एवं डा. साह के पिता तत्कालीन बागेश्वर विकास खंड के प्रमुख स्व. ईश्वरी लाल साह ने इस योजना को पुर्नजीवित करने के प्रयास किये। 1980 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इदिरा गांधी के बागेश्वर आगमन पर भी इस मांग के ज्ञापन सौपे गये। जिसके बाद 1984 में इसके सर्वेक्षण के लिए सरकार द्वारा बजट आवंटित कर सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ हुआ, किंतु फिर लगभग दो दशकों तक योजना नेपथ्य में चली गयी। इधर राज्य बनने के बाद दिसम्बर 2004 में बागेश्वर-टनकपुर रेल मार्ग निर्माण संघर्ष समिति ने इस मांग पर बागेश्वर से दिल्ली के जंतर-मंतर तक संघर्ष किया। आगे 2007 में कुमाऊं के निजी भ्रमण पर आये तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने पुन: इसके निर्माण के लिये त्वरित सर्वेक्षणों के आदेश दिये। आगे वर्ष 2012 के रेल-बजट में तत्कालीन रेल मंत्री मुकुल राय ने इस रेल लाइन को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देकर इसे देश की चार राष्ट्रीय रेल परियजनाओं में सम्मिलित किया।उल्लेखनीय है कि तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने वर्ष 2010 में लोकसभा चुनाव के पहले नैनीताल, कौसानी व बागेश्वर भ्रमण के दौरान नैनीताल में सर्वप्रथम पत्रकारों (जिसमें लेखक भी शामिल था) के यह कहते हुए औचित्य समझाने पर कि उनके प्रदेश बिहार और उत्तराखंड एक जैसी पलायन की समस्या से ग्रस्त हैं। पलायन के कारण उत्तराखंड का चीन से लगा सीमावर्ती क्षेत्र खाली होता जा रहा है। रेल लाइन बनने से लोग यहां रुकेंगे, और देश की सीमाएं मजबूत होंगी, बताने पर ही सर्वप्रथम बागेश्वर-टनकपुर रेल लाइन के बारे में पहला सकारात्मक बयान दिया था, और आगे केंद्रीय रेल बजट में 110 किलोमीटर लंबी इस रेलवे लाइन बिछाने की स्वीकृति प्रदान की थी। और आगे रेल बजट में घोषित इस रेल लाइन का अक्टूबर 2010 में सर्वे किया गया था। गौरतलब है कि इससे एक दिन पूर्व रामनगर में उन्होंने इस रेल लाइन को औचित्यहीन ठहराया था। आगे रेलमंत्री मुकुल रॉय ने वर्ष 2012 में टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित करने का ऐलान किया था। इधर बीते दिनों पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक केके अटल ने सर्वेक्षण रिपोर्ट रेल मंत्रालय को सौंपे जाने की जानकारी दी थी। मंगलवार को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने कहा कि रेल बजट में इस बाबत घोषणा होने और इस रेल लाइन के आगे बढ़ने में कोई संदेह नहीं है। डा. साह ने अपने सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि प्रस्तावित रेल लाइन 1909-10 में स्थापित टनकपुर स्टेशन से बागेश्वर तक शारदा (काली) व सरयू के समानान्तर उतार-चढाव एवं मोडदार पथ पर स्टेशनों एवं पुलों से आगे बढती हुयी लगभग 137 किमी की होगी। पहला स्टेशन पोथ या चूका गांव पर टनकपुर से 46 किमी पर, दूसरा मदुवा लगभग २५ किमी पर, तीसरा पंचेश्वर लगभग 16 किमी आगे, चौथा घाट 19 किमी पर, पांचवा भैंसियाछाना या सेराघाट 33 किमी पर तथा छठा बिलौना या बागेश्वर स्टेशन 18 किमी पर होगा। उन्होंने बताया कि 137 किमी की इस रेल लाइन में से करीब 67 किमी लाईन चीन व नेपाल की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के समानान्तर होगी। लिहाजा इससे सैनिक गतिविधि की निगरानी, सेना एवं भारी सैन्य सामग्री के लाने-ले जाने के लिए इसका उपयोग किया जा सकेगा, साथ ही निर्माणधीन पंचेश्वर बांध के निर्माण के लिए तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा, पूर्णागिरि धाम, उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों में पर्यटन व आधारभूत सुविधाओं के विस्तार के लिये भी यह मील का पत्थर साबित होगी। प्रदेश की करीब 55 लाख जनता को भी इससे लाभ मिलेगा।उत्तराखंड में नई लाइनों का सर्वे शुरूभाजपा सांसद तरुण विजय ने 2015 के रेल बजट के बाद बताया कि उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में दशकों से लंबित बहुप्रतीक्षित व महत्वाकांक्षी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजना में शामिल टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का प्रारंभिक इंजीनियरिंग व ट्रेफिकिंग सर्वेक्षण (प्रिलिमिनरी इंजीनियरिंग एंड ट्रेफिकिंग सर्वे-पीईटीएस) का कार्य पूरा कर लिया गया है। इस सर्वेक्षण में 50 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान के साथ सामाजिक जरूरतों के लिए भी जरूरी बताई गई है। रेल मंत्री ने रामनगर से चौखुटिया और उसके गैरसैंण तक विस्तारीकरण की मांग को स्वीकार करते हुए 230 किमी लंबी रेल पटरी बिछाने का सर्वेक्षण बजट में स्वीकार कर लिया है। इसी प्रकार देहरादून-सहारनपुर 69 किमी, ऋषिकेश-देहरादून 20 किमी और देहरादून-कालसी 47 किमी रेल लाइन बिछाने के काम को हाथ में लिया गया है। उत्तराखंड में जहां 2014-15 में केवल 76 करोड़ रुपये के ऐसे रेलवे कार्य हाथ में लिए गए थे, जो लाइनों, डबलिंग व गॉज कन्वर्जन से संबंधित थे, वहीं 2015-16 में नरेंद्र मोदी सरकार में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने 304 करोड़ की राशि उत्तराखंड के रेल कार्यों को दी है, अर्थात पिछली सरकार की तुलना में उत्तराखंड के रेल कार्यों को 300 प्रतिशत की वृद्धि मिली है। इसी प्रकार यात्रियों की सुविधा के लिए वर्ष 2014-15 में उत्तराखंड की रेल लाइनों के लिए 148.15 करोड़ रुपये आवंटित थे,जिसमें 66.6 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 2015-16 के लिए यह राशि 334.41 करोड़ रुपये कर दी गई है। मैकेनिकल प्रोजेक्ट की दृष्टि से उत्तराखंड में 2015-16 में 316.67 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए एक करोड़ रुपये दिए गए हैं।यह भी पढ़ें: खुशखबरी: पहाड़ चढ़ेगी रेलयह भी पढ़ें : लोक सभा चुनाव के असली मुद्दे-3 : उत्तराखंड में 131 साल से अधूरी है एक परियोजना, कुमाऊं के सपनों की रेल को अब भी लाल झंडी…नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 26 मार्च 2019। देश के हिमाचल, जम्मू कश्मीर और असम समेत कई हिमालयी राज्यों में जब रेल दौड़ रही है, तब इसके विपरीत उत्तराखंड के पहाड़ों में जीवन को सरल बनाने, पर्यटन विकास और रोजगार के लिए रेल सेवा सपना बन कर रह गई है। प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व 1888-89 में ही अंग्रेजों ने इस रेल मार्ग का सर्वेक्षण करा दिया था। तब से करीब सवा सौ साल गुजरने के बावजूद टनकपुर-बागेश्वर रेल परियोजना पर काम कहने को हो रहा है पर धरातल पर 1 इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। अब इस रेल सेवा की फाइल रेलवे बोर्ड में पड़ी है। चुनाव के समय सर्वे के लिए धनराशि स्वीकृत करने की सियासी चाल से यहां के लोग खिन्न हैं। 1996 में तत्कालीन केंद्रीय रेल राज्य मंत्री सतपाल महाराज ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग व टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के लिए प्रयास किए। 2010-11 के बजट में बागेश्वर रेल लाइन के सर्वे के लिए 46.50 करोड़ रुपया स्वीकृत हुआ। 2013 -14 के बजट में टनकपुर बागेश्वर रेल परियोजना के साथ ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का भूमि पूजन करने का दावा किया। टनकपुर-बागेश्वर की फाइल रेलवे बोर्ड के पास भेजी गई। इसके बाद यह फाइल वहीं अटकी है। पिछले पांच साल में सांसद एवं केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा ने इसके लिए प्रयास नहीं किया। सूचना अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार 53.44 किमी लंबी इस रेल लाइन में 276 पुल और 13 स्टेशन प्रस्तावित थे। राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी की ओर से इसका फिर से सर्वे करने के लिए धनराशि स्वीकृत करने की बात सामने आई है।आश्चर्यजनक बात है कि सर्वे पूरा हो चुका है तो दोबारा कैसा सर्वे। इस चुनाव में यही रेल लाइन बड़ा मुद्दा बनने जा रही है।यह भी पढ़ें : पंचेश्वर बांध: ‘न्यू इंडिया’ से पहले ही टूट रही है ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ की अवधारणा!रेलवे के हालात: नैनीताल। सम्मेलन में बताया गया कि रेलवे देश में सवा लाख किमी रेल पटरियों पर रोज 20 से 25 हजार गाड़ियों का संचालन करता है और रोज दो करोड़ यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती है। विभाग में 13.26 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि तकनीकि सेवाओं से संबंधित 1.8 लाख सहित दो से ढाई लाख कर्मचारियों के पद रिक्त पड़े हैं। बड़ी संख्या में लोग आउटसोर्सिग के माध्यम से कार्य कर रहे हैं। रेलों में रेल कर्मियों की गलती से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या बीते वर्षो में 50 फीसद से घटकर 39 फीसद हो गई है, जबकि रेलवे समपारों पर होने वाली दुर्घटनाएं 33 फीसद से बढ़कर 40 फीसद हो गई हैं। 1600 विभागीय कर्मचारी भी प्रतिवर्ष ऐसे हादसों का शिकार हो रहे हैं।यह भी पढ़ें : हल्द्वानी : गौलापार के होटल में काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह संदिग्ध परिस्थितियों में मृत मिले, फेसबुक लाइव वीडियो में 4 करोड़ रुपये के भूमि विवाद और उत्पीड़न के आरोपयह भी पढ़ें : बलूनी के इस ‘दिवास्वप्न’ से चौखुटिया-बागेश्वर क्या, गैरसैंण भी पहुंचेगी ट्रेननवीन समाचार, नैनीताल, 28 फरवरी 2019। राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी ने एक और बड़ा स्वप्न देख लिया है और उनके इस स्वप्न पर पहल भी हो हुई है। रेल मंत्रालय ने उत्तराखंड के लिए बृहस्पतिवार को ऐतिहासिक घोषणा की है। इस निर्णय के बाद आने वाले समय में रेल नेटवर्क गैरसैंण, चौखुटिया, और बागेश्वर पहुंच जाएगा, जिससे पूरा उत्तराखंड रेल मार्ग के नेटवर्क से जुड़ जाएगा। यह पहल सफल रही तो किसी दिवास्वप्न से कम नहीं होगी।बता दें कि टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के लिए स्थानीय जनता पिछले 32 वर्षो से आंदोलनरत है। वहीं रामनगर चौखुटिया रेल लाइन के लिए भी दो दशक पहले से आंदोलन हो रहा है। राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी राज्य के हितों को लेकर काफी सक्रिय हैं। 21 फरवरी को ही उन्होंने इन तमाम रेलवे लाइनों के लिए रेल मंत्री पीयूष गोयल से मांग की थी। उनकी पहल पर रेल मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को टनकपुर से बागेश्वर, बागेश्वर से चौखुटिया, चौखुटिया से गैरसैंण और गैरसैंण से कर्णप्रयाग रेल लाइन सर्वे की मंजूरी दी। उत्तर-पूर्वी रेलवे गोरखपुर के महाप्रबंधक आरके प्रेमी ने टनकपुर से बागेश्वर की बीच 155 किमी की रेल लाइन के लिए दोबारा सव्रे के लिए 23 लाख 25 हजार रुपये मंजूर किए हैं। बागेश्वर, कर्णप्रयाग वाया गैरसैंण रेल लाइन सर्वे के लिए 38,7500 रुपये मंजूर किए हैं । श्री बलूनी ने बताया कि केंद्र सरकार ने राज्य के सांस्कृतिक, राजनीतिक व सामाजिक चेतना के केंद्र गैरसैंण को बड़ा सम्मान दिया है। ऐसा करके उन्होंने राज्य आंदोलन के शहीदों, राज्य की आंदोलनकारी जनता तथा उत्तराखंड के प्रति संवेदनशील मानस के प्रति सम्मान अपना व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन पर तेजी से कार्य हो रहा है। भूमि हस्तांतरण, सर्वे और प्रोजेक्ट पर तेजी से काम जारी है। यह रेल लाइन राज्य की प्रगति में नया इतिहास लिखेगी।आने वाले समय में पर्यटन के क्षेत्र में इस सीमांत प्रदेश कायाकल्प होगा।यह भी पढ़ें : खुशखबरी: आज से ‘उत्कृष्ट’ हो गयी रानीखेत एक्सप्रेस, जानिये कैसे…-एक रेक का पहला चरण पूरा, दूसरी रेक 28 फरवरी तथा तीसरी रेक 15 मार्च तक हो जाएगी यात्रियों के लिए उपलब्ध नवीन समाचार, नैनीताल, 16 फरवरी 2019। ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों को उच्च स्तर की यात्री सुविधायें उपलब्ध कराने के उद्देश्य ये पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल ने ‘प्रोजेक्ट उत्कृष्ट’ के तहत रानीखेत एक्सप्रेस का कायाकल्प कर दिया है। पूर्वोत्तर रेलवे के पीआरओ राजेंद्र सिंह ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत रानीखेत एक्सप्रेस के सभी टायलेटों के फर्श पर एपॉक्सी फ्लोरिंग की गयी है, तथा फ्रेश एअर वेंटीलेशन सिस्टम, नयी विशिष्टताओं के फ्लेशिंग वाल्व, अच्छी गुणवत्ता के लिक्विड सोप डिस्पेन्सर तथा स्टेनलेस स्टील के डस्ट बिन लगाये गये हैं, तथा गैंगवे व डोरवेज एवं प्रसाधनों की आन्तरिक दीवारों पर विनायल रैंपिंग की गयी है, जिससे यान की ऐस्थेटिक लुक में सुधार हुआ है। इसके अलावा एसी डिब्बों में पश्चिमी स्टाइल वाले टायलेटों में बेबी सीटर तथा सभी टायलेट में डिसइंफेक्टेशन हेतु आटोजेनीटर सिस्टम लगाये गये हैं। वहीं सभी डिब्बों में प्रसाधनों के बीच की गैलरी में पॉलीग्रास मैट तथा वेस्टीबल एरिया में रबर होलोमैट बिछायी गयी है, जिससे यात्रियो ंको एक कोच से दूसरे कोच में जाने में सुगमता होगी। साथ ही सभी डिब्बों में पारंपरिक बिजली की फिटिंग के स्थान पर एलईडी लाइटों का प्रावधान भी किया गया है। जबकि प्रथम श्रेणी के एसी डिब्बों में यात्रियों हेतु काफी आरामदायक मिंक ब्लेंकेट उपलब्ध कराये गये हैं। इसके अलावा डिब्बों की सघन सफाई एवं डिस्इन्फेक्टेशन किया गया है तथा बाहरी सतह पर पेन्ट टच अप का कार्य भी किया गया है। इस तरह की रानीखेत एक्सप्रेस की एक रेक का कार्य पूर्ण करके शनिवार 15 फरवरी को निकाला गया तथा काठगोदाम से रूद्रपुर स्टेशनों के बीच यात्रियों से बातकर उनकी फीडबेक भी ली गयी, जिसमें यात्रियों ने रेलवे द्वारा किये गये सराहनीय कार्यों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की गयी। बताया कि आगे रानीखेत एक्सप्रेस की दूसरी रेक 28 फरवरी तक तथा तीसरी रेक 15 मार्च तक पूरी होकर यात्रियों के लिए उपलब्ध हो जाएगी।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड को मिली एक और रेलगाड़ी, त्रिवेणी एक्सप्रेस टनकपुर से चलेगीनवीन समाचार, नैनीताल, 23 जनवरी 2019। उत्तराखंड को एक और रेलगाड़ी मिल गयी है। पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल की ओर से बुधवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार सिगरौली-बरेली-सिगरौली त्रिवेणी एक्सप्रेस व शक्तिनगर-बरेली-शक्तिनगर त्रिवेणी एक्सप्रेस रेल गाड़ियों का मार्ग विस्तार टनकपुर तक किया जायेगा। यह दोनों गाड़ियां अपने विस्तारित मार्ग के तहत बरेली सिटी, इज्जतनगर, पीलीभीत तथा मझौला पकड़िया स्टेशनों पर भी रूकेगी। इन दोनों त्रिवेणी एक्सप्रेस गाड़ियों के मार्ग विस्तार टनकपुर तक हो जाने से बरेली सिटी, पीलीभीत एवं उत्तराखंड के खटीमा, बनबसा व टनकपुर के आसपास के यात्रियांें को शाहजहांपुर, हरदोई, लखनऊ, रायबरेली, इलाहाबाद, विन्ध्याचल, मिर्जापुर, सोनभद्र आदि नगरों को आने-जाने के लिये एक अतिरिक्त सीधी ट्रेन की सुविधा भी उपलब्ध हो जायेगी।यह भी पढ़ें : कुमाऊं-उत्तराखंड को शीघ्र मिल सकते हैं रेलवे से कई तोहफे, रामेश्वरम, बंगलुरू से जुड़ेगी देवभूमि, फिर चलेगी आगरा के लिए कुमाऊं एक्सप्रेसटनकपुर से देहरादून, दिल्ली, अमृतसर तथा इलाहाबाद हेतु एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन शुरू करने की भी की गयी मांगेंकाठगोदाम से शताब्दी ट्रेन शाम के समय वाया बरेली-रामपुर होेते हुए दिल्ली तक तथा सुबह दिल्ली से काठगोदाम के लिए भी चलाने की की गयी मांगेंअल्मोड़ा सांसद टम्टा ने टनकपुर- बागेश्वर रेल लाइन का सर्वेक्षण पूर्ण होने के बाद शीघ्र इस लाइन का निर्माण शुरू करने एवं रामनगर-चौखुटिया-गैरसैण नई रेल लाइन का सर्वेक्षण कार्य शीघ्र पूरा करने की भी मांगें कींनैनीताल। 11 सितम्बर, 2018। पूर्वोत्तर रेलवे, इज्जतनगर मण्डल द्वारा सेवित क्षेत्रों के संसद सदस्यों एवं प्रतिनिधियों के साथ पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबन्धक राजीव अग्रवाल के साथ बुधवार को बरेली स्थित मण्डल रेल प्रबन्धक कार्यालय के सभाकक्ष में बैठक हुई। बैठक में अध्यक्षता करते हुए बरेली के सांसद एवं केंद्र सरकार में श्रम व रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष गंगवार ने भोजीपुरा स्टेशन पर पैदल उपरिगामी पुल का निर्माण शीघ्र करने, बरेली-लालकुआं रेल मार्ग पर ग्राम बिचपुरी में बंद किये जा रहे मानव रहित समपार सं. 15/सी एवं बहेड़ी तहसील के ग्राम करनपुर के बंद समपार संख्या 17/सी एवं 18/सी पर भी आरयूबी. का निर्माण करने की जरूरत बताई। इसके अलावा उन्होंने सीबी गंज में निर्माणाधीन डैमो शेड के कार्यशील हो जाने के बाद बरेली-हल्द्वानी एवं बरेली-कासगंज रेल खंडों पर दिन में 2-3 फेरे डैमो ट्रेन के लगवाने को कहा। साथ ही काठगोदाम-मथुरा रेलपथ पर पूर्व में चल रही कुमाऊं एक्सप्रेस की तर्ज पर बडी लाइन की गाड़ी को कुमाऊं एक्सप्रेस के नाम एवं समय-सारणी से ही पुनः चलाने, काठगोदाम से शताब्दी ट्रेन शाम के समय वाया बरेली-रामपुर होेते हुए दिल्ली तक तथा सुबह दिल्ली से काठगोदाम के लिए, काठगोदाम से कन्याकुमारी-रामेश्वरम वाया बरेली-कासगंज-मथुरा-आगरा- भोपाल-नागपुर-विजयवाडा-तिरूपति-सेलम और मदुरई जंक्शन तक, एक जनशताब्दी ट्रेन काठगोदाम से नई दिल्ली आनन्द विहार वाया बरेली प्रतिदिन तथा एक सुपरफास्ट ट्रेन काठगोदाम से बंगलौर-वास्कोडिगामा तक चलाने की मांग की। वहीं ऑवला के सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने भी इज्जतनगर मंडल की प्रतिष्ठित कुमाऊं एक्सप्रेस की तर्ज पर काठगोदाम से आगरा फोर्ट के मध्य एक एक्सप्रेस ट्रेन को पुनः चलाने की मांग की। पीलीभीत की सांसद एवं केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के प्रतिनिधि आनन्द लाल चौधरी ने बहेड़ी स्टेशन पर प्रातः 8-9 बजे के बीच काठगोदाम-लखनऊ अथवा रामनगर-आगरा फोर्ट एक्सप्रेस का ठहराव प्रदान करने की मांग की। जबकि नैनीताल के सांसद अजय टमटा के प्रतिनिधि हेमेंद्र रावत ने टनकपुर से देहरादून, दिल्ली, अमृतसर तथा इलाहाबाद हेतु एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन शीध्र करने का सुझाव दिया। साथ ही टनकपुर- बागेश्वर रेल लाइन का सर्वेक्षण पूर्ण होने की जानकारी देते हुए इस लाइन का निर्माण कार्य शीध्र प्रारम्भ करने एवं रामनगर-चौखुटिया-गैरसैण नई रेल लाइन का सर्वेक्षण कार्य शीघ्र पूरा करने की भी मांगें कीं। इसके अलावा उन्होंने टनकपुर से बरेली व अन्य स्थानों को जाने वाली पैसेंजर गाड़ियों का पीलीभीत में एक से डेढ घंटे तक होने वाले ठहराव की अवधि को कम करके 10 से 15 मिनट तक सीमित करने की मांग भी कीं। साथ ही 15013 रानीखेत एक्सप्रेस के प्रायः विलम्ब से काठगोदाम पहँुचने का उल्लेख करते हुए इसके समय पालन में सुधार लाने, इस गाड़ी के वातानुकूलित, स्लीपर तथा सामान्य श्रेणी के कोच पुराने होने की शिकायत करते हुए इनके स्थान पर नए कोचों की व्यवस्था करने और इधर हाल में शुरू हुई काठगोदाम से चलने वाली नैनी-दून जनशताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन के समय को पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों के लिए अनुकूल नहीं होने की बात कहते हुए इस गाडी के समय-सारणी में परिवर्तन करने की मांग की।यह भी पढ़ें : नैनीताल व यूपी वालों के लिए बड़े तोहफ़े का हुआ ऐलान : झांसी-लालकुआं के बीच चलेगी ग्रीष्मकालीन साप्ताहिक विशेष गाडीनैनीताल। रेल प्रशासन ने ग्रीष्मकाल में यात्रियों की भारी भीड़ को देखते हुये यूपी व नैनीताल वालों को बड़ा तोहफा दिया है। उनकी सुविधा के लिए झांसी-लालकुंआ के बीच एक जोड़ी ग्रीष्मकालीन साप्ताहिक विशेष गाडी का संचालन शुरू किया जा रहा है। यह विशेष रेलगाड़ी फिलहाल 10 फेरों के लिए चलेगी। उत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने बताया कि 04187 झांसी-लालकुंआ ग्रीष्मकालीन साप्ताहिक विषेष गाड़ी 25 मई तथा 1, 8,15, 22 व 29 जून तथा 6, 13, 20 तथा 27 जुलाई यानी प्रत्येक शुक्रवार को झांसी से रात्रि 11.05 बजे चल कर लालकुंआ अगली सुबह 10.45 बजे पहुंचेगी। और वापसी में लालकुंआ से हर शनिवार दोपहर 12.10 बजे चल कर रात्रि 12.30 बजे झांसी पहुंचेगी। गाड़ी में 6 साधारण श्रेणी के, 4 शयनयान श्रेणी, 3 वातानुकूलित तृतीय श्रेणी तथा 2 एसएलआरडी श्रेणी सहित कुल 15 कोच लगाये जायेंगे।यह भी पढ़ें : पहाड़ चढ़ेगी रेल ! लोहनी के रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनने से फिर जगी कुमाऊं में रेल की आस-टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की विस्तृत रिपोर्ट बनाने वाले कुमाऊं विवि के पूर्व प्रोफेसर गोविन्द लाल साह ने लोहनी को भिजवाईनवीन जोशी, नैनीताल। अपनी हर नयी जिम्मेदारी को उम्मीदों से भी बेहतर तरीके से पूरा करने के कारण ‘मिस्टर टर्न अराउंड’ कहे जाने वाले अश्विनी लोहनी के रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनने से एक बार फिर कुमाऊं के पहाड़ों पर आजादी के बाद रेल लाइन के आगे सरकने की उम्मीदों को पंख लग गये हैं। कुमाऊं में टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की विस्तृत रिपोर्ट बनाने वाले कुमाऊं विवि के भूगोल विभाग के पूर्व प्रोफेसर डा. जीएल साह लोहनी अपनी रिपोर्ट को यहां अल्मोड़ा जनपद के सात गांवों के समूह सतराली के ग्राम लोहना के मूल निवासी लोहनी को भिजवाने जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि डा. साह ने अपनी यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु को भिजवाई थी, जिसके बाद ही प्रभु ने इस रेल लाइन को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना में शामिल किया था। अलबत्ता, बाद में यह फिर से ठंडे बस्ते में डाल दी गयी है।यह भी पढ़ें : अश्विनी लोहनी को बनाया गया रेलवे बोर्ड का नया चेयरमैनडा. साह ने बताया कि टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की महत्वाकांक्षी हिमालयी रेल परियोजना के बारे में प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व 1888-89 तथा बाद में 1911-12 में अंग्रेजी शासकों द्वारा तिब्बत तथा नेपाल के साथ सटे इस पर्वतीय क्षेत्र के लिए आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति के अतिरिक्त इसकी भू-राजनैतिक उपयोगिता तथा प्रचुर वन सम्पदा को ध्यान में रखकर व सैनिकों के सरल प्रवाह के निमित्त इस क्षेत्र में सर्वेक्षणों की श्रृंखला से प्रारम्भ किया था।पंचेश्वर बांध के निर्माण से भी नहीं पड़ेगा टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के निर्माण पर प्रभावनैनीताल। डा. साह ने बताया कि उन्होंने करीब एक दशक पूर्व प्रस्तावित पंचेश्वर बांध के निर्माण की पृष्ठभूमि को संज्ञान में रखकर ही टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का प्रस्ताव तैयार किया था, लिहाजा इसे बांध के डूब क्षेत्र से अधिक ऊंचाई के हिसाब से बनाया गया है। इसलिये पंचेश्वर बांध के निर्माण से इस रेल लाइन के निर्माण में कोई बाधा नहीं पड़ेगी। बताया कि कुल 137 किमी लंबी यह प्रस्तावित रेल लाइन 1909-10 में स्थापित टनकपुर स्टेशन से पंचेश्वर तक 67 किमी भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा व काली नदी के समानांतर तथा पंचेश्वर से सेराघाट तक करीब 42 किमी बांध के डूब क्षेत्र से होकर गुजरेगी। लिहाजा इससे सैनिक गतिविधियों की निगरानी के साथ ही सेना एवं भारी सैन्य सामग्री के लाने-ले जाने के लिए इसका उपयोग किया जा सकेगा, साथ ही निर्माणधीन पंचेश्वर बांध के निर्माण के लिए तथा कैलाश मानसरोवर यात्रा, पूर्णागिरि धाम, उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों में पर्यटन व आधारभूत सुविधाओं के विस्तार के लिये भी यह मील का पत्थर साबित होगी। प्रदेश की करीब 55 लाख जनता को भी इससे लाभ मिलेगा।यह भी पढ़ें : पशु से टकराने के बाद सवारियों सहित अनियंत्रित होकर 20 किलोमीटर उल्टी दौड़ी ट्रेननवीन समाचार, खटीमा, 17 मार्च 2021। दिल्ली से टनकपुर आ रही पूर्णागिरि जन शताब्दी एक्सप्रेस (05326) के साथ बुधवार को अजीब सा हादसा हो गया। टनकपुर स्टेशन पर पहुचने से पहले होम सिग्नल नंबर 3 के पास से अचानक रेलगाड़ी वापस उल्टी दौड़ पड़ी, और करीब 20 किलोमीटर तक सवारियों को लेकर अनियंत्रित होकर वापस मैदानों की ओर ढलान के मार्ग पर दौड़ती चली गई। इससे यात्रियों के साथ ही रेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। देखें पटरी पर उल्टी दौड़ती रेलगाड़ी का वीडियो :https://www.youtube.com/watch?v=eShckfqhwLIप्राप्त जानकारी के अनुसार शाम करीब 4 बजे होम सिग्नल के पास एक पशु के चपेट में आकर कटने के बाद रेलगाड़ी रुकी, लेकिन इसी दौरान रेलगाड़ी का प्रेशर पाइप फट गया। इस कारण रेलगाड़ी सवारियों को लेकर उल्टी दौड़ पड़ी। इस दौरान रेलगाड़ी की गति 40 किलोमीटर प्रतिघंटे से अधिक बताई गई। यह भी बताया गया कि उल्टी दौड़ती ट्रेन की चपेट में भी एक पशु आया। सूचना मिलने पर आनन-फानन में क्रॉसिग गेटों को बंद करने के आदेश दिए गए। साथ ही बनबसा में पटरियों पर पत्थर-गिट्टी लगाकर ट्रेन को रोकने की कोशिश की गई, लेकिन ट्रेन नहीं रुकी। अलबत्ता आगे खटीमा-चकरपुर के बीच गेट संख्या 35 के पास ट्रेन को रोकने में सफलता मिली। गनीमत रही कि इस दौरान सभी यात्री सुरक्षित रहे। वरना बड़ा हादसा हो सकता था। यह भी पढ़ें : देहरादून-काठगोदाम के बीच दो जून से सप्ताह में पांच दिन चलेगी रेलगाड़ीनवीन समाचार, नैनीताल, 21 मई 2020। काठगोदाम-देहरादून विशेष गाड़ी 2 जून 2020 से चलायी जायेगी। इस गाड़ी का प्रस्थान, आगमन तथा ठहराव 12092 काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस के समय-सारिणी के अनुसार होगा। 02091 देहरादून-काठगोदाम विशेष गाड़ी 2 जून 2020 से चलायी जायेगी। इस गाड़ी का प्रस्थान, आगमन तथा ठहराव 12091 देहरादून-काठगोदाम एक्सप्रेस के समय-सारिणी के अनुसार होगा। इन विशेष गाड़ियों की संरचना में एसएलआरडी के 2, साधारण श्रेणी के 3, साधारण कुर्सीयान के 5 तथा वातानुकूलित कुर्सीयान के 2 कोचों सहित कुल 12 कोच लगेगें। 02092-02091 काठगोदाम-देहरादून-काठगोदाम विशेष गाड़ी साप्ताह में पॉच दिन चलायी जायेगी।यह भी पढ़ें : संसद में पहली बार उठी नैनीताल के बेतालघाट के लिए रेललाइन और गौलापार के लिए ओवरब्रिज की मांगनवीन समाचार, नैनीताल, 13 मार्च 2020। नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोक सभा क्षेत्र के सांसद अजय भट्ट ने बृहस्पतिवार को लोक सभा में उत्तराखंड व खासकर अपनी लोक सभा से संबंधित रेल विभाग से संबंधित मांगें संसद में उठाई है। उन्होंने पहली बार नैनीताल जनपद में रामनगर-कर्णप्रयाग मार्ग से बेतालघाट के लिए कोसी नदी के किनारे-किनारे रेल लाइन के निर्माण की मांग संसद में उठाई। कहा कि भविष्य में रानीखेत, अल्मोड़ा, बागेश्वर व पिथौरागढ़ तक के लोगों को भी इस रेल लाइन का लाभ मिल सकेगा। साथ ही उन्होंने पहली बार हल्द्वानी से गौलापार होते हुए खटीमा, सितारगंज, पीलीभीत को जाने के लिए रेल लाइन पर लगने वाले जाम का उल्लेख करते हुए जैन मंदिर से रेल फाटक तक ओवरब्रिज बनाने की मांग भी रखी। इसके अलावा उन्होंने काशीपुर से धामपुर के बीच रेललाइन को रेल मंत्री से सैद्धांतिक स्वीकृति मिलने की बात को आगे बढ़ाते हुए इसे पूर्ण स्वीकृति दिलाने की मांग भी रखी। कहा कि इस लाइन के बनने से काठगोदाम से राज्य की राजधानी देहरादून जाने के लिए मुरादाबाद के रास्ते नहीं जाना पड़ेगा। उन्होंने काठगोदाम से अमृतसर के लिए नई रेलगाड़ी चलाने की मांग भी रखी। इसके साथ ही उन्होंने लालकुआं-सितारगंज-खटीमा की नई 63 किमी की रेल लाइन का सर्वे कार्य पूरा होने की बात कहते हुए इसके निर्माण के लिए धनराशि स्वीकृति करने की मांग की। उन्होंने मझोला-खटीमा रेलवे स्टेशनों के बीच एलसी18-20/सी को विभाग द्वारा बंद करने की जानकारी देते हुए इसे बंद न करने तथा लालकुआं जंक्शन में फुट ओवरब्रिज निर्माण की मांग भी रखी।कुलपति ने की काठगोदाम रेलवे स्टेशन का नाम रखने की मांग नैनीताल। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. केएस राणा ने केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर काठगोदाम रेलवे स्टेशन का नाम कुमाऊं द्वार या स्वामी विवेकानंद के नाम से रखने की मांग की है। पत्र में प्रो. राणा ने काठगोदाम को कुमाऊं में प्रवेश के लिए अंतिम रेलवे स्टेशन तथा कुमाऊं में स्वामी विवेकानंद की पैदल यात्राओं का जिक्र करते हुए नाम रखने की मांग की है। पत्र की प्रतियां सांसद अजय भट्ट, विधायक संजीव आर्य व रेलवे के अधिकारियों को भी भेजी गई हैं।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के स्टेशनों पर उर्दू के प्रयोग पर रेलवे ने साफ की स्थिति..नवीन समाचार, देहरादून, 8 फरवरी 2020। उत्तराखंड के रेलवे स्टेशनों के प्लैटफॉर्म पर लगे साइन बोर्डों से उर्दू भाषा को हटाकर संस्कृत का इस्तेमाल किए जाने के संबंध में रेलवे ने सफाई दी है। इससे पहले अधिकारियों ने उर्दू की जगह संस्कृत के इस्तेमाल पर रेलवे के नियमों का हवाला दिया था। अब उर्दू हटाए जाने की बात का खंडन करते हुए रेलवे ने स्पष्टीकरण जारी किया है। रेलवे ने कहा कि मौजूदा भाषाओं के साथ ही संस्कृत को अतिरिक्त भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। रेलवे ने साफ किया है कि उर्दू को हटाया नहीं जाएगा।भारतीय रेलवे ने स्पष्ट किया करते हुए कहा, ‘किसी भी स्टेशन से न तो उर्दू भाषा को हटाया है और न ही ऐसा करने का कोई इरादा है। संस्कृत भाषा को रेलवे स्टेशनों पर लगे साइन-बोर्डों पर एक अतिरिक्त भाषा के रूप में लिखा जा सकता है लेकिन इसे उर्दू भाषा को हटाकर नहीं लिखा जाएगा।’ANI✔@ANIIndian Railways:Indian Railways has neither replaced Urdu language from any station nor has any intention to do so presently.Sanskrit may be used as additional language apart from existing languages in sign-boards at stations,but will not replace Urdu language wherever it exists.पूर्व समाचार : उत्तराखंड में रेलवे से उर्दू की होगी रुखसती, संस्कृत से होगा अभिनंदन, जानिये वजह..नवीन समाचार, देहरादून, 19 जनवरी 2020। उत्तराखंड में रेलवे स्टेशनों पर लगे बोर्डो में उर्दू भाषा में लिखे नामों को अब बदल कर संस्कृत में लिखा जाएगा। उल्लेखनीय है कि संस्कृत उत्तराखंड की दूसरी आधिकारिक भाषा है। उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी दीपक कुमार ने पत्रकारों को बताया कि नाम बदलने का यह कदम रेलवे नियमावली के अनुरूप उठाया जा रहा है जिसमें कहा गया है कि प्लेटफॉर्म के साइनबोर्ड में रेलवे स्टेशनों का नाम हिंदी और अंग्रेजी के बाद संबंधित राज्य की दूसरी आधिकारिक भाषा में लिखा होना चाहिए। उन्होंने कहा,‘‘अब पूरे उत्तराखंड में रेलवे स्टेशनों के साइन बोर्ड में नाम हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के बजाए हिंदी ,अंग्रेजी और संस्कृत में लिखे जाएगें।’’ अधिकारी ने कहा,‘‘चूंकि उत्तराखंड की दूसरी आधिकारिक भाषा संस्कृत है इसलिए रेलवे स्टेशनों में उर्दू में लिखे नामों को बदल कर संस्कृत में किया जाएगा।’’ ये नाम अभी भी उर्दू में इसलिए हैं क्योंकि इसमें से अधिकतर नाम तब के हैं जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था। उत्तर प्रदेश की दूसरी आधिकारिक भाषा उर्दू है।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationआज लोकसभा चुनाव हो जाएं तो 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