नवीन समाचार, भवाली (नैनीताल), 13 अप्रैल 2026 (Bhawali-Revival of Historical Heritage)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) जनपद अंतर्गत भवाली (Bhowali) के व्यस्त बाजार की संकरी गलियों में एक ऐतिहासिक परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है। 19वीं शताब्दी की एक जीर्ण-शीर्ण धर्मशाला (Dharamshala), जो कभी उपेक्षा का शिकार थी, अब ‘रं’ (Run) समुदाय की समृद्ध संस्कृति और वास्तुकला को समर्पित एक जीवंत संग्रहालय (Museum) के रूप में पुनर्जीवित हो उठी है। यह परियोजना न केवल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि कुमाऊँ (Kumaon) के लुप्त होते हस्तशिल्प को सहेजने का एक सफल प्रयास भी है।
नैनीताल कलेक्ट्रेट (Nainital Collectorate) और ‘कंपार्टमेंट एस4’ (Compartment s4) के वास्तुकारों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस संरचना का निर्माण 19वीं सदी की प्रसिद्ध दानदात्री जसुली बुड़ी शौक्यानी (Jasuli Buri Shaukyani) ने करवाया था। उन्होंने धारचूला (Dharchula) के शौका व्यापारियों की सुविधा हेतु भारत-तिब्बत व्यापार मार्ग (Indo-Tibet Trade Route) पर लगभग 200 धर्मशालाओं का निर्माण करवाया था, जिनमें से भवाली की यह धर्मशाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी। जसुली दीदी-उत्तराखंड की सबसे बड़ी दानवीर महिला : जो हेनरी रैमजे को नदी में रुपए बहाती मिली थीं
स्थापत्य कला और पारंपरिक ‘लिखाई’ का संगम
संग्रहालय के पुनर्निर्माण में स्थानीय निर्माण सामग्री और पारंपरिक कलाओं का समावेश किया गया है:
लिखाई कला: संग्रहालय के द्वारों और झरोखों पर उत्तराखंड की विलुप्त होती हस्तशिल्प कला ‘लिखाई’ (Likhai) का प्रयोग किया गया है, जो लकड़ी पर की जाने वाली सूक्ष्म नक्काशी है।
निर्माण सामग्री: ओसारी (Osari) या बरामदे की छत देवदार (Pine) की लकड़ी से निर्मित है, जबकि स्तंभों और रेलिंग में सागौन (Teak) का उपयोग किया गया है ताकि वर्षा से सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
ऐपण कला: मुख्य सोपानों (Steps) पर उत्तराखंड की पारंपरिक लोक कला ‘ऐपण’ (Aipan) उकेरी गयी है, जो सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है।

चुनौतियों के मध्य ‘शांति का गलियारा’
वास्तुकारों के अनुसार, इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भीड़भाड़ वाले बाजार के बीच एक शांत स्थान (Sanctuary of Calm) निर्मित करना था। निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती उपलब्ध अभिलेखों का अभाव और सामग्री का परिवहन था। संकरी गलियों के कारण निर्माण सामग्री का आवागमन केवल मध्य रात्रि के पश्चात ही संभव हो पाता था। संग्रहालय के भीतर प्रकाश और वायु के आवागमन हेतु पत्थरों की मूल दीवारों को काटकर मार्ग बनाये गये और छत पर ‘ग्लास रिज’ (Glass Ridge) का प्रयोग किया गया।
सामुदायिक प्रभाव और भविष्य की दिशा
भवाली के इस संग्रहालय के सफल संचालन के पश्चात, प्रशासन ने अब संपूर्ण बाजार क्षेत्र के सौंदर्यीकरण और विरासत संरक्षण (Heritage Restoration) की योजना बनाई है। यहाँ आने वाले पर्यटक न केवल रंग समुदाय के इतिहास और उनकी पत्थर एवं काष्ठ कला से परिचित होंगे, बल्कि रात्रि के समय स्थानीय दुकानों के शटर पर बनी पारंपरिक चित्रकारियाँ भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी। यह पहल दर्शाती है कि कैसे एक सूक्ष्म ऐतिहासिक संरचना का पुनरुद्धार पूरे नगर के सामाजिक और आर्थिक स्वरूप को परिवर्तित कर सकता है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
