देश का नाम केवल ‘भारत’ रखने के पीछे 2 तरह से उत्तराखंड…

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-जानें कैसे ? साथ ही जानें किनके नाम से और क्यों पड़ा देश का नाम भारत ? क्या थी उनमें ऐसी खाशियत ? और क्या वाकई मोदी सरकार ‘इंडिया’ नाम हटायेगी ?

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 6 सितंबर 2023 (Aitihasik Kahaniyan)। देश की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने जी-20 के नई दिल्ली में आयोजित हो रहे वैश्विक सम्मेलन के लिए दिये गये आमंत्रणों में परंपरा से हटकर ‘प्रेजीडेंट ऑफ इंडिया’ की जगह ‘प्रेजीडेंट ऑफ भारत’ लिखा है। 

Aitihasik Kahaniyan, Bharat Vs India Name Change Reaction; Jairam Ramesh | Narendra Modi  Government | AAP ने कहा- हम I.N.D.I.A को भारत करने पर विचार करेंगे, BJP देश  का नया नाम सोचे - Dainik Bhaskarइसके बाद चर्चा है कि केंद्र की मोदी सरकार संसद में देश का नाम भारतीय संविधान में उल्लेखित ‘भारत दैट इज इंडिया’ या अब तक अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ की जगह केवल ‘भारत’ रखने का प्रस्ताव ला सकती है। यदि देश का नाम केवल ‘भारत’ रखा जाता है तो यह देश के भाल व देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड के लिए दो संदर्भों से सुखद हो सकता है।

पहला, उत्तराखंड के ही एक सांसद, राज्य सभा सांसद नरेश बंसल ने राज्यसभा के पिछले सत्र में देश का नाम ‘इंडिया’ से बदलकर ‘भारत’ रखने का प्रस्ताव रखा था। और दूसरे जिन चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से देश का नाम भारत पड़ा, वह उत्तराखंड में ही पले-बढ़े थे।

राज्यसभा के पिछले सत्र में उत्तराखंड के राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने राष्ट्रपति के सामने प्रस्ताव रखा था कि किसी भी देश के दो नाम नहीं होते, लेकिन ‘भारत’ के दो नाम होने से उन्हें आपत्ति है। उन्होंने कहा था कि तमाम कार्यक्रम में पत्राचार में जहां-जहां पर भी ‘इंडिया’ शब्द लिखा जाता है। उसे ‘भारत’ में बदला जाये। और संविधान में संशोधन करके ‘इंडिया’ का नाम बदलकर ‘भारत’ रखा जाये। भाजपा के कई सांसदों ने उनके इस प्रस्ताव का राज्यसभा में समर्थन किया था।

देश को अपना नाम देने वाले और देश में सबसे पहले लोकतंत्र स्थापित करने वाले महाराज भरत की कहानी

डॉ. नवीन जोशी @ नैनीताल, 6 अप्रैल 2026 (Valmiki Sabha Elections Results)। )।  आज हम उन महाराज भरत के बारे में जानने वाले हैं, जिनके नाम से हमारे प्यारे देश का नाम भारत पड़ा। उन्होंने ही इस देश में विश्व के सबसे पुराने ‘लोकतंत्र’ की नींव भी रखी थी। महाराज भरत की कहानी भारत के साथ उत्तराखंड के लिए भी विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा उत्तराखंड में ही बीता था।

महाराज भरत की कहानी द्वापर युग में महाराज पुरु द्वारा स्थापित कुरु वंश के कौरव एवं पांडवों के बीच हुए ‘महाभारत’ नाम के बड़े युद्ध से भी सदियों पहले से शुरू होती है। इसी कुरु वंश में एक राजा विश्वामित्र हुए, जिन्हें कौशिक भी कहा जाता था। ऋषि-मुनियों की शक्ति को देखते हुए उन्हें किसी कारण से ऐसा लगा कि राजाओं की शक्ति ऋषियों के मुकाबले बहुत कम होती है। इसलिए वे राजपरिवार में जन्म लेने और राजा होने के बावजूद ऋषि बनना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वन में जाकर घोर तपस्या शुरू की।

उनके घोर तप को देखते हुए देवराज इंद्र का सिंहासन डोलने लगा। इंद्र को लगा कि यदि विश्वामित्र की तपस्या पूर्ण हो गई, तो उनकी श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने स्वर्ग से अपनी एक अप्सराकृमेनकाकृको उन्हें रिझाकर उनके तप व साधना को भंग करने के लिए भेजा। मेनका ने विश्वामित्र का तप भंग कर दिया। विश्वामित्र से मेनका ने एक बेटी को जन्म दिया।

लेकिन तप भंग होने का भान होने पर विश्वामित्र को दुःख हुआ कि उन्होंने अपनी साधना से जो कुछ पाया था, वह अपना ध्यान भंग होने के कारण खो चुके हैं। इसलिए वे कुपित होकर माँ और बेटी दोनों को वहीं छोड़कर चले गए। उधर मेनका भी स्वर्ग की एक अप्सरा होने के कारण पृथ्वी पर अधिक समय तक नहीं रह सकती थी। इसलिए वह भी अपनी नन्ही बच्ची को मालिनी नाम की नदी के किनारे अकेली छोड़कर स्वर्ग लौट गई।

विश्वामित्र व मेनका की उस नन्ही बच्ची को मालिनी नदी के पास कुछ शकुन प्रजाति के पक्षियों ने अन्य जीवों से बचाकर रखा। एक दिन कण्व ऋषि वहां से गुजरे तो उन्होंने इस विचित्र स्थिति को देखा। वे बच्ची को उठाकर अपने आश्रम ले आए और उसका पालन-पोषण किया। शकुन पक्षियों द्वारा बचाए जाने के कारण उन्होंने उस बच्ची का नाम ‘शकुंतला’ रखा।

उत्तराखंड में था महर्षि कण्व का आश्रम, यहीं हुआ भरत का जन्म

उल्लेखनीय है कि महर्षि कण्व का आश्रम उत्तराखंड में कोटद्वार से 14 किलोमीटर की दूरी पर माना जाता है। यहां अब भी बहने वाली नदी को मालिनी नदी ही कहा जाता है। महाकवि कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में कण्वाश्रम का परिचय इस प्रकार दिया गया हैकृ‘एष कण्वः खलु कुलाधिपतिः आश्रमः’। इसके अलावा ‘स्कन्द पुराण’ के केदारखंड के 57वें अध्याय में भी इस पुण्य क्षेत्र का उल्लेख इस प्रकार से किया गया है- ‘कण्वाश्रमसमारम्य यावन्नन्दागिरिर्भवेत्। यावत् क्षेत्रं परमं पुण्यं मुक्तिप्रदायकम्॥’

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यहीं कण्वाश्रम में नन्ही शकुंतला बड़ी होकर रूप-यौवन पाकर एक सुंदर युवती बनीं। एक दिन दुष्यंत नाम के एक राजा एक लड़ाई से वापस लौटते हुए इस क्षेत्र से एक हिरण का पीछा करते हुए गुजरे। उन्होंने यहीं हिरण को तीर मारा, लेकिन हिरण भाग गया। दुष्यंत ने उसका पीछा किया तो देखा कि वह शकुंतला की गोद में था। वह शकुंतला का पालतू हिरण था। शकुंतला बहुत प्यार से उसके घावों पर औषधि का लेप लगा रही थीं। यह देखकर दुष्यंत शकुंतला के प्रेम में पड़ गए। वे कुछ समय तक यहीं रहे और कण्व ऋषि की अनुमति से उन्होंने शकुंतला से गंधर्व विवाह कर लिया।

कुछ समय बाद दुष्यंत शकुंतला को अपनी यादगार निशानी और विवाह के चिह्न के रूप में अपनी शाही अंगूठी पहनाकर, कुछ दिनों बाद लौटने का वादा कर अपने राज्य लौट गए। दुष्यंत के जाने के बाद शकुंतला लगातार उनके लौटने का इंतजार करती हुई उनके सपनों में खोई रहने लगीं।

एक दिन दुर्वासा ऋषि कण्व ऋषि के आश्रम में आए। वे अत्यंत क्रोधी स्वभाव के थे। उन्होंने शकुंतला को अपने पास बुलाया, किंतु शकुंतला ने उनका स्वर नहीं सुना। उनकी आंखें खुली थीं, पर वह कुछ देख नहीं पा रही थीं। दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझा और उन्हें श्राप दिया- ‘अभी तुम जिसकी स्मृति में खोई हुई हो, वह तुम्हें सदा के लिए भूल जाएगा।’ श्राप सुन शकुंतला की तंद्रा टूटी तो वे रोने लगीं और दुर्वासा ऋषि से अपनी भूल की क्षमा मांगने लगीं।

आश्रम के लोगों ने भी दुर्वासा को पूरी बात बताते हुए उन्हें क्षमा करने का अनुरोध किया। इस पर दुर्वासा ने अपने श्राप का प्रभाव कम करते हुए कहा-‘वह तुम्हें मेरे श्राप से भूल गया है, किंतु जैसे ही तुम उसे कोई ऐसी वस्तु दिखाओगी, जो उसे तुम्हारी याद दिलाए, उसे सब कुछ स्मरण हो जाएगा।’

दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण शकुंतला को भूल चुके दुष्यंत लौटकर नहीं आए। इस बीच शकुंतला को एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘भरत’ रखा गया। उन्हीं के नाम पर बाद में हमारे देश का नाम भारत पड़ा, क्योंकि वे कालांतर में अनेक गुणों से युक्त एक आदर्श राजा बने।

भरत जंगल में ही बड़े हुए। एक दिन कण्व ऋषि ने शकुंतला से कहा-‘तुम्हें जाकर राजा दुष्यंत को स्मरण कराना चाहिए कि तुम उनकी पत्नी हो और तुम्हारा एक पुत्र है। यह उचित नहीं है कि एक राजा का पुत्र अपने पिता के बिना बड़ा हो रहा है।’ शकुंतला अपने पुत्र को लेकर दुष्यंत के महल की ओर चल पड़ीं। इस बीच नौका से नदी पार करते समय उनकी अंगुली से दुष्यंत की अंगूठी नदी में गिर गई, जिसका उन्हें पता भी नहीं चला।

वे राजा दुष्यंत के दरबार में पहुंचीं, लेकिन दुष्यंत श्राप के कारण उन्हें पहचान नहीं सके। शकुंतला ने उन्हें अंगूठी दिखानी चाही, किंतु वह उनके पास नहीं थी। ऐसे में राजा दुष्यंत ने उन्हें महल से बाहर निकलवा दिया। उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। अब वे महर्षि कण्व के आश्रम के पीछे और भी घने जंगल में जाकर अपने पुत्र के साथ रहने लगीं। यहां भरत जंगली जानवरों के बीच बड़े हुए। वे अत्यंत साहसी और शक्तिशाली थे।

एक दिन दुष्यंत पुनः इस वन में शिकार के लिए आए। उन्होंने एक छोटे बालक को शेरों के साथ खेलते, उनके दांत गिनते और हाथियों पर चढ़ते देखा। उन्होंने आश्चर्य से पूछा-‘तुम कौन हो?’ बालक ने उत्तर दिया-‘मैं भरत हूं, दुष्यंत का पुत्र।’ राजा ने कहा-‘मैं ही दुष्यंत हूं, फिर मैं तुम्हें क्यों नहीं पहचानता?’ तभी कण्व ऋषि वहां आए और उन्होंने पूरी कथा बताई। अंततः दुष्यंत को सब कुछ स्मरण हो गया और वे शकुंतला तथा भरत को अपने साथ महल ले गए।

अपने पुत्रों की जगह जनता की पसंद से चुना उत्तराधिकारी

समय बीतने पर दुष्यंत के बाद उनके पुत्र भरत राजा बने। उन्होंने लंबे समय तक अत्यंत कुशलता के साथ राज्य किया। वे मानसिक संतुलन, निष्पक्षता और सबको साथ लेकर चलने की भावना के लिए प्रसिद्ध थे। वे अपने समय के शक्तिशाली और न्यायप्रिय शासक माने जाते हैं। उन्होंने एक विस्तृत और संगठित साम्राज्य स्थापित किया तथा शासन में न्याय, अनुशासन और जनकल्याण को महत्व दिया। उनके समय में राज्य व्यवस्था सुदृढ़ और प्रभावी मानी जाती थी।

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महाभारत के आदिपर्व के अनुसार महाराज भरत की तीन पत्नियां थीं और उनसे उन्हें नौ पुत्र प्राप्त हुए थे। जब पुत्र बड़े हुए, तो भरत ने उन्हें उत्तराधिकारी बनाने पर विचार किया, किंतु निष्कर्ष निकाला कि वे योग्य शासक नहीं बन सकते। यह एक महत्वपूर्ण निर्णय था। उन्होंने कहा-‘केवल राजा का पुत्र होना, राजा बनने के लिए पर्याप्त नहीं है।’

उन्होंने यह स्थापित किया कि केवल राजा के घर जन्म लेने से कोई व्यक्ति शासन के योग्य नहीं हो जाता। उनके इस निर्णय को विशेष महत्व मिला, क्योंकि पहली बार उत्तराधिकार जन्म के बजाय गुणों के आधार पर तय किया गया।

उन्होंने अपने पुत्रों से इतर अपनी प्रजा की सहमति से ऋषि भारद्वाज के पुत्र ‘भूमन्यु’ को उत्तराधिकारी बनाया। यह निर्णय इस बात का स्पष्ट संदेश था कि शासन के लिए योग्यता, चरित्र और क्षमता सर्वोपरि हैं। भूमन्यु के बाद उनके पुत्र सौमित्र और फिर उनके पुत्र हस्ती राजा बने। हस्ती ने ही हस्तिनापुर नगर की स्थापना की, जो आगे चलकर कौरवों और पांडवों की राजधानी बना।

इस प्रकार महाराज भरत का निर्णय उनके राज्य को निरंतर समृद्धि के मार्ग पर ले गया। आज भी शासन, राजनीति और नेतृत्व में योग्यता आधारित चयन का यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि वे केवल अपने पुत्रों के ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य के पिता हैं। इसलिए वे अपना उत्तराधिकारी अपनी प्रजा में से सर्वश्रेष्ठ को चुनेंगे।

यह विचार कि “राज्य किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है”, उनके निर्णय में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आज भी लोकतंत्र की मूल भावना में यह सिद्धांत परिलक्षित होता है।

सम्राट भरत केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने परंपराओं से ऊपर उठकर सही का चयन किया। उन्होंने यह स्थापित किया कि सच्चा नेतृत्व वंश से नहीं, बल्कि योग्यता और कर्तव्य से तय होता है-और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

ऐसे महान सम्राट भरत को कोटि-कोटि नमन।

क्या मोदी सरकार इंडिया नाम हटाकर केवल भारत रखेगी

अब प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार इंडिया नाम हटाकर केवल भारत रखेगी ? इस प्रश्न का उत्तर तमाम संभावनाओं के बावजूद अभी स्पष्ट तौर पर नहीं दिया जा सकता है। देश के नाम से इंडिया हटाने से जहां अनेकों संस्थानों-स्मारकों व योजनाओं के नाम से ‘इंडिया’ शब्द को हटाना पड़ेगा,

वहीं मीडियो रिपोर्टों से एक तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि भारत के यह नाम छोड़ने के बाद भारत की ही कोख से जन्मा पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ में इंडिया नाम की मांग कर सकता है। क्योंकि वह पाकिस्तान में बहने वाली ‘इंडस’ भी कही जाने वाली सिंधु नदी से जोड़कर ‘इंडिया’ शब्द पर पहले से दावा करता रहा है।

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यह भी पढ़ें (Aitihasik Kahaniyan) : महाभारत की अन्जानी कहानी : दुर्योधन की पत्नी भानुमती ने किया था अर्जुन से विवाह !

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 2 मई 2022 (Aitihasik Kahaniyan)। जी, हां, दुर्योधन की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी भानुमती ने अर्जुन से विवाह किया था। ऐसा कई कथाओं में कहा जाता है। इसके पीछे कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में कौरव कुल का नाश हो जाने के बाद नवसृजन के लिए भानुमती ने अर्जुन से विवाह किया था।

(Aitihasik Kahaniyan) यह पहली बार नहीं था, जब किसी महिला ने अपने देवर से विवाह किया हो। इससे पूर्व त्रेता युग में रावण की पत्नी मंदोदरी ने भी रावण की मृत्यु हो जाने के बाद रावण के भाई विभीषण से विवाह किया था। कहा जाता है कि राम-रावण के युद्ध में भी रावण के सभी 100 पुत्रों की मृत्यु हो गई थी।

(Aitihasik Kahaniyan) वहीं द्वापर युग में भी महर्षि वेद व्यास ने भीष्म द्वारा विवाह न करने की प्रतिज्ञा लेने एवं अपने अन्य भाइयों चित्रांगद की युद्ध में एवं विचित्रवीर्य की पुत्र उत्पन्न होने से पूर्व ही मृत्यु हो जाने के कारण उनकी पत्नियां-अंबिका व अंबालिका से ‘नियोग’ कर धृतराष्ट्र एवं पांडु को उत्पन्न किया था। बाद में वेदव्यास ने ही धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी का गर्भ 101 हिस्सों में चूर-चूर हो जाने के कारण उससे 100 कौरव पुत्र व एक पुत्री दुःशला को जन्म दिया था।

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(Aitihasik Kahaniyan) अलबत्ता यह साफ नहीं है कि अर्जुन ने भानुमती से विवाह किया था, या नियोग। क्योंकि तब नियोग की एक व्यवस्था थी जिसके तहत कोई स्त्री अपने पति से पुत्र न होने या उसकी मृत्यु हो जाने की स्थिति में पवित्र मन से किसी पुरुष से नियोग यानी केवल पुत्र उत्पन्न करने के लिए केवल एक बार संभोग करती थी। ‘नियोग’ के बारे में और अधिक पढ़ सकते हैं। इसलिए हो सकता है कि भानुमती का एकमात्र पुत्र लक्ष्मण चूंकि महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु के हाथों मारा जा चुका था, इसलिए उसने दुर्योधन का वंश आगे बढ़ाने को अर्जुन से नियोग किया हो।

(Aitihasik Kahaniyan) गौरतलब है कि दुर्योधन की पत्नी भानुमती के नाम से ही ‘कहां का ईट-कहां को रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ नाम की एक कहावत कही जाती है। शायद इसलिए कि उसने अर्जुन से विवाह किया था। और शायद इसलिए भी दुर्योधन से स्वयंवर में उसका वरण, जबर्दस्ती उसके हाथों से अपने गले में वरमाला डलवाकर की थी। महाभारत युद्ध के बाद में उसकी एकमात्र बची लक्ष्मणा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब ने जबर्दस्ती उसका अपहरण किया था।

(Aitihasik Kahaniyan) हालांकि महाकवि भास द्वारा महाभारत पर आधारित लिखित नाटक ‘उरुभंगम’ के अनुसार दुर्योधन की दो और पत्नियां मालवी व पौरवी भी थीं। इनमें से मालवी का दुर्जय नाम का एक पुत्र भी था। नाटक के एक महत्वपूर्ण दृश्य में दुर्योधन अपनी टूटी हुई उरु यानी जंघा पर दुर्जय को न बैठा पाने पर दुःख जताता है, और उसे दुर्योधन की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर का अगला राजा बनाने की बात होती है। इसका अर्थ यह है कि दुर्योधन का एक पुत्र दुर्जय महाभारत के युद्ध के बाद भी जीवित रहा था।

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