क्या बालिग होने से माता-पिता की राय का कोई महत्व नहीं रह जाता ? उच्च न्यायालय ने अपनी मर्जी से शादी करने वाले जोड़े को खूब सुनाया, भारी जुर्माने की चेतावनी भी दी…

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नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2026 (High Court Sternly Rebuked a Couple)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) स्थित उच्च न्यायालय (High Court) में एक युवक-युवती द्वारा दायर सुरक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताते हुए सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। न्यायालय ने बालिग होने के बाद भी माता-पिता की भूमिका और सम्मान को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए, वहीं प्रारंभिक सख्त रुख के बावजूद अंततः पुलिस को याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

घर से निकलकर विवाह, फिर सुरक्षा की मांग

loveHigh Court Sternly Rebuked a Couple (Haldwani-Ruckus (Haridwar-Married Womans Love Affair-Left Husband) over a Couple Found in a Hotel (Love-Deceit and a Wedding at the Police Station (Young man Marred 40-year-old married woman After (Supreme Court Decision-Live-In Physical Relation)मामले के अनुसार 18 वर्षीय युवती और 21 वर्षीय युवक ने घर से निकलकर मंदिर में विवाह कर लिया था। इसके बाद दोनों ने न्यायालय में याचिका दायर कर कहा कि उनके परिजन इस विवाह को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और उन्हें धमकियां मिल रही हैं, इसलिए सुरक्षा प्रदान की जाए।

न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

Uttarakhand High Court | runaway couple | judgeसुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, ‘आप यहां क्यों आए हैं, अपने माता-पिता के पास जाइए।…आप दोनों यहां क्या करने आए हैं। जिन्होंने तुम्हारा लालन-पालन किया, उन्हीं से तुम सुरक्षा मांग रही हो। आखिर यह समाज किस दिशा में जा रहा है।… क्या केवल बालिग होने का अर्थ यह है कि माता-पिता की राय का कोई महत्व नहीं रह जाता? न्यायालय ने यह भी कहा कि माता-पिता, जिन्होंने बच्चों का पालन-पोषण किया, उनकी उपेक्षा कर सीधे न्यायालय आना चिंताजनक प्रवृत्ति है। 

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति थपलियाल ने कहा, ‘यह किस तरह की शादी है? सिर्फ इसलिए कि वे बालिग हैं, वे कुछ भी करेंगे? जिन माता-पिता ने उन्हें जन्म दिया, क्या उनकी कोई बात नहीं मानी जाएगी?’ अदालत ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि बच्चे पाल-पोसकर बड़ा करने वाले माता-पिता से सलाह तक नहीं लेते और फिर सीधे अदालत आकर उन्हीं पर धमकी देने का आरोप लगा देते हैं।

न्यायमूर्ति ने आगे कहा, ‘समाज कहां जा रहा है? मां-बाप ने तुम्हें जन्म दिया, इतनी मुश्किलों से पाला और अब वे तुम्हारे दुश्मन हो गए? ऐसे लोगों के लिए यहा कोई जगह नहीं है जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते।’ एक समय पर तो कोर्ट इतना नाराज हुआ कि याचिका को 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ खारिज करने तक की बात कह दी।

न्यायालय ने समाज में बदलते पारिवारिक मूल्यों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में माता-पिता को पूरी तरह नजरअंदाज करना उचित नहीं माना जा सकता। कहा कि क्या बच्चों के बालिग होने के बाद माता-पिता उनकी शादी को लेकर कुछ नहीं कह सकते?

10 लाख रुपये जुर्माने की चेतावनी

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने नाराजगी व्यक्त करते हुए याचिका को 10 लाख रुपये के भारी जुर्माने के साथ निरस्त करने तक की टिप्पणी की। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस प्रकार की याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकती हैं।

माता से बातचीत की बात, फिर नहीं किया संपर्क

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने युवती से उसकी माता का संपर्क विवरण भी मांगा और कहा कि वह परिजनों से बात करना चाहते हैं, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके। न्यायमूर्ति ने कहा, ‘हम तुम्हारी मां से बात करेंगे और उन्हें कम से कम यह बताएंगे कि उनकी बेटी यहाँ है। कल को अगर वह हमसे पूछेंगी कि हमने इस शादी की अनुमति कैसे दे दी, तो हम क्या जवाब देंगे? हालांकि बाद में न्यायालय ने इस दिशा में आगे कोई कार्रवाई नहीं की।

फिर भी सुरक्षा का अधिकार सर्वोपरि

प्रारंभिक सख्त टिप्पणी के बाद न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्य की एजेंसियों का दायित्व है कि वे प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करें। इसी आधार पर न्यायालय ने पुलिस को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार का खतरा हो तो उन्हें आवश्यक सुरक्षा प्रदान की जाए। इसके अलावा, अदालत ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि वह महिला के माता-पिता से कहे कि वे कानून को अपने हाथ में न लें।

सामाजिक और कानूनी संतुलन का संकेत

यह प्रकरण केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक ढांचे और कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन का विषय भी बनकर सामने आया है।

एक ओर जहां न्यायालय ने पारिवारिक मूल्यों और अभिभावकों के सम्मान की आवश्यकता पर बल दिया, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में नागरिकों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।

आगे क्या संकेत

ऐसे मामलों में न्यायालय का यह दृष्टिकोण बताता है कि—

  • बालिग व्यक्तियों को अपने निर्णय का अधिकार है

  • लेकिन सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों की अनदेखी उचित नहीं

  • राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक संतुलित दृष्टांत के रूप में देखा जा सकता है।

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