एरीज (ARIES) नैनीताल के वैज्ञानिक के नेतृत्व में चीन, भारत, फिनलैंड, रूस, अमेरिका, जापान और बुल्गारिया के 28 वैज्ञानिकों ने की ब्रह्मांड के अबूझ रहस्यों पर एक बड़ी खोज

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नैनीताल : भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीतने वाली प्रो. एंड्रिया का नैनीताल से है खास संबंध

-‘टीएमटी’ परियोजना के लिए भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीतने वाली एंड्रिया के सहयोगी रहे हैं एरीज नैनीताल के डा. पांडे नवीन समाचार, नैनीताल, 9 नवम्बर 2020। वर्ष 2020 का भौतिकी के लिए नोबल पुरस्कार ‘टीएमटी’ यानी ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप’ यानी दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास यानी फुटबॉल के मैदान जितनी बड़ी दूरबीन की … Read more

मौसम के बदले मिजाज के पीछे कोरोना के साथ सूर्य की ‘खराब सेहत’, आगे 10 दिन में 10 डिग्री बढ़ सकता है पारा !

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-इस वर्ष पर्यावरण साफ होने के साथ सौर सक्रियता ‘सोलर मिनिमम’ में अपने सबसे निचले स्तर पर
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मई 2020। इस वर्ष गर्मियों के मई माह तक शीतकाल से चला आ रहा बारिश व ओलावृष्टि का क्रम जारी है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तो अब भी बर्फबारी हो रही है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में अपेक्षित गर्मी नहीं है। मौसम का यह बदला मिजाज चर्चा में है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला कोरोना विषाणु की महामारी के कारण दुनिया भर में लागू लॉक डाउन की वजह से फैक्टरियों एवं वाहनों के काफी कम चलने से ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सर्जन से पर्यावरण में प्रदूषण का घटना एवं धरती के ऊपर ओजोन परत में सुधार आना, और दूसरे धरती पर ऊष्मा व ऊर्जा देने वाले सूर्य पर उसके 11 वर्षीय सोलर साइकिल यानी सौर चक्र के ‘सोलर मिनिमम’ यानी अपने निचले स्तर पर होना। उल्लेखनीय है कि सोलर मिनिमम को सूर्य की सेहत खराब होने के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि इससे सूर्य पर सौर भभूकाएं उठने की तीव्रता कम हो जाती है।
स्थानीय एरीज यानी आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन के अनुसार मौसम को अनेक घटक प्रभावित करते हैं। इनमें प्राकृतिक कारणों के साथ ही मानवजनित कारण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस वर्ष लॉक डाउन की वजह से मानव जनित कारणों में काफी कमी आई है। इस कारण क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोना ऑक्साइड व ओजोन आदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन काफी कम होने से धरतीवासियों की सबसे बड़ी चिता का कारण बनी ओजोन परत में सुधार आया है। वहीं दूसरी ओर सूर्य 2007 के आसपास अपनी सक्रियता के 11 वर्षीय सौर चक्र में शीर्ष पर रहने के बाद इधर अपने सबसे कम सक्रियता की स्थिति में है। मौसम में दिख रहे बदलाव का यह भी बड़ा कारण हो सकता है।

अगले 10 दिनों में 10 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान झेलेंगे मैदानी क्षेत्र

Pr.BS Kotliya
प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया

नैनीताल। बदले मौसम पर दीर्घकालीन मौसम पर शोधरत कुमाऊं विश्वविद्यालय में यूजीसी के प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया का भी मानना है कि मानव जनित कारण मौसम का काफी प्रभावित करते हैं। बावजूद उनका मानना है कि वर्तमान मौसमी बदलाव के पीछे मानवजनित कारणों से अधिक प्राकृतिक कारण हैं। उन्होंने कहा कि मई के पहले पखवाड़े तक सक्रिय रहा पश्चिमी विक्षोभ अब समाप्त हो गया है। इसके बाद अगले दो-तीन दिनों में ही गर्मी बढ़ने वाली है और मैदानी क्षेत्रों में अगले 10 दिनों में तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि यह बढ़ा हुआ तापतान दक्षिण पश्चिमी मानसून के आने तक बना रह सकता है। अलबत्ता, पर्वतीय क्षेत्रों में हाल में हुई बारिश की वजह से मौजूद नमी तापमान को अधिक बढ़ने नहीं देगी। लिहाजा पहाड़ों पर मौसम खुशगवार रह सकता है।

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-पिछले पांच वर्ष से तारे की चमक में कमी आने से वैज्ञानिक जता रहे सुपरनोवा विस्फोट की आशंका, जिसके बाद कुछ समय के लिए खत्म होने से पहले सूर्य व चंद्रमा जैसा तीसरा सबसे चमकदार तारा जैसा नजर जाएगा आर्द्रा नक्षत्र
Ardra nakshtraनवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। पृथ्वी से 700 प्रकाश वर्ष दूर एक आकाशगंगा में स्थित सूर्य से करीब 19 गुना भारी व नौ सौ गुना बड़े विशाल आकार वाले लाल रंग के तारे ‘बेटेल्गयूज’ (भारतीय नाम आर्द्रा नक्षत्र) पर दुनिया भर के खगोल वैज्ञानिकों की नजरें लगी हुई हैं। अभी यह सबसे अधिक चमक के मामले में आकाश गंगा का 11वां तारा है। लेकिन इधर पिछले पांच माह में इसकी चमक में 25 फीसद कमी आ गई है। वैज्ञानिकों का इस आधार पर ही मानना है कि जल्द ही सूपरनोवा विस्फोट के जरिये इसका अंत हो जाएगा। वहीं धार्मिक आधार पर देखें तो माता नंदा देवी के मेले का धार्मिक पक्ष निभाने वाले पंडित एवं शिक्षक भगवती प्रसाद जोशी कहते हैं कि धार्मिक तौर पर किसी नक्षत्र के समाप्त होने की परिकल्पना नहीं की गई है।

जानिये आर्द्रा नक्षत्र के बारे में:

आर्द्रा का अर्थ होता है नमी। आकाश मंडल में आर्द्रा छठवां नक्षत्र है। यह राहु का नक्षत्र है व मिथुन राशि में आता है। आर्द्रा नक्षत्र कई तारों का समूह न होकर केवल एक तारा है। यह आकाश में मणि के समान दिखता है। इसका आकार हीरे अथवा वज्र के रूप में भी समझा जा सकता है। कई विद्वान इसे चमकता हीरा तो कई इसे आंसू या पसीने की बूंद समझते हैं। आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में 6 अंश 40 कला से 20 अंश तक रहता है। जून माह के तीसरे सप्ताह में प्रातः काल में आर्द्रा नक्षत्र का उदय होता है। फरवरी माह में रात्रि 9 बजे से 11 बजे के बीच यह नक्षत्र शिरोबिंदु पर होता है। निरायन सूर्य 21 जून को आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है। इसे पृथ्वी पर नमी की मात्रा बढ़ने के रूप में भी देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में 0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है-अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती। 28वां नक्षत्र अभिजीत है। राहु को आर्द्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है। आर्द्रा नक्षत्र के चारों चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है।

इधर, स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमार के अनुसार सुपरनोवा विस्फोट के दौरान विशाल ऊर्जा के विकिरण से इसकी चमक कुछ समय के लिए काफी अधिक बढ़ जाएगी। इसके बाद यह यात्रि में कुछ समय के लिए आसमान में सूर्य व चंद्रमा के बाद तीसरे सबसे अधिक चमकते हुए तारे के रूप में नजर आयेगा। यह अवधि एक-दो माह से चार माह तक की हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बेटेल्गयूज मृग तारा समूह का 10 मिलियन वर्ष से कम पुराना तारा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके आकार के फैलने का सिलसिला लगभग 40 हजार साल पहले शुरू हो चुका था, जो अब विशाल आकार ले चुका है। इस तारे के बारे में वैज्ञानिकों को 1836 में पता चला था। तभी से इस तारे में वैज्ञानिक नजर रखे हुए हैं। यूरोपियन सदर्न आब्जर्वेटरी की वेरी लार्ज टेलीस्कोप इस पर नजर रखी जा रही है। इसके विस्फोट को लेकर निश्चित समय का आंकलन अभी नहीं किया जा सकता है।
बताया गया है कि किसी विशाल तारे में इस तरह का महाविस्फोट इससे पूर्व वर्ष 1006, 1054 व 1572 ईसवी सन मंे एवं आखिरी विस्फोट 1604 ईसवी सन में हुआ था। इसलिए सैकड़ों वर्षों में होने वाली इस दुर्लभ खगोलीय घटना को लेकर वैज्ञानिक काफी रोमांचित हैं। बेटेल्गयूज के विस्फोट से वैज्ञानिकों को पता चल सकेगा कि विस्फोट से पूर्व तारे की स्थिति क्या होती है। जिससे इस तरह के तारों के अंत समय की स्थिति के साथ आगे के अध्ययन में आसानी हो जाएगी।

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-14 जनवरी 2019 को हुए विशाल गामा किरणों के विष्फोट का देश के 20 देशों के वैज्ञानिकों के साथ किया स्पेन और पुणे की दूरबीनों से सफल प्रेक्षण
नवीन समाचार, नैनीताल, 20 नवंबर 2019। एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के दो वैज्ञानिकों डा. शशिभूषण पांडे एवं डा. कुंतल मिश्रा का शोध पत्र एक बार पुनः दुनिया की शीर्ष विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ पत्रिका के नवंबर माह के अंक में प्रकाशित हुआ है। दोनों वैज्ञानिकों का यह शोध पत्र ब्रह्मांड के सबसे बड़े-गामा किरणों के विष्फोट से संबंधित है, जिसका उन्होंने भारत के आईआईएसटी त्रिवेंद्रम की डा. एल रेसमी व उनके साथियों के साथ स्पेन और पुणे की दूरबीनों से गत 14 जनवरी 2019 को सफल प्रेक्षण किया।
बुधवार अपराह्न स्थानीय एरीज में आयोजित पत्रकार वार्ता में निदेशक डा. वहाब उद्दीन एवं डा. शशि भूषण पांडे व डा. कुंतल मिश्रा ने पत्रकार वार्ता में यह जानकारी दी। बताया कि 14 जनवरी को 22 सेकेंड के लिए गामा किरणों का विस्फोट जीआरबी 190114सी हुआ था। दुनिया के 20 देशों के वैज्ञानिक भी इसका प्रेक्षण कर रहे थे। बताया कि जीआरबी विस्फोट ब्रह्मांड के सर्वाधिक बड़े व भयावह विस्फोट होते हैं। गामा किरणों सबसे शक्तिशाली तरंगे होती हैं जो कि किसी लोहे के 26 इंच मोटे से मोटे कोलम से भी पार हो जाती हैं। इनकी तरंगदैर्ध्य परमाधु के आकार से भी छोटी होती है। लिहाजा ये इतनी घातक होती हैं कि परमाणु को भी अपनी ताकत से खत्म कर सकती हैं। यदि इनका रुख कभी किसी कारण पृथ्वी की ओर हो जाए तो इससे होने वाले नुकसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए वैज्ञानिक इनके अध्ययन में जुटे हुए हैं। हालांकि 14 जनवरी को रिकार्ड हुआ गामा किरणों का विस्फोट ब्रह्मांड में पृथ्वी से 4.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हुआ था। इससे पूर्व भी डा. पांडे व डा. मिश्रा का इससे अपेक्षाकृत छोटा जीआरबी 160625बी के विस्फोट का शोध भी नेचर पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि ऐसे विस्फोट ब्रह्मांड में हर रोज करीब एक होते रहते हैं।

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-धनतेरस की पिछली शाम वाशिंगटन से हुई है न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पहली बार घोषणा, एरीज के वैज्ञानिकों की भूमिका भी रही है इस खोज में
-इस खोज में एरीज के वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी रहे हैं शामिल
-इसी माह ब्लेक होल्स के आपस में टकराने से संबंधित एक अन्य खोज पर मिला है इस वर्ष का नोबल पुरस्कार
नैनीताल। महान वैज्ञानिक आंइस्टीन ने अपने जीवन काल में पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर अंतरिक्ष में होने वाली एक ‘बड़ी दीपावली’ की ओर सैद्धांतिक तौर पर इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि दो ‘न्यूट्रॉन स्टार्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलती हैं, जोकि ‘स्पेस टाइम’ यानी अंतरिक्ष के समय की गणना को प्रभावित करती हैं। पहली बार वैज्ञानिकों ने आइंस्टीन की इस मान्यता की उपकरणों की मदद से पुष्टि कर दी है। बीती 16 अक्टूबर यानी धनतेरस की पिछली शाम अमेरिका के वाशिंगटन डीसी से इसकी घोषणा की गयी। गर्व करने वाली बात है कि इस सफलता में भारत और नैनीताल के एरीज के वैज्ञानिकों की भी भूमिका रही है। एरीज के दो वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी इस परियोजना के अंतर्गत एक खास तरह की गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज में शामिल रहे हैं। खास बात यह भी है कि ऐसी ही एक अन्य खोज, जिसमें इसी तरह दो ‘ब्लेक होल्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पुष्टि हुई है, पर इसी माह इस वर्ष यानी 2017 का विज्ञान का दुनिया का सबसे बड़ा नोबल पुरस्कार दिया गया है। आगे एरीज में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ‘देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ यानी ‘डॉट’ में भी इस सफलता की मुख्य सूत्रधार उपकरण ‘लाइगो’ के लगने की संभावना है, जिसके बाद एरीज इस दिशा में और अधिक बेहतर परिणाम दे सकता है।
इस संबंध में मंगलवार को एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडेय ने पत्रकार वार्ता कर इस उपलब्धि की जानकारी दी। बताया कि न्यूट्रॉन स्टार्स तारों के जीवन पूरा होने के बाद शेष बचे अत्यधिक घनत्व वाले करीब 20 किमी व्यास के पिंड होते हैं। ये इतने भारी होते हैं कि इनकी एक चम्मच भर सामग्री माउंट एवरेस्ट से अधिक भारी होती है। इनके टकराने के बारे में अध्ययन लेजर तकनीक आधारित ‘अमेरिकी लेजर इंटरफेरमीटर गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला’ यानी लाइगो डिटेक्टर कहे जाने वाले उपकरणों से ही संभव होता है। यह लाइगो डिटेक्टर भारत में पुणे स्थित जॉइंट मीटर वेभ रेडियो टेलीस्कोप और लद्दाख स्थित हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप में लगे हैं। इनकी मदद से ही एरीज के दोनों वैज्ञानिकों ने इस खोज को करने में अपना योगदान दिया है। इनके अवलोकन में वैज्ञानिक सूर्य के द्रव्यमान के 1.1 से 1.6 गुना तक भारी इन खगोलीय पिंडों को 100 सेकेंड तक न्यूट्रॉन स्टार्स के रूप में चिन्हित कर सके। इनके टकराने से गामा किरणों का फ्लैश यानी एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी की कक्षाओं के उपग्रहों के द्वारा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के आगमन के सापेक्ष दो सेकेंड तक देखा गया। यह इस बात का पहला निर्णायक प्रमाण है कि अक्सर उपग्रहों से नजर आने वाला अल्प अवधि का गामा विकीरण विस्फोट वास्तव में न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से उत्पन्न होता है। इसका अनुमान एक शताब्दी पूर्व आइंस्टीन से लगाया था। इससे इस बात के संकेत भी मिले हैं कि गामा विकीरण के शक्तिशाली विस्फोटों से प्राप्त विलयनों में लोहे से ज्यादा घनत्व वाले सोना और सीसा जैसे तत्वों की 50 फीसद से अधिक मात्रा होती है। लिहाजा इस खोज से एरीज के वैज्ञानिकों में हर्ष की लहर है, और इसे मील का पत्थर और बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

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जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंग
जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंग

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2019। मंगलवार 19 फरवरी को भारतीय परंपरा के अनुसार माघ पूर्णिमा की रात आसमान में चांद कुछ खास स्वरूप में नजर आया। स्थानीय एरीज के खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार आज का चांद आम दिनों के मुकाबले 14 फीसद बड़ा और 30 फीसद अधिक चमकीला नजर आया। वैज्ञानिकों के मुताबिक पूर्णिमा के दिन चांद के के अपनी कक्षा में पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए पृथ्वी के अपेक्षाकृत सबसे करीब आ जाने के कारण इसका आकार और रोशनी आम पूर्णिमा के चांद के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है और इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘सुपर स्नो मून’ कहा जा रहा है। सरोवरनगरी में बादलों की लुका-छिपी के बीच इसे खुली आंखों से देखा गया। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह खास मौका रहा। बताया गया कि आगे ऐसा नजारा 2555 दिनों यानी करीब सात साल बाद 2026 में दिखाई देगा।
वैज्ञानिकों ने नासा के हवाले से बताया कि रात्रि 9 बजकर 23 मिनट पर चांद अपने सबसे बड़े व चमकीले बिहंगम स्वरूप में नजर आया, जब सूर्य चांद के ठीक 180 डिग्री यानी उल्टी दिशा में रहा होगा। बताया गया है कि फरवरी के माह में ऐसे बड़े व चमकीले दिखने वाले चांद को कई संस्कृतियों में सुपरमून तो दुनिया के कुछ देशों में इस खगोलीय घटना को स्ट्रॉम मून, हंगर मून व बोन मून भी कहा जाता है। इस दौरान समुद्री क्षेत्रों में आने वाले कुछ दिनों में ज्वार की स्थिति आने और ज्यादा ऊंची लहरें उठने की भी आशंका जताई जा रही है।

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वाशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मार्स इनसाइट लैंडर यान सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतारा गया। भारतीय समयानुसार सोमवार-मंगलवार की रात करीब 1:24 बजे इसे मंगल पर लैंड कराया गया। इनसाइट लैंडर यान को मंगल की रहस्यमयी दुनिया के बारे में जानकारी के लिए बनाया गया।वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मंगल ग्रह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मददगार होगा। इससे पृथ्वी से जुड़े नए तथ्य पता लगने की उम्मीद भी जताई जा रही है।

inside lander

जानकारी के मुताबिक, इनसाइट के लिए मंगल पर लैंडिंग में लगने वाला छह से सात मिनट का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान इसका पीछा कर रहे दोनों सैटेलाइट्स के जरिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर इनसाइट लैंडर पर रहीं। इन दोनों सैटेलाइट्स का नाम डिज्नी के किरदानों पर रखा गया है- ‘वॉल ई’ और ‘ईव’। दोनों सैटेलाइट्स ने आठ मिनट में इनसाइट के मंगल पर उतरने की जानकारी धरती तक पहुंचा दी। नासा ने इस पूरे मिशन का लाइव कवरेज किया। इनसाइट से पहले 2012 में नासा के क्यूरियोसिटी यान ने मंगल पर लैंडिंग की थी।

मार्स इनसाइट लैंडर यान कैसे काम करेगा 
नासा का यह यान सिस्मोमीटर की मदद से मंगल की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन करेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मंगल ग्रह पृथ्वी से इतना अलग क्यों है।

इनसाइट लैंडर की खासियत

  • इनसाइट का पूरा नाम ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस’
  • मार्स इनसाइट लैंडर का वजन 358 किलो
  • सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाला यान
  • 26 महीने तक काम करने के लिए डिजाइन किया गया
  • कुल 7000 करोड़ का मिशन
  • इस मिशन में यूएस, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप समेत 10 से ज्यादा देशों के वैज्ञानिक शामिल
  • इसका मुख्य उपकरण सिस्मोमीटर (भूकंपमापी) है, जिसे फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने बनाया है। लैंडिंग के बाद ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सेस्मोमीटर लगाएगा।
  • दूसरा मुख्य टूल ‘सेल्फ हैमरिंग’ है, जो ग्रह की सतह में ऊष्मा के प्रवाह को दर्ज करेगा।
  • इनसाइट की मंगल के वातावरण में प्रवेश के दौरान अनुमानित गति 12 हजार 300 मील प्रति घंटा रही।
  • इनसाइट प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ब्रूस बैनर्ट का कहना है कि यह एक टाइम मशीन है, जो यह पता लगाएगी कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने।

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-सूर्य पर धरती की ओर उभरा 8 लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ से खतरे की आशंका
-एरीज के सौर वैज्ञानिक के अनुसार सूर्य पर फिलहाल कोई सौर ज्वालाएं नहीं हैं
नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सूर्य के धरती की ओर की सतह पर बुधवार को आठ लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ यानी एक तरह का गड्ढा उभरने का दावा किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इससे 2 विशाल जी-1 श्रेणी की सौर ज्वालाएं रिकॉर्ड की गयी हैं। नासा ने आशंका जताई है कि इन विशाल सौर ज्वालाओं की वजह से उठा ‘सौर तूफान’ धरती के चुंबकीय क्षेत्र से टकरा सकता है। इसके नतीजे काफी बुरे हो सकते हैं। इसके धरती के वायुमंडल से टकराने की वजह से उपग्रह अव्यवस्थित हो सकते हैं। इसकी वजह से व्यवसायिक उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं, और जीपीएस सिस्टम भी अव्यवस्थित हो सकता है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसकी वजह से दुनिया के अनेक हिस्सों में बिजली भी गुल हो सकती है।
अलबत्ता, एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाबउद्दीन का ‘कोरोनल होल’ के उभरने की बात को स्वीकार करते हुए इससे इतर कहना है कि इन दिनों सूर्य अपने 11 वर्ष के सौर सक्रियता चक्र में शांत स्थिति में है, और सौर सक्रियता अपने न्यूनतम स्तर पर है। उनका कहना है कि कोरोनल होल की वजह से काफी सौर हवाएं आ सकती हैं। हो सकता है कि इसकी तीव्रता अधिक हो, किंतु सूर्य पर काफी समय से कोई बड़ी सौर ज्वाला और कोई सौर धब्बा नजर नहीं दिखी है।

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