(Industry) बोले गृह मंत्री शाह-उत्तराखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का आज समापन नहीं, अनंत उत्तराखंड को तराशने की शुरुआत, हुए 3.5 लाख करोड़ के निवेश समझौते…

Industry

(Water Problem) नैनीताल वाले पी रहे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा आईएसओ 9001 पानी, राज्य में यह मानक पाने वाला पहला नगर, जानें क्या हैं इसके मायने…

Water supply Problem, peyjal Pani

Water Problem

भारतीय क्रिकेटर (Cricket) मोहम्मद शमी ने पेश की मानवता की मिसाल, घायल को पहुंचायी प्राथमिक चिकित्सा

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ज्योर्तिलिंग जागेश्वर, यहीं से शुरू हुई थी शिवलिंग की पूजा, यहाँ होती है शिव के बाल व वृद्ध स्वरुप में भी पूजा… पीएम मोदी भी आ चुके

Jageshwar

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Solar Lunar Eclipse कल चंद्रग्रहण पर शाम 4 बजे से बंद हो जायेंगे नयना देवी मंदिर के कपाट, मंदिर प्रबंधन ट्रस्ट की नयी कार्यकारिणी गठित…

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उत्तराखंड के इस स्थान से एक साथ कर सकते हैं 2-2 कैलाश पर्वतों व ॐ पर्वत के दिव्य दर्शन

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मामूली बात पर अधिवक्ता (Advocates) ने युवक को गोली मारी, गिरफ्तार…

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चेक गणराज्य में शोध (Research-1) करेंगी नैनीताल की डॉ. अनीता राणा…

Research

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 सितंबर 2023 (Research)। नैनीताल नगर निवासी एक शोधार्थी डॉ. अनीता राणा का चयन यूरोप के चेक गणराज्य में शोध के लिये हुआ है। डॉ. अनीता वर्तमान में आईआईटी रुड़की में कार्यरत हैं और जल्द ही चेक गणराज्य में ‘सिंथेसिस ऑफ ड्रग-पॉलीमर कंज्युगेट्स’ विषय पर शोध कार्य करेंगी।

Research)।
डॉ. अनीता राणा

डॉ. अनीता ने बताया की उन्होंने कुमाऊ विश्वविद्यालय के प्रो. राजेंद्र सिंह नैनो साइंस और नैनो टेक्नोलॉजी केंद्र नैनीताल से केंद्र के प्रभारी प्रो. नंद गोपाल साहू के निर्देशन में ‘ग्राफीन एंड ड्रग डिलीवरी, नेचुरल प्रोडक्टस’ विषय पर शोध कार्य पूरा किया है। डॉ. अनीता के 16 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि उनकी एक खोज को एक पेटेंट प्राप्त हो चुका है व कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी उनके नाम हैं।

उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु प्रो. नंद गोपाल साहू और अपने माता- पिता,पति को दिया है। उनकी माता तारा राणा नगर पालिका सभासद व पिता सर्वजीत सिंह राणा व्यवसायी हैं।

आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करेंयदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो यहां क्लिक कर हमें सहयोग करें..यहां क्लिक कर हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से, यहां क्लिक कर हमारे टेलीग्राम पेज से और यहां क्लिक कर हमारे फेसबुक ग्रुप में जुड़ें। हमारे माध्यम से अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : सुबह का पठनीय समाचार : यमुना ही थी सरस्वती नदी, शोध में बड़ा दावा

(Research) बड़ी खोजः प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम के नीचे प्राचीन नदी के सबूत  मिले, कहीं ये सरस्वती तो नहीं! - Science AajTakनवीन समाचार, अल्मोड़ा, 29 दिसंबर 2022 (Research) । देश में गंगा, यमुना व सरस्वती नाम की तीन बड़ी नदियों की बात शास्त्रों में कही जाती है। कहा जाता है कि प्रयाग में गंगा-यमुना के साथ सरस्वती का भी संगम होता है, लेकिन सरस्वती नदी कहीं दिखाई नहीं देती है। अब नदियों पर अध्यध्यन करने वाले कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भू-वैज्ञानिक जेएस रावत ने दावा किया है कि यमुना नदी ही सरस्वती नदी थी। इस बारे में उन का शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ साइंस एंड रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। यह भी पढ़ें : अजब-गजब : मूंगफली-लहसुन खाने वाली मुर्गी ने एक दिन में दिए 31 अंडे, विश्व रिकॉर्ड खंगाला जाने लगा…

(Research) सरस्वती नदी और उससे पनपी सभ्यता का पता लगाने के लिए किए गए प्रो. रावत के शोध के दावे के मुताबिक यमुना ही असल में सरस्वती नदी है। पहले इस नदी का प्रवाह क्षेत्र हरियाणा से पंजाब, राजस्थान, गुजरात के दक्षिण पश्चिमी भाग और पश्चिम पाकिस्तान तक था। यह भी पढ़ें : नैनीताल : सैलानियों ने टैक्सी चालकों से मारपीट, महिलाओं ने लगाए छेड़छाड़ के आरोप

प्रो.जेएस रावत नेशनल चेयर ...(Research) शोध में दावा किया गया है कि लोथल और मोहनजोदड़ो वास्तव में सरस्वती (यमुना) नदी के किनारे विकसित सभ्यताएं थीं। भूगर्भीय, पुरातात्विक और रासायनिक प्रमाणों से इसका पता चला कि यह पूरी तरह स्वदेशी सभ्यता है। इसे मध्य एशिया से आने वाले आर्यों ने विकसित नहीं किया। यह भी पढ़ें : हल्द्वानी में शुरू हुआ रेलवे व प्रशासन का अतिक्रमण हटाओ अभियान, क्षेत्रवासियों के विरोध के बीच पीलर हदबंदी की कोशिश

(Research) सरस्वती का प्रवाह सरस्वती नदी का सभ्यता क्षेत्र हरियाणा में भिरना, कुणाल, महम, फरमाना, पौली, धानी, राखीगढ़ी, बालू, सीसवाल, पंजाब में दलेवान, लखमीरावाला, राजस्थान में कालीबगान, सूरतगढ़, अनूपगढ़, किशनगढ़, सोठी, मेहरगढ़, कच्छ के रण, पाकिस्तान में चोलिस्तान, गनवेरीवाला, किला अब्बास, मारोट, मोहनजोदड़ो, मिताथल तक था। यह भी पढ़ें : पति को महंगा पड़ा प्रेमिका बनी पत्नी का मायके जाने पर अनजान महिला से चैटिंग करना, राज खुला तो वह निकली अपनी ही पत्नी और

(Research) प्रो. रावत के अनुसार हजारों सालों में न सिर्फ यमुना बल्कि गंगा, गोमती, शारदा और घाघरा नदी ने भी प्रवाह बदला। एक समय गंगा नदी भी ऋषिकेश से दिल्ली के बीच बहती थी। करीब 30 हजार से 8500 वर्ष पूर्व होलोसीन के समय नदी का प्रवाह तंत्र बदला। लगभग 8,500 वर्ष पहले यमुना ने ठीक वही रास्ता अपनाया, जहां गंगा बहती थी। यह भी पढ़ें : सुबह का सुखद समाचार : यूकेपीएससी ने जारी किया 2023 के लिए 32 परीक्षाओं का कलेंडर

(Research) प्रो. रावत के अनुसार नील नदी बेसिन में जिस तरह विभिन्न सभ्यताओं का जन्म हुआ, उसी तरह सरस्वती नदी के किनारे भी सबसे पुरानी सभ्यता पनपी। इसके बाद सरस्वती के नए प्रवाह क्षेत्र को यमुना के नाम से जाने जाने लगा। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : शोधार्थियों के लिए शोध रूपरेखा जमा करने की अंतिम तिथियां घोषित

बहुजन शोधार्थियों के लिए बना मंच, पीएचडी में मदद करेंगे बहुजन विद्वान -  दलित दस्तकनवीन समाचार, नैनीताल, 23 नवंबर 2022 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने मंगलवार को प्री-पीएचडी कोर्स वर्क का परीक्षाफल घोषित करने के बाद अब शोध रूपरेखा जमा करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर 2022 घोषित कर दी है। कुलसचिव दिनेश चंद्रा ने बताया कि इसके पश्चात 10 जनवरी 2023 तक 1000 रुपये तथा 20 जनवरी तक 2000 रुपये विलंब शुल्क के साथ शोध रूपरेखा जमा की जा सकेगी। यह भी पढ़ें : उत्तराखंड ब्रेकिंग: कल की छुट्टी पर आया बड़ा अपडेट

(Research) शोध निदेशक प्रो. ललित तिवारी ने बताया की 20जनवरी के बाद शोध रूपरेखा जमा नहीं होगी। पंजीकरण फार्म विश्वविद्यालय की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते है। शोध रूपरेखा पांच प्रतियों में सभी दस्तावेजों के साथ शोध निर्देशक, विभागाध्यक्ष या संकाय अध्यक्ष के माध्यम से शोध निदेशालय में जमा की जायेंगी। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : कुमाऊं विश्वविद्यालय ने विषाणुओं को बेअसर करने वाला पेंट बनाया, पेटेंट भी हासिल किया

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 जून 2022 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. नंद गोपाल साहू एवं उनकी टीम के डॉ. मनोज कड़ाकोटी, डॉ. संदीप पांडे डॉ. सुनील ढाली, चेतना तिवारी ने आईआईटी ग्वालियर के प्रो अनुराग श्रीवास्तव के साथ बेकार प्लास्टिक से ग्राफीन व ग्राफीन से एंटी वायरल पेंट का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की है।

(Research) यह पेंट विभिन्न प्रकार के विषाणुओं को बेअसर करता है। इस कार्य पर टीम को भारत सरकार से पेटेंट भी प्रदान किया गया है। इसका पत्र आज पेटेंट ऑफिस भारत सरकार ने जारी किया है। 

(Research) टीम की इस उपलब्धि पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनके जोशी, शोध निदेशक प्रो. ललित तिवारी, प्रो. संजय पंत, प्रो. एबी मेलकानी, डॉ.आशीष तिवारी, डॉ.महेश आर्य, प्रो. चित्रा पांडे, डॉ. गीता तिवारी, प्रो. पुष्पा जोशी, प्रो. एसएस बर्गली सहित कूटा यानी कुमाऊं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं तथा इसे विश्वविद्यालय का गौरव बताया है। उल्लेखनीय है कि प्रो. साहू की टीम पूर्व में भी कई भारतीय तथा ऑस्ट्रेलियन पेटेंट हासिल कर चुकी है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : नैनीताल (Research) : एरीज नैनीताल एवं एथेंस के वैज्ञानिकों ने जंगलो की आग से सौर ऊर्जा के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों पर किया बड़ा शोध, बताए निष्कर्ष

कहा-सौर ऊर्जा के उत्पादन को घटाने में बड़ी भूमिका निभाती है जंगलों की आग
कहा-निष्कर्ष देश में सौर ऊर्जा के उत्पादन एवं इसके प्रबंधन व वितरण की योजना बनाने में हो सकता है बड़े स्तर पर कारगर
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 27 अप्रैल 2022 (Research) । देश में गर्मी के मौसम में जंगलों में लगने वाली आग देश में सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने में बड़ी भूमिका निभाती है। यह बात एक अध्ययन में प्रकाश में आई है।

(Research) इस अध्ययन से देश में सौर संयंत्रों के उत्पादन पर जंगल की आग के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण देश में बिजली के उत्पादन की योजना बनाने, बिजली के वितरण, आपूर्ति, सुरक्षा और बिजली उत्पादन में पूरी स्थिरता रखने में मदद मिल सकती है।

(Research) उल्लेखनीय है भारत जैसे विकासशील देशों में सौर ऊर्जा उत्पादन का व्यापक कार्य हो रहा है। मौजूदा केंद्र सरकार भी इस दिशा में नए संकल्प के साथ प्रयासरत है। अब तक माना जाता रहा है कि बादल, एरोसोल और प्रदूषण जैसे कई कारक सौर किरणित ऊर्जा मान को सीमित करते हैं। इससे फोटोवोल्टिक केंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्र प्रतिष्ठानों के कार्य-निष्पादन में समस्याएं पैदा होती हैं।

(Research) इस बात को ध्यान में रखते हुए डीएसटी यानी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार के तहत स्वायत्त अनुसंधान संस्थान एरीज यानी आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज नैनीताल और यूनान स्थित नेशनल ऑब्जर्वेटरी ऑफ एथेंस (एनओए) के शोधकर्ताओं के एक समूह ने एरीज के वैज्ञानिक डॉ. उमेश चंद्र दुम्का के नेतृत्व में प्रो. पनागियोटिस जी कोस्मोपोलोस, डॉ. पीयूष कुमार व एन पटेल आदि वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने वाले कारकों का पता लगाने की कोशिश की।

(Research) उन्होंने पाया कि बादलों और एरोसोल के अलावा जंगल की आग सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इंटरनेशनल ‘पीयर रिव्यूड जर्नल-रिमोट सेंसिंग’ में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि जनवरी से अप्रैल 2021 की अध्ययन अवधि के दौरान एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ वैल्यू 1.8 तक थी।

(Research) इस दौरान बड़े पैमाने पर जंगल की आग की घटनाओं के कारण एक क्षैतिज सतह (वैश्विक क्षैतिज किरणन-जीएचआई) पर कुल सौर विकिरण की घटना में कमी आई और सूर्य से बिना बिखरे हुए सौर विकिरण 0 से 45 फीसदी तक ही प्राप्त हुई।

(Research) अध्ययन में शामिल प्रो.दुम्का व अन्य वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस अध्ययन के निष्कर्ष से देश के स्तर पर ऊर्जा प्रबंधन और योजना पर जंगल की आग के प्रभाव के बारे में निर्णय लेने वालों के बीच काफी जागरूकता बढ़ेगी। इसके अलावा यह शोध जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को कम करने की प्रक्रियाओं और नीतियों एवं सतत विकास पर इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का समर्थन भी कर सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : विद्यार्थियों को कोविड-सार्स जैसे विषाणुओं व इनके टीकों को बनाने की वैज्ञानिक जानकारियां

-गुहा रिसर्च कांफ्रेंस एवं भाभा एटोमिम रिसर्च सेंटर मुंबई के आउटरीच कार्यक्रम के तहत भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में हुआ व्याख्यानमाला का आयोजन
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 अप्रैल 2022 (Research)। गुहा रिसर्च कांफ्रेंस एवं भाभा एटोमिम रिसर्च सेंटर मुंबई के आउटरीच कार्यक्रम के तहत गुरुवार को मुख्यालय स्थित भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया।

(Research) इस अवसर पर शहीद सैनिक विद्यालय के साथ नगर के डीएसबी परिसर के भौतिक विज्ञान विभाग, निशांत स्कूल व सीआरएसटी व राजकीय इंटर कॉलेज के विद्यार्थियों को संेटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी हैदराबार की वैज्ञानिक डॉ. रसना भंडारी एवं रघु तिरुमलाई ने कोरोना व सार्स विषाणु की अवधारणा तथा इन विषाणुओं के विरुद्ध कोवैक्सीन व कोवीशील्ड जैसे टीकों को बनाने की विधियों की विस्तार से जानकारी दी।

(Research) इनके अलावा सेंटर फॉर डीएनए फिंगर प्रिंटिंग एंड डाईगोसटिक्स हैदराबाद के कासवेकर दुर्गादास ने रसायनिक हथियारों के नुकसान पर व्याख्यान दिया। साथ ही बच्चों को भारतीय परिवेश में वैज्ञानिक अनुसंधान व मेहनत से भाग्य निर्माण हेतु विद्यार्थियों को प्रेरित किया। साथ ही शहीद सैनिक विद्यालय के विद्यार्थियों हेतु एक लाख 60 हजार रुपए मूल्य का इंटरेक्टिव स्मार्ट क्लासरूम भी प्रदान किया।

(Research) आयोजन में प्रधानाचार्य बीएस मेहता, कुमाऊं विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. नीता बोरा शर्मा, आरोही संस्था प्यूड़ा के गोपाल नेगी, उप प्रधानाचार्य प्रवीण सती, डॉ. नीलिमा जोशी, उमेश जोशी, ललित जीना, विनीता बोरा, अवंतिका गुप्ता, नेहा, भाष्कर पांडे, मीनाक्षी बिष्ट, निखिल बिष्ट, यामिनी पांडे, दिशा रानी, उत्कर्ष बोरा व दरबान सिंह आदि ने भी योगदान दिया। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : चीन में कार्यरत दीर्घकालीन मौसम वैज्ञानिक प्रो. गायत्री नैनीताल के गांव में करेंगी कृषि संबंधी शोध, आ रही अड़चने

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2022 (Research)। सामान्यतया प्रतिभाएं अपनी प्रतिभा से दूसरे देशों को लाभान्वित करती हैं और अपने घर-देश लौटना पसंद नहीं करती हैं, परंतु नगर की एक बेटी, नगर के ही डीएसबी परिसर की छात्रा रही, चीन की शियान जाइटोंग युनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत दीर्घकालीन मौसम वैज्ञानिक डॉ. गायत्री कठायत ने नैनीताल जनपद की ग्राम पंचायत दाड़िमा में अपनी प्रतिभा का उपयोग करने का फैसला लिया है।

अलबत्ता उन्हें इस कार्य में स्थानीय तौर पर अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। सोमवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में डॉ. गायत्री ने बताया कि वह ग्राम पंचायत दाड़िमा में ‘रीजनल वैदर स्टेशन’ स्थापित करना और यहां सर्वश्रेष्ठ उत्पादन के साथ उगाई जा सकने वाली फसलों पर शोध करना चाहती हैं। चीन, वियतनाम सहित कई देशों में किए गए अपने अध्ययन के आधार पर उन्होंने बताया कि फसलों का उत्पादन बहुत हद तक स्थानीय जलवायु पर निर्भर करता है।

वह दाड़िमा में स्थानीय जलवायु का अध्ययन करना चाहती हैं, तथा प्राप्त होने वाले डाटा के आधार पर सर्वप्रथम उसके अनुरूप टमाटर के उपयुक्त बीजों की पौध लगाना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि शोध के उपरांत उपयुक्त बीजों की पहचान कर लिए जाने के बाद वह चाहने पर स्थानीय लोगों को अपने ज्ञान व डाटा का लाभ देंगी।

निर्दलीय विधायक प्रत्याशी बने रोड़ा
नैनीताल। डॉ. गायत्री ने बताया कि उनके कृषि परियोजना स्थल तक पहुंचने के लिए 12-15 फिट चौड़ी दाड़िमा-गढ़गांव सड़क है। इससे उन्हें ट्रैक्टर ले जाना है। इस सड़क पर गढ़गांव की सड़क कटने के कारण मलवा गिर गया था, जिसे प्रशासन की आधिकारिक अनुमति से प्रशासन की मौजूदगी में वह गत 15 मार्च को साफ करा रही थीं।

किंतु निर्दलीय विधायक प्रत्याशी व जिला पंचायत सदस्य लाखन सिंह नेगी का कहना है कि यह सड़क उनके द्वारा बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के बनाई है। वह किसी राजस्व विभाग को नहीं मानते। इसलिए वह उन्हें इस सड़क से नहीं जाने देंगे। जबकि दूसरे राज्यों के बिल्डर भी इस क्षेत्र में कॉटेज आदि बनाने के लिए इस सड़क का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शिकायत जिलाधिकारी से भी की है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा के शोधकर्ताओं के साथ नैनीताल की कविता के शोध को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

-चमोली आपदा पर किया गया है शोध, देश-दुनिया के कुल 53 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने स्वैच्छिक आधार पर शोध कार्य किया
-शोध में हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया है

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 9 मार्च 2022 (Research)। पिछले वर्ष 7 फरवरी को चमोली जिले में आई आपदा पर किया गया एक शोध ‘ए मैसिव रॉक एंड आइस एवलांच कॉज्ड द 2021 डिजास्टर एट चमोली, इंडियन हिमालय’ विख्यात जर्नल ‘साइंस’ में प्रकाशित हुआ है, और इसे ‘अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ जियोेग्रैफर्स’ के ‘जियोमोरफोलॉजी स्पेशलिटी ग्रुप’ की ओर से विश्वप्रसिद्ध ‘2022 ग्रोव कार्ल गिल्बर्ट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है।

(Research) इस शोध का हिस्सा रहीं नैनीताल निवासी पत्रकार एवं जल नीति विशेषज्ञ कविता उपाध्याय ने बताया कि इस घटना से चिंतित अमेरिका, ब्रिटेन, भारत, कनाडा और कई अन्य देशों के कुल 53 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने चमोली में आई बाढ़ और उससे हुई क्षतियों पर स्वैच्छिक तौर पर यह शोध किया। इन विशेषज्ञों में हाइड्रोलॉजिस्ट यानी जल वैज्ञानिक, ग्लेशियोलॉजिस्ट यानी ग्लेशियर वैज्ञानिक, मौसम विशेषज्ञ, आपदा विशेषज्ञ एवं जल नीति शोधकर्ता आदि शामिल रहे।

(Research) उत्तराखंड के देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान भी इस शोध में हिस्सेदार था। उल्लेखनीय है कि कविता ऑक्सफोर्ड विश्वविश्यालय से जल विज्ञान एवं जल निति में एमएससी कर चुकी हैं, और वर्तमान में हिमालय के पर्यावरणीय विषयों पर शोध एवं स्वतंत्र पत्रकारिता करती हैं।

(Research) उन्होंने कहा, यह शोध इस मायने में भिन्न है कि इसमें हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया है, जब कि अधिकांश वैज्ञानिक शोधपत्र इस तरह के विवाद में पड़ने से बचने की कोशिश करते हैं। इस कारण, आपदा प्रभावित इन परियोजनाओं से होने वाली क्षतियों के खिलाफ इस शोध का उपयोग न्याय पाने के लिए न्यायालयों में कर रहे हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : पीएचडी प्रवेश परीक्षा पर आई अपडेट

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 7 जनवरी 2022 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश परीक्षा रविवार को आम्रपाली इंस्टीट्यूट हल्द्वानी तथा डीएसबी परिसर नैनीताल में आयोजित होगी। परीक्षा संयोजक प्रो. संजय पंत ने बताया कि परीक्षा हेतु प्रवेश पत्र विश्वविद्यालय की वेबसाइट https://www.kunainital.ac.in/ में अपलोड किए जा चुके हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक ने खोज लिया भगवान विष्णु का ‘क्षीरसागर’, अमेरिकी जनरल में प्रकाशित हुआ शोध पत्र…

-लद्दाख में भारतीय व काराकोरम प्लेट के बीच फंसे नए खोजे गए ‘क्षिरोधा’ नाम के भूखंड की खोज से बदल जाएगी भारतीय व एशियाई प्लेट के टकराने की भूवैज्ञानिक अवधारणाएं

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जनवरी 2022 (Research)। सृष्टि के शुरुआती दौर सतयुग के बारे में कहा जाता है कि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीरसागर में वास करते थे। इसी क्षीरसागर में एक सुमेरु पर्वत था। इसी क्षीरसागर में मंदराचल पर्वत पर वासुकी नाग की मदद से देवों एवं असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था और इसके फलस्वरूप हलाहल विष के साथ माता लक्ष्मी सहित अनेक रत्न निकले थे।

(Research) भारतीय धर्मग्रंथों में वर्णित इन संदर्भों को अब एक हद तक वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं। इधर कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक प्रो. राजीव उपाध्याय ने कभी हिमालय की जगह मौजूद रहे टेथिस सागर के क्षेत्र में एक ऐसे अज्ञात भूखंड को खोज लिया है, जिसे क्षीरसागर के नाम पर ही ‘क्षिरोधा’ नाम दिया गया है।

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प्रो. राजीव उपाध्याय

(Research) प्रो. राजीव उपाध्याय का इस संबंध में एक शोध पत्र मंगलवार को ही दुनिया की शीर्ष भूवैज्ञानिक पत्रिका ‘जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका’ में ‘डिस्कवरी’ नाम से छपा है। इस बारे में ‘नवीन समाचार’ को उन्होंने बताया कि पृथ्वी की उम्र करीब 4.6 अरब वर्ष की है। तब दुनिया में आज की तरह सात की जगह उत्तरी गोलार्ध में लॉरेशिया और दक्षिणी गोलार्ध में वर्तमान दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत, आस्ट्रेलिया व अंटार्कटिका महाद्वीप को समाहित करने वाले गोंडवाना लेंड नाम के कुल दो ही महाद्वीप थे, और वर्तमान हिमालय की जगह टेथिस नाम का महासागर था।

(Research) अब से करीब 30 करोड़ वर्ष पूर्व लॉरेशिया और गौंडवाना लेंड आपस में टकराए और इससे नए महाद्वीपों का जन्म हुआ। ऐसी मान्यता है कि इसी कड़ी में आगे 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट भी दक्षिणी गोलार्ध से टूटकर उत्तरी गोलार्ध की ओर आई और एशियाई प्लेट से टकराई। इसी प्रक्रिया में उनके टकराने वाले स्थान पर मौजूद टेथिस सागर में जमा चूना पत्थर आदि पहाड़ का रूप लेकर हिमालय पर्वत बन गया।

(Research) अब तक के अध्ययनों के आधार पर माना जाता है कि भारतीय प्रांत लद्दाख में सिंधु नदी से लगे इंडस सांग्पो सूचर या इंडस सूचर क्षेत्र में भारतीय भूगर्भीय प्लेट तिब्बती प्लेट से टकराई। भूवैज्ञानिकों की ओर से यह एक स्थापित सत्य है। इधर नए शोध अध्ययन में इससे इतर कहा गया कि भारतीय प्लेट एशियाई प्लेट से नहीं टकराई, बल्कि इनके बीच में और भी छोटे-छोटे भूखंड हैं, जो भारतीय प्लेट से पहले ही टकराए थे।

(Research) ऐसा ही भूखंड हैं-काराकोरम, ल्हासा व पेंगांस झील के पूर्व में स्थित क्विंगटांग। लेकिन उत्तरी लद्दाख में सिंधु नदी के उत्तर में सियाचिन से आने वाली नुब्रा व शियोक नदियांे की नुब्रा घाटी में भारतीय एवं काराकोरम प्लेट के बीच में एक अन्य छोटा भूंखंड फंसा हुआ है।

(Research) यह भूखंड अब तक पूरी तरह से अज्ञात था। अलबत्ता भूवैज्ञानिकों की गणना के अनुसार यहां एक करीब 1500 किलोमीटर लंबा भूखंड अज्ञात था। इसे हाल ही में हावर्ड व एमआईटी विश्वविद्यालय के विश्व प्रसिद्ध तुर्की निवासी प्रोफेसर प्रो. सलाल सेंगोर के द्वारा क्षीरसागर के नाम से ‘क्षिरोधा’ नाम दिया गया था।

(Research) अब उस अज्ञात भूखंड को साक्ष्यों के साथ खोज लिया गया है। इसके बाद भविष्य में भारतीय प्लेट के एशियाई प्लेट से टकराने की और उस क्षेत्र के उद्भव व विकास की भूवैज्ञानिक अवधारणा में नया आयाम जुड गया है और यह अवधारणा काफी हद तक बदलने वाली है।

(Research) नए खोजे गए इस भूखंड का प्रमाण यह है कि इसके उत्तरी गोलार्ध में होने के बावजूद इसमें 30 करोड़ वर्ष पुराने गोंडवाना काल यानी पुरावनस्पतिक काल के स्टोर व पोलनग्रेन्स यानी तत्कालीन पेड़ों के बीजों के जीवाश्म तथा कोयले के टुकड़े मिले हैं। जबकि वहां 10 करोड़ वर्ष पुराने या उससे नई चट्टानें ही मिलनी चाहिए थी।

(Research) यही गौंडवाना काल का कोयला देश के बिहार क्षेत्र में रानीगंज व झरिया के क्षेत्रों में भूगर्भ से प्राप्त होता है। इस शोध अध्ययन में पुरावनस्पति बीरबल साहनी संस्थान लखनऊ के सेवानिवृत्त डॉ. राम अवतार और उनके पुत्र शोधार्थी सौरभ गौतम का भी सहयोग रहा है।

(Research) क्षीरसागर तथा समुद्र मंथन में विष व रत्न निकलने की कहानी भूवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण से काफी सही
नैनीताल (Research) । प्रो. राजीव उपाध्यक्ष क्षीरसागर तथा समुद्र मंथन में विष व रत्न निकलने की भारतीय धर्मग्रंथों के उल्लेख को भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से काफी सही मानते हैं। उनका कहना है कि भूविज्ञान तो आज के दौर का विज्ञान है, और भले भारतीय धर्मग्रंथों में यह बात दूसरी तरह से कही गई हो, लेकिन तब भी उसी तरह की बातें कही गई हैं, जैसी अब भूविज्ञान की अवधारणाएं कहती हैं।

(Research) उस दौर में धरती में बड़ी वैश्विक स्तर के ज्वालामुखी फटने जैसी भूगर्भीय घटनाएं हुईं, जिनसे बड़ी मात्रा में जहरीली गैसें व तत्व निकले, और बाद में सोना, चांदी व हीरे, मोती आदि भी निकले। ज्वालामुखी के बाद ऐसा होना सामान्य बात है। उल्लेखनीय है कि प्रो. उपाध्याय पूर्व में लद्दाख क्षेत्र में सोना, चांदी, तांबा व लोहा आदि तत्वों को भी खोज कर चुके हैं। इससे पता चलता है कि उस दौर में भी प्रकृति के बारे में भारतीय ज्ञान अत्यधिक उन्नत था। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : महिलाओं के मुद्दों को समाचार पत्रों में मिलने वाले स्थान पर किया शोध

-जशोदा की पीएचडी मौखिक परीक्षा संपन्न
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जनवरी 2022 (Research)। कुमाऊं विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की शोध छात्रा जशोदा बिष्ट कार्की की पीएचडी मौखिक परीक्षा मंगलवार को सफलतापूर्वक आयोजित हुई। शोध के आधार पर जशोदा ने बताया कि समाचार पत्रों में महिलाओं से संबंधित समाचारों में करीब 50 फीसदी समाचार अपराधों से संबंधित तथा करीब 15 फीसद ही महिलाओं की उपलब्धियों से संबंधित होते हैं।

(Research) इन समाचारों में भी महिलाओं को ग्लैमर की वस्तु की तरह अधिक पेश किया जाता है, और महिलाओं के दृष्टिकोण से अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है। जशोदा ने समाचार पत्रों में महिलाओं सम्बन्धी समाचारों का विश्लेषण कर ‘न्यूज पेपर कवरेज ऑफ वीमेन रिलेटेड इश्यूज एंड देयर इम्पैक्ट ऑन कुमाऊं मंडल’ विषय पर विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश रंजन तिवारी के निर्देशन में पीएचडी थीसिस तैयार की है।

(Research) उनकी पीएचडी मौखिक परीक्षा आइआइएमसी के वरिष्ठ प्रोफेसर गोविंद सिंह ने ली। इस दौरान सहायक प्रोफेसर पूनम बिष्ट, वरिष्ठ पत्रकार डा. नवीन जोशी, सुनील भारती, अधिवक्ता नितिन कार्की, मोअज्जम खान, किशन व चंदन आदि मौजूद रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : राशि ने पूरा किया शोध कार्य

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जुलाई 2021 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर के जंतु विज्ञान विज्ञान विभाग की शोधार्थी राशि मिगलानी ने प्रो. सतपाल सिंह बिष्ट ने निर्देशन में अपना शोध कार्य पूरा कर लिया है। उनके शोध का विषय राज्य के तराई क्षेत्र में ‘इफेक्ट ऑफ कॉमनली यूज्ड इनसैक्टीसाइड ऑन अर्थवॉर्म्स इन एग्रीकल्चर फील्ड एंड लैबोरेटरी कंडीशन्स’ यानी सामान्य रूप से प्रयुक्त कीटनाशकों का कृषि पर खेतों एवं प्रयोगशाला की स्थितियों में कैंचुओं पर पड़ने वाले प्रभावों पर है।

उल्लेखनीय है कि उन्हें वर्ष 2020 में अंतर्राष्ट्रीय युवा वैज्ञानिक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

दावा (Research)  (Research) : कोविड-19 के मामूली संक्रमण के बाद लंबे समय तक बनी रहती है इम्युनिटी, कम हो जाती है बार-बार बीमार होने की संभावना

नवीन समाचार, नई दिल्ली, 26 मई 2021 (Research) । कोविड-१९ के मामूली संक्रमण से निपटने के कुछ महीने बाद भी लोगों में प्रतिरक्षी कोशिकाएं होती हैं जो कोरोना वायरस के खिलाफ रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करती हैं। इससे बार-बार बीमार होने की संभावना कम हो जाती है। यह जानकारी एक अध्ययन में दी गई है।

(Research) अमेरिका के सेंट लुइस में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने कहा कि इस तरह की कोशिकाएं जीवन भर रह सकती हैं जिससे हर समय रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रह सकती है। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-१९ के मामूली संक्रमण से लंबे समय तक रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है और इसमें बार-बार बीमार होने की संभावना कम हो जाती है।

(Research) वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर और शोध के वरिष्ठ लेखक अली एल्लेबेडी ने कहा, ‘पिछली गर्मियों में इस तरह की खबरें आईं कि संक्रमण के बाद रोग प्रतिरोधी क्षमता तेजी से कम होती है जिससे कोविड-१९ हो जाता है और मुख्य धारा के मीडिया ने कहा कि इस कारण शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता लंबे समय तक नहीं टिक पाती है।‘

(Research) एल्लेबेडी ने कहा, ‘लेकिन यह आंकड़ों को गलत तरीके से पेश करना है। संक्रमण के बाद रोग प्रतिरोधक स्तर का नीचे आना सामान्य बात है, लेकिन वह बिल्कुल ही खत्म नहीं हो जाता है।’ शोधकर्ताओं ने पाया कि पहले लक्षण के ११ महीने बाद लोगों में फिर से रोग प्रतिरोधी कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं। उन्होंने बताया कि ये कोशिकाएं लोगों के शेष जीवन तक जीवित रहेंगी और रोग प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न करेंगी जो कि यह लंबे समय तक प्रतिरक्षण क्षमता का दमदार सबूत है।

(Research) शोधकर्ताओं के अनुसार, संक्रमण के दौरान एंटीबॉडी उत्पन्न करने वाली प्रतिरोधी कोशिकाएं तेजी से विभाजित होती हैं और रक्त में आ जाती हैं जिससे एंटीबॉडी का स्तर तेजी से बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि संक्रमण दूर होने पर ऐसी ज्यादातर कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं और रक्त में एंटीबॉडी का स्तर कम हो जाता है।

(Research) शोधकर्ताओं ने बताया कि एंटीबॉडी उत्पन्न करने वाली कुछ कोशिकाएं लंबे समय तक रहने वाली प्लाज्मा कोशिकाएं कहलाती है। ये कोशिकाएं अस्थि मज्जा यानी बोन मैरो में पहुंच कर वहां रहने लगती हैं और कम संख्या में ही सही, एंटीबॉडी उत्पन्न कर रक्त प्रवाह में पहुंचाती हैं। ये एंटीबॉडी वायरस के संक्रमण से बचाव करती हैं।

दावा (Research) : मौत के १२ से २४ घंटे बाद नाक, मुंह की गुहाओं में नहीं रहता कोरोना
नई दिल्ली (Research) । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फोरेंसिक प्रमुख डा. सुधीर गुप्ता
ने कहा है कि एक संक्रमित व्यक्ति की मौत के १२ से २४ घंटे बाद कोरोना वायरस नाक और मुंह की गुहाओं (नेजल एवं ओरल कैविटी) में सक्रिय नहीं रहता जिसके कारण मृतक से संक्रमण का खतरा अधिक नहीं होता है।

(Research) डा.गुप्ता ने कहा, मौत के बाद १२ से २४ घंटे के अंतराल में लगभग १०० शवों की कोरोना वायरस संक्रमण के लिए फिर से जांच की गई थी जिनकी रिपोर्ट नकारात्मक आई। मौत के २४ घंटे बाद वायरस नाक और मुंह की गुहाओं में सक्रिय नहीं रहता है। पिछले एक साल में एम्स में फोरेंसिक मेडिसिन विभाग में श्कोविड-१९ पॉजिटिव मेडिको-लीगलष् मामलों पर एक अध्ययन किया गया था।

(Research) इन मामलों में पोस्टमॉर्टम किया गया था। उन्होंने कहा कि सुरक्षा की दृष्टि से पार्थिव शरीर से तरल पदार्थ को बाहर आने से रोकने के लिए नाक और मुंह की गुहाओं को बंद किया जाना चाहिए। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : कुमाऊं एवं एसएसजे विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों व शोधार्थियों ने खोजीं कोरोना से लड़ने में कारगर 41 पौधे

-च्यवनप्राश में प्रयोग होते हैं यह पौधे, यूके एवं फ्रांस की शोध पत्रिकाओं में शोध हुआ प्रकाशित

नवीन समाचार, नैनीताल, 09 दिसम्बर 2020 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के वनस्पति विज्ञान विभाग एवं सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के संयुक्त शोध में आंवला, तुलसी, दारू हल्दी, गिलोय, दालचीनी, तेजपत्ता, लांग, इलाइची, पीपली, पुर्ननवा एवं अष्टवर्ग के च्यवनप्राश में प्रयुक्त होने वाले 41 औषधीय पौधे कोरोना से लड़ने में कारगर पाए गए है।

(Research) यह शोध कार्य यूनाइटेड किंगडम से प्रकाशित शोध पत्रिका टेलर एवं फ्रांस के जनरल ऑफ बायो, मॉलीक्यूल एवं स्ट्रक्चरल डायनामिक्स में हाल में ही प्रकाशित किया गया है। वनस्पति विज्ञान विभाग, के सहायक प्राध्यापक डा.. सुभाष चंन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर डा.. सुषमा टम्टा तथा शोधार्थी प्रियंका शर्मा, तुषार जोशी, शालिनी मठपाल, तनूजा जोशी एवं हेमलता द्वारा किये गये एक शोध में च्यवनप्राश में प्रयुक्त 41 पौधों मंे पाये जाने वाले 686 यौगिको की मॉलीक्युलर डा.किंग एवं मॉलीक्युलर डायनामिक्स सिमुलेशन विधि द्वारा स्क्रीनिंग की गई।

(Research) इस स्क्रीनिंग में ऐसे 4 यौगिक पाये गये, जो कोरोना विषाणु में पाये जाने वाले मेन प्रोटेएज रिसेप्टर से आबद्व हो सकते हैं। लिहाजा इनसे कोरोना विषाणु की प्रजनन प्रक्रिया को रोका जा सकता है। इन योगिकों को लेकर क्लीनिकल ट्रायल भी किया जा सकता है।

(Research) प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों की इस उपलब्धि पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रो. एनके जोशी, विज्ञान संकायाध्यक्ष एवं वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. एससी सती, निदेशक एसआरआईसीसी प्रो. ललित तिवारी, प्रो. वाईएस रावत, प्रो. एसएस बर्गली, डा. किरन बर्गली, डा. नीलू नोधियाल, डा. एके बिष्ट, डा. कपिल खुल्बे, प्रो. नीतू बोरा शर्मा, प्रो. पीएस बिष्ट आदि ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह कोरोना काल में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

(Research) च्यवनप्राश के बहुत से पौधे उत्तराखण्ड में पाये जाते है जिनसे प्राप्त होने वाले तत्व कोरोना से लड़ने में सक्षम है। कुमाऊं विश्वविद्यालय में हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले इस शोध से कोरोेना से लड़ने में मदद मिलने की आशा है।

यह भी पढ़ें : कुमाऊं विश्वविद्यालय ने कोरोना पर प्रारंभ किया शोध, शरीर में विषाणु को प्रवेश ही न करने देंगे..

-उत्तराखंड के पौधों में पाये जाने वाले ‘फाइटो कैमिकल्स’ से कोरोना विषाणु के मानव शरीर में प्रवेश को रोकने पर शुरू हुआ शोध

डॉ.नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 मई 2020। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने कोरोना की वैश्विक महामारी के बचाव हेतु शोध कार्य प्रारम्भ हो गया है। विश्वविद्यालय के के भीमताल परिसर स्थित जैव प्रौद्योगिकी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने बताया कि विश्व के सभी देश कोरोना के खिलाफ वैक्सीन-औषधि प्राप्त करने की दिशा में प्रयासरत हैं,

परन्तु वैक्सीन जनमानस तक पहुंचाना अभी एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें अभी भी काफी समय लगने की सम्भावना है। ऐसे में जैव प्रौद्योगिकी विभाग कुमाऊं विश्वविद्यालय के नवागत कुलपति प्रो. एनके जोशी की प्रेरणा से इस महामारी के बचाव की दूसरी सम्भावनाओं पर कार्य कर रहा है।

उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड महत्वपूर्ण औषधीय पादपों की सम्पदा का धनी है। राज्य में इन औषधीय पौधों में पाये जाने वाले महत्वपूर्ण ‘फाइटोकैमिकल्स’ की एक लम्बी सूची है जो पहले से ही मिलती-जुलती बीमारियों से विरूद्ध काफी कारगर सिद्ध हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पौधे भी जीवित प्राणी ही होते हैं, और उनमें विभिन्न बीमारियों-बाहरी खतरों से लड़ने के फाइटो कैमिकल्स कहे जाने वाले तत्व होते हैं।

उत्तराखंड में ऐसे सैकड़ों फाइटो कैमिकल्स की पहचान हो चुकी है। इसलिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने इन्ही फाइटोकैमिकल्स के उपयोग से कोरोना के बचाव तलाशने पर कार्य कर रहा है। प्रो. पांडे ने बताया कि कोरोना के संक्रमण के लिए ‘सार्क-कोव-2’ नाम का एक ‘आरएनए’ विषाणु जिम्मेदार है। मानव शरीर में गुर्दे व फेफड़े आदि विभिन्न अंग इसके लक्ष्य होते हैं। इन अंगों में यह विषाणु हमला न कर पाएं, इस हेतु कुछ एन्जाइम-प्रोटीन का होना अत्यंत आवश्यक होता है।

इसलिए शोध में इन अंगों में विषाणु का प्रवेश निरुद्ध कर सकने योग्य राज्य में पाये जाने वाले फाइटोकैमिकल्स की कम्प्यूटर पर ‘इन सिलिको स्क्रीनिंग’ प्रारम्भ की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जाये कि कौन से फाइटोकैमिकल इन अंगों में कोरोना को प्रवेश करने व स्थापित होने से रोक सकते हैं। ताकि उसको प्रवेश करने पर ही रोका जा सके, ताकि वह मानव शरीर में अन्य समस्याएं न पैदा कर सके।

एक खास बात यह भी कि कोरोना के विषाणु पर कोई प्रयोग करने की जगह ‘होस्ट सेल टार्गेट’ यानी मानव के फेफड़े, गुर्दे आदि लक्षित अंगों पर ही प्रयोग किये जा रहे हैं, क्योंकि उसमें ‘म्यूटेशन’ यानी बदलाव की सम्भावना बहुत कम होती है जबकि विषाणु में म्यूटेशन की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है, वह बार-बार अपनी संरचना बदलने में सक्षम होता है।

ऐसे में हो सकता है जब तक वैज्ञानिक विषाणु पर शोध कर किसी निष्कर्ष पर पहुचें, वह अपनी संरचना परिवर्तित कर वैज्ञानिकों के सारे प्रयासों को निष्फल कर दे। प्रो. पांडे ने बताया कि मानव शरीर में कुछ महत्वपूर्ण प्रोटीन व एन्जाइम पाये जाते हैं जो कि फेफड़ों व गुर्दों में इस विषाणु के प्रवेश करने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं एवं उसे वहां चिपकने के लिए आधार प्रदान करते हैं।

इसलिए शोध में मुख्य रूप से इन्हीं प्रोटीनों व एन्जाइमों को अपना लक्ष्य माना है एवं उन्हीं पर ध्यान केन्द्रित किया है कि कैसे इस प्राकृतिक फाइटो कैमिकल्स की मदद से या तो इन प्रोटीनों-एन्जाइमों के उत्पादन को रोका या कम किया जाये या उन बिन्दुओं को अवरुद्ध किया जाये, जहां पर विषाणु अपने विशिष्ट संरचनाओं के साथ संलग्न होता है। इसके लिए सर्वप्रथम ‘इन सिलिको स्क्रीनिंग’ के माध्यम से एक सूची तैयार की जा रही है, जिसमें इस विषाणु के विरूद्ध मनुष्य के लिए उपयोगी फाइटोकैमिकल्स को रखा जाएगा।

उसके पश्चात ‘बायोइन्फोर्मेटिक्स’ साधनों एवं ‘कम्पूटेशनल डोकिंग’ के माध्यम से सभी सम्भावित विकल्पों एवं सम्भावनाओं पर कार्य कर सबसे कारगर पाये गये कम्पाउंडों के एक संग्रह का निर्माण किया जायेगा जो कि दवा निर्माण में लगे वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होगा। इससे न सिर्फ समय अपितु ऊर्जा व संसाधनों की भी बचत होगी तथा कम समय में बेहतर नतीजे प्राप्त होंगे।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड की इस बूटी पर मिला अमेरिकी पेटेंट, बनेगी इस महाबीमारी की दवाई

कुमाऊं विवि के लिए’पहला पेटेंट’ हासिल कर प्रो. वीना ने रचा इतिहास, महाबीमारी के लिए खोजी पहाड़ी प्राकृतिक औषधि

-जैव प्रौद्योगिकी विभाग की अध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक प्रो. लालजी सिंह व प्रो. दुबे के साथ हासिल किया पेटेंट
डॉ.नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने विवि के लिए पहला पेटेंट हासिल कर इतिहास रच दिया है। विभाग की अध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक कहे जाने वाले प्रो. लालजी सिंह व बनारस हिंदू विवि के प्रोफेसर जीपी दुबे के साथ वर्ष 2011-12 से नैनीताल के अयारपाटा क्षेत्र में पहाड़ के फल किलमोड़ा (दारुहरिद्रा) पर किए गए शोध से

मधुमेह के लिए प्राकृतिक, रसायन रहित आर्युर्वेदिक औषधि बनाने का रामबाण फार्मूला खोज निकाला है, जिसे अमेरिकी संस्था ‘इंटरनेशनल पेटेंट सेण्टर’ से पेटेंट प्रमाण पत्र प्राप्त हो गया है। आगे इस औषधि को व्यवसायिक तरीके से इस्तेमाल के लिए रोगियों तक पहुंचाने के लिए कंपनियों के साथ बात चल रही है।

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KNSB : इंटरनेट बैंकिंग सेवा प्रारम्भ करने वाला उत्तराखण्ड का पहला नगरीय सहकारी बैंक बना कूर्मांचल बैंक

KNSB

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हल्द्वानी में आईएसबीटी (ISBT-Gaulapar) मामले में उच्च न्यायालय का दीर्घकालीन-नजीर पेश करने वाला 1 बड़ा आदेश

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DM Nainital : डीएम ने अतिक्रमण हटाने के लिए तय की समयसीमा, नैनीताल-हल्द्वानी के 21 जंक्शन भी होंगे ‘साफ’

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Roap Way Cable Car : खराबी दूर होने के बाद फिर चलने लगी रोपवे केबल कार

Roap Way Cable Car

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नैनीताल में सिर्फ नैनी ताल नहीं, इतनी झीलें हैं, 8वीं, 9वीं, 10वीं आपने शायद ही देखी हों…

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Nainital, famously known as the City of Lakes, is home to several enchanting lakes, including Nainital Lake, Bhimtal, Naukuchiatal, Sattal, and many more. These serene bodies of water offer breathtaking views and unique attractions. Nainital district, also referred to as the District of Lakes, holds a rich history with its abundance of natural water reservoirs. Although the region once boasted sixty lakes, today, eleven picturesque lakes still captivate visitors and locals alike.

नैनीताल में जाम और पार्किंग के हल्ले से घटी नैनीताल आने वाले सैलानियों की संख्या, नैनीताल के पर्यटन की वास्तविक स्थिति पर देखें रिपोर्ट (Nainital-Crises)

Nainital-Crises, The number of tourists visiting Nainital has significantly decreased due to traffic congestion and parking issues, as reported by ‘Naveen Samachar.’ In an effort to provide an accurate assessment of the city’s tourism and traffic situation, the media outlet conducted on-ground reporting over the weekend. Several factors, such as diverted routes for vehicles, road repairs, and inconvenient parking arrangements, have contributed to the decline in tourist arrivals. The report also highlights concerns regarding online hotel bookings, illegal hotels, and the impact on traditional establishments. Furthermore, the closure of Delhi-Nainital bus services and the challenges faced by older hotels in renovating themselves have further affected the tourism industry in Nainital. Digvijay Bisht, President of the Nainital Hotel and Restaurant Association, suggests allowing vehicles with octroi stickers to enter the city directly and utilizing vacant parking spaces to alleviate congestion. Nainital tourism, Nainital tourism problems,
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Challenges faced by traditional hotels in Nainital,
Closure of Delhi-Nainital bus services and its impact on tourism,
Issues with illegal hotels in Nainital,
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नंदा देवी मेले में पशु बलि के लिए पशु वधशाला का मामला फिर चर्चा में…

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अप्रैल 2023। (The case of animal slaughter house for animal sacrifice in Nanda Devi fair again in discussion…) नगर में सामान्यता महत्वपूर्ण विषय समय बीत जाने के बाद ठीक मौके पर उठते हैं। नैनी झील में जल स्तर घटना, भूस्खलन होना पर्यटन सीजन में पार्किंग के साथ नंदा देवी मेले में … Read more