डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 28 मई 2024 (Story of Jia Rani of Uttarakhand )। देवभूमि उत्तराखंड में गौरवशाली सांस्कृतिक-धार्मिक इतिहास की अनेक कथाएं प्रसिद्ध हैं। आज हम आपको उत्तराखंड के एक ऐतिहासिक व प्रसिद्ध चरित्र ‘जनदेवी’ जिया रानी की कथा बताने जा रहे हैं, जो एक जीवित चरित्र होने के बाद भी देवी के रूप में पूजी जाती हैं और उत्तराखंड राज्य को आज भी एक सूत्र में पिरोती हैं। हरिद्वार के मायापुर से लेकर नैनीताल के रानीबाग तक आज भी उनकी स्पष्ट उपस्थिति नजर आती है और वे उत्तराखंड की लोककथाओं में रची-बसी हैं।
उन्होंने जिस तरह अपने सतीत्व के लिये अपने जीवन का उत्सर्ग किया, उस आधार पर उन्हें भारत के इतिहास में पहला जौहर दिखाने वाली रानी भी माना जाता है। साथ ही उन्होंने अपने अल्पायु पुत्र धामदेव की जगह मुगलों व तुर्कों की सेना का सामना किया, इसलिए उन्हें उत्तराखंड की ‘झांसी की रानी’ भी कहा जाता है। मौला देवी को राजमाता का दर्जा प्राप्त था। उन दिनों माता को ‘जिया’ कहा जाता था, इसलिए उनका नाम ‘जिया रानी’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। देखें रानीबाग में उत्तरायणी पर कत्यूरी वंशजों द्वारा किया जाने वाला जियारानी का जागर :
देश की तत्कालीन परिस्थितियाँ
इतिहासकारों और स्थानीय लोगों के अनुसार जिया रानी प्रख्यात उत्तराखंडी प्रेमकथा के नायक मालूशाही की दादी थीं। जिया रानी की कहानी उस दौर से शुरू होती है, जब दिल्ली में तुगलक वंश के फिरोज शाह तुगलक के निर्बल वंशज शासन कर रहे थे। उधर मध्य एशिया में स्थित समरकंद के लुटेरे शासक तैमूर लंग ने भारत की महान समृद्धि और वैभव के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था।
जब उसे यह ज्ञात हुआ कि दिल्ली में तुगलक वंश के निर्बल वंशज शासन कर रहे हैं, तो उसने भारत की समृद्धि को लूटने के उद्देश्य से आक्रमण की योजना बनाई और दिल्ली की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर भारत पर चढ़ाई कर दी। इससे उत्तर भारत में तुर्कों का प्रभाव बढ़ गया।
उत्तराखंड की तत्कालीन परिस्थितियाँ (Story of Jia Rani of Uttarakhand)
इस दौरान हरिद्वार के मायापुर में पुंडीरों का राज्य था। अमरदेव पुंडीर वहां के राजा थे। अमरदेव की पुत्री मौला देवी थीं, जो बाद में जिया रानी के नाम से विख्यात हुईं। पुंडीर राज्य के साथ ही उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ में भी तुर्कों व मुगलों के हमले लगातार होते रहते थे। ऐसे ही एक हमले में कुमाऊँ के पिथौरागढ़ के कत्यूरी राजा प्रीतम देव उर्फ पृथ्वीपाल ने अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए भेजा।
इस सहायता से उऋण होने के लिए राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह राजा प्रीतमदेव से कर दिया।इस प्रकार मौला देवी, राजा प्रीतमदेव की दूसरी रानी बनीं। मौला रानी से तीन पुत्र-धामदेव, दुला देव व ब्रह्मदेव हुए, जिनमें ब्रह्मदेव को कुछ लोग प्रीतमदेव की पहली पत्नी से जन्मा भी मानते हैं।
वर्ष 1398 में समरकंद का लुटेरा शासक तैमूर लंग मेरठ को लूटने और रौंदने के बाद हरिद्वार की ओर बढ़ रहा था। उस समय वहां वत्सराजदेव पुंडीर शासन कर रहे थे। उन्होंने वीरता से तैमूर का सामना किया, किंतु शत्रु सेना की विशाल संख्या के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उत्तर भारत में गंगा, यमुना व रामगंगा के क्षेत्र में तुर्कों का प्रभाव स्थापित हो गया। इन तुर्कों को ‘रुहेला’ या ‘रुहेलखंडी’ भी कहा जाता था। रुहेलों का राज्य विस्तार व लूटपाट के इरादे से पर्वतीय क्षेत्रों की ओर, गौला नदी के किनारे भी बढ़ रहा था।
कहा जाता है कि इस दौरान उन्होंने हरिद्वार क्षेत्र में भयानक नरसंहार किया, जबरन बड़े स्तर पर मतांतरण कराया और तत्कालीन पुंडीर राजपरिवार को भी उत्तराखंड के नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी, जहां उनके वंशज आज भी ‘मखलोगा पुंडीर’ के नाम से जाने जाते हैं।
जिया रानी ने किया कुमाऊँ के राजपूतों की सेना का गठन (Story of Jhansi ki Rani-Jia Rani of Uttarakhand)
लूटेरे तैमूर ने एक टुकड़ी आगे पहाड़ी राज्यों पर भी हमला करने के लिए भेजी। जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने फौरन इसका सामना करने के लिए कुमाऊँ के राजपूतों की एक सेना का गठन किया। तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच नैनीताल के रानीबाग क्षेत्र में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें तुर्क सेना की जबरदस्त हार हुई।
इस विजय के बाद जिया रानी के सैनिक कुछ निश्चिन्त हो गए लेकिन दूसरी तरफ से अतिरिक्त मुस्लिम सेना आ पहुँची और इस हमले में जिया रानी की सेना की हार हुई। जिया रानी एक बेहद खूबसूरत महिला थी इसलिए हमलावरों ने उनका पीछा किया और वह अपने सतीत्व की रक्षा करते हुऐ रानीबाग की एक गुफा के गुप्त मार्ग से सीधे हरिद्वार निकल गयीं। यह गुफा आज भी रानीबाग में बतायी जाती है।
जब राजा प्रीतम देव को इस हमले की सूचना मिली तो वो जिया रानी से चल रहे मनमुटाव के बावजूद स्वयं सेना लेकर आए और मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया। इसके बाद वो जिया रानी को अपने साथ पिथौरागढ़ ले गए। इस बीच प्रीतमदेव की असामयिक मृत्यु हो गयी।
बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन किया (Story of Jia Rani of Uttarakhand)
राजा प्रीतमदेव की मृत्यु के बाद उनके पुत्र धामदेव को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया, किंतु वे अल्पायु थे। इसलिए मौला देवी ने उनके संरक्षक के रूप में शासन संभाला। राजमाता होने के कारण उन्हें ‘जिया रानी’ कहा जाने लगा।
चित्रशिला के रूप में ‘जिया रानी’ रानीबाग में आज भी विद्यमान
इतिहासकारों के अनुसार मौला देवी अत्यंत सुंदर और सुनहरे केशों वाली महिला थीं। एक दिन जब वे गौला नदी के तट पर गईं, तभी तुर्कों ने उन्हें घेर लिया। मौला देवी शिवभक्त और सती थीं। उन्होंने अपने ईष्ट देव का स्मरण किया और गौला नदी की शिला में समा गईंकृइस प्रकार उन्होंने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर कर लिया।
गौला नदी के किनारे आज भी एक शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी पहनावे के रंग-बिरंगे लहंगे जैसा प्रतीत होता है। इसे ‘चित्रशिला’ कहा जाता है और इसे जिया रानी का स्मृति-चिह्न माना जाता है। आज भी मकर संक्रांति (13-14 जनवरी) के अवसर पर यहां हजारों लोग, विशेषकर कत्यूरी वंशज, एकत्र होते हैं और ‘जागर’ गाते हैं। ‘जय जिया’ के जयकारों के साथ लोग उन्हें ‘जनदेवी’ और न्याय की देवी के रूप में पूजते हैं।
रानी जिया उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत बन चुकी हैं। यह भी माना जाता है कि उनके शौर्य, बलिदान और त्याग को वह व्यापक पहचान नहीं मिल पाई, जिसकी वे वास्तव में अधिकारी हैं।
जिया रानी की जागर में नैनीताल में नयना देवी के मंदिर की स्थापना का जिक्र
कुमाऊं के लोकगायकों द्वारा चित्रशिला घाट रानीबाग में उत्तरायणी मेले के दौरान के अद्भुद जिया रानी के शौर्य एवं वीरता का उल्लेख करते हुए गाये जाने वाले जागर गीतों में नैनीताल में नयना देवी के मंदिर की स्थापना का जिक्र भी इन शब्दों में आता है- ‘उती को बसना को आयो, यो नैनीताल, नैनीताल, नैनीदेवी थापना करी छ।’
इससे लगता है कि जिया रानी ने नैनीताल में नैना देवी की स्थापना की थी। बताया जाता है कि वर्तमान बोट हाउस क्लब के पास स्थित यह प्राचीन मंदिर ही 18 सितंबर 1880 को आये महाविनाशकारी भूस्खलन की चपेट में आकर नैनी झील में समा गया था और बाद में इसके अवशेष मिलने पर वर्तमान स्थल पर नये नयना देवी मंदिर की स्थापना की गयी।
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‘डॉ.नवीन जोशी, वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले पत्रकार’ एवं मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 140 मिलियन यानी 1.40 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।

चित्रशिला के रूप में ‘जिया रानी’ रानीबाग में आज भी विद्यमान