नवीन समाचार, नैनीताल, 7 अप्रैल 2026 (Right to OBC Reservation not by Marriage।
उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि विवाह के आधार पर किसी महिला को दूसरे राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है। अदालत ने कहा कि आरक्षण का आधार जन्म और मूल निवास होता है, न कि विवाह के बाद बदला गया पता। हालांकि, न्यायालय ने यह राहत भी दी कि यदि आरक्षित पद खाली रह जाते हैं, तो अभ्यर्थी को सामान्य श्रेणी में विचार का अवसर मिल सकता है।
मामला और न्यायालय का निर्णय
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ह फैसला न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने दो याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सुनाया। याचिकाकर्ता महिला का कहना था कि वह कहार समुदाय से संबंधित है, जो उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और उत्तराखंड दोनों में ओबीसी श्रेणी में शामिल है। उसका जन्म और पालन-पोषण उत्तर प्रदेश में हुआ था, लेकिन विवाह के बाद वह उत्तराखंड आ गई और यहां से ओबीसी प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया।
वर्ष 2023 में उसने सहायक शिक्षक (प्राथमिक) पद के लिए ओबीसी आरक्षण के तहत आवेदन किया, लेकिन चयन नहीं हुआ। इसके बाद उसने 28 अक्टूबर 2024 को उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर नियुक्ति की मांग की।
राज्य सरकार की दलील और अदालत की सहमति
राज्य सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि विवाह के आधार पर किसी व्यक्ति की सामाजिक श्रेणी नहीं बदलती। आरक्षण का लाभ केवल उसी राज्य में मान्य होता है जहां व्यक्ति का जन्म और मूल निवास है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता की ओबीसी आरक्षण से नियुक्ति की मांग को खारिज कर दिया।
सामान्य श्रेणी में अवसर का रास्ता खुला
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि चयन प्रक्रिया में आरक्षित पद रिक्त रह जाते हैं, तो संबंधित अभ्यर्थी को सामान्य (General) श्रेणी में विचार किया जा सकता है। इसके लिए याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर संबंधित प्राधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन देने की अनुमति दी गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि इस पर चार महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।
अन्य राज्यों में भी समान कानूनी स्थिति
यह निर्णय केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने भी हाल ही में इसी प्रकार का फैसला सुनाया है, जिसमें स्पष्ट किया गया कि विवाह के बाद जाति या आरक्षण का अधिकार नहीं बदलता। दोनों उच्च न्यायालयों के फैसलों से यह कानूनी स्थिति और मजबूत हो गई है कि आरक्षण का आधार जन्म ही रहेगा।
सामाजिक प्रभाव और आगे की स्थिति
इस फैसले का सीधा असर उन महिलाओं पर पड़ेगा जो विवाह के बाद दूसरे राज्य में जाकर सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ लेना चाहती हैं। अब उन्हें उस राज्य में सामान्य श्रेणी में ही आवेदन करना होगा, जहां उनका जन्म नहीं हुआ है।
यह निर्णय आरक्षण व्यवस्था की मूल भावना—सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार—को बनाए रखने की दिशा में एक स्पष्ट संदेश भी देता है। आने वाले समय में भर्ती प्रक्रियाओं और प्रमाणपत्र जारी करने के नियमों में और सख्ती देखने को मिल सकती है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।














