EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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पाई हैं। इन्हीं में एक आज कुमाऊं ही नहीं उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक पहचान बन चुका प्रसिद्ध छल या छलिया और हिन्दी में छोलिया कहा जाने वाला लोकनृत्य है, जो कि मूलतः युद्ध का नृत्य बताया जाता है। एक साथ श्रृंगार और वीर रस के दर्शन कराने वाले इस नृत्य के बारे में कुछ इतिहासकारों का मत है कि सबसे पहले चंद वंश के पहले राजा सोमचंद के विवाह के अवसर पर इसका प्रयोग हुआ था, जो कि ‘कुमाऊं का इतिहास’ पुस्तक के लेखक बद्री दत्त पांडे के अनुसार 700 ईसवी में गद्दी पर बैठे थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह नृत्य चंद राजाओं की विरासत है, और इसे प्रदर्षित करने वाले ‘छलेर’ या ‘छोल्यार’ उस काल की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleइतिहास के आईने मेंनए प्रयोगढोल वादक की भी होती है बड़ी भूमिकामहाभारत की तरह युद्ध व्यूहों की झलक भी (Chholiya Dance History and Present)यह भी पढ़ें: ‘दास’ परंपरा के कलाकारों (ढोल वादकों) का नहीं कोई सुधलेवानैनीताल, कुमाऊं और उत्तराखंड की संस्कृति सम्बंधित खबरों/आलेखों के लिए यहाँ क्लिक करें।छोलिया नृत्य संबंधी कुछ और चित्र:Like this:Relatedइतिहास के आईने मेंइस यु़द्ध नृत्य के इतिहास के बारे में आसानी से समझने योग्य तथ्य है कि करीब एक हजार वर्ष पूर्व उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में भी युद्ध राजाओं की सेनाओं के बीच आमने-सामने ढाल-तलवार, भाले, बरछे, कटार आदि से लड़े जाते थे। योद्धाओं को युद्ध में प्रोत्साहित करने के लिए यहां ढोल, दमुवा (दमाऊ), बीन बाजा (मशकबीन-बैगपाईपर), तुरी (तुरही), नगार (नगाड़ा), भेरी व रणसिंघा आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता था। संभवतया दूसरे राजाओं की कन्याओं का वरण करने के लिए भी इसी तरह के युद्ध का प्रयोग किया जाता होगा, जिसका ही आधुनिक संस्करण आज का छोलिया नृत्य है।यह भी पढ़ें : खुशखबरी ! अब घर बैठे मिलेगी सत्यापित खतौनी, छह राजस्व पोर्टल शुरूहालिया दौर में जिस तरह से विवाहों में छोलिया नृत्य का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रारूप को इतिहास में लेकर जाएं तो कल्पना करना कठिन नहीं कि उस दौर में राजा अपनी सेना के साथ दूर देशों में विवाह करने जाते थे। सबसे आगे किसी युद्ध की तरह ही लाल ध्वजा सामने आने वालों को आगाह करने के लिए और सबसे पीछे सफेद ध्वजा शांति के प्रतीक स्वरूप रखी जाती थी। कन्या का वरण करने के उपरांत लौटते समय ध्वजाएं इस संदेश के साथ आपस में आगे-पीछे अदल-बदल दी जाती थीं, कि अब सामने वाले को केाई खतरा नहीं है। इस प्रथा का आज भी कुमाउनी विवाहों में निर्वहन किया जाता है। संभव है कि विवाह के लिए जाने के दौरान दूल्हे राजा के सैनिकों को कई बार दूसरे राजा के अपनी पुत्री का विवाह इस राजा से करने की अनिच्छा की स्थिति में उसके सैनिकों से कड़ा मुकाबला करना पड़ता होगा, और कई बार दूल्हे राजा के सैनिक रास्ते में आपस में ही अपनी युद्ध कला को और पैना करने के लिए आपस में ही युद्ध का अभ्यास करते हुए चलते होंगे, और धीरे-धीरे यही अभ्यास विवाह यात्राओं का एक आवश्यक अंग बन गया होगा। लेकिन देश में प्रचलित अन्य अनेकों युद्ध नृत्यों से इतर कुमाऊं के छोलिया नृत्य की एक विशिष्टता इसकी आपस में तलवार व ढाल टकराने और शरीर को मोड़कर कुछ प्रदर्शन करने से इतर इसके नाम ‘छोलिया’ नाम से जुड़ी है।‘छोलिया’ शब्द को ‘छल’ से जोड़कर देखा जाता है, जो इस नृत्य विधा में भी कई बार दिखता है। कल्पना के अनुसार प्राचीन क्षत्रिय सैनिकों जैसे ही किंतु रंग-बिरंगे विशिष्ट परिधानों-सफेद चूड़ीदार पाजामा व लम्बा घेरदार चोला, सिर पर सफेद पगड़ी, बेल्ट, सिर में पगड़ी, पैरों में घुंघरू की पट्टियां, कानों में बालियां और चेहरे पर चंदन व सिन्दूर आदि से सजे पुरुष छोलिया नर्तक बीच-बीच में एक-दूसरे पर छल करते हुए वार करने का प्रदर्शन करते हैं।वह विवाह के दौरान सामान्यतया ढाल-तलवार घुमाते हुए चलते हैं, और जगह-जगह अपने खास अंदाज में नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। वह कभी-कभार ही एक-दूसरे पर हाथ अथवा पैर से नृत्य में रोचकता लाने के लिए बल का प्रयोग करते हैं। इस दौरान देखने वाले लोग बीच में कुछ रुपए या सिक्के डालते हैं, जिन्हें छोल्यारों के द्वारा अपनी तलवार की नोक से ही उठाने का विधान है। इस दौरान उनकी भाव-भंगिमा में भी ‘छल’ का प्रदर्शन होता है।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। वह अपने हाव-भाव से एक दूसरे को छेड़ने, चिढ़ाने व उकसाने के साथ ही भय व खुशी के भाव आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करते हुए एक-दूसरे को उलझाकर, चालाकी से स्वयं रुपए उठाने का प्रयास करते हैं, जो काफी रोचक होता है। कुमाऊं में छोलिया नृत्य का प्रयोग परंपरागत तौर पर क्षत्रिय जातियों के विवाहों में ही अलग-अलग वाद्य यंत्रों के साथ आधे से दो दर्जन तक कलाकारों के समूह के साथ किया जाता रहा है, जबकि जबकि ब्राह्मणों की बारातें शंख की ध्वनि करते हुए ही जाया करती थीं।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के 7 राजकीय मेडिकल कॉलेजों में 365 असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती का प्रस्ताव, जल्द चयन बोर्ड को भेजा जाएगा अधियाचन...नए प्रयोगइधर नृत्य में रोचकता लाने के लिए छोलिया नृत्य में एक दूसरे के कंधों पर चढ़कर व कमर पर पैरों का फंदा डालते हुए लटककर मीनार बनाने सरीखे प्रयोग भी किये जा रहे हैं। कुमाऊं के अलग-अलग क्षेत्रों के छोलिया नृत्यों की भी अपनी अलग विशिष्टताएं हैं। पाली पछाऊं में प्रचलित छोलिया नृत्य में छोल्यार पारम्परिक परिधानों की जगह सफेद कपड़े पहनकर हाथों में लंबी तलवारें और गैंडे की खाल से बने ढाल पकड़कर नगाड़े की थाप पर थिरकते हैं। स्थानीय भाषा में इस युद्ध को ‘सरकार’ कहा जाता है।ढोल वादक की भी होती है बड़ी भूमिकाकुमाऊं मंडल ही नहीं उत्तराखंड प्रदेश में ढोल वादन भी एक अन्य बड़ा व महत्वपूर्ण विषय है। बीते दौर में परंपरागत तौर पर युद्ध भूमि में दरबारी दास द्वारा तथा मौजूदा दौर में देव मंदिरों और शादी-व्याह और कमोबेश सभी संस्कारों, त्योहारों में ढोल वादन के अलग-अलग व विशिष्ट तरीके हैं। लोक विद्वानों के अनुसार ढोल वादक वीरों के उत्साह वर्धन के साथ ही युद्ध कला में भी प्रवीण होते थे।वह युद्ध भूमि में अपने राजा की सेना की स्थिति पर पूरी दृष्टि रखता था, और जरूरत के अनुसार सेना को आगे बढने या या पीछे हटने अथवा किसी विशेष दिशा में बढने तथा युद्ध जीतने के लिये सेना के लिए जरूरी व्यूह रचना ढोल वादन के गुप्त संकेतों के जरिए प्रकट करते थे।महाभारत की तरह युद्ध व्यूहों की झलक भी (Chholiya Dance History and Present)महाभारत के “चक्रव्यूह“ की तरह पर्वतीय क्षेत्रो में ‘गरुड व्यूह’, ‘मयूर व्यूह’ व ‘सर्प व्यूह’ आदि की रचना करने के प्रमाण भी मिलते हैं। इस दौरान ढोल वादक गंगोलिया बाजा, हिटुवा बाजा, बधाई का बाजा, दुल्हन के घर पर पहुंचने का बाजा, वापस गांव की सीमा पर बजने वाला बाजा आदि अलग-अलग प्रकार के बाजे बजाते हैं। इस दौरान आम बाराती हाथों में रुमाल लेकर कलात्मक नृत्य करते हैं, जो एक अलग आकर्षण होता है।यह भी पढ़ें : पति प्रताड़ित करता था तो कैसे साथ गुजार दिए 11 साल ? न्यायालय ने आरोपित फौजी पति को किया दहेज उत्पीड़न के आरोपों से दोषमुक्त....यह भी पढ़ें: ‘दास’ परंपरा के कलाकारों (ढोल वादकों) का नहीं कोई सुधलेवाकुमाऊं-उत्तराखंड की सांस्कृतिक खूबसूरती विश्व धरोहर स्मारक बनने की ओर जागेश्वर, देश की 25 पुरातात्त्विक धरोहरों में हुआ शामिल दुबई में 19 से 21 दिसंबर तक उत्तराखंडी कौथिग का सफलता पूर्वक मंचन कुमाऊं में ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप में मनाई जाती थी परंपरागत दीपावलीसच्चा न्याय दिलाने वाली माता कोटगाड़ी: जहां कालिया नाग को भी मिला था अभयदान ‘खतडु़वा’ आया, संग में सर्दियां लाया नेपाली, तिब्बती, पैगोडा, गौथिक व ग्वालियर शैली में बना है नयना देवी मंदिर देवभूमि के कण-कण में देवत्वस्वामी विवेकानंद का ‘बोध गया’: काकड़ीघाटमां नयना की नगरी में होती है मां नंदा की ‘लोक जात’पाषाण देवी शक्तिपीठः जहां घी, दूध का भोग करती हैं सिंदूर सजी मां वैष्णवीकुमाऊं में है महर्षि मार्कंडेय का आश्रमआदि गुरु शंकराचार्य का उत्तराखंड में पहला पड़ावः कालीचौड़ मंदिरदेवीधूरा की बग्वालः जहां लोक हित में पत्थरों से अपना लहू बहाते हैं लोगबाबा नीब करौरी का कैंची धामः जहां बाबा करते हैं भक्तों से बातेंलोक देवताओं की विधान सभा है ब्यानधूरा मंदिरउत्तराखंड का प्राचीन इतिहास, ताकि सनद रहे…उत्तराखंड में भी गूंजे थे जंगे आजादी के ‘गदर’ में विद्रोह के स्वरउत्तराखंड विचारः कुछ खट्टा-कुछ मीठाउत्तराखंड में 1400 वर्ष पुराना है श्रमिक आंदोलनों का इतिहासउत्तराखंड का कल्पवृक्ष है इंडियन बटर ट्री-च्यूराबुरांश: जंगल की ज्वाला संग मुस्काया पहाड़इस वर्ष समय पर खिला राज्य वृक्ष बुरांशभैया यह का फल है, जी यह ‘काफल’ ही है.बाखलीः पहाड़ की परंपरागत हाउसिंग कालोनीहरेलाः लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रये, जागि रयेउत्तराखंड में अनूठी है भाई-बहन के प्रेम की ‘भिटौली’ परंपराहोली छाई ऐसी झकझोर कुमूं मेंकुमाऊं का ऋतु पर्व ही नहीं, ऐतिहासिक व लोक सांस्कृतिक पर्व भी है उत्तरायणीश्री नंदादेवी राजजात से कुमाऊं गढ़वाल दोनों के राज परिवार संतुष्ट नहींकैलाश मानसरोवर यात्रा ने छुवा रिकार्ड का नया ‘शिखर’आड़ू, बेड़ू जैसा नहीं घिंघारूनैनीताल, कुमाऊं और उत्तराखंड की संस्कृति सम्बंधित खबरों/आलेखों के लिए यहाँ क्लिक 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