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नैनीताल हाई कोर्ट को अन्यत्र ले जाने की मुहिम के पीछे ‘यह’ तथा प्रधानमंत्री तक पहुंच रखने वाले एक नेता जी हैं कारण

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-कुमाऊं के राजनीतिक स्तर पर पिछड़ने को बताया जा रहा है कारण

उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर मांगे गए सुझावों का नोटिफिकेशन।

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 अक्तूबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित किये जाने के पीछे कुमाऊं के राजनीतिक स्तर पर पिछड़ने और प्रधानमंत्री तक पहुंच रखने वाले एक भाजपा नेता को कारण बताया जा रहा है। मामला मुख्य न्यायाधीश के स्तर से उठने के बाद अब इस मुद्दे पर स्थानीय अधिवक्ता कुछ भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं। अलबत्ता उनका कहना है कि राज्य मंत्रिमंडल में कुमाऊं मंडल की कहने भर की उपस्थिति, नैनीताल सहित मंडल के 6 में से पांच जनपदों से एक भी मंत्री का न होना इसके पीछे बड़ा कारण है। ऐसी स्थितियों में सत्तारूढ़ भाजपा के केंद्र के साथ राज्य की अंदरूनी राजनीति में भी सक्रिय व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंच रखने वाले एक भाजपा नेता को उच्च न्यायालय को नैनीताल से बाहर ले जाने के पीछे बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से भी इस बाबत कोई पत्र आया है, परंतु इस पर खुलकर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। नैनीताल से उच्च न्यायालय के जाने से राज्य गठन के समय देहरादून को अस्थाई राजधानी बनाते समय क्षेत्रीय संतुलन के लिए नैनीताल में उच्च न्यायालय बनाये जाने का संतुलन बिगड़ सकता है।
यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व में कांग्रेस सरकार के दौर में भी इस तरह की कवायद शुरू हुई थी, किंतु तब जनपद से आने वाली काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश ने इस तरह के प्रयासों को नाकाम कर दिया था, किंतु अब कोई इसके खिलाफ बोलने वाला नहीं है। अधिवक्ताओं तक यह भी संदेश चला गया है कि यदि नैनीताल से उच्च न्यायालय नहीं जाने देंगे तो इसकी बेंच दूसरे मंडल में भेज दी जाएगी। पिछले दिनों उच्च न्यायालय की वेबसाइट से ली गई जनता की राय में उच्च न्यायालय को जनपद के रानीबाग स्थित बंद पड़ी एचएमटी फैक्टरी में ले जाने की अधिसंख्य रायें आई थीं, किंतु अब इस पर भी बात नहीं बन रही, और उच्च न्यायालय इस कवायद के पीछे मौजूद नेता के क्षेत्र में, नैनीताल जनपद के पर्वतीय क्षेत्र से बाहर कहीं जा सकता है। इससे स्थायी राजधानी को गैरसेंण में स्थापित करने की पर्वतीय राज्य की अवधारणा पर भी कुठाराघात हो सकता है।

यह भी पढ़ें : तो उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करने को शुरू हुई ‘निर्णायक पहल’! बेंच की पहल के बाद बार भी इस मुद्दे पर हुआ संजीदा !!

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 अक्तूबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित करने का मामला एक बार फिर उठ गया है। और इस बार मामले के अधिक गंभीरता से और निर्णायक स्तर तक पहुंचने की बातें कही जा रही हैं। आने वाले समय में मामले के गरमाने और निर्णायक स्तर तक पहुंचने के पूरे आसार हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक इस मामले से अपना अलग मत लेकर चल रहे हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को भी इसके पक्ष में लेने के प्रयास स्वयं बेंच की ओर से शुरू हुए हैं। इसके लिए नैनीताल में स्थान की कमी की बात कही जा रही है। बेंच की ओर से ऐसे प्रयास किये जाने के बाद बार भी इस मामले में संजीदा होती और अपने रुख में बदलाव कर सकती है, ऐसी संभावना बनती नजर आ रही है। बताया गया है कि मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन ने उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं तथा बार के पदाधिकारियों के साथ इस विषय में बात की, और नैनीताल में स्थान की कमी की बात रखते हुए सर्वसम्मति से वैकल्पिक स्थान का चयन करने की बात कही। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के शुरू में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं बार के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत ने स्थान की कमी, मौसम, यातायात व आवागमन के साधन, पर्यटन स्थल, महंगाई आदि अनेक बिंदुओं को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय को रानीबाग स्थित एचएमटी घड़ी फैक्टरी में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया था, जिस पर उच्च न्यायालय ने अपनी वेबसाइट के जरिये आम लोगों से इस बारे में सुझाव मांग लिये थे। ताजा कदम को इसी कड़ी में अगला कदम माना जा रहा है।

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-कहा-हाईकोर्ट पर स्थिति स्पष्ट करे सरकार, बताया गैरसेंण-भराणीसेंण में राजधानी व हाईकोर्ट के लिए पर्याप्त स्थान है
-पूछा-हाईकोर्ट नैनीताल में होना कानूनी किंतु 18 वर्ष बाद भी राज्य की स्थायी राजधानी पर क्यों स्पष्टता नहीं है

हाईकोर्ट बार एवं राजधानी के मुद्दे पर पत्रकार वार्ता करते पूर्व सांसद व वरिष्ठ अधिवक्ता डा. महेंद्र पाल व अन्य अधिवक्ता।

नवीन समाचार, नैनीताल, 5 जुलाई 2019। दो बार के पूर्व सांसद, बार काउंसिल ऑफ इडिया व हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता डा. महेंद्र सिंह पाल की अगुवाई में अधिवक्ताओं के एक वर्ग ने शुक्रवार को पत्रकार वार्ता कर उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा कानूनी तौर तौर नोटिफिकेशन के साथ राज्य बनने के बाद से नैनीताल में स्थापित उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थापित करने के लिए सुझाव आमंत्रित किये जाने पर नाराजगी व्यक्त की, एवं सवाल उठाया कि 18 वर्ष के बाद ही राज्य की स्थायी राजधानी पर कानूनन स्थिति साफ नहीं है। बावजूद इस पर सभी मौन क्यों हैं। क्यों राज्य की अवधारणा से जुड़े व राज्य आंदोलन के केंद्र गैरसेंण के विषय को जनहित याचिका की तरह नहीं लिया जाता है। राज्य सरकार की ओर से उच्च न्यायालय के स्थानांतरण के मुद्दे पर अब तक कोई बयान भी नहीं आने का हवाला देते हुए सरकार से इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया। साथ ही कहा कि सरकार पहले राज्य की स्थायी राजधानी पर स्थिति स्पष्ट करे। गैरसेंण-भराड़ीसेंण में सरकार के पास 500 हैक्टेयर भूमि है जो राज्य की स्थायी राजधानी के साथ ही उच्च न्यायालय की स्थापना के लिए भी पर्याप्त है। लिहाजा यदि उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित किया जाता है तो इसे दीर्घकालीन कार्ययोजना बनाकर राज्य की स्थायी राजधानी के साथ गैरसेंण में स्थापित किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट बार सभागार में शुक्रवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में डा. पाल ने कहा कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने परोक्ष तौर पर और मौजूदा भाजपा सरकार ने अपने घोषणापत्र में गैरसेंण में राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसेंण में स्थापित करने की बात कही है, बावजूद गैरसेंण के प्रति सरकार गंभीर नहीं दिखती। आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता के पत्र को उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड कर और इस पर जनता के सुझाव मांगकर मात्र खलबली मचाने का कार्य किया गया है। वहीं त्रिभुवन फर्त्याल ने कहा कि गैरसेंण को राज्य की अवधारणा के विपरीत अपनी जरूरतों व क्षमताओं के अनुरूप राजधानी बनाने से इतर केवल घूमने की ऐशगाह बना दिया गया है। इस मुद्दे पर जनता को फिर से सड़क पर आने की जरूरत है। भुवनेश जोशी ने कहा कि पर्वतीय राज्य की राजधानी व उच्च न्यायालय सहित सभी प्रमुख निदेशालय पर्वतीय क्षेत्र में बनाने की राज्य निर्माण की अवधारणा थी। लेकिन अधिकांश विभागों के निदेशालय मैदानी क्षेत्रों में ले जाये जा चुके हैं। राज्य की सरकारें कभी इस भावना पर गंभीर नहीं रहीं, जबकि यूपी के दौर में 1991 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दौर में पौड़ी व अल्मोड़ा में ढाई-ढाई हजार नाली भूमि पर्वतीय विकास के लिए मिनी सचिवालय बनाने हेतु जमीन अधिग्रहीत की गयी थी। इस मौके पर राम सिंह सम्भल, मनोज राय, एमएस भंडारी, योगेश पचौली, जेसी कर्नाटक, जेपीएस टाकुली, नवनीश नेगी, प्रेम कौशल, प्रतिरूप पांडे, सुहाष जोशी, निशात इंतजार, सरिता बिष्ट, भूपेंद्र भंडारी, अत्रि अधिकारी, गीता आर्या सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता मौजूद रहे, परंतु हाईकोर्ट की निर्वाचित बार एसोसिएशन की ओर से दूरी बनाये रखी गयी।

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नवीन समाचार, देहरादून, 30 जून 2019। गढ़वाल मण्डल में नैनीताल हाईकोर्ट की बैंच की मांग को एक बार फिर अधिवक्ता जोरशोर से उठाने की तैयारी में है। हाईकोर्ट के आश्वासन के बाद अधिवक्ताओं ने चार सप्ताह तक शनिवार की हड़ताल को फिलहाल स्थगित कर रखा था, परन्तु हाईकोर्ट द्वारा मामले का संज्ञान न लेने पर दोबारा हड़ताल का निर्णय लिया गया है। शनिवार को बार एसोसिएशन देहरादून के सभागार में एक बैठक का आयोजन किया गया। जिसमें गढ़वाल मंडल में हाईकोर्ट की बेंच को लेकर कई वर्षों से चले आ रहे अधिवक्ताओं के आंदोलन को लेकर रणनीति तय की गई। हाईकोर्ट के आश्वासन पर पूर्व में 4 सप्ताह के लिए शनिवार की हड़ताल को स्थगित कर दिया गया था, जिसमें बार एसोसिएशन देहरादून को समर्थन देते हुए बार एसोसिएशन हरिद्वार,ऋषिकेश व विकासनगर ने भी अपने आंदोलन को स्थगित कर दिया था। चार सप्ताह बीतने के बाद भी हाईकोर्ट द्वारा इस विषय का कोई संज्ञान न लेने के कारण अधिवक्ताओं ने फिर से आंदोलन का निर्णय लिया है, जिसके तहत शनिवार को पूर्व की तरह हड़ताल रखी जाएगी। इस अवसर पर बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड के चेयरमेन सुरेन्द्र पुण्डीर, बार एसोसिएशन देहरादून के अध्यक्ष मनमोहन कंडवाल, बार एसोसिएशन हरिद्वार के अध्यक्ष जसमहेन्द्र सिंह, सचिव सुशील सैनी, उपाध्यक्ष राजेश सिन्हा, बार एसोसिएशन ऋषिकेश के अध्यक्ष राजेन्द्र सजवाण, सचिव नरेश शर्मा, बार एसोसिएशन विकासनगर के अध्यक्ष संदीप बड़वाल, सचिव अमित चौहान, उपाध्यक्ष रफाकत खान, बार एसोसिएशन टिहरी के अध्यक्ष शांति प्रसाद भट्ट समेत दून बार एसोसिएशन के राकेश गुप्ता, अनिल पंडित, योगेंद्र तोमर, राजबीर सिंह बिष्ट, रंजन सोलंकी, मुन्फेद अली व बार एसोसिएशन के (सचिव) अनिल शर्मा ,अरुण खन्ना, अमित डंगवाल, ललित भंडारी, काली प्रसाद भट्ट, प्रियंका रानी, अल्पना जदली आदि अधिवक्ता उपस्थित रहे।

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हाईकोर्ट परेशानी के बावजूद नैनीताल में रहे: कंसलनवीन समाचार, नैनीताल, 25 जून 2019। जिला बार ने नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने के मुद्दे पर मंगलवार को आम सभा की। बार अध्यक्ष हरिशंकर कंसल ने हाईकोर्ट की स्थापना में जिला बार की भूमिका पर प्रकाश डाला। कहा कि कुछ परेशानियों के बावजूद हाईकोर्ट को नैनीताल से अन्यत्र शिफ्ट करने को सही नहीं ठहराया जा सकता है। इस मौके पर कई सदस्यों ने हाईकोर्ट के रानीबाग शिफ्ट करने के पक्ष में भी राय जाहिर की। बार के सभागार में हुई सभा को संबोधित करते हुए अध्यक्ष कंसल ने राज्य गठन के समय हाईकोर्ट के लिए की गई पहल का ब्यौरा रखा। बताया कि अल्मोड़ा में कुमाऊं की सभी बार की बैठक में सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में हाईकोर्ट की स्थापना की राय सामने आई, लेकिन बाद में सर्वसम्मति से नैनीताल पर आम राय बनी। कहा कि होटल के साथ ही सभी संबंधित संगठनों की सहमति पर ही यहां हाईकोर्ट स्थापित हुआ है। उन्होंने दिल्ली में तत्कालीन केंद्र सरकार के स्तर पर उनके और डॉ. महेंद्र पाल के स्तर पर नैनीताल के लिए की गई पैरवी को भी सदस्यों के सम्मुख रखा। कंसल ने कहा कि सदस्यों ने इसके चलते हो रही परेशानी को रखा है, लेकिन उनका मानना है कि हाईकोर्ट के रहने के लाभ अधिक हैं। आशंका जताई कि शिफ्ट की स्थिति आने पर देहरादून विकल्प बनाया जा सकता है। वहीँ जिला बार की सभा में कई वक्ता हाईकोर्ट के शिफ्ट करने के प्रस्ताव के पक्ष में भी रहे। उन्होंने कहा कि नैनीताल जैसे पर्यटक स्थल में हाईकोर्ट के रहने से कई परेशानियां हो रही हैं। हाईकोर्ट ने अपनी वेबसाइट में इससे लिए सुझाव मांगकर न्यायसंगत कार्य किया है। उन्होंने कहा कि नगर जनदबाव के सहने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में नैनीताल तहसील के अंतर्गत रानीबाग में हाईकोर्ट शिफ्ट करने की पहल जनहित में सही साबित होगी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद बार ने कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं किया, लेकिन अध्यक्ष कंसल ने दावा किया कि बहुमत हाईकोर्ट के नैनीताल बने रहने के साथ है।

(‘नवीन समाचार’ उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा मांगे गये सुझाव के अंतर्गत इस बेहद संवेदनशील विषय पर अपने पाठकों के विचारों को प्रकाशित करेगा। इस कड़ी में आज नैनीताल के बसंत सिंह राणा के विचार पेश हैं। आप भी हमें अपने विचार भेजें। यथासंभव प्रकाशित किये जाएंगे)

हाईकोर्ट के स्थानांतरण पर ‘पलायन’ को लेकर बड़ा सवाल

सुविधाओं के अभाव में अब तक तो सिर्फ पहाड़ के लोग ही पलायन कर रहे थे, तो अब क्या हाईकोर्ट जैसे शक्तिशाली संस्थान को भी पलायन करना पड़ रहा है ? क्या ज्युडिशरी और सरकार वो सभी सुविधाएं नैनीताल शहर को नहीं दे सकती हैं जिसके कारण अब हाईकोर्ट भी पलायन करना चाह रहा है ? क्या हम नैनीताल शहर के वासी न सभी सुविधाओं के हकदार नहीं हैं जिसकी वजह से हाईकोर्ट पलायन चाह रहा है ?
-बसंत सिंह राणा, नैनीताल।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 24 जून 2019। नैनीताल होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करने के बाबत अपने सुझाव दिये हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेश साह की ओर से लिखे गये पत्र में मुख्य न्यायाधीश का इस महत्वपूर्ण विषय को जन सामान्य के समक्ष रखने पर आभार जताया गया है। आगे पत्र में कहा गया है कि नैनीताल एक ऐतिहासिक शहर है और इसकी 90 फीसद आबादी सीधे अथवा परोक्ष तौर पर पर्यटन पर निर्भर करती है। पर्यटन राज्य का बड़े रोजगार अवसर एवं राजस्व प्रदान करने वाला क्षेत्र है। नैनीताल नगर पालिका को लेक ब्रिज चुंगी, पार्किंग एवं सरकार के वन विभाग को चिड़ियाघर तथा कुमाऊं मंडल विकास निगम जैसे अर्ध सरकारी उपक्रमों को रोपवे, केव गार्डन आदि की आय भी पर्यटन से ही आती है। नैनीताल के पर्यटन से ही निकटवर्ती मुक्तेश्वर, रामगढ़, भीमताल, सातताल, रानीखेत व अल्मोड़ा आदि भी लाभांन्वित होते है। दूसरे नैनीताल शहर की पहचान इसके शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी है। पूरी दुनिया के छात्र यहां से शिक्षित होते आये हैं, एवं इस क्षेत्र ने भी बड़ी मात्रा में रोजगार दिये हैं। नगर की तीसरी विशेषता यहां कुमाऊं मंडल की कमिश्नरी, जिला मुख्यालय के रूप में जिले व मंडल के महत्वपूर्ण कार्यालय एवं उत्तराखंड प्रशासन अकादमी जैसे कार्यालय हैं। दूसरी ओर सहाय कमेटी की सिफारिशों में कहा गया है, ‘नैनीताल नगर क्षेत्र में कोई भी नया कार्यालय स्थापित नहीं होगा, और इसे केवल पर्यटन नगर के रूप में रखा जाए। शहर के बाहर ‘सेटेलाइट टाउन’ विकसित हों।’ इस कारण ही यहां से अनेकों कार्यालय विकास भवन भीमताल एवं हल्द्वानी आदि शहरों को स्थानांतरित हुए हैं। नगर की उपरोक्त तीन व्यवस्था करीब 100 वर्षों से हैं और कुछ को 150 वर्ष भी हो चुके हैं।
नौ नवंबर 2000 को अलग उत्तराखंड राज्य बनने पर प्रदेश के कुमाऊं एवं गढ़वाल मंडलों में क्षेत्रीय संतुलन के दृष्टिगत, एवं कई अनुभवी लोगों की इस मान्यता के विपरीत कि शहर ऐसे बड़े संस्थान के उपयुक्त नहीं है, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के रूप में नैनीताल को चौथी बड़ी पहचान मिली। नया राज्य बनने के उत्साह में आशंकाओं को अनसुना कर उत्तराखंड उच्च न्यायालय को 10-11 सितंबर 1953, 4 से 6 व 11-12 मार्च 1988 आदि को बड़े भूस्खलन झेल चुके एवं 4 अक्तूबर 1930 व 26 दिसंबर 1953 के शासकीय गजटों एवं ब्रजेंद्र सहाय कमेटी की 1995 में आई रिपोर्टो में ‘असुरक्षित’ घोषित एपं 5 जुलाई 1988 को नैना पीक के नीचे के पूरे क्षेत्र को खाली कराने के आदेश के बावजूद तत्कालीन सेक्रेटरियेट एवं ब्रुक हिल के भवनों में स्थापित किया गया। लिहाजा उच्च न्यायालय का क्षेत्र खतरे में हैं। बावजूद उच्च न्यायालय को भविष्य में और अधिक विस्तार की भी आवश्यकता है। पत्र में कहा गया है कि 11.73 वर्ग किमी क्षेत्रफल के नैनीताल शहर में 5 वर्ग किमी क्षेत्र आरक्षित वन क्षेत्र, 3.65 वर्ग किमी में नैनी झील, करीब 2 वर्ग किमी में विभिन्न सरकारी कार्यालय एवं केवल 1.08 वर्ग किमी में नगर के बाजार, होटल, बैंक, सड़कें व आवासीय क्षेत्र हैं, जबकि निकट के सैनिक स्कूल घोड़ाखाल के पास ही 2 वर्ग किमी का परिसर है। बावजूद सभी आरोप इसी 1.08 वर्ग किमी के क्षेत्र पर लगते हैं। पत्र में नगर में बढ़ती वाहनों की संख्या, गुणवत्तायुक्त पर्यटकों की संख्या में निरंतर आ रही कमी एवं स्थान व पार्किंग स्थलों की कमी का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उन्हें खुशी है कि उच्च न्यायालय नैनीताल नगर में है, किंतु नगर में नये निर्माणों की कीमत मैदानी क्षेत्रों से काफी अधिक होने और उच्च न्यायालय में स्थान की काफी कमी होने व नये विस्तार की आवश्यकताओं को देखते हुए उन्हें लगता है कि उच्च न्यायालय नैनीताल जनपद में ही ऐसे अधिक सुविधाजनक स्थान पर होना चाहिए जहां अधिवक्ताओं एवं वादकारियों के आवास, चैंबर, पार्किंग आदि के लिए विस्तार की संभावना हो और रेल, सड़क व हवाई यातायात की सुविधा से युक्त हो। पत्र की प्रतियां देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री, प्रदेश की राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं राज्य के कानून मंत्री को भी भेजी गयी हैं।

उत्तराखंड हाई कोर्ट के स्थानांतरण पर पढ़ें अखिल साह का सुझाव, आप भी दें अपना सुझाव, यहां प्रकाशित होगा…

रानीबाग स्थानांतरित हो उच्च न्यायालय 

माननीय उच्च न्यायालय के स्थानांतरण हेतु मेरा सुझाव है कि उच्च न्यायालय रानीबाग शिफ्ट होना चाहिए। वो रेलवे स्टेशन काठगोदाम के बेहद करीब है एवं बेहतर शिक्षा व स्वास्थ सुविधाएं भी हैं। विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल नैनीताल भी करीब होने से उच्च न्यायालय आने वाले पर्यटन का आनंद भी ले सकते हैं।
-अखिल साह विभागाध्यक्ष-आईटी, कूर्मांचल बैंक, नैनीताल.

हाईकोर्ट बार का ध्वनिमत से ऐलान- नैनीताल में ही रहे हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 जून 2019। नैनीताल हाईकोर्ट को अन्यत्र स्थापित करने के लिये वेबसाइट पर सुझाव मांगने के क्रम में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की बैठक शुक्रवार को भी जारी रही। इसमें हाईकोर्ट के नैनीताल में रहने की पुरजोर तरीके से वकालत की। हालांकि कुछ ने सर्दियों में रानीबाग में वैकल्पित व्यवस्था का पक्ष रखा। इस दौरान अधिक्ताओं ने एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए। हाईकोर्ट बार सभागार में हुई बैठक में शुक्रवार को वक्ताओं ने कहा कि 18 वर्ष की हाईकोर्ट में अब तक कई प्रत्यावेदन या पत्र आदि आए होंगे। इसमें से कितनों पर इतनी गंभीरता से कवायद हुई, लेकिन इस बार मामले को वेबसाइट में डालने तक की नौबत कैसे आ गई। हाई कोर्ट को अन्यत्र शिफ्ट करने के मामले में हाई कोर्ट की ओर से वेबसाइट के माध्यम से जनता से सुझाव मांगने के मामले में हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारी चीफ जस्टिस से मिलकर सुझाव पत्र को वेबसाइट से डिलीट करने की मांग करेंगे। ऐसा नहीं होने पर बार एसोसिएशन फिर भावी कदम उठाएगा। एसोसिएशन ने एकमत से हाई कोर्ट को शिफ्ट करने का विरोध किया। साथ ही कहा कि न्यायपालिका में राजनीति और कूटनीति नहीं होनी चाहिए। इस अवसर पर पूर्व अध्यक्ष ललित बेलवाल, नदीम मून, पुष्पा जोशी, श्रुति जोशी, भुवनेश जोशी, राजेश जोशी, विजय भट्ट, विरेंद्र अधिकारी, पीएस सौन, एसएस सौन, प्रमोद बेलवाल, कमलेश तिवारी, मनोज भट्ट, गीता परिहार, पीयूष गर्ग समेत अन्य अधिवक्ता मौजूद थे।

गौलापार, हल्द्वानी शिफ्ट हो हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ रोड व ट्रेन की connectivity हो, वाद करियो को सस्ता खाना, रहना मिले, आने जाने में सुविधा हो। साथ ही advocate को भी आसानी से आवास व पार्किंग मिले। नैनिताल मे जगह की कमी है। पर्किग व्यस्था नहीं है। भूगर्भ शास्त्रियों की रिपोर्ट के अनुसार जनसन्ख्या के अधिक दवाब के कारण  बलिया नाले में लगातार भू स्खलन हो रहा है। लोवर मॉल रोड बार बार टूट रही है। पानी की कमी होती जा रही है। advocate व वादकरियो की कम से कम 2000 गाड़िया शहर मे रोज प्रवेश करती है। हाई कोर्ट नैनीताल के आस पास की जगह जैसे गौलापार, हल्द्वानी शिफ्ट होने पर नैनीताल मे दबाब कम होगा, पानी की किल्लत कम होगी। वादकरियो को सस्ता भोजन व आवास की सुविधाएं मिलेगी। बलिया नाले व माल रोड से  दबाब कम होगा, लोकल लोगो की रोजी रोटी भी प्रभवित नहीं होगी। वैसे भी disposed of फाइल्स की संख्या बढ़ती जा रही है। रिकॉर्ड रूम के लिए और जगह चाहिए, जजो कि संख्या बढ़ती जा रही है हाई कोर्ट को फैलने के लिए जगह चाहिए, अतः लखनऊ की तरह एक नया व बड़ा  हाई कोर्ट चाहिए। अशोक साह (पूर्व आईबी अधिकारी )

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट के स्थानांतरण पर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने दिया गजब का तर्क, कहा पर्वतीय नगर नैनीताल में हो पर्वतीय राज्य का हाईकोर्ट….

-हाईकोर्ट को अन्यत्र स्थापित किये जाने पर बार एसोसिएशन ने जताया ‘घोर विरोध’

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 जून 2019। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने के लिए उच्च न्यायालय की वेबसाइट में जनता से सुझाव मांगे पर ‘घोर विरोध’ जताया गया। बृहस्पतिवार को बार के अध्यक्ष पूरन सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में आयोजित हुई बैठक में अधिवक्ताओं ने कहा कि हाईकोर्ट को नैनीताल में स्थापित किये जाने के समय भी जनता से राय मांगी गयी थी, जिसमें जनता ने नैनीताल में उच्च न्यायालय स्थापित किये जाने के लिए अपनी सहमति दी थी। पर्वतीय राज्य का उच्च न्यायालय पर्वतीय क्षेत्र में ही और नैनीताल में ही रहना चाहिए। संचालन महासचिव जयवर्धन कांडपाल ने किया। बैठक में विपुल पैन्यूली, श्रुति जोशी, चेतन जोशी, भुवनेश जोशी, राजेश कुमार जोशी, डा. एमएस पाल, पुष्पा जोशी, डीएस मेहता, सैयद नदीम खुर्शीद, पीएस सौन, टीएस फर्त्याल, सीके शर्मा, सीएस रावत, योगेश पचौलिया, जगदीश बिष्ट, टीपीएस टाकुली, कमलेश तिवारी, बीबी शर्मा, देवेश बिश्नोई, पीएस रावत व डीके त्यागी सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता मौजूद रहे। बताया गया है कि बैठक शुक्रवार को भी जारी रहेगी। बैठक में हाईकोर्ट में उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थापित करने की मांग करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी कांडपाल भी मौजूद रहे, परंतु आज उन्होंने विचार व्यक्त नहीं किये।

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बोले-हाईकोर्ट का बंटवारा न हो, हल्द्वानी-काठगोदाम के निकट बने हाईकोर्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 17 जून 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय नैनीताल द्वारा खुद को अन्यत्र स्थानांतरित करने के लिए मांगे जाने पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केएस राणा ने भी अपने सुझाव उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भेज दिये हैं। प्रेस को भी जारी सुझावों में कुलपति प्रो. राणा ने कहा है कि उत्तर प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहे नैनीताल का उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वजह से सौंदर्य प्रभावित होता है। देहरादून में इसकी शाखा बनाने या संपूर्ण न्यायालय ले जाने का प्रश्न उठना भी कुमाऊं मंडल के साथ अन्याय होगा। इसका विकल्प नगर में बहुमंजिला पार्किंग हो सकता है। लेकिन यदि इसे बाहर ले जाना ही हो तो इसे शहर से बाहर हल्द्वानी या काठगोदाम तक रोडवेज एवं रेलवे स्टेशन के निकट या लिंक रोड के किनारे के किसी स्थान पर ले जाया जाना समीचीन होगा।

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-वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी कांडपाल ने 11 जनवरी 2019 को मुख्य न्यायाधीश पत्र भेजकर की थी नैनीताल से हाईकोर्ट को हटाकर एचएमटी फैक्टरी रानीबाग में स्थापित करने की मांग

उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर मांगे गए सुझावों का नोटिफिकेशन।

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 जून 2019। पर्यटन नगरी नैनीताल से उत्तराखंड उच्च न्यायालय को हटाने की मांग गाहे-बगाहे विभिन्न स्तरों से पूर्व में ही उठती रही है, किंतु पहली बार उच्च न्यायालय की ओर से इस दिशा में पहल करते हुए वेबसाइट पर लोगों से इस संबंध में सुझाव मांगे गये हैं। दरअसल उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी कांडपाल ने गत 11 जनवरी 2019 को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ‘नैनीताल उच्च न्यायालय की कठिन भौगोलिक स्थितियों’ का हवाला देते हुए पत्र लिखा था और पत्र में नैनीताल उच्च न्यायालय को जनपद के ही रानीबाग स्थित बंद पड़ी एचएमटी घड़ी फैक्टरी में स्थानांतरित करने की मांग की गयी थी। इस हेतु उच्च न्यायालय के द्वारा अपने ईमेल highcourt-ua.nic.in पर सुझाव मांगे गये हैं।
पत्र में नैनीताल नगर को पर्यटन नगरी बताते हुए कहा है कि वास्तव में अंग्रेजों ने राज करने व अपने व्यक्तिगत जीवन का आनंद लेने के लिए बसाया था और इसे अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। कहा है कि नगर में वर्ष में 7-8 माह अत्यधिक ठंड या भूस्खलनों का मौसम रहता है। पर्यटन नगर होने के कारण यहां होटलों की दरें भी अधिक हैं, लिहाजा न्याय के लिए यहां आने वाले वादकारियों को रहने व खाने के नाम पर अनावश्यक रूप से ‘लूटा’ जाता हैं। नगर रेल से जुड़ा नहीं है। काठगोदाम से पर्याप्त आवागमन की सुविधाएं भी नहीं हैं। इस कारण 90 फीसद यात्रियों को महंगी टैक्सियों से आना पड़ता है, और 40 किमी के लिए 500 रुपए प्रति व्यक्ति तक चुकाने पड़ते हैं। यह भी कहा गया है कि उच्च न्यायालय में अपनी पार्किंग का स्थान नहीं है। इसलिए अधिवक्ताओं के वाहनों से भी उच्च न्यायालय परिसर में जाम लगता है। पत्र में नगर में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव का भी जिक्र करते हुए कहा गया है कि इन कारणों से उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पहले मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अशोक देसाई भी उच्च न्यायालय को एचएमटी रानीखेत में स्थानांतरित करने के पक्ष में थे। यह भी कहा गया है कि नैनीताल में उच्च न्यायालय की स्थापना उत्तराखंड के कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों में संतुलन बनाने के लिए की गयी थी, क्योंकि देहरादून में राज्य की राजधानी स्थापित की गयी थी। इसलिए नैनीताल जिले में स्थित एचएमटी फैक्टरी में उच्च न्यायालय को स्थानांतरित किया जाए।

सबसे पहले तत्कालीन सांसद कोश्यारी ने उठाई थी यह मांग

नैनीताल से हाईकोर्ट हटाओ : कोश्यारी (राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 3 अगस्त 2015 , पेज-2)

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हटाने की मांग सर्वप्रथम दो अगस्त 2015 को उठाई थी। उन्होंने राज्य अतिथि गृह में आयोजित पत्रकार वार्ता में नगर को कमजोर तथा विद्वान न्यायाधीशों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हटाकर हल्द्वानी अथवा रुद्रपुर में किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की थी। उल्लेखनीय है कि पत्रकार वार्ता के बावजूद इस समाचार को केवल ‘राष्ट्रीय सहारा’ समाचार पत्र एवं आपके प्रिय एवं भरोसेमंद समाचार पोर्टल ‘नवीन समाचार’ ने तीन अगस्त 2015 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया था। उनके बाद प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने भी इस मांग को ‘निजी राय’ व्यक्त कर उठाते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय को अधिक वादों वाले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित करने का बयान दिया था। इसके उपरांत यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सनप्रीत ंिसह अजमानी ने जनवरी 2016 में इस संबंध में देश के राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालयय व उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व राज्यपाल तथा केंद्रीय कानून मंत्री आदि को पत्र भेजकर उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित करने की बात कही थी। इधर जून 2018 में मुख्यालय में नैनीताल टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज जोशी ने भी पत्रकार वार्ता कर कोश्यारी, सतपाल व यूथ बार एसोसिएशन के बयानों का स्वागत करते हुए यह मांग दोहराई थी। उनका कहना था कि उच्च न्यायालय की वजह से भी नगर में वाहनों की संख्या बढ़ती है। इसी दौरान 12 जून 2018 को तल्लीताल में प्रशासन के अधिकारियों के समक्ष भी नैनीताल से हाईकोर्ट हटाने की मांग पर नारे लगे थे। वहीं उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष नवीन वर्मा ने हल्द्वानी में पत्रकार वार्ता कर नैनीताल में उच्च न्यायालय होने से यहां का पर्यटन बुरी तरह से प्रभावित होने का बयान दिया था। अलबत्ता पूर्व जनता दल व कांग्रेस सांसद रहे डा. महेंद्र पाल ने सतपाल महाराज के बयान के बाद विरोध में उनका पुतला फूंकने की बात भी कही थी।

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नवीन जोशी, नैनीताल। देश की व्यवस्थाओं को चलाने में योगदान देने वाली कोई भी संवैधानिक संस्था स्वयं के सर्वोच्च होने के गुमान में न रहे। चाहे वह विधायिका हो, कार्यपालिका हो, न्यायपालिका हो अथवा स्वयं को स्वयंभू तरीके से चौथा स्तंभ कहने वाली प्रेस ही क्यों ना हो। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के संविधान की यही संभवतया सबसे बड़ी खूबी है कि यहां सभी सर्वशक्तिमान भी हैं, किंतु यदि वे केवल स्वयं को ही सर्वशक्तिमान और दूसरों को कमतर मानने का लगें तो उन्हें निरंकुश होते ही हद में लाने की व्यवस्था भी है। यह भी खूबसूरती है कि देश के लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि और ‘जनार्दन’ तक कही जाती है तो जनार्दन जनता के ‘भाव’ के प्यासे और खुद को ‘अधिकारी’ कहने वाले ‘जनता के सेवक’। साथ ही जब चार में से कोई भी स्तंभ अपनी हद पार करे तो दूसरे उसे उसकी हदें बताते हैं, और वे न बता पाएं तो आखिर जनता जागती है, और याद दिलाती हैं कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे की सभी संस्थाएं जनता के लिए हैं।

‘नवीन समाचार’ के आधार पर ‘Class of Politics’ Youtube यूट्यूब चैनल की रिपोर्ट :

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p style=”text-align: justify;”>ऐसा ही कुछ इन दिनों उत्तराखंड उच्च न्यायालय के साथ होता नजर आ रहा है। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य की स्थापना के दौरान नैनीतालवासियों ने प्रार्थना कर नैनीताल में उच्च न्यायालय की स्थापना करवाई, लेकिन आज उन्ही नैनीतालवासियों के मन में उच्च न्यायालय के खिलाफ भाव बदलते नजर आ रहे हैं। इस ‘भावनात्मक बदलाव’ के सतह पर आने की शुरुआत जनप्रतिनिधियों के बाद इधर नगर के एक संगठन ‘टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन’ से हो चुकी है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने बीती 21 अप्रैल शनिवार को बकायदा नैनीताल क्लब में पत्रकार वार्ता कर कहा ‘‘वे उत्तराखंड उच्च न्यायालय के संबंध में प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और सांसद भगत सिंह कोश्यारी तथा यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा नैनीताल नगर से उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने के बयान का पुरजोर समर्थन करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी भावनाओं का संज्ञान लेकर इस संबंध में उचित कार्रवाई करेंगे, ताकि नैनीताल पर्यटन नगरी में बढ़ रहे यातायात एवं इसके द्वारा हो रही समस्याओं से निजात मिले, एवं उच्च न्यायालय में आने वाले वादकारियों को भी राहत मिल सके।’’
यहां एसोसिएशन की बात थोड़ी उलझी हुई जरूर नजर आ रही है। उलझी इसलिये है कि उच्च न्यायालय के प्रति मन में भय व्याप्त है। लेकिन पत्रकार वार्ता में एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज जोशी ने आगे जो बातें कहीं, उससे बात कुछ साफ हो जाती है। उन्होंने एक नये तथ्य को शामिल करते यह आरोप भी लगाया कि ‘उच्च न्यायालय की वजह से नगर में जलापूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित होती है। क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वजह से नगर में 600 से ज्यादा अधिवक्ताओं, इतने ही अन्य कर्मियों और हर रोज आने वाले सैकड़ों वादकारियों के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर 10 से 15 हजार की जनसंख्या एवं प्रतिदिन 1 से 2 हजार वाहनों की संख्या भी बढ़ गयी है। इसके कारण जाम की समस्या भी उत्पन्न होती है, क्योंकि उच्च न्यायालय के समीप इन वाहनों के लिए पार्किग की उचित व्यवस्था भी नहीं है। इन कारणों से नगर की रीढ़-पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। संगठन का यह भी मानना है कि नगर में उच्च न्यायालय के लिए पर्याप्त स्थान भी उपलब्ध नहीं है।’ यानी वे नगर में पेयजल और वाहनों की अधिकता-जाम के लिए उच्च न्यायालय को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
अब बात स्थानीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी, प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया की, जिनका जिक्र टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन के पदाधिकारी कर रहे हैं। या कि जिनकी पहलों के बाद ही एसोसिएशन के पदाधिकारी इतनी बात भी कहने की हिम्मत जुटा पाए हैं। सतपाल महाराज ने 18 अप्रैल को भीमताल में नैनीताल से उत्तराखंड उच्च न्यायालय को सर्वाधिक मामलों वाले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित करने के संबंध में बयान दिया है। जबकि इससे पूर्व यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष सनप्रीत सिंह अजमानी के द्वारा जनवरी 2018 में देश के राष्ट्रपति के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड के राज्यपाल तथा केंद्र एवं उत्तराखंड सरकार के कानून मंत्रियों को उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग की गयी है। यूथ बार एसोसिएशन का कहना है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय पुराने सचिवालय के पुराने भवन में स्थापित है। यहां स्थान की कमी की वजह से वादकारियों व अधिवक्ताओं के साथ ही न्यायाधीशों को भी असुविधा हो रही है। पत्र में उच्च न्यायालय के डा. अजय रावत की नैनीताल से संबंधित जनहित याचिका पर पार्किंग की अनुपलब्धता से संबंधित फैसले का जिक्र भी किया गया था।
उल्लेखनीय है कि इससे व सबसे पहले क्षेत्रीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी 2 अगस्त 2015 को नैनीताल नगर की कमजोर भौगोलिक स्थितियों के मद्देनजर ‘विद्वान न्यायाधीशों’ की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय को नैनीताल से हटाने की सार्वजनिक तौर पर मांग कर चुके हैं। जबकि इधर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने नगर में पर्यटन के प्रभावित होने का हवाला देते हुए ‘निजी राय’ व्यक्त करते हुए कहा है कि उच्च न्यायालय को अधिक मामलों वाले हरिद्वार-ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि उच्च न्यायालय के नैनीताल से जाने से यहां यातायात का दबाव कम होगा, साथ ही पर्यटन को भी लाभ मिलेगा। नगर में वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह सहित एक वर्ग है जो नैनीताल उच्च न्यायालय की एक बेंच पश्चिमी उत्तराखंड में स्थापित किये जाने को मौजूदा समस्याआंे के समाधान के रूप में देखता है। वहीं नगर के अधिवक्ताओं के एक वर्ग विशेष को छोड़कर अन्य कोश्यारी व महाराज के बयानों के समर्थन में दिखते हैं। पूर्व कांग्रेस व जनता दल सांसद डा. महेंद्र सिंह पाल की अगुवाई वाले इस वर्ग ने महाराज का पुतला फूंकने की घोषणा भी की, किंतु अन्य अधिवक्ताओं से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाने अथवा अन्य कारणों से वे घोषणा करने के बावजूद ऐसा कर नहीं पाये। इससे समझा जा सकता है नैनीताल में उच्च न्यायालय का समर्थन घट रहा है। हालांकि नगर में निवर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष श्याम नारायण सहित प्रशंसकों का एक वर्ग ऐसा जरूर है, जो मानता है कि नैनीताल में सरकारी मशीनरी जितना भी हिलती-डुलती है, उच्च न्यायालय के इशारों पर। नगर में पुलिस किसी सड़क पर वाहनों को कुछ देर के लिए भी रोकती है तो कोतवाल या कप्तान का नहीं हाईकोर्ट का आदेश बताती है। दिलचस्प बात यह भी है कि उच्च न्यायालय के कंधे पर ही बंदूक रखकर चलाने वाली नैनीताल पुलिस में भी ‘उच्च न्यायालय’ के खिलाफ नाराजगी उच्चाधिकारियों से लेकर निचले दर्जे पर पुलिस कर्मियों तक में गाहे-बगाहे उजागर हो जाती है।
नगर की स्थितियों की बात करें तो एक ओर नैनीताल में पार्किंग की समस्या को देखते हुए हाईकोर्ट को इस तरह के निर्देश देने पड़े हैं। नैनीताल शहर में पर्यटकों का बढ़ता दबाव और वाहनों की बढ़ती संख्या के साथ ही नैनी झील का लगातार गिरता जल स्तर एक बड़ी समस्या बन गई है। नगर में भीड़ के चलते अनेक बार ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि पूरे दिन वाहन सड़कों पर रेंगने को मजबूर होते हैं। शहर के एकमात्र खेल के मैदान ‘फ्लैट्स’ में खेल की गतिविधियां रोककर इसे जिलाधिकारी के स्तर से पार्किंग के लिए खोलना पड़ता है। हाईकोर्ट ने भी इस खेल मैदान के पार्किंग के लिए दुरूपयोग होने पर नाराजगी जताई है। वहीं राजा महमूदाबाद की ‘शत्रु संपत्ति’ मेट्रोपोल होटल के मैदान में प्रशासन को पार्किंग का प्रबंध करना पड़ रहा है, जबकि जिलाधिकारी इसके मात्र ‘कस्टोडियन’ होते हैं। यह संपत्ति केंद्र सरकार से अध्यादेश जारी होने के बावजूद अभी भी जिला प्रशासन ने ‘जब्त’ नहीं की है। इस शत्रु संपत्ति के एक हिस्से को ही उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की पार्किंग के लिए दिया गया है।
अब उन कारणों की पड़ताल करते हैं जिन कारणों से उत्तराखंड उच्च न्यायालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था के प्रति उसके मुख्यालय में ही विरोध उपज रहा है। वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत ‘राजू’ के हाल ही में आये एक लेख के हवाले से बात करें तो बीते पखवाड़े पहले उच्च न्यायालय ने और उसकी देखा देखी निचली अदालत ने भी अपने अधिवक्ताओं के लिए पार्किंग की जगह आरक्षित करा ली है। पार्किंग की यह वही जगह है, जहां नगर वासियों और सैलानियों के वाहन खड़े होते रहे हैं। यानी उच्च न्यायालय व जिला न्यायालय ने अपने अधिवक्ताओं की सुविधा को पहले देखते हुए दूसरों के हिस्से की पार्किंग अपनी ताकत के बल पर प्रशासन से हासिल ली है। वह भी तब, जबकि दूसरी ओर इसी दौरान नैनीताल हाईकोर्ट ने नैनीताल को ईको सेंसटिव जोन घोषित करने के मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एक मई के बाद निजी वाहनों से आने वाले पर्यटकों को पार्किंग की अग्रिम व्यवस्था का प्रमाण देने के बाद ही शहर में प्रवेश करने देने और इस बारे में पर्याप्त प्रचार करने के लिए चार राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन देने को कहा है। इस संबंध में पत्रकार राजू का कहना है कि नैनीताल नगर का दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है। वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है, या फिर हाईकोर्ट का। राजू यह बड़ा सवाल भी उठाते हैं कि ‘जो हाईकोर्ट नैनीताल के लिए बेहद चिंतित दिखता है, क्या वही उसकी एक बड़ी मुसीबत भी नहीं बन गया है ?’
उनके तर्क हैं-उत्तराखंड उच्च न्यायालय अपनी स्थापना के समय नैनीताल के अंग्रेजी दौर के सेक्रेटरिएट भवन में दर्जनों विभागों को अन्यत्र हटाकर स्थापित हुआ था, और इसके बाद से कुमाऊं विश्वविद्यालय के ब्रुकहिल हॉस्टल, वन विभाग के कैंटन लॉज परिसर सहित प्रभागीय वनाधिकारी एवं मुख्य वन संरक्षक सहित दर्जन भर विभागों के कार्यालय भी हटाकर अब हाईकोर्ट की संपत्ति हो चुके हैं। आम जन के लिए नैनीताल में अवैध निर्माणों पर कड़ा रूख अपनाने वाले उच्च न्यायालय के भूस्खलन संभावित क्षेत्र में इसकी स्थापना के बाद से ही निर्माण लगातार जारी हैं। नैनीताल में पर्यटकों के आकर्षण के एक बड़े केंद्र-उद्यान में हाईकोर्ट के वकीलों के चैंबर उग चुके हैं। नैनीताल झील के मुख्य जलग्रहण क्षेत्र कैंटन लॉज इलाके में ‘नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड’ के जरिए 84 टाइप एक भवन, घरेलू कर्मचारियों के लिए छह भवन और न्यायाधीशों के लिए चार भवनों का निर्माण करवाया जा रहा है। बताया गया है कि लगभग 400 कमरों वाले इस निर्माण पर एनएलआरएसएडीए (नैनीताल लेक रीजन स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) भी अपनी आपत्ति जता चुका है। लेकिन मामला हाईकोर्ट से जुड़ा होने के कारण निर्माण कार्य पर रोक नहीं लग सकी है। 200 मीटर दूर की आर्डवैल तक की राज्य संपत्ति विभाग की संपत्ति भी अब हाईकोर्ट के अधीन आ चुकी है। नगर में नालों के आसपास निर्माण प्रतिबंधित हैं, किंतु उच्च न्यायालय परिसर में नालों के निर्माण के आरोप आम हैं।
दूसरे, नगर को ईको जोन में तब्दील करने वाली डा. अजय रावत की बहुचर्चित याचिका मूलतः उच्च न्यायालय से चंद कदमों की दूरी पर स्थित सूखाताल क्षेत्र के लिए है, लेकिन इस याचिका पर उच्च न्यायालय सूखाताल के प्रति कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कमोबेश उच्च न्यायालय की ‘नाक के नीचे’ सूखाताल झील के डूब क्षेत्र में कई नये निर्माण बेरोकटोक, उच्च न्यायालय को मुंह चिढ़ाते हुए किये जा रहे हैं। यह जमीन पूर्व में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश साहब की ही बताई जाती है, जबकि कुछ वर्ष पूर्व एक स्थानीय न्यायाधीश महोदय ने नगर के शेर का डांडा क्षेत्र के अत्यधिक संवेदनशील इलाके में पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर अपने घर तक के लिए एक मोटर सड़क ही बनवा दी थी. इस सड़क के कारण नैनीताल के इस ऊपरी इलाके में वाहनों की आवाजाही तो बढ़ी ही, जुलाई 2015 में यहां एक बड़ा भूस्खलन भी हुआ। इससे हजारों टन मलवा झील में भर गया था।
उच्च न्यायालय के प्रति नगर वासियों का आक्रोश इन स्थितियों के अलावा नगर के पंत पार्क क्षेत्र को यहां फड़ लगाकर अपनी आजीविका चलाने वाले कमजोर वर्ग के लोगों के लिए प्रतिबंधित कर यहां अपनी लंबी लग्जरी गाड़ियां खड़ी कर माल रोड की सैर पर निकलने को लेकर भी है। नगर की माल रोड पहले सीजन के भीड़भाड़ भरे दिनों में ही शाम छह बजे से आठ बजे तक वाहनों की आवाजाही के लिए प्रतिबंधित की जाती थी, लेकिन बीते कुछ वर्षों से यह वर्ष भर इस समय वाहनों के लिए बिना किसी लिखित आदेश के प्रतिबंधित की जाती है। नागरिकों का मानना है कि माल रोड को केवल विद्वान न्याायाधीशों की शाम की सैर के लिए और पंत पार्क को उनके वाहन खड़े करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है। सैर के दौरान न्यायाधीश गणों के सुरक्षाकर्मियों का उनके करीब किसी व्यक्ति को फटकने न देने के लिए हाथ-पांव मारना नगर के बुजुर्गों को अंग्रेजी दौर की याद दिलाता है, जब केवल अंग्रेज व उनके सुरक्षा कर्मी ही अपर माल रोड पर चल सकते थे, और भारतीयों को लोवर माल रोड से गुजरना पड़ता था। वैसे ही मिलते-जुलते दृश्य भी अब भी शाम को नगर की माल रोड में दिख जाते हैं।

अब उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल ने की नैनीताल से हार्इकोर्ट को कहीं और शिफ्ट करने की मांग 

व्यापार मंडल ने की नैनीताल से हाई कोर्ट शिफ्ट करने की मांगहल्द्वानी, 14 जून 2018 : नैनीताल से हार्इकोर्ट को शिफ्ट करने की मांग की जा रही है। उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल का कहना है कि नैनीताल में हार्इ कोर्ट के होने के चलतेे कर्इ तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।  हल्द्वानी में आयोजित प्रेस वार्ता में संगठन के प्रदेश महामंत्री नवीन वर्मा ने कहा कि नैनीताल में हाईकोर्ट की वजह से पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। व्यापारियों सहित आम लोगों को भी बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि यहां हार्इकोर्ट होने के कारण जाम और अव्यस्था के हालत बने रहते हैं।  पिछले दिनों नैनीताल से पर्यटकों को लौटना पड़ा। देशभर में यह संदेश गया कि नैनीताल में पर्यटकों को नहीं आने दिया जा रहा है। पर्यटकों को होटलों में बुकिंग के बाद भी नैनीताल नहीं आने दिया गया। इस अवसर पर संगठन के सरंक्षक बाबू लाल गुप्ता,  जिलाध्यक्ष विपिन गुप्ता, महानगर अध्यक्ष योगेश शर्मा सहित अन्य व्यापारी मौजूद रहे।

टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन ने भी की हाईकोर्ट को अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग

-कहा बढ़ते यातायात के साथ ही उच्च न्यायालय की वजह से नगर में जलापूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग पहली बार किसी संगठन के द्वारा खुलकर उठा दी गयी है। टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन ने शनिवार को बकायदा पत्रकार वार्ता कर कहा कि वे इस संबंध में प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और सांसद भगत सिंह कोश्यारी तथा यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा नैनीताल नगर से उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने के बयान का पुरजोर समर्थन करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी भावनाओं का संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करेंगे, ताकि नैनीताल पर्यटन नगरी में बढ़ रहे यातायात एवं इसके द्वारा हो रही समस्याओं से निजात एवं उच्च न्यायालय में आने वाले वादकारियों को राहत मिल सके।
नैनीताल क्लब में पत्रकार वार्ता करते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज जोशी ने एक नये तथ्य को शामिल करते यह आरोप भी लगाया कि उच्च न्यायालय की वजह से नगर में जलापूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वजह से नगर में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से 10 से 15 हजार की जनसंख्या एवं प्रतिदिन 1 से 2 हजार वाहनों की संख्या भी बढ़ गयी है, जिसके कारण जाम की समस्या भी उत्पन्न हो गयी है, क्योंकि उच्च न्यायालय के समीप इन वाहनों के लिए पार्किग की उचित व्यवस्था भी नहीं है। इन कारणों से नगर की रीढ़-पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। संगठन का यह भी मानना है कि नगर में उच्च न्यायालय के लिए पर्यप्त स्थान भी उपलब्ध नहीं है। पत्रकार वार्ता में संगठन के संरक्षक हारून खान पम्मी व कोषाध्यक्ष ओमवीर सिंह आदि भी मौजूद रहे।

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नैनीताल से हाईकोर्ट हटाओ : कोश्यारी (राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 3 अगस्त 2015 , पेज-2)

स्थानीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी के बाद प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने नैनीताल से उत्तराखंड उच्च न्यायालय को सर्वाधिक मामलों वाले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित करने के संबंध में बयान दिया है। इससे यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष सनप्रीत सिंह अजमानी द्वारा बीते जनवरी माह में देश के राष्ट्रपति के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड के राज्यपाल, केंद्र एवं उत्तराखंड सरकार के कानून मंत्रियों को उत्तराखंड उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने की उठाई गयी मांग फिर से चर्चा में आ गयी है। यूथ बार एसोसिएशन का कहना था कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय पुराने सचिवालय के पुराने भवन में स्थापित है। यहां स्थान की कमी की वजह से वादकारियों व अधिवक्ताओं के साथ ही न्यायाधीशों को भी असुविधा हो रही है। पत्र में उच्च न्यायालय के डा. अजय रावत की नैनीताल से संबंधित जनहित याचिका पर पार्किंग की अनुपलब्धता से संबंधित फैसले का जिक्र भी किया गया था।

दो बार क्लिक करके बड़ा करके यह भी देखें : 

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सबसे पहले क्षेत्रीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी अगस्त 2015 में नैनीताल नगर की कमजोर भौगोलिक स्थितियों के मद्देनजर विद्वान न्यायाधीशों की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय को नैनीताल से हटाने की सार्वजनिक तौर पर मांग कर चुके हैं, जबकि इधर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने नगर में पर्यटन के प्रभावित होने का हवाला देते हुए निजी राय व्यक्त करते हुए कहा है कि उच्च न्यायालय को अधिक मामलों वाले हरिद्वार-ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि उच्च न्यायालय के नैनीताल से जाने से यहां यातायात का दबाव कम होगा, साथ ही पर्यटन को लाभ मिलेगा। इस बारे में नगर के विभिन्न वर्गों से बात की गयी, तो नगर के अधिवक्ताओं को छोड़कर अन्य वर्ग के लोग भी कोश्यारी व महाराज के बयानों के समर्थन में दिखे।

चित्र परिचयः 19एनटीएल-3ः नैनीताल। उच्च न्यायालय एवं जिल न्यायालय के अधिवक्ताओं हेतु आरक्षित पार्किंग के बोर्ड।

वहीं वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत ‘राजू’ का कहना था कि जिस तरह बीते पखवाड़े पहले उच्च न्यायालय व उसकी देखा देखी निचली अदालत ने भी अपने अधिवक्ताओं के लिए पार्किंग की जगह आरक्षित करा ली है। उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय ने सैलानियों से पार्किंग की व्यवस्था किये बिना नैनीताल न आने को कहा है और उनके हिस्से की पार्किग अपने अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित कर दी है। कहा कि नैनीताल नगर का दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है। वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है, या फिर हाईकोर्ट का। वहीं दूसरे वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह का कहना है कि पश्चिमी उत्तराखंड में नैनीताल उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित किये जाने से समस्या का समाधान हो सकता है। अलबत्ता पूर्व कांग्रेस व जनता दल से सांसद तथा बार एसोसिएशन व बार काउंसिल के अध्यक्ष रहे डा. महेंद्र पाल ने महाराज की टिप्पणी पर कहा कि पहले वे राज्य की राजधानी तय करवाएं, फिर उच्च न्यायालय की बात करें। वहीं नगर के अधिवताओं का बड़ा वर्ग अपने पेशेगत कारणों से नैनीताल में ही उच्च न्यायालय को बरकरार रखने का पक्षधर दिखा।

बयान पर महाराज को मंत्री पद से हटाने की मांग

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल। उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्य जगह स्थानांतरित करने संबंधी बयान से उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिक्वताओ में रोष है। अधिवक्ताओं ने महाराज के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए सरकार से उन्हें केबिनेट मंत्री के पद से हटाने की मांग की है। साथ ही बृहस्पतिवार को अपराह्न एक बजे सतपाल महाराज का पुतला फूकने का निर्णय भी लिया गया है।
बुधवार को उच्च न्यायालय के अधिक्वता उच्च न्यायालय परिसर में एकत्र हुए और उन्होंने मंत्री के ब्यान की निंदा की। हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष डा. महेंद्र सिंह पाल ने कहा कि मंत्री कोे इस तरह का बयान देना शोभा नही देता है। पूर्व बार अध्यक्ष सैय्यद नदीम मून ने कहा कि नैनीताल के विकास में उच्च न्यायालय का योगदान रहा है प्रदेश सरकार के एक मंत्री का ऐसा बयान निंदनीय है। पूर्व सचिव त्रिभुवन फर्त्याल ने कहा कि मंत्री का बयान उत्तराखंड के विरोध को दर्शाता है। हरिद्वार के अधिवक्ता विवेक शुक्ला, पूर्व सचिव कमलेश, शक्ति प्रताप सिंह, भुवनेश जोशी, सौरभ अधिकारी सहित अन्य अधिक्वता भी शामिल रहे।

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू की कलम से… यह भी पढ़ें : जो हाईकोर्ट नैनीताल के लिए बेहद चिंतित दिखता है, क्या वही उसकी एक बड़ी मुसीबत भी बन गया है?

नैनीताल में कई लोगों का मानना है कि उसका दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है. वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है या फिर हाईकोर्ट का

एक मई के बाद अगर आप नैनीताल जाने की सोच रहे हैं और अपने ही वाहन से जाने की सोच रहे हैं तो पहले अपनी पार्किंग की व्यवस्था पक्की कर लें. अन्यथा आपको वहां से बैरंग वापस लौटना पड़ सकता है. नैनीताल हाईकोर्ट ने नैनीताल को ईको सेंसटिव जोन घोषित करने के मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जिला प्रशासन को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है – एक मई के बाद निजी वाहनों से आने वाले पर्यटकों को पार्किंग की अग्रिम व्यवस्था का प्रमाण देने के बाद ही शहर में प्रवेश करने दिया जाए. अदालत ने यह भी कहा है कि इस बारे में पर्याप्त प्रचार करने के लिए चार राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन भी दिए जाएं.

नैनीताल में पार्किंग की समस्या को देखते हुए हाईकोर्ट को इस तरह के निर्देश देने पड़े हैं. नैनीताल शहर में पर्यटकों का बढ़ता दबाव और वाहनों की बढ़ती संख्या अब एक बड़ी समस्या बन गई है. भीड़ के चलते अनेक बार ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि पूरे दिन वाहन सड़कों पर कुछ मीटर भी आगे नहीं बढ़ पाते. नैनीताल शहर का एक मात्र खेल मैदान बरसों से पार्किंग के काम में आ रहा है. मगर अब इससे भी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा रहा. हाईकोर्ट ने अब इस खेल मैदान के पार्किंग के लिए दुरूपयोग पर भी नाराजगी जताई है.

हाईकोर्ट की इस सख्ती से यह तो समझ में आता है कि वह एक पर्यटक शहर के रूप में नैनीताल की बदहाली को लेकर कितना चिंतित है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि नैनीताल की इस बढ़ती बदहाली के लिए वह भी किसी न किसी रूप में जिम्मेदार है.

झील के चारों ओर बसे नैनीताल शहर पर आबादी का दबाव अपने सेचुरेशन पाइंट को बहुत पहले ही पार कर चुका है. पर्यावरण और भूगर्भीय खतरों के चलते नैनीताल में निर्माण कार्यो पर कई तरह के प्रतिबंध भी लागू हैं. भूगर्भीय दृष्टि से नैनीताल कितना संवेदनशील है इसका पता सितंबर 1880 के उस भयावह भूस्खलन से चलता है जिसमें 151 लोग मारे गए थे और कई इमारतें जमींदोज हो गई थीं.

उस दुर्घटना के बाद अंग्रेजों ने वैसे किसी दूसरे हादसे से बचाने के लिए नैनीताल के कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में भवन निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया. पूरे शहर की पहाड़ियों से बारिश के पानी की एक-एक बूंद को नालियों के जरिए नियंत्रित करके झील तक पहुंचाने के लिए 90 मील लम्बी नालियों का जाल बिछाया गया. लेकिन 90 के दशक के बाद यहां अवैध निर्माणों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह हाईकोर्ट की स्थापना और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद थमा नही है. उल्टे हाईकोर्ट बनने के बाद शहर में उसकी जरूरतों के हिसाब से नए निर्माणों की शुरूआत हो गई.

सचिवालय भवन में हाईकोर्ट की स्थापना के बाद कुमाऊं विश्वविद्यालय के ब्रुकहिल हॉस्टल, वन विभाग के कैंटन लॉज तथा सिल्विकल्चर विभाग के भवन अब हाईकोर्ट की संपत्ति हो चुके हैं. दो सौ मीटर दूरी पर आर्डवैल तक की सारी राज्य संपत्ति भी अब उसके अधीन ही है. इसके अलावा नैनीताल के दर्जनों सरकारी कार्यालय भी कोर्ट के ही कारण अन्यत्र स्थानांतरित कर दिए गऐ हैं. कभी उद्यान विभाग का उद्यान नैनीताल में पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र था. अब इसका भी एक बड़ा हिस्सा हाईकोर्ट के वकीलों के चैंबरों में बदल चुका है. वहां पर मौजूद भारी भरकम ओवर ब्रिज पर्यावरण के प्रति उपेक्षा का प्रतीक जैसा लगता है.

एक ओर हाईकोर्ट नैनीताल के अवैध निर्माणों पर कड़ा रूख अपनाता रहा है मगर खुद उसके लिए कैंटन लॉज इलाके में ‘नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड’ के जरिए 84 टाइप एक भवन, घरेलू कर्मचारियों के लिए छह भवन और न्यायाधीशों के लिए चार भवनों का निर्माण करवाया जा रहा है. गौरतलब है कि यह निर्माण उसी इलाके में कराया जा रहा है जो नैनीताल झील का मुख्य जलग्रहण क्षेत्र है और भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है. लगभग 400 कमरों वाले इस निर्माण पर एनएलआरएसएडीए (नैनीताल लेक रीजन स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) भी अपनी आपत्ति जता चुका है. लेकिन मामला हाईकोर्ट से जुड़ा होने के कारण निर्माण कार्य पर रोक नहीं लग सकी.

शहर में कई अवैध निर्माण कार्य भी हाईकोर्ट की आड़ में हुए हैं. यहां के कुछ वकीलों पर अवैध निर्माणों के आरोप लग चुके हैं. इसके अलावा कुछ वर्ष पूर्व एक स्थानीय जज साहब ने शेर का डांडा क्षेत्र के अत्यधिक संवेदनशील इलाके में पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर अपने घर तक के लिए एक मोटर सड़क ही बनवा दी थी. इस सड़क के कारण नैनीताल के इस ऊपरी इलाके में वाहनों की आवाजाही तो बढ़ी ही, जुलाई 2015 में यहां एक बड़ा भूस्खलन भी हुआ. इससे हजारों टन मलवा झील में भर गया था.

गर्मियों में पर्यटकों को पार्किंग का इंतजाम करके आने का निर्देश देने वाले हाईकोर्ट ने नैनीताल में सामान्य लोगों की एक प्रमुख पार्किंग को भी अपने वकीलों के लिए आरक्षित कर दिया है. उसके निर्देश पर जिला प्रशासन ने मेट्रोपोल होटल की एक बड़ी पार्किंग हाईकोर्ट के वकीलों के लिए आरक्षित कर दी है. इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने जिला अदालत के वकीलों के लिए भी शहर में पार्किंग आरक्षित करने के बोर्ड लगाने शुरू कर दिए हैं. एक और नैनीताल में पार्किंग नियमों में थोड़ी सी चूक होने पर दस हजार रूपए तक का जुर्माना लग चुका है और दूसरी ओर वकीलों के लिए आरक्षित पार्किंग निःशुल्क हैं. इस मुद्दे को लेकर स्थानीय जनता में काफी रोष है और नैनीताल के नागरिक संगठनों ने अब इसका विरोध करना भी शुरू कर दिया है.

लेकिन समस्या सिर्फ इतनी नहीं है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जब शहर में निकलते हैं तो मल्लीताल में फौवारे के आसपास का इलाका उनके वाहनों की पार्किंग में बदल जाता है और पर्यटकों को उसके आसपास भी फटकने तक नहीं दिया जाता. पहले सीजन के भीड़भाड़ भरे दिनों में ही शाम छह बजे से आठ बजे तक माल रोड पर वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित की जाती थी मगर अब हाईकोर्ट की वजह से यह प्रतिबंध पूरे साल लागू रहता है. इस दौरान हाई कोर्ट के जजों को मॉल रोड पर इवनिंग वॉक करते देखा जा सकता है. उनकी देखा-देखी लोअर ज्यूडिशियरी के जज भी अब ईवनिंग वाक का मजा लेने लगे हैं.

ऐसे मौकों पर कई बार जजों के सुरक्षाकर्मी व गनर आगे-पीछे की जनता को तितर बितर करते हुए देखे जा सकते हैं. नैनीताल के बुजुर्ग इस स्थिति की तुलना अंग्रेजी राज के उन दिनों से करते हैं जब भारतीय लोगों का माल रोड पर चलना प्रतिबंधित होता था. ऐसे में जब शहर की बची-खुची सामान्य पार्किंग को निदान अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित किया जाने लगा है तो एक बार फिर इसके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.

‘संविधान के अनुसार किसी खास पेशे में होने के कारण कोई व्यक्ति विशेष नागरिक अधिकार हासिल नहीं कर लेता. सार्वजनिक पार्किंग स्थल कोर्ट की प्रापर्टी नहीं है, इसलिए इस तरह का आरक्षण वैध नहीं ठहराया जा सकता’ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आईबी सिंह कहते हैं.

नैनीताल के जनजीवन पर हाईकोर्ट का दखल जिस तरह से बढ़ता जा रहा है उसके कारण अब ऐसी चर्चाएं भी होने लगी हैं कि क्या उसे हाईकोर्ट की जरूरत है भी! ऐसी चर्चा करने वालों का मानना है कि नैनीताल के लिए दो चरित्रों का शहर बनकर रहना बड़ा मुश्किल है. वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है या फिर हाईकोर्ट का. 600 से ज्यादा वकीलों, इतने ही स्टाफ और हर रोज आने वाले सैकड़ों मुवक्किलों के दबाव से यह बुरी तरह कराहने लगा है. पर्यटक शहर की मस्ती पर जिस तरह से हाईकोर्ट का आतंक छाया हुआ है, उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्यों न उसे कहीं और ट्रांसफर कर दिया जाए!

इसके लिए यह तर्क भी दिया जा रहा है कि राजधानी और हाईकोर्ट अलग-अलग शहरों में होने से सरकारी मुकदमों में धन और समय का भारी अपव्यय हो रहा है. हालांकि ऐसा तर्क देने वालों को यह भी पता है कि नैनीताल की खूबसूरती का मोह ही ऐसा है कि हाईकोर्ट आसानी से उस पर अपना ‘विशेषाधिकार’ छोड़ने वाला नहीं है.

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