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आखिर क्यों उठने लगीं नैनीताल हाईकोर्ट के खिलाफ घर में ही आवाजें

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नवीन जोशी, नैनीताल। देश की व्यवस्थाओं को चलाने में योगदान देने वाली कोई भी संवैधानिक संस्था स्वयं के सर्वोच्च होने के गुमान में न रहे। चाहे वह विधायिका हो, कार्यपालिका हो, न्यायपालिका हो अथवा स्वयं को स्वयंभू तरीके से चौथा स्तंभ कहने वाली प्रेस ही क्यों ना हो। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के संविधान की यही संभवतया सबसे बड़ी खूबी है कि यहां सभी सर्वशक्तिमान भी हैं, किंतु यदि वे केवल स्वयं को ही सर्वशक्तिमान और दूसरों को कमतर मानने का लगें तो उन्हें निरंकुश होते ही हद में लाने की व्यवस्था भी है। यह भी खूबसूरती है कि देश के लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि और ‘जनार्दन’ तक कही जाती है तो जनार्दन जनता के ‘भाव’ के प्यासे और खुद को ‘अधिकारी’ कहने वाले ‘जनता के सेवक’। साथ ही जब चार में से कोई भी स्तंभ अपनी हद पार करे तो दूसरे उसे उसकी हदें बताते हैं, और वे न बता पाएं तो आखिर जनता जागती है, और याद दिलाती हैं कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे की सभी संस्थाएं जनता के लिए हैं।

‘नवीन समाचार’ के आधार पर ‘Class of Politics’ Youtube यूट्यूब चैनल की रिपोर्ट :

ऐसा ही कुछ इन दिनों उत्तराखंड उच्च न्यायालय के साथ होता नजर आ रहा है। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य की स्थापना के दौरान नैनीतालवासियों ने प्रार्थना कर नैनीताल में उच्च न्यायालय की स्थापना करवाई, लेकिन आज उन्ही नैनीतालवासियों के मन में उच्च न्यायालय के खिलाफ भाव बदलते नजर आ रहे हैं। इस ‘भावनात्मक बदलाव’ के सतह पर आने की शुरुआत जनप्रतिनिधियों के बाद इधर नगर के एक संगठन ‘टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन’ से हो चुकी है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने बीती 21 अप्रैल शनिवार को बकायदा नैनीताल क्लब में पत्रकार वार्ता कर कहा ‘‘वे उत्तराखंड उच्च न्यायालय के संबंध में प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और सांसद भगत सिंह कोश्यारी तथा यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा नैनीताल नगर से उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने के बयान का पुरजोर समर्थन करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी भावनाओं का संज्ञान लेकर इस संबंध में उचित कार्रवाई करेंगे, ताकि नैनीताल पर्यटन नगरी में बढ़ रहे यातायात एवं इसके द्वारा हो रही समस्याओं से निजात मिले, एवं उच्च न्यायालय में आने वाले वादकारियों को भी राहत मिल सके।’’
यहां एसोसिएशन की बात थोड़ी उलझी हुई जरूर नजर आ रही है। उलझी इसलिये है कि उच्च न्यायालय के प्रति मन में भय व्याप्त है। लेकिन पत्रकार वार्ता में एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज जोशी ने आगे जो बातें कहीं, उससे बात कुछ साफ हो जाती है। उन्होंने एक नये तथ्य को शामिल करते यह आरोप भी लगाया कि ‘उच्च न्यायालय की वजह से नगर में जलापूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित होती है। क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वजह से नगर में 600 से ज्यादा अधिवक्ताओं, इतने ही अन्य कर्मियों और हर रोज आने वाले सैकड़ों वादकारियों के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर 10 से 15 हजार की जनसंख्या एवं प्रतिदिन 1 से 2 हजार वाहनों की संख्या भी बढ़ गयी है। इसके कारण जाम की समस्या भी उत्पन्न होती है, क्योंकि उच्च न्यायालय के समीप इन वाहनों के लिए पार्किग की उचित व्यवस्था भी नहीं है। इन कारणों से नगर की रीढ़-पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। संगठन का यह भी मानना है कि नगर में उच्च न्यायालय के लिए पर्याप्त स्थान भी उपलब्ध नहीं है।’ यानी वे नगर में पेयजल और वाहनों की अधिकता-जाम के लिए उच्च न्यायालय को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
अब बात स्थानीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी, प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया की, जिनका जिक्र टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन के पदाधिकारी कर रहे हैं। या कि जिनकी पहलों के बाद ही एसोसिएशन के पदाधिकारी इतनी बात भी कहने की हिम्मत जुटा पाए हैं। सतपाल महाराज ने 18 अप्रैल को भीमताल में नैनीताल से उत्तराखंड उच्च न्यायालय को सर्वाधिक मामलों वाले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित करने के संबंध में बयान दिया है। जबकि इससे पूर्व यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष सनप्रीत सिंह अजमानी के द्वारा जनवरी 2018 में देश के राष्ट्रपति के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड के राज्यपाल तथा केंद्र एवं उत्तराखंड सरकार के कानून मंत्रियों को उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग की गयी है। यूथ बार एसोसिएशन का कहना है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय पुराने सचिवालय के पुराने भवन में स्थापित है। यहां स्थान की कमी की वजह से वादकारियों व अधिवक्ताओं के साथ ही न्यायाधीशों को भी असुविधा हो रही है। पत्र में उच्च न्यायालय के डा. अजय रावत की नैनीताल से संबंधित जनहित याचिका पर पार्किंग की अनुपलब्धता से संबंधित फैसले का जिक्र भी किया गया था।
उल्लेखनीय है कि इससे व सबसे पहले क्षेत्रीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी 2 अगस्त 2015 को नैनीताल नगर की कमजोर भौगोलिक स्थितियों के मद्देनजर ‘विद्वान न्यायाधीशों’ की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय को नैनीताल से हटाने की सार्वजनिक तौर पर मांग कर चुके हैं। जबकि इधर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने नगर में पर्यटन के प्रभावित होने का हवाला देते हुए ‘निजी राय’ व्यक्त करते हुए कहा है कि उच्च न्यायालय को अधिक मामलों वाले हरिद्वार-ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि उच्च न्यायालय के नैनीताल से जाने से यहां यातायात का दबाव कम होगा, साथ ही पर्यटन को भी लाभ मिलेगा। नगर में वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह सहित एक वर्ग है जो नैनीताल उच्च न्यायालय की एक बेंच पश्चिमी उत्तराखंड में स्थापित किये जाने को मौजूदा समस्याआंे के समाधान के रूप में देखता है। वहीं नगर के अधिवक्ताओं के एक वर्ग विशेष को छोड़कर अन्य कोश्यारी व महाराज के बयानों के समर्थन में दिखते हैं। पूर्व कांग्रेस व जनता दल सांसद डा. महेंद्र सिंह पाल की अगुवाई वाले इस वर्ग ने महाराज का पुतला फूंकने की घोषणा भी की, किंतु अन्य अधिवक्ताओं से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाने अथवा अन्य कारणों से वे घोषणा करने के बावजूद ऐसा कर नहीं पाये। इससे समझा जा सकता है नैनीताल में उच्च न्यायालय का समर्थन घट रहा है। हालांकि नगर में निवर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष श्याम नारायण सहित प्रशंसकों का एक वर्ग ऐसा जरूर है, जो मानता है कि नैनीताल में सरकारी मशीनरी जितना भी हिलती-डुलती है, उच्च न्यायालय के इशारों पर। नगर में पुलिस किसी सड़क पर वाहनों को कुछ देर के लिए भी रोकती है तो कोतवाल या कप्तान का नहीं हाईकोर्ट का आदेश बताती है। दिलचस्प बात यह भी है कि उच्च न्यायालय के कंधे पर ही बंदूक रखकर चलाने वाली नैनीताल पुलिस में भी ‘उच्च न्यायालय’ के खिलाफ नाराजगी उच्चाधिकारियों से लेकर निचले दर्जे पर पुलिस कर्मियों तक में गाहे-बगाहे उजागर हो जाती है।
नगर की स्थितियों की बात करें तो एक ओर नैनीताल में पार्किंग की समस्या को देखते हुए हाईकोर्ट को इस तरह के निर्देश देने पड़े हैं। नैनीताल शहर में पर्यटकों का बढ़ता दबाव और वाहनों की बढ़ती संख्या के साथ ही नैनी झील का लगातार गिरता जल स्तर एक बड़ी समस्या बन गई है। नगर में भीड़ के चलते अनेक बार ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि पूरे दिन वाहन सड़कों पर रेंगने को मजबूर होते हैं। शहर के एकमात्र खेल के मैदान ‘फ्लैट्स’ में खेल की गतिविधियां रोककर इसे जिलाधिकारी के स्तर से पार्किंग के लिए खोलना पड़ता है। हाईकोर्ट ने भी इस खेल मैदान के पार्किंग के लिए दुरूपयोग होने पर नाराजगी जताई है। वहीं राजा महमूदाबाद की ‘शत्रु संपत्ति’ मेट्रोपोल होटल के मैदान में प्रशासन को पार्किंग का प्रबंध करना पड़ रहा है, जबकि जिलाधिकारी इसके मात्र ‘कस्टोडियन’ होते हैं। यह संपत्ति केंद्र सरकार से अध्यादेश जारी होने के बावजूद अभी भी जिला प्रशासन ने ‘जब्त’ नहीं की है। इस शत्रु संपत्ति के एक हिस्से को ही उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की पार्किंग के लिए दिया गया है।
अब उन कारणों की पड़ताल करते हैं जिन कारणों से उत्तराखंड उच्च न्यायालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था के प्रति उसके मुख्यालय में ही विरोध उपज रहा है। वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत ‘राजू’ के हाल ही में आये एक लेख के हवाले से बात करें तो बीते पखवाड़े पहले उच्च न्यायालय ने और उसकी देखा देखी निचली अदालत ने भी अपने अधिवक्ताओं के लिए पार्किंग की जगह आरक्षित करा ली है। पार्किंग की यह वही जगह है, जहां नगर वासियों और सैलानियों के वाहन खड़े होते रहे हैं। यानी उच्च न्यायालय व जिला न्यायालय ने अपने अधिवक्ताओं की सुविधा को पहले देखते हुए दूसरों के हिस्से की पार्किंग अपनी ताकत के बल पर प्रशासन से हासिल ली है। वह भी तब, जबकि दूसरी ओर इसी दौरान नैनीताल हाईकोर्ट ने नैनीताल को ईको सेंसटिव जोन घोषित करने के मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एक मई के बाद निजी वाहनों से आने वाले पर्यटकों को पार्किंग की अग्रिम व्यवस्था का प्रमाण देने के बाद ही शहर में प्रवेश करने देने और इस बारे में पर्याप्त प्रचार करने के लिए चार राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन देने को कहा है। इस संबंध में पत्रकार राजू का कहना है कि नैनीताल नगर का दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है। वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है, या फिर हाईकोर्ट का। राजू यह बड़ा सवाल भी उठाते हैं कि ‘जो हाईकोर्ट नैनीताल के लिए बेहद चिंतित दिखता है, क्या वही उसकी एक बड़ी मुसीबत भी नहीं बन गया है ?’
उनके तर्क हैं-उत्तराखंड उच्च न्यायालय अपनी स्थापना के समय नैनीताल के अंग्रेजी दौर के सेक्रेटरिएट भवन में दर्जनों विभागों को अन्यत्र हटाकर स्थापित हुआ था, और इसके बाद से कुमाऊं विश्वविद्यालय के ब्रुकहिल हॉस्टल, वन विभाग के कैंटन लॉज परिसर सहित प्रभागीय वनाधिकारी एवं मुख्य वन संरक्षक सहित दर्जन भर विभागों के कार्यालय भी हटाकर अब हाईकोर्ट की संपत्ति हो चुके हैं। आम जन के लिए नैनीताल में अवैध निर्माणों पर कड़ा रूख अपनाने वाले उच्च न्यायालय के भूस्खलन संभावित क्षेत्र में इसकी स्थापना के बाद से ही निर्माण लगातार जारी हैं। नैनीताल में पर्यटकों के आकर्षण के एक बड़े केंद्र-उद्यान में हाईकोर्ट के वकीलों के चैंबर उग चुके हैं। नैनीताल झील के मुख्य जलग्रहण क्षेत्र कैंटन लॉज इलाके में ‘नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड’ के जरिए 84 टाइप एक भवन, घरेलू कर्मचारियों के लिए छह भवन और न्यायाधीशों के लिए चार भवनों का निर्माण करवाया जा रहा है। बताया गया है कि लगभग 400 कमरों वाले इस निर्माण पर एनएलआरएसएडीए (नैनीताल लेक रीजन स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) भी अपनी आपत्ति जता चुका है। लेकिन मामला हाईकोर्ट से जुड़ा होने के कारण निर्माण कार्य पर रोक नहीं लग सकी है। 200 मीटर दूर की आर्डवैल तक की राज्य संपत्ति विभाग की संपत्ति भी अब हाईकोर्ट के अधीन आ चुकी है। नगर में नालों के आसपास निर्माण प्रतिबंधित हैं, किंतु उच्च न्यायालय परिसर में नालों के निर्माण के आरोप आम हैं।
दूसरे, नगर को ईको जोन में तब्दील करने वाली डा. अजय रावत की बहुचर्चित याचिका मूलतः उच्च न्यायालय से चंद कदमों की दूरी पर स्थित सूखाताल क्षेत्र के लिए है, लेकिन इस याचिका पर उच्च न्यायालय सूखाताल के प्रति कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कमोबेश उच्च न्यायालय की ‘नाक के नीचे’ सूखाताल झील के डूब क्षेत्र में कई नये निर्माण बेरोकटोक, उच्च न्यायालय को मुंह चिढ़ाते हुए किये जा रहे हैं। यह जमीन पूर्व में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश साहब की ही बताई जाती है, जबकि कुछ वर्ष पूर्व एक स्थानीय न्यायाधीश महोदय ने नगर के शेर का डांडा क्षेत्र के अत्यधिक संवेदनशील इलाके में पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर अपने घर तक के लिए एक मोटर सड़क ही बनवा दी थी. इस सड़क के कारण नैनीताल के इस ऊपरी इलाके में वाहनों की आवाजाही तो बढ़ी ही, जुलाई 2015 में यहां एक बड़ा भूस्खलन भी हुआ। इससे हजारों टन मलवा झील में भर गया था।
उच्च न्यायालय के प्रति नगर वासियों का आक्रोश इन स्थितियों के अलावा नगर के पंत पार्क क्षेत्र को यहां फड़ लगाकर अपनी आजीविका चलाने वाले कमजोर वर्ग के लोगों के लिए प्रतिबंधित कर यहां अपनी लंबी लग्जरी गाड़ियां खड़ी कर माल रोड की सैर पर निकलने को लेकर भी है। नगर की माल रोड पहले सीजन के भीड़भाड़ भरे दिनों में ही शाम छह बजे से आठ बजे तक वाहनों की आवाजाही के लिए प्रतिबंधित की जाती थी, लेकिन बीते कुछ वर्षों से यह वर्ष भर इस समय वाहनों के लिए बिना किसी लिखित आदेश के प्रतिबंधित की जाती है। नागरिकों का मानना है कि माल रोड को केवल विद्वान न्याायाधीशों की शाम की सैर के लिए और पंत पार्क को उनके वाहन खड़े करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है। सैर के दौरान न्यायाधीश गणों के सुरक्षाकर्मियों का उनके करीब किसी व्यक्ति को फटकने न देने के लिए हाथ-पांव मारना नगर के बुजुर्गों को अंग्रेजी दौर की याद दिलाता है, जब केवल अंग्रेज व उनके सुरक्षा कर्मी ही अपर माल रोड पर चल सकते थे, और भारतीयों को लोवर माल रोड से गुजरना पड़ता था। वैसे ही मिलते-जुलते दृश्य भी अब भी शाम को नगर की माल रोड में दिख जाते हैं।

अब उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल ने की नैनीताल से हार्इकोर्ट को कहीं और शिफ्ट करने की मांग 

व्यापार मंडल ने की नैनीताल से हाई कोर्ट शिफ्ट करने की मांगहल्द्वानी, 14 जून 2018 : नैनीताल से हार्इकोर्ट को शिफ्ट करने की मांग की जा रही है। उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल का कहना है कि नैनीताल में हार्इ कोर्ट के होने के चलतेे कर्इ तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।  हल्द्वानी में आयोजित प्रेस वार्ता में संगठन के प्रदेश महामंत्री नवीन वर्मा ने कहा कि नैनीताल में हाईकोर्ट की वजह से पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। व्यापारियों सहित आम लोगों को भी बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि यहां हार्इकोर्ट होने के कारण जाम और अव्यस्था के हालत बने रहते हैं।  पिछले दिनों नैनीताल से पर्यटकों को लौटना पड़ा। देशभर में यह संदेश गया कि नैनीताल में पर्यटकों को नहीं आने दिया जा रहा है। पर्यटकों को होटलों में बुकिंग के बाद भी नैनीताल नहीं आने दिया गया। इस अवसर पर संगठन के सरंक्षक बाबू लाल गुप्ता,  जिलाध्यक्ष विपिन गुप्ता, महानगर अध्यक्ष योगेश शर्मा सहित अन्य व्यापारी मौजूद रहे।

टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन ने भी की हाईकोर्ट को अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग

-कहा बढ़ते यातायात के साथ ही उच्च न्यायालय की वजह से नगर में जलापूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग पहली बार किसी संगठन के द्वारा खुलकर उठा दी गयी है। टैक्सी-ट्रेवल एसोसिएशन ने शनिवार को बकायदा पत्रकार वार्ता कर कहा कि वे इस संबंध में प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और सांसद भगत सिंह कोश्यारी तथा यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा नैनीताल नगर से उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने के बयान का पुरजोर समर्थन करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी भावनाओं का संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करेंगे, ताकि नैनीताल पर्यटन नगरी में बढ़ रहे यातायात एवं इसके द्वारा हो रही समस्याओं से निजात एवं उच्च न्यायालय में आने वाले वादकारियों को राहत मिल सके।
नैनीताल क्लब में पत्रकार वार्ता करते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष नीरज जोशी ने एक नये तथ्य को शामिल करते यह आरोप भी लगाया कि उच्च न्यायालय की वजह से नगर में जलापूर्ति भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वजह से नगर में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से 10 से 15 हजार की जनसंख्या एवं प्रतिदिन 1 से 2 हजार वाहनों की संख्या भी बढ़ गयी है, जिसके कारण जाम की समस्या भी उत्पन्न हो गयी है, क्योंकि उच्च न्यायालय के समीप इन वाहनों के लिए पार्किग की उचित व्यवस्था भी नहीं है। इन कारणों से नगर की रीढ़-पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। संगठन का यह भी मानना है कि नगर में उच्च न्यायालय के लिए पर्यप्त स्थान भी उपलब्ध नहीं है। पत्रकार वार्ता में संगठन के संरक्षक हारून खान पम्मी व कोषाध्यक्ष ओमवीर सिंह आदि भी मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें : महाराज के बयान के बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय के बाबत शुरू हुई नयी बहस

नैनीताल से हाईकोर्ट हटाओ : कोश्यारी (राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 3 अगस्त 2015 , पेज-2)

स्थानीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी के बाद प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने नैनीताल से उत्तराखंड उच्च न्यायालय को सर्वाधिक मामलों वाले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित करने के संबंध में बयान दिया है। इससे यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष सनप्रीत सिंह अजमानी द्वारा बीते जनवरी माह में देश के राष्ट्रपति के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखंड के राज्यपाल, केंद्र एवं उत्तराखंड सरकार के कानून मंत्रियों को उत्तराखंड उच्च न्यायालय को अन्यत्र स्थानांतरित करने की उठाई गयी मांग फिर से चर्चा में आ गयी है। यूथ बार एसोसिएशन का कहना था कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय पुराने सचिवालय के पुराने भवन में स्थापित है। यहां स्थान की कमी की वजह से वादकारियों व अधिवक्ताओं के साथ ही न्यायाधीशों को भी असुविधा हो रही है। पत्र में उच्च न्यायालय के डा. अजय रावत की नैनीताल से संबंधित जनहित याचिका पर पार्किंग की अनुपलब्धता से संबंधित फैसले का जिक्र भी किया गया था।

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उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सबसे पहले क्षेत्रीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी अगस्त 2015 में नैनीताल नगर की कमजोर भौगोलिक स्थितियों के मद्देनजर विद्वान न्यायाधीशों की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय को नैनीताल से हटाने की सार्वजनिक तौर पर मांग कर चुके हैं, जबकि इधर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने नगर में पर्यटन के प्रभावित होने का हवाला देते हुए निजी राय व्यक्त करते हुए कहा है कि उच्च न्यायालय को अधिक मामलों वाले हरिद्वार-ऊधमसिंह नगर जिलों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि उच्च न्यायालय के नैनीताल से जाने से यहां यातायात का दबाव कम होगा, साथ ही पर्यटन को लाभ मिलेगा। इस बारे में नगर के विभिन्न वर्गों से बात की गयी, तो नगर के अधिवक्ताओं को छोड़कर अन्य वर्ग के लोग भी कोश्यारी व महाराज के बयानों के समर्थन में दिखे।

चित्र परिचयः 19एनटीएल-3ः नैनीताल। उच्च न्यायालय एवं जिल न्यायालय के अधिवक्ताओं हेतु आरक्षित पार्किंग के बोर्ड।

वहीं वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत ‘राजू’ का कहना था कि जिस तरह बीते पखवाड़े पहले उच्च न्यायालय व उसकी देखा देखी निचली अदालत ने भी अपने अधिवक्ताओं के लिए पार्किंग की जगह आरक्षित करा ली है। उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय ने सैलानियों से पार्किंग की व्यवस्था किये बिना नैनीताल न आने को कहा है और उनके हिस्से की पार्किग अपने अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित कर दी है। कहा कि नैनीताल नगर का दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है। वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है, या फिर हाईकोर्ट का। वहीं दूसरे वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह का कहना है कि पश्चिमी उत्तराखंड में नैनीताल उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित किये जाने से समस्या का समाधान हो सकता है। अलबत्ता पूर्व कांग्रेस व जनता दल से सांसद तथा बार एसोसिएशन व बार काउंसिल के अध्यक्ष रहे डा. महेंद्र पाल ने महाराज की टिप्पणी पर कहा कि पहले वे राज्य की राजधानी तय करवाएं, फिर उच्च न्यायालय की बात करें। वहीं नगर के अधिवताओं का बड़ा वर्ग अपने पेशेगत कारणों से नैनीताल में ही उच्च न्यायालय को बरकरार रखने का पक्षधर दिखा।

बयान पर महाराज को मंत्री पद से हटाने की मांग

नैनीताल। उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से अन्य जगह स्थानांतरित करने संबंधी बयान से उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिक्वताओ में रोष है। अधिवक्ताओं ने महाराज के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए सरकार से उन्हें केबिनेट मंत्री के पद से हटाने की मांग की है। साथ ही बृहस्पतिवार को अपराह्न एक बजे सतपाल महाराज का पुतला फूकने का निर्णय भी लिया गया है।
बुधवार को उच्च न्यायालय के अधिक्वता उच्च न्यायालय परिसर में एकत्र हुए और उन्होंने मंत्री के ब्यान की निंदा की। हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष डा. महेंद्र सिंह पाल ने कहा कि मंत्री कोे इस तरह का बयान देना शोभा नही देता है। पूर्व बार अध्यक्ष सैय्यद नदीम मून ने कहा कि नैनीताल के विकास में उच्च न्यायालय का योगदान रहा है प्रदेश सरकार के एक मंत्री का ऐसा बयान निंदनीय है। पूर्व सचिव त्रिभुवन फर्त्याल ने कहा कि मंत्री का बयान उत्तराखंड के विरोध को दर्शाता है। हरिद्वार के अधिवक्ता विवेक शुक्ला, पूर्व सचिव कमलेश, शक्ति प्रताप सिंह, भुवनेश जोशी, सौरभ अधिकारी सहित अन्य अधिक्वता भी शामिल रहे।

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू की कलम से… यह भी पढ़ें : जो हाईकोर्ट नैनीताल के लिए बेहद चिंतित दिखता है, क्या वही उसकी एक बड़ी मुसीबत भी बन गया है?

नैनीताल में कई लोगों का मानना है कि उसका दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है. वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है या फिर हाईकोर्ट का

एक मई के बाद अगर आप नैनीताल जाने की सोच रहे हैं और अपने ही वाहन से जाने की सोच रहे हैं तो पहले अपनी पार्किंग की व्यवस्था पक्की कर लें. अन्यथा आपको वहां से बैरंग वापस लौटना पड़ सकता है. नैनीताल हाईकोर्ट ने नैनीताल को ईको सेंसटिव जोन घोषित करने के मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जिला प्रशासन को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है – एक मई के बाद निजी वाहनों से आने वाले पर्यटकों को पार्किंग की अग्रिम व्यवस्था का प्रमाण देने के बाद ही शहर में प्रवेश करने दिया जाए. अदालत ने यह भी कहा है कि इस बारे में पर्याप्त प्रचार करने के लिए चार राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन भी दिए जाएं.

नैनीताल में पार्किंग की समस्या को देखते हुए हाईकोर्ट को इस तरह के निर्देश देने पड़े हैं. नैनीताल शहर में पर्यटकों का बढ़ता दबाव और वाहनों की बढ़ती संख्या अब एक बड़ी समस्या बन गई है. भीड़ के चलते अनेक बार ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि पूरे दिन वाहन सड़कों पर कुछ मीटर भी आगे नहीं बढ़ पाते. नैनीताल शहर का एक मात्र खेल मैदान बरसों से पार्किंग के काम में आ रहा है. मगर अब इससे भी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा रहा. हाईकोर्ट ने अब इस खेल मैदान के पार्किंग के लिए दुरूपयोग पर भी नाराजगी जताई है.

हाईकोर्ट की इस सख्ती से यह तो समझ में आता है कि वह एक पर्यटक शहर के रूप में नैनीताल की बदहाली को लेकर कितना चिंतित है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि नैनीताल की इस बढ़ती बदहाली के लिए वह भी किसी न किसी रूप में जिम्मेदार है.

झील के चारों ओर बसे नैनीताल शहर पर आबादी का दबाव अपने सेचुरेशन पाइंट को बहुत पहले ही पार कर चुका है. पर्यावरण और भूगर्भीय खतरों के चलते नैनीताल में निर्माण कार्यो पर कई तरह के प्रतिबंध भी लागू हैं. भूगर्भीय दृष्टि से नैनीताल कितना संवेदनशील है इसका पता सितंबर 1880 के उस भयावह भूस्खलन से चलता है जिसमें 151 लोग मारे गए थे और कई इमारतें जमींदोज हो गई थीं.

उस दुर्घटना के बाद अंग्रेजों ने वैसे किसी दूसरे हादसे से बचाने के लिए नैनीताल के कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में भवन निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया. पूरे शहर की पहाड़ियों से बारिश के पानी की एक-एक बूंद को नालियों के जरिए नियंत्रित करके झील तक पहुंचाने के लिए 90 मील लम्बी नालियों का जाल बिछाया गया. लेकिन 90 के दशक के बाद यहां अवैध निर्माणों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह हाईकोर्ट की स्थापना और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद थमा नही है. उल्टे हाईकोर्ट बनने के बाद शहर में उसकी जरूरतों के हिसाब से नए निर्माणों की शुरूआत हो गई.

सचिवालय भवन में हाईकोर्ट की स्थापना के बाद कुमाऊं विश्वविद्यालय के ब्रुकहिल हॉस्टल, वन विभाग के कैंटन लॉज तथा सिल्विकल्चर विभाग के भवन अब हाईकोर्ट की संपत्ति हो चुके हैं. दो सौ मीटर दूरी पर आर्डवैल तक की सारी राज्य संपत्ति भी अब उसके अधीन ही है. इसके अलावा नैनीताल के दर्जनों सरकारी कार्यालय भी कोर्ट के ही कारण अन्यत्र स्थानांतरित कर दिए गऐ हैं. कभी उद्यान विभाग का उद्यान नैनीताल में पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र था. अब इसका भी एक बड़ा हिस्सा हाईकोर्ट के वकीलों के चैंबरों में बदल चुका है. वहां पर मौजूद भारी भरकम ओवर ब्रिज पर्यावरण के प्रति उपेक्षा का प्रतीक जैसा लगता है.

एक ओर हाईकोर्ट नैनीताल के अवैध निर्माणों पर कड़ा रूख अपनाता रहा है मगर खुद उसके लिए कैंटन लॉज इलाके में ‘नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड’ के जरिए 84 टाइप एक भवन, घरेलू कर्मचारियों के लिए छह भवन और न्यायाधीशों के लिए चार भवनों का निर्माण करवाया जा रहा है. गौरतलब है कि यह निर्माण उसी इलाके में कराया जा रहा है जो नैनीताल झील का मुख्य जलग्रहण क्षेत्र है और भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है. लगभग 400 कमरों वाले इस निर्माण पर एनएलआरएसएडीए (नैनीताल लेक रीजन स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) भी अपनी आपत्ति जता चुका है. लेकिन मामला हाईकोर्ट से जुड़ा होने के कारण निर्माण कार्य पर रोक नहीं लग सकी.

शहर में कई अवैध निर्माण कार्य भी हाईकोर्ट की आड़ में हुए हैं. यहां के कुछ वकीलों पर अवैध निर्माणों के आरोप लग चुके हैं. इसके अलावा कुछ वर्ष पूर्व एक स्थानीय जज साहब ने शेर का डांडा क्षेत्र के अत्यधिक संवेदनशील इलाके में पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर अपने घर तक के लिए एक मोटर सड़क ही बनवा दी थी. इस सड़क के कारण नैनीताल के इस ऊपरी इलाके में वाहनों की आवाजाही तो बढ़ी ही, जुलाई 2015 में यहां एक बड़ा भूस्खलन भी हुआ. इससे हजारों टन मलवा झील में भर गया था.

गर्मियों में पर्यटकों को पार्किंग का इंतजाम करके आने का निर्देश देने वाले हाईकोर्ट ने नैनीताल में सामान्य लोगों की एक प्रमुख पार्किंग को भी अपने वकीलों के लिए आरक्षित कर दिया है. उसके निर्देश पर जिला प्रशासन ने मेट्रोपोल होटल की एक बड़ी पार्किंग हाईकोर्ट के वकीलों के लिए आरक्षित कर दी है. इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने जिला अदालत के वकीलों के लिए भी शहर में पार्किंग आरक्षित करने के बोर्ड लगाने शुरू कर दिए हैं. एक और नैनीताल में पार्किंग नियमों में थोड़ी सी चूक होने पर दस हजार रूपए तक का जुर्माना लग चुका है और दूसरी ओर वकीलों के लिए आरक्षित पार्किंग निःशुल्क हैं. इस मुद्दे को लेकर स्थानीय जनता में काफी रोष है और नैनीताल के नागरिक संगठनों ने अब इसका विरोध करना भी शुरू कर दिया है.

लेकिन समस्या सिर्फ इतनी नहीं है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जब शहर में निकलते हैं तो मल्लीताल में फौवारे के आसपास का इलाका उनके वाहनों की पार्किंग में बदल जाता है और पर्यटकों को उसके आसपास भी फटकने तक नहीं दिया जाता. पहले सीजन के भीड़भाड़ भरे दिनों में ही शाम छह बजे से आठ बजे तक माल रोड पर वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित की जाती थी मगर अब हाईकोर्ट की वजह से यह प्रतिबंध पूरे साल लागू रहता है. इस दौरान हाई कोर्ट के जजों को मॉल रोड पर इवनिंग वॉक करते देखा जा सकता है. उनकी देखा-देखी लोअर ज्यूडिशियरी के जज भी अब ईवनिंग वाक का मजा लेने लगे हैं.

ऐसे मौकों पर कई बार जजों के सुरक्षाकर्मी व गनर आगे-पीछे की जनता को तितर बितर करते हुए देखे जा सकते हैं. नैनीताल के बुजुर्ग इस स्थिति की तुलना अंग्रेजी राज के उन दिनों से करते हैं जब भारतीय लोगों का माल रोड पर चलना प्रतिबंधित होता था. ऐसे में जब शहर की बची-खुची सामान्य पार्किंग को निदान अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित किया जाने लगा है तो एक बार फिर इसके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.

‘संविधान के अनुसार किसी खास पेशे में होने के कारण कोई व्यक्ति विशेष नागरिक अधिकार हासिल नहीं कर लेता. सार्वजनिक पार्किंग स्थल कोर्ट की प्रापर्टी नहीं है, इसलिए इस तरह का आरक्षण वैध नहीं ठहराया जा सकता’ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आईबी सिंह कहते हैं.

नैनीताल के जनजीवन पर हाईकोर्ट का दखल जिस तरह से बढ़ता जा रहा है उसके कारण अब ऐसी चर्चाएं भी होने लगी हैं कि क्या उसे हाईकोर्ट की जरूरत है भी! ऐसी चर्चा करने वालों का मानना है कि नैनीताल के लिए दो चरित्रों का शहर बनकर रहना बड़ा मुश्किल है. वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है या फिर हाईकोर्ट का. 600 से ज्यादा वकीलों, इतने ही स्टाफ और हर रोज आने वाले सैकड़ों मुवक्किलों के दबाव से यह बुरी तरह कराहने लगा है. पर्यटक शहर की मस्ती पर जिस तरह से हाईकोर्ट का आतंक छाया हुआ है, उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्यों न उसे कहीं और ट्रांसफर कर दिया जाए!

इसके लिए यह तर्क भी दिया जा रहा है कि राजधानी और हाईकोर्ट अलग-अलग शहरों में होने से सरकारी मुकदमों में धन और समय का भारी अपव्यय हो रहा है. हालांकि ऐसा तर्क देने वालों को यह भी पता है कि नैनीताल की खूबसूरती का मोह ही ऐसा है कि हाईकोर्ट आसानी से उस पर अपना ‘विशेषाधिकार’ छोड़ने वाला नहीं है.

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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