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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 10 जनवरी 2026 (Deepali Sharma Reinstatement)। उत्तराखंड के नैनीताल स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) से न्याय और प्रशासन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया है। उच्च न्यायालय ने दीवानी अदालत की न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) रही दीपाली शर्मा (Judge Deepali Sharma) की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा की निरंतरता और वरिष्ठता सहित बहाल करने के आदेश दिए हैं।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह माना जाएगा कि दीपाली शर्मा को कभी सेवा से हटाया ही नहीं गया था। साथ ही, अदालत ने निर्देश दिया कि मध्यवर्ती अवधि के लिए वह अवशेष लाभों (Back Benefits) के 50 प्रतिशत की हकदार भी होंगी और इससे उनकी वरिष्ठता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह फैसला न्यायिक सेवा, निष्पक्ष जांच और विधिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

न्यायालय का आदेश और जांच प्रक्रिया की खामियां

इस प्रकरण की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र (Chief Justice G Narendra) और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय (Justice Subhash Upadhyay) की खंडपीठ (Division Bench) में हुई। अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों (Records) की गहन समीक्षा के बाद जांच प्रक्रिया में “महत्वपूर्ण कमियां” पाईं। न्यायालय के अनुसार, मामले की मुख्य गवाह किशोरी और उसके पिता—दोनों ने दीपाली शर्मा के विरुद्ध लगाए गए आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि उनके साथ उचित व्यवहार किया गया।

अदालत ने यह भी माना कि जांच के आधार पर दीपाली शर्मा को हटाने जैसा कठोर कदम उठाने से पहले प्रक्रिया का पूर्णतः विधिसम्मत होना आवश्यक था। क्या किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई में प्रक्रिया ही प्रश्नों के घेरे में आ जाए, तो निर्णय कितना टिकाऊ रह जाता है—यह सवाल इस फैसले के बाद केंद्र में आ गया है।

2018 की शिकायत से शुरू हुआ मामला, 2020 में सेवा समाप्ति का प्रस्ताव

(Deepali Sharma Reinstatement) Court Express : Uttarakhand Civil Judge Dismissed for Torturing Minor Girlयह पूरा प्रकरण वर्ष 2018 में एक गुमनाम शिकायत (Anonymous Complaint) के बाद शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि हरिद्वार (Haridwar) में दीवानी न्यायालय की न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) के रूप में तैनाती के दौरान दीपाली शर्मा ने एक 14 वर्षीय नाबालिग किशोरी को अपने घर में घरेलू काम के लिए रखा, उसके स्वास्थ्य की उपेक्षा की और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाया। इसके बाद जांच हुई और उत्तराखंड उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ (Full Court) ने 14 अक्टूबर 2020 को उनकी सेवाएं समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया। आगे चलकर इस संबंध में शासनादेश (Government Order) भी जारी किया गया था।

नवंबर 2020 में नौ न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ के प्रस्ताव और उसके बाद जारी शासनादेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। इसके बाद खंडपीठ ने पूरे मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण किया।

छापेमारी की अनुमति को लेकर सवाल, टीम की तैनाती पर भी टिप्पणी

अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि 2018 में हरिद्वार स्थित जजेस कॉलोनी (Judges Colony) में दीपाली शर्मा के आधिकारिक आवास पर की गई छापेमारी (Raid) के लिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ (KM Joseph) से कोई पूर्व स्वीकृति (Prior Approval) प्राप्त नहीं की गई थी। न्यायालय ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई अनुमोदन उपलब्ध नहीं है।

इसके अतिरिक्त, अदालत ने इस बात पर भी प्रश्न उठाए कि एक महिला न्यायिक अधिकारी के आवास पर छापेमारी के लिए 18 से 20 अधिकारियों की टीम तैनात करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। आसपास कई न्यायाधीशों के आवास होने के बावजूद कोई स्वतंत्र गवाह कदाचार की पुष्टि के लिए सामने नहीं आया—यह तथ्य भी अदालत के सामने निर्णायक रूप में आया।

बाल श्रम नहीं, बल्कि आचरण नियमों के आधार पर तैयार किए गए आरोप

न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि दीपाली शर्मा के विरुद्ध आरोप बाल श्रम (Child Labour) से संबंधित नहीं माने गए, बल्कि उत्तराखंड सरकारी सेवक नियम, 2002 (Uttarakhand Government Servants Rules, 2002) के अंतर्गत निष्ठा और कार्य-आचरण से जुड़े विषय के रूप में तैयार किए गए थे। अदालत के अनुसार घरेलू काम के लिए बच्चों को नियोजित करने से संबंधित विशिष्ट नियमों (Specific Rules) को लागू नहीं किया गया था।

इस निष्कर्ष के बाद अदालत ने 14 अक्टूबर 2020 के पूर्ण न्यायालय (Full Court) के प्रस्ताव और उसके बाद जारी सेवा समाप्ति के शासनादेश को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिए कि दीपाली शर्मा को सेवा की निरंतरता और वरिष्ठता सहित बहाल किया जाए, तथा बीच की अवधि के बकाया लाभों का 50 प्रतिशत भुगतान किया जाए।

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मानव पक्ष: सेवा, सम्मान और न्याय की कसौटी

यह निर्णय केवल एक अधिकारी की बहाली नहीं है, बल्कि यह न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रक्रिया की अनिवार्यता को भी रेखांकित करता है। किसी भी शिकायत पर कार्रवाई आवश्यक हो सकती है, लेकिन क्या वह कार्रवाई पूरी तरह विधिक कसौटी पर खरी उतरती है—यह उतना ही जरूरी प्रश्न है। ऐसे फैसले न्यायिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों के मनोबल, सेवा सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़े रहते हैं।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बहाली के बाद सेवा लाभों के भुगतान और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं कितनी तेजी से पूरी होती हैं और इस फैसले का भविष्य में न्यायिक सेवा के मामलों पर क्या व्यापक प्रभाव पड़ता है।

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By डॉ.नवीन जोशी

डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, 'कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन 'नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड' के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।

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