रूढ़ियों की बेड़ियाँ तोड़ती बेटियाँ: पिथौरागढ़ में दो बहनों ने पिता की अर्थी को दिया कंधा, रामगंगा घाट पर दी मुखाग्नि

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‘नवीन समाचार’, पिथौरागढ़, 31 मार्च 2026 (Daughters Broak Shackles of Tradition)। उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के बेरीनाग क्षेत्र से सामाजिक परिवर्तन की एक अत्यंत प्रेरणादायक और भावुक कर देने वाली खबर सामने आई है। पाताल भुवनेश्वर क्षेत्र के ग्राम नैनी शीतला (मोना) निवासी 75 वर्षीय नंदन सिंह दसौनी के निधन के पश्चात उनकी दो विवाहित पुत्रियों ने सदियों पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं को धता बताते हुए न केवल पिता की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि श्मशान घाट पर मुख्य कर्मकांड संपन्न कर मुखाग्नि भी दी। समाज को आईना दिखाने वाले इस साहसिक निर्णय की संपूर्ण क्षेत्र में मुक्तकंठ से सराहना हो रही है।

Daughters Broak Shackles of Tradition‘नवीन समाचार’ को प्राप्त जानकारी के अनुसार, नंदन सिंह दसौनी का सोमवार की रात्रि लंबी बीमारी के पश्चात देहांत हो गया था। उनका कोई पुत्र नहीं था, केवल दो विवाहित पुत्रियाँ—हेमा कार्की और नीमा कार्की हैं। पिता के निधन का समाचार मिलते ही दोनों बहनें अपने ससुराल से मायके पहुँचीं। मंगलवार सुबह जब अंतिम संस्कार की तैयारी प्रारंभ हुई, तो पितृसत्तात्मक परंपराओं के अनुरूप ग्रामीणों और बुजुर्गों के मध्य इस बात पर चर्चा होने लगी कि मुखाग्नि चचेरे-तहेरे भाइयों में से किसी पुरुष सदस्य को देनी चाहिए।

“भाई नहीं तो क्या हुआ, हम हैं बेटे”: बेटियों का दृढ़ संकल्प

Daughters Broak Shackles of Traditionपरंपरागत तर्कों और असमंजस की स्थिति के बीच दोनों बेटियाँ हेमा और नीमा ढाल बनकर खड़ी हो गईं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि उनका भाई नहीं है, तो वे स्वयं बेटे का उत्तरदायित्व निभाएंगी। उन्होंने बुजुर्गों के तर्कों को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और पिता के अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कीं। इसके पश्चात दोनों बहनों ने पिता की अर्थी को अपने कंधों पर उठाया और थल स्थित रामगंगा घाट (Ramganga Ghat) तक शव यात्रा का नेतृत्व किया।

अश्रुपूरित नेत्रों के बीच रामगंगा तट पर अंतिम विदाई

थल के रामगंगा घाट पर उपस्थित जनसमूह के बीच दोनों बेटियों ने अपने पिता की चिता को मुखाग्नि दी। इस दृश्य को देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं। उल्लेखनीय है कि इन बेटियों की माता का भी एक वर्ष पूर्व लंबी बीमारी से निधन हो गया था। माता-पिता के साये के उठ जाने के बाद भी बेटियों ने जिस धैर्य और साहस का परिचय दिया, वह समाज में बदलती सोच का जीवंत प्रतीक बन गया है।

सीमांत में निरंतर टूट रही हैं रूढ़िवादी दीवारें

पिथौरागढ़ जनपद में यह पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व दिसंबर 2025 में गंगोलीहाट के सिमलकोट में एक पूर्व सैनिक की सात बेटियों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया था, जिनमें से सीआइएसएफ (CISF) में कार्यरत एक बेटी ने मुंडन कराकर बेटे के रूप में समस्त कर्मकांड पूर्ण किए थे। भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष दीपक धानिक और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि जिम्मेदारियों के निर्वहन में अब बेटा-बेटी का भेद मिट रहा है।

यह घटना उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो पुत्र न होने पर स्वयं को असहाय समझते हैं। हेमा और नीमा जैसी बेटियों ने सिद्ध कर दिया है कि प्रेम और कर्तव्य की कोई लैंगिक सीमा नहीं होती।

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