डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 28 मार्च 2026 (Lord Rama and Devbhumi Uttarakhand)। उत्तराखंड (Uttarakhand), जिसे आदि काल से ‘देवभूमि’ के नाम से पूजा जाता है, का मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) और रामायण काल से अत्यंत गहरा और जीवंत संबंध है। यह पावन धरती केवल ऋषि-मुनियों की तपोस्थली ही नहीं रही, बल्कि यहाँ के पर्वत, नदियाँ और मंदिर भगवान राम के जीवन के उन रहस्यों को संजोए हुए हैं, जो अयोध्या (Ayodhya) से लेकर हिमालय के शिखर तक विस्तृत हैं।
गुरु वशिष्ठ (Guru Vashistha) द्वारा सरयू को अयोध्या ले जाने की कथा हो या, लक्ष्मण के मूर्छित होने पर संजीवनी बूटी ले जाने और माता सीता का निर्वासन काल, देवभूमि का कण-कण रामायण के साक्ष्यों से गुंजायमान है। उत्तराखंड सरकार अब इन पौराणिक स्थलों को ‘रामायण सर्किट’ (Ramayana Circuit) के रूप में विकसित कर रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भगवान राम के ‘हिमालयी जुड़ाव’ से परिचित हो सकें। ऋषिकेश से लेकर देवप्रयाग और सीमांत बागेश्वर से पिथौरागढ़ तक बिखरे ये स्थल न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
सरयू का उद्गम और बागेश्वर की पौराणिक गाथा
महर्षि वशिष्ठ और सरयू का धरती पर अवतरण
अयोध्या की जीवनधारा पवित्र सरयू नदी (Saryu River) का उद्गम उत्तराखंड के बागेश्वर (Bageshwar) जिले में स्थित ‘सरमूल’ (Sarmool) नामक स्थान से होता है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान राम के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ (Maharishi Vashistha), ब्रह्मा जी की मानसपुत्री सरयू को जैसे भगवान राम के पूर्वज भगीरथ ने गंगा जी को स्वर्ग से उत्तराखंड की धरा पर ही उतारा था, इसी भांति ही, अयोध्या के कल्याण हेतु हिमालय से नीचे ला रहे थे। नंदाकोट पर्वत के पास से निकलकर जब सरयू वशिष्ठ के पीछे-पीछे चल रही थीं, तब बागेश्वर के समीप एक अद्भुत घटना घटी।
महर्षि मार्कण्डेय और बागेश्वर का नामकरण
बागेश्वर के समीप महर्षि मार्कण्डेय (Maharishi Markandeya) तपस्यारत थे, जिस कारण सरयू का मार्ग अवरुद्ध हो गया और जल प्रलय की स्थिति बनने लगी। तब कुलगुरु वशिष्ठ की प्रार्थना पर भगवान शिव ने ‘बाघ’ और माता पार्वती ने ‘गाय’ का रूप धारण किया। गाय के कातर स्वर में रम्भाने से मार्कण्डेय ऋषि की तपस्या भंग हुई और सरयू को आगे बढ़ने का मार्ग मिला। इसके बाद ही महादेव यहाँ ‘व्याघ्रेश्वर’ (Byaghreshwar) के रूप में यहाँ स्थापित हुए, और इस स्थान का नाम अपभ्रंश होकर बागेश्वर पड़ा।
पिथौरागढ़ का रामेश्वर धाम: शस्त्र शिक्षा और स्वर्गारोहण
रामेश्वर में गुरु वशिष्ठ से ग्रहण की शिक्षा
पिथौरागढ़ (Pithoragarh) से 40 किमी दूर सरयू नदी के किनारे ही रामगंगा के संगम पर स्थित रामेश्वर मंदिर (Rameshwar Temple) का जुड़ाव तो सीधे श्री राम से जुड़ा है। स्कंद पुराण के ‘मानस खंड’ में वर्णित है कि श्रीराम के कुलगुरु वशिष्ठ का यहाँ आश्रम था। वह चारों राजकुमारों (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) को शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा देने हेतु इसी हिमालयी घाटी में लाए थे। संगम तट पर स्थित इसी आश्रम में भगवान राम ने धनुर्विद्या और वेदों का ज्ञान प्राप्त किया था।
बैकुंठ प्रस्थान से पूर्व शिवलिंग की स्थापना
एक अन्य महत्वपूर्ण मान्यता के अनुसार, राजपाठ त्यागने के पश्चात भगवान राम ने इसी स्थान पर प्राकृतिक शिवलिंग की पूजा की और शिव मंदिर की स्थापना की। स्कंद पुराण के अनुसार, यहीं से उन्होंने वैकुंठ लोक हेतु ‘स्वर्गारोहण’ (Ascension to Heaven) किया था। स्थानीय लोग इसे सेतुबंध रामेश्वर से भी अधिक फलदायी मानते हैं। यहाँ आज भी श्राद्ध तर्पण और यज्ञोपवीत संस्कार जैसे पवित्र कार्य संपन्न किए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि सरयू नदी आगे अन्य नदियों से मिलती हुए शारदा व घाघरा भी कही जाती है, लेकिन अयोध्या पहुंचकर पुनः सरयू ही कहलाती है।
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सीतावनी: माता सीता का निर्वासन और लव-कुश का जन्म
वाल्मीकि आश्रम में व्यतीत हुआ वनवास
नैनीताल (Nainital) जनपद के रामनगर के समीप घने वनों में स्थित सीतावनी (Sitabani) माता सीता के धैर्य और मातृत्व का साक्षी है। रामायण के अनुसार, निर्वासन के दौरान माता सीता ने यहीं महर्षि वाल्मीकि (Maharishi Valmiki) के आश्रम में आश्रय लिया था। यहीं पर सीता-राम के पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ और उन्होंने शस्त्र विद्या सीखी। इसी वन क्षेत्र में लव-कुश का भगवान राम की सेना के साथ ऐतिहासिक युद्ध भी हुआ था।
प्राकृतिक जल-धारे और त्वचा रोगों से मुक्ति
सीतावनी क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। स्कंद पुराण के अनुसार, यहाँ सीता, लव और कुश के नाम से पवित्र जल-धारे मौजूद हैं। मान्यता है कि इन धाराओं में स्नान करने से असाध्य त्वचा रोगों से मुक्ति मिल जाती है। यह क्षेत्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा प्रबंधित है, जहाँ आज भी त्रेता युग की शांति और पौराणिकता का अनुभव किया जा सकता है।
दूनागिरी और भरतकोट: हनुमान का संजीवनी पथ और भरत के बाण से धराशायी होने की अनूठी कथा
नवीन समाचार, अल्मोड़ा, 28 मार्च 2026। देवभूमि उत्तराखंड (Uttarakhand) के कण-कण में रामायण (Ramayana) के प्रमाण बिखरे हुए हैं। अल्मोड़ा (Almora) जनपद के द्वाराहाट (Dwarahat) क्षेत्र में स्थित ‘दूनागिरी’ (Dunagiri) पर्वत और समीपवर्ती ‘भतकोट’ (Bhatkot) का संदर्भ भगवान राम के प्रति अगाध श्रद्धा और एक रोचक ऐतिहासिक घटना का केंद्र है। लोक मान्यताओं और क्षेत्रीय पुराणों के अनुसार, लंका युद्ध (Lanka War) के दौरान जब मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण मूर्छित हुए थे, तब हनुमान (Hanuman) इसी दूनागिरी पर्वत शृंखला पर संजीवनी बूटी (Sanjeevani) लेने आए थे।
दूनागिरी: द्रोणागिरी का वह अंश जिसे हनुमान ले गए थे
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब हनुमान जी को संजीवनी बूटी की पहचान नहीं हो सकी, तो उन्होंने संपूर्ण पर्वत शिखर को ही हथेली पर उठा लिया। माना जाता है कि दूनागिरी (Dronagiri) का अर्थ ही ‘द्रोण का अंश’ है। यहाँ आज भी मां दूनागिरी का भव्य मंदिर स्थित है, जहाँ वैष्णवी रूप में शक्ति की पूजा होती है। इस क्षेत्र की वनस्पतियों और औषधीय गुणों को आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
भरतकोट: जहाँ भरत के बाण ने हनुमान को ‘राक्षस’ समझकर गिराया
दूनागिरी से कुछ ही दूरी पर ‘भरतकोट’ या ‘भतकोट’ (Bharatkot) नामक स्थान स्थित है, जिसका संबंध भगवान राम के अनुज भरत (Bharat) से है। मान्यता है कि जब हनुमान जी संजीवनी बूटी युक्त विशाल पर्वत खंड लेकर आकाश मार्ग से अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे, तब नंदीग्राम (Nandigram) में तपस्यारत भरत ने आकाश में एक विशाल आकृति को उड़ते देखा। उन्होंने इसे कोई मायावी राक्षस (Demon) समझ लिया।
भरत ने ‘भरतकोट’ की पहाड़ी पर अपना एक घुटना जमीन पर टेककर (Kneeling down) और धनुष पर बाण चढ़ाकर उस उड़ती हुई आकृति पर प्रहार किया। बाण लगते ही हनुमान ‘राम-राम’ का जाप करते हुए इसी ‘भरतकोट’ की पहाड़ी पर आ गिरे। जब भरत को ज्ञात हुआ कि यह राम के अनन्य भक्त हनुमान हैं, तो उन्हें अत्यंत ग्लानि हुई। बताया जाता है कि ‘भरतकोट’ की पहाड़ी पर आज भी भरत के घुटना जमीन पर टेकने के चिह्न मौजूद हैं। यह स्थान आज भी साधुओं की तपस्थली के रूप में विख्यात है। आप यह संबंधित वीडिओ भी जरूर देखना चाहेंगे :
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर के रूप में संरक्षण
भरतकोट की यह घटना भाई के प्रति भाई के प्रेम और भक्त की परीक्षा का अद्भुत संगम है। स्थानीय लोग बताते हैं कि जिस स्थान पर भरत ने घुटना टेका था, वहाँ आज भी विशेष चिह्न मौजूद हैं। उत्तराखंड सरकार ‘रामायण सर्किट’ (Ramayana Circuit) के अंतर्गत दूनागिरी और भरतकोट को जोड़ने की योजना बना रही है। यहाँ प्रत्येक वर्ष विशेष उत्सवों का आयोजन होता है, जो त्रेता युग की इन यादों को जीवंत बनाए रखते हैं।
देवभूमि में राम के अन्य प्रमुख पदचिह्न
देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर: रावण वध के पश्चात ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति हेतु भगवान राम ने अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर स्थित इसी मंदिर में कठिन तपस्या की थी।
चाई गांव (जोशीमठ): यहाँ माता सीता का प्राचीन मंदिर है, जहाँ उन्हें ‘वेदवती’ के रूप में पूजा जाता है।
राम करेला: उत्तराखंड की पहाड़ियों में पाई जाने वाली यह विशेष सब्जी ‘राम करेला’ कहलाती है। माना जाता है कि वनवास के दौरान भगवान राम ने इसका सेवन किया था।
कुश गांव (नारायणबगड़): चमोली के इस गांव में पौराणिक लव-कुश मंदिर स्थित है, जिसे स्थानीय लोग अपना आराध्य मानते हैं।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
