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अनूठी कहानी: इंजीनियर पिता ने स्कूल नहीं भेजी बेटियां, पर सीधे दिलाई 10वीं की परीक्षा

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एनआईटी से बीटेक ओर आईआईटी मुम्बई से ग्राफिक डिजाइन का कोर्स कर चुके एक पहाड़ प्रेमी इंजीनियर पिता द्वारा अपनी बेटियों को स्कूल न भेजकर सीधे जीवन में पहली 10वीं की परीक्षा दिलाने की अनूठी कहानी प्रकाश में आई है। गुड़गांव में ग्राफिक इंजीनियर के तौर पर नौकरी के बाद अपनी जड़ों-पहाड़ से प्रेम के चलते पहले हल्द्वानी और फिर अल्मोड़ा जिले के अल्मोड़ा के कफड़खान के करीब बाराकोट-देवड़ा रोड के निकट सल्ला गांव में रह कर ऑर्गेनिक फार्मिंग की पद्धति सीख रहे मूलतः पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी से आगे सीमांत मिलम गांव के निवासी नवीन पांगती ने अपनी दो बेटियों मृणाल व कृतिका को किसी अन्य कारण नहीं वरन स्कूलों की मौजूदा दशा और शिक्षण व्यवस्था से आहत होकर स्कूल नहीं भेजा, और घर पर ही पति-पत्नी ने उन्हें अक्षर व गणित का प्राकृतिक तरीके से मूलभूत ज्ञान कराने के साथ ही सभी विषयों में इतना प्रवीण कर दिया कि बिना स्कूल गये ही बड़ी 15 वर्षीया बेटी मृणाल ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग से 10वीं की परीक्षा दिलाई है, और पूरी उम्मीद है कि वह इस परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण भी हो जाएगी। साथ ही छोटी 13 वर्षीया बेटी कृतिका भी इसी तरह परीक्षा देने की तैयारी कर रही है। सौका समुदाय से आने वाले नवीन के पिता अभी भी हल्द्वानी में ही परिवार के साथ रह रहे हैं। उनके पूर्वज पूर्व में गर्मियों में पिथौरागढ़ जिले के मिलम गांव और सर्दियों में थल के करीब भैंसखाल में रहते थे।

इंजीनियर पिता के बेटियों को स्कूल न भेजने के तर्क
ग्राफिक इंजीनियर नवीन का कहना है कि गुड़गाव में कार्य करते हुए अपनी जड़ें-पहाड़ अपनी ओर खींचता था। इसलिए करीब 6 साल पहले परिवार सहित हल्द्वानी आ गए। यहां से भी खींचने लगे तो सल्ला गांव आ गए। नवीन का कहना है कि स्कूल में शिक्षकों का ध्यान पढ़ाने व सिखाने से अधिक परीक्षाओं पर रहता है। उनका दावा है कि स्कूल जाने से बच्चों में पढ़ने व सीखने की प्रवृत्ति खत्म हो जाती है। यह अनुभव उन्होंने गुड़गांव में मृणाल को कक्षा 2 तक स्कूल पढ़ाकर देखा, लेकिन ऐसी प्रवृत्ति देखने के बाद स्कूल से निकाल लिया। लिहाजा 15 साल उम्र में मृणाल ने जिंदगी की पहली परीक्षा के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग में 10वीं की परीक्षा को ऑन लाइन आवेदन किया, और ऑन डिमांड के आधार पर हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान के प्रश्न पत्र देहरादून के केंद्र पर दिए। अंतिम प्रश्न पत्र 27 मार्च को हुआ। आगे मृणाल का रुझान इतिहास, राजनीतिशास्त्र व मनोविज्ञान की ओर है, तथा वह वकालत या मनोविज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाना चाहती है। आगे छोटी बेटी कृतिका भी, जो कभी स्कूल ही नहीं गई, उसे भी इसी तरह ओपन बोर्ड से परीक्षा दिलाने की योजना है।

नवीन का कहना है कि बचपन में कभी-कभी बच्चों को देखकर कृतिका स्कूल जाने के लिए कहती थी। वह उसे स्कूल भी ले गए, लेकिन स्कूल में कमरों में बैठकर पढ़ रहे बच्चों को देखकर कृतिका सहम गयी। जिसके बाद उसे भी अक्षर ज्ञान, अंक ज्ञान आदि घर पर ही कराया गया। उनका कहना है कि स्कूल में बहुत छोटी कक्षा में ही बच्चों पर पढ़ाई का दबाव डाल दिया जाता है। इससे बच्चे का विकास नहीं हो पाता। स्कूल में कमरों में बैठकर 6-7 घंटे की पढ़ाई होती है, इससे बच्चों को बाहरी ज्ञान कम हो पाता है।

बच्चों में ऐसे विकसित हुई मूलभूत तथा व्यवहारिक व स्थायी समझ
नवीन के अनुसार उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल न भेजकर घर पर ही व्यवहारिक ज्ञान दिलाया। दोनों माता-पिता घर पर ही बच्चियों को किताबें पढ़ाते थे। इससे बच्चे भी स्वाभाविक तौर पर किताबों की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने स्वयं किताबें पढ़नी शुरू कीं। गणित का संख्या ज्ञान देने के लिए घर पर छोटे-छोटे काम कराए। जैसे एक मग पानी खेत में डलवाया, दो लकड़ी मंगायीं, और दुकान से सामान मंगवाया। और इस तरह बच्चों से संख्या के आधार पर कार्य कराकर उन्हें गणित का व्यवहारिक ज्ञान कराया। इससे उनमें गणितीय ज्ञान की मूलभूत व स्थायी समझ विकसित हुई।
इनपुट: अंशुल डांगी, हिंदुस्तान।

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