मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखंड के द्वारा गत 3 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची जारी करते हुए दी गई जानकारी के अनुसार अंतिम मतदाता सूची में प्रदेश में 71,58,949 मतदाता हैं। जबकि SIR शुरू होने के समय 8 जून 2026 को मतदाता संख्या 79,60,762 थी। इस तरह SIR प्रक्रिया की शुरुआत और अंतिम सूची के बीच मतदाताओं की शुद्ध संख्या 8,01,813 कम हुई है, जो लगभग 10.07 प्रतिशत है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—2022 से 2026 के बीच 11.08 लाख मतदाताओं की कमी को सीधे SIR में हटाए गए नाम नहीं माना जा सकता। SIR का वास्तविक प्रारंभिक आधार 79,60,762 मतदाताओं की सूची थी। इसलिए SIR के प्रभाव को समझने के लिए 79.60 लाख से 71.58 लाख की तुलना अधिक उपयुक्त है।
धर्मपुर में सबसे बड़ी संख्या में कमी, कैंट और राजपुर रोड में प्रतिशत अधिक
विधानसभा-वार उपलब्ध आंकड़ों में धर्मपुर विधानसभा सीट पर मतदाताओं की संख्या में सबसे बड़ी कमी दिखाई देती है। 2022 में धर्मपुर में 2,07,718 मतदाता थे, जो 2026 में घटकर 1,50,400 रह गए। यानी 57,318 मतदाताओं की कमी।
इसके बाद देहरादून कैंट में 46,346, ऋषिकेश में 43,299, काशीपुर में 41,281, रायपुर में 39,989 और टिहरी नगर में 39,553 मतदाताओं की कमी दिखाई देती है।
वहीं प्रतिशत के लिहाज से तस्वीर कुछ अलग है। देहरादून कैंट में 2022 की तुलना में लगभग 34.19 प्रतिशत, राजपुर रोड में 32.64 प्रतिशत और धर्मपुर में 27.59 प्रतिशत मतदाता कम दिखाई देते हैं।
2022 बनाम 2026: सबसे ज्यादा प्रभावित विधानसभा सीटें
| क्रम | विधानसभा सीट | 2022 मतदाता | 2026 मतदाता | कमी | कमी प्रतिशत |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | धर्मपुर | 2,07,718 | 1,50,400 | 57,318 | 27.59% |
| 2 | देहरादून कैंट | 1,35,555 | 89,209 | 46,346 | 34.19% |
| 3 | ऋषिकेश | 1,68,852 | 1,25,553 | 43,299 | 25.64% |
| 4 | काशीपुर | 1,77,270 | 1,35,989 | 41,281 | 23.29% |
| 5 | रायपुर | 1,78,153 | 1,38,164 | 39,989 | 22.45% |
| 6 | टिहरी नगर | 1,49,219 | 1,09,666 | 39,553 | 26.51% |
| 7 | राजपुर रोड | 1,19,615 | 80,569 | 39,046 | 32.64% |
| 8 | रानीपुर | 1,64,022 | 1,31,893 | 32,129 | 19.59% |
| 9 | रुड़की | 1,21,689 | 89,700 | 31,989 | 26.29% |
| 10 | हल्द्वानी | 1,51,985 | 1,20,691 | 31,294 | 20.59% |
| 11 | बाजपुर | 1,52,175 | 1,29,158 | 23,017 | 15.13% |
| 12 | किच्छा | 1,39,845 | 1,18,609 | 21,236 | 15.19% |
| 13 | रुद्रपुर | 1,92,723 | 1,73,171 | 19,552 | 10.15% |
| 14 | टिहरी | 85,206 | 66,877 | 18,329 | 21.51% |
| 15 | चौबट्टाखाल | 94,620 | 77,687 | 16,933 | 17.90% |
| 16 | पौड़ी | 95,590 | 79,472 | 16,118 | 16.86% |
| 17 | सल्ट | 97,946 | 83,550 | 14,396 | 14.70% |
| 18 | द्वाराहाट | 94,056 | 80,040 | 14,016 | 14.90% |
| 19 | बदरीनाथ | 1,04,795 | 91,555 | 13,240 | 12.63% |
| 20 | नरेंद्रनगर | 92,505 | 79,507 | 12,998 | 14.05% |
| 21 | नानकमत्ता | 1,24,169 | 1,11,312 | 12,857 | 10.35% |
| 22 | कर्णप्रयाग | 98,042 | 86,399 | 11,643 | 11.88% |
| 23 | गंगोत्री | 88,403 | 77,083 | 11,320 | 12.80% |
| 24 | रुद्रप्रयाग | 1,05,849 | 96,512 | 9,337 | 8.82% |
नोट: यह विधानसभा-वार तालिका उपलब्ध 2022 बनाम 2026 के आंकड़ों पर आधारित है। कमी प्रतिशत 2022 की संबंधित मतदाता संख्या के आधार पर निकाला गया है। शेष विधानसभा क्षेत्रों के 2022 आंकड़े उपलब्ध चार्ट में नहीं हैं, इसलिए उन्हें अनुमान से जोड़ना उचित नहीं होगा। 2026 की अंतिम मतदाता सूची निर्वाचन आयोग/मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अभिलेखों में उपलब्ध है।
देहरादून की सभी सीटों पर बदला मतदाता आधार
SIR के बाद सबसे व्यापक बदलाव देहरादून जिले में दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों में 2022 की तुलना में मतदाता संख्या कम हुई है।
धर्मपुर में 57,318, देहरादून कैंट में 46,346, ऋषिकेश में 43,299, रायपुर में 39,989 और राजपुर रोड में 39,046 मतदाताओं की कमी है।
इसके अलावा मसूरी में लगभग 34,113, डोईवाला में 20,240, सहसपुर में 12,608, विकासनगर में 7,714 और चकराता में 2,066 मतदाताओं की कमी बतायी गयी है।
इस तरह राजधानी जिले में बदलाव केवल किसी एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग पूरे जिले के मतदाता आधार में पुनर्संरचना दिखाई देती है।
कुमाऊं में हल्द्वानी और काशीपुर भी बड़े बदलाव वाली सीटें
कुमाऊं और तराई की सीटों में भी मतदाता संख्या में उल्लेखनीय कमी है।
काशीपुर में 41,281, हल्द्वानी में 31,294, बाजपुर में 23,017, किच्छा में 21,236 और रुद्रपुर में 19,552 मतदाताओं की कमी उपलब्ध आंकड़ों में दिखाई देती है।
हल्द्वानी में 2022 के 1,51,985 मतदाताओं की तुलना में 2026 में संख्या 1,20,691 रह गई है। यानी यहां 31,294 मतदाताओं की कमी है।
यह बदलाव 2027 के चुनाव से पहले हल्द्वानी सहित तराई-कुमाऊं की राजनीतिक पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें अब पुराने बूथवार मतदाता आंकड़ों के बजाय नई मतदाता सूची के आधार पर अपनी चुनावी तैयारी करनी होगी।
गढ़वाल की कई सीटों पर भी उल्लेखनीय कमी
यह बदलाव केवल मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। टिहरी नगर में 39,553, टिहरी में 18,329, चौबट्टाखाल में 16,933, पौड़ी में 16,118, सल्ट में 14,396, द्वाराहाट में 14,016, बदरीनाथ में 13,240, नरेंद्रनगर में 12,998, कर्णप्रयाग में 11,643, गंगोत्री में 11,320 और रुद्रप्रयाग में 9,337 मतदाताओं की कमी दिखाई गई है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि SIR के बाद मतदाता गणित में बदलाव राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में भी हुआ है। हालांकि संख्या के लिहाज से सबसे बड़ी कमी अधिक आबादी वाली मैदानी विधानसभा सीटों में दिखाई देती है।
70 में से 69 सीटों पर कमी का क्या अर्थ?
उपलब्ध 2022-2026 विधानसभा-वार तुलना के अनुसार 70 में से 69 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता संख्या कम हुई है, जबकि हरिद्वार जिले की ज्वालापुर विधानसभा सीट में मात्र 73 मतदाताओं की वृद्धि बतायी गयी है।
लेकिन इस तथ्य को भी सीधे “69 सीटों पर इतने नाम काट दिए गए” के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
SIR में मृत, स्थानांतरित, अनुपलब्ध अथवा दोहराव वाले अभिलेखों की पहचान के साथ नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया भी हुई। इसलिए अंतिम संख्या कई अलग-अलग प्रक्रियाओं का परिणाम है।
SIR में वास्तव में क्या हुआ?
8 जून 2026 को SIR की प्रक्रिया शुरू होने के समय उत्तराखंड में 79,60,762 मतदाता थे। 14 जुलाई को जारी प्रारूप मतदाता सूची में यह संख्या घटकर 71,33,785 रह गई।
इसके बाद दावे और आपत्तियों का चरण आया। अंतिम सूची में 1,29,872 नए मतदाता जोड़े गए, जबकि 1,04,708 नाम हटाए गए। परिणामस्वरूप अंतिम मतदाता संख्या 71,58,949 हो गई।
इसका अर्थ है कि प्रारूप सूची की तुलना में अंतिम सूची में 25,164 की शुद्ध वृद्धि हुई।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड की वेबसाइट पर SIR-2026 के अंतिम रोल, प्रारूप रोल और अन्य संबंधित दस्तावेज उपलब्ध हैं।
19 लाख से अधिक अभिलेखों में मिली थीं विसंगतियां
SIR के दौरान लगभग 19,04,380 मतदाता अभिलेखों में तार्किक विसंगतियां चिन्हित की गई थीं। इनमें नाम में अंतर, असामान्य आयु अंतर और पारिवारिक विवरणों में असंगतियां जैसी स्थितियां शामिल थीं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी अभिलेख में विसंगति मिलने का अर्थ अपने आप मतदाता का नाम हट जाना नहीं था। संबंधित मामलों में नोटिस, दस्तावेज और सुनवाई की प्रक्रिया अपनायी गयी।
SIR की पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए गए और अधिकांश मामलों की सुनवाई पूरी होने की जानकारी निर्वाचन अधिकारियों ने दी थी।
2022 की तुलना में 11.08 लाख की कमी को कैसे समझें?
यही इस पूरे विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। निर्वाचन आयोग के अनुसार 2022 में उत्तराखंड में कुल 82,66,644 मतदाता थे। 2026 की अंतिम सूची में 71,58,949 मतदाता हैं।
अंतर: 82,66,644 − 71,58,949 = 11,07,695
अर्थात 2022 की तुलना में अंतिम मतदाता सूची में 11.08 लाख कम मतदाता दिखाई देते हैं।
लेकिन इसे SIR में हटाए गए 11.08 लाख नाम कहना सही नहीं होगा। क्योंकि SIR का प्रारंभिक आधार 2022 की सूची नहीं, बल्कि 8 जून 2026 की 79,60,762 मतदाताओं वाली सूची थी।
इस आधार से अंतिम सूची तक वास्तविक शुद्ध कमी: 79,60,762 − 71,58,949 = 8,01,813, यानी SIR प्रक्रिया के दौरान लगभग 8.02 लाख की शुद्ध कमी।
यह अंतर स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है, अन्यथा 2022-2026 का अंतर और SIR के प्रत्यक्ष प्रभाव को एक ही मान लिया जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल—2027 के चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?
SIR के बाद बदला मतदाता गणित निश्चित रूप से राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित करेगा, लेकिन केवल आंकड़ों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसका फायदा भाजपा को होगा या कांग्रेस को।
1. बूथवार रणनीति फिर से बनानी होगी
धर्मपुर में 57 हजार से अधिक, कैंट में 46 हजार से अधिक और हल्द्वानी में 31 हजार से अधिक मतदाताओं का अंतर पुराने चुनावी आंकड़ों पर आधारित बूथ प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है।
राजनीतिक दलों को अब यह पता लगाना होगा कि नई सूची में किन बूथों पर कितने मतदाता बचे हैं और कहां सबसे बड़ा बदलाव हुआ है।
2. केवल संख्या नहीं, बदलाव की प्रकृति महत्वपूर्ण होगी
किसी सीट पर 30 हजार मतदाता कम होने का अर्थ यह नहीं है कि वहां किसी पार्टी के 30 हजार समर्थक कम हो गए।
यह भी संभव है कि इनमें बड़ी संख्या में मृत, स्थानांतरित अथवा दोहराव वाले नाम हों। दूसरी ओर कुछ पात्र मतदाताओं के नाम सत्यापन के दौरान छूटे हों और वे आगे Form-6 के माध्यम से वापस जुड़ें।
इसलिए चुनावी प्रभाव समझने के लिए मतदाता संख्या के साथ बूथवार और क्षेत्रवार परिवर्तन देखना जरूरी होगा।
3. शहरी और प्रवासी आबादी वाली सीटों पर विशेष नजर
धर्मपुर, देहरादून कैंट, राजपुर रोड, ऋषिकेश, हल्द्वानी, काशीपुर जैसी सीटों में मतदाता संख्या में बड़ी कमी दिखाई देती है। इन क्षेत्रों में नौकरी, शिक्षा, व्यवसाय और आवागमन के कारण स्थानांतरण की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है।
इसलिए यहां SIR के आंकड़ों को केवल राजनीतिक नजर से नहीं, बल्कि जनसंख्या की गतिशीलता और मतदाता पंजीकरण के संदर्भ में भी देखना होगा।
4. 2027 के प्रत्याशी चयन पर भी अप्रत्यक्ष असर
नई मतदाता सूची का असर राजनीतिक दलों के प्रत्याशी चयन पर भी पड़ सकता है। जिन विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता आधार और बूथ संरचना में बड़ा बदलाव आया है, वहां दल पुराने चुनाव परिणामों के साथ नई मतदाता संरचना को भी आधार बनाएंगे।
विशेषकर वे सीटें जहां 2022 में मुकाबला बहुत करीबी था, वहां कुछ हजार मतदाताओं का बूथवार बदलाव भी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
कांग्रेस के लिए SIR के आंकड़े क्यों महत्वपूर्ण हैं?
यह तस्वीर कांग्रेस की 2027 की तैयारी के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाती है।
कांग्रेस पहले से ही दो दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर नए चेहरों की तलाश की चुनौती का सामना कर रही है। पार्टी के 2022 के कई प्रमुख प्रत्याशी अब भाजपा में जा चुके हैं, जबकि कुछ अन्य नेता चुनावी मैदान से दूर हो चुके हैं। उपलब्ध राजनीतिक सामग्री के अनुसार उत्तरकाशी की तीनों विधानसभा सीटों—पुरोला, यमुनोत्री और गंगोत्री—पर 2022 में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे मालचंद, दीपक बिजल्वाण और विजयपाल सजवाण अब भाजपा में हैं।
नैनीताल जिले में भी राजनीतिक समीकरण बदले हैं। नैनीताल सीट पर संजीव आर्य के चुनाव नहीं लड़ने की बात सामने आयी है। भीमताल में दान सिंह भंडारी भाजपा में जा चुके हैं। लालकुआं में 2022 के कांग्रेस प्रत्याशी हरीश रावत के दोबारा चुनाव लड़ने की संभावना कम बतायी गयी है और संध्या डालाकोटी भी कांग्रेस से दूर हैं। कालाढूंगी में महेश शर्मा भी भाजपा में जा चुके हैं।
ऐसे में SIR के बाद नई मतदाता सूची कांग्रेस के लिए केवल मतदाता संख्या का आंकड़ा नहीं होगी। पार्टी को यह भी देखना होगा कि जिन सीटों पर उसके पुराने प्रत्याशी उपलब्ध नहीं हैं, वहां नई मतदाता संरचना के अनुरूप कौन सा स्थानीय चेहरा और संगठनात्मक ढांचा प्रभावी हो सकता है।
भाजपा के लिए भी चुनौती कम नहीं
मतदाता सूची में बदलाव को केवल विपक्ष की समस्या मानना भी सही नहीं होगा।
जिन सीटों पर कांग्रेस के पुराने नेता भाजपा में शामिल हुए हैं, वहां भाजपा के पुराने संगठनात्मक दावेदार भी टिकट की दौड़ में हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव में भाजपा को भी पुराने कार्यकर्ताओं और बाहर से आए नेताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
SIR के बाद बदली मतदाता संरचना इस टिकट रणनीति का एक और नया आंकड़ा बन सकती है।
बड़ी हार वाली सीटों पर कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती
2022 के चुनावी आंकड़ों के एक अलग विश्लेषण के अनुसार लगभग 19 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी 10 हजार से अधिक मतों के अंतर से हारे थे। 2017 में भी लगभग 23 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों को 10 हजार से अधिक मतों के अंतर से हार मिली थी।
ऐसी सीटों में देहरादून की डोईवाला, मसूरी, देहरादून कैंट, रायपुर, धर्मपुर, ऋषिकेश और राजपुर रोड के साथ हरिद्वार की रानीपुर और हरिद्वार सीट तथा चौबट्टाखाल, यमकेश्वर, घनसाली, बागेश्वर, गंगोलीहाट, लालकुआं, कालाढूंगी, रुद्रपुर, सितारगंज और काशीपुर जैसी सीटों का उल्लेख किया गया है।
अब इन सीटों में से कई जगह दोहरी चुनौती दिखाई देती है—एक ओर पिछली बड़ी हार का अंतर और दूसरी ओर SIR के बाद बदला मतदाता आधार।
हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि मतदाता संख्या में कमी को सीधे कांग्रेस के नुकसान या भाजपा के लाभ में बदलना उचित नहीं होगा।
2027 से पहले असली राजनीतिक तस्वीर क्या होगी?
SIR के बाद उत्तराखंड की मतदाता सूची ने राजनीतिक दलों के सामने एक नया आंकड़ा जरूर रख दिया है, लेकिन चुनाव का परिणाम केवल मतदाता संख्या से तय नहीं होता।
अगले चरण में तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण होंगी—
पहला, छूटे हुए पात्र मतदाताओं में से कितने वापस जुड़ते हैं।
दूसरा, नई मतदाता सूची में बूथवार किस क्षेत्र में कितनी वास्तविक कमी और वृद्धि हुई है।
तीसरा, राजनीतिक दल नई सूची के अनुसार अपने संगठन, प्रत्याशी और मतदाता संपर्क अभियान को कितनी तेजी से पुनर्गठित करते हैं।
निर्वाचन विभाग ने अंतिम सूची जारी होने के बाद पात्र लेकिन छूटे मतदाताओं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत नाम जोड़ने का अवसर दिया है। इसलिए 2027 विधानसभा चुनाव तक मतदाता सूची में और बदलाव संभव हैं।
निष्कर्ष
SIR के बाद उत्तराखंड का मतदाता गणित निश्चित रूप से बदल गया है। धर्मपुर में 57,318, देहरादून कैंट में 46,346, ऋषिकेश में 43,299, काशीपुर में 41,281 और रायपुर में 39,989 मतदाताओं की कमी जैसे आंकड़े सामान्य बदलाव नहीं हैं।
लेकिन इन आंकड़ों का राजनीतिक अर्थ निकालने से पहले यह समझना जरूरी है कि मतदाता सूची से नाम कम होना और किसी राजनीतिक दल के मत कम होना एक ही बात नहीं है।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले अब असली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल नए मतदाताओं को जोड़ने की नहीं, बल्कि नई मतदाता सूची को समझने, छूटे पात्र मतदाताओं तक पहुंचने और बदले बूथवार गणित के अनुसार चुनावी संगठन को पुनर्गठित करने की होगी। SIR ने सिर्फ मतदाता संख्या नहीं बदली, बल्कि 2027 के लिए राजनीतिक दलों के पुराने चुनावी आंकड़ों को फिर से पढ़ने की जरूरत पैदा कर दी है।” खासकर धर्मपुर, देहरादून कैंट, ऋषिकेश, काशीपुर, रायपुर और हल्द्वानी को एक साथ सामने रखने से पाठक को पूरे राज्य का राजनीतिक-भौगोलिक असर स्पष्ट दिखता है।
यही वजह है कि SIR की अंतिम सूची ने उत्तराखंड के राजनीतिक दलों को चुनाव से पहले एक नया होमवर्क दे दिया है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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