भारतीय टीम में ओपनर की भूमिका तलाश रहे उन्मुक्त ने नैनीताल में गोल्फ स्टिक से उड़ाये छक्के

नैनीताल के राजभवन गोल्फ कोर्स में गोल्फ स्टिक के लम्बे शॉट्स का अभ्यास करते क्रिकेटर उन्मुक्त चंद
नैनीताल के राजभवन गोल्फ कोर्स में गोल्फ स्टिक के लम्बे शॉट्स का अभ्यास करते क्रिकेटर उन्मुक्त चंद

नवीन जोशी, नैनीताल। अपने कॅरियर की शुरुआत में दिल्ली के लिए ओपनर के रूप में 425 रनों की पारी और अंडर-19 विश्व कप में आस्ट्रेलिया के खिलाफ 111 रनों की नाबाद व कप्तानी पारी खेलकर आस्ट्रेलियाई दिग्गज पूर्व कप्तान इयान चैपल से प्रशंसा प्राप्त कर चुके उत्तराखण्ड मूल के युवा क्रिकेटर उन्मुक्त चंद भारतीय क्रिकेट टीम में ओपनर के रूप में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। बीती 5 फ़रवरी 2016 की शाम नैनीताल पहुंचे थे, और 6 की सुबह नैनीताल राजभवन स्थित गोल्फ कोर्स में उन्होंने गोल्फ खेलकर अपना दैनिक अभ्यास करते हुए पसीना बहाया। इस दौरान उन्होंने यहाँ नैनीताल राजभवन गोल्फ कोर्स में गोल्फ स्टिक (क्लब) पर पहली बार हाथ आजमाते हुए कई ‘उन्मुक्त छक्कों’ सरीखे लम्बे शॉट भी खेले। साथ ही अपने दोस्तों के साथ नगर की प्राकृतिक सुंदरता में खोकर कई सेल्फी लीं। इस दौरान उन्होंने अपने कॅरियर, भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने की संभावनाओं, इसके लिए की जा रही मेहनत आदि पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि तीन-चार दिन के अवकाश पर अपने घर-कुमाऊं आये हैं।

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अब बनाइये ऐसे बंबू हट, जिन पर गोली, आग व भूकंप का भी असर न होगा

Bamboo Huts at Maheshkhan
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट
Interior of Bamboo Huts at Maheshkhan
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट का इंटीरियर

-नैनीताल स्थित चिड़ियाघर में ऐसा ही एक बंबू हट, जो है पूरी तरह ईको फ्रेंडली तथा बारिश, सर्दी-गर्मी व बारिश के प्रभावों से भी सुरक्षित
नवीन जोशी, नैनीताल। पहाड़ों पर सीमेंट, सरिया की जगह हल्की संरचना के, पारिस्थितिकी के अनुकूल यानी ईको-फ्रेंडली घर बनाने की जरूरत तो बहुत जतायी जाती है, और इसके लिये बंबू हट यानी बांश के बनों घरों का विकल्प सुझाया भी जाता है, लेकिन बंबू हट एक सुरक्षित घरों की जरूरतों को पूरा नहीं करते। उनमें जल्द बारिश-नमी की वजह से फफूंद लग जाती है। बांश की लकड़ी को दीपक भी कुछ वर्षों के भीतर चट कर जाती है, और बांश की खपच्चियों के बीच से सर्द हवायें भीतर आकर बाहर जैसी ही ठंड कर देती हैं। वहीं ऐसे घरों में आग लगने, हल्के धक्कों में भी इसकी दीवारों को तोड़कर किसी के भी भीतर घुस जाने जैसे अन्य तमाम खतरे भी बने रहते हैं। लेकिन अब आप चाहें तो बांश से ही पूरी तरह ईको फ्रेंडली के साथ ही पूरी तरह सुरक्षित बंबू हट बनाने की अपनी ख्वाहिश आम घरों से कम कीमत में पूरी कर सकते हैं। ऐसा ही एक बंबू हट मुख्यालय स्थित नैनीताल जू में रिसेप्सन, टिकट काउंटर व सोविनियर शॉप के लिये इन दिनों निर्मित किया जा रहा है।

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भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

कहते हैं आदि-अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन करने वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित रहने वाली यह तीनों देवियां कम ही स्थानों पर एक स्थान पर तीनों के एकत्व स्वरूप् में विराजती हैं। ऐसा एक स्थान है माता का सर्वोच्च स्थान बताया जाने वाला वैष्णो देवी धाम।

माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह

लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं अंचल में भी एक ऐसा ही दिव्य एवं अलौकिक विरला धाम मौजूद है, जहां माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली एक साथ एक स्थान पर वैष्णो देवी की तरह ही स्वयंभू लिंग या पिंडी स्वरूप में आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती हैं, और सच्चे मन से आने वाले अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों का हरती तथा जीवन पथ पर संबल प्रदान करती हैं। इस स्थान को माता के 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना जाता है। शिव पुराण में आये माता भद्रकाली के उल्लेख के आधार पर श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव शिव द्वारा आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जाये जाने के दौरान यहां दक्षकुमारी माता सती की मृत देह का दांया गुल्फ यानी घुटने से नीचे का हिस्सा गिरा था।

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पर्यटन, हर्बल के बाद अब जैविक प्रदेश बनेगा उत्तराखंड

विभिन्न प्रकार के बीज
विभिन्न प्रकार के बीज

-प्रदेश के जैविक उत्पादों का बनेगा अपना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ब्रांड
-उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के प्रस्ताव को मुख्य मंत्री ने दी हरी झंडी
-राज्य में ही पहली बार लगने जा रही कलर सॉर्टिंग मशीनों से स्थानीय ख्याति प्राप्त उत्पाद राजमा, चौलाई, गहत, भट्ट आदि के जियोग्रेफिकल इंडेक्स बनेंगे
-इस हेतु रुद्रपुर में मंडी परिषद के द्वारा एक वर्ष के भीतर बनाया जाएगा 1500 टन क्षमता का कोल्ड स्टोर और तीन हजार टन क्षमता का गोदाम

नवीन जोशी, नैनीताल। देश में दालों की बढ़ती कीमतों के बीच यह खबर काफी सुकून देने वाली हो सकती है। अभी भी अपेक्षाकृत सस्ती मिल रहीं उत्तराखण्ड की जैविक दालें (मौंठ 50, भट्ट 70 तथा गहत और राजमा 120 रुपये प्रति किग्रा.) देश की महँगी दालों का विकल्प हो सकती हैं। पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित उत्तराखंड एक नए स्वरूप में स्वयं को ढालने की राह पर चलने जा रहा है। यह राह है हर्बल प्रदेश बनने की, जिस पर अब तक पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित किये जा रहे उत्तराखण्ड ने कदम बढ़ा दिए हैं। प्रदेश सरकार ने उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड, मंडी परिषद, उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद एवं कृषि एवं उद्यान आदि विभागों के संयुक्त तत्वावधान में प्रदेश को जैविक प्रदेश यानी जैविक उत्पादों का प्रदेश बनाने की कवायद शुरू कर दी है। इस कड़ी में राज्य के सभी पर्वतीय जिलों के 10 ब्लॉकों को जैविक ब्लॉक घोषित कर दिया गया है। रुद्रप्रयाग जिला जैविक जिले के रूप में विकसित किया जा रहा है, और आगे चमोली व पिथौरागढ़ को भी जैविक जनपद बनाने की तथा अगले चरण में सभी पर्वतीय जिलों को जैविक जिलों के रूप में विकसित किए जाने की योजना है। साथ ही प्रदेश के जैविक उत्पादों के लिए प्रदेश में ही बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित किए जाने को मुख्यमंत्री के स्तर से हरी झंडी मिल गई है। प्रस्तावित जैविक प्रदेश में जैविक खाद्यान्नों के साथ जैविक दालों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

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नेपाली, तिब्बती, पैगोडा, गौथिक व ग्वालियर शैली में बना है नयना देवी मंदिर

Vishesh Aalekh Special Article Navin Samachar

“सरोवरनगरी की पहचान से जुड़ा नगर का प्राचीन नयना देवी मंदिर नेपाली, तिब्बती, पैगोडा व कुछ हद तक अंग्रेजी गौथिक व ग्वालियर शैली में भी बना हुआ है। इसकी स्थापना नगर के संस्थापकों में शामिल मूलतः नेपाल के निवासी मोती राम शाह के पुत्र अमर नाथ शाह ने अंग्रेजों से एक समझौते के तहत यहां लगभग सवा एकड़ भूमि पर 1883 में माता के जन्म दिन माने जाने वाली ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की नवमी की तिथि को की थी।

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चिंताजनक: बारिश से नैनी झील लबालब पर जल प्रदाता सूखाताल झील खाली

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शनिवार 1 सितम्बर 2018 को पानी से लबालब 11 फिट के स्तर तक भरी नैनी झील।
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शनिवार 1 सितम्बर 2018 को एक कोने में पानी के अलावा शेष हिस्से में सूखी पड़ी सूखाताल झील।

नवीन जोशी, नैनीताल (1 सितम्बर 2018)। सरोवरनगरी की लाइफलाइन नैनी झील लबालब भरकर शनिवार को सितंबर माह के मानकों के अनुसार इसके गेट खोले जाने के स्तर 11 फिट तक पहुंच गयी है। वहीं नैनी झील की सर्वाधिक जल प्रदाता सूखाताल झील अब भी सूखी हुई है। इससे नगर वासियों में चिंता की स्थिति है। एक अध्ययन के अनुसार सूखाताल झील नैनी झील के 40 फीसद से अधिक प्राकृतिक जल श्रोतों का जलागम है, लिहाजा लोगों को आशंका है कि भले नैनी झील अभी भर गयी है, लेकिन सूखाताल झील के न भरने के कारण यह आगे बरसात के बाद तेजी से खाली होती जाएगी, क्योंकि सूखाताल झील इसे अपेक्षित मात्रा में पानी दे नहीं पायेगी।
उल्लेखनीय है कि हालिया वर्षों में 2014 में भी सूखाताल झील बरसात के मौसम में पानी से लबालब भर गयी थी, और इसी वर्ष सर्दियों में बर्फ से भी पटी थी। किंतु बीते वर्षों में जहां प्रशासन की ओर से भी इसमें मलबा भरा गया है, वहीं इधर इस झील को जल निगम, एडीबी आदि शासकीय विभागों व नगर पालिका द्वारा निष्प्रयोज्य सामग्री, पाइप, कूड़ेदान आदि रखने का अघोषित ‘सरकारी डंपयार्ड’ बना दिया है, वहीं इसके कुछ नालों को अन्यत्र मोड़े जाने के भी प्रशासन पर आरोप लगते हैं। इसके अलावा इस झील के डूब क्षेत्र में हालिया वर्षों में भी अवैध भवन निर्माण हुए हैं।

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सूखाताल की पुरानी कुछ सुखद तस्वीरें : 

नाम सूखाताल लेकिन नैनी झील को वर्ष भर और सर्वाधिक देती है पानी

नैनीताल। सूखाताल झील विश्व प्रसिद्ध नैनी सरोवर की सर्वाधिक जल प्रदाता झील है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बेशक सूखाताल झील का नाम सूखी रहने वाली ताल है, लेकिन यह नैनी झील को वर्ष भर और सर्वाधिक पानी देती है। इसके जरिए ही नैनी झील को सर्वाधिक 50 फीसद पानी जमीन के अंदर से रिसकर और 20 फीसद सतह से बहकर पहुंचता है, जबकि झील में अन्य सभी नालों से कुल मिलाकर केवल 10 फीसद और झील के ऊपर बारिश से भी सीधे इतना ही यानी 10 फीसद पानी ही आता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जहां सूखाताल की ओर से नैनी झील में 50 फीसद भूजल आता है, जबकि इससे अधिक यानी 55 फीसद भूजल तल्लीताल की ओर से रिसकर बाहर निकल जाता है।

इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंटल रिसर्च मुंबई द्वारा वर्ष 1994 से 1995 के बीच नैनी झील में आये कुल 4,636 हजार घन मीटर पानी में से सर्वाधिक 42.6 प्रतिशत यानी 1,986,500 घन मीटर पानी सूखाताल झील से, 25 प्रतिशत यानी 1,159 हजार घन मीटर पानी अन्य सतह से बहकर, 16.7 प्रतिशत यानी 772 हजार घन मीटर पानी नालों से बहकर तथा शेष 15.5 प्रतिशत यानी 718,500 घन मीटर पानी बारिश के दौरान तेजी से बहकर पहुंचता है। वहीं झील से जाने वाले कुल 4,687 हजार घन मीटर पानी में से सर्वाधिक 1,787,500 घन मीटर यानी 38.4 प्रतिशत यानी डांठ के गेट खोले जाने से निकलता है। 1,537 हजार घन मीटर यानी 32.8 प्रतिशत पानी पंपों के माध्यम से बाहर निकाला जाता है, 783 हजार घन मीटर यानी 16.7 प्रतिशत पानी झील से रिसकर निकल जाता है, वहीं 569,500 घन मीटर यानी 12.2 प्रतिशत पानी वाष्पीकृत हो जाता है।

वहीं एक अध्ययन के अनुसार सूखाताल झील नैनी झील के 40 फीसद से अधिक प्राकृतिक जल श्रोतों का जलागम है, लिहाजा इसकी वजह से नैनी झील के जल्द ही पूरी तरह सूख जाने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसी झील से नैनी झील में 70 फीसद पानी पहुंचता है। साथ ही आईआईटी रुड़की की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार नैनी झील में सर्वाधिक 53 फीसद पानी जमीन के भीतर और २४ फीसद सतह से भरकर यानी कुल 77 फीसद पानी आता है। इसमें से सर्वाधिक हिस्सा सूखाताल झील की ओर से ही आता है। वहीं इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंटल रिसर्च मुंबई की 2002 की रिपोर्ट के अनुसार नगर की सूखाताल झील नैनी झील को प्रति वर्ष 19.86 लाख यानी करीब 42.8 फीसद पानी उपलब्ध कराती है।

आठ मीटर की ऊंचाई तथा 20 मीटर चौड़ाई व 30 मीटर की लंबाई में पट गई है सूखाताल झील

नैनीताल। इधर हाल में सीडार व कैंब्रिज विवि के शोधकर्ताओं द्वारा शोध अध्ययन करते हुए बताया गया है कि सूखाताल झील की तलहटी लगातार मलवा डाले जाने से करीब आठ मीटर की ऊंचाई तथा 20 मीटर चौड़ाई व 30 मीटर की लंबाई में पट गई है। इस भारी मात्रा के मलवे की वजह से झील की तलहटी में मिट्टी सीमेंट की तरह कठोर हो गई है, और झील स्विमिंग पूल जैसी बन गई है। कैंब्रिज विवि की इंजीनियर फ्रेंचेस्का ओ हेलॉन व सीडार के डा. विशाल सिंह का कहना है कि यदि झील में भरे मलवे और इसमें भरी प्लास्टिक की गंदगी को ही हटा दिया जाए तो इस झील का पुनरुद्धार किया जा सकता है।
शनिवार को एक कोने में पानी के अलावा शेष हिस्से में सूखी पड़ी सूखाताल झील।
चित्र परिचयः 01एनटीएल-5ः नैनीताल। शनिवार को पानी से लबालब 11 फिट के स्तर तक भरी नैनी झील।

यह भी पढ़ें: कुदरत सूखाताल को भरने और प्रशासन सुखाने पर आमादा

-प्रशासन पंप लगाकर खाली करा रहा झील को
नवीन जोशी, नैनीताल (16 अगस्त 2014)। वर्षभर पानी से विहीन सूखाताल झील को पुनर्जीवित करने के प्रति उत्तराखंड उच्च न्यायालय की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन झील में पंप लगाकर पानी बाहर निकलवा रहा है। इन दिनों हुई भारी बरसात के कारण झील के किनारे बने घरों के साथ झील के बीच में बना जल संस्थान का पंप हाउस व एडीबी का स्टोर भी पानी में डूब गया है। खतरे को भांपते हुए जिला प्रशासन ने पंप चलाकर झील से पानी बाहर निकालना प्रारंभ कर दिया। उल्लेखनीय है कि सूखाताल झील, विश्व प्रसिद्ध नैनी झील की सबसे बड़ी प्राकृतिक जल प्रदाता है। आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट के अनुसार नैनी झील में सर्वाधिक 53 फीसद पानी जमीन के भीतर और 24 फीसद सतह से भरकर यानी कुल 77 फीसद पानी आता है। लिहाजा सूखाताल झील का भरे रहना विशेष महत्व रखता है। पूर्व में भी सूखाताल झील भरती थी और सितंबर तक पानी से भरी रहती थी और अगले वर्ष मार्च-अप्रैल तक इसका पानी रिस-रिस कर नैनी झील में पहुंचता था, जिससे नैनी झील में पानी की मात्रा बनी रहती थी।

इस कारण झील के किनारे बने दर्जन भर घरों के साथ जल संस्थान द्वारा झील के बीच में बनाए गए पंप हाउस व एडीबी का स्टोर भी पानी में डूब गया है, जिसके बाद जिला प्रशासन ने पंप चलाकर झील से पानी बाहर निकालना प्रारंभ कर दिया है। उल्लेखनीय है कि इन दिनों नैनीताल नगर से अतिक्रमण हटाने का माध्यम बनी प्रो. अजय रावत की याचिका मूलतः सूखाताल झील की परिधि में हुए अनाधिकृत निर्माणों को हटाने और झील को पुर्नर्जीवित करने को लेकर ही है, और इस याचिका पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा एवं नगर के पर्यावरण प्रेमियों के लिहाजा से अपेक्षित रुख अपनाया है, लेकिन झील के हालात यथावत बने हुए हैं।

फिर बारिश का सर्वोच्च रिकार्ड टूटने के आसार
-15 अगस्त को हुई 213 मिमी बारिश, झील उच्चतम स्तर तक भरने के बाद पूरे 15 इंच खोलने पड़े झील के गेट

वर्ष 2010, 11 और 2013 में बना बारिश का रिकार्ड लगता है कि इस बार अगस्त में ही टूट जाएगा। बारिश का सर्वोच्च रिकार्ड वर्ष 2010 में 4,289.55 मिमी का था। 2011 में 16 अगस्त तक 3,644.64 मिमी, 2013 में 3685.54 मिमी बारिश हुई थी, जबकि इस वर्ष इसी तिथि तक 3300.74 मिमी हो चुकी है। ऐसे में आशंका व्यक्त की जा रही है कि इंद्रदेव कहीं रिकार्ड तोड़ने के लिए शेष करीब 900 मिमी बारिश भी इसी माह में न कर दें। शनिवार को नैनी झील का पानी नियंतण्र कक्ष के पैमाने पर अंकित सर्वाधिक 12 फीट यानी खतरे का स्तर पार करता हुआ पानी माल रोड के पास तक चढ़ आया। इसके परिणामस्वरूप हालिया दौर में झील के पांचों गेटों को सर्वाधिक 15 इंच तक खोलना पड़ गया।
गौरतलब है कि वर्ष 2010 के सितंबर महा में आई ‘जलप्रलय’ के बाद मुख्यालय में सर्वाधिक वर्षा का रिकार्ड बना था। झील नियंत्रण कक्ष के अनुसार तब आज की तिथि यानी 16 अगस्त तक 2,153.15 मिमी बारिश हुई थी, लेकिन इस वर्ष 16 अगस्त की सुबह तक 3,300.7 मिमी बारिश हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि नगर में बीते 24 घंटों में 213.36 मिमी एवं इससे पूर्व 14 अगस्त को 109.22 मिमी बारिश हुई। नगर में गत जुलाई माह तक 1788.16 मिमी बारिश हुई थी, जबकि इस माह एक पखवा़े में रिकार्ड 1512.58 मिमी बारिश हो चुकी है।

पंतनगर विवि की इस गलती से हजारों युवाओं की सांसें अटकीं

Pantnagar Univदेश के प्रतिष्ठित पंतनगर विश्वविद्यालय की एक लापरवाही से उत्तराखंड सहित देश भर के हजारों युवाओं की सांसें अटक गयी हैं। पंतनगर विवि ने आगामी तीन जून को स्नातक एवं एमसीए की परीक्षा की तिथि नियत कर दी है, जबकि इसी दिन देश के एक अन्य प्रतिष्ठित जिपमर यानी जवाहर लाल नेहरू मेडिकल इंस्टीट्यूट की प्रवेश परीक्षा पहले से तय है। हास्यास्पद एवं पंतनगर विवि के स्तर के विवि के लिए चिंताजनक बात यह भी है कि पंतनगर विवि के कुलपति को इस बात की जानकारी ही नहीं है, और जानकारी दिये जाने पर छात्रों के समक्ष बनी इस बड़ी दुविधा की स्थिति को लेकर कोई संवेदनशीलता नजर नहीं आ रही है। बताया गया है कि जिपमर की परीक्षा में करीब 3 लाख छात्र-छात्राएं शामिल हो रहे हैं। जबकि दो परीक्षाओं का एक ही दिन होना इतना गंभीर विषय है कि प्रभावित हो रहे दुविधाग्रस्त छात्र मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश के कुलाधिपति राज्यपाल तक से गुहार लगा रहे हैं।

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नाम सूखाताल, लेकिन नैनी झील को देती है वर्ष भर और सर्वाधिक 77 प्रतिशत पानी

नवीन जोशी, नैनीताल। आईआईटीआर रुड़की के अल्टरनेट हाइड्रो इनर्जी सेंटर (एएचईसी) द्वारा वर्ष 1994 से 2001 के बीच किये गये अध्ययनों के आधार पर 2002 में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार नैनीताल झील में सर्वाधिक 53 प्रतिशत पानी सूखाताल झील से जमीन के भीतर से होकर तथा 24 प्रतिशत सतह पर बहते हुऐ (यानी कुल मिलाकर 77 प्रतिशत) नैनी झील में आता है। इसके अलावा 13 प्रतिशत पानी बारिश से एवं शेष 10 प्रतिशत नालों से होकर आता है। वहीं झील से पानी के बाहर जाने की बात की जाऐ तो झील से सर्वाधिक 56 फीसद पानी तल्लीताल डांठ को खोले जाने से बाहर निकलता है, 26 फीसद पानी पंपों की मदद से पेयजल आपूर्ति के लिये निकाला जाता है, 10 फीसद पानी झील के अंदर से बाहरी जल श्रोतों की ओर रिस जाता है, जबकि शेष आठ फीसद पानी सूर्य की गरमी से वाष्पीकृत होकर नष्ट होता है।

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