नाबालिगों के ‘सहमति वाले रिश्तों’ पर हाई कोर्ट की बड़ी लकीर: ‘सुरक्षा और स्वायत्तता’ के बीच संतुलन का दिया ऐतिहासिक संदेश

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नवीन समाचार, नैनीताल, 3 अप्रैल 2026 (High Court on Consensual Relationships)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) ने नाबालिगों (Minors) के मध्य आपसी सहमति (Consent) से निर्मित संबंधों से संबंधित प्रकरणों में न्यायिक संवेदनशीलता एवं दूरदर्शिता की महत्ता को रेखांकित किया है। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आलोक मेहरा (Justice Alok Mehra) की एकलपीठ (Single Bench) ने लगभग 15 वर्ष की आयु के दो किशोरों से जुड़े एक जटिल मामले की समीक्षा करते हुए टिप्पणी की कि किशोरों के मध्य सहमतिजन्य संबंधों को सावधानीपूर्वक और मानवीय दृष्टिकोण से निपटाने की आवश्यकता है।

High Court on Consensual Relationships High Court Order On Reservation, High Court On Consensual Relationship (HC On Ayurveda University) (HC On WorkCharge Workers) (HC gave Security to Couple) (Security To Lovers) (On Sanctioned Vacant Posts) (Uttarakhand-Judges Transfers) (UK High Court Stays Increase in Liquor Prices) (UK High Court Bar Association Election Schedule) (One Husband-Two Wifes of same Name-High Court) (High Court Directs to Reopen Slaughter House)(Government Claims No Shortage of Doctors in UK) High Court Order on Marriage After Rape of Minor (Supreme Court overturned UK High Courts Decision) (Muslim Girl Married with Hindu Boy High Court) (Controversy Over Tampering of Ballot in Nainital) (High Court Sought Record of Results-Achievments) (Prohibitory Orders outside Nainital High Court) (Supreme Court Stay Uttarakhand High Courts Order (Election Commission Reached High Court for Voter (Vigilance Trap vs Pre-Investigation-HC Debates (800 Cr Scam-No Registration-No Trace-High Court (Land Scam in Haldwani-High Court Demands Answers (Nazul-railway-Forest department land being Sold) (Panchayat Polls Stayed-Next Hearing For June 25 (Ban on Three-Tier Panchayat Elections Continues) (High Court Stayed Ban on Kllegal mining in Kanda) (Divorced Woman Mother of Children-Love Married)न्यायालय ने एक अंतरिम उपाय (Interim Measure) के रूप में देहरादून (Dehradun) स्थित किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) के समक्ष लंबित कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। उम्मीद की जा रही है कि किशोरावस्था की भावनाओं और कानूनी प्रावधानों के मध्य संतुलन स्थापित करने की दिशा में यह आदेश एक नजीर सिद्ध होगा।

नवीन समाचार को उच्च न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह प्रकरण एक लड़की के पिता द्वारा दर्ज कराई गई उस शिकायत (Complaint) से उत्पन्न हुआ था, जिसमें उन्होंने एक किशोर पर अपनी नाबालिग पुत्री के अपहरण (Abduction) का आरोप (Accused) लगाया था। पुलिस अन्वेषण (Police Investigation) के उपरांत न्यायालय में आरोप-पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया गया था। इस मामले में याचिकाकर्ता (Petitioner) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि दोनों किशोर विगत चार वर्षों से प्रगाढ़ मित्रता में थे और उनके मध्य का संबंध पूर्णतः आपसी सहमति पर आधारित था। मजिस्ट्रेट (Magentrate) के समक्ष दर्ज बयानों में भी किसी भी प्रकार के बल प्रयोग की पुष्टि नहीं हुई है।

अलमारी में छिपाया और भोजन दिया: पीड़िता के बयान ने बदला प्रकरण का रुख

प्रकरण की सुनवाई के दौरान यह तथ्य प्रकाश में आया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा-183 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष अंकित बयानों में लड़की ने स्वीकार किया कि वह स्वयं याचिकाकर्ता के घर गई थी और उसने किशोर को अपने घर भी आमंत्रित किया था। उसने किशोर को अपने घर की अलमारी (Wardrobe) में छिपाया, उसे भोजन उपलब्ध कराया और स्वेच्छा से शारीरिक संबंध (Physical Relationship) स्थापित किए। चिकित्सक (Doctor) द्वारा तैयार की गई चिकित्सा रिपोर्ट (Medical Report) में भी जबरन यौन संबंध (Forced Sexual Relation) या किसी भी प्रकार के शारीरिक संघर्ष के साक्ष्य नहीं मिले हैं। न्यायालय ने इन तथ्यों को किशोर के भविष्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना है।

सुरक्षा एवं स्वायत्तता के मध्य संतुलन: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का संदर्भ

न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में आयु एक निर्णायक कारक (Critical Factor) होती है और पीड़िता के बयान को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के ‘उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनिरुद्ध एवं अन्य’ (State of UP vs Aniruddha & Ors) के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि संबंध आपसी स्नेह एवं सहमति पर आधारित हैं, तो इसे जमानत (Bail) और अभियोजन (Prosecution) के निर्णयों में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि किशोर को सुधार गृह (Observation Home) में रखने का निर्देश उसके भविष्य की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और इससे अनुचित कारावास (Wrongful Imprisonment) जैसे परिणाम निकल सकते हैं।

किशोर न्याय प्रणाली हेतु दिशा-निर्देश

उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी (Respondent) को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रणाली को नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी स्वायत्तता (Autonomy) को मान्यता देने के मध्य एक सूक्ष्म संतुलन (Balance) बनाए रखना चाहिए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के अनुसार, आरोपों की प्रकृति और किशोरों की आयु को देखते हुए कानून को उदार रुख (Leniency) अपनाना चाहिए। इस आदेश के माध्यम से न्यायालय ने यह संदेश दिया है कि किशोरावस्था के सहज आकर्षण और आपराधिक कृत्य के मध्य के अंतर को समझना न्याय के हित में अनिवार्य है।

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