रामपुर तिराहा कांड में 30 वर्ष बाद जगी न्याय की उम्मीद, उच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी, निर्णय सुरक्षित

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 10 मार्च 2026 (Rampur Tiraha-HC Reserved Verdict)। उत्तराखंड (Uttarakhand) राज्य आंदोलन से जुड़े बहुचर्चित रामपुर तिराहा कांड (Rampur Tiraha Firing Case) पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) में सुनवाई पूरी हो गई है। न्यायमूर्ति आशीष नैथानी (Justice Ashish Naithani) की एकलपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया है। लगभग 30 वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक प्रकरण में अब न्यायालय के फैसले का इंतजार किया जा रहा है, जिसे राज्य आंदोलनकारियों और पीड़ित परिवारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या था रामपुर तिराहा कांड

(Rampur Tiraha-HC Reserved Verdict उत्तराखंड के निहत्थे राज्य आंदोलनकारियों पर गांधी जयंती के दिन बरसाई गई थी  गोलियां, आज तक नहीं मिला इंसाफ!रामपुर तिराहा कांड 2 अक्टूबर 1994 की घटना है, जब पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली (New Delhi) की ओर कूच कर रहे थे। आरोप है कि मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा (Rampur Tiraha) क्षेत्र में पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान गोलीबारी की और बल प्रयोग किया।

इस दौरान कई आंदोलनकारियों की मृत्यु हुई तथा महिला आंदोलनकारियों के साथ गंभीर अत्याचार और दुष्कर्म की घटनाएं सामने आईं। यह घटना उस समय पूरे उत्तराखंड क्षेत्र में व्यापक आक्रोश का कारण बनी थी और राज्य आंदोलन के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिनी जाती है।

यूपी सरकार को कुछ पता नहीं

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार से यह महत्वपूर्ण प्रश्न किया कि इस प्रकरण में दर्ज छह अभियोग वर्तमान में किस न्यायालय में विचाराधीन हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Government) की ओर से अदालत को बताया गया कि तत्कालीन मुजफ्फरनगर (Muzaffarnagar) के जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह (Anant Kumar Singh) से जुड़े अभियोग किस न्यायालय में लंबित हैं और उनकी क्या स्थिति है, इसका कोई स्पष्ट अभिलेख उनके पास उपलब्ध नहीं है।

अदालत में उठे लंबित मुकदमों के प्रश्न

याचिकाकर्ता की ओर से न्यायालय को बताया गया कि इस घटना को लगभग 30 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इन अभियोगों की सुनवाई प्रभावी रूप से आगे नहीं बढ़ सकी है।

बताया गया कि देहरादून (Dehradun) के जिला न्यायाधीश (District Judge) ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) के पत्र के आधार पर इन मामलों को सुनवाई के लिए मुजफ्फरनगर न्यायालय को भेज दिया था। इसके बाद से इन मामलों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी।

राज्य आंदोलनकारी एवं अधिवक्ता रमन शाह (Raman Shah) ने अदालत को बताया कि इस घटना के दौरान सात महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म हुआ था और 17 अन्य आंदोलनकारियों को प्रताड़ित किया गया था। साथ ही इस घटना में कई आंदोलनकारियों की मृत्यु भी हुई थी।

सीबीआई जांच और कानूनी प्रक्रिया

मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (Central Bureau Of Investigation – CBI) को सौंप दी थी। जांच के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह सहित अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध हत्या, गोलीबारी और गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित धाराओं में अभियोग दर्ज किए गए।

हालांकि राज्यपाल की ओर से अभियोजन की अनुमति न मिलने के कारण अनंत कुमार सिंह को कानूनी राहत मिल गई थी। बाद में राज्य आंदोलनकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court Of India) में अपील दायर की, जिसके बाद यह प्रकरण उत्तराखंड उच्च न्यायालय नैनीताल में स्थानांतरित कर दिया गया था।

ऐतिहासिक फैसले की प्रतीक्षा

अब उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय सुरक्षित रखे जाने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि तीन दशक पुराने इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण चरण तक पहुंचेगी।

राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि इस प्रकरण का निर्णय न केवल पीड़ित परिवारों के लिए बल्कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। पाठकों से आग्रह है कि इस समाचार से संबंधित अपनी राय और विचार नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

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