डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 जनवरी 2026 (Devguru Brihaspati Mandir)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) जनपद के ओखलकांडा (Okhalkanda) विकासखंड से जुड़ी मध्य हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक ऐसा दुर्लभ और रहस्यमय तीर्थस्थल स्थित है, जो देवताओं के गुरु बृहस्पति देव (Brihaspati Dev) को समर्पित है। देवगुरु-कोटली (Devguru-Kotli) गांव के समीप, घने जंगलों और पर्वतीय सन्नाटे के बीच लगभग सात किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित यह मंदिर उत्तराखंड का एकमात्र देवगुरु वृहस्पति मंदिर माना जाता है।
समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह स्थल न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है, बल्कि आध्यात्मिक साधना, ज्ञान और गुरु कृपा का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर के दर्शन मात्र से जीवन में विवेक, बौद्धिक स्पष्टता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
उत्तराखंड का एकमात्र देवगुरु वृहस्पति मंदिर
दक्षिणाभिमुख अवष्टक (Dakshinabhimukh Avashthak) के नाम से भी पहचाने जाने वाले इस प्राचीन मंदिर की स्थापना सातवीं शताब्दी मानी जाती है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार देश में देवगुरु वृहस्पति के अत्यंत सीमित मंदिर हैं, जिनमें राजस्थान (Rajasthan) के जयपुर (Jaipur) और तमिलनाडु (Tamil Nadu) में कुंभकोणम (Kumbakonam) के समीप अलनगुड़ी (Alangudi) प्रमुख हैं। ऐसे में नैनीताल जनपद में स्थित यह मंदिर विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।
पौराणिक मान्यताएं और कथा
पौराणिक जनश्रुतियों के अनुसार जब-जब देवताओं पर असुरों का संकट बढ़ा, तब देवगुरु बृहस्पति ने इसी पर्वत पर आकर तपस्या और चिंतन किया। कहा जाता है कि उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव (Lord Shiva) ने उन्हें देवताओं का गुरु पद प्रदान किया और नवग्रहों में विशिष्ट स्थान दिया। स्थानीय मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में अनेक ऋषि-मुनियों ने इस क्षेत्र में साधना की थी।
श्रद्धालुओं की आस्था-ज्ञान और बुद्धि का केंद्र
देवगुरु बृहस्पति मंदिर को ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है. छात्र, शिक्षक और शिक्षा से जुड़े लोग यहां विशेष रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से बुद्धि प्रखर होती है और निर्णय क्षमता मजबूत होती है। आज भी देश-प्रदेश से श्रद्धालु यहां गुरु दोष निवारण, शिक्षा में सफलता, जीवन में मार्गदर्शन और आध्यात्मिक उन्नति की कामना लेकर यहाँ पहुंचते हैं। विशेष रूप से विद्यार्थी, शिक्षक और बौद्धिक क्षेत्र से जुड़े लोग इस स्थल को ज्ञान और बुद्धि का केंद्र मानते हैं। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना से निर्णय क्षमता सुदृढ़ होती है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
गुरुवार का विशेष महत्व
हर बृहस्पतिवार (Thursday) को मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष उपस्थिति रहती है। इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और चने की दाल का भोग अर्पित करने की परंपरा है, जिसे देवगुरु बृहस्पति को प्रिय माना जाता है।
वन्य जीवों के साथ अद्भुत सहअस्तित्व
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार यह मंदिर मानवीय बस्तियों से दूर घने जंगलों में स्थित है। कहा जाता है कि रात्रि के समय आसपास के गांवों के पालतू पशु और हिंसक वन्य जीव भी इस क्षेत्र में बिना किसी टकराव के एक साथ रहते हैं। वर्षों से चली आ रही इस मान्यता को देवगुरु की कृपा और इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ा जाता है।
पर्यटन की संभावनाएं और अधूरी पहल
करीब एक दशक पूर्व देवगुरु-कोटली गांव सहित नैनीताल जनपद के एक दर्जन से अधिक गांवों को ‘विलेज टूरिज्म’ (Village Tourism) से जोड़कर ‘पर्यटन गांव’ के रूप में विकसित करने की घोषणा की गई थी, लेकिन यह योजना धरातल पर पूरी तरह साकार नहीं हो सकी। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर को व्यवस्थित रूप से पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए, तो इससे क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण मिल सकता है।
कैसे पहुंचें देवगुरु पर्वत
देवगुरु वृहस्पति मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालु हल्द्वानी (Haldwani) या काठगोदाम (Kathgodam) पहुंच सकते हैं। वहां से भीमताल (Bhimtal) होते हुए ओखलकांडा के लिए सड़क मार्ग उपलब्ध है। मुख्य सड़क से मंदिर तक पहुंचने के लिए कुछ किलोमीटर की पैदल चढ़ाई चढ़नी होती है, जिसे श्रद्धालु एक आध्यात्मिक यात्रा के रूप में अनुभव करते हैं।
हिमालय की गोद में स्थित यह दुर्लभ धाम आज भी रहस्य, आस्था और ज्ञान का प्रतीक बना हुआ है, जो देवभूमि उत्तराखंड की आध्यात्मिक पहचान को और गहराई प्रदान करता है।
समूचे विश्व में अपनी तरह का एकमात्र अनोखा एवं दुर्लभ मंदिर जनपद नैनीताल में
देवात्मा हिमालय के महत्व एवं उसकी महिमा का वर्णन अनंत है। यह पावन भूमि सनातन काल से तपस्वियों की तपस्या का केंद्र रही है। ऋषि-मुनियों ने ही नहीं, बल्कि देवताओं ने भी इस पावन धरा पर तपस्या करके अपने कर्तव्य पथ को संवारा है। कदम-कदम पर देव मंदिरों की श्रृंखला यहां के कण-कण में देवत्व का अहसास कराती है।
प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से यह क्षेत्र केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां के पर्यटन एवं तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए जो आध्यात्मिक अनुभूति होती है, वह अपने आप में अद्भुत है। पर्यटन की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि तीर्थाटन की दृष्टि से भी यह पावन भूमि महत्वपूर्ण है। इसी कारण यहां का भ्रमण अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा श्रेष्ठ एवं संतोष प्रदान करने वाला है। ऐसा ही परम संतोष प्रदान करने वाला पावन केंद्र है देवगुरु बृहस्पति मंदिर।
जनपद नैनीताल में स्थित देवगुरु का यह दरबार ऐसा मनभावन स्थान है, जहां पहुंचते ही आत्मा दिव्य लोक का अनुभव करती है। समूचे विश्व में यह एकमात्र मंदिर है, जहां देवगुरु साक्षात् रूप से विराजमान माने जाते हैं। देवताओं के गुरु बृहस्पति महाराज के इस पावन दरबार में मांगी गई मनौती सदैव पूरी होती है, ऐसा इनके भक्तों का अटल विश्वास है।
जनपद नैनीताल के ओखलकांडा क्षेत्र में स्थित देवगुरु बृहस्पति महाराज का यह मंदिर समूचे हिमालयी भूभाग में परम पूजनीय है। इस मंदिर की महिमा के बारे में अनेक दंतकथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि सतयुग में एक बार देवराज इंद्र ब्रह्महत्या के पाप से घिर गए थे। इस पाप से व्यथित होकर और उससे मुक्ति पाने के उद्देश्य से वे यहां के बीहड़ जंगलों की गुफाओं में छिपकर तपस्या करने लगे। उनके द्वारा अचानक गुपचुप तरीके से स्वर्ग छोड़ देने के कारण समूचे स्वर्ग में हाहाकार मच गया। देवता अपने राजा को न पाकर व्याकुल हो उठे।
काफी खोजबीन के बाद भी जब देवराज इंद्र का पता नहीं चला तो सभी देवगण निराश होकर अपने गुरु बृहस्पति महाराज की शरण में गए तथा उनसे देवराज इंद्र को खोजने का अनुरोध किया। देवताओं की विनती पर देवगुरु ने इंद्र की खोज आरंभ की। खोजते-खोजते वे धरती लोक पर पहुंचे। एक गुफा में उन्होंने देवराज इंद्र को भयभीत एवं व्याकुल अवस्था में देखा।
देवगुरु ने इंद्र की व्याकुलता दूर कर उन्हें अभय प्रदान किया और वापस स्वर्ग भेज दिया। इसके बाद इस स्थान के सौंदर्य एवं पर्वतों की रमणीयता को देखकर वे मंत्रमुग्ध हो गए और यहीं तपस्या में लीन हो गए। तभी से यह स्थान पृथ्वी पर देवगुरु धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस स्थान का महत्व संसार में अतुलनीय है, क्योंकि समूचे विश्व में यही एक ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां देवताओं के गुरु साक्षात् रूप से विद्यमान हैं।
देवगुरु के भक्तों के लिए यह स्थान परम पूजनीय है। भूमंडल पर यह देवगुरु का सर्वोच्च स्थान माना जाता है। दूर-दराज के क्षेत्रों से यहां आकर उनके भक्त श्रद्धापूर्वक शीश नवाते हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर देवगुरु के प्रति की गई आराधना कभी निष्फल नहीं होती। जो व्यक्ति जिस कामना से यहां आता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
नगाधिराज हिमालय की रमणीय वादियों में ऊंचे पर्वत की चोटी पर स्थित इस देवालय में महिलाओं का प्रवेश एवं उनके द्वारा पूजा करना स्वीकार्य नहीं है। इस संदर्भ में एक दंतकथा लोक में काफी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि पहले यहां पूजा का दायित्व एक महिला संभालती थी। एक बार वह पूजा की तैयारियां करके देवगुरु को भोग लगाने के उद्देश्य से दूध की खीर बना रही थी।
इसी बीच मौसम ने करवट ली। खराब मौसम के चलते पुजारिन की अधीरता बढ़ती गई। आनन-फानन में जल्दबाजी करते हुए पुजारिन ने गर्म खीर देवगुरु को समर्पित कर दी। खीर के पिंडी पर पड़ते ही पिंडी फट गई। इससे कुपित होकर देवगुरु ने उसी दिन से महिलाओं को पूजा के अधिकार के साथ-साथ दर्शन के अधिकार से भी वंचित कर दिया। तभी से यहां महिलाओं के दर्शन एवं पूजन पर प्रतिबंध है।
तब से यहां पुजारी का दायित्व पुरुष वर्ग संभाल रहा है। कहते हैं कि इस घटना के कई वर्षों बाद एक दिन देवगुरु ने स्वप्न में अपने एक भक्त पुजारी को दर्शन दिए और कहा कि तुम हरि और हर की नगरी हरिद्वार जाओ। वहां पहुंचकर श्रद्धा एवं प्रेमपूर्वक गंगा नदी में स्नान करो, भगवान आशुतोष को प्रणाम करो और इस वन में मेरा स्मरण करते हुए अकेले ही आना। ध्यान रहे कि तुम्हें कोई पहचान न सके, इसलिए काला कंबल ओढ़ लेना। आगे तुम्हें क्या करना है, इसका मार्गदर्शन यहां पहुंचने पर प्राप्त होगा।
स्वप्न में देवगुरु से मिले आदेश के अनुसार पुजारी ने श्रद्धा-भक्ति से उनकी आज्ञा को शिरोधार्य किया। उन्होंने हरिद्वार में स्नान किया, भगवान शंकर की स्तुति की और इसके बाद यहां के बीहड़ एवं घने जंगल में प्रवेश किया। जंगल में चलते-चलते देवगुरु बृहस्पति की कृपा से उन्हें शक्ति के अद्भुत स्वरूप के दर्शन हुए, जो पिंडी (लिंग) के रूप में परिवर्तित होकर उनके कंधे पर विराजमान हो गई।
उस पिंडी ने दिव्य स्वरूप में अलौकिक वाणी में कहना आरंभ किया कि काफी समय पूर्व मेरी शक्तिरूपी पिंडी फट गई थी। इस शक्ति को मेरा साक्षात् रूप समझकर विधिवत पूजन-अर्चन के साथ स्थापित करो और अपना जीवन धन्य करो। तुम्हारा कल्याण होगा। यही स्थान इस वसुधरा पर देवगुरु बृहस्पति धाम के नाम से प्रसिद्ध है।
देवभूमि उत्तराखंड में तीर्थाटन के विकास की असीमित संभावनाएं हैं। एक से बढ़कर एक मनोरम तीर्थस्थल, सौंदर्य से परिपूर्ण पहाड़ियां, कल-कल ध्वनि के साथ बहती नदियां और ऐतिहासिक मंदिर तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन देवगुरु धाम इन सबसे बढ़कर अवर्णनीय है। यहां मिलने वाली अकूत शांति को शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। अनंत महिमा से संपन्न इस धाम के प्रति लोगों की आस्था का जवाब नहीं। आज भी देवगुरु की कृपा से यहां भांति-भांति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। पुरातन काल से पूजनीय आस्था का यह पावन केंद्र ऋषि-मुनियों की आराधना, तपस्या एवं साधना स्थली रहा है।
बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने देवगुरु के दरबार में साधना करके अलौकिक सिद्धियां प्राप्त कीं और संसार में ज्ञान का प्रकाश फैलाया। अनंत रहस्यों को अपने में समेटे इस दरबार के प्रति अंग्रेजों की भी गहरी आस्था थी। वे भी देवगुरु के चमत्कारों से परिचित थे। इस मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देवगुरु की इच्छा से यह मंदिर खुले आकाश के नीचे स्थित है। अनेक भक्तों ने यहां मंदिर निर्माण की बात सोची, लेकिन सभी की इच्छाएं धरी की धरी रह गईं, क्योंकि देवगुरु की इच्छा खुले आकाश के नीचे विराजमान रहने की है। बताते हैं कि कई लोगों ने पूर्व में यहां भव्य मंदिर निर्माण के प्रयास किए, लेकिन देवगुरु की इच्छा के आगे उनके सभी प्रयास विफल रहे।
देवगुरु के प्रति श्रद्धा रखने वाले स्थानीय श्रद्धालु बताते हैं कि एक बार मंदिर के पूर्व पुजारी स्वर्गीय केशव दत्त ने मंदिर का विस्तार करने के उद्देश्य से कुछ दूरी पर पत्थरों की खुदाई करवाई। इस खुदाई में हर पत्थर के नीचे सांपों के झुंड निकले। पत्थर इतने वजनदार हो गए कि उन्हें कोई उठा तक नहीं पाया। देवगुरु के सभी भक्त प्रभु के संकेत को समझ गए कि उनका मंदिर खुले आकाश के नीचे ही रहेगा।
यहां की मनोरम पहाड़ियों में अतीत के अनेक अनसुलझे रहस्य छिपे हैं। बताते हैं कि रात्रि में विधिपूर्वक यहां देवगुरु का ध्यान लगाने पर पहाड़ियों से कानों में संगीत के स्वर गूंजते हैं। प्रसिद्ध संत हैड़ाखान महाराज, सोमवारी बाबा, दशहरा गिरी, बर्फानी बाबा सहित अनेक आधुनिक एवं पौराणिक संतों ने देवगुरु की महिमा का अपने-अपने शब्दों में बखान किया है।
जनपद नैनीताल के ओखलकांडा विकासखंड की ऊंची चोटी पर स्थित देवगुरु के इस दरबार की ऊंचाई लगभग आठ हजार फीट है। आसपास के गांवों में कोटली, करायल, देवली, पुटपुड़ी एवं तुषराड़ आदि शामिल हैं, जिनकी दूरी मंदिर से क्रमशः पांच, सात, चार, पांच एवं छह किलोमीटर के लगभग है। इस स्थान तक पहुंचने के लिए धानाचूली से ओखलकांडा और करायल होते हुए लंबा पैदल मार्ग तय करना पड़ता है। एक अन्य मार्ग ओखलकांडा से करायल, फिर देवली होते हुए पैदल मंदिर तक पहुंचता है। धानाचूली से पहाड़पानी होते हुए शहरफाटक को पार कर भीड़ापानी, नाईकोटली के रास्ते भी लोग यहां आते हैं।
हालांकि, यह रास्ता काफी लंबा एवं जटिल है। बीहड़ जंगलों की चोटी पर स्थित देवगुरु के इस धाम के एक ओर मां बाराही का जाग्रत दरबार है तो दूसरी ओर की पर्वत श्रृंखलाओं में अनेक धार्मिक धरोहरें मौजूद हैं। पौराणिक धार्मिक कथाओं को समेटे दयोथल की गुफा सहित अनेक गुफाएं शोधकर्ताओं के लिए गहन शोध का विषय हैं। चारों ओर घने वनों में चीड़, देवदार, बांज, काफल सहित अनेक प्रजातियों के वृक्षों की भरमार है। वैसे तो यहां भक्तों का यदा-कदा आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन एवं मंगसीर के महीनों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। गांव वाले मिलकर समय-समय पर सामूहिक पूजा का आयोजन भी करते रहते हैं।
यहां सबसे गौरतलब बात यह है कि भारतभूमि में देवगुरु के गिने-चुने ही मंदिर हैं, लेकिन जहां वे पिंडी रूप में विराजमान हैं, वह एकमात्र मंदिर समूचे विश्व में यहीं माना जाता है। यह मंदिर ओखलकांडा विकासखंड में काठगोदाम से लगभग 93 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देवगुरु बृहस्पति का एक मंदिर काशी विश्वनाथ के निकट भी है और उनका एक पावन पौराणिक धाम उज्जैन में भी है, लेकिन पिंडी के रूप में उनका पूजन समूची वसुधरा में यहीं होता है।
देवगुरु बृहस्पति का पुराणों में अनेक स्थानों पर सुंदर उल्लेख मिलता है। उन्हें महातपस्वी एवं पराक्रमी ऋषि के रूप में भी जाना जाता है। धनुष-बाण और स्वर्ण परशु उनके हाथों की शोभा हैं, जो भक्तों को अभय प्रदान करते हैं। युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए भी योद्धा उनकी स्तुति करते हैं। परोपकारी स्वभाव के कारण उन्हें गृहपुरोहित भी कहा गया है। उनकी कृपा से ही यज्ञ का फल सफल होता है।
देवताओं के गुरु के रूप में पूजित बृहस्पति देव महर्षि अंगिरा ऋषि की सुरूपा नामक पत्नी से उत्पन्न हुए थे। तारा, शुभा एवं तारका उनकी तीन पत्नियां थीं। महाभारत के अनुसार बृहस्पति के संवर्त एवं उतथ्य नामक दो भाई थे। बृहस्पति को देवताओं के गुरु की पदवी प्रदान की गई है। वे स्वर्ण मुकुट तथा गले में सुंदर माला धारण किए रहते हैं। पीले वस्त्र पहने हुए वे कमलासन पर विराजमान रहते हैं और उनके चार हाथ हैं।
उनके चार हाथों में स्वर्ण निर्मित दंड, रुद्राक्ष माला, पात्र एवं वरदमुद्रा शोभा पाते हैं। शुभा से उनकी सात कन्याएं उत्पन्न हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—भानुमती, राका, अर्चिष्मती, महामती, महिष्मती, सिनीवाली एवं हविष्मती। इसके उपरांत तारका से सात पुत्र एवं एक कन्या उत्पन्न हुई। उनकी तीसरी पत्नी से भारद्वाज एवं कच नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन्होंने प्रभास तीर्थ में भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें देवगुरु का पद प्राप्त करने का वरदान दिया था। उनके प्रमुख मंत्र इस प्रकार हैं—
ॐ ऐं श्रीं बृहस्पतये नमः। ॐ गुं गुरवे नमः। ॐ बृं बृहस्पतये नमः। ॐ क्लीं बृहस्पतये नमः।
कुल मिलाकर देवगुरु का यह स्थान जितना अलौकिक एवं अतुलनीय है, तीर्थाटन की दृष्टि से उतना ही उपेक्षित भी है।
पाठकों से आग्रह है कि इस समाचार से संबंधित अपनी राय और विचार नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।
नैनीताल जनपद में हाल के दिनों में हुई अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी पूरी रिपोर्ट यहाँ क्लिक करके पढ़ी जा सकती है। इसी तरह पिथौरागढ़ के समाचारों के लिए यहाँ👉, अल्मोड़ा के समाचारों के लिए यहाँ👉, बागेश्वर के समाचारों के लिए यहाँ👉, चंपावत के समाचारों के लिए यहाँ👉, ऊधमसिंह नगर के समाचारों के लिए यहाँ👉, देहरादून के समाचारों के लिए यहाँ👉, उत्तरकाशी के समाचारों के लिए यहाँ👉, पौड़ी के समाचारों के लिए यहाँ👉, टिहरी जनपद के समाचारों के लिए यहाँ👉, चमोली के समाचारों के लिए यहाँ👉, रुद्रप्रयाग के समाचारों के लिए यहाँ👉, हरिद्वार के समाचारों के लिए यहाँ👉और उत्तराखंड से संबंधित अन्य समाचार पढ़ने के लिये यहां👉 क्लिक करें।
आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे उत्तराखंड के नवीनतम अपडेट्स-‘नवीन समाचार’ पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप चैनल से, फेसबुक ग्रुप से, गूगल न्यूज से यहाँ, एक्स से, थ्रेड्स चैनल से, टेलीग्राम से, कुटुंब एप से और डेलीहंट से जुड़ें। अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो हमें यहाँ क्लिक करके सहयोग करें..।
Devguru Brihaspati Mandir, Brihaspati Temple Uttarakhand, Devguru Brihaspati Mandir Nainital, Okhalkanda Religious Tourism, Unique Hindu Temples In India, Himalayan Spiritual Destinations Uttarakhand, Ancient Temples Of Uttarakhand, Guru Brihaspati Worship Place, Nainital District Religious Places, Village Tourism Uttarakhand Potential, Mythological Temples In Himalayas, Devguru Brihaspati Temple, Devguru Dham, Brihaspati Maharaj, Okhalkanda, Nainital, Uttarakhand, Religious Places in Uttarakhand, Temples of Kumaon, Himalayan Temples, Ancient Temples,
Mythological Temple, Religious Tourism, Spiritual Tourism, Uttarakhand Tourism, Kumaon Tourism, Hindu Pilgrimage, Brihaspati Dev, Himalayan Spiritual Heritage, Unique Temple, Nainital Tourism, Uttarakhand Heritage, Devbhoomi Uttarakhand, Indian Mythology, #UttarakhandTourism #NainitalNews #ReligiousTourismIndia #HinduTempleHeritage #SpiritualUttarakhand #HimalayanTemples #IndianCultureHeritage #DevbhoomiUttarakhand

डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
