नवीन समाचार, नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026 (Supreme Courts Remarks on Journalist)। मोबाइल फोन और सामाजिक माध्यमों (Social Media) के बढ़ते प्रभाव के बीच आज बड़ी संख्या में लोग मोबाइल पत्रकारिता (Mobile Journalism-MoJo) और नागरिक पत्रकारिता (Citizen Journalism) के माध्यम से घटनाओं को सामने ला रहे हैं। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने टिप्पणी की है कि यदि हर नागरिक पत्रकार बनने लगे, तो इससे दूसरों के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। न्यायालय की यह टिप्पणी स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों और रील बनाने वालों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा उनके काम के दौरान सुरक्षा से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई।
मामले में यह प्रश्न उठाया गया कि विरोध प्रदर्शनों और अन्य सार्वजनिक घटनाओं को कवर करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के साथ पुलिस का व्यवहार कैसा होना चाहिए और क्या पत्रकारिता करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समान सुरक्षा मिलनी चाहिए। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पत्रकारिता की विभिन्न श्रेणियों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अतिरिक्त सुरक्षा के मानदंडों पर विचार करने की आवश्यकता जताई।
पुलिस द्वारा पीआईबी कार्ड मांगे जाने का मुद्दा उठा
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह (Indira Jaising) ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची (Justice Joymalya Bagchi) की पीठ के समक्ष कहा कि दिल्ली पुलिस विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों को मान्यता नहीं देती तथा उनसे प्रेस सूचना ब्यूरो (Press Information Bureau-PIB) का पहचान पत्र मांगती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि पुलिस के लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल बनाया जाना चाहिए, ताकि किसी मीडिया संस्थान का पहचान पत्र रखने वाले पत्रकार के पेशेवर कार्य में अनावश्यक बाधा न आए। इस मांग का उद्देश्य स्वतंत्र पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान होने वाली कठिनाइयों से राहत दिलाना था।
मुख्य न्यायाधीश ने सावधानी बरतने की सलाह दी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस विषय में सावधानी बरतने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि यदि हर व्यक्ति पत्रकार बनने लगे, तो इससे अन्य लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। न्यायालय की चिंता इस बात से जुड़ी थी कि पत्रकारिता के नाम पर काम करने वाले अलग-अलग लोगों की भूमिका और उन्हें मिलने वाली सुरक्षा के बीच अंतर को कैसे निर्धारित किया जाए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इस विषय की गहराई से जांच करनी होगी कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देश के प्रत्येक नागरिक को पत्रकार बनने का अधिकार भी देता है। उन्होंने मान्यता प्राप्त पत्रकारों, पंजीकृत मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, सामाजिक माध्यमों के प्रभावशाली व्यक्तियों (Influencers) और रील बनाने वालों के बीच अंतर तथा उनके लिए सुरक्षा के अलग-अलग स्तरों पर विचार करने की आवश्यकता बताई।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर विस्तृत विचार जरूरी है कि क्या पत्रकारों की कोई ऐसी श्रेणी निर्धारित की जानी चाहिए, जिसे अतिरिक्त सुरक्षा दी जाए। न्यायमूर्ति बागची ने कार्यरत पत्रकार अधिनियम (Working Journalists Act) का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून में पत्रकारों के विभिन्न वर्गों के बीच अंतर किया गया है और इन सभी पहलुओं की जांच आवश्यक है।
तुषार मेहता ने महिला पत्रकारों के साथ महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने कहा कि डिजिटल युग में मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र या फ्रीलांस पत्रकार बता सकता है। उनके अनुसार, कुछ लोग वास्तव में समाचार संकलन करने के बजाय सामाजिक माध्यमों पर लोकप्रियता हासिल करने और आय अर्जित करने के उद्देश्य से रील बनाते हैं। ऐसी सामग्री में एकतरफा जानकारी प्रस्तुत करने या घटनाओं को सनसनीखेज बनाने की आशंका भी रहती है।
तुषार मेहता ने महिला पत्रकारों को परेशान न किए जाने की आवश्यकता का समर्थन किया। साथ ही उन्होंने कहा कि समान दृष्टिकोण महिला पुलिसकर्मियों के मामले में भी अपनाया जाना चाहिए।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन का प्रश्न
इस सुनवाई में स्वतंत्र पत्रकारों के पेशेवर कार्य में बाधा न डालने की मांग के साथ यह व्यापक प्रश्न भी सामने आया कि पत्रकारिता के नाम पर कार्य करने वाले अलग-अलग समूहों की पहचान और सुरक्षा के मानदंड क्या होने चाहिए। एक ओर स्वतंत्र पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक घटनाओं की रिपोर्टिंग का प्रश्न है, तो दूसरी ओर समाचार संकलन, सामाजिक माध्यमों के लिए सामग्री बनाने और सनसनीखेज प्रस्तुति के बीच अंतर स्पष्ट करने की चुनौती है।
न्यायालय की टिप्पणियां इस विषय पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सुनवाई में पत्रकारों की विभिन्न श्रेणियों, अतिरिक्त सुरक्षा और पुलिस के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इन टिप्पणियों को अंतिम निर्णय या सभी नागरिकों के पत्रकार बनने के अधिकार पर न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
