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मिशन-2019: संजीव के साथ बेतालघाट साधने निकले भगत

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नैनीताल, 30 सितंबर 2018। आगामी लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा से टिकट हेतु अपनी दावेदारी जता चुके पूर्व मंत्री और इन दिनों पार्टी के नेपथ्य में चल रहे कालाढुंगी विधायक बंशीधर भगत ने रविवार को जनपद के दूरस्थ बेतालघाट में कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए मिशन-2019 का मंत्र फूका। इस दौरान भगत ने क्षेत्रीय विधायक संजीव आर्य द्वारा कराए जा रहे विकास कार्यों की सराहना करते हुए उनके कार्यों को इन्हें क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर बताया। संजीव भी इस दौरान उनके साथ कार्यक्रम में रहे। इस दौरान लंबे समय बाद क्षेत्र में आगमन पर भगत के स्वागत के लिए जनता में भी जोश देखा गया।
इस दौरान आयोजित सभा को संबोधित करते हुए विधायक संजीव आर्य ने विधानसभा क्षेत्र में किए गए विकास कार्यों की उपलब्धियां गिनाईं, वही बंशीधर भगत ने मोदी सरकार को देश हित में वरदान बताते हुए केंद्र सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखा। भगत ने कहा कि 2019 में भले ही टिकट किसी को भी मिले सबने साथ मिलकर मोदी को मजबूत करना है। चुनावी चुटकी लेते हुए भगत ने यह भी कहा कि वह भी टिकट की दौड़ में हैं, और इसी के चलते मुझे अपने पुराने क्षेत्र के साथियो से मिलने आये हैं। इस अवसर पर जिला प्रभारी कमल नारायण जोशी, अरविंद पडियार, संजय वर्मा, जिपं सदस्य पीसी गोरखा, मंजू पंत, लक्ष्मण महरा, धीरज, दलीप सिंह, दीवानी राम, राजेंद्र जैड़ा, माया बोरा, अम्बा दरमाल सहित दर्जनों पदाधिकारी एवं सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित रहे ।
महरा को कराई भाजपा में वापसी
बेतालघाट। विगत विधानसभा चुनावों से पार्टी से नाराज चल रहे सहकारी समिति हल्द्यानी के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह महरा ने रविवार को भाजपा में वापसी कर ली। पूर्व मंत्री बंशीधर भगत एवं संजीव आर्य ने माल्यार्पण कर उनकी पार्टी में वापसी कराई।

यह भी पढ़ें : योगी के गढ़ में ‘बुआ-बबुआ’ की जीत से 2019 के संदेश, ‘जंगल बुक’ में छुपा है विपक्ष की जीत का फ़ॉर्मूला 

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा छोड़ी गयी गोरखपुर और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की फूलपुर लोक सभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी जीते हैं। इस जीत के तरह-तरह के मायने निकाले जा रहे हैं। कहीं इसे भारतीय राजनीति में ‘मोदी की अगुवाई वाले भाजपा युग’ के तिलिस्म का टूटना माना जा रहा है, तो कहीं इसे मोदी को 2019 में हटाने का ख्वाब पाल रहे विपक्ष के लिए जीत का मंत्र माना जा रहा है। राजनीति में कुछ भी चिरस्थायी नहीं होता। न नेता, और न उनके फॉर्मूले। यह भी होता है कि कई बार एक का फॉर्मूला दूसरे के लिए सफलता की राह खोल देता है। लेकिन इस जीत-हार का असल मूल मंत्र उभर कर आ रहा है ‘संघे-शक्तिः’। जिस ‘सबका साथ-सबका विकास’ के फॉर्मूले से मोदी एक के बाद एक राज्य जीतते जा रहे हैं, वही फॉर्मूला इस बार ‘बुआ-बबुआ’ यानी बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के प्रत्याशियों के लिए काम कर गया है। इस जीत को बिहार के विधानसभा चुनावों में लालू एवं नितीश के गठबंधन और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के ‘झाड़ू’ की ‘क्लीन स्वीप’ जीत से जोड़कर भी देखा जा सकता है। लेकिन यह जीत कितनी स्थायी होगी, इसके लिए ‘जंगल बुक’ के उस दृश्य का दृष्टांत उपयुक्त होगा, जिसमें सूखा पड़ने की स्थिति में नदी में ‘शांति शिला’ उभर आती है, और जंगल के सभी हिंसक-अहिंसक, शिकारी-शिकार जानवर ‘शांति काल’ की घोषणा कर एक घाट से पानी पीने लगते हैं, किंतु प्यास बुझते ही फिर एक-दूसरे की जान के प्यासे हो जाते हैं। बिहार का उदाहरण अधिक पुराना नहीं है, जहां जीत आधे कार्यकाल की भी नहीं रही, और अब लालू-नितीश अलग-अलग खेमों में खड़े अपने ‘चुनावी साथ’ को ‘सबसे बड़ी भूल’ करार दे चुके हैं। जरूर 1993 में सपा-बसपा के इसी तरह के गठबंधन को मिली जीत के केवल दो वर्ष बाद 2 जून 1995 को हुए लखनऊ के ‘गेस्ट हाउस कांड’ के बाद गोमती में बहुत पानी बह चुका है, सपा तब के मुलायम के हाथों से छिनकर ‘टीपू’ के हाथों में आ चुकी है, पर मायावती वही हैं। उन्हें इस कांड में बचाने वाले ‘संघी पंडित भाई’ की पार्टी उनके लिए आज भी सबसे बड़ी ‘मनुवादी-अछूत’ है। जीत के बाद बधाई देने गये सपा नेताआंे को बसपाइयों की तरह खड़े रखकर उन्होंने फिर बता दिया है वे मनुवाद को लाख गलियाने के बावजूद आज भी अपने खेमे की ‘मनुवादी दौर की पंडित’ ही हैं, जहां उनसे ऊपर कोई नहीं हो सकता।
बहरहाल, गोरखपुर व फूलपुर में चुनाव परिणाम उसी फॉर्मूले पर आये हैं, जिसके तहत मोदी भाजपा को जिताते आए हैं, यानी सबका साथ…, इस फॉर्मूले के पार्श्व में मोदी चाहे जो भी राजनीतिक दांव-पेंच चलते रहे हों, लेकिन मूल में यही मंत्र रहता है कि अधिकाधिक वोटों का ध्रुवीकरण कैसे भाजपा के पक्ष में हो। इस ध्रुवीकरण के साथ विपक्ष का आपस में बंटा होना भी भाजपा की जीत में निर्विवाद तौर पर बड़ी भूमिका निभाता रहा है। लेकिन जहां भी विपक्ष का बिखराव ‘जंगल बुक’ की स्थितियों में एका में बदलता है, मोदी हार जाते हैं। बिहार में भी यही हुआ, दिल्ली में भी और अब यूपी के गोरखपुर व फूलपुर में भी। इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है।
लेकिन बात यहां से आगे 2019 में जाने, भविष्य की करें तो ‘बुआ-बबुआ’ के कोष्ठों में इकट्ठा हुआ विपक्ष आगे स्थायी एकता के प्रति आश्वस्त नहीं करता। अनुभवी सोनिया गांधी के हाथों से युवा राहुल के हाथों में आ चुकी ‘कांग्रेसी छतरी’ भी विपक्ष को राजनीतिक सुरक्षा दिलाने के प्रति भरोसा नहीं दिलाती। राहुल अभी भी चुनाव के समय-बेसमय ननिहाल जाने का बचपना नहीं छोड़ पा रहे। नितीश राजग में आ चुके हैं, लालू जेल में हैं, ममता की अपनी सीमाएं हैं। बुआ-बबुआ एक ही राज्य से आते हैं। बुआ को 2019 के लोस चुनावों में 60 सीटें चाहिए। बाम किला त्रिपुरा में भी ध्वस्त हो चुका है, और केरल के प्रति भी सशंकित है। बावजूद विपक्ष यदि 2019 को ‘शांति काल’ घोषित कर एक हो जाए तो मोदी का तिलिस्म टूटना नामुमकिन नहीं है, पर ‘हो पाएगा ?’ इस प्रश्न में ही 2019 का चुनाव परिणाम निहित है।

बीएसपी का वोट एसपी को ट्रांसपर

यूपी उपचुनाव में जीत इस जीत में एक बात साफ नजर आई की कि बीएसपी अपना वोट एसपी को पूरी तरह ट्रांसफर करने में सफल रही। इस जीत के बात ऐसी सुगबुगाहट होने लगी है कि दोनों दल 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के साथ उतर सकते हैं। गोरखपुर चुनाव में हार यूपी के सीएम आदित्यनाथ के लिए निजी तौर पर काफी मुश्किलों वाला है। आदित्यनाथ 1998 से यहां से लगातार 5 बार सांसद रह चुके हैं।

उपचुनाव में यह रहा वोटों का गणित

बिहार के अररिया में आरजेडी को 49 फीसदी वोट मिले और 2014 की तुलना में उसका वोट शेयर करीब 7 फीसदी ज्यादा रहा। वहीं, एनडीए को यहां 43 फीसदी वोट मिले और 2014 की तुलना में उसका वोट शेयर करीब 16 फीसदी बढ़ा। जहानाबाद विधानसभा उपचुनाव में महागठबंधन को 55 फीसदी वोट मिले जो 2015 की तुलना में 4 फीसदी ज्यादा रहा। वहीं एनडीए को 30 फीसदी वोट मिले। भभुआ विधानसभा में एनडीए को कुल 48 फीसदी वोट मिले और 2015 की तुलना में उसका वोट शेयर करीब 13 प्रतिशत बढ़ा जबकि महागठबंधन को यहां 37 फीसदी वोट प्राप्त हुए जो 2015 विधानसभा चुनाव की तुलना में 8 प्रतिशत ज्यादा था।

2019 के लिए बढ़ी चिंता
एसपी की गोरखपुर और फूलपुर में जीत ने सत्तारूढ़ बीजेपी के माथे पर शिकन ला दिया है। 2019 लोकसभा चुनाव में करीब एक साल का वक्त शेष है और विपक्ष की इस जीत ने भगवा पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। मुस्लिमों का वोट बीजेपी को हराने वाली पार्टी के लिए गया है। गोरखपुर में कांग्रेस की मुस्लिम उम्मीदवार को केवल 2 फीसदी वोट मिले वहीं, फूलपुर में स्वतंत्र उम्मीदवार अतीक अहमद केवल 6.5 फीसदी वोट ही पा सके हैं। 2014 की तुलना में गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी का वोट शेयर गिरा है। एसपी की जीत में मुस्लिमों की भूमिका अहम रही है। बीजेपी चीफ अमित शाह केंद्र और राज्य सरकार पर वादे पूरे करने का दबाव बनाए हुए हैं। यूपी में दो लोकसभा सीट पर हार के बाद लोकसभा में बीजेपी के एमपी की संख्या घटकर 275 हो गई है। बीजेपी को अलवर, अजमेर, रतलाम और गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा था।

बिहार उपचुनाव के नतीजे भी इसी तरफ इशारा करते हैं कि यहां भी अंकगणित सत्तारूढ़ पार्टी के लिए सही नहीं रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में अररिया में बीजेपी को 2.6 लाख वोट मिले थे जबकि जेडीयू को 2.2 लाख वोट। दोनों पार्टियों का वोट मिला ले तो आंकड़ा 4.8 लाख वोटों का बनता है और यह आरजेडी (4.1 लाख वोट) को हराने के लिए काफी था। बावजूद इसके आरजेडी ने यह सीट करीब 62 हजार के अंतर से जीत लिया। मतलब साफ है एनडीए गठबंधन से वोट छिटका है।

2014 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर सीट का हाल

समझें 2018 उपचुनाव के वोटों का गणित
2018 के उपचुनाव में यूपी में दोनों लोकसभा क्षेत्र में बीजेपी के वोट प्रतिशत में कमी आई है। बीजेपी ने गोरखपुर में 2014 में जहां 52 फीसदी वोट पाए थे वहीं, उपचुनाव में उसे 47 फीसदी वोट ही मिले, यानी 5 फीसदी वोट का नुकसान। फूलपुर में 2014 के चुनाव में बीजेपी को 52 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि उपचुनाव में उसका प्रतिशत 13 प्रतिशत घटकर 39 प्रतिशत पहुंच गया।

यह भी पढ़ें : नितीश के ‘महानायक’ होने का सच

d9125मीडिया में बहुप्रचारित हो रहा है-‘महागठबंधन की महाजीत, महानायक बने नितीश’। मानो एक प्रांत बिहार जीते नितीश में मोदी से खार खाए लोगों को उनके खिलाफ मोहरा मिल गया है। नितीश बाबू भी राष्ट्रीय चैनलों पर राष्ट्रीय नेता बनने के दिवास्वप्न देखते दिखाए जा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि चुनाव परिणाम की रात नितीश सो नहीं पाए हैं। सच है कि उन्हें महागठबंधन ने अपने नेता के रूप में पेश किया था, इसलिए उनकीं तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी तय है। लेकिन भीतर का मन सवाल कर कचोट रहा है, पिछली बार के मुकाबले सीटें और वोट दोनों कम मिले हैं। गठबंधन में ‘छोटे भाई’ लालू, अधिक सीटों (80)के साथ ‘बड़े भाई’ बनकर उभरे हैं। पीछे से मन कह रहा है, जिस भाजपा को पिटा हुआ बता रहे हैं, वह तो 24.8 फीसद वोटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। मीडिया कह रहा है, उन (नितीश) का जादू चला है, जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें लोक सभा चुनाव (16.04फीसद)  से महज 0.76 फीसद अधिक ही और भाजपा से आठ फीसद से भी कम, महज 16.8 फीसद वोट मिले हैं, और उनके सहयोगी लालू व कांग्रेस को मिलाकर पूरे महागठबंधन का वोट प्रतिशत भी लोक सभा चुनाव के मुकाबले करीब पांच फीसद गिरा है। लोक सभा चुनाव में जहां लालू को 20.46 फीसद वोट मिले थे, वहीं अबकी 18.4 फीसद मिले हैं। चार से 27 सीटों पर पहुंचकर ‘बाल सुलभ’ बल्लियां उछल रही राहुल बाबा की कांग्रेस को भी लोक सभा के 8.56 फीसद के बजाय 6.7 फीसद वोट ही मिले हैं और कुल मिलाकर महागठबंधन को भी जहां लोक सभा चुनाव में 46.28 फीसद वोट मिले थे, वहीं इस बार महज 41.9 फीसद वोट ही मिले हैं।

वहीँ, 2010 के वोटों से तुलना करने पर भी नितीश की पार्टी जदयू सबसेे कमजोर प्रदर्शन कर पाई है, जबकि भाजपा का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा है। भाजपा को जहां 2010 में 16.49 फीसद वोट मिले थे, वहीं अबके करीब आठ फीसद की बढ़ोत्तरी के साथ 24.8 फीसद वोट मिले हैं, और वोटों में बढ़ोत्तरी वाली वह इकलौती पार्टी है। उसके उलट नितीश बाबू की जदयू 5.78 फीसद के सबसे बड़े घाटे में रही है। उसे तब 22.58 फीसद वोट मिले थे, और अबकी महज 16.8 फीसद। लालू का राजद भी सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद पिछली बार के मुकाबले 0.44 फीसद की मामूली ही सही लेकिन वोट फीसद के मामले में नुकसान में रहा है। वहीं कांग्रेस को 1.67 फीसद का नुकसान हुआ है। उसे 2010 में 8.3 फीसद और अब 6.7 फीसद वोट मिले हैं, जबकि राम विलास पासवान की लोजपा का नुकसान 1.94 फीसद का है। लोजपा को 2010 में 6.74 फीसद वोट मिले थे और अब 2014 में 4.8 फीसद वोट मिले हैं। इस प्रकार कह सकते हैं बिहार में महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार आंकड़ों की सच्चाई के लिहाज से किसी भी खेमे के लिए खुश होने का कारण नहीं है।

चुुनावी ‘जीत’ के लिए देश को ना हराएं

बिहार में हुई चुनावी जंग के बाद से देश में ना तो ‘बीफ’ की कोई बात सुनाई दी है, और ना ही ‘असहिष्णुता’ की। ‘अखलाक-कलबुर्गी’ तो सपने में भी नहीं आ रहे हैं, और पुरस्कार लौटाने की ‘आंधी’ भी पूरी तरह से रुक गई है। लिहाजा लग रहा है मानो देश अचानक फिर से वापस ‘सहिष्णु’ हो गया है। दाल की कीमतें भी जैसे अचानक नीचे लौट आई हैं, ‘ओआरओपी’ पर लौटने वाले पुरस्कार भी थम गए हैं। लगता है देश में सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, या कि ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं !
चुनाव बीत गया है सो समय है कुछ पीछे जाने का, कि किस तरह सरकार की कथित असहिष्णुता के खिलाफ हमारे साहित्यकारों ने अपनी ओर से ‘अपनी तरह की क्या खूब सहिष्णुता’ दिखाते हुए पुरस्कार लौटाए। शायद इससे पूर्व वह साबित कर चुके थे कि एक दक्षिणपंथी दल की सरकार के प्रति वे एक-डेढ़ वर्ष ‘सहिष्णु’ रह चुके हैं, और इससे अधिक समय नहीं रह (झेल) सकते। आखिर वह कैसे उनके साथ कदम से कदम मिलाकर ‘लेफ्ट-राइट’ कर सकते हैं। दिल्ली में वह बड़ी चालाकी से ‘आम आदमी’ के साथ हो गए थे, और उसके (आम आदमी के) ‘हाथ’ को साथ लेकर दक्षिण पंथ को धूल चटा दी थी। बिहार में कोई ‘चारा’ नहीं था, इसलिए यह सब किया-कराया, और चुनाव जीत भी गए। लेकिन इस ‘जीत’ की कोशिश में देश को दुनिया के समक्ष कितना ‘हरा’ दिया, क्या वे सोचेंगे भी ?

भारत में जीत का फार्मूलाः ज्यादा गाली खाओ-जीत पाओ

जी हां, भारतीय राजनीति में जीत का यह फार्मूला अब से नहीं पिछले करीब ढाई दशक से लगातार मजबूत होता जा रहा है। बिहार चुनावों से यह फार्मूला राज्यों की ओर भी जाता और सही साबित होता नजर आ रहा है। याद कीजिए, 1998 का लोक सभा चुनाव, जब भाजपा अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में दूसरी बार चुनाव लड़ रही थी, और विपक्ष सांप्रदायिकता के नाम पर बाजपेयी के खिलाफ जमकर विष वमन कर रहा था। नतीजा भाजपा व एनडीए को सत्ता प्राप्ति के रूप् में मिला। 2004 के चुनावों में जहां बाजपेयी आत्ममुग्धता के साथ ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ ही सोनिया गांधी पर ‘विदेशी मूल’ का ठप्पा लगाकर चुनाव मैदान में गए थे, कांग्रेस की 13 वर्ष के बनवास के बाद सत्ता में वापसी हुई थी। सोनिया की जगह प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह की सरकार 2009 के चुनाव में बहुत सुविधाजनक स्थिति में नहीं गई थी, लेकिन भाजपा की ओर से लाल कृष्ण आडवाणी और तब उनके सारथी की भूमिका में रहे नरेंद्र मोदी ने मनमोहन को ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कह कर जमकर हमला किया था। नतीजा मनमोहन को और मजबूत कर सत्ता में वापसी करा गया। इधर 2014 के चुनावों में हर किसी के निशाने पर नरेंद्र मोदी थे, और वह पहली सबसे बड़े बहुमत की गैर भाजपाई सरकार के करिश्मे के साथ दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए। दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कुछ ऐसे ही निसाने पर केजरीवाल रहे थे, और उन्हें भी एक तरफा जीत मिली, और अब यही कहानी ‘जंगलराज पार्ट-टू’ के लिए कुप्रचारित लालू के बिहार विधान सभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के रूप में दिखाई दे रही है। यानी यदि आप यदि सत्ता में वापसी के लिए चुनाव में हैं तो आत्ममुग्धता में स्वयं ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू’ बनते हुए शेखी न बघारें और हर स्थिति में दूसरे प्रत्याशी पर कमर से नीचे वार करते हुए हमला न बोलें, यह भारतीय चुनाव में जीत की गारंटी हो सकता है। 

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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