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रेस्टोरेंट संचालक युवती से शादी का झांसा देकर करता रहा दुष्कर्म, दो लाख रुपये भी ऐंठकर शादी से मुकरा

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युवतियां जरूर पढ़ें : फिल्मी स्टाइल में युवती से कई बार किया दुष्कर्म

काशीपुर, 13 सितंबर 2018। फिल्में युवकों को कानून की नजर से अपराधी और युवतियों को जीवन भर के लिए अपनी ही नजरों में अपराधी बना रही हैं। खासकर अगर किशोरियों-युवतियों को उनके खुलेपन को लेकर टोको तो वे उल्टा समझाने वाले को ही अपना भला-बुरा समझने की बात कह कर झिड़क देती हैं। लेकिन यह कहानी ऐसी लड़कियों के लिए सबक हो सकती है।

मुरादाबाद के अगवानपुर निवासी एक युवक ने काशीपुर के विजय नगर नई बस्ती निवासी एक युवती को फोन पर बातें कर पहले अपने जाल में फंसाया, और एक दिन उसे बहला-फुसलाकर होटल में ले गया। आधुनिक बॉय फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड रखने का अनुभव लेने की चाहत में युवती भी उसके बहकावे में आ गयी। वहां युवक ने उसे कोई ड्रिंक पीने को दी, जिसे पीकर युवती बेहोश हो गयी। इसके बाद युवक ने उसकी अस्मत लूट ली। यही नहीं, फिल्मी स्टाइल में मोबाइल से उसकी वीडियो भी बना ली, और उसे दिखाकर किसी को न बताने को कहकर उल्टा उससे हजारों रुपए ऐंठ लिये। वह यहीं नहीं रुका। उसने आगे भी कई बार युवती को इस वीडियो की धमकी देकर होटल के कमरे में बुलाया और दुष्कर्म किया। इधर हद तब हो गयी, जब इस बार वह उसे मुरादाबाद ले गया। वहां दोनों को साथ में किसी ने देख लिया तो उसे धमकी देकर वहीं छोड़ दिया। वह किसी तरह अपने घर लौट पायी और मां को पूरी बात बतायी। इसके बाद युवती की मां ने काशीपुर कोतवाली में युवक के खिलाफ तहरीर देकर कार्रवाई की मांग की है। 

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शक्तिफार्म, 2 सितंबर 2018। बलात्कार के मामलों में कानूनों के कड़े होते जाने के बावजूद ऐसे मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताजा मामला ऊधमसिंह नगर जिले के शक्तिफार्म से एक वहशी दादा द्वारा अपनी ही सगी और नाबालिग मात्र 14 वर्ष की पोती को कई बार हवस का शिकार बनाने का मानवता को शर्मशार करने वाला प्रकाश में आया है। पुलिस ने पीड़िता के पिता की तहरीर पर आरोपित दादा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। बताया गया है कि क्षेत्र का एक राज मिस्त्री परिवार व बच्चों के साथ हल्द्वानी में रहता है। जबकि उसकी बेटी अपने चाचा-चाची और दादा के साथ शक्तिफार्म क्षेत्र में रहती है। बताया गया है कि दादा ने काफी समय पहले शराब के नशे में रिश्ते को कलंकित करते हुए पोती के साथ दुष्कर्म किया और किसी से इसका जिक्र न करने का कहा। वह इसके बाद भी जब-तब दादा पोती को हवस का शिकार बनाने लगा। इधर बीते 31 अगस्त को पोती ने दादा की हरकतों की जानकारी अपने एक परिचित को दी। परिचित ने फोन करके राजमिस्त्री को उसके पिता की हरकतो की जानकारी दी। जिसके बाद राजमिस्त्री ने यहां पहुंच कर पिता को पुलिस के हवाले करते हुए एक तहरीर दी। तहरीर के बाद पुलिस ने विधिक कार्रवाई पूरी करने के बाद जेल भेज दिया।

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  • आरोपित को पुलिस ने किया गिरफ्तार, सीओ भवाली ने किया घटना स्थल का निरीक्षण, युवती को मेडिकल के लिए भेजा जिला मुख्यालय

दान सिंह लोधियाल, धानाचूली (1 सितंबर, 2018)। नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर थाना क्षेत्र में 31 अगस्त की देर शाम एक अधेड़ व्यक्ति द्वारा स्वयं से करीब आधी उम्र की विक्षिप्त युवती के साथ दुष्कर्म का मामला प्रकाश में आया है। आरोपित को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा है। जबकि युवती का मेडिकल परीक्षण करने के लिए जिला अस्पताल भेजा गया है।

थाना मुक्तेश्वर से मिली जानकारी के अनुसार क्षेत्र में ग्राम सुनकिया निवासी भीम चंद्र (42) पुत्र दिवान राम द्वारा एक 26 वर्षीया विक्षिप्त युवती के साथ युवती के घर के पास ही उसे बहला-फुसला कर दुष्कर्म कर डाला। घटना की प्राथमिक रिपोर्ट युवती के पिता द्वारा थाने में दर्ज कराई। इसके बाद आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। थानाध्यक्ष कैलाश जोशी ने घटना की पुष्टि करते बताया आरोपित भी अविवाहित है। उस के खिलाफ भादस 376 के तहत मुकदमा दर्ज कर न्यायालय में पेश कर जेल भेजा जा रहा है। इधर घटना की जानकारी मिलते ही सीओ भवाली आर एस नबियाल ने घटनास्थल का निरीक्षण कर आवश्यक दिशानिर्देश दिए। 

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साथ ही रेप के मामलों की जांच के लिए 48 घंटे के भीतर हर जिले में एसआईटी का गठन करने के निर्देश
-निचली अदालतों से कहा फास्ट ट्रेक कोर्ट में करें ऐसे मामलों की सुनवाई
नैनीताल, 21 अगस्त 2018। प्रदेश में बढ़ रहे यौन अपराधों व खासकर उत्तरकाशी में 12 वर्षीया किशोरी के साथ हुई जघन्य वारदात पर नैनीताल हाईकोर्ट ने गंभीर रुख दिखाते हुए सरकार को हर जिले में स्थाई रूप से एसआईटी का गठन करने को कहा है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व मनोज तिवारी की खंडपीठ ने साथ ही सरकार से पूछा है कि वह कब तक बच्चियों के साथ रेप के मामले में फांसी की सजा वाला कानून कब तक बनाने जा रही है। उत्तरकाशी में रेप के बाद बच्ची की हत्या के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए अदालत ने आज इस मामले की सुनवाई की और सरकार को आदेश दिए कि 48 घंटे के भीतर वह हर जनपद में एसआईटी का गठन करे। साथ ही निचली अदालतों को भी निर्देशित किया है कि वे भी ऐसे मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर फास्ट ट्रैक कोर्टों में करें।
न्यायालय ने साथ ही सरकार से यह भी पूछा कि क्या सरकार ने हिमांचल प्रदेश की तर्ज पर राज्य के बाहरी लोगों द्वारा राज्य में जमीन खरीदने के लिए कोई कानून बनाये हैं ?

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नैनीताल, 21 अगस्त 2018। उत्तरकाशी की डुंडा तहसील के एक गांव में बीती 18 अगस्त शनिवार को पारिवारिक सदस्यों के साथ बरामदे में सो रही 12 वर्षीया किशोरी को अगवा कर सामूहिक दुष्कर्म के बाद गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। यह मामला पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर गया था। इस मामले में विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि पुलिस कुछ ही घंटों में मामले का खुलासा कर सकती है। मामले में जो खुलासा संभावित है, उसके अनुसार जिस तरह के बाहरी या समुदाय विशेष के व्यक्ति द्वारा यह दुर्दांत वारदात अंजाम दिये जाने की बात की जा रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है। पुलिस अभी आरोपित के डीएनए सेंपल लेने जैसर फॉरेंसिक-वैज्ञानिक सबूतों को तैयार करने में जुटी है।
उल्लेखनीय है कि डुंडा तहसील के एक गांव में बारह वर्षीय किशोरी रोज की अपने माता-पिता के साथ बरामदे में सोई हुई थी। दरिंदों ने वहीं से उसे अगवा किया। रात करीब तीन बजे मां की नींद खुली तो किशोरी बिस्तर पर नहीं मिली। इस पर उन्होंने खोजबीन शुरू की। शनिवार सुबह लगभग साढ़े छह बजे गांव के निकट मोटर पुल पर उसका शव बरामद हुआ। सूचना पर पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची। इससे पहले काफी संख्या में ग्रामीण एकत्र हो गए थे। उन्होंने घटना के विरोध स्वरूप हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने शव नहीं उठाने दिया। इसके बाद मामले में मुख्यमंत्री को भी बयान देना पड़ा, और पुलिस को गढ़वाल के पर्वतीय जिलों में इंटरनेट सेवा भी रोकनी पड़ी थी। आगे देखने वाली बात होगी कि पुलिस मामले को कितना पुख्ता बना पाती है, ताकि आरोपित को मुख्यमंत्री के कहे अनुसार ‘कठोर से कठोर’ सजा दी जा सके।

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    • सम्पूर्णानंद जेल अधीक्षक सहित तीन पर कोर्ट के आदेश पर गैंगरेप का मामला दर्ज
  • जेल में भी महिला कैदियों का यौन शोषण व बदसलूकी किये जाने का भी लगाया गया है आरोप
आरोपित जेलर का वायरल वीडियो

रुद्रपुर 10 अगस्त 2018 । बिहार व यूपी के बालिका संरक्षण गृह में हुई दुष्कर्म के मामलों के बाद उत्तराखंड की हल्द्वानी जेल व सितारगंज की संपूर्णानंद खुली जेल परिसरों में पीसीएस स्तर के अधिकारी जेल अधीक्षक व जेल अधिकारी सहित तीन लोगों पर एक महिला बंदी से दुष्कर्म करने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। हालांकि मामला पुराना है। महिला ने पहले पुलिस में शिकायत की, किंतु पुलि ने मामला दर्ज करने में टालामटोली की, जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर मामला दर्ज कर लिया गया है।मामले में आरोपी जेलर की शीघ्र गिरफ्तारी हो सकती है। मामले में जेलरों की अय्याशी का एक वीडियो भी वायरल हुआ है। साथ ही महिला के द्वारा संपूर्णानंद जेल में होने वाले कई काले कारनामों, यहां जेल में कैदियों के पास मोबाइल होने और यहीं गत दिनों जसपुर में भाड़े के शूटर द्वारा की गयी हत्या का तानाबाना यहीं बुने जाने, जेल में महिला कैदियों का यौन शोषण भी किये जाने जैसे सनसनीखेज खुलासे भी किये है। 

यह है पूरा मामला
प्राप्त जानकारी के अनुसार रुद्रपुर निवासी एक महिला ने खटीमा के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में दिए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया था कि उसके भाई के खिलाफ दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज होने पर वर्ष 2003 में उसे भी हल्द्वानी जेल भेज दिया गया था। हल्द्वानी जेल में तत्कालीन डिप्टी जेलर और वर्तमान में संपूर्णानंद जेल के अधीक्षक टीडी जोशी ने उसे अपने कार्यालय में बुला कर उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके कुछ दिन बाद वह जमानत पर रिहा हो गई, और जोशी की संपूर्णानंद जेल सितारगंज में तैनाती हो गई। बदकिस्मती से वह भी यहां राजस्व विभाग की जमीन पर खेती बाड़ी करने के साथ ही वह जेल में एक संस्था के माध्यम से कार्य कर रही थी। ऐसे में एक बार फिर उसकी मुलाकात जेल अधीक्षक से हो गई। महिला ने आरोप लगाया कि अक्तूबर 2016 में जेल अधीक्षक ने फिर उसे अपने कार्यालय बुला कर उसके साथ छेड़छाड़ की, जिसका उसने विरोध किया। इसके बाद आरोपी जेल अधीक्षक अपने साथ जेल अधिकारी जयंत पांगती व राकेश सिंह को साथ लेकर नवंबर 2016 में उसके घर आया, और उसके साथ गैंग रेप किया। यही घटना तीनों आरोपियों ने 26 जनवरी 2017 की रात करीब 8.30 बजे भी दोहराई। इस दौरान मोबाइल से उसकी वीडियो भी बनाई और इसे इंटरनेट पर अपलोड कर बदनाम करने व बच्चों की धमकी देते हुए इसके बाद भी उसके साथ दुष्कर्म करते रहे। इधर 3 मई 2018 की रात को भी आरोपियों ने एक बार फिर उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद 18 जून 2018 को उसने एसएसपी, मुख्य सचिव, आईजी, डीआईजी, डीजीपी और महिला आयोग की अध्यक्ष को पत्र भेज कर कार्रवाई की मांग की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस पर उसने न्यायिक मजिस्ट्रेट खटीमा की अदालत में न्याय के लिए गुहार लगाई। इस पर 28 जुलाई को अदालत ने सितारगंज थानाध्यक्ष को आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए। पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर आरोपी जोशी, जयंत व राकेश के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।

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  • जनपद के दूरस्थ बेतालघाट विकास खंड के ग्राम रतौड़ा की घटना, राजस्व पुलिस में मुकदमा दर्ज, सिविल पुलिस कर रही मामले की तफ्तीश

नैनीताल, 14 जुलाई 2018। जनपद के दूरस्थ बेतालघाट विकास खंड के ग्राम रतौड़ा में एक मानसिक रूप से कुछ कमजोर 32-33 वर्षीया परित्यकता महिला से करीब 12 वर्ष बड़े उसके रिश्ते के भाई द्वारा दुष्कर्म किये जाने का मानवता को शर्मशार करने का मामला सामने आया है। घटना करीब एक-डेढ़ माह पुरानी बतायी गयी है। महिला पहले लोकलाज के भय से मामले को छुपाये रही, परंतु अब समस्या बढ़ने की वजह से उसने अपनी भाभी को इसकी जानकारी दी। जिसके बाद उसके भाई की तहरीर पर राजस्व पुलिस में आरोपित 45 वर्षीय भगत सिंह दर्मवाल के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। वहीं राजस्व पुलिस के पुलिस कार्यों का परित्याग करने की स्थितियों के बीच बेतालघाट पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बेतालघाट मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर खैरना की ओर स्थित रतौड़ा गांव में पीड़िता करीब 4-5 वर्ष से पति व ससुराल वालों से ठुकराये जाने के बाद मायके में ही भाई-भाभी के साथ रहती है। वहीं रिश्ते में भाई ही लगने वाला आरोपित नशेड़ी व लड़ाकू प्रवृत्ति का है। वह पूर्व में अपनी पत्नी व बच्चों सहित ससुर के साथ भी मारपीट कर चुका है। उसकी रोज-रोज की मारपीट से परेशान होकर उसकी पत्नी दो बच्चों को लेकर करीब दो वर्ष पूर्व अपने मायके चली गयी है, जिसके बाद से वह अकेला रहता है। इधर घटना के दिन पीड़िता के भाई-भाभी एक विवाह में शामिल होने गये थे, जिस कारण वह घर में अकेली थी। आरोप है कि इस बीच आरोपित शराब के नशे में उसके घर में जबरन घुसा और दुष्कर्म कर दिया। बेतालघाट के थाना प्रभारी रोहिताश सागर ने बताया कि पीड़िता का मेडिकल कराकर सबूत इकट्ठे किये जा रहे हैं।

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-जिस बोर्डिंग स्कूल में यौन शोषण होने का आरोप लगा है, वह बहुत ही प्रतिष्ठित स्कूल है। वहां कई एनआरआई परिवारों के बच्चे भी पढ़ते हैं

एक पीड़िता ने आत्महत्या करने का भी प्रयास किया, और इससे पहले एक पत्र लिखकर स्कूल के अंदर रेप होने की बात कही

देश में बलात्कार की घटनाएँ रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। अब ताज़ा मामला उत्तराखंड में मसूरी के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में चार छात्राओं के साथ रैगिंग के नाम पर वरिष्ठ छात्रों के द्वारा बलात्कार किये जाने का सामने आया है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस संबंध में पुलिस अधिकारियों और शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर मामले की जांच करने और मामले की रिपोर्ट 15 दिनों में देने के आदेश दिए हैं। बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सचिव कामिनी गुप्ता ने बताया कि जिस बोर्डिंग स्कूल में यौन शोषण होने का आरोप लगा है, वह बहुत ही प्रतिष्ठित स्कूल है। वहां कई एनआरआई परिवारों के बच्चे भी पढ़ते हैं।

मामला मसूरी के एकबोर्डिंग स्कूल का है। यहां नया प्रवेश लेने वाली चार छात्राओं का आरोप है कि वरिष्ठ छात्रों ने 6 मई को कथित रूप से रैगिंग के नाम पर उनका रेप किया। इसके बाद चारों छात्राएं स्कूल से घर को भाग निकलीं और अपने परिजनों को जाकर स्कूल में यौन शोषण होने की बात बताई। छात्राओं ने यह भी बताया कि बोर्डिंग स्कूल में नहाने की जगह पर कोई दरवाजे नहीं हैं। सिर्फ पर्दे लगे हैं। इस पर एक छात्रा के परिजन  ने बाल अधिकार संरक्षण आयोग से संपर्क किया और शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि छात्राएं मानसिक रूप से बेहद प्रताड़ित हैं। उनमें से एक ने आत्महत्या करने का भी प्रयास किया। आत्महत्या का प्रयास करने से पहले उसने एक पत्र लिखा, जिसमें स्कूल के अंदर रेप होने की बात कही। शिकायतकर्ता ने बताया कि छात्रा ने अपनी डायरी में जो लिखा है उसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाएंगे। उनके पास छात्रा की रिकॉर्डिंग भी है। उन्होंने आयोग को वह रिकॉर्डंग भी सौंपी, जिसमें वे स्कूल प्रशासन से बात कर रहे हैं। सभी छात्राओं को उनके घर वापस भेजा जा रहा है। इस मामले में जल्द ही कार्रवाई की आवश्यकता है।

यह भी पढ़ें : बच्चों के मोबाइल फोन नियमित रूप से चेक करें अभिभावक, ताकि….: खंडूड़ी

-मासिक अपराध समीक्षा बैठक में एसएसपी ने दिये निर्देश
नैनीताल। एसएसपी जनमेजय खंडूड़ी ने अभिभावको से अपील की है कि वह अपने बच्चों के प्रति सतर्कता बरतते हुए उनके मोबाइल फोन इत्यादि नियमित रूप से अवश्य चेक कर लें, ताकि उनके बच्चे, स्कूली छात्र-छात्राएं कही गलत संगत में ना पड़ जायें। इस सम्बन्ध में उन्होंने पुलिस अधिकारीयों को स्कूल-कॉलेजो में गोष्ठियां आयोजित कर जन-जागरुकता फैलाने तथा असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने हेतु स्कूल-कॉलेजों एवं कोचिंग सेंटरो के बाहर सादे वस्त्रो में पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाने के लिए भी निर्देशित भी किया।
स्थानीय पुलिस लाइन सभागार में अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के मासिक सम्मेलन व अपराध समीक्षा बैठक में एसएसपी श्री खंडूड़ी ने इसके अलावा आसन्न नगर निकाय चुनावों के दृष्टिगत सतर्क दृष्टि रखते हुए 107-116 सीआरपीसी एवं गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही एवं समय-समय पर हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी करने हेतु निरोधात्मक कार्यवाही करने, यातायात ड्यूटी में लगाए जाने वाले पुलिसकर्मियों से ड्यूटी के दौरान शालीनता पूर्वक व्यवहार करने एवं किसी भी प्रकार की अभद्र भाषा इत्यादि का प्रयोग ना करने हेतु निर्देशित किया गया। .इसके अलावा आगामी 24 अप्रैल से 30 अप्रैल तक नैनीताल पुलिस द्वारा सड़क सुरक्षा सप्ताह अभियान चलाने और इस दौरान वाहन चालकों को हेलमेट की अनिवार्यता एवं यातायात के नियमों के संबंध में जागरुक करने व यातायात का उल्लंघन करने पर एमवी एक्ट के अंतर्गत कानूनी कार्यवाही करने को कहा।

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कठुआ मामले में यह भी जानें

(Am I Next ?)  कठुआ के बाद क्या मैं ? छात्राओं ने मौन जुलूस निकालकर पूछा सवाल

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नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के हरमिटेज परिसर स्थित आईपीएसडीआर के छात्र-छात्राओं ने मुंह पर काली पट्टी बाँध कर मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ वर्षीया बच्ची आसिफा की मौत पर मौन जुलूस निकाला और हाथों में ली गयी पट्टियों के माध्यम से पूछा ‘एम आई नेक्स्ट’ यानी क्या अगली पीढ़ित वे होंगी। केवल तीन शब्दों का गहरे अर्थ लिये यह संदेश अनेक लोगों के दिलों तक उतरा और प्रधानमंत्री मोदी के ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के आह्वान के बावजूद बेटियों के साथ अनवरत हो रही हैवानियत पर समाज को कड़ा सवाल भी दे गया।
इस दौरान छात्राआंे ने मल्लीताल बैंड स्टेंड के सामने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से भी बेटियों के साथ हो रही अमानवीयता को उजागर किया। उन्होंने वे भी इंसान हैं और उन्हें भी सकुशल जीने का हक है, जैसे मार्मिक संदेश लिखी हुई पट्टियां भी हाथों में ली हुई थीं। उन्होंने आसिफा को न्याय दिलाने की गुहार भी लगाई। मौन जुलूस में रमनदीप कौर, मेघा राज, पिंकी बिष्ट, विशाखा जोशी, महिमा अधिकारी, अनीता बिष्ट, कविता भट्ट, तान्या, अंजलि, ऋषभ जोशी, छात्र संघ अध्यक्ष अभिषेक मेहरा व शार्दूल नेगी आदि भी शामिल रहे।
इधर देर शाम कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में आयोजित कार्यक्रम में गजाला कमाल, मुन्नी तिवाड़ी, ईशा साह, नीतू बोहरा, नाहिद, बुशरा, मंजू, पवन जाटव, समीर अली, हरीश, अनश खान, अतीक हुसैन, दीपंक, राज कमाल व शादाब आदि ने मल्लीताल पंत मूर्ति के नीचे इसी घटना को लेकर प्रदर्शन किया और मोमबत्तियां जलाईं।

हाँ, एक पक्ष यह भी है.. चूंकि अगले वर्ष 2019 में देश में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं, इसलिए तय मानिये कि चुनाव होने तक देश में महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराध बढ़ेंगे, बढ़ाए जायेंगे अथवा बढ़ते हुए नज़र आयेंगे। यह साजिशन होगा या कि स्वाभाविक तौर पर, इस पर नज़र रखियेगा जरूर …

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भावनाओं के ज्वार से विचार ठहर नहीं पाते इसलिए समझ नहीं आ रहा कि शुरू कहाँ से करें। कामुकता पर आभासी शब्द बाण चलाने वालों पर निशाना साधा जाए या वासना से घायल को छद्म नैतिकता और न्याय की लोरी सुनाने वालों को कोसें। शुरुआत सुब्रमनियम स्वामी के नपुंसक सर्जरी वाले बयान से करना ही ठीक होगा।
स्वामी जी ने सलाह दी है कि बलात्कारियों को फांसी देना नाकाफी है इसलिए सर्जरी करके उन्हें लिंगहीन कर दिया जाए। सुनने में भी यह न्याय का क्रांतिकारी विचार लगता है। लेकिन, यह क्रांतिकारी विचार पूर्णतः अव्यवहारिक है क्योंकि लिंग के शमन से व्यक्ति की सोंच और समझ का शमन नहीं होता। वासना व्यक्ति के में पनपती-बसती है, लिंग में नहीं। ऐसे में लिंग का शमन और खतरनाक रूप ले सकता है। व्यक्ति पर हावी कामुकता के दौरान यदि उसका शरीर किसी अप्राकृतिक कारण से असहयोग करे तो यह असहयोग उसे और उत्तेजित करेगा। उसके भीतर कुंठा, क्रोध और अपराध को हवा देगा, जिसके कारण सम्मुख उपस्थित महिला या बच्ची को और भी भयंकर स्थिति से गुजरना पड़ सकता है। संभव है कि वह स्थिति बलात्कार से भी ज्यादा विभत्स हो जाए। 
एक अन्य विचार पर काम शुरू हुआ है। सरकार अब यौन संबंधी अपराधियों का लेखाजोखा तैयार करेगी। कामुक प्रवृत्ति के लोगों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए यह कवायद की जा रही है। स्पष्ट है कि आंकड़ों में उन अपराधियों को शुमार किया जाएगा, जिनका अपराध या प्रवृत्ति सार्वजनिक हो चुकी है। मतलब इस प्रकार के आंकड़े नए कामुक लोगों की पड़ताल में मददगार नहीं होंगे। जबकि यौन संबंधी अपराधों का सबसे महत्वपूर्ण एवं मुश्किल तथ्य यही है कि इसे अंजाम देने वाले लोग अधिकांतः अंतर्मुखी होते हैं और नियोजित तौर-तरीकों से अपराध करते हैं। घटना से पूर्व उनके मन को पढ़ना और पहचानना लगभग असंभव होता है। 
अब बात बलात्कारियों को मृत्यदंड दिए जाने की। दंड कठोर दर कठोर किए जाने के बावजूद कागजों में यौन अपराध के आंकड़े बढ़ रहे हैं। यह बड़ी कठिन स्थिति है क्योंकि यदि इसके बाद भी अंकुश नहीं लगा तब क्या उपाय होगा? और, अभी तक के अकादमिक, प्रशासनिक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक प्रयासों के बावजूद ऐसे अपराध घटने के बजाय बढ़ क्यों रहे हैं? स्पष्ट है कि कहीं न कहीं एक बड़ी चूक हो रही है। यह चूक हमारे विमर्श में है, मंथन में है। यही वजह है कि हम समस्या के मूल में नहीं पहुंच पा रहे। क्योंकि अगर सारभौमिक सिद्धांतों की कसौटी पर समस्या के मूलभूत कारणों की पहचान हो जाती तो उससे निदान के उपाय भी मिलते। 
समस्या का मूल यह है कि हम कॉन्डोम के लिए बिंदास बोलने को तैयार हैं, पैडमैन का शोर मचाने को तत्पर हैं मगर, कामुकता पर बातचीत के लिए कोई आगे नहीं आना चाहता है। मसलन, 90 फीसद लोग इस स्तम्भ को बलात्कार और यौन शोषण से संबंधी जानकर ही इससे अलग हो जाएंगे। इसपर अपनी राय जताने से बचेंगे। यही मानव प्रवृत्ति इस समस्या से निजात नहीं मिल पाने का मुख्य कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो इतनी गंभीर समस्या पर सही लोगों की घोर चुप्पी ही गलत लोगों की ताकत है। विमर्श नहीं होने से अधिकांश लोग कामुकता और इस प्रकार की प्रवृत्तियों के तानेबाने से अनभिज्ञ रह जाते हैं, जिसका सीधा फायदा अपराधियों को मिलता है। मोहल्ले में दो बाइक चोरी होने पर घर-घर कोहराम मच जाता है। उसी मोहल्ले के किसी मनचले से अलग रहने भर को अभिभावक समझते हैं। 
समस्या सचमुच बहुत गंभीर है और यह किसी राज्य या देश की सीमाओं तक सीमित न होकर वैश्विक है। दुनिया के तमाम देशों में महिलाओं के साथ यौन हिंसा की समस्या भारत से भी कई गुना अधिक बड़ी और जघन्य है। यदि इसपर सही-सही विमर्श हो तो शायद भारत इस भयंकर समस्या से उन्मूलन में पूरे विश्व का नेतृत्व कर सकता है।
कामुकता और इसकी प्रवृत्ति पर विमर्श करते समय हमें अपनी समझ के आयाम को थोड़ा उदार करने की दरकार है। फिर हमें समझना होगा कि मानव निर्मित समाज और प्रकृति निर्धारित समाज के मध्य सामंजस्य और विरोधाभास कहाँ और क्यों उपस्थित हैं। जानवर से अलग पहचान स्थापित करने की कड़ी में इंसानों ने जो सिद्धांत, नैतिकता के मानदंड और कानून रूपी निषेध स्थापित किए हैं, क्या उन निषेधों ने प्राकृतिक मनुष्य को अप्राकृतिक जीवन जीने के लिए मजबूर किया है। क्या इस निषेध का अवसाद इंसान को दूसरों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण के लिए प्रेरित या बाध्य करता है? क्या अचेतन मस्तिष्क में प्राकृतिक और सामाजिक जीवन के बीच का द्वंद्व मुक्त एवं निष्ठुर मानसिकता को और घातक बना देता है? शायद हाँ! संभवतः यही वह प्रश्न हैं, जिनके उत्तर में इस गंभीर संकट का हल निहित है। 
ऐसे में नए कानून बनाने या पुराने कानूनों को कठोर करने के बजाय यह विचरना लाभप्रद होगा कि मौलिक त्रुटियों को कैसे सुधारा जाए। प्राकृतिक सत्य को आत्मसात कर कैसे नए रास्ते तलाशे जाएं, जिससे यौन उत्पीड़न जैसे पाशविक कृत्यों को न्यूनतम किया जा सके। सड़क पर मूत्र विसर्जन, थूकने या कूड़ा फेकने का दंड तभी न्यायसंगत है, यदि निश्चित दूरी और स्थान पर मूत्रालय और कूड़ेदान की व्यवस्था कर दी जाए। घर में शौचालय होते हुए भी कोई कमरे में पेशाब करे तो निश्चित तौर पर वह मानसिक रोगी है। किंतु, शौचालय नहीं होने पर कोई कमरे में पेशाब करे तो यह स्थापना संबंधी विफलता से उपजी हुई समस्या कहलाएगी। और यह सबकुछ तभी संभव है, जब कामुकता और अंतर्मुखी प्रवृत्तियों पर लोग खुलकर बोलेंगे। अव्यवहारिक लिहाज त्यागकर विमर्श करेंगे। (अनिल कामिल)

दिल्ली गैंग रेप कांड के बाद तो दावा किया गया था-जाग गया है पूरा देश ! फिर क्यों नहीं रुक रहे बलात्कार, क्यों हुई कठुवा-सूरत जैसी हैवानियत ?

दिल्ली गैंग रेप कांड और इसके बाद जो कुछ भी हुआ है, वह कई मायनों में अभूतपूर्व है। इस नृशंशतम् घटना के बाद कहा जा रहा था कि देश ‘जाग’ गया है, 125 करोड़ देशवासी जाग गए हैं, लेकिन सच्चाई इसके कहीं आसपास भी नहीं है। सच्चाई यह है दिल्ली गैंग रेप कांड के बाद भी ऐसे नृशंशतम मामलों का अंतहीन सिलसिला, बदायूं, लालकुआं, रामनगर, शीशमहल हल्द्वानी, 29 जुलाई 2016 की  रात्रि बुलन्दशहर के निकट एनएच-91 पर पिता के समक्ष पत्नी व नाबालिग बेटी के साथ तथा जम्मू के कठुवा व यूपी के उन्नाव के साथ ही बिहार के सासाराम व गुजरात के सूरत हुई वहशियाना घटनाओं के साथ जारी है। सच यही है-न देश अन्ना के आंदोलन के बाद जागा था, और न ही अब जागेगा।

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हमारी आदत है, हम आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ आराम तलब होते चले जा रहे है। हम पहले जागते नहीं, और कभी देर से जाग भी गए, तो वापस जल्दी ही सो भी जाते हैं। यदि जाग गए होते तो दिल्ली की घटना के ठीक बाद बस से नग्नावस्था में फेंके गए युवक व युवती को यूं घंटों खुद को लपेटने के लिए कपड़े की गुहार लगाते हुए घंटों वहीं नहीं पड़े रहने देते। और तब ना सही, करोड़ों रुपए की मोमबत्तियां जलाने-गलाने के बाद ही सही, जाग गये होते तो अब देश में कोई बलात्कार न हो रहे होते, जितने लोग शीशमहल कांड की पीड़िता के बलात्कारी हत्यारे को सरेआम फांसी पर लटकाने और तड़फा-तड़फा कर मारने के कमेंट कर और मार्च निकालने को आगे आये, उसके एक फीसद से भी कम, कुछ सौ लोग भी यदि घटना के तत्काल बाद आस-पास 100-500 मीटर के दायरे में बच्ची की तलाश में जुटते तो आज इस सब की जरूरत ही न पड़ती। बुलंदशहर के साथ ऐसी अमानवीय घटनाओं का अबाध सिलसिला जारी न रहता।

सच्चाई यह है कि दिल्ली की घटना के बाद तो देश में जैसे बलात्कार के मामलों की (या मामलों के प्रकाश में आने की) बाढ़ ही आ गई है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि कि देश की बड़ी आबादी को दिल्ली और इस जैसे कांडों की जानकारी ही नहीं है, और देश की अन्य समस्याओं, भूख, गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, महंगाई व भ्रष्टाचार के बीच वह अपने लिए दो जून की रोटी जुटाने में सो ही नहीं पाता, तो जागेगा क्या। वह आज भी आजादी के पहले जैसी ही जिंदगी जीने को अभिशप्त है। उसके पास चुनाव के दौर से सैकड़ों की संख्या में ‘उगे’ खबरिया चैनल दूर, रेडियो तक मयस्सर नहीं है। फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशियल साइटों का तो उसने नाम भी न सुना होगा। स्थिति यह है कि एक आंकलन के अनुसार हमारे देश में हर 6 मिनट पर एक महिला के खिलाफ अपराध को अंजाम दिया जाता है और केवल चार प्रतिशत बलात्कार के मामले ही अनजान लोगों द्वारा किए जाते हैं, यानी 96 प्रतिशत बलात्कार जानने-पहचानने वालों द्वारा किए जाते हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि बलात्कार के साथ ही अवैध संबंध बनाने वालो का क्या मनोविज्ञान है।

कठुवा व उन्नाव की घटनाओं पर महिला संगठनों ने लगाए ‘आजादी’ के नारे

नैनीताल। बीते सप्ताह जम्मू के कठुवा व यूपी के उन्नाव के साथ ही बिहार के सासाराम व गुजरात के सूरत सहित देश भर में बेटियों के साथ हुई अमानवीय घटनाओं से दिल्ली के निर्भया कांड की यादें एक बार फिर ताजा होने लगी हैं। रविवार को इन घटनाओं के विरोध में जनपद की महिला मैत्री, प्रयास, विमर्श, स्यैंणियों का संगठन, आवाज व महिला मंच आदि संगठनों की अगुवाई में महिलाओं व बालिकाओं ने नगर में रैली निकाली। रैली में महिलाएं हमें चाहिए आजादी, पढ़ने-लिखने की आजादी, बच्ची मांगे आजादी, हिंसाओं से आजादी, आज के भारत की यही निशानी-हिंसा बलात्कार और मनमानी, जब कातिल उतरे सड़कों पर-जब ताले लगे लबों पर-आवाज उठाना लाजमी है-आवाम जगाना लाजमी है तथा बेटी को ज्ञान दो-बेटी को सरकार दो एवं स्टॉप रेप नाव के साथ ही ‘पुरुष बुरे नहीं होते, औरत को नुकसान पहुंचाने वाली सोच बुरी है’ जैसे नारे लिखी तख्तियां लहराई गयीं और नारे लगाए गए।
रैली तल्लीताल बाजार के क्रांति चौक से प्रारंभ हुई और मल्लीताल पंत पार्क पर आकर समाप्त हुई। रैली में विमर्श संस्था की कंचन भंडारी, मैत्री की बसंती पाठक, प्रयास की सुनीता शाही, महिला मंच की बिमला असवाल व तारा शाही के साथ ही मेघा, यमुना, नीतू, प्रियंका, भारती, दिव्या, अनिल कार्की, पंकज, भरत, गिरिजा पाठक, महेश जोशी व अमित मेहता सहित बड़ी संख्या में लोग व खासकर महिलाएं व बालिकाएं मौजूद रहीं।

महिलाएं ही करती हैं संस्कारवान परिवार व देश का निर्माण

-आरएसएस का मातृशक्ति सम्मेलन हुआ आयोजित
नैनीताल। देश में चर्चा में चल रहीं कठुवा व उन्नाव की घटनाओं के बीच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का परिवार प्रबोधिनी मातृ शक्ति सम्मेलन रविवार को मुख्यालय स्थित आर्य समाज मंदिर में आयोजित हुआ। इस अवसर पर विद्या भारती के प्रांत संगठन मंत्री भुवन जी ने बतौर मुख्य वक्ता कहा कि एक महिला ही अपने परिवार को बेहतर संस्कार दे सकती है, और इससे ही एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। उन्होंने कुंती का उदाहरण देकर परिवार को बांधने की कहानी सुनाई एवं मैकाले द्वारा शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के जरिये देश में भारतीयता को विखंडित कर अंग्रेजियत थोपने का भी जिक्र किया।
अध्यक्षता करते हुए शुमा कंसल व अन्य वक्ताओं ने कहा कि जिस परिवसार में महिलाएं पूजी जाती हैं, यानी उनका सत्कार होता है वहां दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तर संतान उत्पन्न होती हैं। और जहां ऐसा नहीं होता है, वहां सभी तरह के कार्य निष्फल होते हैं। भारत वर्ष में महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है। वर्तमान समय में उन्नाव व कठुवा की घटनाओं की तरह समाज में महिलाओं के बारे में एक वर्ग में जो अपराध बढ़ रहा है, वह चिंताजनक है। इन स्थितियों से यथाशीघ्र देश को बाहर निकलने की जरूरत है। कार्यक्रम में नगर संघचालक डीएसबी परिसर के प्रोफेसर डा. हरीश चंदोला, नगर कार्यवाह सुयश पंत, नगर परिवार प्रबोधन प्रमुख धर्मेंद्र, जिला प्रचारक मनोज, केपी काला, विमला अधिकारी, तारा राणा, रीना मेहरा सहित अनेक महिलाएं मौजूद रहीं।

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मीडिया ने निस्संदेह एक हद तक शहरी और कस्बाई जनता को जगा दिया है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि “ऐसे लोग” मीडिया से नहीं जागते। सरकार और राजनीतिक दलों को मीडिया से दूर सोई जनता को जगाने का हुनर आता है। वह चुनाव के दिन मीडिया से कोसों दूर, सोई जनता को चुनाव के दौरान घर से बाहर निकालकर बूथों तक लाकर अपने पक्ष में वोट भी डलवा देते हैं, जबकि कथित तौर पर ‘जागे’ लोग वोट डालते वक्त ‘सो’ जाते हैं, यह भी सच्चाई है। लिहाजा, यह गलतफहमी ही कही जाएगी, कि देश जाग चुका है। अच्छा हो सरकार और राजनीतिक दल एक दिन के बजाए रोज के लिए इस पूरी जनता को जगा दें। और जो एक चौथाई लोग कथित तौर पर मीडिया और सोशियल मीडिया से जागे हैं, चुनाव के दिन अपनी आदत से ही सो ना जाऐं।

एक समाधान यह हो सकता है, शिक्षा में नैतिक शिक्षा विषय को बढ़ावा दिया जाए। आज कई एकल परिवारों में बच्चों को भाई-बहन का रिश्ता भी नहीं पता होता। उन्हें इसका ज्ञान दिया जाए। वहीं लगातार बढ़ते जा रहे आर्थिक असंतुलन के कारण समाज उभर रहे एक बड़े रोटी के एक टुकड़े या चंद रुपयों के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले उपेक्षित वर्ग के लोगों, खासकर बच्चों-युवाओं के बीच जाकर उनके मन में भी अपने घर, परिवार, समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान, आदर का भाव जगाया जाए। उनके बीच नुक्कड़ नाटक जैसे जागरूकता के कार्यक्रम चलाकर सरकार इस दिशा में पहल कर सकती है।

आइये बलात्कार की समस्या को समग्रता से समझें….

मनोवैज्ञानिक व सामाजिक पहलू:

बलात्कार की समस्या को समग्रता से समझें तो मानना होगा हमारी बहुत सी समस्याएं लगती तो शारीरिक हैं, लेकिन होती मानसिक हैं। बलात्कार भी एक तरह से तन से पहले मन की बीमारी है। और इसकी जड़ में समाज के अनेक-शिक्षा, लिंग, सामाजिक-आर्थिक स्तर के विभेद जैसे अनेक कारण भी हैं। कानून, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था का प्रभाव तो बहुत देर में आता है। इन समस्याओं पर सतही चर्चा करने के बजाए गहन मंथन करने की भी जरूरत है। अधिकतर लोग क्यों बलात्कार करते हैं ? इससे पहले एक बात पर शायद सभी सहमत हों कि यौन आवश्यकता हर जीवधारी में भोजन की तरह ही मूलभूत होती है, और पीढ़ियों के आगे बढ़ने के लिए जरूरी भी है। मनुष्य ने इस आवश्यकता को विवाह नाम के सामाजिक बंधन से बांध दिया है। विवाह में सबसे पहले, खासकर पुरुषों की हर वर्ग में और आर्थिक रूप से समर्थ वर्ग में महिलाओं (पुत्रियों) की पसंद का ध्यान रखा जाता है। विवाह से पूर्व कम उम्र में, जबसे मनुष्य के बच्चों के कोमल मन के साथ मस्तिष्क काम करना शुरू करने लगता है, छुपा कर रखे गए व गुप्त बताए जाने वाले खुद के एवं विरोधी लिंग के अंगों के प्रति जानने की इच्छा बढ़ने लगती है। यही समय है जब माता-पिता बच्चों की उनके अंगों के बारे में बताएं और अच्छे-बुरे की जानकारी दें, साथ ही स्कूलों में नैतिक, संस्कारवान शिक्षा दी जाए। जरूरी समझी जाए तो यौन शिक्षा भी दी जाए। जरूरी हो तो भूख और सैक्स का मनोविज्ञान भी समझा जाए। भूख को पेट की और सैक्स को शरीर की आग और दोनों को बेहद खतरनाक कहा जाता है। सैक्स की आग में शरीर की भूख के साथ ही मन की भी बड़ी भूमिका होती है, जिस पर मनुष्य की शैक्षिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति भी अत्यधिक प्रभाव डालती है। निठारी कांड इन दोनों भूखों को नृशंशतम् मामला था जिसमें कहा जाता है कि इन दोनों भूखों के भूखे भेड़िये दर्जनों मासूम बच्चों का बलात्कार करने के बाद उनके शरीर को भी खा गए। अफसोस, हमारी याददाश्त बेहद कमजोर होती है। हम इस कांड को कमोबेश भूल चुके हैं। मीडिया भी उसी दिन याद करता है, जब न्यायालय से इस मामले में कोई अपडेट आती है। वर्षों से मामला न्यायालय में चल रहा है। और इस “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” मामले में दोषियों को कब सजा होगी, कुछ नहीं कहा जा सकता।

आयु के आधार परः

इसे पहले आयु के आधार पर देखते हैं। कम उम्र के बच्चों (लड़के-लड़कियों दोनों में, भारत में अभी कम, विदेशों में काफी) में टीवी, सिनेमा व इंटरनेट की देखा-देखी और सैक्स व जननांगों के बारे में जानने की इच्छा, के कारण सैक्स संबंध बनाए जाते हैं। युवावस्था में युवक-युवतियों दोनों में शारीरिक और यौन अंगों का विकास होने के साथ यौन इच्छाएं भी नैसर्गिक रूप से बढ़ती हैं। सामाजिक व्यवस्था भी उन्हें बताती जाती है कि अब आप विवाह एवं यौन संबंध बनाने योग्य हो गऐ हो। यहां आकर व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक स्थित उसकी यौन इच्छाओं को प्रभावित करती है। अच्छे आर्थिक व सामाजिक स्तर के लोगों में इस स्थिति में अपने लिए मनपसंद जीवन साथी प्राप्त करने की अधिक सहज स्थिति रहती है, जबकि कमजोर तबके के लोगों के लिए यह एक कठिन समय होता है। इस कठिन समय पर यदि व्यक्ति को उसका मनपसंद साथी ना मिल पाए तो उसे अच्छी और संस्कारवान, नैतिक शिक्षा ही संबल व शक्ति प्रदान कर सकती हैं। अन्यथा उनके भटकने का खतरा अधिक रहता है। इस उम्र में कुछ लोग, खासकर युवक शराब जैसे बुरे व्यसनों की गिरफ्त में फंसकर और अपनी कथित पौरुष शक्ति के प्रदर्शन की कोशिश में युवतियों से छेड़छाड़ और बलात्कार की हद तक जा सकते हैं। इससे आगे प्रौढ़ अवस्था में विवाहितों और अविवाहितों में यौन इच्छाऐं (मन के स्तर से ही) पारिवारिक स्तर पर तृप्त या अतृप्त होने पर निर्भर करती हैं।

आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक स्तर

यौन इच्छाओं की पूर्ति बहुत हद तक मनुष्य की आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक स्तर पर निर्भर करती है। इन तीनों स्तरों के समन्वित प्रभाव से ही मनुष्य स्वयं में एक तरह की शक्ति या कमजोरी महसूस करता है। शक्ति की कमजोरी की स्थिति में आकर गिरा व्यक्ति इससे बुरा क्या होगा की दशा में बुराइयों को दलदल में और धंसता चला जाता है, जबकि शक्ति के उच्चस्तर स्तर पर आकर भी व्यक्ति में सब कुछ अपने कदमों पर आ गिरने जैसा अहम और कोई क्या बिगाड़ लेगा का दंभ भी उसे ऐसे कुकृत्य करने को मजबूर करता है, और वह अपने बल से अपनी आवश्यकताओं को जबर्दस्ती जुटा भी लेता है, फिर बल से ही लोगों का मुंह भी बंद कराने में अक्सर सफल हो जाता है। कमजोर वर्ग के लोगों के मामले जल्दी प्रकाश में आ जाते हैं। दिल्ली कांड में भी बलात्कारी कमोबेश इसी वर्ग के हैं। कोई ड्राइवर, क्लीनर, कोई सड़क पर फल विक्रेता, और एक कम उम्र युवक। यानी किसी की भी आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक स्थिति बहुत ठीक नहीं है। वहीं, मध्यम वर्ग के लोगों में सहयोग से या ”पटा कर (जुगाड़ से)“ काम निकालने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। यह वर्ग कोई बुरा कार्य करने से पहले सामाजिक स्तर पर डर भी अधिक महसूस करता है, इसलिए एक हद तक बुराइयों से बचा भी रहता है।

महिलाओं के प्रति समाज का गैर बराबरी का रवैया

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महिलाओं, बालिकाओं के प्रति आज भी समाज में बरकरार असमानता की भावना ऐसी स्थितियों के लिए बड़ी हद तक जिम्मेदार है। माता-पिता के मन में उसे पैदा करने से ही डर लगता है कि वह पैदा हो जाएगी तो उस ”लक्ष्मी“ के आने के बावजूद बधाइयां नहीं मिलेंगी। उसे, स्कूल-कालेज या कहीं भी अकेले भेजने में डर लगेगा। फिर उस ”पराए धन“ को कैसा घर-बर मिलेगा। और इस डर के कारण बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। पैदा हो जाती है तो उसे यूं ”घर की इज्जत“ कहा जाता है, मानो वह हर दम दांव पर लगी रहती है। ससुराल में भी पह ”पराई“ ही रहती है, और उसे ”डोली पर आने“ के बाद ”अर्थी पर ही जाने“ की घुट्टी पिला दी जाती है कि वह कदम बाहर निकालने की हिमाकत न करे। बंधनों में कोई बंधा नहीं रहना चाहता। वह भी ”सारे बंधन तोड़कर उड़ने“ की कोशिश करती है। आज के दौर में पश्चिमीकरण की हवा में टीवी- सिनेमा और इंटरनेट उसकी ”उड़ानों को पंख“ देने का काम कर रहा है। इस हवा में उसका अचानक ”उड़ना“ बरसों से उसे कैद कर रखने वाला पुरुष प्रधान समाज कैसे बर्दास्त कर ले, यह भी एक चुनौती है। यह संक्रमण और तेजी से आ रहे बदलावों का दौर है। इसलिए विशेष सतर्क रहने की जरूरत है। लिहाजा, यह कहा जा सकता है कि बलात्कार केवल एक शब्द नहीं, मानव मात्र पर एक अभिशाप है। यह केवल महिलाओं के लिए ही नहीं संपूर्ण समाज और मानवता पर कोढ़ की तरह है। इसके लिए किसी एक व्यक्ति, महिला या पुरुष, जाति, वर्ण, वर्ग को एकतरफा दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भले ही एक व्यक्ति बलात्कार करता हो, लेकिन इसके लिए पूरा समाज, हम सब, हमारी व्यवस्था दोषी है। लिहाजा, इसके उन्मूलन के लिए हर तरह के सामूहिक प्रयास करने होंगे। और यह सब हमारे हाथ में है, जब कहा जा रहा है कि दिल्ली की घटना के बाद पूरा देश जाग गया है। ऐसे में अच्छा हो कि अदालत से इस एक मामले में चाहे जो और जब व जैसा परिणाम आऐ, उससे पूर्व ही हम सब मिलकर मानवता पर लगे इस दाग को हमेशा के लिए और जड़ से मिटा दें।

क्या कानून से रुक सकते हैं बलात्कार

वादे कितने ही किये जायें पर बेहद लंबी कशमकश और दांव-पेंच भरी कानूनी लड़ाई के बाद शायद उसके बलात्कारियों और हत्यारों को शायद फांसी दे ही दी जाए। इससे पहले बलात्कारियों, हत्यारों को फांसी की मांग करने वाले अनेक अधिवक्ता उन्हें फांसी देने का भी विरोध करेंगे। न्यायाधीश महोदय भी पूछेंगे कि क्यों फांसी ही दी जाए, आखिर हमारे कानून की भावना जो ठहरी-”एक भी निर्दोष न फंसे“ (चाहे जितने दोषी बच जाएं, जबकि अनगिनत निर्दोष सींखचों के पीछे ट्रायल के नाम पर ही बर्षों से सजा भुगतते रहें हैं।) हमारी संसद, पश्चिमी दुनिया के लिव-इन संबंधों को अपने यहां भी कानूनी मान्यता देने व विवाह जैसी सामाजिक संस्था के लिए पंजीकरण की कानूनी बाध्यता बनाने और यौन संबंधों में आपसी सहमति के लिए आयु को कम करने की पक्षधरता के बीच शायद बलात्कार को भी ”रेयर“ और ”गैर रेयर“ के अलावा कुछ अन्य नए वर्गों में भी वर्गीकृत कर दे। उम्र (नाबालिगों से सहमति के यौन संबंध भी बलात्कार की श्रेणी में हैं) व लिंग (महिलाओं, पुरुषों व किन्नरों के आधार पर तो बलात्कार के लिए भी कमोबेश अलग-अलग कानूनी प्राविधान) के साथ ही हमारे माननीय बलात्कार को जाति-वर्ण के आधार पर भी बांट दें, यानी जाति विशेष की महिलाओं से बलात्कार पर अधिक या कम सजा के प्राविधान हो जाएं तो आश्चर्य न होगा। ऐसे-ऐसे तर्क भी आ सकते हैं कि दूसरों के केवल गुप्त यौननांगों पर बलात आक्रमण या प्रयोग ही क्यों बलात्कार कहा जाए, पूरा शरीर और अन्य अंगों पर क्यों नहीं। ऐसे तर्क भी आने लगे हैं कि महिला बलात्कार के बाद ‘जिंदा लाश’ क्यों कही जाए। बलात्कार होना मौत से बदतर क्यों माना जाए। बहरहाल, इन सब कानूनी बातों और केवल इस एक मामले में कड़ा न्याय मिल जाने के बावजूद क्या दिल पर हाथ रखकर कहा जा सकता है कि देश में ऐसी घटनाओं पर रोक लग जाएगी । क्या हमारी बहन-बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी ?

दिल्ली की तरह बलात्कार का हर मामला न पहला, न आखिरी

यह सही है कि दिल्ली का बलात्कार न तो पहला था, और ना ही आखिरी। उत्तराखंड के लालकुआं में आफिसकर्मी युवती से बलात्कार का मामला भी कम वीभत्स नहीं था, जिसमें बलात्कारियों ने युवती से बलात्कार के बाद उसके खास अंगों में पेन और रुपए ठूंस दिए थे, और उसकी हत्या भी कर डाली थी। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति कर चुकी है, पर आज भी जांच शुरू नहीं हुई है। इसके अलावा लालकुआ की ही आठ साल की मासूम संजना के बलात्कार के बाद हत्याकांड का मामला। ऐसे ही और भी अनेकों मामले हैं। लेकिन, दिल्ली जैसा आक्रोश पहले कभी देखने को नही मिला। निस्संदेह, इस आक्रोश के पीछे केवल दिल्ली की छात्रा के अपमान का रोष ही नहीं, वरन देश की हर मां-बहन की इज्जत, मान-सम्मान का प्रश्न आ खड़ा हुआ था। यह देश भर में पूर्व में हुई ऐसी अन्य घटनाओं के साथ लोगों के दिलों में भीतर राख में दहल रहे शोलों और खासकर छात्राओं, किशोरियों द्वारा समाज में कथित बराबरी के बावजूद झेली जा रही जिल्लत का स्वतः स्फूर्त नतीजा था। मौजूदा व्यवस्था से बुरी तरह आक्रोशित जनता को मौका मिला, और उन्होंने अपने गुस्से को व्यक्त कर दिया।

इस सबसे थोड़ा आगे निकलते हैं। कल तक मीडिया, समाचार पत्रों की सुर्खियां बनी बलात्कार पीड़िता की खबरें धीरे-धीरे पीछे होती चली जा रही हैं। सोशियल मीडिया में लोगों की प्रोफाइल पर लगे काले धब्बे भी हटकर वापस अपनी या किसी अन्य खूबसूरत चेहरे की आकर्षक तस्वीरों से गुलजार होने लगे हैं। आगे अखबरों, चनलों में कभी संदर्भ के तौर पर ही इस घटना का इतना भर जिक्र होगा कि 16 दिसंबर 2012 को पांच बहशी दरिंदों ने दिल्ली के बसंत विहार इलाके में चलती बस में युवती से बलात्कार किया था, और उसे उसके मित्र के साथ महिपालपुर इलाके में नग्नावस्था में झाड़ियों में फेंक दिया था। यह नहीं बताया जाएगा कि करीब आधे घंटे तक सैकड़ों लोग उन्हें बेशर्मी से देखते हुए निकल गऐ थे, और आखिर पुलिस ने पास के होटल से चादर मंगाकर उन्हें ढका और दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया, और जहां से हृदयाघात होने के बावजूद कमोबेश मृत अवस्था में ही उसे राजनीतिक कारणों से 27 दिसंबर को सिंगापुर ले जाकर वहां के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 29 दिसंबर की सुबह तड़के 2.15 बजे उसने दम तोड़ दिया, लेकिन पूरे दिन रोककर रात्रि के अंधेरे में उसके शरीर को दिल्ली लाया गया और 30 की सुबह तड़के परिवार के कथित तौर पर विरोध के बीच उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। ऐसा इसलिए ताकि लोग आक्रोषित ना हों, कानून-व्यवस्था के भंग होने की कोई स्थिति न उत्पन्न हो। क्योंकि पूरा देश कथित तौर पर जाग गया था।

आक्रोश के पीछे भी कोई साजिश तो नहीं थी ?

इसके बावजूद दिल्ली के साथ जिस तरह देश भर में महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी कंधे से कंधे मिलाते हुए ‘बलात्कारियों को फांसी दो’ के नारे के साथ निकल पड़े, दिल्ली में छात्र मानो 1997-97 में इंडोनेशिया के देशव्यापी छात्र आंदोलन की यादों को ताजा करने लगे और उनके समर्थन में देश भर के अनेकों छोटे-बढ़े कस्बों में खासकर युवा जुड़ गए, और दिल्ली में तो हजारों की भीड़ करीब-करीब निरंकुश होती हुई राष्ट्रपति भवन की ओर बढती हुई मिश्र में राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को गद्दी से उतारने के बाद ही थमने वाली जनक्रांति जैसा नजारा पेश करने लगी। वह सरकार ही नहीं, देशवासियों के लिए भी कान खड़े करने वाला और मौजूदा शासन व्यवस्था के साथ ही देश के लिए भी खतरे की घंटी है। लेकिन आश्चर्य की बात रही कि ऐसे हालातों पर चर्चा केवल लाठी चार्ज और एक पुलिस कर्मी की शहादत को विवादित कर पीछे धकेल दी गई। यह सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं की गई कि ऐसा क्यों हुआ। यह आक्रोश स्वतः स्फूर्त था कि इसके पीछे भी कोई साजिश थी। देश में चल रहे अनेक अन्य जरूरी मुद्दे, गैस सब्सिडी को सीमा में बांधने, महंगाई के आसमान छूने, आरटीआई के बावजूद नन्हे बच्चों के स्कूलों में एडमिशन न हो पाने के साथ ही भ्रष्टाचार, कालाधन, जन लोकपाल, पदोन्नति में आरक्षण, अन्ना, रामदेव, केजरीवाल सभी इस आंदोलन के आगे बौने पड़ गए, जिनके द्वारा भी कभी देश को जगा देने की बात कही जा रही थी । सारे देश को जगाने वाले अन्ना या रामदेव कहीं नहीं दिखे। रामदेव और केजरीवाल दिल्ली आए भी तो उन्हें भीड़ को भड़काने के आरोप में मुकदमे ठोंककर वापस भेज दिया गया। कहीं ऐसा तो न था कि गुजरात में मोदी की हैट्रिक के रूप में प्रचारित की जा रही जीत, केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के साथ ही बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों के साथ ही देश भर के सरकारी कर्मचारियों को प्रभावित करने वाले पदोन्नति में आरक्षण के बिल के लोक सभा में पास न हो पाने जैसे मुद्दों को इस नृशंशतम घटना के पीछे नेपथ्य में धकेल दिया गया। इस आंदोलन में एक खास बात यह भी रही कि कमोबेश पहली बार सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की छात्र व युवा ब्रिगेड एनएसयूआई व युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता भी इस मामले का विरोध करने सड़कों पर उतरे। लिहाजा, यह दिल्ली सहित देश भर में ऐसा व्यापक विरोध प्रदर्शन रहा, जिसमें हर वर्ग के लोग शामिल हुए, और खास तौर पर यदि सत्तारूढ़ दल की विचारधारा के लोग भी आंदोलन में शामिल रहे या शामिल होने का मजबूर हुए, तो यह वक्त है जब सरकार को संभल जाना चाहिए। अन्ना, रामदेव के आंदोलनों को दबाने, के लिए जिस तरह के राजनीतिक प्रपंच किए गऐ, उनसे अब काम चलाने से बाज आना चाहिए। आश्चर्य न होगा, यदि ऐसे में जल्द ही किसी सामान्य विषय पर भी लोग इसी तरह गुस्से का इजहार करने लगे।

समस्याएं थोपी तो नहीं जा रहीं ?

हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है ? बीते वर्ष पूरे देश को झकझोरने वाले दिल्ली गैंग रेप और हालिया बदायूं में दो बहनों की बलात्कार के बाद पेड़ पर लटका दिए जाने की घटनाओं के आलोक में यदि इस प्रश्न का जवाब देश के बच्चों से पूछा जाए तो उनमें अनेक बच्चों का भी जवाब होगा-बलात्कार। ऐसा क्यों है ? निस्संदेह, बलात्कार एक राष्ट्रीय कोढ़ जैसी समस्या है, और इस समस्या के कारण देश की महिलाओं, युवतियों, किशोरियों और यहां तक कि तीन-चार वर्ष की बच्चियों के साथ ही पूरे देश को पड़ोसी देशों के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ में तक शर्मसार होना पड़ा है। पर बच्चों के भी दिल-दिमाग में भी बलात्कार जैसा विषय क्यों ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम नहीं कोई और हमारी समस्याएं तय कर रहा है, या समस्याएं तय कर हम पर थोप रहा है।

विगत वर्षों में पहले केंद्र और दिल्ली सरकार के राष्ट्रमंडल खेलों, टूजी स्पेक्ट्रम सहित अनेकानेक घोटाले ‘देश’ की चिंता का सबब बने रहे। बाबा रामदेव ने दल-बल के साथ देश का काला धन देश में वापस लाने के आह्वान के साथ दिल्ली कूच किया तो काला धन से अधिक बाबा रामदेव देश की मानो समस्या हो गए। खबरिया चैनल दिल्ली में उनके प्रवेश से लेकर मंत्रियों द्वारा समझाने, फिर उनके मंच पर उपस्थित चेहरों, इस बीच आए समझौते के पत्र, रात्रि में हुए लाठीचार्ज और महिलाओं के वस्त्रों में रामदेव के दिल्ली से वापस लौटने की कहानी में काला धन का मुद्दा कहीं गुम ही हो गया। फिर अन्ना हजारे जन लोकपाल के मुद्दे पर दिल्ली आए तो यहां भी कमोबेश जन लोकपाल की जरूरत से अधिक अन्ना की गिरफ्तारी, उनके अनशन के एक-एक दिन बीतने के साथ उनके स्वास्थ्य की चिंता जैसी बातें देश की समस्या बन गईं, और इन समस्याओं को लेकर कथित तौर पर ‘पूरा देश’ ‘जाग’ भी गया। फिर अन्ना टीम में बिखराव व मतभेद पर ‘देश’ चिंतित रहा। आखिरकार केजरीवाल के ‘आम आदमी पार्टी’ बनाने के बाद ‘देश’ की चिंता कुछ कम होती नजर आई। लेकिन बीते वर्ष के आखिर में दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में हुई गैंग रेप की घटना ने तो मानो देश को झंकायमान ही करके ही रख दिया।

इन सभी घटनाक्रमों के पीछे क्या चीज ‘कॉमन’ थी। एक-दिल्ली, दो-इन घटनाओं को जनता तक लाने वाला मीडिया, तीन-सरकार और चार-आक्रोशित आम आदमी। क्या है इन चारों का आपसी संबंध ?

दिल्ली निस्संदेह देश की राजधानी और देश का दिल है। लेकिन क्यों केवल दिल्ली की खबरें ही हमारी चिंता का सबब बनती हैं। क्या बाकी देश की कोई समस्याएं नहीं हैं। क्या बलात्कार देश भर में नहीं हो रहे। क्या देश में महंगाई, भूख, गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण और भ्रष्टाचार जैसी अनेकानेक समस्याएं नहीं हैं। यदि हैं, क्या कहीं कोई बड़ी गड़बड़ तो नहीं है। मीडिया क्यों नहीं गांवों में आ सकता। क्यों उत्तराखंड के लालकुआं में ऑफिस कर्मी युवती के साथ बलात्कार के बाद उसके प्राइवेट नाजुक अंगों में रुपए व पेन आदि ठूंसने और उत्तराखंड के पहले करीब चार दर्जन लोगों की डीएनए जांच के बाद रिस्ते के फूफा के ही 13 बर्षीय बच्ची की बलात्कार बाद हत्या करने के मामले की खबरें राष्ट्रीय मीडिया की ‘पट्टी’ में भी नहीं आती। यह टीआरपी के नाम पर जो चाहे दिखाने, और उसी को राष्ट्रीय चिंता व समस्या बना देने का कोई खेल तो नहीं है।

ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं हम पर समस्याएं थोपी तो नहीं जा रही हैं। कि लो, अभी कुछ दिन यह समस्या लो, इससे बाहर कुछ ना सोचो। थोड़े दिन बाद, अब इस समस्या की घुट्टी पियो, और थोड़े दिन बाद अगली समस्या का काढ़ा पियो और अपनी वास्तविक समस्याओं को भूलकर मस्त रहो। यह कोई साजिश तो नहीं चल रही कि देश भर के लोगों की भावनाओं को चाहे जिस तरह से भड़काओ, और उनसे अपने लिए माल-मत्ता समेटो। लोगों की भावनाओं का बाजार सजा दो। देश की वास्तविक समस्याओं से लोगों का ध्यान भटका दो, और अपनी ऐश काटो। कोई बलात्कार जैसी समस्याओं का भी व्यापार तो नहीं कर रहा कि अभी मोदी अपनी जीत को ‘हैट्रिक-हैट्रिक’ कहते हुये बहुत उछल रहा है। अच्छा हुआ, बलात्कार हो गया, इसी गोटी से घोड़े को पीट डालो। रामदेव को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर, अन्ना को केजरीवाल अलग करवाकर और केजरीवाल को राजनीति में लाकर पहले ही पीट चुके है। शतरंज की बिसात पर कोई बचना नहीं चाहिए। राजनीति में इतना दम है कि प्यांदे से राजा को ‘शह-मात’ दे दें।

(मूलतः दिल्ली के गैंग रेप कांड के दौरान लिखी गई पोस्ट)

बलात्कार-एसिड अटैक पीड़िताओं के प्रति भी संवेदनशील नहीं सरकार

-पीड़िताओं को न्यायालय के आदेशों और विधिक सेवा प्राधिकरणों की संस्तुति के बावजूद नहीं मिल रहा मुआवजा
-एक वर्ष से लंबित हैं फाइलें
नवीन जोशी, नैनीताल। देश-प्रदेश में ऐसा कल्याणकारी राज्य बताया जाता है, जो कमजोरों, जरूरतमंदों को मुसीबत के समय सहारा दे। दुखियारों के दु:ख दूर करे। लेकिन उत्तराखंड सरकार अपनी इस जिम्मेदारी का कितना सही-गलत निर्वाह कर पा रही है, इसका नमूना राज्य की बलात्कार और तेजाब के हमलों की शरीर के साथ ही मन-मस्तिष्क पर असह्य पीड़ा झेलने वाली प्रदेश की नाबालिग बच्चियों को राज्य सरकार की ओर से मिलने वाले मुआवजे से देखा जा सकता है। उत्तराखंड राज्य में ऐसी बालिकाओं, किशोरियों और पीड़ितों के लिए ‘उत्तराखंड अपराध पीड़ित सहायता योजना” लागू है, लेकिन इस योजना के तहत जनपद की एक भी पीड़िता को लाभ नहीं मिला है। जिला न्यायालयों के आदेशों एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की संस्तुतियों के बावजूद शासन में पिछले एक वर्ष से अधिक समय से फाइलें लंबित हैं।
उल्लेखनीय है कि राज्य में बलात्कार एवं तेजाब के हमले जैसी मर्मांतक पीड़ा झेलने वाली पीड़िताओं के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए ‘उत्तराखंड अपराध पीड़ित सहायता योजना” लागू है। इस योजना के तहत सामान्यतया संबंधित न्यायालय मामले में फैसला सुनाने के साथ अपराधी से वसूली गई जुर्माने की राशि का अंश पीड़िता को देने के साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देशित करते हैं कि वह पीड़िता को शासन से भी मदद दिलाएं। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष व सचिव योजना के प्राविधानों के तहत पीड़िताओं को अधिकतम दो से ढाई लाख रुपए तक की सहायता की मंजूरी देते हैं, जिसके बाद जिलों के डीएम के माध्यम से संबंधित फाइलें धनराशि की स्वीकृति के लिए शासन को भेज दी जाती हैं। नैनीताल जनपद की बात करें तो यहां से एक अप्रैल 2014 से करीब आठ मामलों की फाइलें शासन में भेजी गई हैं, लेकिन एक वर्ष बीतने के बाद भी इन मामलों में संस्तुति तो दूर शासन से प्राधिकरण को फाइल प्राप्ति का कोई जवाब भी प्राप्त नहीं हुआ है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव ज्योति बाला का कहना था कि फाइलें शासन में लंबित हैं। प्रयास किया जाएगा कि पीड़िताओं को जल्द से जल्द मदद दिलाई जाएगी।

सगे पिता से पीड़ित बहनों से लेकर संजना व पूजा बलात्कार बाद हत्याकांड के मामले लंबित

नैनीताल। ‘उत्तराखंड अपराध पीड़ित सहायता योजना” के तहत शासन में सगे पिता द्वारा नौ जुलाई 2013 को बलात्कार की गई कालाढुंगी थाने के ग्राम पाटकोट निवासी दो सगी 12 व 14 वर्ष की बहनों की फाइल एक अप्रैल 2013 को शासन में भेजे जाने के बाद से लंबित हैं। दोनों बहनों को ढाई-ढाई लाख रुपए देने की संस्तुति की गई थी। इसके अलावा बिंदूखत्ता के तिवारी नगर निवासी प्रदेश के बहुचर्चित संजना बलात्कार बाद हत्याकांड मामले की फाइल भी नौ अप्रैल 2014 को भेजी गई थी। इसी तरह हल्द्वानी के भोटिया पड़ाव निवासी कविता बिष्ट पुत्री दीवान सिंह पर दो फरवरी 2008 में अज्ञात व्यक्ति ने तेजाब से हमला किया था, उसे डेढ़ लाख रुपए देने की संस्तुति की फाइल 25 मार्च 14 से, धनपुर मोटाहल्दू में 16 वर्षीया बालिका के साथ निकटवर्ती बचीपुर गांव के आनंद सिंह ने जुलाई 2011 में बलात्कार किया था, रेलवे कॉलोनी काठगोदाम निवासी 16 वर्षीया बालिका से काठगोदाम निवासी भुवन सिंह पुत्र रूप सिंह ने बलात्कार किया था एवं मूलत: मूंडा पांडे मुरादाबाद निवासी मजदूर की 10वर्षीया बेटी की साथी मजदूर ने रामनगर थाना क्षेत्र में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। इन सभी मामलों में ढाई-ढाई लाख रुपए देने की संस्तुति की गई थी, जबकि हल्द्वानी के लाइन नंबर 18 में 10 जून 2014 को हुए बहुचर्चित तेजाब हमले के मामले में जहांआरा पुत्री रईश मिया, इरशाद हुसैन व समीर सहित कुल 19 एसिड अटैक पीड़ितों को करीब ढाई लाख रुपए मुआवजा देने की संस्तुति जिला प्रशासन की ओर से की गई थी। यह सभी फाइलें शासन में अभी भी लंबित पड़ी हैं।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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