प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पूरे विश्व की जीवन शैली का अंग बन रहा है योग: भट्ट

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 जून, 2024। सरोवरनगरी नैनीताल में ‘स्वयं और समाज के लिए योग’ की थीम के साथ मनाये गये 10वें विश्व योग (Yog) दिवस पर अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए। मुख्य कार्यक्रम डीएसए मैदान के बास्केटबॉल कोर्ट में आयोजित हुआ। इस अवसर पर नैनीताल-ऊधमसिंह नगर के सांसद अजय भट्ट के साथ ही कृषि उत्पादन … Read more

भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा 4.7 करोड़ वर्ष पुराना-बस जितना लंबा एनाकोंडा जैसा भगवान शिव के गले की शोभा-वासुकी नाग

Bhagwan Shiv Mahadev

नवीन समाचार, देहरादून, 20 अप्रैल 2024 (Indian scientists discovered Shiv jis Vasuki Nag)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के प्रो. सुनील वाजपेयी और पोस्ट-डॉक्टरल फैलो देबजीत दत्ता ने सांप की एक 47 मिलियन यानी 4.7 करोड़ वर्ष पुरानी प्रजाति की खोज की है। इसे पृथ्वी पर अब तक घूमने वाले सबसे बड़े सांपों में से एक … Read more

एरीज (ARIES) नैनीताल के वैज्ञानिक के नेतृत्व में चीन, भारत, फिनलैंड, रूस, अमेरिका, जापान और बुल्गारिया के 28 वैज्ञानिकों ने की ब्रह्मांड के अबूझ रहस्यों पर एक बड़ी खोज

ARIES

Solar Lunar Eclipse कल चंद्रग्रहण पर शाम 4 बजे से बंद हो जायेंगे नयना देवी मंदिर के कपाट, मंदिर प्रबंधन ट्रस्ट की नयी कार्यकारिणी गठित…

Solar Lunar Eclipse

चेक गणराज्य में शोध (Research-1) करेंगी नैनीताल की डॉ. अनीता राणा…

Research

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 सितंबर 2023 (Research)। नैनीताल नगर निवासी एक शोधार्थी डॉ. अनीता राणा का चयन यूरोप के चेक गणराज्य में शोध के लिये हुआ है। डॉ. अनीता वर्तमान में आईआईटी रुड़की में कार्यरत हैं और जल्द ही चेक गणराज्य में ‘सिंथेसिस ऑफ ड्रग-पॉलीमर कंज्युगेट्स’ विषय पर शोध कार्य करेंगी।

Research)।
डॉ. अनीता राणा

डॉ. अनीता ने बताया की उन्होंने कुमाऊ विश्वविद्यालय के प्रो. राजेंद्र सिंह नैनो साइंस और नैनो टेक्नोलॉजी केंद्र नैनीताल से केंद्र के प्रभारी प्रो. नंद गोपाल साहू के निर्देशन में ‘ग्राफीन एंड ड्रग डिलीवरी, नेचुरल प्रोडक्टस’ विषय पर शोध कार्य पूरा किया है। डॉ. अनीता के 16 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि उनकी एक खोज को एक पेटेंट प्राप्त हो चुका है व कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी उनके नाम हैं।

उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु प्रो. नंद गोपाल साहू और अपने माता- पिता,पति को दिया है। उनकी माता तारा राणा नगर पालिका सभासद व पिता सर्वजीत सिंह राणा व्यवसायी हैं।

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यह भी पढ़ें (Research) : सुबह का पठनीय समाचार : यमुना ही थी सरस्वती नदी, शोध में बड़ा दावा

(Research) बड़ी खोजः प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम के नीचे प्राचीन नदी के सबूत  मिले, कहीं ये सरस्वती तो नहीं! - Science AajTakनवीन समाचार, अल्मोड़ा, 29 दिसंबर 2022 (Research) । देश में गंगा, यमुना व सरस्वती नाम की तीन बड़ी नदियों की बात शास्त्रों में कही जाती है। कहा जाता है कि प्रयाग में गंगा-यमुना के साथ सरस्वती का भी संगम होता है, लेकिन सरस्वती नदी कहीं दिखाई नहीं देती है। अब नदियों पर अध्यध्यन करने वाले कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भू-वैज्ञानिक जेएस रावत ने दावा किया है कि यमुना नदी ही सरस्वती नदी थी। इस बारे में उन का शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ साइंस एंड रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। यह भी पढ़ें : अजब-गजब : मूंगफली-लहसुन खाने वाली मुर्गी ने एक दिन में दिए 31 अंडे, विश्व रिकॉर्ड खंगाला जाने लगा…

(Research) सरस्वती नदी और उससे पनपी सभ्यता का पता लगाने के लिए किए गए प्रो. रावत के शोध के दावे के मुताबिक यमुना ही असल में सरस्वती नदी है। पहले इस नदी का प्रवाह क्षेत्र हरियाणा से पंजाब, राजस्थान, गुजरात के दक्षिण पश्चिमी भाग और पश्चिम पाकिस्तान तक था। यह भी पढ़ें : नैनीताल : सैलानियों ने टैक्सी चालकों से मारपीट, महिलाओं ने लगाए छेड़छाड़ के आरोप

प्रो.जेएस रावत नेशनल चेयर ...(Research) शोध में दावा किया गया है कि लोथल और मोहनजोदड़ो वास्तव में सरस्वती (यमुना) नदी के किनारे विकसित सभ्यताएं थीं। भूगर्भीय, पुरातात्विक और रासायनिक प्रमाणों से इसका पता चला कि यह पूरी तरह स्वदेशी सभ्यता है। इसे मध्य एशिया से आने वाले आर्यों ने विकसित नहीं किया। यह भी पढ़ें : हल्द्वानी में शुरू हुआ रेलवे व प्रशासन का अतिक्रमण हटाओ अभियान, क्षेत्रवासियों के विरोध के बीच पीलर हदबंदी की कोशिश

(Research) सरस्वती का प्रवाह सरस्वती नदी का सभ्यता क्षेत्र हरियाणा में भिरना, कुणाल, महम, फरमाना, पौली, धानी, राखीगढ़ी, बालू, सीसवाल, पंजाब में दलेवान, लखमीरावाला, राजस्थान में कालीबगान, सूरतगढ़, अनूपगढ़, किशनगढ़, सोठी, मेहरगढ़, कच्छ के रण, पाकिस्तान में चोलिस्तान, गनवेरीवाला, किला अब्बास, मारोट, मोहनजोदड़ो, मिताथल तक था। यह भी पढ़ें : पति को महंगा पड़ा प्रेमिका बनी पत्नी का मायके जाने पर अनजान महिला से चैटिंग करना, राज खुला तो वह निकली अपनी ही पत्नी और

(Research) प्रो. रावत के अनुसार हजारों सालों में न सिर्फ यमुना बल्कि गंगा, गोमती, शारदा और घाघरा नदी ने भी प्रवाह बदला। एक समय गंगा नदी भी ऋषिकेश से दिल्ली के बीच बहती थी। करीब 30 हजार से 8500 वर्ष पूर्व होलोसीन के समय नदी का प्रवाह तंत्र बदला। लगभग 8,500 वर्ष पहले यमुना ने ठीक वही रास्ता अपनाया, जहां गंगा बहती थी। यह भी पढ़ें : सुबह का सुखद समाचार : यूकेपीएससी ने जारी किया 2023 के लिए 32 परीक्षाओं का कलेंडर

(Research) प्रो. रावत के अनुसार नील नदी बेसिन में जिस तरह विभिन्न सभ्यताओं का जन्म हुआ, उसी तरह सरस्वती नदी के किनारे भी सबसे पुरानी सभ्यता पनपी। इसके बाद सरस्वती के नए प्रवाह क्षेत्र को यमुना के नाम से जाने जाने लगा। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : शोधार्थियों के लिए शोध रूपरेखा जमा करने की अंतिम तिथियां घोषित

बहुजन शोधार्थियों के लिए बना मंच, पीएचडी में मदद करेंगे बहुजन विद्वान -  दलित दस्तकनवीन समाचार, नैनीताल, 23 नवंबर 2022 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने मंगलवार को प्री-पीएचडी कोर्स वर्क का परीक्षाफल घोषित करने के बाद अब शोध रूपरेखा जमा करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर 2022 घोषित कर दी है। कुलसचिव दिनेश चंद्रा ने बताया कि इसके पश्चात 10 जनवरी 2023 तक 1000 रुपये तथा 20 जनवरी तक 2000 रुपये विलंब शुल्क के साथ शोध रूपरेखा जमा की जा सकेगी। यह भी पढ़ें : उत्तराखंड ब्रेकिंग: कल की छुट्टी पर आया बड़ा अपडेट

(Research) शोध निदेशक प्रो. ललित तिवारी ने बताया की 20जनवरी के बाद शोध रूपरेखा जमा नहीं होगी। पंजीकरण फार्म विश्वविद्यालय की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते है। शोध रूपरेखा पांच प्रतियों में सभी दस्तावेजों के साथ शोध निर्देशक, विभागाध्यक्ष या संकाय अध्यक्ष के माध्यम से शोध निदेशालय में जमा की जायेंगी। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : कुमाऊं विश्वविद्यालय ने विषाणुओं को बेअसर करने वाला पेंट बनाया, पेटेंट भी हासिल किया

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 जून 2022 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. नंद गोपाल साहू एवं उनकी टीम के डॉ. मनोज कड़ाकोटी, डॉ. संदीप पांडे डॉ. सुनील ढाली, चेतना तिवारी ने आईआईटी ग्वालियर के प्रो अनुराग श्रीवास्तव के साथ बेकार प्लास्टिक से ग्राफीन व ग्राफीन से एंटी वायरल पेंट का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की है।

(Research) यह पेंट विभिन्न प्रकार के विषाणुओं को बेअसर करता है। इस कार्य पर टीम को भारत सरकार से पेटेंट भी प्रदान किया गया है। इसका पत्र आज पेटेंट ऑफिस भारत सरकार ने जारी किया है। 

(Research) टीम की इस उपलब्धि पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनके जोशी, शोध निदेशक प्रो. ललित तिवारी, प्रो. संजय पंत, प्रो. एबी मेलकानी, डॉ.आशीष तिवारी, डॉ.महेश आर्य, प्रो. चित्रा पांडे, डॉ. गीता तिवारी, प्रो. पुष्पा जोशी, प्रो. एसएस बर्गली सहित कूटा यानी कुमाऊं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं तथा इसे विश्वविद्यालय का गौरव बताया है। उल्लेखनीय है कि प्रो. साहू की टीम पूर्व में भी कई भारतीय तथा ऑस्ट्रेलियन पेटेंट हासिल कर चुकी है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : नैनीताल (Research) : एरीज नैनीताल एवं एथेंस के वैज्ञानिकों ने जंगलो की आग से सौर ऊर्जा के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों पर किया बड़ा शोध, बताए निष्कर्ष

कहा-सौर ऊर्जा के उत्पादन को घटाने में बड़ी भूमिका निभाती है जंगलों की आग
कहा-निष्कर्ष देश में सौर ऊर्जा के उत्पादन एवं इसके प्रबंधन व वितरण की योजना बनाने में हो सकता है बड़े स्तर पर कारगर
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 27 अप्रैल 2022 (Research) । देश में गर्मी के मौसम में जंगलों में लगने वाली आग देश में सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने में बड़ी भूमिका निभाती है। यह बात एक अध्ययन में प्रकाश में आई है।

(Research) इस अध्ययन से देश में सौर संयंत्रों के उत्पादन पर जंगल की आग के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण देश में बिजली के उत्पादन की योजना बनाने, बिजली के वितरण, आपूर्ति, सुरक्षा और बिजली उत्पादन में पूरी स्थिरता रखने में मदद मिल सकती है।

(Research) उल्लेखनीय है भारत जैसे विकासशील देशों में सौर ऊर्जा उत्पादन का व्यापक कार्य हो रहा है। मौजूदा केंद्र सरकार भी इस दिशा में नए संकल्प के साथ प्रयासरत है। अब तक माना जाता रहा है कि बादल, एरोसोल और प्रदूषण जैसे कई कारक सौर किरणित ऊर्जा मान को सीमित करते हैं। इससे फोटोवोल्टिक केंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्र प्रतिष्ठानों के कार्य-निष्पादन में समस्याएं पैदा होती हैं।

(Research) इस बात को ध्यान में रखते हुए डीएसटी यानी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार के तहत स्वायत्त अनुसंधान संस्थान एरीज यानी आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज नैनीताल और यूनान स्थित नेशनल ऑब्जर्वेटरी ऑफ एथेंस (एनओए) के शोधकर्ताओं के एक समूह ने एरीज के वैज्ञानिक डॉ. उमेश चंद्र दुम्का के नेतृत्व में प्रो. पनागियोटिस जी कोस्मोपोलोस, डॉ. पीयूष कुमार व एन पटेल आदि वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने वाले कारकों का पता लगाने की कोशिश की।

(Research) उन्होंने पाया कि बादलों और एरोसोल के अलावा जंगल की आग सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इंटरनेशनल ‘पीयर रिव्यूड जर्नल-रिमोट सेंसिंग’ में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि जनवरी से अप्रैल 2021 की अध्ययन अवधि के दौरान एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ वैल्यू 1.8 तक थी।

(Research) इस दौरान बड़े पैमाने पर जंगल की आग की घटनाओं के कारण एक क्षैतिज सतह (वैश्विक क्षैतिज किरणन-जीएचआई) पर कुल सौर विकिरण की घटना में कमी आई और सूर्य से बिना बिखरे हुए सौर विकिरण 0 से 45 फीसदी तक ही प्राप्त हुई।

(Research) अध्ययन में शामिल प्रो.दुम्का व अन्य वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस अध्ययन के निष्कर्ष से देश के स्तर पर ऊर्जा प्रबंधन और योजना पर जंगल की आग के प्रभाव के बारे में निर्णय लेने वालों के बीच काफी जागरूकता बढ़ेगी। इसके अलावा यह शोध जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को कम करने की प्रक्रियाओं और नीतियों एवं सतत विकास पर इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का समर्थन भी कर सकता है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : विद्यार्थियों को कोविड-सार्स जैसे विषाणुओं व इनके टीकों को बनाने की वैज्ञानिक जानकारियां

-गुहा रिसर्च कांफ्रेंस एवं भाभा एटोमिम रिसर्च सेंटर मुंबई के आउटरीच कार्यक्रम के तहत भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में हुआ व्याख्यानमाला का आयोजन
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 अप्रैल 2022 (Research)। गुहा रिसर्च कांफ्रेंस एवं भाभा एटोमिम रिसर्च सेंटर मुंबई के आउटरीच कार्यक्रम के तहत गुरुवार को मुख्यालय स्थित भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया।

(Research) इस अवसर पर शहीद सैनिक विद्यालय के साथ नगर के डीएसबी परिसर के भौतिक विज्ञान विभाग, निशांत स्कूल व सीआरएसटी व राजकीय इंटर कॉलेज के विद्यार्थियों को संेटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी हैदराबार की वैज्ञानिक डॉ. रसना भंडारी एवं रघु तिरुमलाई ने कोरोना व सार्स विषाणु की अवधारणा तथा इन विषाणुओं के विरुद्ध कोवैक्सीन व कोवीशील्ड जैसे टीकों को बनाने की विधियों की विस्तार से जानकारी दी।

(Research) इनके अलावा सेंटर फॉर डीएनए फिंगर प्रिंटिंग एंड डाईगोसटिक्स हैदराबाद के कासवेकर दुर्गादास ने रसायनिक हथियारों के नुकसान पर व्याख्यान दिया। साथ ही बच्चों को भारतीय परिवेश में वैज्ञानिक अनुसंधान व मेहनत से भाग्य निर्माण हेतु विद्यार्थियों को प्रेरित किया। साथ ही शहीद सैनिक विद्यालय के विद्यार्थियों हेतु एक लाख 60 हजार रुपए मूल्य का इंटरेक्टिव स्मार्ट क्लासरूम भी प्रदान किया।

(Research) आयोजन में प्रधानाचार्य बीएस मेहता, कुमाऊं विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. नीता बोरा शर्मा, आरोही संस्था प्यूड़ा के गोपाल नेगी, उप प्रधानाचार्य प्रवीण सती, डॉ. नीलिमा जोशी, उमेश जोशी, ललित जीना, विनीता बोरा, अवंतिका गुप्ता, नेहा, भाष्कर पांडे, मीनाक्षी बिष्ट, निखिल बिष्ट, यामिनी पांडे, दिशा रानी, उत्कर्ष बोरा व दरबान सिंह आदि ने भी योगदान दिया। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : चीन में कार्यरत दीर्घकालीन मौसम वैज्ञानिक प्रो. गायत्री नैनीताल के गांव में करेंगी कृषि संबंधी शोध, आ रही अड़चने

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 20 मार्च 2022 (Research)। सामान्यतया प्रतिभाएं अपनी प्रतिभा से दूसरे देशों को लाभान्वित करती हैं और अपने घर-देश लौटना पसंद नहीं करती हैं, परंतु नगर की एक बेटी, नगर के ही डीएसबी परिसर की छात्रा रही, चीन की शियान जाइटोंग युनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत दीर्घकालीन मौसम वैज्ञानिक डॉ. गायत्री कठायत ने नैनीताल जनपद की ग्राम पंचायत दाड़िमा में अपनी प्रतिभा का उपयोग करने का फैसला लिया है।

अलबत्ता उन्हें इस कार्य में स्थानीय तौर पर अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। सोमवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में डॉ. गायत्री ने बताया कि वह ग्राम पंचायत दाड़िमा में ‘रीजनल वैदर स्टेशन’ स्थापित करना और यहां सर्वश्रेष्ठ उत्पादन के साथ उगाई जा सकने वाली फसलों पर शोध करना चाहती हैं। चीन, वियतनाम सहित कई देशों में किए गए अपने अध्ययन के आधार पर उन्होंने बताया कि फसलों का उत्पादन बहुत हद तक स्थानीय जलवायु पर निर्भर करता है।

वह दाड़िमा में स्थानीय जलवायु का अध्ययन करना चाहती हैं, तथा प्राप्त होने वाले डाटा के आधार पर सर्वप्रथम उसके अनुरूप टमाटर के उपयुक्त बीजों की पौध लगाना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि शोध के उपरांत उपयुक्त बीजों की पहचान कर लिए जाने के बाद वह चाहने पर स्थानीय लोगों को अपने ज्ञान व डाटा का लाभ देंगी।

निर्दलीय विधायक प्रत्याशी बने रोड़ा
नैनीताल। डॉ. गायत्री ने बताया कि उनके कृषि परियोजना स्थल तक पहुंचने के लिए 12-15 फिट चौड़ी दाड़िमा-गढ़गांव सड़क है। इससे उन्हें ट्रैक्टर ले जाना है। इस सड़क पर गढ़गांव की सड़क कटने के कारण मलवा गिर गया था, जिसे प्रशासन की आधिकारिक अनुमति से प्रशासन की मौजूदगी में वह गत 15 मार्च को साफ करा रही थीं।

किंतु निर्दलीय विधायक प्रत्याशी व जिला पंचायत सदस्य लाखन सिंह नेगी का कहना है कि यह सड़क उनके द्वारा बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के बनाई है। वह किसी राजस्व विभाग को नहीं मानते। इसलिए वह उन्हें इस सड़क से नहीं जाने देंगे। जबकि दूसरे राज्यों के बिल्डर भी इस क्षेत्र में कॉटेज आदि बनाने के लिए इस सड़क का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शिकायत जिलाधिकारी से भी की है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा के शोधकर्ताओं के साथ नैनीताल की कविता के शोध को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

-चमोली आपदा पर किया गया है शोध, देश-दुनिया के कुल 53 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने स्वैच्छिक आधार पर शोध कार्य किया
-शोध में हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया है

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 9 मार्च 2022 (Research)। पिछले वर्ष 7 फरवरी को चमोली जिले में आई आपदा पर किया गया एक शोध ‘ए मैसिव रॉक एंड आइस एवलांच कॉज्ड द 2021 डिजास्टर एट चमोली, इंडियन हिमालय’ विख्यात जर्नल ‘साइंस’ में प्रकाशित हुआ है, और इसे ‘अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ जियोेग्रैफर्स’ के ‘जियोमोरफोलॉजी स्पेशलिटी ग्रुप’ की ओर से विश्वप्रसिद्ध ‘2022 ग्रोव कार्ल गिल्बर्ट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है।

(Research) इस शोध का हिस्सा रहीं नैनीताल निवासी पत्रकार एवं जल नीति विशेषज्ञ कविता उपाध्याय ने बताया कि इस घटना से चिंतित अमेरिका, ब्रिटेन, भारत, कनाडा और कई अन्य देशों के कुल 53 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने चमोली में आई बाढ़ और उससे हुई क्षतियों पर स्वैच्छिक तौर पर यह शोध किया। इन विशेषज्ञों में हाइड्रोलॉजिस्ट यानी जल वैज्ञानिक, ग्लेशियोलॉजिस्ट यानी ग्लेशियर वैज्ञानिक, मौसम विशेषज्ञ, आपदा विशेषज्ञ एवं जल नीति शोधकर्ता आदि शामिल रहे।

(Research) उत्तराखंड के देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान भी इस शोध में हिस्सेदार था। उल्लेखनीय है कि कविता ऑक्सफोर्ड विश्वविश्यालय से जल विज्ञान एवं जल निति में एमएससी कर चुकी हैं, और वर्तमान में हिमालय के पर्यावरणीय विषयों पर शोध एवं स्वतंत्र पत्रकारिता करती हैं।

(Research) उन्होंने कहा, यह शोध इस मायने में भिन्न है कि इसमें हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया है, जब कि अधिकांश वैज्ञानिक शोधपत्र इस तरह के विवाद में पड़ने से बचने की कोशिश करते हैं। इस कारण, आपदा प्रभावित इन परियोजनाओं से होने वाली क्षतियों के खिलाफ इस शोध का उपयोग न्याय पाने के लिए न्यायालयों में कर रहे हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : पीएचडी प्रवेश परीक्षा पर आई अपडेट

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 7 जनवरी 2022 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश परीक्षा रविवार को आम्रपाली इंस्टीट्यूट हल्द्वानी तथा डीएसबी परिसर नैनीताल में आयोजित होगी। परीक्षा संयोजक प्रो. संजय पंत ने बताया कि परीक्षा हेतु प्रवेश पत्र विश्वविद्यालय की वेबसाइट https://www.kunainital.ac.in/ में अपलोड किए जा चुके हैं। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक ने खोज लिया भगवान विष्णु का ‘क्षीरसागर’, अमेरिकी जनरल में प्रकाशित हुआ शोध पत्र…

-लद्दाख में भारतीय व काराकोरम प्लेट के बीच फंसे नए खोजे गए ‘क्षिरोधा’ नाम के भूखंड की खोज से बदल जाएगी भारतीय व एशियाई प्लेट के टकराने की भूवैज्ञानिक अवधारणाएं

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जनवरी 2022 (Research)। सृष्टि के शुरुआती दौर सतयुग के बारे में कहा जाता है कि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीरसागर में वास करते थे। इसी क्षीरसागर में एक सुमेरु पर्वत था। इसी क्षीरसागर में मंदराचल पर्वत पर वासुकी नाग की मदद से देवों एवं असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था और इसके फलस्वरूप हलाहल विष के साथ माता लक्ष्मी सहित अनेक रत्न निकले थे।

(Research) भारतीय धर्मग्रंथों में वर्णित इन संदर्भों को अब एक हद तक वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं। इधर कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक प्रो. राजीव उपाध्याय ने कभी हिमालय की जगह मौजूद रहे टेथिस सागर के क्षेत्र में एक ऐसे अज्ञात भूखंड को खोज लिया है, जिसे क्षीरसागर के नाम पर ही ‘क्षिरोधा’ नाम दिया गया है।

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प्रो. राजीव उपाध्याय

(Research) प्रो. राजीव उपाध्याय का इस संबंध में एक शोध पत्र मंगलवार को ही दुनिया की शीर्ष भूवैज्ञानिक पत्रिका ‘जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका’ में ‘डिस्कवरी’ नाम से छपा है। इस बारे में ‘नवीन समाचार’ को उन्होंने बताया कि पृथ्वी की उम्र करीब 4.6 अरब वर्ष की है। तब दुनिया में आज की तरह सात की जगह उत्तरी गोलार्ध में लॉरेशिया और दक्षिणी गोलार्ध में वर्तमान दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत, आस्ट्रेलिया व अंटार्कटिका महाद्वीप को समाहित करने वाले गोंडवाना लेंड नाम के कुल दो ही महाद्वीप थे, और वर्तमान हिमालय की जगह टेथिस नाम का महासागर था।

(Research) अब से करीब 30 करोड़ वर्ष पूर्व लॉरेशिया और गौंडवाना लेंड आपस में टकराए और इससे नए महाद्वीपों का जन्म हुआ। ऐसी मान्यता है कि इसी कड़ी में आगे 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट भी दक्षिणी गोलार्ध से टूटकर उत्तरी गोलार्ध की ओर आई और एशियाई प्लेट से टकराई। इसी प्रक्रिया में उनके टकराने वाले स्थान पर मौजूद टेथिस सागर में जमा चूना पत्थर आदि पहाड़ का रूप लेकर हिमालय पर्वत बन गया।

(Research) अब तक के अध्ययनों के आधार पर माना जाता है कि भारतीय प्रांत लद्दाख में सिंधु नदी से लगे इंडस सांग्पो सूचर या इंडस सूचर क्षेत्र में भारतीय भूगर्भीय प्लेट तिब्बती प्लेट से टकराई। भूवैज्ञानिकों की ओर से यह एक स्थापित सत्य है। इधर नए शोध अध्ययन में इससे इतर कहा गया कि भारतीय प्लेट एशियाई प्लेट से नहीं टकराई, बल्कि इनके बीच में और भी छोटे-छोटे भूखंड हैं, जो भारतीय प्लेट से पहले ही टकराए थे।

(Research) ऐसा ही भूखंड हैं-काराकोरम, ल्हासा व पेंगांस झील के पूर्व में स्थित क्विंगटांग। लेकिन उत्तरी लद्दाख में सिंधु नदी के उत्तर में सियाचिन से आने वाली नुब्रा व शियोक नदियांे की नुब्रा घाटी में भारतीय एवं काराकोरम प्लेट के बीच में एक अन्य छोटा भूंखंड फंसा हुआ है।

(Research) यह भूखंड अब तक पूरी तरह से अज्ञात था। अलबत्ता भूवैज्ञानिकों की गणना के अनुसार यहां एक करीब 1500 किलोमीटर लंबा भूखंड अज्ञात था। इसे हाल ही में हावर्ड व एमआईटी विश्वविद्यालय के विश्व प्रसिद्ध तुर्की निवासी प्रोफेसर प्रो. सलाल सेंगोर के द्वारा क्षीरसागर के नाम से ‘क्षिरोधा’ नाम दिया गया था।

(Research) अब उस अज्ञात भूखंड को साक्ष्यों के साथ खोज लिया गया है। इसके बाद भविष्य में भारतीय प्लेट के एशियाई प्लेट से टकराने की और उस क्षेत्र के उद्भव व विकास की भूवैज्ञानिक अवधारणा में नया आयाम जुड गया है और यह अवधारणा काफी हद तक बदलने वाली है।

(Research) नए खोजे गए इस भूखंड का प्रमाण यह है कि इसके उत्तरी गोलार्ध में होने के बावजूद इसमें 30 करोड़ वर्ष पुराने गोंडवाना काल यानी पुरावनस्पतिक काल के स्टोर व पोलनग्रेन्स यानी तत्कालीन पेड़ों के बीजों के जीवाश्म तथा कोयले के टुकड़े मिले हैं। जबकि वहां 10 करोड़ वर्ष पुराने या उससे नई चट्टानें ही मिलनी चाहिए थी।

(Research) यही गौंडवाना काल का कोयला देश के बिहार क्षेत्र में रानीगंज व झरिया के क्षेत्रों में भूगर्भ से प्राप्त होता है। इस शोध अध्ययन में पुरावनस्पति बीरबल साहनी संस्थान लखनऊ के सेवानिवृत्त डॉ. राम अवतार और उनके पुत्र शोधार्थी सौरभ गौतम का भी सहयोग रहा है।

(Research) क्षीरसागर तथा समुद्र मंथन में विष व रत्न निकलने की कहानी भूवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण से काफी सही
नैनीताल (Research) । प्रो. राजीव उपाध्यक्ष क्षीरसागर तथा समुद्र मंथन में विष व रत्न निकलने की भारतीय धर्मग्रंथों के उल्लेख को भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से काफी सही मानते हैं। उनका कहना है कि भूविज्ञान तो आज के दौर का विज्ञान है, और भले भारतीय धर्मग्रंथों में यह बात दूसरी तरह से कही गई हो, लेकिन तब भी उसी तरह की बातें कही गई हैं, जैसी अब भूविज्ञान की अवधारणाएं कहती हैं।

(Research) उस दौर में धरती में बड़ी वैश्विक स्तर के ज्वालामुखी फटने जैसी भूगर्भीय घटनाएं हुईं, जिनसे बड़ी मात्रा में जहरीली गैसें व तत्व निकले, और बाद में सोना, चांदी व हीरे, मोती आदि भी निकले। ज्वालामुखी के बाद ऐसा होना सामान्य बात है। उल्लेखनीय है कि प्रो. उपाध्याय पूर्व में लद्दाख क्षेत्र में सोना, चांदी, तांबा व लोहा आदि तत्वों को भी खोज कर चुके हैं। इससे पता चलता है कि उस दौर में भी प्रकृति के बारे में भारतीय ज्ञान अत्यधिक उन्नत था। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : महिलाओं के मुद्दों को समाचार पत्रों में मिलने वाले स्थान पर किया शोध

-जशोदा की पीएचडी मौखिक परीक्षा संपन्न
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जनवरी 2022 (Research)। कुमाऊं विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की शोध छात्रा जशोदा बिष्ट कार्की की पीएचडी मौखिक परीक्षा मंगलवार को सफलतापूर्वक आयोजित हुई। शोध के आधार पर जशोदा ने बताया कि समाचार पत्रों में महिलाओं से संबंधित समाचारों में करीब 50 फीसदी समाचार अपराधों से संबंधित तथा करीब 15 फीसद ही महिलाओं की उपलब्धियों से संबंधित होते हैं।

(Research) इन समाचारों में भी महिलाओं को ग्लैमर की वस्तु की तरह अधिक पेश किया जाता है, और महिलाओं के दृष्टिकोण से अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है। जशोदा ने समाचार पत्रों में महिलाओं सम्बन्धी समाचारों का विश्लेषण कर ‘न्यूज पेपर कवरेज ऑफ वीमेन रिलेटेड इश्यूज एंड देयर इम्पैक्ट ऑन कुमाऊं मंडल’ विषय पर विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश रंजन तिवारी के निर्देशन में पीएचडी थीसिस तैयार की है।

(Research) उनकी पीएचडी मौखिक परीक्षा आइआइएमसी के वरिष्ठ प्रोफेसर गोविंद सिंह ने ली। इस दौरान सहायक प्रोफेसर पूनम बिष्ट, वरिष्ठ पत्रकार डा. नवीन जोशी, सुनील भारती, अधिवक्ता नितिन कार्की, मोअज्जम खान, किशन व चंदन आदि मौजूद रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : राशि ने पूरा किया शोध कार्य

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जुलाई 2021 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर के जंतु विज्ञान विज्ञान विभाग की शोधार्थी राशि मिगलानी ने प्रो. सतपाल सिंह बिष्ट ने निर्देशन में अपना शोध कार्य पूरा कर लिया है। उनके शोध का विषय राज्य के तराई क्षेत्र में ‘इफेक्ट ऑफ कॉमनली यूज्ड इनसैक्टीसाइड ऑन अर्थवॉर्म्स इन एग्रीकल्चर फील्ड एंड लैबोरेटरी कंडीशन्स’ यानी सामान्य रूप से प्रयुक्त कीटनाशकों का कृषि पर खेतों एवं प्रयोगशाला की स्थितियों में कैंचुओं पर पड़ने वाले प्रभावों पर है।

उल्लेखनीय है कि उन्हें वर्ष 2020 में अंतर्राष्ट्रीय युवा वैज्ञानिक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

दावा (Research)  (Research) : कोविड-19 के मामूली संक्रमण के बाद लंबे समय तक बनी रहती है इम्युनिटी, कम हो जाती है बार-बार बीमार होने की संभावना

नवीन समाचार, नई दिल्ली, 26 मई 2021 (Research) । कोविड-१९ के मामूली संक्रमण से निपटने के कुछ महीने बाद भी लोगों में प्रतिरक्षी कोशिकाएं होती हैं जो कोरोना वायरस के खिलाफ रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करती हैं। इससे बार-बार बीमार होने की संभावना कम हो जाती है। यह जानकारी एक अध्ययन में दी गई है।

(Research) अमेरिका के सेंट लुइस में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने कहा कि इस तरह की कोशिकाएं जीवन भर रह सकती हैं जिससे हर समय रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रह सकती है। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-१९ के मामूली संक्रमण से लंबे समय तक रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है और इसमें बार-बार बीमार होने की संभावना कम हो जाती है।

(Research) वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर और शोध के वरिष्ठ लेखक अली एल्लेबेडी ने कहा, ‘पिछली गर्मियों में इस तरह की खबरें आईं कि संक्रमण के बाद रोग प्रतिरोधी क्षमता तेजी से कम होती है जिससे कोविड-१९ हो जाता है और मुख्य धारा के मीडिया ने कहा कि इस कारण शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता लंबे समय तक नहीं टिक पाती है।‘

(Research) एल्लेबेडी ने कहा, ‘लेकिन यह आंकड़ों को गलत तरीके से पेश करना है। संक्रमण के बाद रोग प्रतिरोधक स्तर का नीचे आना सामान्य बात है, लेकिन वह बिल्कुल ही खत्म नहीं हो जाता है।’ शोधकर्ताओं ने पाया कि पहले लक्षण के ११ महीने बाद लोगों में फिर से रोग प्रतिरोधी कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं। उन्होंने बताया कि ये कोशिकाएं लोगों के शेष जीवन तक जीवित रहेंगी और रोग प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न करेंगी जो कि यह लंबे समय तक प्रतिरक्षण क्षमता का दमदार सबूत है।

(Research) शोधकर्ताओं के अनुसार, संक्रमण के दौरान एंटीबॉडी उत्पन्न करने वाली प्रतिरोधी कोशिकाएं तेजी से विभाजित होती हैं और रक्त में आ जाती हैं जिससे एंटीबॉडी का स्तर तेजी से बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि संक्रमण दूर होने पर ऐसी ज्यादातर कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं और रक्त में एंटीबॉडी का स्तर कम हो जाता है।

(Research) शोधकर्ताओं ने बताया कि एंटीबॉडी उत्पन्न करने वाली कुछ कोशिकाएं लंबे समय तक रहने वाली प्लाज्मा कोशिकाएं कहलाती है। ये कोशिकाएं अस्थि मज्जा यानी बोन मैरो में पहुंच कर वहां रहने लगती हैं और कम संख्या में ही सही, एंटीबॉडी उत्पन्न कर रक्त प्रवाह में पहुंचाती हैं। ये एंटीबॉडी वायरस के संक्रमण से बचाव करती हैं।

दावा (Research) : मौत के १२ से २४ घंटे बाद नाक, मुंह की गुहाओं में नहीं रहता कोरोना
नई दिल्ली (Research) । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फोरेंसिक प्रमुख डा. सुधीर गुप्ता
ने कहा है कि एक संक्रमित व्यक्ति की मौत के १२ से २४ घंटे बाद कोरोना वायरस नाक और मुंह की गुहाओं (नेजल एवं ओरल कैविटी) में सक्रिय नहीं रहता जिसके कारण मृतक से संक्रमण का खतरा अधिक नहीं होता है।

(Research) डा.गुप्ता ने कहा, मौत के बाद १२ से २४ घंटे के अंतराल में लगभग १०० शवों की कोरोना वायरस संक्रमण के लिए फिर से जांच की गई थी जिनकी रिपोर्ट नकारात्मक आई। मौत के २४ घंटे बाद वायरस नाक और मुंह की गुहाओं में सक्रिय नहीं रहता है। पिछले एक साल में एम्स में फोरेंसिक मेडिसिन विभाग में श्कोविड-१९ पॉजिटिव मेडिको-लीगलष् मामलों पर एक अध्ययन किया गया था।

(Research) इन मामलों में पोस्टमॉर्टम किया गया था। उन्होंने कहा कि सुरक्षा की दृष्टि से पार्थिव शरीर से तरल पदार्थ को बाहर आने से रोकने के लिए नाक और मुंह की गुहाओं को बंद किया जाना चाहिए। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें (Research) : कुमाऊं एवं एसएसजे विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों व शोधार्थियों ने खोजीं कोरोना से लड़ने में कारगर 41 पौधे

-च्यवनप्राश में प्रयोग होते हैं यह पौधे, यूके एवं फ्रांस की शोध पत्रिकाओं में शोध हुआ प्रकाशित

नवीन समाचार, नैनीताल, 09 दिसम्बर 2020 (Research)। कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के वनस्पति विज्ञान विभाग एवं सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के संयुक्त शोध में आंवला, तुलसी, दारू हल्दी, गिलोय, दालचीनी, तेजपत्ता, लांग, इलाइची, पीपली, पुर्ननवा एवं अष्टवर्ग के च्यवनप्राश में प्रयुक्त होने वाले 41 औषधीय पौधे कोरोना से लड़ने में कारगर पाए गए है।

(Research) यह शोध कार्य यूनाइटेड किंगडम से प्रकाशित शोध पत्रिका टेलर एवं फ्रांस के जनरल ऑफ बायो, मॉलीक्यूल एवं स्ट्रक्चरल डायनामिक्स में हाल में ही प्रकाशित किया गया है। वनस्पति विज्ञान विभाग, के सहायक प्राध्यापक डा.. सुभाष चंन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर डा.. सुषमा टम्टा तथा शोधार्थी प्रियंका शर्मा, तुषार जोशी, शालिनी मठपाल, तनूजा जोशी एवं हेमलता द्वारा किये गये एक शोध में च्यवनप्राश में प्रयुक्त 41 पौधों मंे पाये जाने वाले 686 यौगिको की मॉलीक्युलर डा.किंग एवं मॉलीक्युलर डायनामिक्स सिमुलेशन विधि द्वारा स्क्रीनिंग की गई।

(Research) इस स्क्रीनिंग में ऐसे 4 यौगिक पाये गये, जो कोरोना विषाणु में पाये जाने वाले मेन प्रोटेएज रिसेप्टर से आबद्व हो सकते हैं। लिहाजा इनसे कोरोना विषाणु की प्रजनन प्रक्रिया को रोका जा सकता है। इन योगिकों को लेकर क्लीनिकल ट्रायल भी किया जा सकता है।

(Research) प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों की इस उपलब्धि पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रो. एनके जोशी, विज्ञान संकायाध्यक्ष एवं वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. एससी सती, निदेशक एसआरआईसीसी प्रो. ललित तिवारी, प्रो. वाईएस रावत, प्रो. एसएस बर्गली, डा. किरन बर्गली, डा. नीलू नोधियाल, डा. एके बिष्ट, डा. कपिल खुल्बे, प्रो. नीतू बोरा शर्मा, प्रो. पीएस बिष्ट आदि ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह कोरोना काल में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

(Research) च्यवनप्राश के बहुत से पौधे उत्तराखण्ड में पाये जाते है जिनसे प्राप्त होने वाले तत्व कोरोना से लड़ने में सक्षम है। कुमाऊं विश्वविद्यालय में हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले इस शोध से कोरोेना से लड़ने में मदद मिलने की आशा है।

यह भी पढ़ें : कुमाऊं विश्वविद्यालय ने कोरोना पर प्रारंभ किया शोध, शरीर में विषाणु को प्रवेश ही न करने देंगे..

-उत्तराखंड के पौधों में पाये जाने वाले ‘फाइटो कैमिकल्स’ से कोरोना विषाणु के मानव शरीर में प्रवेश को रोकने पर शुरू हुआ शोध

डॉ.नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 मई 2020। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने कोरोना की वैश्विक महामारी के बचाव हेतु शोध कार्य प्रारम्भ हो गया है। विश्वविद्यालय के के भीमताल परिसर स्थित जैव प्रौद्योगिकी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने बताया कि विश्व के सभी देश कोरोना के खिलाफ वैक्सीन-औषधि प्राप्त करने की दिशा में प्रयासरत हैं,

परन्तु वैक्सीन जनमानस तक पहुंचाना अभी एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें अभी भी काफी समय लगने की सम्भावना है। ऐसे में जैव प्रौद्योगिकी विभाग कुमाऊं विश्वविद्यालय के नवागत कुलपति प्रो. एनके जोशी की प्रेरणा से इस महामारी के बचाव की दूसरी सम्भावनाओं पर कार्य कर रहा है।

उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड महत्वपूर्ण औषधीय पादपों की सम्पदा का धनी है। राज्य में इन औषधीय पौधों में पाये जाने वाले महत्वपूर्ण ‘फाइटोकैमिकल्स’ की एक लम्बी सूची है जो पहले से ही मिलती-जुलती बीमारियों से विरूद्ध काफी कारगर सिद्ध हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पौधे भी जीवित प्राणी ही होते हैं, और उनमें विभिन्न बीमारियों-बाहरी खतरों से लड़ने के फाइटो कैमिकल्स कहे जाने वाले तत्व होते हैं।

उत्तराखंड में ऐसे सैकड़ों फाइटो कैमिकल्स की पहचान हो चुकी है। इसलिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने इन्ही फाइटोकैमिकल्स के उपयोग से कोरोना के बचाव तलाशने पर कार्य कर रहा है। प्रो. पांडे ने बताया कि कोरोना के संक्रमण के लिए ‘सार्क-कोव-2’ नाम का एक ‘आरएनए’ विषाणु जिम्मेदार है। मानव शरीर में गुर्दे व फेफड़े आदि विभिन्न अंग इसके लक्ष्य होते हैं। इन अंगों में यह विषाणु हमला न कर पाएं, इस हेतु कुछ एन्जाइम-प्रोटीन का होना अत्यंत आवश्यक होता है।

इसलिए शोध में इन अंगों में विषाणु का प्रवेश निरुद्ध कर सकने योग्य राज्य में पाये जाने वाले फाइटोकैमिकल्स की कम्प्यूटर पर ‘इन सिलिको स्क्रीनिंग’ प्रारम्भ की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जाये कि कौन से फाइटोकैमिकल इन अंगों में कोरोना को प्रवेश करने व स्थापित होने से रोक सकते हैं। ताकि उसको प्रवेश करने पर ही रोका जा सके, ताकि वह मानव शरीर में अन्य समस्याएं न पैदा कर सके।

एक खास बात यह भी कि कोरोना के विषाणु पर कोई प्रयोग करने की जगह ‘होस्ट सेल टार्गेट’ यानी मानव के फेफड़े, गुर्दे आदि लक्षित अंगों पर ही प्रयोग किये जा रहे हैं, क्योंकि उसमें ‘म्यूटेशन’ यानी बदलाव की सम्भावना बहुत कम होती है जबकि विषाणु में म्यूटेशन की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है, वह बार-बार अपनी संरचना बदलने में सक्षम होता है।

ऐसे में हो सकता है जब तक वैज्ञानिक विषाणु पर शोध कर किसी निष्कर्ष पर पहुचें, वह अपनी संरचना परिवर्तित कर वैज्ञानिकों के सारे प्रयासों को निष्फल कर दे। प्रो. पांडे ने बताया कि मानव शरीर में कुछ महत्वपूर्ण प्रोटीन व एन्जाइम पाये जाते हैं जो कि फेफड़ों व गुर्दों में इस विषाणु के प्रवेश करने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं एवं उसे वहां चिपकने के लिए आधार प्रदान करते हैं।

इसलिए शोध में मुख्य रूप से इन्हीं प्रोटीनों व एन्जाइमों को अपना लक्ष्य माना है एवं उन्हीं पर ध्यान केन्द्रित किया है कि कैसे इस प्राकृतिक फाइटो कैमिकल्स की मदद से या तो इन प्रोटीनों-एन्जाइमों के उत्पादन को रोका या कम किया जाये या उन बिन्दुओं को अवरुद्ध किया जाये, जहां पर विषाणु अपने विशिष्ट संरचनाओं के साथ संलग्न होता है। इसके लिए सर्वप्रथम ‘इन सिलिको स्क्रीनिंग’ के माध्यम से एक सूची तैयार की जा रही है, जिसमें इस विषाणु के विरूद्ध मनुष्य के लिए उपयोगी फाइटोकैमिकल्स को रखा जाएगा।

उसके पश्चात ‘बायोइन्फोर्मेटिक्स’ साधनों एवं ‘कम्पूटेशनल डोकिंग’ के माध्यम से सभी सम्भावित विकल्पों एवं सम्भावनाओं पर कार्य कर सबसे कारगर पाये गये कम्पाउंडों के एक संग्रह का निर्माण किया जायेगा जो कि दवा निर्माण में लगे वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होगा। इससे न सिर्फ समय अपितु ऊर्जा व संसाधनों की भी बचत होगी तथा कम समय में बेहतर नतीजे प्राप्त होंगे।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड की इस बूटी पर मिला अमेरिकी पेटेंट, बनेगी इस महाबीमारी की दवाई

कुमाऊं विवि के लिए’पहला पेटेंट’ हासिल कर प्रो. वीना ने रचा इतिहास, महाबीमारी के लिए खोजी पहाड़ी प्राकृतिक औषधि

-जैव प्रौद्योगिकी विभाग की अध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक प्रो. लालजी सिंह व प्रो. दुबे के साथ हासिल किया पेटेंट
डॉ.नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने विवि के लिए पहला पेटेंट हासिल कर इतिहास रच दिया है। विभाग की अध्यक्ष प्रो. वीना पांडे ने भारत में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक कहे जाने वाले प्रो. लालजी सिंह व बनारस हिंदू विवि के प्रोफेसर जीपी दुबे के साथ वर्ष 2011-12 से नैनीताल के अयारपाटा क्षेत्र में पहाड़ के फल किलमोड़ा (दारुहरिद्रा) पर किए गए शोध से

मधुमेह के लिए प्राकृतिक, रसायन रहित आर्युर्वेदिक औषधि बनाने का रामबाण फार्मूला खोज निकाला है, जिसे अमेरिकी संस्था ‘इंटरनेशनल पेटेंट सेण्टर’ से पेटेंट प्रमाण पत्र प्राप्त हो गया है। आगे इस औषधि को व्यवसायिक तरीके से इस्तेमाल के लिए रोगियों तक पहुंचाने के लिए कंपनियों के साथ बात चल रही है।

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Uplabdhi-उपलब्धियां : शादात, लोकेश, शिखर, मेघा, श्रृद्धि, धीरज व प्रवर को दें बधाई….

Uplabdhi

Uplabdhi : An alumnus of Kumaun University’s DSB Campus, Dr. Shikhar Pant, has been honored with the prestigious Fellow of Royal Society of Biology (FRCB) award, considered the highest recognition in the field of biology. Dr. Pant, currently serving as the coordinator of the Center for Biodiversity Studies at Ghulam Badshah University in Rajouri, Jammu and Kashmir, completed his PhD under the guidance of YPS Pangati and Dr. SS Samant. He has also been recognized as a Fellow of the National Academy of Environmental Science and the Linnean Society.

सुबह का सुखद समाचार: सरकारी विद्यालय के छात्र ने बनाया ऐसा कमाल का ड्रोन, जो दुश्मनों के दांत खट्टे कर देगा, इसमें लगे हैं गन प्वाइंट के साथ ही बम ड्रॉपर व पैराशूट भी…

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 मार्च 2023। उत्तराखंड के एक सरकारी विद्यालय के छात्र ने एक ऐसे ड्रोन का प्रोजेक्ट तैयार किया है, जो दुश्मन देशों के दांत खट्टे कर देगा। इसमें गन प्वाइंट के साथ ही बम ड्रॉपर भी लगे होंगे। यह उड़ते हुए ही हमला कर सकेगा। इसकी गति 180 किमी प्रति घंटा तक … Read more

Aastha-Vigyan : आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था प्राचीन भारतीय ज्ञान

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल (Aastha-Vigyan)। विज्ञान के वर्तमान दौर में आस्था व विश्वास को अंधविश्वास कहे जाने का चलन चल पड़ा है। आस्था और विज्ञान को एक दूसरे का बिल्कुल उलट-विरोधाभाषी कहा जा रहा है। यानी जो विज्ञान नहीं है, वैज्ञानिक नियमों और आज के वैज्ञानिक दौर के उपकरणों से संचालित नहीं … Read more

Breaking : ABVP की नगर व कॉलेज कार्यकारिणी की हुई घोषणा..

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2021। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की नैनीताल इकाई की रविवार को नैनीताल क्लब में हुई बैठक में नगर एवं डीएसबी परिसर इकाई के दायित्वों की घोषणा की गई। डॉ. दीपक कुमार को नगर अध्यक्ष, करन बिष्ट को नगर मंत्री, प्रदीप कुमार व शिवेंद्र कांडपाल को नगर उपाध्यक्ष, रंजना अधिकारी धीरज … Read more

नैनीताल : भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीतने वाली प्रो. एंड्रिया का नैनीताल से है खास संबंध

-‘टीएमटी’ परियोजना के लिए भौतिकी का नोबल पुरस्कार जीतने वाली एंड्रिया के सहयोगी रहे हैं एरीज नैनीताल के डा. पांडे नवीन समाचार, नैनीताल, 9 नवम्बर 2020। वर्ष 2020 का भौतिकी के लिए नोबल पुरस्कार ‘टीएमटी’ यानी ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप’ यानी दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास यानी फुटबॉल के मैदान जितनी बड़ी दूरबीन की … Read more

मौसम के बदले मिजाज के पीछे कोरोना के साथ सूर्य की ‘खराब सेहत’, आगे 10 दिन में 10 डिग्री बढ़ सकता है पारा !

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-इस वर्ष पर्यावरण साफ होने के साथ सौर सक्रियता ‘सोलर मिनिमम’ में अपने सबसे निचले स्तर पर
नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 17 मई 2020। इस वर्ष गर्मियों के मई माह तक शीतकाल से चला आ रहा बारिश व ओलावृष्टि का क्रम जारी है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तो अब भी बर्फबारी हो रही है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में अपेक्षित गर्मी नहीं है। मौसम का यह बदला मिजाज चर्चा में है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला कोरोना विषाणु की महामारी के कारण दुनिया भर में लागू लॉक डाउन की वजह से फैक्टरियों एवं वाहनों के काफी कम चलने से ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सर्जन से पर्यावरण में प्रदूषण का घटना एवं धरती के ऊपर ओजोन परत में सुधार आना, और दूसरे धरती पर ऊष्मा व ऊर्जा देने वाले सूर्य पर उसके 11 वर्षीय सोलर साइकिल यानी सौर चक्र के ‘सोलर मिनिमम’ यानी अपने निचले स्तर पर होना। उल्लेखनीय है कि सोलर मिनिमम को सूर्य की सेहत खराब होने के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि इससे सूर्य पर सौर भभूकाएं उठने की तीव्रता कम हो जाती है।
स्थानीय एरीज यानी आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन के अनुसार मौसम को अनेक घटक प्रभावित करते हैं। इनमें प्राकृतिक कारणों के साथ ही मानवजनित कारण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस वर्ष लॉक डाउन की वजह से मानव जनित कारणों में काफी कमी आई है। इस कारण क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोना ऑक्साइड व ओजोन आदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन काफी कम होने से धरतीवासियों की सबसे बड़ी चिता का कारण बनी ओजोन परत में सुधार आया है। वहीं दूसरी ओर सूर्य 2007 के आसपास अपनी सक्रियता के 11 वर्षीय सौर चक्र में शीर्ष पर रहने के बाद इधर अपने सबसे कम सक्रियता की स्थिति में है। मौसम में दिख रहे बदलाव का यह भी बड़ा कारण हो सकता है।

अगले 10 दिनों में 10 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान झेलेंगे मैदानी क्षेत्र

Pr.BS Kotliya
प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया

नैनीताल। बदले मौसम पर दीर्घकालीन मौसम पर शोधरत कुमाऊं विश्वविद्यालय में यूजीसी के प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया का भी मानना है कि मानव जनित कारण मौसम का काफी प्रभावित करते हैं। बावजूद उनका मानना है कि वर्तमान मौसमी बदलाव के पीछे मानवजनित कारणों से अधिक प्राकृतिक कारण हैं। उन्होंने कहा कि मई के पहले पखवाड़े तक सक्रिय रहा पश्चिमी विक्षोभ अब समाप्त हो गया है। इसके बाद अगले दो-तीन दिनों में ही गर्मी बढ़ने वाली है और मैदानी क्षेत्रों में अगले 10 दिनों में तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि यह बढ़ा हुआ तापतान दक्षिण पश्चिमी मानसून के आने तक बना रह सकता है। अलबत्ता, पर्वतीय क्षेत्रों में हाल में हुई बारिश की वजह से मौजूद नमी तापमान को अधिक बढ़ने नहीं देगी। लिहाजा पहाड़ों पर मौसम खुशगवार रह सकता है।

यह भी पढ़ें : ‘आर्द्रा नक्षत्र’ में हो सकता है महाविस्फोट ! क्या 26 ही रह जायेंगे नक्षत्र ?

-पिछले पांच वर्ष से तारे की चमक में कमी आने से वैज्ञानिक जता रहे सुपरनोवा विस्फोट की आशंका, जिसके बाद कुछ समय के लिए खत्म होने से पहले सूर्य व चंद्रमा जैसा तीसरा सबसे चमकदार तारा जैसा नजर जाएगा आर्द्रा नक्षत्र
Ardra nakshtraनवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। पृथ्वी से 700 प्रकाश वर्ष दूर एक आकाशगंगा में स्थित सूर्य से करीब 19 गुना भारी व नौ सौ गुना बड़े विशाल आकार वाले लाल रंग के तारे ‘बेटेल्गयूज’ (भारतीय नाम आर्द्रा नक्षत्र) पर दुनिया भर के खगोल वैज्ञानिकों की नजरें लगी हुई हैं। अभी यह सबसे अधिक चमक के मामले में आकाश गंगा का 11वां तारा है। लेकिन इधर पिछले पांच माह में इसकी चमक में 25 फीसद कमी आ गई है। वैज्ञानिकों का इस आधार पर ही मानना है कि जल्द ही सूपरनोवा विस्फोट के जरिये इसका अंत हो जाएगा। वहीं धार्मिक आधार पर देखें तो माता नंदा देवी के मेले का धार्मिक पक्ष निभाने वाले पंडित एवं शिक्षक भगवती प्रसाद जोशी कहते हैं कि धार्मिक तौर पर किसी नक्षत्र के समाप्त होने की परिकल्पना नहीं की गई है।

जानिये आर्द्रा नक्षत्र के बारे में:

आर्द्रा का अर्थ होता है नमी। आकाश मंडल में आर्द्रा छठवां नक्षत्र है। यह राहु का नक्षत्र है व मिथुन राशि में आता है। आर्द्रा नक्षत्र कई तारों का समूह न होकर केवल एक तारा है। यह आकाश में मणि के समान दिखता है। इसका आकार हीरे अथवा वज्र के रूप में भी समझा जा सकता है। कई विद्वान इसे चमकता हीरा तो कई इसे आंसू या पसीने की बूंद समझते हैं। आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में 6 अंश 40 कला से 20 अंश तक रहता है। जून माह के तीसरे सप्ताह में प्रातः काल में आर्द्रा नक्षत्र का उदय होता है। फरवरी माह में रात्रि 9 बजे से 11 बजे के बीच यह नक्षत्र शिरोबिंदु पर होता है। निरायन सूर्य 21 जून को आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है। इसे पृथ्वी पर नमी की मात्रा बढ़ने के रूप में भी देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में 0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है-अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती। 28वां नक्षत्र अभिजीत है। राहु को आर्द्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है। आर्द्रा नक्षत्र के चारों चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है।

इधर, स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमार के अनुसार सुपरनोवा विस्फोट के दौरान विशाल ऊर्जा के विकिरण से इसकी चमक कुछ समय के लिए काफी अधिक बढ़ जाएगी। इसके बाद यह यात्रि में कुछ समय के लिए आसमान में सूर्य व चंद्रमा के बाद तीसरे सबसे अधिक चमकते हुए तारे के रूप में नजर आयेगा। यह अवधि एक-दो माह से चार माह तक की हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बेटेल्गयूज मृग तारा समूह का 10 मिलियन वर्ष से कम पुराना तारा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके आकार के फैलने का सिलसिला लगभग 40 हजार साल पहले शुरू हो चुका था, जो अब विशाल आकार ले चुका है। इस तारे के बारे में वैज्ञानिकों को 1836 में पता चला था। तभी से इस तारे में वैज्ञानिक नजर रखे हुए हैं। यूरोपियन सदर्न आब्जर्वेटरी की वेरी लार्ज टेलीस्कोप इस पर नजर रखी जा रही है। इसके विस्फोट को लेकर निश्चित समय का आंकलन अभी नहीं किया जा सकता है।
बताया गया है कि किसी विशाल तारे में इस तरह का महाविस्फोट इससे पूर्व वर्ष 1006, 1054 व 1572 ईसवी सन मंे एवं आखिरी विस्फोट 1604 ईसवी सन में हुआ था। इसलिए सैकड़ों वर्षों में होने वाली इस दुर्लभ खगोलीय घटना को लेकर वैज्ञानिक काफी रोमांचित हैं। बेटेल्गयूज के विस्फोट से वैज्ञानिकों को पता चल सकेगा कि विस्फोट से पूर्व तारे की स्थिति क्या होती है। जिससे इस तरह के तारों के अंत समय की स्थिति के साथ आगे के अध्ययन में आसानी हो जाएगी।

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-14 जनवरी 2019 को हुए विशाल गामा किरणों के विष्फोट का देश के 20 देशों के वैज्ञानिकों के साथ किया स्पेन और पुणे की दूरबीनों से सफल प्रेक्षण
नवीन समाचार, नैनीताल, 20 नवंबर 2019। एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के दो वैज्ञानिकों डा. शशिभूषण पांडे एवं डा. कुंतल मिश्रा का शोध पत्र एक बार पुनः दुनिया की शीर्ष विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ पत्रिका के नवंबर माह के अंक में प्रकाशित हुआ है। दोनों वैज्ञानिकों का यह शोध पत्र ब्रह्मांड के सबसे बड़े-गामा किरणों के विष्फोट से संबंधित है, जिसका उन्होंने भारत के आईआईएसटी त्रिवेंद्रम की डा. एल रेसमी व उनके साथियों के साथ स्पेन और पुणे की दूरबीनों से गत 14 जनवरी 2019 को सफल प्रेक्षण किया।
बुधवार अपराह्न स्थानीय एरीज में आयोजित पत्रकार वार्ता में निदेशक डा. वहाब उद्दीन एवं डा. शशि भूषण पांडे व डा. कुंतल मिश्रा ने पत्रकार वार्ता में यह जानकारी दी। बताया कि 14 जनवरी को 22 सेकेंड के लिए गामा किरणों का विस्फोट जीआरबी 190114सी हुआ था। दुनिया के 20 देशों के वैज्ञानिक भी इसका प्रेक्षण कर रहे थे। बताया कि जीआरबी विस्फोट ब्रह्मांड के सर्वाधिक बड़े व भयावह विस्फोट होते हैं। गामा किरणों सबसे शक्तिशाली तरंगे होती हैं जो कि किसी लोहे के 26 इंच मोटे से मोटे कोलम से भी पार हो जाती हैं। इनकी तरंगदैर्ध्य परमाधु के आकार से भी छोटी होती है। लिहाजा ये इतनी घातक होती हैं कि परमाणु को भी अपनी ताकत से खत्म कर सकती हैं। यदि इनका रुख कभी किसी कारण पृथ्वी की ओर हो जाए तो इससे होने वाले नुकसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए वैज्ञानिक इनके अध्ययन में जुटे हुए हैं। हालांकि 14 जनवरी को रिकार्ड हुआ गामा किरणों का विस्फोट ब्रह्मांड में पृथ्वी से 4.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हुआ था। इससे पूर्व भी डा. पांडे व डा. मिश्रा का इससे अपेक्षाकृत छोटा जीआरबी 160625बी के विस्फोट का शोध भी नेचर पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि ऐसे विस्फोट ब्रह्मांड में हर रोज करीब एक होते रहते हैं।

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-धनतेरस की पिछली शाम वाशिंगटन से हुई है न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पहली बार घोषणा, एरीज के वैज्ञानिकों की भूमिका भी रही है इस खोज में
-इस खोज में एरीज के वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी रहे हैं शामिल
-इसी माह ब्लेक होल्स के आपस में टकराने से संबंधित एक अन्य खोज पर मिला है इस वर्ष का नोबल पुरस्कार
नैनीताल। महान वैज्ञानिक आंइस्टीन ने अपने जीवन काल में पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर अंतरिक्ष में होने वाली एक ‘बड़ी दीपावली’ की ओर सैद्धांतिक तौर पर इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि दो ‘न्यूट्रॉन स्टार्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलती हैं, जोकि ‘स्पेस टाइम’ यानी अंतरिक्ष के समय की गणना को प्रभावित करती हैं। पहली बार वैज्ञानिकों ने आइंस्टीन की इस मान्यता की उपकरणों की मदद से पुष्टि कर दी है। बीती 16 अक्टूबर यानी धनतेरस की पिछली शाम अमेरिका के वाशिंगटन डीसी से इसकी घोषणा की गयी। गर्व करने वाली बात है कि इस सफलता में भारत और नैनीताल के एरीज के वैज्ञानिकों की भी भूमिका रही है। एरीज के दो वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी इस परियोजना के अंतर्गत एक खास तरह की गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज में शामिल रहे हैं। खास बात यह भी है कि ऐसी ही एक अन्य खोज, जिसमें इसी तरह दो ‘ब्लेक होल्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पुष्टि हुई है, पर इसी माह इस वर्ष यानी 2017 का विज्ञान का दुनिया का सबसे बड़ा नोबल पुरस्कार दिया गया है। आगे एरीज में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ‘देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ यानी ‘डॉट’ में भी इस सफलता की मुख्य सूत्रधार उपकरण ‘लाइगो’ के लगने की संभावना है, जिसके बाद एरीज इस दिशा में और अधिक बेहतर परिणाम दे सकता है।
इस संबंध में मंगलवार को एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडेय ने पत्रकार वार्ता कर इस उपलब्धि की जानकारी दी। बताया कि न्यूट्रॉन स्टार्स तारों के जीवन पूरा होने के बाद शेष बचे अत्यधिक घनत्व वाले करीब 20 किमी व्यास के पिंड होते हैं। ये इतने भारी होते हैं कि इनकी एक चम्मच भर सामग्री माउंट एवरेस्ट से अधिक भारी होती है। इनके टकराने के बारे में अध्ययन लेजर तकनीक आधारित ‘अमेरिकी लेजर इंटरफेरमीटर गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला’ यानी लाइगो डिटेक्टर कहे जाने वाले उपकरणों से ही संभव होता है। यह लाइगो डिटेक्टर भारत में पुणे स्थित जॉइंट मीटर वेभ रेडियो टेलीस्कोप और लद्दाख स्थित हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप में लगे हैं। इनकी मदद से ही एरीज के दोनों वैज्ञानिकों ने इस खोज को करने में अपना योगदान दिया है। इनके अवलोकन में वैज्ञानिक सूर्य के द्रव्यमान के 1.1 से 1.6 गुना तक भारी इन खगोलीय पिंडों को 100 सेकेंड तक न्यूट्रॉन स्टार्स के रूप में चिन्हित कर सके। इनके टकराने से गामा किरणों का फ्लैश यानी एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी की कक्षाओं के उपग्रहों के द्वारा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के आगमन के सापेक्ष दो सेकेंड तक देखा गया। यह इस बात का पहला निर्णायक प्रमाण है कि अक्सर उपग्रहों से नजर आने वाला अल्प अवधि का गामा विकीरण विस्फोट वास्तव में न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से उत्पन्न होता है। इसका अनुमान एक शताब्दी पूर्व आइंस्टीन से लगाया था। इससे इस बात के संकेत भी मिले हैं कि गामा विकीरण के शक्तिशाली विस्फोटों से प्राप्त विलयनों में लोहे से ज्यादा घनत्व वाले सोना और सीसा जैसे तत्वों की 50 फीसद से अधिक मात्रा होती है। लिहाजा इस खोज से एरीज के वैज्ञानिकों में हर्ष की लहर है, और इसे मील का पत्थर और बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

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जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंग
जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंग

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2019। मंगलवार 19 फरवरी को भारतीय परंपरा के अनुसार माघ पूर्णिमा की रात आसमान में चांद कुछ खास स्वरूप में नजर आया। स्थानीय एरीज के खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार आज का चांद आम दिनों के मुकाबले 14 फीसद बड़ा और 30 फीसद अधिक चमकीला नजर आया। वैज्ञानिकों के मुताबिक पूर्णिमा के दिन चांद के के अपनी कक्षा में पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए पृथ्वी के अपेक्षाकृत सबसे करीब आ जाने के कारण इसका आकार और रोशनी आम पूर्णिमा के चांद के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है और इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘सुपर स्नो मून’ कहा जा रहा है। सरोवरनगरी में बादलों की लुका-छिपी के बीच इसे खुली आंखों से देखा गया। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह खास मौका रहा। बताया गया कि आगे ऐसा नजारा 2555 दिनों यानी करीब सात साल बाद 2026 में दिखाई देगा।
वैज्ञानिकों ने नासा के हवाले से बताया कि रात्रि 9 बजकर 23 मिनट पर चांद अपने सबसे बड़े व चमकीले बिहंगम स्वरूप में नजर आया, जब सूर्य चांद के ठीक 180 डिग्री यानी उल्टी दिशा में रहा होगा। बताया गया है कि फरवरी के माह में ऐसे बड़े व चमकीले दिखने वाले चांद को कई संस्कृतियों में सुपरमून तो दुनिया के कुछ देशों में इस खगोलीय घटना को स्ट्रॉम मून, हंगर मून व बोन मून भी कहा जाता है। इस दौरान समुद्री क्षेत्रों में आने वाले कुछ दिनों में ज्वार की स्थिति आने और ज्यादा ऊंची लहरें उठने की भी आशंका जताई जा रही है।

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वाशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मार्स इनसाइट लैंडर यान सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतारा गया। भारतीय समयानुसार सोमवार-मंगलवार की रात करीब 1:24 बजे इसे मंगल पर लैंड कराया गया। इनसाइट लैंडर यान को मंगल की रहस्यमयी दुनिया के बारे में जानकारी के लिए बनाया गया।वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मंगल ग्रह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मददगार होगा। इससे पृथ्वी से जुड़े नए तथ्य पता लगने की उम्मीद भी जताई जा रही है।

inside lander

जानकारी के मुताबिक, इनसाइट के लिए मंगल पर लैंडिंग में लगने वाला छह से सात मिनट का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान इसका पीछा कर रहे दोनों सैटेलाइट्स के जरिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर इनसाइट लैंडर पर रहीं। इन दोनों सैटेलाइट्स का नाम डिज्नी के किरदानों पर रखा गया है- ‘वॉल ई’ और ‘ईव’। दोनों सैटेलाइट्स ने आठ मिनट में इनसाइट के मंगल पर उतरने की जानकारी धरती तक पहुंचा दी। नासा ने इस पूरे मिशन का लाइव कवरेज किया। इनसाइट से पहले 2012 में नासा के क्यूरियोसिटी यान ने मंगल पर लैंडिंग की थी।

मार्स इनसाइट लैंडर यान कैसे काम करेगा 
नासा का यह यान सिस्मोमीटर की मदद से मंगल की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन करेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मंगल ग्रह पृथ्वी से इतना अलग क्यों है।

इनसाइट लैंडर की खासियत

  • इनसाइट का पूरा नाम ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस’
  • मार्स इनसाइट लैंडर का वजन 358 किलो
  • सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाला यान
  • 26 महीने तक काम करने के लिए डिजाइन किया गया
  • कुल 7000 करोड़ का मिशन
  • इस मिशन में यूएस, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप समेत 10 से ज्यादा देशों के वैज्ञानिक शामिल
  • इसका मुख्य उपकरण सिस्मोमीटर (भूकंपमापी) है, जिसे फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने बनाया है। लैंडिंग के बाद ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सेस्मोमीटर लगाएगा।
  • दूसरा मुख्य टूल ‘सेल्फ हैमरिंग’ है, जो ग्रह की सतह में ऊष्मा के प्रवाह को दर्ज करेगा।
  • इनसाइट की मंगल के वातावरण में प्रवेश के दौरान अनुमानित गति 12 हजार 300 मील प्रति घंटा रही।
  • इनसाइट प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ब्रूस बैनर्ट का कहना है कि यह एक टाइम मशीन है, जो यह पता लगाएगी कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने।

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-सूर्य पर धरती की ओर उभरा 8 लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ से खतरे की आशंका
-एरीज के सौर वैज्ञानिक के अनुसार सूर्य पर फिलहाल कोई सौर ज्वालाएं नहीं हैं
नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सूर्य के धरती की ओर की सतह पर बुधवार को आठ लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ यानी एक तरह का गड्ढा उभरने का दावा किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इससे 2 विशाल जी-1 श्रेणी की सौर ज्वालाएं रिकॉर्ड की गयी हैं। नासा ने आशंका जताई है कि इन विशाल सौर ज्वालाओं की वजह से उठा ‘सौर तूफान’ धरती के चुंबकीय क्षेत्र से टकरा सकता है। इसके नतीजे काफी बुरे हो सकते हैं। इसके धरती के वायुमंडल से टकराने की वजह से उपग्रह अव्यवस्थित हो सकते हैं। इसकी वजह से व्यवसायिक उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं, और जीपीएस सिस्टम भी अव्यवस्थित हो सकता है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसकी वजह से दुनिया के अनेक हिस्सों में बिजली भी गुल हो सकती है।
अलबत्ता, एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाबउद्दीन का ‘कोरोनल होल’ के उभरने की बात को स्वीकार करते हुए इससे इतर कहना है कि इन दिनों सूर्य अपने 11 वर्ष के सौर सक्रियता चक्र में शांत स्थिति में है, और सौर सक्रियता अपने न्यूनतम स्तर पर है। उनका कहना है कि कोरोनल होल की वजह से काफी सौर हवाएं आ सकती हैं। हो सकता है कि इसकी तीव्रता अधिक हो, किंतु सूर्य पर काफी समय से कोई बड़ी सौर ज्वाला और कोई सौर धब्बा नजर नहीं दिखी है।

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कोरोना से थमे चीन को पाठ पढ़ा रहीं नैनीताल की गायत्री

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-चीन की शियान जाइटोंग यूनिवर्सिटी में पिछले 10 वर्षों से पढ़ाती हैं नैनीताल की डा. गायत्री कठायत, यहां से भी छात्र-छात्राओं को नैनीताल से ऑनलाइन पढ़ाते हुए 90 फीसद कार्य पूरे कर रही हैं

Gayatri Kathayat
अपने घर पर चीन के विद्यार्थियों को पढ़ातीं डा. गायत्री कठायत।

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 21 फरवरी 2020। भयानक जानलेवा कोरोना वायरस से सैकड़ों नागरिकों की मौत के बाद पड़ोसी देश चीन कमोबेश थम गया है, लेकिन चीन की शियान जाइटोंग यूनिवर्सिटी में पिछले करीब 10 वर्षों से प्रोफेसर के पद पर काम करने वाली डा. गायत्री कठायत थमी नहीं हैं। वे इन दिनों अपने घर नैनीताल में हैं। उन्होंने अपने घर पर बकायदा अपना विशेष कार्यालय स्थापित कर लिया है, जहां से वे शियान यूनिवर्सिटी के अपने छात्र-छात्राओं एवं शोधार्थियांे को ऑनलाइन पढ़ा रही हैं। उल्लेखनीय है कि डा. गायत्री के नाम एक भूविज्ञानी होने के तौर पर दिसंबर 2017 में दुनिया के 5700 वर्षों के मौसमी आंकड़े तैयार करने की उपलब्धि दर्ज है।
डा. गायत्री ने बताया, वे प्रतिदिन 12 से 14 घंटे घर से भी अपने कार्य पर रहती हैं। अपने विद्यार्थियों के लिए यहीं से कक्षाएं लेकर उनके लिए ऑनलाइन लेक्चर व प्रजेंटेशन तैयार करती व शोध कार्य करती हैं, उन्हें विद्यार्थियों को उपलब्ध कराती हैं और उनके सवालों के जवाब भी देती हैं। विद्यार्थियों की ऑनलाइन उपस्थिति भी दर्ज करती हैं। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थियों से सीधा संवाद भी करती थीं। वहीं आगे जरूरत पड़ने पर वह उनकी ‘ओएमआर’ शीट पर परीक्षा भी लेंगी। गायत्री की अपने कार्य के प्रति इतनी अधिक प्रतिबद्धता है कि वह यहां इंटरनेट की धीमी गति की समस्या के कारण पूरी रात्रि कार्य करती है। उन्होंने बताया कि जो वे शियान में करती थीं, उसका केवल प्रयोगात्मक कार्य छोड़कर 90 फीसद कार्य यहां से भी कर पा रही हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह ऑनलाइन पढ़ाना उनके लिए कुछ नयां नहीं है। अक्सर ही संगोष्ठियों में जाने पर वे विद्यार्थियों के ऑनलाइन पढ़ाती रही हैं। उन्होंने कहा, चीन में भले मोबेलिटी यानी कहीं आना-जाना थम गया है, किंतु यूनिवर्सिटी में पढ़ाई नहीं रुकी है। ड्रापबॉक्स के माध्यम से यूरोपीय व अमेरिकी देशों की तरह विद्यार्थियों को बरसों से ऑनलाइन पढ़ाया जाता है।
उन्होंने बताया कि वह 1 जनवरी को एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के लिए वियतनाम गई थीं। वहां चल रहे स्प्रिंग फेस्टिवल के वे घर आ गई थीं। पहले उन्हें उनका शहर शियान कोरोना प्रभावित हुबे राज्य के वुहान शहर से 1000 किमी दूर उत्तर में होने की वजह से उन्हें कोरोना से संक्रमित होने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वियतनाम में पता चलने पर वह भारत आ गईं। उन्हंे 1 फरवरी को लौटना था लेकिन उनकी यूनिवर्सिटी ने उन्हें सहित सभी प्रोफेसरों व छात्र-छात्राओं को बचाव व सुरक्षा उपायों के तहत घर पर ही रुकने की हिदायत दी है। उल्लेखनीय है कि डा. गायत्री नगर पालिका में कार्यरत रहे चंदन कठायत एवं भाजपा नेत्री तुलसी कठायत की पुत्री हैं एवं नगर के सात नंबर क्षेत्र में रहती हैं।

दो से नई दिल्ली में अंतराष्ट्रीय जियोलॉजिकल कांग्रेस में करेंगे प्रतिभाग
नैनीताल। डा. गायत्री आगे नई दिल्ली में दो से आठ मार्च तक आयोजित होने जा रही आईजीसी यानी अंतराष्ट्रीय जियोलॉजिकल कांग्रेस में प्रतिभाग करने जा रही हैं। उन्होंने बताया कि चार वर्ष में होने वाली अंतराष्ट्रीय जियो कांग्रेस में सामान्यता 45 से अधिक उम्र के वैज्ञानिक ही प्रतिभाग कर पाते हैं, किंत उनकी उपलब्धियों की वजह से कम उम्र के बावजूद उन्हें इसके एक हिस्से में की-नोट स्पीकर यानी बीज वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया है। इस हेतु उन्हें यहां आना ही था। भारत ने 2012 में पेरिस में हुई आईजीसी में 2020 में भारत में इसका आयोजन करने का वादा किया था। पिछली आईजीसी 2016 में केपटाउन में हुई थी।

चीन में युवा पीढ़ी नहीं खाती अभोज्य वस्तुएं
नैनीताल। यह पूछे जाने कि क्या चीन में वहां के अभोज्य पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों को खाने की जीवनशैली के कारण कोरोना वायरस फैला है, उन्होंने कहा कि वहां युवा व नई पीढ़ी कभी भी ऐसे अभोज्य वस्तुएं नहीं खाते हैं। अलबत्ता वहां की पुरानी पीढ़ी में व ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे भोज्यों की संस्कृति बताई जाती है। लेकिन उन्होंने अपने 10 वर्ष के कार्यकाल में कभी किसी को ऐसे खाते हुए नहीं देखा है।

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  • चीन व अमेरिका की प्रयोगशालाओं से यूरेनियम सिरीज की आधुनिकतम तकनीकों के जरिए देहरादून के निकट साहिया की गुफाओं के अध्ययन से तैयार किए गए हैं आंकड़े
  • नैनीताल निवासी शोध वैज्ञानिक गायत्री कठायत का ‘15 इंपैक्ट फैक्टर वाला’ शोध पत्र दुनिया की शीर्ष शोध पत्रिका ‘साइंस एडवांस’ में हुआ है प्रकाशित

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डा. गायत्री कठायत।

नवीन जोशी, नैनीताल। देश-दुनिया में मौसमी आंकड़ों की कमी के बावजूद चल रही मौसमी परिवर्तन व ग्लोबलवार्मिंग की चिंताओं के बीच विज्ञान की दुनिया से न केवल भारतीय उपमहाद्वीप वरन पूरी दुनिया के लिए मौसमी आंकड़ों के मोर्चे पर बड़ी खुशखबरी आई है। एक भारतीय युवा वैज्ञानिक डा. गायत्री कठायत की अगुवाई में चीन व अमेरिका के वैज्ञानिकों का ‘15 इंपैक्ट फैक्टर वाला’ एक शोध पत्र ‘The Indian monsoon variability and civilization changes in the Indian subcontinent’ 10 से अधिक ‘इम्पैक्ट फैक्टर’ वाली दुनिया की शीर्ष प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप के 2-3 वर्ष की उच्च परिशुद्धता युक्त 5700 वर्षों के मानसून के आंकड़े अत्याधुनिक यूरेनियम श्रेणी एवं ऑक्सीजन आइसोटोप की प्रविधि से तैयार किए गए हैं। इस अध्ययन के अनुसार सिंधु घाटी और वैदिक सभ्यता का उदय और पतन मजबूत और कमजोर मॉनसून की अवधियों के दौरान हुआ। जबकि पूर्व अध्ययन इसके जल प्रलय आने जैसे अन्यान्य कारण बताते हैं।

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आसमान की ओर देखिये, वहां नजर आ रहा है यह खूबसूरत नजारा

नैनीताल, 5 अक्टूबर 2018। इन दिनों नैनीताल सहित पर्वतीय क्षेत्रों से दूधिया रोशनी की तरह आकाशगंगा का बेहद खूबसूरत नजारा दिखाई दे रहा है। आकाशगंगा शाम होने के बाद दक्षिण-पश्चिम दिशा में सैगिटेरियस यानी धनु राशि के तारामंडल के पास नजर आ रही है। खास बात यह भी है कि शनि, प्लूटो व मंगल ग्रह … Read more

नये वर्ष में ठंड कम, बारिश अधिक कराएगा अल नीनो !

  • पिछले वर्षों में अतिवृष्टि के रूप में अपना प्रभाव दिखा चुके अल-नीनो के बाबत यूजीसी के दीर्घकालीन मौसम विशेषज्ञ डा. बीएस कोटलिया का दावा
  • अल नीनो के प्रभाव में सर्दियों में आईटीसीजेड को पर्वतीय राज्यों तक नहीं धकेल पाएगा दक्षिण-पश्चिमी मानसून
    नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तर भारत में बारिश को तरस रही सर्दियों का क्रम आने वाले नये वर्ष में भी बना रह सकता है। अलबत्ता नए वर्ष 2018 में मानसूनी वर्षा अच्छी मात्रा में हो सकती है। यह दावा यूजीसी के दीर्घकालीन मौसम विशेषज्ञ डा. बहादुर सिंह कोटलिया ने वैश्विक मौसम को प्रभावित करने वाले ‘भाई-बहन’ अल नीनो व ला नीना के अध्ययन के जरिए किया है।

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खुल गया जसपुर में मिले डायनासोर के कंकाल का राज

पिछले वर्ष 19 नवंबर 2017 को तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अंतर्गत जसपुर के बिजली घर में स्टोर की सफाई के दौरान मिले डायनासोर की तरह दिखने वाले कंकाल की गुत्थी सुलझ गई है। वन्य जीव संस्थान देहरादून ने कंकाल की डीएनए जांच के बाद उसके बिल्ली प्रजाति का होने की पुष्टि की है। उल्लेखनीय … Read more