Pahadi Holi 2026: इस बार रंगों को केवल चेहरे पर नहीं, मन में उतारिए, खेलिए कुमाऊँ की होली, जो है रंग, राग और आध्यात्म का अनुपम पर्व..

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 3 मार्च 2026 (Pahadi Holi Celebration In Kumaon Hills)। फाल्गुन का महीना आते ही जहां पूरा भारत रंगों की मस्ती में डूब जाता है, परंतु उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत, लोक परंपरा, आध्यात्म और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम है। यहाँ होली एक दिन की नहीं, बल्कि लगभग तीन माह तक चलने वाली एक सांस्कृतिक यात्रा है, जो पौष माह के प्रथम रविवार से प्रारंभ होकर छलड़ी तक अपने उत्कर्ष पर पहुँचती है।

यदि आप इस बार ऐसी होली का एक अलग अनुभव करना चाहते हैं, जहाँ रंगों से अधिक राग हों, जहाँ ढोल-दमाऊं की थाप में इतिहास गूँजता हो, जहाँ मंदिरों में देवताओं के साथ भी होली खेली जाती हो—तो कुमाऊँ की वादियाँ आपका स्वागत कर रही हैं। आप यह भी पढ़ना चाहेंगे : सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है कुमाउनी शास्त्रीय होली


कुमाऊँनी होली की साझा विशेषताएँ

कुमाऊँ की होली लगभग 1500 वर्ष पुरानी मानी जाती है और 10वीं शताब्दी के चंद शासनकाल से जुड़ी परंपरा के रूप में देखी जाती है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ इसे देश की अन्य होलियों से अलग पहचान देती हैं।

1. बैठकी होली – रागों में डूबी आध्यात्मिकता

पौष माह के पहले रविवार से प्रारंभ होने वाली कुमाऊँ की बैठकी होली को ‘निर्वाण की होली’ भी कहा जाता है। लोग घरों, मंदिरों और सभागारों में बैठकर हारमोनियम और तबले की संगत में राग काफी, खमाज, भैरवी, पीलू, झिंझोटी आदि में होलियाँ गाते हैं।
प्रारंभिक चरण में शिवरात्रि के बाद तक भक्ति रस के साथ गणेश, शिव और विष्णु स्तुति—फिर बसंत पंचमी के बाद राधा-कृष्ण और राम-सीता के श्रृंगारिक पदों के साथ देर रात्रि तक होलियाँ गाते हैं। इसके लिए अलग-अलग स्थानों पर होली की विशेष शास्त्रीय संगीत की सी महफिलें सजती हैं। 

2. खड़ी होली – लोकनृत्य और उल्लास

फाल्गुन माह की एकादशी से प्रारंभ होने वाली खड़ी होली में पुरुष पारंपरिक श्वेत कुर्ता-पायजामा और नोकदार टोपी पहनकर ढोल-हुड़के की थाप पर गोल घेरा बनाकर विशेष पद संचालन के साथ नृत्य करते हुए होली गाते हैं।

3. महिला होली और स्वांग परंपरा

महिलाएँ बैठकर गैर शास्त्रीय तरीके से मनोरंजक तरीके से पहले देवताओं की और बाद में छेड़छाड़ के रसयुक्त झोड़ा और चांचरी तथा मनचाहे नृत्यों के साथ अपनी अलग होली आयोजित करती हैं। स्वांग विधा महिला होली की विशिष्ट पहचान है, जिसमें महिलाएँ पुरुषों या चर्चित व्यक्तित्वों का रूप धरकर सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं। 4. चीर बंधन, चीर हरण और निसान की परंपरा 

रंगभरी एकादशी को कई गांवों में गाँव के मध्य मथुरा-वृंदावन से पूर्व में पूर्वजों के द्वारा लाई गई चीर को पयां (पद्म) वृक्ष की शाखा के साथ गाड़ा जाता है, जिस पर हर घर से रंगीन कपड़े के चीर कहे जाने वाले टुकड़े बांधे जाते हैं। दूसरे गांवों की चीर को चुराने (चीर हरण), अपने गाँव की चीर को चोरी किए जाने से बचाने की होड़ भी रहती है। अन्य कई गांवों में चीर की निसान (झंडे) भी गाड़े जाते हैं। चीर व निसान गाँव की एकता और सामूहिक शक्ति व संरक्षण का प्रतीक होते हैं।

5. देवताओं के साथ होली

कुमाऊँ में देवी-देवताओं के मंदिरों में होली गायन की परंपरा है। नैना देवी, बागनाथ, कोट भ्रामरी जैसे मंदिरों में होल्यार विशेष प्रस्तुति देते हैं। देवी-देवताओं को भी रंग चढ़ाया जाता है। 

6. पारंपरिक व्यंजन

होली में होलयारों को आलू के गुटके और भांग की चटनी परंपरागत तौर पर परोसे जाते हैं। अब सिंगल, गुड़, छोले, गुझिया—और अब आधुनिक दौर में घर के बने चिप्स भी खिलाए जाते हैं।


विभिन्न स्थानों की विशिष्ट होलियाँ

नैनीताल – झीलों के बीच रागमयी होली

Pahadi Holi Celebration In Kumaon Hillsनैनीताल की बैठकी होली विश्वविख्यात है। झील किनारे सभागारों में रागों की होली सुनना आत्मिक अनुभव है।

  • श्रीराम सेवक सभा, युगमंच और नैनीताल समाचार की होली विशेष आकर्षण होती है।

  • नैना देवी मंदिर में मूर्तियों को श्वेत वस्त्र पहनाकर रंग चढ़ाया जाता है।

  • विदेशी पर्यटक भी भाग लेते हैं।

यहाँ होली संगीत और सौंदर्य का अद्वितीय संगम है।


अल्मोड़ा – सांस्कृतिक राजधानी की सुरमयी परंपरा

अल्मोड़ा की होली अपने उच्च शास्त्रीय स्तर के लिए जानी जाती है।

  • ऐतिहासिक हुक्का क्लब की बैठकी होली प्रसिद्ध।

  • मल्ला महल और नंदा देवी मंदिर प्रांगण में भव्य आयोजन।

  • नैनी (चौगर्खा) व रीठागाड़ क्षेत्र की होलियाँ भी विशेष लोकप्रिय।

यहाँ बैठकी होली को सुनना किसी शास्त्रीय संगीत के सम्मेलन में बैठने जैसा अनुभव देता है।


चंपावत (काली कुमाऊँ) – ऐतिहासिक गहराई

15वीं शताब्दी से जुड़ी परंपरा वाली चंपावत की होली की खास विशेषताएं : 

  • खेतीखान और काली कुमाऊँ की होली विशेष आकर्षण।

  • फेटा बाँधकर खड़ी होली का प्रदर्शन।

  • लोहाघाट में रंग महोत्सव का आयोजन।

यहाँ होली में शास्त्रीयता और वीरता का भाव दिखाई देता है।


बागेश्वर – बागनाथ की संगम की होली

बागनाथ मंदिर परिसर में विभिन्न गाँवों के होल्यार एकत्रित होकर पहली प्रस्तुति देते हैं।
कोट भ्रामरी मंदिर में भी विशेष आयोजन होता है।
धुराफाट क्षेत्र के कुछ गाँवों में परंपरागत मान्यताओं के कारण होली नहीं मनाई जाती—यह सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण है।


पिथौरागढ़ – राग पुष्करी की अनूठी धुन

यहाँ की “आठवीं ताल वाली होली” प्रसिद्ध है।
पोखरी गाँव की होली विशेष आकर्षण का केंद्र है।
कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय देव मान्यताओं के कारण रंग नहीं खेले जाते।

यहाँ की होली में संगीत की जटिलता और आध्यात्मिकता का अद्भुत मेल है।


क्यों आएँ कुमाऊँ की होली देखने?

  • यहाँ होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक धरोहर है।

  • यहाँ होली तीन माह तक चलने वाला संगीत पर्व है।

  • यहाँ लोक और शास्त्र का अद्भुत संगम है।

  • यहाँ प्रकृति, अध्यात्म और परंपरा एक साथ मिलते हैं।

यदि आप शोर से दूर, आत्मा को छू लेने वाला अनुभव चाहते हैं—तो आप भी कुमाऊँ की वादियों की ओर रुख कीजिए, और इस बार रंगों को केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि मन में उतारिए। कुमाऊँ की होली आपका इंतजार कर रही है।

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