गंगा-यमुना नदियों का पानी अपने मातृ प्रदेश में ही आचमन योग्य क्यों नहीं, उत्तराखंड हाईकोर्ट सरकार से मांगा जवाब

नैनीताल, 12 सितंबर 2018। ‘उत्तराखंड से निकलने वाली गंगा और यमुना नदियों का पानी अपने मातृ प्रदेश में ही आचमन योग्य नहीं रहा है।’ इससे संबंधित दिल्ली निवासी आचार्य अजय गौतम के पत्र को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया है। श्री गौतम ने उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखकर प्रार्थना की थी कि उत्तराखंड की इन दो पवित्र नदियों में पानी की गुणवत्ता अब बहुत खराब हो हो चुकी है। न्यायमूर्ति वीके बिष्ट और न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने इस पत्र का संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया है। मामले को सुनने के बाद खण्डपीठ ने अधिवक्ता अजय वीर पुंडीर को न्यायमित्र नियुक्त किया है, तथा सरकार से अगली सुनवाई की तिथि 30 अक्टूबर तक जवाब पेश करने को कहा है।

अब मुर्गियों के हितों पर हाईकोर्ट नाराज, केंद्र व राज्य सरकारों को दिये निर्देश

नैनीताल, 14 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने मुर्गियों के हितों की हो रही अनदेखी से संबंधित एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को इस संबंध में तीन सप्ताह के अंदर विधि आयोग की ओर से तैयार नियमों का पालन करने को कहा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा की अगुवाई वाली खंडपीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता गौरी मौलेखी की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद ये निर्देश जारी किये हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिये हैं कि वह 2013 में जारी शासनादेश का कड़ाई से पालन करे।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय में पिछले साल एक याचिका दायर कर कहा गया था कि प्रदेश में मुर्गियों के हितों की अनदेखी की जा रही है। उनके साथ क्रूरता की जा रही है। उनको एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिये जो तरीका अपनाया जाता है वह उचित नहीं है। उनको पर्याप्त जगह में नहीं रखा जाता है। मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिये कि वह केंद्रीय विधि आयोग की ओर से तैयार नियमावली का तीन सप्ताह में अनुपालन करे, साथ ही उनका कड़ाई से अनुपालन भी सुनिश्चित कराये।

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नैनीताल, 10 अगस्‍त 2018। देश में अपनी तरह के पहले आदेश में उत्‍तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि वह राज्‍य में गायों और अन्‍य आवारा पशुओं के कल्‍याण के लिए ‘उनका कानूनी संरक्षक’ है। हाई कोर्ट ने ऐसा इसलिए किया है क्‍योंकि गायें और अन्‍य आवारा पशु खुद अपना संरक्षण नहीं कर सकते हैं। इस प्रावधान के बाद पूरे राज्‍य में हाई कोर्ट ने खुद को गोवंश का संरक्षक घोषित किया है।
उत्‍तराखंड हाई कोर्ट ने यह आदेश 10 अगस्‍त को दिया और सोमवार 13 अगस्‍त को इसकी सत्‍यापित कॉपी जारी हुई। कार्यकारी चीफ जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने अपने 41 पन्‍ने के आदेश में राज्‍य में गायों के संरक्षण के लिए कई कदम उठाने को कहा है। खंडपीठ ने गायों के संरक्षण के महत्‍व को दर्शाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों, उपनिषद, अर्थशास्‍त्र, जैन और बौद्ध धर्म की शिक्षाओं, महात्‍मा गांधी तथा दलाई लामा के संदेशों का हवाला दिया। खंडपीठ ने इस संबंध में राज्‍य सरकार को कई निर्देश दिए। इसके तहत गाय, बैल, बछड़ों का वध रोकना और पूरे राज्‍य में गोमांस की किसी भी तरह से बिक्री को रोकना और आवारा पशुओं को चिकित्‍सा सहायता देना शामिल है। इसके अलावा हाई कोर्ट ने तीन महीने के अंदर राज्‍य के सभी गौशालाओं से अवैध कब्‍जे को हटाने और ग्रामीण इलाकों में गौहत्‍या रोकने के लिए 24 घंटे गश्‍त लगाने का भी निर्देश दिया। खंडपीठ ने कहा, ‘गायों के संरक्षण के लिए डीएसपी रैंक के अधिकारी के नेतृत्‍व में कुमाऊं और गढ़वाल में एक विशेष दस्‍ता बनाया जाए। इसमें पशुओं का एक डॉक्‍टर भी शामिल हो।’ हाई कोर्ट ने कहा कि जिन मालिकों के पशु सड़कों पर पाए जाएं उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्‍न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पशुओं की देखरेख के दौरान उन्‍हें कोई दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए। हाई कोर्ट ने कहा, ‘हिंदू मान्‍यता के मुताबिक हरेक प्राणी भगवान से जुड़ा हुआ है। पशु भी हमारी तरह सांस लेते हैं और उनके अंदर भी भावनाएं होती हैं। उन्‍हें खाना, पानी, छत और इलाज की जरूरत होती है।’ उत्‍तराखंड हाई कोर्ट ने यह आदेश हरिद्वार में गोवध को लेकर दायर जनहित याचिका पर दिया है।

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नैनीताल, 14 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के गंगा नदी सहित सभी नदी, नालों व झीलों आदि को जीवित मानव का दर्जा दिये जाने की ही तरह के एक नये फैसले में हवा, पानी व उत्तराखंड में रहनवाले जीव-जंतुओं को मानव की तरह की तरह का विधिक दर्जा प्रदान कर दिया है, तथा उत्तराखंड के नागरिकों को उनका संरक्षक घोषित कर दिया है। उच्च न्यायालय के इस महत्वपूर्ण फैसले में जीव जंतुओं के भी मानवों की तरह ही अधिकार, कर्तव्य व जिम्मेदारियां बताई गयी हैं।
उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ का यह फैसला उत्तराखंड के चम्पावत जिले के पड़ोसी देश नेपाल की सीमा से लगे बनबसा कस्बे के निवासी नारायण दत्त भट्ट की जनहित याचिका पर आया है। 2014 में दायर इस याचिका में बनबसा से महेंद्रनगर (नेपाल) की 14 किमी की दूरी के मार्ग पर चलने वाले बुग्गी, तांगा व भैंसा गाड़ियों में जुतने वाले पशुओं के चिकित्सकीय परीक्षण, टीकाकरण के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की प्रार्थना की गयी थी। साथ ही याचिका में यह भी कहा गया था कि बुग्गियों, तांगों व भैंसा गाडियों से यातायात प्रभावित होता है और इन गाड़ियों के माध्यम से मानव तस्करी व ड्रग्स तस्करी की आशंका भी बनी रहती है, लेकिन भारत-नेपाल सीमा पर इनकी जांच नहीं की जाती है, जो कि भारत-नेपाल सहयोग संधि 1991 का उल्लंघन है। इस याचिका पर बुधवार को अपना फैसला सुनाते हुए खंडपीठ ने अपने आदेश में नगर पंचायत बनबसा को नेपाल से भारत आने वाले घोड़े-खच्चरों का परीक्षण करने व सीमा पर एक पशु चिकित्सा केंद्र खोलने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पंतनगर विवि के कुलपति को पशुपालन विभाग की अध्यक्षता में दो प्रोफेसरों को शामिल करते हुए एक कमेटी का गठन करने को कहा है। कमेटी से पशु क्रूरता अधिनियम से संबंधित मामलों में रिपोर्ट पेश करने तथा कुलपति से मुख्य सचिव को रिपोर्ट भेजने को कहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर अधिनियम में संशोधन किया जा सके। इसके अलावा आदेश में पीठ ने सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि पशुओं से अधिक भार ना ढोया जाए। जानवरों के माध्यम से ले जाने वाले भार को भी तय कर दिया गया है। पीठ ने जानवरों से अधिक व कम तापमान में काम ना लेने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही नगरपालिकाओं से कहा है कि जानवरों से भार ढोने वाले मामलों में नजर रखने, जानवरों के लिए आश्रय स्थल बनाने तथा जानवरों के लिए बनाए गए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित कराने को भी कहा है। वहीं तांगा व घोड़ा गाड़ियों के मालिकों से रात्रि में दृश्यता बनाने के लिए रिफ्लेक्टर लगाने को कहा है। वहीं पुलिस अधिकारियों से जानवरों से अधिक भार ना ढोने देना सुनिश्चित करने को तथा पशु चिकित्सकों से बीमार जानवरों का उपचार करने, यदि जानवर चिकित्सक के पास नहीं लाया जा सकता तो चिकित्सकों को जानवर के पास खुद जाका उपका उपचार करने को कहा है।

हाईकोर्ट के निर्देश

1, प्रदेश के समस्त पशु, पक्षी, जलीय प्राणी लीगल entity घोषित, मनुष्यों की भांति उनके अधिकार, कर्तव्य घोषित। प्रदेश का हर नागरिक पशुओं का अभिभावक घोषित।
2, सड़कों में वाहन चालक पहले बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी इत्यादि को देंगे रास्ता, नहीं बाधित होगी उनकी राह।
3, जानवरों को हर दो घंटे में पानी, चार घंटे में भोजन देना आवश्यक, एक बार में 2 घंटे से ज्यादा पैदल चलाने पर रोक।
4, पशुओं को केवल 12 डिग्री से 30 डिग्री तापमान के दौरान ही चलाया जा सकता है पैदल। 37 डिग्री से ज्यादा 5 डिग्री से कम तापमान के दौरान हल जोतने पर प्रतिबंध।
5, पशुओं के स्वास्थ्य, भोजन, इलाज के साथ ही उनकी भावनाओं और संवेदनाओं का ध्यान रखना आवश्यक।
6, बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी के आगे पीछे व खींचने वाले पशुओं के शरीर पर रेडियम का कवर लगाना आवश्यक।
7, किसी वाहन में 6 से अधिक पशु न लादे जाएं, साथ में एक अटेंडेंट व फर्श पर मैटिंग आवश्यक।
7, पशुओं को हांकने के लिए चाबुक, डंडे सहित किसी भी प्रकार की अन्य विधि पर रोक। पशुओं के नाक, मुंह में लगाम लगाने पर रोक, केवल रस्सी से गर्दन से बांधने की अनुमति। रस्सी का मुलायम होना आवश्यक।
8, पंत विवि के कुलपति वरिष्ठ प्रोफेसरों की कमेटी बनाएं, जो यह बताये कि बछड़े, बैल ऊंट आदि द्वारा ढोए जाने वाले बोझ के लिए निर्धारित मानदंड सही हैं या बोझ की मात्रा ज्यादा है।
9, बनबसा से नेपाल तथा नेपाल से बनबसा के मध्य चलने वाली घोड़ागाड़ी के घोडों के स्वास्थ्य की नियमित जांच हो व प्रमाणपत्र जारी हों।
10, कोर्ट ने विभिन्न पशुओं द्वारा ढोए जाने वाले बोझ की सीमा भी निर्धारित की हैै।

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अधिवक्ता ललित मिगलानी से मुलाकात करती फ्रांस की शोधार्थी डेनियल बेरती

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के गंगा नदी को ‘जीवित मानव’ का दर्जा दिए जाने के बहुचर्चित व ऐतिहासिक फैसले को भले ही देश में भुला दिया गया हो, और देश की सर्वाेच्च अदालत ने भी इस पर उत्तराखंड सरकार को स्थगनादेश दे दिया हो, किंतु प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए संवेदनशील फ्रांस के उच्चशिक्षण संस्थाओं में इस पर न केवल खूब चर्चा हो रही है, वरन वहां की एक शोधार्थी की मानें तो वहां इसे पढ़ाया भी जा रहा है।

इस फैसले के प्रभावों व पृष्ठभूमि पर अध्ययन करने के लिए फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंस रिसर्च – सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज की शोधार्थी डेनियल बेरती ने इस बहुचर्चित मामले के याचिकाकर्ता – अधिवक्ता ललित मिगलानी से मुलाकात कर फैसले तथा गंगा की धार्मिक व सामाजिक मान्यता को लेकर तथ्यात्मक जानकारी जुटाई। साथ ही बताया कि मिगलानी की ‘गंगा के प्रदूषण एवं गंगा को बचाने’ से सम्बंधित जनहित याचिका संख्या 140/2015 को फ्रांस में उनके संस्थान में पढाया गया, और उन्हें इस विषय पर ही पीएच.डी. स्वीकृत हुई है। अधिवक्ता मिगलानी ने इसको उत्तराखंड उच्च न्यायालय के साथ ही देश के लिए बड़ी उपलब्धि करार दिया। बताया कि पूर्व में एक विदेशी पत्रकार ने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी इस विषय पर चर्चा होने की बात कही थी। तब उन्होंने इस बात को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया था।
ज्ञात हो कि अधिवक्ता ललित मिगलानी की इसी यायिका की सुनवाई के दौरान ही आए हरिद्वार निवासी मो. सलीम द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी पंत ने उच्च न्यायालय के समक्ष न्यूजीलेंड की वानकुई नदी को ‘जीवित व्यक्ति’ का दर्जा दिए जाने का तर्क रखा था, जिस पर न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने 20 मार्च 2016 को गंगा और यमुना को भी ‘जीवित व्यक्ति’ का दर्जा दे दिया था। इसके कुछ समय बाद ही अधिवक्ता ललित मिगलानी की जनहित याचिका पर वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दो दिसंबर 2016 को गंगा के साथ ही ग्लेशियरों, नदियों, चरागाहों, झीलों, झरनों, पेड़ व पौधों आदि प्राकृतिक संपदाओं को जीवित व्यक्ति का दर्जा दे दिया था। हालांकि बाद में उत्तराखंड सरकार ने गंगा-यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिए जाने के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में विशेष जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय की याचिका पर रोक लगा दी थी। अलबत्ता, ग्लेशियरों व नदियों, चरागाहों, झीलों, झरनों, पेड़-पौधों आदि को जीवित व्यक्ति का दर्जा देने वाला आदेश प्रभावी है।

पूर्व आलेख : गंगा-यमुना के बाद ग्लेशियर, नदी, नाले, झील, जंगल, चरागाह भी अब ‘जीवित मानव’

-उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक और एतिहासिक फैसला देते हुए गंगा-यमुना के बाद गंगोत्री, यमुनोत्री सहित नदी, नालों, झीलों, जंगलों, चरागाहों को भी जीवित मानव का दर्जा दिया

– भारतीय मिथकों की कण-कण में ईश्वर होने की परिकल्पना पर लगी एक तरह से मुहर
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक और एतिहासिक फैसला देते हुए गंगा और यमुना नदियों के बाद अब इनके उद्गम स्थलों-गंगोत्री व यमुनोत्री सहित ग्लेशियरों के साथ ही नदियों, छोटी नदियों, घाटियों, जल धाराओं, ग्लेशियरों, झीलों, हवा, घास के मैदानों, जंगलों, जंगली जलराशियों व झरने इत्यादि को कानूनी वैधता, कानूनी तौर पर जीवित मनुष्य का दर्जा दे दिया है। इन्हें एक कानूनी तौर पर जीवित व्यक्ति की तरह सभी संबंधित मौलिक व कानूनी अधिकार होंगे, साथ ही इनके जीवित मनुष्य की तरह दायित्व और जिम्मेदारियां भी होंगी।

गंगा माता की आरती के लिए चित्र परिणाम

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की एक खंडपीठ ने हरिद्वार निवासी मोहम्मद सलीम द्वारा दायर की गयी एक जनहित याचिका पर बीती 20 मार्च को भी अपने एक ऐतिहासिक फैसले में देश की दो पवित्र नदियों गंगा और यमुना को जीवित मानव का दर्जा देने का आदेश दिया था। वहीं दो दिसंबर 2016 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय की इसी खंड पीठ ने ललित मिगलानी की याचिका पर सुनवाई के बाद पूर्ण फैसला देते हुए 66 पृष्ठ का यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। फैसले में केंद्र सरकार को 10 श्मशान घाटों को हटाकर इनकी जगह प्रदूषण रहित श्मशान घाट बनाने की प्रक्रिया आठ सप्ताह एवं शेष 40 श्मशान घाटों की प्रक्रिया तीन माह में पूरी करने के आदेश दिये हैं।

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इसके साथ ही उत्तराखंड के मुख्य सचिव, नमामि गंगे प्रोजेक्ट के निदेशक प्रवीण कुमार व कानूनी सलाहकार ईश्वर सिंह, उत्तराखंड के महाधिवक्ता, चंडीगढ़ ज्यूडिशियल के निदेशक डा. बलराम के गुप्ता, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी मेहता को इनके मानवीय चेहरे की तरह संरक्षण के लिये ‘लोको पैरेंट्स’ यानी कानूनी अभिभावक नियुक्त किया है, और उन्हें इनके संरक्षण व इनकी तय स्थिति को बहाल रखने के लिये एक मानवीय चेहरे की तरह कार्य करने को कहा है। यानी ये अधिकारी गंगा और यमुना के जीवित मानव का दर्जे को बरकरार रखने तथा इन नदियों के स्वास्थ्य और कुशलता को बढावा देने के लिये बाध्य होंगे। वहीं उत्तराखंड के मुख्य सचिव को प्रदेश के नदियों, झीलों व ग्लेशियरों आदि के शहरों, कस्बों व गांवों के सात या अधिक जन सामान्य के प्रतिनिधियों को चुनने की अनुमति दी है।

…तो ‘ओ माई गॉड’ फिल्म की तरह इनके विरुद्ध भी दर्ज हो सकेंगे मुकदमे

मां नयना की नगरी नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव-2013 के शुभ अवसर पर पर्वत पर उभरी पर्वत पुत्री माता नंदा की पर्वताकार प्रतिकृति…

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिस तरह गंगा और यमुना के बाद अब अन्य प्राकृतिक चीजों को भी कानूनी तौर पर जीवित व्यक्ति माना है और इन्हें एक जीवित व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के साथ ही एक जीवित व्यक्ति के कर्तव्यों के साथ ही दायित्व व जिम्मेदारियां भी दी हैं। आदेश में साफ कहा गया है कि उपरोक्त के द्वारा अन्य को पहुंचाये जाने वाले घाव, चोट या नुकसान पहुंचाने को एक जीवित मनुष्य की तरह ही माना जायेगा। उल्लेखनीय है कि बीते दिनों आई एक फिल्म-ओ माई गॉड में फिल्म का नायक भूकंप में अपनी दुकान नष्ट हो जाने पर अदालत के माध्यम से ईश्वर के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय मिथकों में भी प्रकृति के विविध अंगों नदी-नालों, पर्वतों, जंगलों आदि को जीवित महामानवों या ईश्वरों की तरह माना जाता है। उनका संरक्षण किया जाता है, उनसे अच्छा करने की प्रार्थना की जाती है, और कई बार बुरा होने पर उन्हें ही इसके लिये दोषी भी ठहराया जाता है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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