मामूली बात पर अधिवक्ता (Advocates) ने युवक को गोली मारी, गिरफ्तार…

(Sister-s Wedding Broken due to Lack of Money) (Police Encounter-3 Shot-4 Arrested by UDN Police)

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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो बच्चों की मां को दी पति-बच्चों को छोड़ प्रेमी के साथ ‘लिव-इन’ में रहने की इजाजत

Uttarakhand High Court Order : The Uttarakhand High Court has granted permission to a mother of two children to live with her ‘live-in partner,’ whom she met through social media. The court made this decision in response to a habeas corpus petition filed by the woman’s husband, who is a gym trainer. The woman informed the court that she experienced ill-treatment from her husband and therefore chose to leave him. She willingly decided to live with her lover, leaving behind her husband and their 10-year-old son and six-year-old daughter.

बड़ा समाचार: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के चार लोग बनेंगे न्यायाधीश…

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अप्रैल 2023। (Big news: Four people of Uttarakhand High Court will become judges) उत्तराखंड उच्च न्यायालय के चार लोग न्यायाधीश बनने जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की कोलेजियम ने इनके नामों की संस्तुति कर दी है। जिन नामों की संस्तुति की गई है, उनमें उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश थपलियाल, … Read more

यूपी व उत्तराखंड से जुड़े बिल को राष्ट्रपति ने दी मंजूरी, आपातकाल के दौर के बाद फिर मिलेगी बड़ी कानूनी सुविधा…

नवीन समाचार, नई दिल्ली, 23 जुलाई 2019। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अग्रिम जमानत का प्रावधान देने वाले बिल को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी। गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि आपातकाल के दौरान इन दोनों राज्यों में अग्रिम जमानत देने वाले जिस कानून को हटा दिया गया था, अब राष्ट्रपति की अनुमति के बाद उसे दोबारा लागू किया जा सकेगा। इसके बाद फांसी की सजा व गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत मिल सकेगी। संशोधित कानून के अनुसार अग्रिम जमानत की सुनवाई के दौरान आरोपी के मौजूद रहने की अनिवार्यता भी खत्म हो जाएगी। नए कानून के तहत कोर्ट के पास अग्रिम जमानत देने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें रखने का अधिकार होगा। गंभीर अपराध के मामलों में अदालत चाहे तो अग्रिम जमानत देने से इनकार भी कर सकता है।
राष्ट्रपति ने सोमवार को कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर बिल (2018) को मंजूरी दी। बता दें कि देश में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड ही ऐसे दो राज्य हैं जहां अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है। चार दशकों बाद राष्ट्रपति की अनुमति के बाद इस कानून को दोबारा लागू करने की प्रक्रिया पर काम किया जा सकेगा। इस बिल के तहत उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में सीआरपीसी यानी भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत संशोधन किया जाएगा। जिन मामलों में दोषी को फांसी की सजा मिली हो या जो मामले गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज हों, उनमें अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं होगा। बताया गया है कि वर्ष 2009 में भी राज्य विधि आयोग ने संशोधित बिल को दोबारा लागू करने की सिफारिश की थी। इसके बाद 2010 में यूपी की मायावती सरकार ने बिल पास कर इसे केंद्र के अनुमोदन के लिए भेजा था, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में चला गया। बाद में केंद्र की ओर से इसे यह कह कर वापस भेज दिया गया कि इसमें अभी कुछ बदलावों की जरूरत है।

यह भी पढ़ें : जज साहेब, तब खतरे में नहीं थे लोकतंत्र, न्यायपालिका ?

जज साहेब कह रहे हैं कि न्यायपालिका खतरे में है। वे हाकिम हैं, हुजूर हैं, माई-बाप हैं। कह रहे हैं तो सचमुच न्यायपालिका संकट में ही होगी। मैं लोकतंत्र का एक अदना सा दास हूँ, मेरी इतनी सामर्थ्य कहाँ जो उनकी बात को काट सकूं। मुझे बस एक बात समझ में नहीं आती, कि यह लोकतंत्र तब खतरे में क्यों नहीं आया था जब निर्भया का अति-क्रूर हत्यारा अफ़रोज़ मुस्कुरा कर कचहरी से निकल रहा था। न्यायपालिका क्या तब संकट में नहीं आयी थी जब सिक्ख दंगो के सारे आरोपी मुस्कुराते हुए बरी हो गए थे ? यह न्यायपालिका तब संकट में क्यों नहीं आयी जब टू-जी घोटाले के सभी आरोपी साक्ष्य के अभाव में छूट कर जश्न मना रहे थे ? संसद में सरेआम नोट उड़ाने वाले लोगों को जब यह न्यायपालिका डांट तक नहीं पाई, तब क्या उसके अस्तित्व पर संकट नहीं था ? यह न्यायपालिका तब संकट में क्यों नहीं आयी जब उसकी नाक के नीचे देश का एक प्रतिष्ठित नेता जज बनाने के नाम पर एक महिला अधिवक्ता का शोषण करता पकड़ा गया ? जिस न्यायपालिका में इस तरह जज बनते हों, उसके लिए क्या किसी दूसरे संकट की आवश्यकता है ?

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