EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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कौए और परोसे जाते हैं पकवाननवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया को रोशनी के साथ ऊष्मा और ऊर्जा के रूप में जीवन देने के कारण साक्षात देवता कहे जाने वाले सूर्यदेव के धनु से मकर राशि में यानी दक्षिणी से उत्तरी गोलार्ध में आने का उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाने वाला पर्व पूरे देश में अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। पूर्वी भारत में यह बीहू, पश्चिमी भारत (पंजाब) में लोहणी और दक्षिणी भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु आदि) में पोंगल तथा देवभूमि उत्तराखंड में यह घुघुतिया और उत्तरायणी के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के लिए यह न केवल लोक पर्व, वरन मौसम परिवर्तन के लिहाज से एक बड़ा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ऋतु पर्व भी है। यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleयह भी पढ़ें : राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वरपहली बार देखें रानीबाग में उत्तरायणी पर कत्यूरी वंशजों द्वारा किया जाने वाला जियारानी का जागर :कत्यूर व चंद शासन काल तथा भगवान राम भी से जुड़ी है घुघुती व मकर संक्रांति मनाने की परंपरासूर्य उपासना का पर्व भी है उत्तरायणीइसलिये बहुत खास है रानीबागयह भी पढ़ें : रानीबाग में हुआ इतिहास, वर्तमान और आस्था का समागम, कत्यूरी वंशजों ने लगाये जागर, हुआ अभिनंदनयहां से पहुंचे कत्यूरी वंशजों के जत्थेयह भी पढ़ें : इस बार कुछ खास होगा रानीबाग में मकर संक्रांति का आयोजनLike this:Relatedयह भी पढ़ें : राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वरउत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मकर संक्रांति यानी उत्तरायणी को लोक सांस्कृतिक पर्व घुघुतिया के रूप में मनाए जाने की विशिष्ट परंपरा रही है। इसी दिन यानी 14 जनवरी 1921 को इसी त्योहार के दिन हुए एक बड़े घटनाक्रम को कुमाऊं और उत्तराखंड प्रदेश की ‘रक्तहीन क्रांति” की संज्ञा दी जाती है, इस दिन कुमाऊं परिषद के अगुवा कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने कुमाऊं की काशी कहे जाने वाले बागेश्वर के ‘सरयू बगड़” (सरयू नदी के किनारे) में सरयू नदी का जल हाथों में लेकर बेहद दमनकारी गोर्खा और अंग्रेजी राज के करीब एक सदी पुराने कुली बेगार नाम के काले कानून संबंधी दस्तावेजों को नदी में बहाकर हमेशा के लिए तोड़ डाला था। यह परंपरा बागेश्वर में अब भी राजनीतिक दलों के सरयू बगड़ में पंडाल लगने और राजनीतिक हुंकार भरने के रूप में कायम है। इस त्योहार से कुमाऊं के लोकप्रिय कत्यूरी शासकों की एक अन्य परंपरा भी जुड़ी हुई है, जिसके तहत आज भी कत्यूरी राजाओं के वंशज नैनीताल जिले के रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर उत्तरायणी के दिन रानी जिया का जागर लगाकर उनका आह्वान व परंपरागत पूजा-अर्चना करते हैं।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में नई समस्या बने नीले ड्रम, ‘देशी गीजर’ बनाकर हो रही बिजली चोरी, रुड़की ऊर्जा निगम की कार्रवाई में 148 नीले ड्रम बरामद...पहली बार देखें रानीबाग में उत्तरायणी पर कत्यूरी वंशजों द्वारा किया जाने वाला जियारानी का जागर :कत्यूर व चंद शासन काल तथा भगवान राम भी से जुड़ी है घुघुती व मकर संक्रांति मनाने की परंपरानैनीताल। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार कुमाऊं के लोकप्रिय चंदवंशीय राजवंश के राजा कल्याण चंद को बागेश्वर में भगवान बागनाथ की तपस्या के उपरांत राज्य का इकलौता वारिस निर्भय चंद प्राप्त हुआ था, जिसे रानी प्यार से घुघुती कहती थी। राजा का मंत्री राज्य प्राप्त करने की नीयत से एक बार घुघुतिया को शडयंत्र रच कर चुपचाप उठा ले गया। इस दौरान एक कौए ने घुघुतिया के गले में पड़ी मोतियों की माला ले ली, और उसे राजमहल में छोड़ आया, इससे रानी को पुत्र की कुशलता का समाचार मिला। इस खुशी में उसने संदेशवाहक कौए को तरह-तरह के पकवान खाने को दिए और अपने पुत्र का पता जाना। तभी से कुमाऊं में घुघुतिया के दिन आटे में गुड़ मिलाकर पक्षी की तरह के घुघुती कहे जाने वाले और पूड़ी नुमा ढाल, तलवार, डमरू, अनार आदि के आकार के स्वादिष्ट पकवानों से घुघुतिया माला तैयार करने और कौओं को पुकारने की प्रथा प्रचलित है। बच्चे उत्तरायणी के दिन गले में घुघुतों की माला डालकर कौओं को ‘काले कौआ काले घुघुति माला खाले, ले कौआ पूरी, मकें दे सुनकि छुरी, ले कौआ ढाल, मकें दे सुनक थाल, ले कौआ बड़, मकें दे सुनल घड़़…” आदि पुकार कर कौओं को आकर्षित करते हैं, और प्रसाद स्वरूप स्वयं भी घुघुते ग्रहण करते हैं। कौओं को इस तरह बुलाने और पकवान खिलाने की परंपरा त्रेता युग में भगवान श्रीराम की पत्नी सीता से भी जोड़ी जाती है। कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र का पुत्र जयेंद्र सीता के रूप-सौंदर्य पर मोहित होकर कौए के वेश में उनके करीब जाता है। राम कुश (एक प्रकार की नुकीली घास) के एक तिनके से जयेंद्र की दांयी आंख पर प्रहार कर डालते हैं, जिससे कौओं की एक आंख हमेशा के लिए खराब हो जाती है। बाद में राम ने ही कौओं को प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान कर पश्चाताप करने का उपाय सुझाया था। इसके साथ ही इस दिन रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर कत्यूर वंश की महारानी जियारानी को याद किया जाता है, इस तरह इसका कत्यूर राजशाही से सम्बन्ध भी दिखता है, और उत्तरायणी हरेला की तरह कुमाऊं का प्रकृति व पर्यावरण से जुड़ा एक और त्योहार भी है।सूर्य उपासना का पर्व भी है उत्तरायणीनैनीताल। कुमाऊं में उत्तरायणी के दिन लोग सरयू, रामगंगा, काली, गोरी व गार्गी (गौला) आदि नदियों में कड़ाके की सर्दी के बावजूद सुबह स्नान-ध्यान कर सूर्य का अर्घ्य चढ़ाकर सूर्य आराधना करते हैं, जो इस त्योहार के कुमाऊं के भी देश भर के छठ सरीखे त्योहारों की की तरह सूर्य उपासना से जु़ड़े होने का प्रमाण है। तत्कालीन राज व्यवस्था के कारण कुमाऊं में इस पर्व को सरयू नदी के पार और वार अलग-अलग दिनों में मनाने की परंपरा है। सरयू पार के लोग पौष मासांत के दिन घुघुते तैयार करते हैं, और अगले दिन कौओं को चढ़ाते हैं। जबकि वार के लोग माघ मास की सक्रांति यानि एक दिन बाद पकवान तैयार करते हैं, और अगले दिन कौओं को आमंत्रित करते हुए यह पर्व मनाते हैं। कत्यूरी राजवंश की महारानी जियारानी रहीं थी रानीबाग मेंहल्द्वानी। कत्यूरी राजवंश चंद्र राजवंश से पहले का था। कुमाऊं में सूर्यवंशी कत्यूरियों का आगमन सातवीं सदी में अयोध्या से हुआ। इतिहासकार इन्हें अयोध्या के सूर्यवंशी राजवंश शालीवान का संबंधी मानते हैं। इनका पहला राजा वासुदेव था। सबसे पहले वह बैजनाथ आया। इनका शासन उत्तराखंड से लेकर नेपाल तक फैला था। द्वाराहाट, जागेश्वर, बैजनाथ आदि स्थानों के मंदिर कत्यूरी राजाओं ने ही बनाए हैं। 47वें कत्यूरी राजा प्रीतम देव की महारानी ही जियारानी थी। प्रीतम देव को पिथौराशाही नाम से भी जाना जाता है। जिनके नाम पर पिथौरागढ़ नगर का नाम पड़ा। जियारानी का असल नाम मौला देवी था जो हरिद्वार के राजा अमर देव पुंडीर की दूसरी बेटी थी। अमर देव की पहली बेटी की शादी प्रीतम देव से हुई थी। 1398 में जब समरकंद का शासक तैमूर लंग मेरठ को लूटने के बाद हरिद्वार की ओर बढ़ रहा था, तब अमर देव ने राज्य की रक्षा के लिए प्रीतम देव से मदद मांगी। प्रीतम देव ने अपने भतीजे ब्रह्मदेव के नेतृत्व में विशाल सेना हरिद्वार भेजी, जिसने तैमूर की सेना को हरिद्वार आने से रोक दिया। इस दौरान ब्रह्मदेव की मुलाकात मौला देवी से हुई और वह उससे प्रेम करने लगा। अमर देव को यह पसंद नहीं आया। उसने मौला की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी प्रीतम देव से कर दी। मौला देवी को विवाह स्वीकार नहीं था। कुछ दिन राजा के साथ चौखुटिया में रहने के बाद वह नाराज होकर रानीबाग एकांतवाश के लिए आ गईं। माना जाता है कि वो यहां 12 साल तक रही। उसने सनेना की एक छोटी टुकड़ी गठित की और यहां फलों का विशाल बाग लगाया। इसी वजह से इस स्थल का नाम रानीबाग पड़ गया। एक बार रानी गौला नदी में नहा रही थी। उसके लंबे सुनहरे बाल नदी में बहते हुए आगे रोहिल्ला सिपाहियों को मिले। उन्होंने सुनहरे बाल वाली महिला की खोज शुरू की। उनकी नजर नहाते हुए रानी पर पड़ी। सैनिकों से बचने के लिए रानी पहाड़ी पर स्थित गुफा में छिप गई। रानी की सेना रोहिल्लों से हार गई और रानी को गिरफ्तार कर लिया गया। जब इसकी सूचना प्रीतम देव को मिली तो उसने अपनी सेना भेजकर रानी को छुड़ाया और अपने साथ ले गया। कुछ समय बाद प्रीतम देव का देहांत हो गया। उनका पुत्र दुला शाही बहुत छोटा था। इसलिए मौला देवी ने दुला शाही के संरक्षक के रूप में राज्य का शासन किया। पहाड़ में मां को जिया भी कहा जाता है। चूंकि मौला देवी राजमाता थीं, इसलिए वो जियारानी कहलाईं। रानीबाग में जियारानी की गुफा दर्शनीय है।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के बागेश्वर में सुबह 7:25 बजे 3.5 तीव्रता का भूकंप, झटके हरिद्वार-ऋषिकेश तक महसूस, नुकसान की सूचना नहींइसलिये बहुत खास है रानीबागनैनीताल। बैठक के दौरान बताया गया कि रानीबाग की अत्यधिक प्राचीन धार्मिक मान्यता रही है। कत्यूरी रानी जिया रानी के जरिये यह प्रदेश के दोनों मंडलों को जोड़ता है। यहां एक वर्ष आने वाले कत्यूरी वंशज अगले वर्ष हरिद्वार जाते हैं। हरिद्वार के मायापुरी की तरह इस स्थान का प्राचीन नाम मायापुरी घाट रहा है। चूंकि कत्यूरी वंश की राजधानी गढ़वाल के जोशीमठ और कुमाऊं के बैजनाथ रही, इसलिए दोनों मंडलों के श्रद्धालु समान रूप से यहां आते हैं। ऋर्षि मार्कंडेय के साथ ही सप्त ऋषियों में शामिल महाप्रतापी रावण के पितामह पुलस्त्य, अत्रि एवं पुलह (जिन्होंने मानसरोवर का आह्वान कर नैनीताल के सरोवर की रचना की थी) के साथ ही आदि गुरु शंकराचार्य का भी यह स्थान तपस्थली रहा है। नदी के किनारे एक विचित्र रंग की शिला है। जिसे चित्रशिला कहा जाता है। कहा जाता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। पुराणों के अनुसार नदी किनारे वट वृक्ष की छाया में ब्रह्मर्षि ने एक पांव पर खड़े होकर, दोनों हाथ ऊपर कर विष्णु ने विश्वकर्मा को बुलाकर इस रंगबिरंगी अद्भुत शिला का निर्माण करवाया और उस पर बैठकर ऋषि को वरदान दिया। कुछ लोग इस शिला को जियारानी का घाघरा भी कहते हैं।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। यह भी पढ़ें : रानीबाग में हुआ इतिहास, वर्तमान और आस्था का समागम, कत्यूरी वंशजों ने लगाये जागर, हुआ अभिनंदननवीन समाचार, नैनीताल, 15 जनवरी 2019। ‘जय जिया जय जिया’ के उदघोषों सोमवार यानी मकर संक्रांति की पहली रात रानीबाग स्थित चित्रेश्वर घाट में गुंजायमान रही। इस दौरान रानीबाग में कत्यूरी राजाओं के वंशजों के जत्थे उमड़ते रहे और कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना गौला नदी में डुबकी लगाते और जिया रानी के गीत ‘जिया रानी भूल नी सकना तेरो बलिदान, देखी ना तेरी जैसी भली बाना, जिया जैसी महाना, मेरी जिया रानी तेरी जय जय कारा’ आदि गाते और देव जागर में महिलाएं जिया रानी तथा पुरुष नृसिंह व ब्रह्मदेव के अवतार में झूमते नाचते रहे। इस दौरान रानीबाग में आस्था और उत्तराखंड की पुरातन प्राचीन संस्कृति जैसे पूरी तरह छाई रही, और पूरी रात अलौकिक दृश्य दृश्यमान रहे। इसके साथ ही रानीबाग में गौला नदी के तट पर श्रद्धालुओं का जबरदस्त मेला लग गया है लोग सुबह से ही आस्था की डुबकियां लगा रहे हैं।यह भी पढ़ें : छुट्टी नहीं मिली तो कर्मचारियों ने यमकेश्वर के माला गांव में एआई से दिखा दिया बब्बर शेर, वन विभाग की जांच में खुली पोल....इससे पूर्व जनपद के चित्रेश्वर महादेव स्थित रानीबाग धाम में सदियों से आने वाले कत्यूर शासकों के वंशजो का सोमवार को पहली बार यहां पहुंचने पर स्वागत-अभिनंदन किया गया। इससे अभिभूत इतिहास के इन जीवंत स्वरूपों की थकान जाती रही।एक दर्जन से अधिक जत्थो में पहुंचे सैकड़ों सदस्यों का पहली बार यहां आयोजित ‘कत्यूरी मिलन समारोह’ मंे फूल माला पहनाकर तथा नारियल एवं प्रसाद भेंट कर अभिनंदन किया गया। इसके उपरांत रात भर वंशजों के द्वारा अपने देव डंगरियों के माध्यम से अपनी कुल देवी माता जिया रानी का उनकी गुफा एवं इसके आसपास देव जागर के जरिये आवाहन एवं पूजन एवं कड़कड़ाती ठंड में पुरातन पुष्पभद्रा, गार्गी व वर्तमान में गौला नाम से जानी जाने वाली पुण्यप्रदाता नदी में स्नान-ध्यान एवं पूजा-अर्चना के कार्यक्रम विधिवत आयोजन हुए। स्थानीय विधायक बंशीधर भगत सहित कई स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी इस मौके पर उपस्थित होकर पुण्य के भागी बने। कत्यूरी मिलन समारोह में कत्यूरी वंशजों का फूल माला पहना कर अभिनन्दन करते विधायक व पूर्व मंत्री बंशीधर भगतकार्यक्रम के आयोजकों की ओर से बताया कि सदियों से अपनी धार्मिक आस्था के तहत मकर संक्रांति पर रानीबाग आ रहे कत्यूरी वंशजों एवं देव दंगरियों का पहली बार स्वागत-अभिनंदन एवं पंजीकरण कर अध्ययन तथा “वे कहां, किन गांवों से तथा किन मान्यताओं के साथ आते हैं”, इसका डॉक्यूमेंटेशन किया जा रहा है। नगर निगम एवं प्रशासन की मदद से उनकी सुविधा के लिए रानीबाग मेला परिक्षेत्र में शौचालय, अलाव व सुरक्षा आदि की व्यवस्थाओं को बीते वर्षों से बेहतर करने के प्रयास भी किये गये हैं। साथ ही नगर के महापौर, स्थानीय विधायक, सांसद एवं राज्य के पर्यटन मंत्री आदि के माध्यम से रानीबाग को धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग पर केंद्र सरकार को एक व्यापक प्रस्ताव तैयार कर भेजा जा रहा है। आयोजन में मुख्य मंदिर के पुजारी नंदन गिरि गोस्वामी, कमल गिरि गोस्वामी, शनि मंदिर के व्यवस्थापक नरेश गुप्ता, स्थानीय ग्राम प्रधान आनंद कुंजरवाल, पूर्व जिपं सदस्य संजय साह, भीम सिंह राणा, भाजपा नेता डा. अनिल कपूर डब्बू, कार्यक्रम संयोजक नारायण लाल चौधरी, कैलाश जोशी, नवीन जोशी, डा. एमपी जोशी, संजय बल्यूटिया, उद्योग भारती पांडे, दामोदर जोशी ‘देवांशु’, पंकज खत्री व डा. सुरेश टम्टा, रामीबन गोस्वामी आदि लोग जुटे रहे।यहां से पहुंचे कत्यूरी वंशजों के जत्थेनैनीताल। रानीबाग में जियारानी की पूजा-उपासना के लिए रानीखेत, द्वाराहाट, भिकियासैंण, लमगड़ा, बासोट (भिकियासैंण), धूमाकोट, रामनगर, चौखुटिया, पौड़ी आदि इलाकों से कत्यूरी वंशज बसों में भरकर रानीबाग पहुंचे। इसके अलावा हल्द्वानी के शीशमहल से रमेश तिवारी सहित चार स्थानीय जत्थे भी इस परंपरागत आयोजन में शामिल हुए। उन्होेंने गार्गी नदी में स्नान करने के बाद जियारानी की गुफा में पूजा की और रात्रि में जागर लगाया, तथा कुल देवी से कष्टों के निवारण के लिए मनौती मांगी।यह भी पढ़ें : इस बार कुछ खास होगा रानीबाग में मकर संक्रांति का आयोजनमकर संक्रांति पर रानीबाग में होगा कत्यूर मिलन, धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की उठेगी मांग बैठक में उपस्थित लोग।नवीन जोशी @ नवीन समाचार, हल्द्वानी, 9 जनवरी 2019। आगामी मकर संक्रांति के अवसर पर नंदा राज जात की तरह ही प्रदेश के गढ़वाल व कुमाऊं दोनों मंडलों की साझा धार्मिक आस्था के केंद्र, पुष्यभद्रा एवं गार्गी (गौला) नदी के तट पर बसे रानीबाग-चित्रशिला घाट रानीबाग में ‘कत्यूर मिलन-2019’ कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इस मौके पर आने वाले कत्यूरी शासकों के वंशजों एवं उनके देव डंगरियों का रानीबाग में अध्ययन किया जाएगा, एवं रानीबाग को प्रदेश का धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग बुलंद की जाएगी। बुधवार को देर शाम हल्द्वानी के नैनीताल रोड स्थित एक बैंंक्वेट हॉल में आयोजित एक बैठक में ‘कत्यूर मिलन-2019’ कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गयी। तय हुआ कि नगर निगम हल्द्वानी एवं सभी संबंधित पक्षों, कत्यूरी संस्थाओं एवं मंदिर के पुजारियों एवं स्थानीय संगठनों आदि के सहयोग से मकर संक्रांति के अवसर पर 13 जनवरी को अपराह्न 4 बजे से रानीबाग में एक विशेष कार्यक्रम रखा जाएगा। कार्यक्रम के तहत सदियों से मकर संक्रांति पर रानीबाग आ रहे कत्यूरी वंशजों एवं देव डंगरियों का अध्ययन किया जाएगा, साथ ही वे कहां, किन गांवों से तथा किन मान्यताओं के साथ आते हैं, इसका डॉक्यूमेंटेशन किया जाएगा। इससे पूर्व उनकी सुविधा के लिए रानीबाग मेला परिक्षेत्र में शौचालय, अलाव व सुरक्षा आदि की व्यवस्थाओं के लिए पुलिस एवं नगर निगम प्रशासन से मिलकर सहयोग लिया जाएगा। साथ ही कोशिश होगी कि मकर संक्रांति के दि नही नगर के महापौर, स्थानीय विधायक, सांसद एवं राज्य के पर्यटन मंत्री आदि को साथ लेकर रानीबाग को धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग पर केंद्र सरकार को एक व्यापक प्रस्ताव तैयार कर भेजा जाए। इस दौरान आयोजन के संयोजन की जिम्मेदारी बैठक में मौजूद रहे नारायण लाल चौधरी को, कत्यूरी वंशजों के स्वागत व पंजीकरण की जिम्मेदारी कैलाश जोशी एवं मीडिया संयोजन की जिम्मेदारी नवीन जोशी को दी गयी। बैठक में इतिहासकार डा. एमपी जोशी, संजय बल्यूटिया, उद्योग भारती पांडे, दामोदर जोशी ‘देवांशु’, पंकज खत्री व डा. सुरेश टम्टा आदि लोग भी शामिल रहे।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हमनाम व आदर्श ‘नरेंद्र’ की उत्तराखंड से स्वामी और राजर्षि विवेकानंद बनने की कहानी भाषा के काम सरकार के भरोसे नहीं हो सकते, समाज को आगे आना होगा: नरेंद्र सिंह नेगी
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