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गोविंद बल्लभ पंत : हिमालय सा व्यक्तित्व और दिल में बसता था पहाड़

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  • लखनऊ, दिल्ली की रसोई में भी कुमाऊंनी भोजन बनता था, पर्वतीय लोगों से अपनी बोली- भाषा में करते थे बात 
नवीन जोशी नैनीताल। देश की आजादी के संग्राम और आजादी के बाद देश को संवारने में अपना अप्रतिम योगदान देने वाले उत्तराखंड के लाल भारतरत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत का व्यक्तित्व हिमालय जैसा विशाल था। वह राष्ट्रीय फलक पर सोचते थे, लेकिन दिल में पहाड़ ही बसता था। उन्हें पहाड़ और पहाड़वासियों से अपार स्नेह था। पंत आज के नेताओं के लिए भी मिसाल हैं। वे महान ऊंचाइयों तक पहुंचने के बावजूद अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहे और स्वार्थ की भावना से कहीं ऊपर उठकर अपने घर से विकास की शुरूआत की। उनके घर में आम कुमाऊंनी रसोई की तरह ही भोजन बनता था और आम पर्वतीय ब्राह्मणों की तरह वे जमीन पर बैठकर ही भोजन करते थे। पं. पंत के करीबी रहे नगर के वयोवृद्ध किशन लाल साह ‘कोनी’ ने 125वीं जयंती की पूर्व संध्या पर पं. पंत के नैनीताल नगर से जुड़ी यादों को से साझा किया।
पंडित पंत के ग्राम खूँट स्थित पुस्तैनी घर के भग्नावशेष

1952 में युवा कांग्रेस का गठन होते ही नैनीताल संयुक्त जनपद के पहले जिला अध्यक्ष बने श्री साह बताते हैं कि 1945 से पूर्व संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री (प्रीमियर) रहने के दौरान तक पं. पंत तल्लीताल नया बाजार क्षेत्र में रहते थे। यहां वर्तमान क्लार्क होटल उस समय उनकी संपत्ति था। यहीं रहकर उनके पुत्र केसी पंत ने नगर के सेंट जोसफ कालेज से पढ़ाई की। वह अक्सर यहां तत्कालीन विधायक श्याम लाल वर्मा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इंद्र सिंह नयाल, दलीप सिंह कप्तान आदि के साथ बी. दास, श्याम लाल एंड सन्स, इंद्रा फाम्रेसी, मल्लीताल तुला राम आदि दुकानों में बैठते और आजादी के आंदोलन और देश के हालातों व विकास पर लोगों की राय सुनते, सुझाव लेते, चर्चा करते और सुझावों का पालन भी करते थे।

बाद में वह फांसी गधेरा स्थित जनरल वाली कोठी में रहने लगे। यहीं से केसी पंत का विवाह बेहद सादगी से नगर के बिड़ला विद्या मंदिर में बर्शर के पद पर कार्यरत गोंविद बल्लभ पांडे ‘गोविंदा’ की पुत्री इला से हुआ। केसी पूरी तरह कुमाऊंनी तरीके से सिर पर मुकुट लगाकर और डोली में बैठकर दुल्हन के द्वार पहुंचे थे। इस मौके पर आजाद हिंद फौज के सेनानी रहे कैप्टन राम सिंह ने बैंड वादन किया था। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए वे पंत सदन (वर्तमान उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का आवास) में रहे, जोकि मूलत: रामपुर के नवाब की संपत्ति था और इसे अंग्रेजों ने अधिग्रहीत किया था। साह बताते हैं कि वह जब भी उनके घर जाते, उनकी माताजी पर्वतीय दालों भट, गहत आदि लाने के बारे में पूछतीं और हर बार रस- भात बनाकर खिलाती थीं।

उनके लखनऊ के बदेरियाबाग स्थित आवास पर पहाड़ से जो लोग भी पहुंचते, पंत उनके भोजन व आवास की स्वयं व्यवस्था कराते थे और उनसे कुमाऊंनी में ही बात करते थे। उनका मानना था कि पहाड़ी बोली हमारी पहचान है। वह अन्य लोगों से भी अपनी बोली-भाषा में बात करने को कहते थे। साह पं. पंत की वर्तमान राजनेताओं से तुलना करते हुए कहते हैं कि पं. पंत के दिल में जनता के प्रति दर्द था, जबकि आज के नेता नितांत स्वार्थी हो गये हैं। पंत में सादगी थी, वह लोगों के दुख-दर्द सुनते और उनका निदान करते थे। वह राष्ट्रीय स्तर के नेता होने के बावजूद अपनी जड़ों से जुड़े हुए थे। उन्होंने नैनीताल जनपद में ही पंतनगर कृषि विवि की स्थापना और तराई में पाकिस्तान से आये पंजाबी विस्थापितों को बसाकर पहाड़ के आँगन को हरित क्रांति से लहलहाने सहित अनेक दूरगामी महत्व के कार्य किये।

पन्त के जीवन के कुछ अनछुवे पहलू

राष्ट्रीय नेता होने के बावजूद पं. पंत अपने क्षेत्र-कुमाऊं, नैनीताल से जुड़े रहे। केंद्रीय गृह मंत्री और संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री रहते हुई भी वह स्थानीय इकाइयों से जुड़े रहे। उनकी पहचान बचपन से लेकर ताउम्र कैसी भी विपरीत परिस्थितियों में सबको समझा-बुझाकर साथ लेकर चलने की रही। कहते हैं कि बचपन में वह मोटे बालक थे, वह कोई खेल भी नहीं खेलते थे, एक स्थान पर ही बैठे रहते थे, इसलिए बचपन में वह ‘थपुवा” कहे जाते थे। लेकिन वे पढ़ाई में होशियार थे। कहते हैं कि गणित के एक शिक्षक ने कक्षा में प्रश्न पूछा था कि 30 गज कपड़े को यदि हर रोज एक मीटर काटा जाए तो यह कितने दिन में कट जाएगा, जिस पर केवल उन्होंने ही सही जवाब दिया था-29 दिन, जबकि अन्य बच्चे 30 दिन बता रहे थे। अलबत्ता, इस दौरान उनका काम खेल में लड़ने वाले बालकों का झगड़ा निपटाने का रहता था। उनकी यह पहचान बाद में गोपाल कृष्ण गोखले की तरह तमाम विवादों को निपटाने की रही। संयुक्त प्रांत का प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते वह रफी अहमद किदवई सरीखे अपने आलोचकों और अनेक जाति-धर्मों में बंटे इस बड़े प्रांत को संभाले रहे और यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री रहते 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौर में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने चीनी समकक्ष चाऊ तिल लाई से बात नहीं कर पा रहे थे, तब पं पंत ही थे, जिन्होंने चाऊलाई को काबू में किया था। इस पर चाऊलाई ने उनके लिए कहा था-भारत के इस सपूत को समझ पाना बड़ा मुश्किल है। अलबत्ता, वह कुछ गलत होने पर विरोध करने से भी नहीं हिचकते थे। कहते हैं कि उन्होंने न्यायाधीश से विवाद हो जाने की वजह से अल्मोड़ा में वकालत छोड़ी और पहले रानीखेत व फिर काशीपुर चले गए। इस दौरान एक मामले में निचली अदालत में जीतने के बावजूद उन्होंने सेशन कोर्ट में अपने मुवक्किल का मुकदमा लड़ने से इसलिए इंकार कर दिया था कि उसने उन्हें गलत सूचना दी थी, जबकि वह दोषी था।
राजनीति और संपन्नता उन्हें विरासत में मिली थी। उनके नाना बद्री दत्त जोशी तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर सर हेनरी रैमजे के अत्यधिक निकटस्थ सदर अमीन के पद पर कार्यरत थे, और उनके दादा घनानंद पंत टी-स्टेट नौकुचियाताल में मैनेजर थे। कुमाऊं परिषद की स्थापना 1916 में उनके नैनीताल के घर में ही हुई थी। प्रदेश के नया वाद, वनांदोलन, असहयोग व व्यक्तिगत सत्याग्रह सहित तत्कालीन समस्त आंदोलनों में वह शामिल रहे थे। अलबत्ता कुली बेगार आंदोलन में उनका शामिल न होना अनेक सवाल खड़ा करता है। इसी तरह उन्होंने गृह मंत्री रहते देश की आजादी के बाद के पहले राज्य पुर्नगठन संबंधी पानीकर आयोग की रिपोर्ट के खिलाफ जाते हुए हिमांचल प्रदेश को संस्कृति व बोली-भाषा का हवाला देते हुए अलग राज्य बनवा दिया, लेकिन वर्तमान में कुमाऊं आयुक्त अवनेंद्र सिंह नयाल के पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इंद्र सिंह नयाल के इसी तर्ज पर उत्तराखंड को भी अलग राज्य बनाने के प्रस्ताव पर बुरी तरह से यह कहते हुए डपट दिया था कि ऐसा वह अपने जीवन काल में नहीं होने देंगे। आलोचक कहते हैं कि बाद में पंडित नारायण दत्त तिवारी (जिन्होंने भी उत्तराखंड मेरी लाश पर बनेगा कहा था) की तरह वह भी नहीं चाहते थे कि उन्हें एक अपेक्षाकृत बहुत छोटे राज्य के मुख्यमंत्री के बारे में इतिहास में याद किया जाए।  1927 में साइमन कमीशन के विरोध में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू को बचाकर लाठियां खाई थीं। इस पर भी आलोचकों का कहना है कि ऐसा उन्होंने नेहरू के करीब आने और ऊंचा पद प्राप्त करने के लिए किया। 1929 में वारदोली आंदोलन में शामिल होकर महात्मा गांधी के निकटस्थ बनने तथा 1925 में काकोरी कांड के भारतीय आरोपितों के मुकदमे कोर्ट में लड़ने जैसे बड़े कार्यों से भी उनका कद बढ़ा था।

वास्तव में 30 अगस्त है पं. पंत का जन्म दिवस 
नैनीताल। पं. पंत का जन्म दिन हालांकि हर वर्ष 10 सितम्बर को मनाया जाता है, लेकिन वास्तव में उनका जन्म 30 अगस्त 1887 को अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में हुआ था। वह अनंत चतुर्दशी का दिन था। प्रारंभ में वह अंग्रेजी माह के बजाय हर वर्ष अनंत चतुर्दशी को अपना जन्म दिन मनाते थे। 1946 में अनंत चतुर्दशी यानी जन्म दिन के मौके पर ही वह संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री बने थे, यह 10 सितम्बर का दिन था। इसके बाद उन्होंने हर वर्ष 10 सितम्बर को अपना जन्म दिन मनाना प्रारंभ किया।
भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के बारे में और अधिक जानकारी यहाँ भी पढ़ सकते हैं। 
भारत रत्न पण्डित गोविन्द बल्लभ पंत संयुक्त प्रान्त के प्रथम प्रधानमंत्री सन् (१९३७ से १९३९)  मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश ( सन् १९४६ से १९५४),  गृहमंत्री भारत सरकार ( सन् १९५५ से १९६१)पं. गोविन्द बल्लभ पंत का जन्म अल्मोडा के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस परिवार का सम्बन्ध कुमाऊं की एक अत्यन्त प्राचीन और सम्मानित परम्परा से है। पन्तों की इस परम्परा का मूल स्थान महाराष्ट्र में कोंकण प्रदेश माना जाता है और इसके आदि पुरुष माने जाते हैं जयदेव पंत। ऐसी मान्यता है कि ११वीं सदी के आरम्भ में जयदेव पंत तथा उनका परिवार कुमाऊं में आकर बस गया था।     पन्तों की वह शाखा, जिसमें पं० गोविन्द बल्लभ पंत के प्रपितामह श्री कमलाकांत नाथू का जन्म हुआ था, अल्मोडा जिले में गंगोलीहाट के समीप उपराडा, जजूट के निकट बस गई थी। यहां से इनकी एक शाखा खूंट चली गई और एक अन्य शाखा छखाता (भीमताल) को चली गई। कमलाकांत के पांच पुत्र थे १. महादेव, २. दुर्गादत्त, ३. शम्भूबल्लभ, ४. घनानंद ५. प्रेम बल्लभ। इनमें से चौथे पुत्र घनानंद, गोविन्द बल्लभ पंत के पितामह थे।  घनानंद पंत के तीन पुत्र थे १. नरोत्तम, २. मनोरथ ३. हरि।    मनोरथ जी का जन्म १८६८ में हुआ। उनका विवाह १८७८ में अल्मोडा के सदर अमीन श्री बद्रीदत्त जोशी की कन्या से हुआ। बद्रीदत्त जोशी ने अपने दामाद मनोरथ को अल्मोडा बुलाकर कुमाऊं कमिश्नर के विश्वस्त अधिकारी होने की वजह से मनोरथ को अल्मोडा की अदालत में रखवा दिया। जहां कुछ वर्षो वाद वे अहलमद हो गये।१८९० में मनोरथ पंत का स्थानान्तरण जिला गढवाल के पौडी में हो गया। बाद में उनका तबादला काशीपुर हो गया। कुछ समय तक हल्द्वानी में कार्यवाहक नायब तहसीलदार के पद पर भी कार्य करने के बाद पुनः काशीपुर आये। उन दिनों पंत जी काशीपुर में वकालत करने लगे थे। १९१३ में मनोरथ जी को हैजा हो जाने से उनका देहान्त हो गया। उस समय उनकी आयु ४५ वर्ष की थी।  यहीं पर १८८७ में बालक गोविन्द बल्लभ का जन्म हुआ। श्री मनोरथ पंत गोविन्द के जन्म से तीन वर्ष के भीतर अपनी पत्नी के साथ पौडी गढवाल चले गये थे। बालक गोविन्द भी कुछ बडा होने पर दो-एक बार पौडी गया परन्तु स्थायी रुप से अल्मोडा में ही रहा जहां उसका लालन-पोषण उसकी मौसी धनीदेवी ने किया। गोविन्द ने १० वर्ष की आयु तक शिक्षा घर पर ही ग्रहण की। १८९७ में गोविन्द को स्थानीय रामजे कालेज में प्राथमिक पाठशाला में दाखिल करा दिया गया और यज्ञोपवीत किया गया। १८९९ में १२ वर्ष की आयु में उनका विवाह पं. बालादत्त जोशी की कन्या गंगा देवी से हो गया, उस समय वह ७वीं क्लास में थे। गोविन्द ने लोअर मिडिल की परीक्षा संस्कृत, गणित, अंग्रेजी विषयों में विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में पास की। गोविन्द इण्टर की परीक्षा पास करने तक यहीं पर रहा। इसके पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा बी.ए. में गणित, राजनीति और अंग्रेजी साहित्य विषय लिए।  इलाहाबाद उस समय भारत की विभूतियां पं० जवाहरलाल नेहरु, पं० मोतीलाल नेहरु, सर तेजबहादुर सप्रु, श्री सतीशचन्द्र बैनर्जी व श्री सुन्दरलाल सरीखों का संगम था तो वहीं विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान प्राध्यापक जैनिग्स, कॉक्स, रेन्डेल, ए.पी. मुकर्जी सरीखे थे। इलाहाबाद में नवयुवक गोविन्द को इन महापुरुषों का सान्निध्य एवं सम्फ मिला तथा इलाहाबाद के जागरुक, व्यापक और राजनैतिक चेतना से भरपूर वातावरण मिला।  गोविन्द के इलाहाबाद पहुंचने के एक महीने बाद ही २० जुलाई, १९०५ को बंगभंग की सरकारी घोषणा होने पर अंग्रेजी शासकों के खिलाफ आर्थिक युद्ध लडने की प्रेरणा दी।          पंत जी की कानून में स्वाभाविक रुचि थी। गर्मियों की छुट्टियों में अल्मोडा जाते थे तो कानून की पुस्तके ले जाते थे तथा खूब अघ्ययन करते थे। १९०९ में गोविन्द बल्लभ पंत को कानून की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम आने पर ”लम्सडैन“ स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।१९१० में गोविन्द बल्लभ पंत ने अल्मोडा से वकालत आरम्भ की। अल्मोडा में एक बार मुकदमें में बहस के दौरान उनकी मजिस्ट्रेट से बहस हो गई। अंग्रेज मजिस्ट्रेट को नये वकील का अधिकारपूर्वक कानून की व्याख्या करना बर्दाश्त नहीं हुआ, गुस्से में बोला- ”मैं तुम्हें अदालत के अन्दर नहीं घुसने दूंगा“ पर बिना हतप्रभ हुए गोविन्द बल्लभ ने तत्काल उत्तर दिया- ”मैं, आज से तुम्हारी अदालत में कदम नहीं रखगा।“      अल्मोडा के बाद पंतजी ने कुछ महीने रानीखेत में वकालत की, पर वह तहसील भी अल्मोडा के मजिस्ट्रेट के अधीन थी। अतः स्वाभिमानी पंत जी वहां से काशीपुर आ गये। उस समय कुमाऊं तथा गढवाल के बहुत बडे भाग के पर्वतीय इलाकों को कपडा तथा खाद्यान्न काशीपुर से ही भेजा जाता था। उन दिनों काशीपुर के मुकदमें एस.डी.एम. (डिप्टी कलक्टर) की कोर्ट में पेश हुआ करते थे। यह अदालत ग्रीष्म काल में ६ महीने नैनीताल व सर्दियों के ६ महीने काशीपुर में। इस प्रकार पंतजी का काशीपुर के बाद नैनीताल से सम्बन्ध जुडा।सन् १९१२-१३ में पंतजी काशीपुर आये उस समय उनके पिता जी रेवेन्यू कलक्टर थे। श्री कुंजबिहारी लाल जो काशीपुर के वयोवृद्ध प्रतिष्ठित नागरिक थे, का मुकदमा पंतजी द्वारा लिये गये सबसे पहले मुकदमों में से एक था। इसकी फीस उन्हें ५ रु० मिली थी।  १९०९ में पंतजी के पहले पुत्र की बीमारी से मृत्यु हो गयी, तथा कुछ समय बाद पत्नी गंगादेवी की भी मृत्यु हो गयी। उस समय उनकी आयु २३ वर्ष की थी। वह गम्भीर व उदासीन रहने लगे तथा समस्त समय कानून व राजनीति में देने लगे। घरवालों के दबाव पर १९१२ में पतजी का दूसरा विवाह अल्मोडा में हुआ। उसके बाद पंतजी काशीपुर आये। पंतजी काशीपुर में सबसे पहले नजकरी में नमकवालों की कोठी में एक साल तक रहे। १९१३ में पंतजी काशीपुर के मौहल्ला खालसा में ३-४ वर्ष तक रहे। अभी नये मकान में आये एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि उनके पिता मनोरथ पंत का देहान्त हो गया। इस बीच एक पुत्र की प्राप्ति हुई पर उसकी कुछ महीनों बाद मृत्यु हो गयी। बच्चे के बाद पत्नि भी १९१४ में स्वर्ग सिधार गई।१९१६ में पंतजी राजकुमार चौबे की बैठक में चले गये। चौबे जी पंतजी के अनन्य मित्रों में से थे। उनके द्वारा दबाव डालने पर पुनःविवाह के लिए राजी होना पडा तथा काशीपुर के ही श्री तारादत्त पाण्डे जी की पुत्री कलादेवी से विवाह हुआ। उस समय पन्तजी की अवस्था ३० वर्ष की थी।          गोविन्द बल्लभ पंत जी का मुकदमा लडने का ढंग निराला था, जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही-सही नहीं बताते या कुछ छिपाते तो पंतजी उनका मुकदमा लेने से इन्कार कर देते थे।काशीपुर में एक बार गोविन्द बल्लभ पंत जी धोती, कुर्ता तथा गाँधी टोपी पहनकर कोर्ट गये। वहां अंग्रेज मजिस्ट्रेट द्वारा आपत्ति करने पर निर्भीकता पूर्वक कहा- मैं कोर्ट से बाहर जा सकता हूं पर यह टोपी नहीं उतार सकता।एक बार एक थानेदार पर घुसखोरी का मुकदमा चला। उसकी ओर से गवाही देने के लिए नैनीताल से पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट मि० ब्रस आये। तो पंतजी ने कोर्ट में उनसे गवाह के कठघरे में खडा होने को कहा तो वह क्रोध म गरम होकर असंगत बाते कह गया। नतीजतन- उसका सारा केस ही खराब हो गया।  पन्त जी की वकालत की काशीपुर में धाक शीघ्र ही जम गई। और उनकी आय ५०० रुपए मासिक से भी अधिक हो गई। पंत जी का राजनीतिक जीवन के बारे में बताते हुए वयोवृद्ध समाजसेवी पं० रामदत्त पंत ने बताया था कि पंत जी के कारण काशीपुर राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों से कुमायूं के अन्य नगरों की अपेक्षा अधिक जागरुक था। अंग्रेज शासकों ने काशीपुर नगर को काली सूची में शामिल कर लिया। पंतजी के नेतृत्व के कारण नौकरशाही काशीपुर को ”गोविन्दगढ“ कहती थी।  १९१४ में काशीपुर में प्रेमसभा की स्थापना पंत जी के प्रयत्नों से ही हुई। ब्रिटिश शासकों को यह भ्रांति हो गई कि समाज सुधार के नाम पर यहां आतंकवादी कार्यो को प्रोत्साहन दिया जाता है। फलस्वरुप इस सभा को उखाडने के अनेक प्रयत्न किये गये पर पंत जी के प्रयत्नों से उनकी नहीं चली। १९१४ में पंत जी के प्रयत्नों से ही उदयराज हिन्दू हाईस्कूल की स्थापना हुई। राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के आरोप में ब्रिटिश सरकार ने इस स्कूल के विरुद्ध डिग्री दायर कर नीलामी के आदेश पारित कर दिये। पंत जी को पता चलने पर उन्होंने चन्दा मांगकर इसको पूरा किया।        १९१६ में पंतजी काशीपुर की नोटीफाइड ऐरिया कमेटी में नामजद किये गये। बाद में कमेटी की शिक्षा समिति के अध्यक्ष बने। कुमायूं में सबसे पहले निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा लागू करने का श्रेय पंतजी को ही है।           पंतजी ने कुमायूं में राष्ट्रीय आन्दोलन को अंहिसा के आधार पर संगठित किया। आरम्भ से ही कुमाऊं के राजनैतिक आन्दोलन का नेतृत्व पंतजी के हाथों में रहा। कुमाऊं में राष्ट्रीय आन्दोलन का आरम्भ कुली उतार, जंगलात आंदोलन, स्वदेशी प्रचार तथा विदेशी कपडों की होली व लगान-बंदी आदि से  हुआ। बाद में धीरे-धीरे कांग्रेस द्वारा घोषित असहयोग आन्दोलन की लहर कुमायूं में छा गयी। १९२६ के बाद यह कांग्रेस में मिल गयी।  दिसम्बर १९२० में कुमाऊं परिषद का वार्षिक अधिवेशन काशीपुर में हुआ। जहां १५० प्रतिनिधियों के ठहरने की व्यवस्था काशीपुर नरेश की कोठी में की गई। पंतजी ने बताया कि परिषद का उद्देश्य कुमाऊं के कष्टों को दूर करना है न कि सरकार से संघर्ष करना। अब पंतजी की वकालत की ख्याति कुमाऊं की परिधि से निकलकर सारे प्रान्त में व्याप्त हो चुकी थी। मित्रों द्वारा हाईकोर्ट में वकालत का सुझाव देने पर उन्होंने कहा- इलाहाबाद वकालत के लिए भले ही अच्छी जगह हो, लेकिन देशसेवा के लिए नैनीताल ही उपयुक्त है। २३ जुलाई, १९२८ को पन्तजी नैनीताल जिला बोर्ड के चैयरमैन चुने गये। १९२०-२१ में चैयरमैन रह चुके थे।  पंत जी के राजनैतिक सिद्धान्त का एक आवश्यक अंग था कि अपने क्षेत्र अथवा जिले की राजनीति की कभी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। जिस प्रकार वृक्ष के वृहदाकार हो जाने पर उसकी जड का महत्व कम नहीं होता उसी प्रकार कार्य क्षेत्र व्यापक हो जाने पर व्यक्ति को स्थानीय राजनीति में सक्रिय भाग लेना चाहिए तथा वहां की समस्याओं को हल करने का पूरा प्रयास करना चाहिए। महात्मा गांधी जी की कुमायूं यात्रा वहां के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का उज्जवल अध्याय है। १९२९ में गांधी जी कोसानी से रामनगर होते हुए काशीपुर भी गये। काशीपुर में गांधी जी लाला नानकचन्द खत्री के बाग में ठहरे थे। एक सजी हुई बैलगाडी में, जिसके पीछे एक विशाल जुलूस था,  गाँधी जी बैठे थे। काशीपुर में गाँधी जी को दो हजार रुपये तथा कुछ स्वर्णाभूषण प्राप्त हुए। काशीपुर से रवाना होने से पूर्व गांधी जी ने गोविन्द बल्लभ पंत से पूछा कि दान में प्राप्त धनराशि का वहां की जनता के लिए क्या उपयोग किया जा सकता है तो पंत जी ने काशीपुर में एक चरखा संघ की स्थापना का सुझाव दिया, जिसकी बाद में विधिवत स्थापना हुई।  १० अगस्त, १९३१ को भवाली में उनके सुपुत्र श्रीकृष्ण चन्द्र पंत का जन्म हुआ।नवम्बर, १९३४ में गोविन्द बल्लभ पंत रुहेलखण्ड-कुमाऊं क्षेत्र से केन्द्रीय विधान सभा के लिए निर्विरोध चुन लिये गये।साम्प्रदायिकता की निन्दा करते हुए पंत जी का कहना था कि ऐसे दंगे हमें अपने लक्ष्य से मीलों दूर फेंक देते हैं। हिन्दू और मुसलमान एक जाति के हैं। उनकी नसों में एक ही खून दौड रहा है। धर्मान्धता हमारे उद्देश्य में भारी अटकाव है।१७ जुलाई, १९३७ को गोविन्द बल्लभ पंत संयुक्त प्रान्त के प्रथम मुख्यमंत्री बने। जिसमें नारायण दत्त तिवारी संसदीय सचिव नियुक्त किये गये थे।स्वतंत्रता के पुनीत अवसर पर गोविन्द बल्लभ पंत द्वारा दिया गया सन्देशः-मित्रों और साथियों, इस ऐतिहासिक अवसर पर आप लोगों के प्रति हार्दिक शुभकामनाएं प्रक करते हुए मुझे हर्ष होता है। हम अपनी मंजिल पर पहुंच चुके हैं। हमें अपना लक्ष्य मिल गया है। भारतीय संघ के स्वतंत्र राज्य में मैं आपका स्वागत करता हूं। जनता के प्रतिनिधि राज्य और उसकी विभिन्न शाखाओं का नियंत्रण और संचालन करेगें और जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार केवल सिद्धान्त नहीं रहेगा वरन अब वह सब प्रकार से सक्रिय रुप धारण करेगा और सभी मानों में यह सिद्धान्त व्यवहार में लाया जाएगा। पन्त जी १९४६ से दिसम्बर १९५४ तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। पंतजी को भूमि सुधारों में पर्याप्त रुचि थी। २१ मई, १९५२ को जमींदारी उन्मूलन कानून को प्रभावी बनाया।मुख्यमंत्री के रुप में उनकी विशाल योजना नैनीताल तराई को आबाद करने की थी। जून १९५० के अन्त तक १४,००० एकड भूमि को कृषि योग्य बना दिया गया था। ६९३ विस्थापित व्यक्तियों, ५०४ राजनीतिक पीडतों तथा ७५ भूतपूर्व सैनिकों को भूमि दी गई। ३३ गांव बसाये गये। ४५० किलोवाट क्षमता वाले एक बिजली घर की स्थापना की गई। रामपुर तथा बाजपुर और काशीपुर को मिलाने वाली सडके बनाई गई। रुद्रपुर नगर का विकास किया गया। पूर्वी बंगाल से आये  हुए ३०० विस्थापित परिवारों को बसाया गया। तराई में गन्ने की खेती का विकास किया गया। १६ नये गांव बसाये गये। हल्द्वानी व नैनीताल नगर को दूध       उपलब्ध कराने हेतु डेरी फार्म की स्थापना की गई। सोलह हजार एकड का राजकीय फार्म बनाया गया। जी.बी. पंत कृषि विश्वविद्यालय, व हवाई अड्डा उन्हीं की देन है। एक हजार एकड भूमि पर बाग लगाये गये। वन रोपण का काम भी चलवाया। इस तरह पंत जी एक विद्वान कानून ज्ञाता होने के साथ ही महान नेता व महान अर्थशास्त्री भी थे। कृष्णचन्द्र पंत उनके   पुत्र  केन्द्र सरकार में विभिन्न पदों पर रहते हुए  योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे।
पंत जी को था अपनी माटी से अगाध प्रेम [

 नैनीताल (एसएनबी)। कहते है व्यक्ति वही बड़ा होता है, जो बड़ा होने के बावजूद अपनी मिट्टी से जुड़ा होता है। भारत र} पंडित गोविंद वल्लभ पंत ऐसे ही महान व विरले व्यक्तित्वों में से एक थे। उत्तर प्रांत के प्रथम प्रधानमंत्री (1937 से 1939), उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1946 से 1954) एवं देश के गृहमंत्री (1955 से 1961) रहने वाले पं पंत को आज उनके देश के लिए किये गए कायां के लिए तो देश याद कर ही रहा है लेकिन उनकी अपनी मिट्टी के लिए किए गए कार्यो की श्रृंखला भी बेहद लंबी है। पं. पंत 1905 में अल्मोड़ा के रैमजे इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इलाहाबाद चले गए थे। यहां इलाहाबाद विवि में पंडित मोती लाल नेहरू, पं. जवाहर लाल नेहरू, सर तेज बहादुर स्प्रू आदि से सान्निध्य में उन्हें राजनीतिक चेतना का माहौल मिला। लिहाजा इलाहाबाद पहुंचने के एक माह बाद ही 20 जुलाई 1905 को वह अंग्रेजांे के खिलाफ लड़ने को खड़े हो गए। इस बीच वह गर्मियों में समय निकाल अल्मोड़ा जरूर आते थे और 1910 में उन्होंने इलाहाबाद में बड़े संपर्को के बावजूद अल्मोड़ा से ही वकालत प्रारंभ की। बाद में उन्होंने रानीखेत व काशीपुर में भी वकालत की। उनके कारण ही काशीपुर में कुमाऊं के अन्य अंचलों के बजाय आजादी की ज्वाला अधिक प्रज्वलित रही। तब कुमाऊं में नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा लागू करने का उन्हें श्रेय मिला। उन्होंने कुमाऊं में राट्रीय आंदोलनों को अहिंसा के आधार पर संगठित किया। वह कुमाऊं परिषद के भी सहयोगी रहे। राजनीतिक रूप से उनका काफी प्रभाव था, फलस्वरूप 1934 में वह रुहेलखंड कुमाऊं क्षेत्र से केंद्रीय विधानसभा के लिए निर्विरोध चुने गए। 1950 में उन्होंने बतौर उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री नैनीताल जिले के तराई क्षेत्र में 14 हजार एकड़ भूमि को कृषि योग्य बनाकर 693 विस्थापितों, 504 राजनीतिक पीड़ितों व 75 भूतपूर्व सैनिकों के 33 गांव बसाए। 450 किलोवाट क्षमता के बिजलीघर की स्थापना हुई। रामपुर से बाजपुर व काशीपुर को जोड़ने वाली सड़क बनाई। रुद्रपुर में पूर्वी बंगाल से आये तीन सौ विस्थापितों को बसाया। हल्द्वानी व नैनीताल को दूध की आपूर्ति के लिए डेयरी फार्म स्थापित किया। 16 हजार एकड़ पर राजकीय कृषि फार्म बनवाया। पंतनगर स्थित उनके नाम का पंत विवि भी उन्हीं के योगदान से बना और एक हजार एकड़ में बाग लगाए गए। हाईकोर्ट छोड़ जिले में करते थे बैरिस्टरी तराई को विकसित कर रहने योग्य बनाया

 comments:
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

2 thoughts on “गोविंद बल्लभ पंत : हिमालय सा व्यक्तित्व और दिल में बसता था पहाड़

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