कुमाऊं का लोक पर्व ही नहीं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक ऋतु पर्व भी है घुघुतिया-उत्तरायणी, रक्तहीन क्रांति का गवाह भी रहा है यह दिन

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  • 1921 में इसी त्योहार के दौरान बागेश्वर में हुई प्रदेश की अनूठी रक्तहीन क्रांति, कुली बेगार प्रथा से मिली थी निजात
  • घुघुतिया के नाम से है पहचान, काले कौआ कह कर न्यौते जाते हैं कौए और परोसे जाते हैं पकवान

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डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल (Ghughutiya-Uttarayani)। दुनिया को रोशनी के साथ ऊष्मा और ऊर्जा के रूप में जीवन देने के कारण साक्षात देवता कहे जाने वाले सूर्यदेव के धनु से मकर राशि में यानी दक्षिणी से उत्तरी गोलार्ध में आने का उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाने वाला पर्व पूरे देश में अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। पूर्वी भारत में यह बीहू, पश्चिमी भारत (पंजाब) में लोहणी और दक्षिणी भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु आदि) में पोंगल तथा देवभूमि उत्तराखंड में यह घुघुतिया और उत्तरायणी के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के लिए यह न केवल लोक पर्व, वरन मौसम परिवर्तन के लिहाज से एक बड़ा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ऋतु पर्व भी है।

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उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मकर संक्रांति यानी उत्तरायणी को लोक सांस्कृतिक पर्व घुघुतिया के रूप में मनाए जाने की विशिष्ट परंपरा रही है। इसी दिन यानी 14 जनवरी 1921 को इसी त्योहार के दिन हुए एक बड़े घटनाक्रम को कुमाऊं और उत्तराखंड प्रदेश की ‘रक्तहीन क्रांति” की संज्ञा दी जाती है, इस दिन कुमाऊं परिषद के अगुवा कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने कुमाऊं की काशी कहे जाने वाले बागेश्वर के ‘सरयू बगड़” (सरयू नदी के किनारे) में सरयू नदी का जल हाथों में लेकर बेहद दमनकारी गोर्खा और अंग्रेजी राज के करीब एक सदी पुराने कुली बेगार नाम के काले कानून संबंधी दस्तावेजों को नदी में बहाकर हमेशा के लिए तोड़ डाला था।

(Ghughutiya-Uttarayani कुमाऊं का ऋतु पर्व ही नहीं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक लोक पर्व भी है घुघुतिया- उत्तरायणी – यह नवीन समाचार का पुराना संस्करण है, नया संस्करण http://www ...यह परंपरा बागेश्वर में अब भी राजनीतिक दलों के सरयू बगड़ में पंडाल लगने और राजनीतिक हुंकार भरने के रूप में कायम है। इस त्योहार से कुमाऊं के लोकप्रिय कत्यूरी शासकों की एक अन्य परंपरा भी जुड़ी हुई है, जिसके तहत आज भी कत्यूरी राजाओं के वंशज नैनीताल जिले के रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर उत्तरायणी के दिन रानी जिया का जागर लगाकर उनका आह्वान व परंपरागत पूजा-अर्चना करते हैं।

पहली बार देखें रानीबाग में उत्तरायणी पर कत्यूरी वंशजों द्वारा किया जाने वाला जियारानी का जागर :

कत्यूर व चंद शासन काल तथा भगवान राम भी से जुड़ी है घुघुती व मकर संक्रांति मनाने की परंपरा

घुघुतिया की प्राचीन लोककथा

कुमाऊं के लोक पर्व घुघुतिया त्यौहार का महत्व एवं लोक कथा -  Devbhoomisamvad.comबहुत पुराने समय की बात है। कुमाऊँ की पहाड़ियों में चन्द्र वंश का शासन हुआ करता था। उन्हीं राजाओं में एक थे राजा कल्याण चंद। उनका राज्य समृद्ध था, प्रजा सुखी थी, लेकिन राजा के जीवन में एक गहरी पीड़ा थी—उनकी कोई संतान नहीं थी। वर्षों बीत गये, पर महल की देहरी पर किलकारी नहीं गूंजी।

राजा कल्याण चंद प्रतिदिन ईश्वर से संतान की कामना करते थे। एक दिन वे बाघनाथ के पवित्र मंदिर पहुंचे और वहां मन से प्रार्थना की। कहा जाता है कि भगवान बाघनाथ ने उनकी तपस्या स्वीकार की और कुछ समय बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पूरे राज्य में उत्सव का वातावरण छा गया। उस बालक का नाम रखा गया—निर्भयचंद।

निर्भयचंद अत्यंत सुंदर, चंचल और हंसमुख था। उसकी माता उसे प्यार से “घुघुती” कहकर बुलाती थीं। घुघुती के गले में मोतियों की एक माला रहती थी, जिसमें छोटे-छोटे घुंघरू लगे थे। जब वह चलता, तो माला की मधुर झंकार गूंज उठती। यह माला उसे बहुत प्रिय थी।

जब घुघुती किसी बात पर जिद करता, तो उसकी मां हंसी में कहती,
“जिद मत कर, नहीं तो तेरी माला कौवे को दे दूंगी।”
फिर उसे डराने के लिए वह कहती,
“काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले।”

घुघुतिया त्यौहार की कहानी : कुमाऊं के लोक पर्व घुघुतिया की लोक कथा |  देवभूमि दर्शनयह सुनते ही आसपास बैठे कौवे कांव-कांव करते हुए पास आ जाते। कौवों को देखकर घुघुती डर जाता और जिद छोड़ देता। मां कौवों को कुछ खाने को दे देती। धीरे-धीरे यह सिलसिला रोज़ का हो गया और घुघुती की कौवों से गहरी मित्रता हो गई। कौवे भी उसे पहचानने लगे।

इधर महल में एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसके मन में ईर्ष्या और लालच पल रहा था। वह राजा का मंत्री था। राजा के निःसंतान रहने तक उसे यह विश्वास था कि आगे चलकर वही राजगद्दी का अधिकारी बनेगा, लेकिन घुघुती के जन्म के साथ उसके सपने टूट गए। अब मंत्री के मन में केवल एक ही विचार था—किसी तरह बालक को रास्ते से हटाया जाए।

एक दिन मंत्री ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा। मौका पाकर वे घुघुती को चुपके से उठाकर जंगल की ओर ले चले। तभी एक कौवे ने यह दृश्य देख लिया। वह जोर-जोर से कांव-कांव करने लगा। अपने मित्र कौवे की आवाज सुनकर घुघुती भी रोने लगा और घबराहट में अपनी माला उतारकर दिखाने लगा।

धीरे-धीरे कई कौवे इकट्ठा हो गए। उनमें से एक कौवा घुघुती के हाथ से माला उठाकर उड़ गया और बाकी कौवों ने मंत्री और उसके साथियों पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले से घबराकर वे सभी भाग खड़े हुए।

घुघुती जंगल में अकेला रह गया। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और रोते-रोते थककर सो गया। सभी कौवे उसी पेड़ पर बैठकर उसकी रखवाली करने लगे।

इधर माला लेकर उड़ने वाला कौवा सीधा महल पहुंचा और एक पेड़ की डाल पर माला टांगकर जोर-जोर से कांव-कांव करने लगा। घुघुती की मां ने जैसे ही माला देखी, उसका हृदय कांप उठा। राजा को तुरंत सूचना दी गई। कौवा एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उड़ता रहा और राजा अपने सैनिकों के साथ उसका पीछा करते रहे।

अंततः कौवा जिस पेड़ पर जाकर रुका, उसके नीचे राजा ने अपने पुत्र घुघुती को सुरक्षित सोया हुआ पाया। राजा उसे गोद में उठाकर महल ले आए। बाद में मंत्री और उसके साथियों को उनके अपराध के लिए दंड दिया गया।

घुघुती के सकुशल लौटने की खुशी में महल में उत्सव मनाया गया। मां ने अनेक पकवान बनाए और घुघुती ने अपने मित्र कौवों को बुलाकर उन्हें खिलाया। यह घटना धीरे-धीरे पूरे कुमाऊँ में फैल गई और बच्चों के लोकपर्व का रूप ले गई। तब से हर वर्ष उत्तरायणी के दिन बच्चे गले में घुघुती की माला पहनकर कौवों को बुलाते हैं और गूंज उठता है— “काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले।”

आज भी यह परंपरा कुमाऊँ की घाटियों में जीवित है और यह पर्व मासूम दोस्ती, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और लोकविश्वास का सुंदर प्रतीक माना जाता है।

तभी से कुमाऊं में घुघुतिया के दिन आटे में गुड़ मिलाकर पक्षी की तरह के घुघुती कहे जाने वाले और पूड़ी नुमा ढाल, तलवार, डमरू, अनार आदि के आकार के स्वादिष्ट पकवानों से घुघुतिया माला तैयार करने और कौओं को पुकारने की प्रथा प्रचलित है। बच्चे उत्तरायणी के दिन गले में घुघुतों की माला डालकर कौओं को ‘काले कौआ काले घुघुति माला खाले, ले कौआ पूरी, मकें दे सुनकि छुरी, ले कौआ ढाल, मकें दे सुनक थाल, ले कौआ बड़, मकें दे सुनल घड़़…” आदि पुकार कर कौओं को आकर्षित करते हैं, और प्रसाद स्वरूप स्वयं भी घुघुते ग्रहण करते हैं।

कौओं को बुलाने और पकवान खिलाने की परंपरा सीता माता से भी जोड़ी जाती है।

कौओं को इस तरह बुलाने और पकवान खिलाने की परंपरा त्रेता युग में भगवान श्रीराम की पत्नी सीता से भी जोड़ी जाती है।  कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र का पुत्र जयेंद्र सीता के रूप-सौंदर्य पर मोहित होकर कौए के वेश में उनके करीब जाता है। राम कुश (एक प्रकार की नुकीली घास) के एक तिनके से जयेंद्र की दांयी आंख पर प्रहार कर डालते हैं, जिससे कौओं की एक आंख हमेशा के लिए खराब हो जाती है।

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बाद में राम ने ही कौओं को प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान कर पश्चाताप करने का उपाय सुझाया था। इसके साथ ही इस दिन रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर कत्यूर वंश की महारानी जियारानी को याद किया जाता है, इस तरह इसका कत्यूर राजशाही से सम्बन्ध भी दिखता है, और उत्तरायणी हरेला की तरह कुमाऊं का प्रकृति व पर्यावरण से जुड़ा एक और त्योहार भी है।

सूर्य उपासना का पर्व भी है उत्तरायणी

नैनीताल। कुमाऊं में उत्तरायणी के दिन लोग सरयू, रामगंगा, काली, गोरी व गार्गी (गौला) आदि नदियों में कड़ाके की सर्दी के बावजूद सुबह स्नान-ध्यान कर सूर्य का अर्घ्य चढ़ाकर सूर्य आराधना करते हैं, जो इस त्योहार के कुमाऊं के भी देश भर के छठ सरीखे त्योहारों की की तरह सूर्य उपासना से जु़ड़े होने का प्रमाण है। तत्कालीन राज व्यवस्था के कारण कुमाऊं में इस पर्व को सरयू नदी के पार और वार अलग-अलग दिनों में मनाने की परंपरा है।

सरयू पार के लोग पौष मासांत के दिन घुघुते तैयार करते हैं, और अगले दिन कौओं को चढ़ाते हैं। जबकि वार के लोग माघ मास की सक्रांति यानि एक दिन बाद पकवान तैयार करते हैं, और अगले दिन कौओं को आमंत्रित करते हुए यह पर्व मनाते हैं।

कत्यूरी राजवंश की महारानी जियारानी रहीं थी रानीबाग में

हल्द्वानी। कत्यूरी राजवंश चंद्र राजवंश से पहले का था। कुमाऊं में सूर्यवंशी कत्यूरियों का आगमन सातवीं सदी में अयोध्या से हुआ। इतिहासकार इन्हें अयोध्या के सूर्यवंशी राजवंश शालीवान का संबंधी मानते हैं। इनका पहला राजा वासुदेव था। सबसे पहले वह बैजनाथ आया। इनका शासन उत्तराखंड से लेकर नेपाल तक फैला था। द्वाराहाट, जागेश्वर, बैजनाथ आदि स्थानों के मंदिर कत्यूरी राजाओं ने ही बनाए हैं। 47वें कत्यूरी राजा प्रीतम देव की महारानी ही जियारानी थी। प्रीतम देव को पिथौराशाही नाम से भी जाना जाता है। जिनके नाम पर पिथौरागढ़ नगर का नाम पड़ा।

जियारानी का असल नाम मौला देवी था जो हरिद्वार के राजा अमर देव पुंडीर की दूसरी बेटी थी। अमर देव की पहली बेटी की शादी प्रीतम देव से हुई थी। 1398 में जब समरकंद का शासक तैमूर लंग मेरठ को लूटने के बाद हरिद्वार की ओर बढ़ रहा था, तब अमर देव ने राज्य की रक्षा के लिए प्रीतम देव से मदद मांगी। प्रीतम देव ने अपने भतीजे ब्रह्मदेव के नेतृत्व में विशाल सेना हरिद्वार भेजी, जिसने तैमूर की सेना को हरिद्वार आने से रोक दिया। इस दौरान ब्रह्मदेव की मुलाकात मौला देवी से हुई और वह उससे प्रेम करने लगा। अमर देव को यह पसंद नहीं आया।

उसने मौला की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी प्रीतम देव से कर दी। मौला देवी को विवाह स्वीकार नहीं था। कुछ दिन राजा के साथ चौखुटिया में रहने के बाद वह नाराज होकर रानीबाग एकांतवाश के लिए आ गईं। माना जाता है कि वो यहां 12 साल तक रही। उसने सनेना की एक छोटी टुकड़ी गठित की और यहां फलों का विशाल बाग लगाया। इसी वजह से इस स्थल का नाम रानीबाग पड़ गया। एक बार रानी गौला नदी में नहा रही थी। उसके लंबे सुनहरे बाल नदी में बहते हुए आगे रोहिल्ला सिपाहियों को मिले। उन्होंने सुनहरे बाल वाली महिला की खोज शुरू की।

उनकी नजर नहाते हुए रानी पर पड़ी। सैनिकों से बचने के लिए रानी पहाड़ी पर स्थित गुफा में छिप गई। रानी की सेना रोहिल्लों से हार गई और रानी को गिरफ्तार कर लिया गया। जब इसकी सूचना प्रीतम देव को मिली तो उसने अपनी सेना भेजकर रानी को छुड़ाया और अपने साथ ले गया। कुछ समय बाद प्रीतम देव का देहांत हो गया। उनका पुत्र दुला शाही बहुत छोटा था। इसलिए मौला देवी ने दुला शाही के संरक्षक के रूप में राज्य का शासन किया। पहाड़ में मां को जिया भी कहा जाता है। चूंकि मौला देवी राजमाता थीं, इसलिए वो जियारानी कहलाईं। रानीबाग में जियारानी की गुफा दर्शनीय है।

इसलिये बहुत खास है रानीबाग

नैनीताल। बैठक के दौरान बताया गया कि रानीबाग की अत्यधिक प्राचीन धार्मिक मान्यता रही है। कत्यूरी रानी जिया रानी के जरिये यह प्रदेश के दोनों मंडलों को जोड़ता है। यहां एक वर्ष आने वाले कत्यूरी वंशज अगले वर्ष हरिद्वार जाते हैं। हरिद्वार के मायापुरी की तरह इस स्थान का प्राचीन नाम मायापुरी घाट रहा है। चूंकि कत्यूरी वंश की राजधानी गढ़वाल के जोशीमठ और कुमाऊं के बैजनाथ रही, इसलिए दोनों मंडलों के श्रद्धालु समान रूप से यहां आते हैं। ऋर्षि मार्कंडेय के साथ ही सप्त ऋषियों में शामिल महाप्रतापी रावण के पितामह पुलस्त्य, अत्रि एवं पुलह (जिन्होंने मानसरोवर का आह्वान कर नैनीताल के सरोवर की रचना की थी) के साथ ही आदि गुरु शंकराचार्य का भी यह स्थान तपस्थली रहा है। 

नदी के किनारे एक विचित्र रंग की शिला है। जिसे चित्रशिला कहा जाता है। कहा जाता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। पुराणों के अनुसार नदी किनारे वट वृक्ष की छाया में ब्रह्मर्षि ने एक पांव पर खड़े होकर, दोनों हाथ ऊपर कर विष्णु ने विश्वकर्मा को बुलाकर इस रंगबिरंगी अद्भुत शिला का निर्माण करवाया और उस पर बैठकर ऋषि को वरदान दिया। कुछ लोग इस शिला को जियारानी का घाघरा भी कहते हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 15 जनवरी 2019। ‘जय जिया जय जिया’ के उदघोषों सोमवार यानी मकर संक्रांति की पहली रात रानीबाग स्थित चित्रेश्वर घाट में गुंजायमान रही। इस दौरान रानीबाग में कत्यूरी राजाओं के वंशजों के जत्थे उमड़ते रहे और कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना गौला नदी में डुबकी लगाते और जिया रानी के गीत ‘जिया रानी भूल नी सकना तेरो बलिदान, देखी ना तेरी जैसी भली बाना, जिया जैसी महाना, मेरी जिया रानी तेरी जय जय कारा’ आदि गाते और देव जागर में महिलाएं जिया रानी तथा पुरुष नृसिंह व ब्रह्मदेव के अवतार में झूमते नाचते रहे।

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इस दौरान रानीबाग में आस्था और उत्तराखंड की पुरातन प्राचीन संस्कृति जैसे पूरी तरह छाई रही, और पूरी रात अलौकिक दृश्य दृश्यमान रहे। इसके साथ ही रानीबाग में गौला नदी के तट पर श्रद्धालुओं का जबरदस्त मेला लग गया है लोग सुबह से ही आस्था की डुबकियां लगा रहे हैं।

इससे पूर्व जनपद के चित्रेश्वर महादेव स्थित रानीबाग धाम में सदियों से आने वाले कत्यूर शासकों के वंशजो का सोमवार को पहली बार यहां पहुंचने पर स्वागत-अभिनंदन किया गया। इससे अभिभूत इतिहास के इन जीवंत स्वरूपों की थकान जाती रही।एक दर्जन से अधिक जत्थो में पहुंचे सैकड़ों सदस्यों का पहली बार यहां आयोजित ‘कत्यूरी मिलन समारोह’ मंे फूल माला पहनाकर तथा नारियल एवं प्रसाद भेंट कर अभिनंदन किया गया।

इसके उपरांत रात भर वंशजों के द्वारा अपने देव डंगरियों के माध्यम से अपनी कुल देवी माता जिया रानी का उनकी गुफा एवं इसके आसपास देव जागर के जरिये आवाहन एवं पूजन एवं कड़कड़ाती ठंड में पुरातन पुष्पभद्रा, गार्गी व वर्तमान में गौला नाम से जानी जाने वाली पुण्यप्रदाता नदी में स्नान-ध्यान एवं पूजा-अर्चना के कार्यक्रम विधिवत आयोजन हुए। स्थानीय विधायक बंशीधर भगत सहित कई स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी इस मौके पर उपस्थित होकर पुण्य के भागी बने।

Katyuri Milan
कत्यूरी मिलन समारोह में कत्यूरी वंशजों का फूल माला पहना कर अभिनन्दन करते विधायक व पूर्व मंत्री बंशीधर भगत

कार्यक्रम के आयोजकों की ओर से बताया कि सदियों से अपनी धार्मिक आस्था के तहत मकर संक्रांति पर रानीबाग आ रहे कत्यूरी वंशजों एवं देव दंगरियों का पहली बार स्वागत-अभिनंदन एवं पंजीकरण कर अध्ययन तथा “वे कहां, किन गांवों से तथा किन मान्यताओं के साथ आते हैं”, इसका डॉक्यूमेंटेशन किया जा रहा है। नगर निगम एवं प्रशासन की मदद से उनकी सुविधा के लिए रानीबाग मेला परिक्षेत्र में शौचालय, अलाव व सुरक्षा आदि की व्यवस्थाओं को बीते वर्षों से बेहतर करने के प्रयास भी किये गये हैं।

साथ ही नगर के महापौर, स्थानीय विधायक, सांसद एवं राज्य के पर्यटन मंत्री आदि के माध्यम से रानीबाग को धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग पर केंद्र सरकार को एक व्यापक प्रस्ताव तैयार कर भेजा जा रहा है। आयोजन में मुख्य मंदिर के पुजारी नंदन गिरि गोस्वामी, कमल गिरि गोस्वामी, शनि मंदिर के व्यवस्थापक नरेश गुप्ता, स्थानीय ग्राम प्रधान आनंद कुंजरवाल,

पूर्व जिपं सदस्य संजय साह, भीम सिंह राणा, भाजपा नेता डा. अनिल कपूर डब्बू, कार्यक्रम संयोजक नारायण लाल चौधरी, कैलाश जोशी, नवीन जोशी, डा. एमपी जोशी, संजय बल्यूटिया, उद्योग भारती पांडे, दामोदर जोशी ‘देवांशु’, पंकज खत्री व डा. सुरेश टम्टा, रामीबन गोस्वामी आदि लोग जुटे रहे।

यहां से पहुंचे कत्यूरी वंशजों के जत्थे

नैनीताल। रानीबाग में जियारानी की पूजा-उपासना के लिए रानीखेत, द्वाराहाट, भिकियासैंण, लमगड़ा, बासोट (भिकियासैंण), धूमाकोट, रामनगर, चौखुटिया, पौड़ी आदि इलाकों से कत्यूरी वंशज बसों में भरकर रानीबाग पहुंचे। इसके अलावा हल्द्वानी के शीशमहल से रमेश तिवारी सहित चार स्थानीय जत्थे भी इस परंपरागत आयोजन में शामिल हुए। उन्होेंने गार्गी नदी में स्नान करने के बाद जियारानी की गुफा में पूजा की और रात्रि में जागर लगाया, तथा कुल देवी से कष्टों के निवारण के लिए मनौती मांगी।

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मकर संक्रांति पर रानीबाग में होगा कत्यूर मिलन, धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की उठेगी मांग

Katyur milan 2019
बैठक में उपस्थित लोग।

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, हल्द्वानी, 9 जनवरी 2019। आगामी मकर संक्रांति के अवसर पर नंदा राज जात की तरह ही प्रदेश के गढ़वाल व कुमाऊं दोनों मंडलों की साझा धार्मिक आस्था के केंद्र, पुष्यभद्रा एवं गार्गी (गौला) नदी के तट पर बसे रानीबाग-चित्रशिला घाट रानीबाग में ‘कत्यूर मिलन-2019’ कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इस मौके पर आने वाले कत्यूरी शासकों के वंशजों एवं उनके देव डंगरियों का रानीबाग में अध्ययन किया जाएगा, एवं रानीबाग को प्रदेश का धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग बुलंद की जाएगी।

बुधवार को देर शाम हल्द्वानी के नैनीताल रोड स्थित एक बैंंक्वेट हॉल में आयोजित एक बैठक में ‘कत्यूर मिलन-2019’ कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गयी। तय हुआ कि नगर निगम हल्द्वानी एवं सभी संबंधित पक्षों, कत्यूरी संस्थाओं एवं मंदिर के पुजारियों एवं स्थानीय संगठनों आदि के सहयोग से मकर संक्रांति के अवसर पर 13 जनवरी को अपराह्न 4 बजे से रानीबाग में एक विशेष कार्यक्रम रखा जाएगा। कार्यक्रम के तहत सदियों से मकर संक्रांति पर रानीबाग आ रहे कत्यूरी वंशजों एवं देव डंगरियों का अध्ययन किया जाएगा, साथ ही वे कहां, किन गांवों से तथा किन मान्यताओं के साथ आते हैं, इसका डॉक्यूमेंटेशन किया जाएगा।

इससे पूर्व उनकी सुविधा के लिए रानीबाग मेला परिक्षेत्र में शौचालय, अलाव व सुरक्षा आदि की व्यवस्थाओं के लिए पुलिस एवं नगर निगम प्रशासन से मिलकर सहयोग लिया जाएगा। साथ ही कोशिश होगी कि मकर संक्रांति के दि नही नगर के महापौर, स्थानीय विधायक, सांसद एवं राज्य के पर्यटन मंत्री आदि को साथ लेकर रानीबाग को धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग पर केंद्र सरकार को एक व्यापक प्रस्ताव तैयार कर भेजा जाए। इस दौरान आयोजन के संयोजन की जिम्मेदारी बैठक में मौजूद रहे नारायण लाल चौधरी को, कत्यूरी वंशजों के स्वागत व पंजीकरण की जिम्मेदारी कैलाश जोशी एवं मीडिया संयोजन की जिम्मेदारी नवीन जोशी को दी गयी। बैठक में इतिहासकार डा. एमपी जोशी, संजय बल्यूटिया, उद्योग भारती पांडे, दामोदर जोशी ‘देवांशु’, पंकज खत्री व डा. सुरेश टम्टा आदि लोग भी शामिल रहे।

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