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अजय भट्ट ने गैरसेंण व उत्तराखंड की राजधानी को लेकर भाजपा सरकार की मंशा पर किया ‘बड़ा’ खुलासा

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नैनीताल, 8 जून 2018। केंद्र एवं राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने गैरसेंण-चंद्रनगर के बारे में उत्तराखंड की राजधानी के बाबत भाजपा सरकार की मंशा पर बड़ा खुलासा किया है। नैनीताल क्लब के राज्य अतिथि गृह में पत्रकारों से बात करते हुए भट्ट ने कहा कि भाजपा सरकार साफ तौर पर पहले गैरसेंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने जा रही है। इसके लिए भी अभी वहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। वहां विधानभवन तैयार हो गया है, परंतु यहां आयोजित होने वाले विधानसभा सत्र के लिए ही तैनात होने वाले कर्मचारियों के लिए आवास नहीं हैं। कर्मचारियों को ग्रामीणों के घरों में शरण लेनी पड़ती है। साथ ही पानी की भारी समस्या है। बीते सत्र में तैनात 1000 पुलिस के जवान पानी के लिए परेशान रहे, जबकि कई को गाड़ियों में सोना पड़ा। पानी व आवास जैसी इन मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराने के बाद सरकार ‘जनभावनाओं के अनुरूप’, जिस स्वरूप में जनता चाहेगी, वैसे गैरसेंण को राजधानी बनाने पर निर्णय लेगी। साथ ही उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस इस बारे में जो कुछ भी कहती है, सदन के बाहर कहती है। सदन के भीतर कांग्रेस ने अब तक गैरसेंण पर अपना रुख साफ नहीं किया है।

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गैरसैंण के ऐतिहासिक सत्र में राजधानी के बाबत ऐतिहासिक घोषणा तय थी !

गैरसैंण में पहली बार राज्यपाल के अभिभाषण के साथ 20 मार्च 2018 से शुरू होने जा रहे ऐतिहासिक बज़ट सत्र में गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने का ऐतिहासिक एलान हो सकता था। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार भाजपा सरकार के स्तर पर ऐसा फैसला कर लिया था, और सरकार इसकी घोषणा के लिये उपयुक्त मौका देख रही थी। किन्तु आखिरी समय में इस मुद्दे पर विस सत्र से पूर्व उक्रांद के राज्य आन्दोलाकारियों के आंदोलन को अपने नेतृत्व में दिखाकर इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश को देखते हुए सरकार घोषणा करने से हिचक गयी।

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उत्तराखंड की राजधानी के बाबत पहले से कौशिक समिति की सिफारिशें होने के बावजूद उत्तराखंड राज्य बनने के बाद मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की अगुवाई वाली भाजपा की अंतरिम सरकार ने न्यायमूर्ति वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में राजधानी स्थल चयन आयोग का गठन किया था, जिसे 2002 में राज्य की पहली निर्वाचित नारायण दत्त तिवारी की सरकार ने भी जारी रखा। छह माह के लिए गठित आयोग ने आठ साल बाद बमुश्किल 2008 में चार चरणों में अपनी रिपोर्ट दी, और 2009 में इसे सदन के पटल पर रखा गया। इधर राज्य में गैरसेंण को राजधानी घोषित करने के मुद्दे पर एक बार पुनः मुखर हो रहे स्वरों और राज्य सरकार की गैरसेंण में निर्मित विधानसभा में पहली बार बजट सत्र आयोजित करने की तैयारियों के बीच यूपी के इटावा जिले के मूल निवासी न्यायमूर्ति दीक्षित की गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में मौत होने की खबर आई है, जिसके बाद रविवार 5 मार्च 2018 को उनका हरिद्वार के कनखल में उनका अंतिम संस्कार किया गया। एक न्यायाधीश के तौर पर न्यायमूर्ति दीक्षित ने जगदंबिका पाल को यूपी का एक दिन का मुख्यमंत्री न मानने वाला ऐतिहासिक फैसला भी सुनाया था। दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देने के साथ अनायास ही उनकी राजधानी के बाबत आयी अंतरविरोधों से भरी, भ्रामक और झूठे तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट को याद करना भी प्रासंगिक है, जिसमें तथ्यों को तोड़मरोड़ कर गैरसेंण को नकारते हुए देहरादून को ही राजधानी के रूप में स्थापित किये जाने की बात कही गयी थी। दीक्षित आयोग की रिपोर्ट के कुछ बिंदु:
1. दीक्षित आयोग ने अपने रिपोर्ट के पहले ही चरण में गैरसैंण को राजधानी के अयोग्य करार दे दिया था और देहरादून के दो स्थलों को राजधानी के लिए अधिमानी स्थल करार दिया था। गैरसैंण को झुठलाने के लिए दीक्षित आयोग ने बेहद बेहूदे और हास्यास्पद तर्क देते हुए कहा था कि गैरसैंण देश की राजधानी से दूर और चीन सीमा के निकट व असुरक्षित क्षेत्र में है।
2. रिपोर्ट में एक ओर गैरसैंण को पानी के लिए अभावग्रस्त बताया गया, साथ ही इसे बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र भी बताया गया। पास में स्थित पिंडर नदी मानो आयोग को दिखाई नहीं दी। रिपोर्ट में कहा गया कि राजधानी बनने की स्थिति में गैरसैंण के लिए कर्णप्रयाग में अलकनंदा से पानी लिफ्ट करना पड़ेगा, जो काफी खर्चीला साबित होगा।
3. आयोग ने एक शोध छात्रा अर्जिता बंसल की कपोल कल्पित थ्योरी खड़ी कर देहरादून के पक्ष में जनमत को खड़ा करने का प्रयास किया। देहरादून का पक्ष मजबूत करने के लिए देहरादून से 26 किमी दूर हवाई अड्डे को देहरादून से मात्र पांच किमी दूर बताया। इतना ही नहीं अल्मोड़ा जिले में स्थित चौखुटिया को दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में चमोली जिले की एक तहसील बताया।
इस तरह के विरोधाभाषी तर्क दर्शाते हैं कि दीक्षित आयोग किसी भी सूरत में देहरादून को राजधानी स्थाल के लिए उपयुक्त बताने के लिए कृतसंकल्पित था। (तथ्य साभार: शंकर भाटिया) 

ऐसे में न चाहते हुए भी इस तरह ही आपको श्रद्धांजलि देनी पड़ रही है ‘अलविदा न्यायमूर्ति दीक्षित, गैरसैंण को जबरिया नकारने के लिए आपको याद रखेंगे…

गैरसैंण राजधानी बनने से हो जाएगा पहाड़ से पलायन व मैदान में बढ़ते जनदबाव का समाधान

  • गैरसैंण को शीघ्र राजधानी घोषित करने की मांग पर नैनीताल में राज्य आंदोलनकारियों ने दिया एक दिवसीय धरना
  • आगामी 11 मार्च को गैरसेंण में महापंचायत में शामिल होने का किया ऐलान
5 मार्च 2018 को तल्लीताल गांधी मूर्ति के नीचे गैरसेंण को राजधानी घोषित करने की मांग पर प्रदर्शन करते राज्य आंदोलनकारी।

नैनीताल, 5 मार्च 2018। उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष एवं नैनीताल के पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल ने गैरसेंण को उत्तराखंड की राजधानी घोषित किये जाने के बाबत एक नया तर्क दिया है। उनका कहना है कि इससे प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में बढ़ते जनदबाव और पहाड़ पर पलायन की समस्या का भी स्वतः समाधान हो जाएगा। क्योंकि पहाड़ पर राजधानी बनने से लोगों का पहाड़ की ओर जाना बढ़ेगा, और पहाड़ से जो लोग बाहर चले गये हैं, वे भी पहाड़ पर सुविधाएं और लोगों की आवाजाही बढ़ने से अपने घरों को लौटेंगे तथा मैदानों क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ने के साथ वहां बढ़ रहा जन दबाव भी घटेगा। डा. जंतवाल ने साथ ही कहा कि उक्रांद ने 25 दिसंबर 1992 को ही चंद्र सिंह गढ़वाली के जन्मस्थान गैरसेंण में चंद्रनगर के रूप में राजधानी स्थापित किया जाने का संकल्प लिया गया था। उत्तराखंड के साथ बने अन्य दोनों राज्यों झारखंड व छत्तीसगढ़ सहित अभी हाल में अलग राज्य होने के बाद आंध्र प्रदेश ने अमरावती को अपनी राजधानी घोषित कर दिया है। यूपी जैसे बड़े राज्य की केवल एक राजधानी है, फिर सरकार के समक्ष क्या मजबूरी है कि वह गैरसेंण को राजधानी घोषित नहीं कर रही है।

उत्तराखंड की राजधानी गैरसेंण को घोषित करने की मांग को राज्य आंदोलनकारी सोमवार को नगर के गांधी चौक में गांधी मूर्ति के नीचे जुटे। इस मौके पर आंदोलनकारियों ने एक स्वर में गैरसेंण को शीघ्र राजधानी घोषित करने की मांग की, और कहा कि इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं है। राज्य सरकार गैरसेंण में बजट सत्र आयोजित करने सहित जो कुछ भी कर रहे हैं, वह केवल ढकोसला है। आगामी 11 मार्च को गैरसेंण में महापंचायत में शामिल होने का भी ऐलान किया गया। वहीं एक दिवसीय धरने की अगुवाई कर रहे वरिष्ठ आंदोलनकारी राजीव लोचन साह ने कहा कि जनदबाव में राज्य बनने के बाद कोई भी सरकार गैरसेंण को नजर अंदाज नहीं कर पाई, बावजूद इसे राजधानी घोषित नहीं किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने भराणीसेंण में विधानभवन के भव्य स्वरूप पर भी सवाल उठाते हुए इसे औचित्यहीन बताया, तथा इसकी जगह सादे भवन की परिकल्पना बताई। इस दौरान मुन्नी तिवारी की अगुवाई में ओजस्वी जनगीत भी गाये गये। प्रदर्शन में सुंदर नेगी, पान सिंह सिजवाली, डा. उमा भट्ट, दीवान सिंह कनवाल, हरीश पाठक, हरीश पांडे, हरीश नौटियाल, हरीश पंत, वीरेंद्र पाल, डीएन पंत, विमला असवाल, सतेश्वरी मिश्रा, तारा शाही, मुनीर आलम व गोल्डी सहित बड़ी संख्या में राज्य आंदोलनकारी मौजूद रहे।

इस तरह स्वीकारा-नकारा गया गैरसेंण
नैनीताल। वर्ष 1994 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तराखंड राज्य गठन हेतु रमा शंकर कौशिक समिति का गठन किया गया और इस समिति ने उत्तराखंड राज्य का समर्थन करते हुए 5 मई 1994 को कुमाऊँ एवं गढ़वाल के मध्य स्थित गैरसैंण (चंद्रनगर) नामक स्थान पर राजधानी बनाने की संस्तुति दी थी। इस समिति की रिपोर्ट के मुताबिक गैरसैंण को 60.21 फीसदी अंक मिले थे, जबकि नैनीताल को 3.40, देहरादून को 2.88, रामनगर-कालागढ़ को 9.95, श्रीनगर गढ़वाल को 3.40, अल्मोड़ा को 2.09, नरेंद्रनगर को 0.79, हल्द्वानी को 1.05, काशीपुर को 1.31, बैजनाथ-ग्वालदम को 0.79, हरिद्वार को 0.52, गौचर को 0.26, पौड़ी को 0.26, रानीखेत-द्वाराहाट को 0.52 फीसद अंक मिलने के साथ ही किसी केंद्रीय स्थल को 7.25 फीसद अन्य को 0.79 प्रतिशत ने अपनी सहमति दी थी। गैरसैंण के साथ ही केंद्रीय स्थल के नाम पर राजधानी बनाने के पक्षधर लोग 68.85 फीसद थे। कौशिक समिति की संस्तुति पर 24 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने उत्तराखंड राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। आगे उत्तराखंड की नित्यानंद स्वामी की अगुवाई में बनी प्रथम सरकार ने राजधानी गैरसैण (चंद्रनगर) के नाम पर दीक्षित आयोग गठित की, जिसने 11 बार अपना कार्यकाल बढ़ने के बाद गैरसेंण के खिलाफ रिपोर्ट दी। इसे राज्य आंदोलनकारी गैरसेंण के खिलाफ एक साजिश मानते हैं।

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जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ बड़े बांधों के विरोधी थे, उनका मानना था कि हमें पारंपरिक घट-आफर जैसे अपने पुश्तैनी धंधों की ओर लौटना होगा। यह वन अधिनियम के बाद और आज के बदले हालातों में शायद पहले की तरह संभव न हो, ऐसे में सरकारों व राजनीतिक दलों को सत्ता की हिस्सेदारी से ऊपर उठाकर राज्य की अवधारणा पर कार्य करना होगा। वह कहते थे-हमारे यहाँ सड़कें इसलिए न बनें कि वह बेरोजगारों के लिए पलायन के द्वार खोलें, वरन घर पर रोजगार के अवसरों को ले कर आयें। हमारा पानी बिजली बनकर महानगरों को ही न चमकाए व एसी ही न चलाये, वरन हमारे पनघटों, चरागाहों को भी ‘हरा’ रखे। हमारी जवानी परदेश में खटने की बजाये अपनी ऊर्जा से अपना ‘घर’ भी संवारे व सजाये। हमारे जंगल पूरे एशिया को ‘प्राणवायु’ देने के साथ ही हमें कुछ नहीं तो जलौनी लकड़ी, मकान बनाने के लिए ‘बांसे’, हल, दनेला, जुआ बनाने के तो काम आयें। हमारे पत्थर टूट-बिखर कर रेत बन अमीरों की कोठियों में पुतने से पहले हमारे घरों में पाथर, घटों के पाट, चाख, जातर या पटांगड़ में बिछाने के काम आयें। हम अपने साथ ही देश-दुनियां के पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदेह पनबिजली परियोजनाओ से अधिक तो दुनियां को अपने धामों, अनछुए प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर स्थलों को पर्यटन केंद्र बना कर ही और अपनी ‘संजीवनी बूटी’ सरीखी जड़ी-बूटियों से ही कमा लेंगे। हम अपने मानस को खोल अपनी जड़ों को भी पकड़ लेंगे, तो लताओं की तरह भी बहुत ऊंचे जा पायेंगे। 

कैसा हो उत्तराखंड,  कैसी हो राजधानी हमारी…

राज्य आन्दोलन से अपना नया राज्य हासिल करने पर बकौल गिर्दा ‘कुछ नहीं बदला कैसे कहूँ, दो बार नाम बदला-अदला, चार-चार मुख्यमंत्री बदले, पर नहीं बदला तो हमारा मुकद्दर, और उसे बदलने की कोशिश तो हुई ही नहीं।’ गिर्दा किसी भी मसले पर एक ओर खड़े होने के बजाय दूसरी तरफ का झरोखा खोलकर भी झांकते थे। राज्य की राजधानी के लिए गैरसैण समर्थक होने के बावजूद उनका कहना था ‘हम तो अपनी औकात के हिसाब से गैरसैण में छोटी डिबिया सी राजधानी चाहते थे, देहरादून जैसी ही ‘रौकात’ अगर वहां भी करनी हो तो उत्तराखंड की राजधानी को लखनऊ से भी कहीं दूर ले जाओ’। यह कहते हुए वह खास तौर पर ‘औकात’ और ‘रौकात’ शब्दों पर खास जोर देते थे। वह समझाते थे, ‘हमने गैरसैण राजधानी इसलिए माँगी थी ताकि अपनी ‘औकात’ के हिसाब से राजधानी बनाएं, छोटी सी ‘डिबिया सी’ राजधानी, हाई स्कूल के कमरे जितनी ‘काले पाथर’ के छत वाली विधान सभा, जिसमें हेड मास्टर की जगह विधान सभा अध्यक्ष और बच्चों की जगह आगे मंत्री और पीछे विधायक बैठते, इंटर कालेज जैसी विधान परिषद्, प्रिंसिपल साहब के आवास जैसे राजभवन तथा मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों के आवास। पहाड़ पर राजधानी बनाने के का एक लाभ यह भी कि बाहर के असामाजिक तत्व, चोर, भ्रष्टाचारी वहां गाड़ियों में उल्टी होने की डर से ही न आ पायें, और आ जाएँ तो भ्रष्टाचार कर वहाँ की सीमित सड़कों से भागने से पहले ही पकडे जा सकें। यह सुखद है कि स्वप्नदृष्टा गिर्दा की गैरसेंण के जीआईसी में विधान सभा बनाने की बात सच साबित हो गई हैं। आठ जून 2014 की शाम गैरसैंण के स्थानीय राजकीय इंटर कालेज के प्रांगण में विधान सभा की बैठक आयोजित की गयी।

क्यों गैरसैंण  : पंकज सिंह महर

बहुत दिनों से गैरसैण को राजधानी बनाने वाले युवा लोगों का उत्साह देख रहा था, और इसको ना चाहने वाले लोगों के कुतर्क भी। कुतर्कों से दुख तो हुआ लेकिन पहले तो सोचा कि छोड़ो भैंस के आगे बीन बजाने से क्या होगा। लेकिन जब हमारे युवा-उत्तराखंड के तथाकथित उत्तराखंड प्रेमी लोग अपने कुतर्कों को इस इंटरनैट युग में इधर उधर फैलाने लगे और उनके पीछे पीछे कुछ लोग “हम तुम्हारे साथ हैं” की तरह पर हुवां-हुवां चिल्लाने लगे तो लगा कि मुझे भी अपनी भावनायें व्यक्त कर ही देनी चाहिये।

वे कहते हैं कि गैरसैण क्यों? मैं कहता हूँ ‘ उत्तराखंड क्यों’ फिर ‘भारत क्यों’। अग्रेजों के जमाने में भी ऐसे कुछ लोग रायबहादुर का खिताब लेकर अंग्रेजों के जूते चाटते थे और कहते थे कि हमें आजादी क्यों चाहिये। लेकिन एक आम आदमी के लिये आजादी अस्मिता का सवाल था, खुली हवा में सांस लेना वही समझ सकता है जिसने बदबूदार, सीलन युक्त कोठरी में दिन बितायें हैं। जिन लोगों ने ना पहाड़ के उस दर्द को देखा है जो धीरे धीरे पहाड़ को उजाड़ रहा है और ना आज की उसकी वास्तविकता से वाकिफ हैं वो तो कहेंगे ही गैरसैण क्यों। यदि ए.सी. चैम्बर में बैठकर इंटरनैट पर धकापेल करने से ही उत्तराखंड का विकास होना होता तो उत्तराखंड आज सबसे अच्छा राज्य होता। उत्तरप्रदेश के वे अधिकारी क्या बुरे थे जो लखनऊ में बैठकर पहाड़ के भाग्य का फैसला करते थे। ऐसे लोगों के लिये पहाड़ केवल साल में एक बार छुट्टी बिताने के लिये जाने वाला स्थान है, और फिर अपने लेटेस्ट कैमरे से फोटो खींच कर इंटरनैट पर साझा करके अपने को तीसमारखां समझने का माध्यम भी ।

पहाड़ का आदमी आज पहाड़ से क्यों भागने को मजबूर है, इसीलिये क्योंकि पहाड़ को पहाड़ के ऐसे नैनिहालों ने बिसरा दिया है। दिल्ली, मुम्बई, लंदन, कनाडा, दुबई में बैठकर पहाड़ी गीत गाना, पहाड़ी नाइट आयोजित करना और हो हो करते हुए हँसते हुए पहाड़ की दुर्दशा का दुखड़ा रोना, यह सब बहुत आसान है। कठिन है तो पहाड़ में बैठकर एक आम पहाड़ी के दर्द को महसूस कर उसके लिये चुपचाप कुछ करते जाना।

लेकिन जब तक पहाड़ के लिये कुछ करने के नाम पर अपने नाम को आगे करने, कोई संस्था बनाकर उसके लिये चंदा उगाहने और पहाड़ के हालात बदलने के नाम पर साल में एक दो बार पहाड़ के प्रायोजित टूर करने की प्रवृति सामने रहेगी तब तक पहाड़ का भला होने वाला नहीं। गैरसैण के नाम पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाले कितने लोग उत्तराखंड के मानचित्र पर गैरसैंण को पहचान सकते हैं। उनमें से कितने लोगों को उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति की सही सही जानकारी है। लेकिन नहीं उन्हें बिना जाने समझे सिर्फ विरोध करना है तो करेंगे।

आज राजधानी बदलने से पहाड़ के बुनियादी विकास की नींव पड़ेगी। उन अधिकारियों, नेताओं को भी उन्ही सब असुविधाओं से दो चार होना पड़ेगा जिन्हेंएक आम उत्तराखंडी हर दिन झेलता है। यह लोकतंत्र है कोई राजशाही तो नहीं कि प्रजा परेशान और राजा महान। यदि उत्तराखंड भूकंप प्रभावित क्षेत्र है तो क्या, राजधानी भी ऐसे ही जगह में हो तो क्या बुरा है। आप राजधानी को ऐसे क्षेत्र से निकालकर अलग बनाना चाहते हैं ताकि जनता मरे और आप राहत कार्यों का हवाई सर्वेक्षण करने पहुंच जायें। नीरो ऐसे ही तो बंशी बजा रहा था जब रोम जल रहा था।

सुदूर क्षेत्र में बैठे एक आम उत्तराखंडी को किसी भी काम के लिये राजधानी जाने के लिये कितना समय लगता है उससे आपको क्या मतलब। आपके पास जहाज है, गाड़ी है पहुंच जाइए देहरादून, हल्द्वानी या नैनीताल। आपको इससे क्या कि एक पहाड़ी को 2 मील दूर से हर रोज पीने का पानी लाना पड़ता है। आप कहेंगे इसकी क्या जरूरत है मिनरल वाटर क्यों नहीं खरीद लेता। पढ़ाई के लिये पांच मील दूर स्कूल जाना होता है जिसमें साल के आधे से ज्यादा दिन पढ़ाई नहीं होती। आप कहेंगे घर बैठे ई-लर्निंग क्यों नहीं कर लेता। अस्पताल जाने के लिये 15 मील चलना पड़ता है। मेडिकल इंस्योरेंस नहीं है क्या?

जब पहाड़ से निकले लोग ही बड़े शहरों में जाकर पहाड़ के असली दुख दर्दों को भूल जाते हैं और सिर्फ फैशन के लिये उत्तराखंड प्रेम की दुहाई देते हैं और खुद को पहाड़ी कहलाने में शर्म महसूस करते हैं तो उन देहरादून में बैठे शहरों में पले बड़े अधिकारियों का क्या दोष। “गैरसैण क्यों “यह सवाल ही एक बहुत बड़ा तमाचा है उन लोगों पर जिन्होंने पहले उत्तराखंड का सपना देखा और अब राजधानी परिवर्तन की जिद पाले बैठे हैं। यह तमाचा है हर उस पहाड़ में रहने वाले उत्तराखंडी पर जो आज भी अपने दैनिक सुख सुविधाओं के लिये जूझ रहा है। पहाड़ में शराब घर घर पहुंच गयी है, ऐसा कहने वाले लोग बहुत मिलेंगे, लेकिन उसका समाधान क्या है यह कोई नहीं बतायेगा। इसके जिम्मेवार भी वही लोग हैं जो पूछते हैं गैरसैण क्यों?
हाँ तो कुछ तथाकथित उत्तराखंड प्रेमी कह रहे हैं कि यह केवल भावनात्मक मुद्दा है। कह रहे हैं आप लोग पागल हो जो केवल भावनाओं के वशीभूत होकर काम करते हो। हमें देखो हमने अपनी भावनाओं को काबू में किया इसलिये आज सब कुछ छोड़छाड़कर दिल्ली, मुम्बई, लंदन, दुबई ना जाने कहाँ कहाँ बैठे हैं। ऐसे ही लोग होते हैं जो भावनाओं की परवाह नहीं करते और अपने माँ-बाप और कम पढे लिखे भाई-बहनों को पहाड़ की कठिन भूमि में छोड़कर उड़ंछू हो जाते हैं। लेकिन यही लोग यह भी कहते हैं हम उत्तराखंड के नाम को बेचेंगे, लोगों को भावनात्मक रूप से मजबूर करेंगे कि वह हमसे जुडें और बदले में हम नाम, दाम कमायेंगे। यदि गैरसैंण की रट लगाने वाले पगले लोग भावनात्मक मुद्दे पर उछ्ल रहे हैं तो आप क्या कर रहे हैं आप भी तो लोगों को भावनात्मक रूप से मजबूर कर रहे हैं। आप उत्तराखंड के नाम पर ग्रुप बना रहे हैं, एन जी ओ बना रहे हैं, ट्र्स्ट बना रहे हैं, साहित्य लिख रहे हैं, कविता कहानी लिख रहे हैं..क्यों भला। खुद ही ना जाने क्या क्या अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, संचालक, प्रवर्तक बन बैठे हैं, क्यों? व्हाई…क्यों आप लोगों को उत्तराखंड के नाम पर भावनात्मक रूप से भड़का रहे हैं। आप भावनात्मक रूप से करें तो ठीक और हम करें तो गलत. क़्यों? व्हाई…..

लेकिन इसे केवल भावनात्मक मुद्दा बताने वाले उस अधजल गगरी की तरह हैं जो छलकती रहती है। कहते हैं ना A Little Knowledge is a Dangerous Thing ठीक वही बात है। या तो ये कुछ ना जानते होते, तो चुप रहते और केवल अपनी परेशानियों का हल ढूंढने के लिये ही सही गैरसैण को राजधानी बनाने की बात कहते। एक आम उत्तराखंडी इसीलिये ही तो जुड़ा है इस आन्दोलन से। या फिर यह जानकार ही होते, पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग की तरह। उत्तराखंड का यही वर्ग तो है जो गैरसैण को समर्थन दे रहा है। प्रेमियों को शायद यह भी नहीं मालूम कि यह राजनीतिक मुद्दा है ही नहीं क्योंकि इस पर किसी भी पार्टी ने अपना मत साफ नहीं किया है। इसको उत्तराखंड के बुद्धिजीवी वर्ग ने समर्थन दिया है और दे रहे हैं। यदि हमारे प्रेमी लोग जानते हों तो कौशिक समिति की रिपोर्ट में 60 % लोगों ने गैरसैण को सीधे और 8% ने केन्द्रीय स्थान के बहाने गैरसैण को ही चुना था। अब कौशिक समिति क्या थी किससे इसने बात की थी वह मैं यहाँ नही बताने जा रहा। यह लोग तो चार किताबें पढ़ लिये और अच्छी अंग्रेजी लिखना सीख गये यह तो कहेंगे ही व्हाई गैरसैण… पद्म श्री शेखर पाठक हों या गैरसैण के लिये शहादत देने वाले बाबा उत्तराखंडी या बुद्धिजीवी वर्ग के अन्य लोग, सभी दिलो जान से गैरसैण के लिये समर्थन में..व्हाई मेरे भाई। क्योंकि यह केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं है इसके पीछे वैज्ञानिक, सामाजिक , आर्थिक, भौगोलिक आधार हैं।

तो अब आते हैं कि क्या गैरसैण केवल कुछ पगलाये लोगों का भावनात्मक मुद्दा ही है या इसके पीछे कोई अन्य कारण भी है। लेकिन पहले मैं कुछ खाये,पीये अघाये लोगों यह बता दूँ कि उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन भी कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं था। इसकी संकल्पना को बनने, पकने और आन्दोलन का रूप लेने में पर्याप्त समय लगा। यह केवल एक राज्य के भौगोलिक धरातल को कम कर अपने लिये जमीन छांट लेने की लड़ाई नहीं थी बल्कि हिमालय के समाजों की अलग भौगोलिक परिवेश में जीने वाले लोगों की परेशानियों को समझने में सक्षम सरकार की स्थापना करने की लड़ाई थी। हिमाचल हो या मेघालय सभी हिमालयी समाजों ने अपने अपने हिस्से के राज्य हमसे पहले प्राप्त कर लिये।

अब चुंकि व्हाई गैरसैण कहने वाले उत्तराखंड प्रेमी लोग पढ़े-लिखे हैं और अंग्रेजी बोलना बेहतर समझते हैं तो उनके लिये कुछ अंग्रेजी सन्दर्भ देने की कोशिश कर रहा हूँ। जीन-जैकस रूसो एक दार्शनिक हुआ करते थे।

रूसे साहब मानते थे कि विज्ञान व कला के विस्तार से नैतिक गुणों का ह्रास होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, और इंसान स्वभावत: अच्छे ही होते हैं लेकिन घटनायें या दुर्घटनायें या परिस्थितियां उन्हें बुरा बना देती हैं, ऐसे ही लोग समाज-निर्माण करते हैं। उन्होने यह भी कहा कि

एक संगठित राज्य एक मानव शरीर की तरह है, जिस तरह शरीर के प्रत्येक हिस्से का अपना एक कार्य होता है उसी तरह राज्य के अलग अलग हिस्से अलग अलग कार्य करते हैं और एक अच्छे राज्य के लिये भी इसके सभी भागों का सुचारु रूप से कार्य करना आवश्यक है। उन्होने यह भी कहा कि यदि राजनैतिक सत्ता , जन भावनाओं के अनुसार काम नहीं करती तो राज्य में विवाद होना अवश्यम्भावी है।

ऐसे ही एक भूगोलवेत्ता थे कार्ल रिटर जिन्होने राज्य के जैविक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इस सिद्धांत को फ्रेडरिक रैटजल, हॉसहॉफ़र और रुडोल्फ जैसे कई लोगों ने माना और आगे बढ़ाया।

राज्य के जैविक विकास के सिद्धांत के अनुसार जिस प्रकार शरीर कोशिकाओं का बना होता है वैसे ही राज्य का हर स्थान मानव शरीर की एक कोशिका की तरह काम करता है। यही कोशिकायें समान इच्छा शक्ति, समान आकांक्षा, समान गुण-धर्म वाले लोगों के आवास में बदल जाती हैं और राज्य के गुण-धर्म को प्रभावित करती हैं। तो एक राज्य का गुण-धर्म उनमें स्थित स्थानों और उन स्थानों में रहने वाले व्यक्तियों की भावना का प्रतिरूप होता है। डार्विन नें लगभग यही सिद्धांत जीव-विकास के लिये प्रतिपादित किया था।

अमरीकी भूगोलविज्ञानी स्टीलसी ने माना की किसी भी राज्य में एक ऐसा ऊर्जा केन्द्र होता है जो राज्य को जीवित रखता है। स्टीलसी नें एक नाभिस्थल की संकल्पना की और कहा किसी भी राज्य के भविष्य का निर्धारण उसके नाभि-स्थल (महत्वपूर्ण स्थल) से होता है। हाँलाकि स्टीलसी ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि यह नाभिस्थल ही राजधानी का स्थान है लेकिन कई विद्वानों नाभि-स्थल को राजधानी के रूप में प्रतिपादित किया।

अब यदि उत्तराखंड राज्य हिमालय समाज को एक अलग परिप्रेक्ष्य में रखकर उसका योजनाबद्ध विकास करने के लिये बना है और इसका मूल गुण-धर्म पहाड़ी है तो इसकी राजधानी पहाड़ में होनी चाहिये ना कि मैदानी इलाके में, और यह स्थान नाभि की तरह राज्य के मध्य भाग के आसपास होना चाहिये। इस स्थिति में गैरसैण एक उपयुक्त स्थान बैठता है।
कुछ लोगों का कहना है कि यदि गैरसैण में राजधानी बनेगी तो इसमें बहुत खर्चा होगा। तो इसमें बुराई क्या है? यदि पहाड़ के विकास के लिये खर्चा हो रहा तो अच्छा ही तो है। क्या आप चाहते हैं कि यह खर्चा केवल देहरादून जैसे बड़े शहरों तक ही सीमित रह जाये। कुछ कहते हैं कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार है इसलिये अधिकतर पैसा भ्रष्ट लोग खा जायेंगे। तो यह तो देहरादून पर होने वाले खर्चे के लिये भी सही है, वहाँ भी तो लोग पैसा खायेंगे तो ना करें कुछ भी खर्चा। अरे भ्रष्टाचार तो सारे भारत में हैं तो क्या सारे नये निर्माण रोक दिये जाने चाहिये। भ्रष्टाचार एक समस्या है हमें उसके भी समाधान की जरूरत है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब तक वह समस्या हल नहीं हो जाती तब तक हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। कई लोगों ने कहा है कि सरकारी योजनाओं का केवल 10 से 15 प्रतिशत ही इसके सही हकदार के पास पहुँचता है और यह केवल उत्तराखंड के लिये ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिये सत्य है। एक और जहाँ हमें इसके खिलाफ लड़ना है वहीं विकास को जारी रखना जरूरी है नहीं तो जो दस या पन्द्रह पैसा पहुंच रहा है वह भी नहीं पहुँचेगा।

अब आते हैं कुछ और विद्वानों के उदाहरणों पर। कई लोगों ने राजधानियों पर शोध किया और अपनी पुस्तकें प्रकाशित की। डेविड गौर्डन, थामस हॉल जैसे विद्वानों ने 19 वीं व बीसवीं सदी की युरोप की राजधानियों का अध्ययन किया। इसके अलावा सर पीटर हॉल ने 7 प्रकार की राजधानियों को चिन्हित किया। कई विद्वानों के अध्ययन से यह बात सामने आयी है कि राजधानी ही राज्य की दशा व दिशा को निर्धारित करती है। यूरोप के अधिकाश देशों की राजधानियाँ उसके नाभि स्थल में स्थित रही हैं। जिन देशों में ऐसा नहीं है उनमे से अधिकांश देश एक से अधिक राजधानियों का भार ढो रहे हैं। विद्वानों का यह भी मानना है कि सोवियत संघ के विघटन व जर्मनी के एकीकरण दोनों उदाहरण यह साबित करते हैं राजधानियाँ देश के भविष्य को प्रभावित करती हैं और यह करती रही हैं।

तो यह रही वैज्ञानिक व अध्ययन आधारित सोच जो यह बताती है कि गैरसैण या उसके आसपास की जगह राजधानी के लिये उपयुक्त है ।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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