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इस बड़े बांध के समर्थन में आई यह बामपंथी पार्टी

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-माले प्रत्याशी पांडे ने कहा, माले के संघर्ष के कारण बाहर निकली जमरानी बांध की फाइल
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 अप्रैल 2019। भाकपा माले प्रत्याशी कामरेड डा. कैलाश पांडे के समर्थन में रविवार को नगर के मल्लीताल स्थित रामलीला मैदान में जनसभा आयोजित हुई। इस मौके पर पांडे ने कहा लाल झंडे की जीत का मतलब लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती होगा। दावा किया कि माले के संघर्ष के कारण ही जमरानी बांध की फाइल बाहर निकली है। भले बाम दल राज्य में बड़े बांधों के विरोधी रहे हों लेकिन 130.60 मीटर ऊंचे व 2584.10 करोड़ रुपये के जमरानी बांध पर उनका स्टेंड अलग है। पांडे ने कहा कि पार्टी ने एनडी तिवारी के शासनकाल में जमरानी बांध पर एसडीएम कोर्ट हल्द्वानी के समक्ष 72 घंटे का धरना भी दिया था। बाम दल बड़े बांधों के खिलाफ जरूर हैं, पर जमरानी बांध के विरोध में नहीं हैं। कहा कि यह क्षेत्र की जरूरत है और दावा किया कि इसके बनने से नदी में पानी चलता रहेगा।

इसके अलावा कॉमरेड पांडेय ने कहा “जिस तरह से पिछले पाँच सालों में देश की लोकतंत्र पर हमले हुए हैं, और संविधान को ताक पर रख दिया गया है ऐसे में लोकतंत्र को बचाने का सवाल इस चुनाव का एक प्रमुख सवाल बन गया है। वोट देते समय यह जेहन में रखा जाना चाहिए कि कौन लोग हैं जो लोकतंत्र पर हमले के खिलाफ इस फासीवादी सरकार से लगातार लड़े। तब आप पाएंगे कि यह लाल झंडा ही था जिसने पूरे देश में यह लड़ाई जारी रखते हुए मोदी सरकार को हर मोर्चे पर चुनौती दी है। इसलिए लाल झंडे की मजबूती का मतलब है लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती।” उन्होंने कहा कि, “पूरे तराई-भाबर में पानी का संकट गहरा रहा है. भाकपा(माले) के संघर्ष के बाद जमरानी बांध की फ़ाइल बाहर निकली थी. उसके बाद हर पार्टी इस मुद्दे पर बोलती रही,परंतु कार्यवाही के नाम पर कुछ नहीं हुआ। भगत सिंह कोश्यारी ने पिछला चुनाव जमरानी बांध के सवाल पर लड़ा, लेकिन न तो उन्होंने इस सवाल पर कुछ किया, न मोदी अपनी दो सभाओं में इस पर एक शब्द बोले.” उन्होंने कहा कि, “बीते पांच साल में एचएमटी फैक्टरी पर ताला लग गया, सिडकुल में फैक्टरियां बन्द हो रही हैं. आशा, आंगनवाड़ी, भोजनमाता जैसे तमाम तबकों को न तो सम्मानजनक वेतन मिल रहा है, न उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिला। किसान बदहाल हैं गन्ना किसानों का गन्ना खेतों में खड़ा है पर सरकार किसानों के पक्ष में नहीं खड़ी है। डबल इंजन की भाजपा केंद्र और राज्य सरकार हर मुद्दे पर नाकाम रही हैं।”  भाकपा(माले) के राज्य सचिव कामरेड राजा बहुगुणा ने कहा कि, “बेरोजगारी का सवाल आज युवाओं का सबसे बड़ा सवाल है. बेरोजगारी की दर पिछले 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ चुकी है. इसलिए इस चुनाव में असल सवाल चाय और चौकीदारी न हो कर बेरोजगारी है”, कॉमरेड राजा बहुगुणा ने कहा कि, “मोदी सरकार का पांच साल का कार्यकाल देश के लिए तबाही सिद्ध हुआ है. नोटबन्दी और जीएसटी ने व्यापार और रोजगार की कमर तोड़ कर रख दी. इस सरकार ने केवल बड़े पूंजीपतियों की तिजोरियां भरने का काम किया है. रॉफेल में अम्बानी को फायदा पहुंचाने के लिए सब कायदे तक पर रख दिये. रॉफेल देश के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा घोटाला है.” उन्होंने कहा कि, “सभी प्रत्याशियों में कॉमरेड डॉक्टर कैलाश पांडेय सर्वाधिक शिक्षित, योग्य एवं संघर्षशील प्रत्याशी हैं.” एआईपीएफ के राष्ट्रीय संयोजक गिरिजा पाठक ने कहा कि, “इस समय देश की खेती सबसे भयावह कृषि संकट से गुज़र रही है. किसान आत्महत्याओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है. उन्होंने कहा कि वनवासियों और वनों पर आश्रित समुदायों के विरुद्ध सरकार दमनकारी नीतियां अख्तियार कर रही है.” प्रख्यात रंगकर्मी जहूर आलम ने कहा कि नैनीताल में ऑडोटोरियम का सवाल तमाम मुख्यमंत्रियों की घोषणा के बाद भी लटका हुआ है. बिजली,पानी के संकट से भी शहर को दो-चार होना पड़ रहा है. सभा की शुरुआत गढ़वाल विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष अंकित उछोली के नेतृत्व में जनगीत से शुरु हुई. भाकपा(माले) के राज्य कमेटी सदस्य इन्द्रेश मैखुरी ने कहा कि, “उत्तराखंड राज्य बने 18 साल हो गए हैं, परंतु पलायन,शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सवाल जस के तस बने हुए हैं.” सभा का संचालन  भाकपा(माले) के नैनीताल नगर सचिव कैलाश जोशी ने किया. सभा में पार्टी के राज्य कमेटी सदस्य अतुल सती,हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव दुर्गा सिंह मेहता,देवेंद्र रौतेला, सुभाष जोशी, रोहित,अमन रावत,हेमन्त खाती, चंचल बोरा, तनुज भट्ट ,हिमांशु जोशी, एनडी जोशी आदि मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें : नैनीताल-ऊधमसिंह नगर की जनता को जमरानी बांध का आजादी के 71 वर्षों में से 53 वर्षों का इंतजार

-1965 में बना था प्रस्ताव, 400 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद नहीं लगा एक पत्थर भी

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 23 मार्च 2019। आजादी के 71 वर्षों में देश में विभिन्न क्षेत्रों में चहुमुखी प्रगति होने की बात कही जाती है। लेकिन नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोक सभा क्षेत्र की जनता विकास के मामले में इतनी खुशकिस्मत नहीं है। यहां की जनता के 53 वर्ष एक ऐसी परियोजना के इंतजार में बीत गये हैं, जिसका प्रस्ताव 1965 में सर्वप्रथम बना था। इस लोक सभा सीट के बड़े तराई-भाबर क्षेत्र की प्राणदायिनी कही जाने वाली जमरानी बांध परियोजना पर इसकी कार्यदायी संस्था सिचाई विभाग की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1976 से अब तक 178 कर्मचारी, 13 इंजीनियर और 400 करोड़ का खर्चा हो चुका है। बावजूद बांध के लिए एक पत्थर भी नहीं लग पाया है। और बांध की वर्तमान लागत 3000 करोड़ रुपए तक पहुंच गयी है, जबकि इधर परियोजना की 2584.10 करोड़ रुपये की डीपीआर को मंजूरी और पर्यावरणीय मंजूरी भी मिल गयी है, किंतु धरातल पर कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया है।
उत्तराखंड की आर्थिक राजधानी व कुमाऊं मंडल के प्रवेश द्वार हल्द्वानी से लगे भाबर क्षेत्र में लगातार गिरते भूजल स्तर और पेयजल व सिचाई की समस्या का समाधान प्राप्त करने के उद्देश्य से 1965 से प्रस्तावित जमरानी बांध परियोजना इधर देश-प्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के ‘दृष्टिकोण पत्र’ में शामिल रही। राज्य सरकार ने करीब पांच दशक बाद बांध की धूल फांकती फाइलें भी खुलवाईं। और इधर 27 फरवरी 2019 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा 2009 में पर्यावरण के लिए हुई जन सुनवाई को ही आधार मानते हुए पर्यावरण की सैद्धांतिक स्वीकृति मिलने और केंद्रीय जल आयोग से चार फरवरी 2019 को इसकी 2584.10 करोड़ रुपये की डीपीआर को मंजूरी मिलने की बात भी कही जा रही है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि धरातल पर आज तक भी इस परियोजना में एक ईंट भी नहीं लग पायी है।

यह होगा बांध का स्वरूप

नैनीताल। उत्तराखंड ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के लिए भी बहुउपयोगी साबित होने वाले जमरानी बांध का निर्माण गौला (गार्गी) नदी पर काठगोदाम से 10 किमी ऊपर, छोटा कैलास की घाटी में विश्वप्रसिद्ध हैड़ाखान बाबा के आश्रम के पास जमरानी ग्राम क्षेत्र में होना है। 130.60 मीटर ऊंचाई वाले प्रस्तावित इस बांध की पत्रावली 1965 में शुरू हुई थी। प्रस्तावित बांध का निर्माण होने पर उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की करीब 90 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचित होने का अनुमान है। इसके अलावा बांध के साथ जल विद्युत परियोजना भी बननी प्रस्तावित है, जिससे करीब 30 मेगा वाट बिजली का उत्पादन भी हो सकेगा। साथ ही बांध के जलाशयों में 144.30 मिलियन घन मीटर जल संग्रहित होगा। जिसमें से 54 मिलियन घन मीटर पानी पेयजल के लिए उपलब्ध हो सकेगा।

एक कदम आगे तो एक कदम पीछे…

नैनीताल। बीते एक दशक में जमरानी बांध की फाइल कुछ तेजी से आगे बढ़ी। 2010 में परियोजना की पुनरीक्षित हाइड्रोलॉजिक रिपोर्ट को केंद्रीय जल आयोग ने अंतिम स्वीकृति प्रदान की थी। इसके बाद उम्मीद जगने लगी थी कि बांध निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। इस के बाद सिंचाई विभाग बांध निर्माण के लिये 351.5 हेक्टेयर वन भूमि को हस्तांतरित कराने में जुटा। दिसंबर 2010 में पहला प्रस्ताव बनाकर नोडल अधिकारी वन विभाग देहरादून को भेजा गया, जिसमें कुछ सुझाव नोडल अधिकारी के स्तर से मांगे गए। इन्हें भी पूरा कर दिया गया। इसके बाद भी बांध का प्रस्ताव कभी वन विभाग की आपत्तियों तो कभी यूपी के रुचि न लेने के कारण आधी शताब्दी से अटका रहा।

डीपीआर की अब तक की विकास यात्रा :
– जमरानी बांध परियोजना को 1975 में सैद्धांतिक स्वीकृति मिलने के बाद 61.25 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए।
– सिंचाई विभाग ने 1981 में गौला बैराज, 440 किमी नहरों, जमरानी कॉलोनी आदि का 25.24 करोड़ रुपये खर्च का का निर्माण किया।
– 1989 में बाँध की 144.84 करोड़ रुपये की डीपीआर भेजी भेजी गई। इस बीच बांध परियोजना की स्वीकृति में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तमाम आपत्तियां लगती रहीं।
– 2015 में परियोजना की लागत 2350 करोड़ रुपये पहुंच गई।
– 20 जुलाई 2018 में 2350 करोड़ रुपये की जगह 2573.10 करोड़ की डीपीआर संशोधित कर केंद्रीय जलायोग को सौंपी गई है।
– फिर 2800 करोड़ की नई डीपीआर केंद्रीय जलायोग को सौंपी।
– जनवरी 2019 में 2954.45 करोड़ रुपये की डीपीआर सौंपी।
– चार फरवरी 2019 को 2584.10 करोड़ रुपये की डीपीआर पर लगी मंजूरी की मुहर।

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राष्ट्रीय सहारा, 19 सितम्बर 2017

विरोधी सुर….

इस बांध परियोजना पर पिछले पचास सालो से काम क्यों नही शुरू हो सका? बाँध विरोधियों के इस बाबत अपने तर्क हैं। संयुक्त प्रान्त के प्रधानमंत्री गोविंद बल्लभ पंत, केंद्र में ऊर्जा मंत्री रहे उनके पुत्र केसी पंत और केंद्रीय मंत्री तथा यूपी व उत्तराखंड के सीएम रहे नारायण दत्त तिवारी जैसे इस क्षेत्र के नेता भी इस बांध परियोजना को ठंडे बस्ते में डाले रहे। बांध विरोधियों के द्वारा कहा जाता है कि जमरानी बांध परियोजना स्थल शिवालिक की पहाड़ियों में प्रस्तावित है। ये पहाड़ियां भुरभुरी व कमजोर हैं, और इनमें लगातार भूस्खलन होता रहता है। इसलिये ये पानी के भार को सहन नहीं कर पायेगी। जहां बांध की दीवार प्रस्तावित है, उसके आसपास तीन बार बड़ा भूस्खलन हो चुका है। प्रस्तावित बांध स्थल के पास अमिया की पहाड़ी लगातार दरक रही है। जो भी बांध उत्तराखंड में बने है वो शिवालिक की तुलना में मजबूत हिमालयी चट्टानों पर बनाये गए हैं। परियोजना स्थल पर जो सुरंगें खोद कर मिट्टी को परीक्षण किया गया था उसकी रिपोर्ट कथित तौर पर नकारात्मक आयी थी। दूसरे, हिमालय से न निकलने के बावजूद गौला नदी शिवालिक की पहाड़ियों में 12 महीने बहती है, और अपने साथ अपने कमजोर जलागम क्षेत्र से मलबा, रेत, बजरी व बोल्डरों को अपने साथ लेकर आती है। इस कारण प्रस्तावित बांध व जल विद्युत परियोजना में इसके रेता, बजरी व बोल्डरों के भर जाने व उसे मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना की तरह ठप करने का अंदेशा है। तीसरे, बांध की लागत 3000 करोड़ रुपये से अधिक आने और अपेक्षाकृत कम विद्युत उत्पादन से बिजली की लागत अधिक आने का भी खतरा बताया जा रहा है। साथ ही कहा जा रहा है कि बांध की वजह से गौला नदी पर निर्भर वैध-अवैध खनन का करीब 10,000 करोड़ का आर्थिक चक्र गड़बड़ा जाएगा। साथ ही राज्य सरकार को हर वर्ष गौला में खनन से मिलने वाले 400 करोड़ के राजस्व पर भी प्रभाव पड़ेगा। बताया जाता है कि गौला नदी से हर वर्ष करीब 15 लाख ट्रक खनन सामग्री निकाली जाती है। यह भी कहा जा रहा है कि जितनी लागत में जमरानी बांध बनेगा और भावर क्षेत्र की पेयजल व सिचाई की कमी को दूर करेगा, उतने से कम में तराई के किसी जलाशय से भी पानी लिफ्ट कर हल्द्वानी लाया जा सकता है।

जमरानी में पहाड़ों की कमजोर प्रकृति :

इस बांध परियोजना पर पिछले पचास सालो से काम क्यों नही शुरू हो सका ? बाँध विरोधियों के इस बाबत अपने तर्क हैं। संयुक्त प्रान्त के प्रधानमंत्री गोविंद बल्लभ पंत, केंद्र में ऊर्जा मंत्री रहे उनके पुत्र केसी पंत और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता भी इस बांध परियोजना को ठंडे बस्ते में डाले रखे। कहा जाता है कि जमरानी बांध परियोजना स्थल शिवालिक की पहाड़ियों में प्रस्तावित है, ये पहाड़ियां भुरभुरी व कमजोर हैं,और लगातार भूस्खलन इसमे होता रहता है। जोकि पानी के भार को सहन नहीं कर पायेगी। जहां बांध की दीवार  प्रस्तावित है, उसके आसपास तीन बार बड़ा भूस्खलन हो चुका है। प्रस्तावित बांध स्थल के पास अमिया की पहाड़ी लगातार दरक रही है, जिसकी दरार गहरी और लंबी है। जो भी बांध उत्तराखंड में बने है वो शिवालिक की तुलना में मजबूत हिमालयी चट्टानों पर बनाये गए हैं। परियोजना स्थल पर जो सुरंगे खोद कर मिट्टी को टेस्ट किया गया था उसकी रिपोर्ट भी नकारात्मक आयी थी, दूसरी बात गौला नदी अपने तेज़ बहाव की वजह से शिवालिक की पहाड़ियों से लगातार गिरने वाले मलबे, सिल्ट-रेत, बजरी, बोल्डर को अपने साथ लेकर बारह मासी बहती है, गौला नदी में बहकर आने वाली रेता बजरी सिल्ट बांध में भर जाने का अंदेशा है। जिससे इस पर बनने वाली जल विद्युत परियोजना ठप हो सकती है। मनेरीभाली जल विद्युत परियोजना इसी वजह से ठप्प हो गयी थी। तीसरी बात, बांध की लागत आएगी तीन हज़ार करोड़ रुपये। ऐसे में बिजली की लागत ज्यादा आ सकती है, लिहाजा, केंद्र वित्तीय मदद से हाथ पीछे खींच सकता है। 

गौला में खनन रुकने से अरबों का होगा नुकसान :

एक और महत्वपूर्ण बात उत्तराखंड में गौला नदी ही एक ऐसी नदी है जो सिल्ट या रेता, बजरी, पत्थर की वजह से वर्तमान में 10,000 करोड़ का आर्थिक चक्र काठगोदाम से किच्छा तक घुमा रही है, करीब दस हज़ार डम्पर कारोबार ,उद्योगों और,एक लाख लोगो के घरों का चूल्हा जलाती है, सरकार को हर साल 400 करोड़ का राजस्व देती है। गौला नदी से हरसाल करीब 15 लाख ट्रक खनन सामग्री निकाली जाती है।बांध बनने पर गौला में खनन बन्द हो सकता है, और सरकार व व्यवसाय को अरबों रुपये का नुक्सान हो सकता है। वहीँ जितनी लागत में जमरानी बांध बनेगा और भावर क्षेत्र की पेयजल की कमी को दूर करेगा, उतने से कम में तराई के किसी जलाशय से भी पानी लिफ्ट कर हल्द्वानी लाया जा सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि बांध की लागत वर्तमान में 2500 करोड़ है और बिजली उत्पादन मात्र 27 मेगावाट होगा, इसलिए सरकार के लिए ये घाटे का सौदा है,क्योंकि बिजली लागत महंगी होगी और गौला खनन आय भी हाथ से जो जायेगी वो अलग।

पूर्व समाचार : हाई कोर्ट ने कहा छह माह में प्रस्ताव का निस्तारण कर 3 साल में जमरानी बांध बनाएं

नवीन समाचार, नैनीताल, 2 नवंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दशकों से लंबित जमरानी बांध का निर्माण तीन साल के भीतर पूरा करने का बड़ा आदेश दिया है। साथ ही उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि एक माह के भीतर बांध से संबंधित प्रस्ताव-संशोधित डीपीआर केंद्र को भेजें, और केंद्र सरकार 6 माह के भीतर इसका निस्तारण करें।
उल्लेखनीय है कि हल्द्वानी निवासी रविशंकर जोशी ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि 1975 में 61.25 करोड़ की लागत से जमरानी बांध के निर्माण का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था। इसके सापेक्ष 1982 में बांध का पहला चरण शुरू हुआ, जिसके तहत काठगोदाम में गौला बैराज तथा 40 किलोमीटर की नहरों का निर्माण किया गया। आगे 1988 में केंद्रीय जल आयोग से बांध की अनुमति मिली। किंतु तब तक बांध की लागत 144.84 करोड़ पहुंच गई। याचिका में कहा गया है कि बांध निर्माण से उत्तर प्रदेश को 47 हजार व उत्तराखंड को 9 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में पानी, बिजली व सिंचाई मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया था। 2014 में फिर से डीपीआर बनाई गई तो लागत 2350.56 करोड़ पहुंच गई। याची के अनुसार बांध को लेकर उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के बीच समझौता नहीं हो सका, जिस कारण साल दर साल नुकसान हो रहा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए तीन साल के भीतर बांध निर्माण पूरा करने का आदेश पारित किया है।

यह भी पढ़ें : राष्ट्रीय योजना में शामिल होगा जमरानी बांध !

जमरानी बांध के निर्माण की बाधाएं कम होती नज़र आ रही हैं। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय योजना में शामिल करने संबंधी उत्तराखंड शासन के प्रस्ताव को लगभग मंजूर कर लिया है और जल्द ही इस संबंध में केंद्र सरकार से घोषणा होने की उम्मीद है। बांध के राष्ट्रीय योजना में शामिल होते ही इसके निर्माण की 90 फीसदी राशि केंद्र सरकार देगी और 10 फीसदी राशि राज्य सरकार को खर्च करनी होगी। बताया गया है कि जमरानी बांध को राष्ट्रीय योजना में शामिल करने संबंधी प्रजेंटेशन केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के उच्चाधिकारियों के समक्ष पिछले दिनों सिंचाई विभाग और शासन के आला अधिकारियों ने दिल्ली में दिया था। इसके बाद ही मंत्रालय के अधिकारियों ने बांध को राष्ट्रीय योजना में शामिल करने के संबंध में अपनी सहमति दे दी थी। मंत्रालय अगले कुछ दिनों के भीतर ही बांध को राष्ट्रीय योजना में शामिल करने संबंधी घोषणा करने जा रहा है। इसके लावा केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की बांध के मामले में पर्यावरण को लेकर आई आपत्तियों का निराकरण भी कर दिया गया है।

जमरानी बांध निर्माण के मामले में यूपी व उत्तराखंड सरकारों से जवाब तलब

1975 से लटके प्रदेश के जमरानी बांध के निर्माण का मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय की दहलीज पर पहुंच गया है। मामले में न्यायालय ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की सरकारों से तीन सप्ताह मे जबाब देने के आदेश दिए है। इस मामले में गौलापार निवासी रविशंकर जोशी ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सन 1975 से जमरानी बांध बनाने कि कार्यवाही शुरू हुई हुई थी। इस कड़ी में बांध निर्माण के लिए 1982 मे गौला बैराज का भी निर्माण किया गया। किन्तु जमरानी बाँध को बनाने के सम्बंध में अभी तक कोई कार्यवाही नही की गयी है। यह बांध कागजों में ही बनकर रह गया है। याची का कहना है कि हल्द्वानी शहर व उसके आसपास के क्षेत्रों में पेयजल व सिंचाई हेतु इस बांध की अति आवश्यक्ता है। याची का कहना है कि बांध से सम्बंधित करोड़ों रूपये की मशीनें बेकार पड़ी हैं, इसलिए बांध को जल्द बनाया जाये। मामले को सुनने के बाद मुख्य न्यायधीश केएम जोसफ व न्यायाधीश वीके बिष्ट की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड सरकारों से तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है, और मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह के बाद की नियत की है।

पूर्व प्रगति :

इस बावत उत्तराखंड के मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने मंगलवार (19.05.2015) को अध्यक्ष केंद्रीय जल आयोग, राकेश कुमार और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों से विचार-विमर्श किया।  बैठक में परियोजना का टाइम फ्रेम तय किया गया। 7 जून 2015 तक परियोजना की नई डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बन जायेगी। विभाग के अनुसार 351.5 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण के लिए डिजिटल मैप तैयार करने की कार्यवाही शुरू हो गई है। एक महीने में पहले चरण का फोरेस्ट क्लीयरेंस (एफएसी) मिल जाएगा। जुलाई तक दूसरे चरण का क्लीयरेंस (एफआईए) मिल जाएगी। बैठक में यह भी तय किया गया कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मिलकर जमरानी बांध का निर्माण करेंगे। पानी और व्यय की हिस्सेदारी का निर्णय दोनों राज्य आपस में मिलकर कर लेंगे। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में केंद्रीय जल आयोग हस्तक्षेप करेगा। बैठक में निर्णय लिया गया कि जमरानी बांध परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने का अनुरोध केंद्र सरकार से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार करेगी। बांध की लागत का 90 प्रतिशत वहन केंद्र सरकार करे। शेष 10 प्रतिशत दोनों राज्य मिलकर करेंगे। इसके साथ ही व्यय और लाभ की हिस्सेदारी पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में नए सिरे से करार किया जाएगा। सिंचाई विभाग ने एडवाइजरी कमेटी की आपत्तियों के निस्तारण के लिए डिजिटल मैप बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। साथ ही भूमि हस्तांतरण के लिए टिहरी जिले में भूमि प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश भी जारी हो गए हैं।

पूर्व समाचार (2 नवम्बर 2014): यूपी न माना तो अपने दम जमरानी बांध बनाएगा उत्तराखंड

Rashtriya Sahara, 02 Nov, 2014

Rashtriya Sahara, 02 Nov, 2014.

-यूपी के अपने समकक्ष अखिलेश यादव से इसी माह निर्णायक वार्ता करेंगे मुख्यमंत्री हरीश रावत, इसी दौरान दोनों राज्यों के बीच एमओयू होने की भी जताई उम्मीद
-जल संग्रह के लिए प्रदेश सरकार को बेहद गंभीर बताया
-1965 से लटका है 130.60 मीटर ऊंचे बांध का मामला
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि वह जमरानी बांध के मुद्दे पर इसी (नवंबर) माह में यूपी के अपने समकक्ष अखिलेश यादव से मिलकर वार्ता करेंगे। उम्मीद जताई कि इसी दौरान दोनों राज्यों के बीच इस आधी शताब्दी से लंबित मसले पर अनुबंध (एमओयू) हस्ताक्षरित हो जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यूपी को चेतावनी देने के अंदाज में दो-टूक कहा कि यदि यूपी न माना तो उत्तराखंड स्वयं अपने दम पर अपनी जरूरतों के अनुरूप छोटा ही सही लेकिन जमरानी बांध बनाने की कार्रवाई करेगा। श्री रावत ने यह बात शनिवार को स्थानीय बोट हाउस क्लब में ‘राष्ट्रीय सहारा’ द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कही। कहा कि वह उत्तराखंड में जल संग्रहण के प्रति हमेशा से गंभीर रहे हैं। केंद्र में जल संसाधन मंत्री रहते भी उन्होंने हरीशताल से लेकर भीमताल तक की अनेक झीलों के संरक्षण के लिए योजनाएं स्वीकृत की थीं, जिन पर अब काम शुरू होने की उम्मीद है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….।मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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