Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

नंदा देवी महोत्सव के लिये बना विशाल स्वागत द्वार गिरा, कई वाहन क्षतिग्रस्त

Spread the love

नैनीताल, 22 सितंबर 2018। नगर में गत दिनों आयोजित हुए नंदा देवी महोत्सव के लिये डीएसए कार पार्किंग में बांस से बनाया गया मुख्य स्वागत द्वार रात्रि में ढह गया है। इसका कारण तेज बारिश और तेज हवाओं का चलना माना जा रहा है। गनीमत रही कि घटना रात्रि करीब 10 बजे हुई। अन्यथा इस स्थान पर खड़े होने वाले पार्किंग कर्मियों के साथ कोई अनहोनी हो सकती थी। बावजूद द्वार गिरने से पार्किंग में खड़े कम से कम 4 पर्यटक वाहन क्षतिग्रस्त हो गए हैं। पार्क का निर्माण जिला प्रशासन के द्वारा करवाया गया था, और इसे मेला समाप्त होने के 3 दिन बाद भी नहीं हटाया गया था।

यह भी पढ़ें : दो वर्षों में आधी से भी कम रह गयी नंदा देवी महोत्सव में श्रद्धालुओं की संख्या !

-महोत्सव के दौरान लगे निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर में दो वर्ष पहले के 2200 की जगह इस बार केवल 1032 ने ही कराई स्वास्थ्य जांच
नैनीताल। नंदा देवी महोत्सव के तहत तीन दिनों तक जिला रेडक्रॉस समिति के तत्वावधान में स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया गया था। बताया गया है कि इस दौरान शिविर में कुल 1032 लोगों ने अपना ब्लड प्रेशर व शुगर आदि की निःशुल्क जांचें कर स्वास्थ्य परीक्षण कराया। इनमें से 122 लोगों को शुगर एवं 132 को ब्लड प्रेसर बढ़ा हुआ पाया गया। इनमें अकेले अपर निदेशक डा. तारा आर्या ने 712 लोगों की जांच की। बताया गया कि इस बार पिछले तीन वर्षों के मुकाबले जांच कराने वाले लोगों की संख्या आधे से भी कम रही। इससे पहले वर्ष 2016 में 2200 व वर्ष 2017 में 1800 लोगों ने स्वास्थ्य जांच कराई थी। इसका कारण मेले का प्रबंधन श्रीराम सेवक सभा से पहले नगर पालिका और अब जिला प्रशासन के पास जाने के बाद 2 वर्षों में मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में आयी कमी को बताया गया है। शिविर में डा. एमएस दुग्ताल, डा. पीडी गुप्ता, डा. उमा रावत, डा. मिश्रा वएवं आईके जोशी, मुस्तकीन, सपना आर्या, रूही तबस्सुम, डीके डालाकोटी आदि ने सहयोग किया। साथ ही जिला रेडक्रास समिति के चेयरमैन सीएस रावत, वाइस चेयरमैन मुन्नी तिवारी, आरएन प्रजापति, बीसी तिवारी, वीके शुक्ला, शंकर बोरा, कल्पना बोरा, चंचला बिष्ट, सुरेश गुरुरानी, डा. सरस्वती खेतवाल, पवन कुमार, नीरज जोशी, मनमोहन कनवाल आदि का भी सहयोग रहा।

यह भी पढ़ें : विदा होने के लिए नगर भ्रमण पर निकलीं माता नंदा-सुनंदा

‘नवीन समाचार’ पर कीजिये माता ‘नंदा-सुनंदा’ की शोभायात्रा  के दर्शन

नैनीताल, 19 सितंबर 2018। पांच दिन पूर्व कदली दलों के रूप में अपने मायके की तरह माता नयना की नगरी में पधारीं और बीते तीन दिनों से नगर वासियों को अपनी सुंदर प्राकृत पर्वताकार छवि में दर्शन दे रहीं माता नंदा-सुनंदा के बुधवार को विदा होने की घड़ी आ गयी। इस अवसर पर माता अपने डोले पर नगर भ्रमण पर शोभायात्रा के रूप में निकल रही हैं। आयोजक श्रीराम सेवक सभा की अगुवाई में सभा के पदाधिकारियों एवं वर्षों से माता के डोले को कंधा दे रहे श्रद्धालुओं के कंधों पर माता दोपहर करीब साढ़े बजे माता नयना देवी के मंदिर से निकलीं, और आगे अपने परंपरागत मार्ग में बौद्ध धर्मावलंबियों के तिब्बती मार्केट, गुरुद्वारा गुरुसिंह सभा, मेला क्षेत्र, जामा मस्जिद, आर्य समाज मंदिर और मैथोडिस्ट चर्च आदि के साथ ही गत 18 अगस्त को ध्वस्त हुई लोअर मॉल रोड के अपने परंपरागत मार्ग से शान से गुजरते हुए श्रद्धालुओं को दर्शन दे रही हैं। इस मौके पर श्रद्धालुओं में उनके दर्शनों के लिए गजब का उत्साह दिखाई दे रहा है। खासकर महिलाएं उन्हें अक्षत और भेंट चढ़ा रही हैं। सड़क के दोनों और उनकी शोभायात्रा में शामिल लोगों का मेला लगा हुआ है। लोग उनकी एक झलक पाने और उनके डोले को छूने को लालायित हो उमड़ रहे हैं। शोभायात्रा में अनेक झांकियां जहां उत्साह बढ़ा रही हैं, वहीं उत्साह भी बढ़ा रहे हैं।

यह भी पढ़ें: नंदा देवी महोत्सव पर आज ‘केवल नगर क्षेत्र के स्कूलों’ में छुट्टी घोषित

  • गत वर्षों में नंदाष्टमी को पूरे दिन का डीएम के स्तर से स्थानीय अवकाश व डोला विसर्जन के दिन नगर के साथ ही निकटवर्ती क्षेत्रों में भी रहता था आधे दिन का अवकाश 

नैनीताल, 18 सितंबर 2018। डीएम विनोद कुमार सुमन ने 19 सितंबर को माता नंदा देवी महोत्सव के तहत डोला भ्रमण के अवसर पर मुख्यालय क्षेत्र के सभी शासकीय, अर्धशासकीय व निजी विद्यालयों में अवकाश घोषित कर दिया है। डीएम की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि नैनीताल में जिला प्रशासन के द्वारा 14 से 19 सितंबर 2018 के मध्य मां नंदा देवी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत 19 को मां नंदा देवी का डोला नगर भ्रमण करते हुए शाम 7 बजे पाषाण देवी मंदिर के समीप से विसर्जित किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि गत वर्षों में नंदाष्टमी (इस वर्ष 17 सितंबर) को पूरे दिन का डीएम के स्तर से स्थानीय अवकाश रहता था। किंतु इस वर्ष इसी दिन विश्वकर्मा पूजा का अवकाश रहने के कारण यह अवकाश अलग से नहीं दिया गया। वहीं डोला विसर्जन के दिन नगर के साथ ही निकटवर्ती क्षेत्रों में भी आधे दिन का अवकाश रहता था। इस वर्ष नगर क्षेत्र में तो अवकाश आधे के बजाय पूरे दिन का रहेगा, अलबत्ता निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के मेला-महोत्सव में हर वर्ष आने वाले ग्रामीणों को इस अवकाश का लाभ नहीं मिलेगा।

यह भी पढ़ें:  प्राकृत पर्वताकार में प्रकट हुईं मां नंदा-सुनंदा, सैकड़ों श्रद्धालुओं ने किए प्रथम दर्शन

नैनीताल, 17 सितंबर 2018। माता नयना की नगरी नैनीताल में एक बेटी की तरह सप्ताह भर के लिए अपने मायके आयीं माता नंदा-सुनंदा ने सोमवार सुबह तड़के दर्शन दे दिए हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में माता अपने भक्तों के द्वारा ही कदली दलों से तैयार हो कर प्राकृत पर्वताकार में प्रकट हुईं। उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की पूजा श्रीराम सेवक सभा के महासचिव राजेन्द्र लाल साह व उनकी धर्मपत्नी आभा साह के यजमानत्व में पंडित भगवती प्रसाद जोशी व आचार्य जगदीश लोहनी द्वारा सोमवार सुबह ब्रह्म मुहूर्त में कराई गयी। इसके उपरांत नयना देवी मंदिर में रखे गए पंडाल से उन्होंने देर रात्रि से ही भजन- कीर्तनों में जमे सैकड़ों श्रद्धालुओं को दिव्य दर्शन दिए।

इस दौरान माहौल बेहद भक्तपूर्ण रहा।

इससे पूर्व रविवार को सेवा समिति भवन में आयोजक संस्था श्रीराम सेवक सभा के चंद्र प्रकाश साह, नवीन लाल साह, संतोष पाण्डेय, हीरा सिंह, गोविन्द सिंह, गोधन सिंह, हरीश पंत, कुंदन नेगी, किशन गुरुरानी, ललित साह, पुष्कर लाल साह, सागर, मोहित साह, दीप गुरुरानी व भोला वर्मा आदि कार्यकर्ता सुबह 9 बजे से ही मूर्ति निर्माण के कार्य में जुट गये थे। इसके उपरांत करीब 2 बजे से मूर्तियों में रंग भरने का कार्य मोनिका साह व आरती संभल आदि के द्वारा किया गया। उधर नयना देवी मंदिर परिसर में पंडाल निर्माण का कार्य भी तेजी से किया गया। मंदिर परिसर में छोलिया नर्तक भी लोक संस्कृति के रंग भरे रहे।
इधर फ्लैट्स मैदान में जिला प्रशासन की ओर से आयोजित किये जा रहे मेले में झूलों का चलना प्रारंभ हो गया है, जबकि पूर्व में मेला नंदाष्टमी के दिन से ही शुरू होता था। अलबत्ता, मेले में दुकानों के महंगी होने के आरोप लगाते हुए कई बाहरी दुकानदारों के लौटने तथा मेला ठेकेदार के भी हाथ खींचने की खबर है। मेले में स्थानीय दुकानदारों को 11 हजार रुपए में जबकि बाहरी दुकानदारों को महंगी दुकानें दिये जाने के प्राविधान किये गये थे। ऐसे में कुछ स्थानीय लोगों द्वारा सस्ती दुकानें लेकर उन्हें बाहरी लोगों को महंगे में किराये पर देने के आरोप भी लग रहे हैं।

एक वर्ष के इंतजार के बाद माता ‘नयना की नगरी’ में कदली स्वरूप में लौट आईं माता ‘नंदा-सुनंदा’

-तीन वर्ष बाद बिना वर्षा के सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं, महिलाओं, छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक वस्त्रों में सजकर कराया नगर भ्रमण

माता नयना की नगरी में कदली स्वरूप में पहुंचीं मां नंदा-सुनंदा को नगर भ्रमण कराते नगरवासी।
माता नयना की नगरी में कदली स्वरूप में पहुंचीं मां नंदा-सुनंदा को नगर भ्रमण कराते नगरवासी।
शोभायात्रा का अवलोकन करते विदेशी सैलानी।

नैनीताल, 15 सितंबर 2018। एक वर्ष के लंबे अंतराल और एक-एक दिन गिनने के बाद आखिर वह दिव्य पल आ गए जब राज्य की कुलदेवी मां नंदा और सुनंदा पवित्र कदली दलों (केले के वृक्षों) के स्वरूप में माता नयना की नगरी में लौट आईं। अब वह अगले पांच दिनों तक एक बेटी के रूप में अपने मायके में रहेंगी। उनके आगमन पर आज नगर के सभी श्रद्धालु हर्षित हो उठे। उनके नगर भ्रमण में सैकड़ों लोगों, खासकर महिलाओं की भीड़ पारंपरिक परिधानों में उमड़ी, जबकि बड़ी संख्या में नगर वासियों ने सड़क किनारे और घरों की बुर्जों से भी उनके दर्शन करते हुऐ उनका अक्षत अर्पित करते हुए स्वागत किया।
शुक्रवार को पवित्र कदली वृक्षों के रूप में मां नंदा-सुनंदा का निकटवर्ती जलालगांव से आकर सबसे पहले सूखाताल और फिर तल्लीताल स्थित मां वैष्णो देवी मंदिर में स्वागत हुआ। वैष्णवी देवी मंदिर समिति के सदस्यों के द्वारा बीते कई वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत कदली वृक्षों की पूजा अर्चना की गई, व श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया। यहां से शक्ति स्वरूपा मां नंदा-सुनंदा कदली वृक्षों के रूप में नगर भ्रमण पर निकलीं। तल्लीताल धर्मशाला और बाजार से पारंपरिक रंग्वाली लहंगे-पिछौड़े में सजीं नगर की महिलाओं और सरस्वती शिशु मंदिर, बालिका विद्या मंदिर, एशडेल, निशांत, नैनी पब्लिक स्कूल व जीजीआईसी आदि अनेक स्कूलों की छात्राएं कुमाऊं के परंपरागत घाघरा व रंग्वाली पिछौड़ा के वस्त्रों में सजकर और कई माता नंदा-सुनंदा के रूप में आत्मसात होकर कलश यात्रा में ‘जै मां नंदा सुनंदा तेरी जै जैकारा’ व ‘जै भगोती नंदा’ के गगनभेदी नारे लगाते हुए एवं महिलाएं भजन मंडलियों में भजन-कीर्तन करते हुए साथ चल रही थीं। सबसे आगे शांति का प्रतीक धवल श्वेत तो सबसे पीछे विजय के लिए क्रांति का संदेश देता लाल ध्वज पारंपरिक रूप में चल रहा था। माता नगर भ्रमण करते हुऐ माल रोड से नैनी सरोवर का चक्कर लगाते हुए मल्लीताल राम लीला मैदान और यहां से मां के आकर्षक पर्वताकार मूर्ति स्वरूप में परिवर्तित होने के लिए नयना देवी मंदिर के समीप पहुंचीं। शोभायात्रा में श्रीराम सेवक सभा के पदाधिकारी एवं नगर के बड़ी संख्या में श्रद्धालु व गणमान्य लोग शामिल रहे। शोभायात्रा में सभा के उपाध्यक्ष अनूप शाही, महासचिव राजेंद्र लाल साह, कमलेश ढोंढियाल, कैलाश जोशी, भीम सिंह कार्की, राजेंद्र बजेठा सहित विक्की राठौर, भास्कर महतोलिया व भुवन बिष्ट आदि प्रमुखता से मौजूद रहे। विदेशी सैलानी भी शोभायात्रा का आनंद लेते देखे गये। शोभायात्रा के उपरांत कदली दलों को सेवा समिति भवन में रख दिया गया है, जहां रविवार को इनसे माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियों को निर्माण किया जाएगा, और सोमवार की सुबह ब्रह्ममुहूर्त में मूर्तियों को नयना देवी मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के उपरांत श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखा जाएगा।

यह भी पढ़ें : सरोवरनगरी में नंदा-सुनंदा का 115वां महोत्सव अपेक्षाकृत कम उत्साह के साथ प्रारंभ

-परम्पराओं के साथ प्रकृति व पर्यावरण के लिए संवेदशील होने, पेड़ पौधों का संरक्षण करने का विधायक ने किया आह्वान

श्रीनंदा देवी महोत्सव का दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ करते विधायक, डीएम आदि।

नैनीताल, 14 सितंबर 2018। सरोवर नगरी नैनीताल का परम्परागत माता नंदा-सुनंदा का 115वें महोत्सव शुक्रवार को वैदिक मंत्रों एवं धार्मिक आनुष्ठानों के बीच प्रारंभ हो गया। स्थानीय विधायक संजीव आर्य तथा डीएम विनोद कुमार सुमन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्जवलित कर महोत्सव का औपचारिक शुभारम्भ किया। इस दौरान रंगारंग धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए तथा अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरा कर रहे आयोजक संस्था श्रीराम सेवक सभा के चुनिंदा पदाधिकारियों के दल को अतिथियों के द्वारा महोत्सव के परंपरागत लाल व सफेद रंग के ध्वज प्रदान कर कदली वृक्ष लाने हेतु विदा किया गया। साथ ही कदली वृक्षों के स्थान पर रोपने के लिए पूजा-अर्चना के साथ पौधारोपण हेतु 21 पौधे भी पिछले कुछ वर्षों से शुरू हुई पर्यावरणीय परंपरा के तहत विदा किये गये हैं। अलबत्ता, महोत्सव का मेले वाला हिस्सा प्रशासन द्वारा किये जाने के बीच महोत्सव में आयोजकों के साथ ही आम जनता में भी अपेक्षाकृत कम उत्साह देखा जा रहा है।
कार्यक्रमों की शुरुआत सभा से जुड़ी बालिकाओं के द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना से हुई, जिसके बाद छात्राओं के द्वारा माता नंदादेवी की स्तुति पर आधारित वंदना व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये। इस अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए विधायक श्री आर्य ने कहा कि माता नंदा-सुनंदा सभी की मनोकामानाऐं पूरी करें तथा देश-प्रदेश व समाज में सुख, समृद्धि बनी रहे यही हमारी माता नंदा से प्रार्थना है। उन्होंने इस महोत्सव को 15 वर्ष पूर्व 1903 में शुरू करने वाले एवं इसकी परंपरा को बीच में दो विश्व युद्धों के बावजूद अनवरत जारी रखने में योगदान देने वाले आयोजक संस्था से जुड़े सहित सभी लोगों को आभार भी जताया। कहा कि उत्तराखंड देवभूमि है। यहां की संस्कृति व परम्परायें समृद्ध हैं, इन्हें संरक्षित रखने की आवश्यकता है। हमें अपनी परम्पराओं का सम्वाहक बनना होगा, साथ ही प्रकृति व पर्यावरण के लिए संवेदशील होकर पेड़ पौधों का भी संरक्षण करना होगा। वहीं डीएम श्री सुमन ने कहा कि प्रदेश सरकार लोकगीत, लोकसंगीत तथा लोक संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है। कहा कि आधुनिकता एंव विज्ञान को अपनाना अच्छी बात है, परंतु हमें अपनी संस्कृतियों को भी नहीं छोड़ना चाहिए। मेले को शांतिपूर्ण सम्पन्न कराने हेतु प्रशासन पूरी तरीके से कटिबद्व है। धार्मिक आयोजन आचार्य भगवती प्रसाद जोशी ने पूरे कराये। पूर्व अध्यक्ष मुकेश जोशी ने सभा की 100 वर्षों एवं आयोजन की 115 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा तथा गत वर्ष तक महोत्सव के आयोजन में शुभारंभ से लेकर मूर्ति निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाने वाले सभा के संरक्षक स्वर्गीय गंगा प्रसाद साह का भावपूर्ण स्मरण किया। इस अवसर पर आईजी पूरन सिंह रावत, एसएसपी जन्मेजय खण्डूरी, सीडीओ विनीत कुमार, मेला अधिकारी-उपजिलाधिकारी अभिषेक रूहेला, श्रीराम सेवक सभा के अध्यक्ष मनोज शाह, उपाध्यक्ष अनूप शाही, महासचिव राजेंद्र लाल साह, पूर्व अध्यक्ष गिरीश जोशी, मुकेश जोशी, पूर्व विधायक सरिता आर्या, डा. नारायण सिंह जंतवाल, पूर्व जिला जज उत्तम नबियाल, भाजपा मंडल अध्यक्ष मनोज जोशी, शांति मेहरा, अरविंद पडियार, डा. सरस्वती खेतवाल, मुन्नी तिवाड़ी, मंजू कोटलिया, कमलेश ढोंढियाल, जगदीश बवाड़ी के साथ ही बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। संचालन नवीन पाण्डेय ने किया।

अग्रिम पंक्ति में बैठने को लेकर रही अव्यवस्था, पीछे सीटें रहीं खाली

नैनीताल। महोत्सव के शुभारंभ के मौके पर नये आयोजक मंडल के नौसिखियेपन के कारण कुछ अव्यवस्थाएं भी देखने को मिलीं। आयोजक संस्था के लोग अतिथियों के बजाय स्वयं अग्रिम पंक्ति पर सीमित क्षमता के सोफों पर पसरे रहे। ऐसे में आईजी के कुछ देर में आने और इस दौरान अन्यत्र गये डीएम के स्थान पर बैठने के बाद डीएम को आईजी व एसएसपी के बीच सोफे की बीच की मुंडेर पर बैठना पड़ा। वहीं पीछे की सीटें कमोबेश पहली बार खाली भी रहीं, और श्रद्धालुओं में भी अपेक्षाकृत जोश की कमी देखी गयी। महोत्सव के शुभारंभ के लिए पिछली बारों की तरह पूर्व विधायकों को मंच पर आमंत्रित नहीं किया गया, इसके बाद पूर्व विधायक सरिता आर्य शुभारंभ के तत्काल बाद ही देहरादून जाने की बात कहते हुए निकल गयीं। आयोजन में कुमाऊं आयुक्त को भी आमंत्रित किया गया था, किंतु वे भी आखिरी क्षणों में हल्द्वानी जाने की बात कह कार्यक्रम में नहीं आये।

राष्ट्रीय सहारा, 12 सितंबर 2018

यह भी पढ़ें : 12 सितंबर से ही शुरू हो जाएंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम, महोत्सव में झोड़ा-चांचरी भी होंगे

नैनीताल, 12 सितंबर 2018। सरोवरनगरी में अपने 115वें वर्ष में नंदा देवी महोत्सव आयोजित करने जा रहे और स्वयं संस्था की 100वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम 12 सितंबर को वर्षगांठ के मौके से ही प्रारंभ हो जाएंगे, एवं इस दौरान संस्था अपने प्रमुख धार्मिक व सामाजिक संस्था के स्वरूप के अनुरूप अन्य धर्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही संस्था कुमाऊं की प्राचीन लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय व ग्रामीण महिलाओं के द्वारा पहली बार नयना देवी मंदिर में झोड़ा व चांचरी नृत्य करने का भी अनुरोध कर रही है।
मंगलवार को सभा के नवनिर्मित भवन में आयोजित महोत्सव की पहली पत्रकार वार्ता में संस्था के पदाधिकारियों ने यह जानकारी दी। साथ ही बताया कि 12 सितंबर 1918 को स्थापित संस्था की बुधवार को 100 वर्ष पूरे होने के मौके से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ हो जाएंगे, जोकि 18 सितंबर तक चलेंगे। अलबत्ता संस्था की स्मारिका पिछले वर्ष नहीं छप पाने के बाद इस वर्ष भी महोत्सव के दौरान नहीं, अलबत्ता आगे विजयादशमी के मौके पर विमोचन किया जाएगा। इस मौके पर पदाधिकारियों ने बताया कि संस्था का नवनिर्मित भवन जरूरतमंदों के शादी-विवाह जैसे कार्यों तथा एक दिवसीय संगोष्ठियों आदि के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा। इस दौरान महोत्सव के कलेंडरों का विमोचन भी किया गया। पत्रकार वार्ता में संस्था के अध्यक्ष मनोज साह, उपाध्यक्ष अनूप शाही, महासचिव राजेंद्र लाल साह, उप सचिव डा. मोहित रौतेला सहित विमल चौधरी, मुकेश जोशी, कृष्ण कुमार साह, प्रदीप बिष्ट, गिरीश भट्ट, गोधन सिंह व दीप जोशी आदि भी मौजूद रहे।

14 सितंबर को होगा शुभारंभ, जलालगांव से लाये जाएंगे कदली दल

नैनीताल, 21 अगस्त 2018। नगर की प्रतिष्ठित धार्मिक संस्था श्री राम सेवक सभा द्वारा प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले श्रीनंदा देवी महोत्सव की तैयारियां प्रारम्भ हो चुकी हैं। इसी कड़ी में मूर्ति निर्माण हेतु कदली वृक्ष जलालगांव मंगोली के प्रकाश सिंह बिष्ट के घर से लाना निश्चित किया गया है। इस हेतु सभा से विमल चौधरी, पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष मुकेश जोशी, हीरा सिंह, गोधन सिंह, भुवन सिंह आदि द्वारा उक्त स्थल का निरीक्षण किया गया और ग्राम प्रधान रघुवर सिंह बिष्ट के नेतृत्व में ग्रामीणों के साथ कदली वृक्ष से संबंधित कार्यक्रमों हेतु विचार मंथन कर तय किया गया कि 14 सितंबर 2018 को सभा का एक सीमित दल निशांण, छोलिया दल सहित जलालगॉंव जाएगा, जहां कलश यात्रा, ग्राम भ्रमण, भंडारा तथा रात्रि पूजन के कार्यक्रम होंगे।

आगे 15 सितम्बर को सभा के अन्य कार्यकर्ता भी वहां जाएंगे और देवी पाठ, देवी भेग, वृक्ष लाना, कन्या पूजन, भंडारा, आदि के पश्चात् नैनीताल लौटेेंगे। नैनीताल में यह दल कदली दलों के साथ सर्वप्रथम सूखाताल पहुंचेगा, और यहां रामलीला कमेटी सूखाताल द्वारा व तल्लीताल स्थित वैष्णोदेवी मंदिर में पूजा अनुष्ठान के बाद माल रोड से मल्लीताल के लिये स्कूलों की झांकियों, महिला दल, छोलिया दल तथा कार्यकर्ताओं के साथ शोभायात्रा नयना देवी मंदिर लायी जाएगी, और इसके बाद इनसे मूर्तिनिर्माण का कार्य प्रारम्भ होगा। बैठक में अध्यक्ष मनोज साह, उपाध्यक्ष अनूप सिंह साही, सचिव राजेंद्र लाल साह, उपसचिव डा. मोहित सनवाल, प्रबंधक विमल चौधरी, गिरीश जोशी, चंद्र प्रकाश साह, मनोज जोशी, हिमांशु जोशी आदि उपस्थित रहे।

मां ‘नयना की नगरी’ में होती है राज राजेश्वरी मां नंदा की ‘लोक जात’

नंदा-सुनंदा पर फूलों की वर्षा

-यहां राज परिवार का नहीं होता आयोजन में दखल, जनता ने ही की शुरुआत, जनता ही बढ़-चढ़ कर करती है प्रतिभाग
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड में प्रसिद्ध कुमाऊं-गढ़वाल को एक सूत्र में पिरोने वाली आदि शक्ति राज राजेश्वरी माता नंदा की ‘राज जात’ से इतर माता नयना की नगरी नैनीताल में माता नंदा-सुनंदा की ‘लोक जात’ का आयोजन किया जाता है। अमूमन 12 वर्षों के अंतराल में आयोजित होने वाली ‘राज जात’ के इतर सरोवरनगरी में पिछले 115 वर्षों से हर वर्ष बीच में प्रथम व द्वितीय दो विश्व युद्धों की विभीषिका के बावजूद बिना किसी व्यवधान के न केवल यह महोत्सव अनवरत जारी है, वरन हर वर्ष समृद्ध भी होता जा रहा है। बिना राज परिवार के जनता द्वारा शुरू किए गए और जनता की ही सक्रिय भागेदारी से आयोजित होने वाले इस महोत्सव को मां नंदा की ‘लोक जात’ ही अधिक कहा जा सकता है।

This slideshow requires JavaScript.

उल्लेखनीय है कि नैनीताल में कुमाऊं-गढ़वाल को एक सूत्र में पिरोने वाली मां नंदा के महोत्सव की सरोवरनगरी में शुरुआत राज परिवार के बजाय नगर के संस्थापकों में शुमार मोती राम शाह ने 1903 में अल्मोड़ा से लाकर की थी। तभी से नगर वासियों की इस महोत्सव और माता नंदा-सुनंदा के प्रति ऐसी अटूट आस्था है कि वह और खासकर महिलाएं वर्ष भर इस महोत्सव का इंतजार करते हैं। देश ही नहीं विदेशों में रहने वाले नगर के प्रवासी भी वर्ष में कम से कम इस मौके पर अवश्य घर लौटते हैं।
कुमाऊं में नंदा महोत्सवों के आयोजन के बारे में कहा जाता है कि पहले यह आयोजन चंद वंशीय राजाओं की अल्मोड़ा शाखा द्वारा होता था। किंतु 1938 में इस वंश के अंतिम राजा आनंद चंद के कोई पुत्र न होने के कारण तब से यह आयोजन इस वंश की काशीपुर शाखा द्वारा आयोजित किया जाता है। वर्तमान में उनका प्रतिनिधित्व नैनीताल के पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा करते हैं। कहते हैं कि नैनीताल की स्थापना के बाद वर्तमान बोट हाउस क्लब के पास नयना देवी के मूल मंदिर की स्थापना की गई थी। 1880 में यह मंदिर नगर के महाविनाशकारी भूस्खलन की चपेट में आकर दब गया। इसके बाद इसे वर्तमान स्थान पर स्थापित किया गया। यहां मूर्ति को स्थापित करने वाले मोती राम शाह ने ही 1903 में अल्मोड़ा से लाकर नैनीताल में नंदा महोत्सव की शुरुआत की। शुरुआत में यह आयोजन नयना देवी मंदिर समिति द्वारा आयोजित होता था। आगे मोती राम शाह के पुत्र अमर नाथ शाह व पौत्र उदय नाथ शाह ने भी यह आयोजन कराया, और आखिर उदय नाथ शाह ने 1926 से यह आयोजन नगर की सबसे पुरानी 1918 में स्थापित धार्मिक सामाजिक संस्था श्रीराम सेवक सभा को दे दिया, जो तभी से लगातार दो विश्व युद्धों के दौरान भी बिना रुके 115 वर्षों से सफलता से और नए आयाम स्थापित करते हुए यह आयोजन कर रही है। यहीं से प्रेरणा लेकर अब कुमाऊं के कई अन्य स्थानों पर भी नंदा महोत्सव के आयोजन होने लगे हैं। इसलिये नैनीताल को नंदा महोत्सवों का प्रणेता भी कहा जाता है। इधर विगत वर्ष 2015 से महोत्सव के तहत फ्लैट्स मैदान में होने वाली मेले की जिम्मेदारी नैनीताल नगर पालिका को दे दी गयी है।

उत्तराखंड की ‘कुलदेवी’ हैं, ‘आराध्य देवी’ हैं अथवा ‘विजय देवी’ हैं राज राजेश्वरी मां नंदा ?

एक शताब्दी से पुराना और अपने 115वें वर्ष में प्रवेश कर रहा सरोवरनगरी का नंदा महोत्सव आज अपने चरम पर है। पिछली शताब्दी और इधर तेजी से आ रहे सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाते दौर में भी यह महोत्सव न केवल अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहा है, वरन इसने सर्वधर्म सम्भाव की मिशाल भी पेश की है। यह पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है, और उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं व गढ़वाल अंचलों को भी एकाकार करता है। यहीं से प्रेरणा लेकर कुमाऊं के विभिन्न अंचलों में फैले मां नंदा के इस महापर्व ने देश के साथ विदेश में भी अपनी पहचान स्थापित कर ली है।

इस मौके पर माता नंदा सुनंदा के बारे में फैले भ्रम और किंवदंतियों को जान लेना आवश्यक है। विद्वानों के इस बारे में अलग अलग मत हैं, लेकिन इतना तय है कि नंदादेवी, नंदगिरि व नंदाकोट की धरती देवभूमि को एक सूत्र में पिरोने वाली शक्तिस्वरूपा मां नंदा ही हैं। यहां सवाल उठता है कि नंदा महोत्सव के दौरान कदली वृक्ष से बनने वाली एक प्रतिमा तो मां नंदा की है, लेकिन दूसरी प्रतिमा किन की है। सुनंदा, सुनयना अथवा गौरा पार्वती की ?

एक दंतकथा के अनुसार माता नंदा को त्रेता युग में नंद यशोदा की पुत्री महामाया भी बताया जाता है जिसे दुष्ट कंश ने शिला पर पटक दिया था। लेकिन वह अष्टभुजाकार रूप में प्रकट हुई थीं। यही नंद पुत्री महामाया नवदुर्गा कलियुग में चंद वंशीय राजा के घर नंदा रूप में और उनके जन्म के कुछ समय बाद ही सुनंदा भी प्रकट हुईं। राज्यद्रोही शडयंत्रकारियों ने उन्हें कुटिल नीति अपनाकर भैंसे से कुचलवाने की कोशिश की। इस पर उन्होंने कदली यानी केले के वृक्ष की ओट में छिपने का प्रयास किया लेकिन इस बीच एक बकरे ने केले के पत्ते खाकर उन्हें भैंसे के सामने कर दिया। बाद में यही कन्याएं पुर्नजन्म लेते हुए नंदा-सुनंदा के रूप में अवतरित हुईं और राज्यद्रोहियों के विनाश का कारण बनीं। इसीलिए कहा जाता है कि नंदा-सुनंदा अब भी चंदवंशीय राजपरिवार के किसी सदस्य के शरीर में प्रकट होती हैं, और वह चंद वंशीय राजाओं की ‘कुल देवियाँ’ हैं । इस प्रकार दो प्रतिमाओं में एक नंदा और दूसरी सुनंदा हैं।
लेकिन कुछ अन्य विद्वान नंदा को राज्य की कुलदेवी की बजाय शक्तिस्वरूपा आदि शक्ति माता के रूप में मानते हैं। उनका कहना है कि चंदवंशीय राजाओं की पहली राजधानी चंपावत में माता नंदा का कोई मंदिर न होना सिद्ध करता है कि नंदा उनकी कुलदेवी नहीं, वरन विजय देवी व आध्यात्मिक दृष्टि से आराध्य देवी थीं। वह चंदवंशीय राजाओं की कुलदेवी माता ‘गौरा-पार्वती’ को मानते हैं। कहते हैं कि जिस प्रकार गढ़वाल नरेशों की राजगद्दी भगवान बदरीनाथ को समर्पित थी, उसी प्रकार कुमाऊं नरेश चंदों की राजगद्दी भगवान शिव को समर्पित थी। इसलिए चंदवंशीय नरेशों को ‘गिरिराज चक्र चूढ़ामणि’ की उपाधि भी दी गई थी। इस प्रकार गौरा उनकी कुलदेवी थीं, और उन्होंने अपने मंदिरों में बाद में जीतकर लाई गई नंदा और गौरा को राजमंदिर में साथ-साथ स्थापित किया। इस प्रकार दो मूर्तियों में से एक मूर्ति हिमालय क्षेत्र की आराध्य देवी पर्वत पुत्री नंदा और दूसरी ‘गौरा-पार्वती’ की हैं। यही उनकी मूर्तियों को प्रतिमाओं को पर्वताकार में बनाने का कारण भी है।
वहीं एक अन्य किंवदंती के अनुसार आदि शक्ति माता नंदा का जन्म गढ़वाल की सीमा पर बागेश्वर जिले के ऊंचे नंदगिरि पर्वत पर हुआ था। गढ़वाल के राजा उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में ले आऐ थे, और अपने गढ़ में स्थापित कर लिया था। इधर कुमाऊं में उन दिनों चंदवंशीय राजाओं का राज्य था। 1563 में चंद वंश की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित हुई। इस दौरान 1673 में कुमाऊं के चंद नरेश बाज बहादुर चंद (1638 से 1678) ने गढ़वाल के जूनागढ़ किले पर विजय प्राप्त की और वह विजयस्वरूप माता नंदा की मूर्ति को डोले के साथ कुमाऊं ले आए। कहा जाता है कि इस बीच रास्ते में विजयी राजा का काफिला गरुड़ के पास स्थित डंगोली नाम के गांव में रात्रि विश्राम के लिए रुका। दूसरी सुबह जब राजा का काफिला अल्मोड़ा के लिए चलने लगा तो मां नंदा की मूर्ति आश्चर्यजनक रूप से दो भागों में विभक्त मिली। इस पर राजा ने मूर्ति के एक हिस्से को वहीं ‘कोट भ्रामरी” नामक स्थान पर स्थापित करवा दिया, जो अब ‘कोट की माई” के नाम से जानी जाती हैं। अल्मोड़ा लाई गई दूसरी मूर्ति को अल्मोड़ा के मल्ला महल स्थित देवालय (वर्तमान जिलाधिकारी कार्यालय) के बांऐ प्रकोष्ठ में स्थापित कर दिया गया। बाद में कुमाऊं कमिश्नर जीडब्ल्यू ट्रेल ने हिमालय यात्रा पर आंखों की रोशनी चले जाने के बाद मूर्तियों को अल्मोड़ा के वर्तमान नंदा देवी मंदिर में स्थापित कराया। बाद में यह मूर्ति चोरी चली गयी। जिसके बाद राजरानियों ने अपने आभूषणों से मौजूदा मूर्ति का निर्माण करवाया। चोरी गयी मूर्तियों के दिल्ली स्थित संग्रहालय में होने की बात भी कही जाती है। इस प्रकार विद्वानों के अनुसार माता नंदा चंद वंशीय राजाओं के साथ संपूर्ण उत्तराखंड की ‘विजय देवी’ हैं।

मजबूत कलापक्ष है पूरी तरह से ‘ईको फ्रेंडली’ और नंदा-सुनंदा की सुंदर मूर्तियों का राज

This slideshow requires JavaScript.

-कभी चांदी से बनाई जाती थीं मूर्तियां, 50 के दशक में मूर्तियों के चेहरे की मुस्कुराहट आज भी की जाती है याद
-1903 से लगातार बीच में दो विश्व युद्धों के दौरान भी जारी रहते हुऐ 112 वर्षों से यहां जारी है महोत्सव
नैनीताल। नयना की नगरी नैनीताल में माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियां पूरे प्रदेश में सबसे सुंदर तरीके से बनती हैं। इसका कारण यहां मूर्ति निर्माण में कलापक्ष पर अधिक ध्यान दिया जाना है। साथ ही यहां आयोजक संस्था हमेशा बेहतरी के लिये बदलावों को स्वीकार करने को तैयार रहती है। इसी कारण बीते कुछ वर्षों से नंदा-सुनंदा की मूर्तियां पूरी तरह ‘ईको-फ्रेडली’ यानी पर्यावरण-मित्र पदार्थों से तैयार की जाती हैं। जबकि यहां एक दौर में चांदी की मूर्तियां बनाए जाने का इतिहास भी रहा है।
नैनीताल मंे 1903 से लगातार बीच में दो विश्व युद्धों के दौरान भी जारी रहते हुऐ 115 वर्षों से महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इधर राज्य के अनेक नगरों में यह आयोजन होने लगे हैं, बावजूद नैनीताल की मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां अल्मोड़ा सहित अन्य सभी नगरों से सुंदर होती हैं। 1950 से मूर्ति निर्माण से जुड़े गत वर्ष ही दिवंगत हुए आयोजक संस्था श्रीराम सेवक सभा के संरक्षक स्वर्गीय गंगा प्रसाद साह बताते थे कि पूर्व में यहां भी परंपरागत मूर्तियां ही बनती थीं। 1945 के दौरान से यहां मूर्ति निर्माण में बदलाव आने लगे। 1950 में शारदा संघ के संस्थापक कलाप्रेमी बाबू चंद्र लाल साह व कला मंदिर फोटो शॉप के स्वामी मूलचंद की जुगलबंदी के बाद यहां सुंदर मूर्तियां बनाई जाने लगीं। 1955-56 तक नंदा देवी की मूर्तियों का निर्माण चांदी से होता था। लेकिन बाद में वापस परंपरागत परंतु अधिक सुंदर मूर्तियां बनने लगीं। ठाकुर नवाब साह, रमेश चन्द्र चौधरी आदि ने भी मूर्ति निर्माण में योगदान दिया। वरिष्ठ कलाकार चंद्र लाल साह 1971 तक मूर्तियों का निर्माण करते रहे, और इस दौरान माता के चेहरे पर दिखने वाली मुस्कुराहट को लोग अब भी याद करते हैं। बाद में प्रसिद्ध चित्रकार विश्वम्भर नाथ साह ‘सखा दाज्यू’ जैसे स्थानीय कलाकारों ने मूर्तियों को सजीव रूप देकर व लगातार सुधार किया, जिसके परिणाम स्वरूप नैनीताल की नंदा-सुनंदा की मूर्तियां, महाराष्ट्र के गणपति बप्पा जैसी ही जीवंत व सुंदर बनती हैं। खास बात यह भी कि मूर्तियों के निर्माण में पूरी तरह कदली वृक्ष के तने, पाती, कपड़ा, रुई व प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग किया जाता है। बीते करीब एक दशक से श्री साह की स्वीकृति पर थर्मोकोल का सीमित प्रयोग भी बंद कर दिया गया है, जिसके बाद महोत्सव पूरी तरह ‘ईको फ्रेंडली” भी हो गया है। श्री साह बताते हैं-हर वर्ष मूर्तियां समान आकार की बनें इस हेतु भी खास ध्यान रखा जाता है। गत वर्षों की मूर्ति के कपड़े को देखकर भी मूर्ति बनाई जाती है। इधर बेहतर स्वरूप के लिये माता के चेहरे में कपड़े के भीतर परिवर्तन किया गया है। साथ ही माता के चेहरे को मुस्कुराहट लिए हुए बनाने की कोशिश की जाती है, इससे माता की सुंदरता देखते ही बनती है।

हर वर्ष नयी पहलों से लगातार समृद्ध होता रहा है नंदा महोत्सव

विनोद गढ़िया। कहते हैं कि प्रगति तभी सही मायनों में प्रगति होती है, जब वह सतत भी हो। कुछ इसी कसौटी पर सरोवरनगरी का ऐतिहासिक नंदा महोत्सव सांस्कृतिक विरासतों को सहेजने के साथ ही साल दर साल नए पायदानों को आत्मसात करता हुआ लगातार समृद्ध होता चला जा रहा है। माता नंदा के इस महोत्सव में हर वर्ष कुछ न कुछ नया अवश्य होता है। चाले मेले का सीसीटीवी कैमरों से सुरक्षा प्रबंधों के साथ ही महोत्सव का सीधा प्रसारण कुमाऊं अंचल के सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक किये जाने की बात हो अथवा नैनी झील को धार्मिक सरोकारों से जोड़ते हुए झील की पंचआरती करने के साथ ही नगर वासियों से अपने घरों से भी सरोवर की आरती करने जैसी अपीलें भी आयोजक संस्था द्वारा की जाती रही हैं।

मूर्तियों के निर्माण के लिए दो कदली वृक्ष काटकर प्रयोग किये जाते हैं तो इनके बदले 21 फलदार वृक्ष रोपने की परंपरा वर्ष 1998 से पर्यावरण मित्र यशपाल रावत के सुझाव पर चल रही है। वर्ष 2005 से मेले में फोल्डर स्वरूप से स्मारिका छपनी प्रारंभ हुई थी, जिसका आकार वर्ष 2014 में 400 पृष्ठों तक फैल गया है। वर्ष 2007 से तल्लीताल दर्शन घर पार्क से मां नंदा के साथ नैनी सरोवर की आरती की एक नई परंपरा भी जोड़ी गई है, जो प्रकृति से मेले के जुड़ाव का एक और आयाम है। वर्ष 2011 से मेले की अपनी वेबसाइट बनाकर देश दुनिया तक सीधी पहुंच भी बनाने का प्रयास हुआ। वर्ष 2012 में पशु बलि की परंपरा को हतोत्साहित करते हुए इसकी जगह नारियल चढ़ाने को बढ़ावा दिया जाने लगा। 2014 में आयोजक संस्था की अपनी वेबसाइट के जरिए महोत्सव का प्रचार-प्रसार करने की कोशिश शुरू हुई। साथ ही केवल मेले के लिए ही नहीं नगर के मल्लीताल क्षेत्र में करीब 2.25 लाख रुपए की लागत से 16 सीसीटीवी कैमरे लगवाए गए, और सुरक्षा के मद्देनजर मेले के दुकानदारों के पहचान पत्र लेकर उनका पुलिस से सत्यापन भी कराया गया, जो आयोजक संस्था के सामाजिक सरोकारों से और अधिक गहराई से जुड़ने का भी बड़ा उदाहरण है। मेले के दौरान दूरदराज से आने वाले ग्रामीणों के लिए मंदिर परिसर के साथ ही राम सेवक सभा प्रांगण में भी हर रोज निःशुल्क भंडारे की व्यवस्था भी की जाने लगी। इसके साथ ही मेले में 40 स्टॉलों में सरकारी विभागों की विकास प्रदर्शनी व 20 स्टॉलों में स्वयं सेवी संस्थाओं के उत्पादों का प्रदर्शन भी करने का प्रबंध किया गया। फेसबुक, गूगल प्लस व ट्विटर सरीखी सोशल साइटों के जरिये भी मेला स्थानीय लोक कला के विविध आयामों, लोक गीतों, नृत्यों, संगीत की समृद्ध परंपरा का संवाहक बनने के साथ संरक्षण व विकास में भी योगदान दे रहा है। इधर वर्ष 2015 से महोत्सव के तहत फ्लैट्स मैदान में होने वाली मेले की जिम्मेदारी नैनीताल नगर पालिका को दे दी गयी है।

बागेश्वर जिले के पोथिंग गांव में भी होता है माता नंदा का प्रसिद्ध मेला

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में भाद्रपद की नवरात्रों में हिमालय पुत्री माता नंदा की विशेष पूजा की जाती है। अल्मोड़ा एवं नैनीताल के साथ ही पूरा पहाड़ इस नवरात्र में अपनी आराध्य देवी माता नंदा भगवती की पूजा अर्चना में व्यस्त रहता है। इन्हीं में बागेश्वर जनपद स्थित पोथिंग ग्राम के मध्य माता नंदा भगवती का भव्य मंदिर है। जहां हर वर्ष भाद्रपद माह के नवरात्रों में माता नंदा की विशेष पूजा की जाती है। यह पूजा पूरे 8 दिन तक चलती है। प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक गांव में स्थित माता की तिबारी में रात भर जागरण होता है। रात के विभिन्न प्रहरों में माता की विशेष आरती होती हैं। लोग पारंपरिक झोड़ा-चांचरी गाकर अपना मनोरंजन करते हैं। यहां पर गढ़वाल और कुमाऊं की संस्कृति का भी संगम देखने को मिलता है। माता के जागर गाने के लिए गढ़वाल से जगरियों का दल आमंत्रित किया जाता है। सप्तमी के दिन हरेला पर्व पर कपकोट के उत्तरौड़ा गांव से लाये गए कदली वृक्ष को काटकर मुख्य मंदिर में माता के भंडारे के साथ ले जाया जाता है। ढोल-नगाड़ों, माता के निशानों, लोगों के कंधों पर बैठे देव डांगरों और सैकड़ों भक्तों की लंबी श्रृंखला दर्शनीय होती है। इस रात्रि के लिए दूर-दूर से भक्त और मेलार्थी यहां पहुंचते हैं। रात्रि की चांचरी बड़ी ही जोशीली और अपने आप में देखने लायक होती है। दर्जनों हुड़कों की थाप पर चांचरी गाते लोगों से पूरी रात गुंजायमान रहती है। रात्रि 9-10 बजे से प्रारम्भ हुई चांचरी सुबह के 4-5 बजे तक चलती है, उसके बाद मेलार्थी स्नान इत्यादि करके नंदा अष्टमी पर होने वाली पूजा के लिए मुख्य मंदिर की ओर चल पड़ते हैं।
नंदा अष्टमी के दिन पोथिंग में हजारों भक्त माता के दर्शनार्थ पहुँचते हैं। लोग मंदिर में दान-पाठ इत्यादि कर माता से मनौती मांगते हैं, और मनौती पूरी होने पर माता को घंटियां, भकोरे, झांझर, ढोल-नगाड़े व निशान इत्यादि चढ़ाते हैं। लोग दिन भर पारम्परिक लोकनृत्य गीत झोड़ा-चांचरी गाकर अपना मनोरंजन करते हैं। इस दिन यहाँ एक बड़े मेले का आयोजन भी होता है जिसे लोग ‘पोथिंग का मेला के नाम से जानते हैं। इस दौरान स्थानीय व्यापारियों के अलावा यहां दूर-दूर से भी व्यापारी आकर अपनी दुकानें सजाते हैं।

इस वर्ष होगी आठूं पूजा

पोथिंग के नंदा मंदिर में इस वर्ष आठूं पूजा 8 दिनों की पूजा है। इस दौरान प्रतिपदा से लेकर षष्टी तक गांव में स्थित माता की तिबारी में रात भर जागरण होता है। सप्तमी के दिन मंदिरमें कदली वृक्ष को काटकर लाया जाता है जिसके तनों का उपयोग माता नंदा भगवती की मूर्ति के निर्माण में किया जाता है। इस रात्रि को बड़ा जनसमुदाय उमड़ पड़ता है। यहां के मंदिर में 400 से 500 ग्राम वजनी पूड़ियों का भोग लगाने की प्रथा है, जो हजारों की संख्या में बनाई जाती हैं और यही प्रसाद स्वरूप भक्तों की प्रदान की जाती है। प्रसाद वितरण के साथ 8 दिन तक चलने वाले ‘आठूं’ पूजा का समापन होता है। पूजा का आयोजन पोथिंग ग्राम के वाशिंदों के द्वारा आपसी सहयोग से किया जाता है। इस पूजा का आयोजन सर्वप्रथम गढ़िया परिवार के पूर्वज भीम बलाव सिंह गढ़िया, हरमल सिंह गढ़िया, कल्याण सिंह एवं जैमन सिंह गढ़िया के परिवार द्वारा सैकड़ों वर्ष पूर्व किया गया। दानू और कन्याल परिवार के लोग मंदिर के धामी हैं। पूर्वजों द्वारा नियुक्त अलग-अलग परिवार के लोग आज भी निःस्वार्थ भाव से माता की सेवा कर रहे हैं। माता भगवती के मंदिर तक पहुंचने के लिए बागेश्वर जनपद मुख्यालय से कपकोट और वहां से पोथिंग गांव तक करीब 28 किमी की दूरी तय करके आना होता है।

यह भी पढ़ें-कौन हैं दो देवियां, मां नंदा-सुनंदा

नंदा-सुनंदा से जुड़े कुछ और संबंधित चित्रः

श्री नंदादेवी राजजात से कुमाऊं गढ़वाल दोनों के राज परिवार संतुष्ट नहीं

नवीन जोशी, नैनीताल। माता नंदा देवी उत्तराखंड राज्य के दोनों अंचलों-कुमाऊं व गढ़वाल में समान रूप से पूज्य एवं दोनों अंचलों को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने वाली देवी हैं, और उनकी कमोबेश हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाला और विश्व का अनूठा हिमालयी सचल महाकुंभ कही जाने वाली श्री नंदा देवी राजजात यात्रा मूलतः यहां के दोनों राजाओं की यात्रा है। अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में यूपी सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया, और राजाओं के वंशजों को ही यात्रा कराने दी। लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार और पिछले वर्ष आई आपदा के कारण टलने के बाद 14 वर्षों के बाद हो रही यात्रा को प्रदेश सरकार ने अपने हाथ में लिया है। यात्रा पर सरकार करीब एक करोड़ रुपए खर्च कर रही है, लेकिन सरकार द्वारा इसके आयोजन को हाथ में लिए जाने से यात्रा राजाओं के वंशजों और उनकी प्रजा तथा पारंपरिक व धार्मिक स्वरूप की कम सरकारी स्वरूप की और सरकार द्वारा खर्ची जा रही करीब एक करोड़ रुपए को खपाने-कमाने की जुगत अधिक नजर आने लगी है। इससे दोनों राजाओं के वंशज भी संतुष्ट नहीं हैं।
उल्लेखनीय है कि माता नंदा कुमाऊं के चंदवंशीय शासकों की कुल देवी कही जाती हैं, जबकि गढ़वाल के राजा सम्वत् 745 में राजा कनकपाल के जमाने से माता नंदा की बेटी के स्वरूप में मायके से ससुराल भेजने के स्वरूप में इस यात्रा का आयोजन करते हैं, और इसीलिए इस यात्रा को नंदा राज जात यानी राजा की यात्रा और विश्व की सबसे पुरानी यात्रा कहा जाता है। 280 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान 5333 मीटर ऊंची ज्यूंरागली चोटी को भी पार किया जाता है, लिहाजा यह कैलास मानसरोवर यात्रा की तरह दुनिया की सबसे कठिनतम यात्रा भी होती है। इस वर्ष यह यात्रा प्रदेश सरकार की अगुवाई में 18 अगस्त से 6 सितम्बर के मध्य आयोजित होने जा रही है। इधर नैनीताल में यात्रा की तैयारियों के लिए आयोजित हुई बैठक के बीच जहां कुमाऊं की राजजात समिति के अध्यक्ष शिरीष पांडे ने कहा भी कि यह यात्रा मूलतः कुमाऊं व गढ़वाल के राजाओं की यात्रा हैं, लिहाजा उन्हीं के सानिध्य में यात्रा आयोजित की जानी चाहिए। साफ था कि वह एक तरह से कुमाऊं के राजा पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा का पक्ष ही रख रहे थे। उनका कहना था कि अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि उत्तराखंड सरकार द्वारा इसके आयोजन में आगे आने से इसके स्वरूप पर फर्क पड़ सकता है। हालांकि राजजात यात्रा की अनुश्रवण समिति समिति के अध्यक्ष विधानसभा के उपाध्यक्ष डा. अनुसूइया प्रसाद मैखुरी अपने संबोधन में कहते रहे कि यात्रा कुमाऊं व गढ़वाल दोनों राजाओं के वंशजों निर्देशन में ही हो रही है, और सरकार की भूमिका केवल सहयोग करने की है लेकिन बैठक में अधिकांश लोगों का ध्यान सरकार द्वारा खर्च किए जाने वाले एक करोड़ रुपयों से ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेने पर ही दिखा। अन्य लोग मान रहे थे जहां पैंसा आ जाता है, वहां धार्मिक भावना व श्रद्धा भी प्रभावित हो जाती है। पूछे जाने पर गढ़वाल के राजा एवं गढ़वाल की राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष कुंवर डा. राकेश सिहं ने बैठक में उपस्थित विधायकों की ओर इशारा करते हुए कहा, अब तो ये ही राजा हैं। यानी साफ था कि वे यात्रा की तैयारियों एवं राजाओं को मिली भूमिका से खुश नहीं हैं। वहीं कुमाऊं के चंद वंशीय राजाओं के वंशज पूर्व सांसद बाबा ने भी साफ तौर पर कहा, जितना हो रहा है व काफी नहीं है। सरकार से और सुविधाओं की दरकार है। ऐसे में लगता है कि प्रदेश सरकार ने यात्रा को धार्मिक व पारंपरिक स्वरूप से बाहर निकालकर इसे सरकार में शामिल व अन्य चुनिंदा लोगों के लिए अपनी ओर से ‘आर्थिक आर्शीवाद’ प्रदान करने का माध्यम बना लिया है। अब लोग यात्रा से अब तक के स्वतः स्फूर्त धार्मिक भावना व श्रद्धा के जरिए अपना ‘परलोक’ सुधारने के बजाए तात्कालिक तौर पर ‘इहलोक’ सुधारने के प्रति ही प्रेरित होते जा रहे हैं।

कुमाऊं का राजजात में प्रतिनिधित्व
नैनीताल। श्री नंदा देवी राजजात में इस वर्ष कुमाऊं मंडल का प्रतिनिधित्व कमोबेश सीमित रहा है। इससे पूर्व वर्ष 2000 की यात्रा में भी कुमाऊं की नंदा डोलियों व छंतोलियों ने नंदा देवी राजजात में प्रतिनिधित्व किया था। कुमाऊं मंडल की आयोजन समिति के अध्यक्ष शिरीष पांडे ने बताया कि कुमाऊं को 1925 के बाद लंबे समय के बाद 1987 की श्री नंदा देवी राजजात में में शामिल होने का न्यौता मिला था, लेकिन तब कुमाऊं की ओर से अपेक्षित तैयारी नीं हो पाई थी। हालांकि उन्होंने बताया कि चंद वंशीय शासक बाज बहादुर चंद (1638-78 ई.) के दौर में भी कुमाऊं से राजजात यात्रा की छंतोली (नंदा का छत्र) भेेजे जाने के प्रमाण मिलते हैं।
Loading...

3 thoughts on “नंदा देवी महोत्सव के लिये बना विशाल स्वागत द्वार गिरा, कई वाहन क्षतिग्रस्त

Leave a Reply