Big Breaking : हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने का प्रस्ताव फिर खारिज, वन भूमि पर निर्माण को केंद्र की मंजूरी नहीं

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नवीन समाचार, नैनीताल, 27 अक्टूबर 2026 (High Court Relocate Proposal Rejected)। उत्तराखंड (Uttarakhand) उच्च न्यायालय (High Court) को नैनीताल (Nainital) से हल्द्वानी (Haldwani) स्थानांतरित करने की योजना को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। केंद्र सरकार के वन संबंधी प्रावधानों के तहत गठित क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति (Regional Empowered Committee—REC) ने हल्द्वानी के लामाचौड़ क्षेत्र में 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर उच्च न्यायालय का नया परिसर बनाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। समिति ने स्पष्ट किया है कि परियोजना के लिए उपयुक्त वैकल्पिक गैर-वन भूमि की पर्याप्त तलाश नहीं की गई। ऐसे में फिलहाल उच्च न्यायालय को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकेगी।

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बेलबाबा और गौलापार के प्रस्तावों का क्या हुआ?

(High Court Relocate Proposal Rejected) Nainital High Court News 8 June 2026 Right to OBC Reservation not by Marriage, (Nainital High Court-1st HC (UK High Court 2 Major Orders) (In Banbhulpura Riot Case-High Court on Bail) (High Court Postpones Silver Jubilee Celebrations,उच्च न्यायालय को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के लिए पहले गौलापार क्षेत्र में भूमि का प्रस्ताव तैयार किया गया था। उस प्रस्ताव को वर्ष 2024 में वन संबंधी समिति ने अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने हल्द्वानी के बेलबाबा के निकट लामाचौड़ क्षेत्र में भूमि चिह्नित की। अगस्त 2026 में राज्य सरकार ने यहां 30 हेक्टेयर वन भूमि पर उच्च न्यायालय परिसर बनाने के लिए प्रशासनिक स्वीकृति दी थी।

हालांकि, राज्य सरकार की प्रशासनिक स्वीकृति का अर्थ वन भूमि के उपयोग की अंतिम अनुमति मिलना नहीं था। वन भूमि को गैर-वानिकी प्रयोजन में इस्तेमाल करने के लिए केंद्र सरकार की निर्धारित प्रक्रिया के तहत स्वीकृति आवश्यक है। अब नए प्रस्ताव को भी क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने अस्वीकार कर दिया है।

30 हेक्टेयर वन भूमि पर क्या बनना प्रस्तावित था?

प्रस्ताव के अनुसार, लामाचौड़ क्षेत्र में लगभग 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर उच्च न्यायालय का नया परिसर बनाया जाना था। इसके लिए 123 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव था। निर्माण की योजना में भूतल के अतिरिक्त सात मंजिलों वाली इमारत, पर्याप्त वाहन पार्किंग और खुले स्थान की व्यवस्था शामिल थी। प्रस्ताव में आवासीय निर्माण शामिल नहीं था।

उच्च न्यायालय परिसर को स्थानांतरित करने के पक्ष में यह तर्क दिया गया था कि नैनीताल में वर्तमान परिसर में जगह सीमित है। न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या बढ़ने, कर्मचारियों और अधिवक्ताओं की आवश्यकताओं तथा नैनीताल में यातायात और ठहरने की अधिक लागत जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया गया था।

वैकल्पिक गैर-वन भूमि की तलाश पर उठे सवाल

समिति ने प्रस्ताव की समीक्षा के दौरान पूछा कि जब इसी क्षेत्र में प्रतिपूरक पौधरोपण के लिए गैर-वन भूमि उपलब्ध कराई जा सकती है, तो उच्च न्यायालय परिसर के निर्माण के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि क्यों नहीं खोजी गई। समिति के अनुसार, प्रस्तावित परियोजना को उसी वन भूमि पर स्थापित करना अनिवार्य साबित नहीं किया गया।

वन भूमि पर निर्माण की आवश्यकता के औचित्य और वैकल्पिक स्थलों की तलाश को पर्याप्त नहीं माना गया। प्रस्ताव में दस्तावेजी और तकनीकी कमियां भी बताई गईं। इनमें विस्तृत निर्माण योजना का अभाव और कुछ आवश्यक प्रमाणपत्रों तथा वन्यजीव प्रबंधन संबंधी दस्तावेजों की कमियां शामिल थीं।

समिति ने वन संरक्षण एवं संवर्धन नियम, 2023 के प्रावधानों के तहत प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभाग को उपयुक्त गैर-वन भूमि पर परियोजना स्थापित करने की संभावनाएं तलाशने को कहा है।

उच्च न्यायालय में लंबित मामले 4 हजार से बढ़कर 64 हजार से अधिक

क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति की बैठक में उच्च न्यायालय के प्रतिनिधि ने स्थानांतरण के पक्ष में तर्क देते हुए बताया कि नैनीताल स्थित वर्तमान परिसर में मुकदमों और कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि के कारण स्थान की कमी हो गई है। वर्ष 2010 में उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या लगभग 4 हजार थी, जो वर्तमान में बढ़कर 64 हजार से अधिक हो गई है। इसके अतिरिक्त नैनीताल प्रमुख पर्यटन स्थल होने के कारण यहां आने वाले वादकारियों को आवास और होटलों के लिए अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ती है। नगर में यातायात जाम की समस्या भी बनी रहती है।

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वन भूमि के बदले करोड़ों रुपये की लागत का आकलन

प्रस्ताव के तकनीकी और वित्तीय विवरणों के अनुसार, 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के उपयोग के बदले शुद्ध वर्तमान मूल्य (नेट प्रेजेंट वैल्यू—NPV) के रूप में 3,68,57,700 रुपये निर्धारित किए गए थे। वहीं, क्षतिपूरक वनीकरण के लिए विभिन्न तहसीलों और क्षेत्रों में कुल 60 हेक्टेयर गैर-वन भूमि चिह्नित की गई थी। इस भूमि पर क्षतिपूरक वनीकरण की अनुमानित लागत 3,46,45,833 रुपये बताई गई थी।

प्रस्ताव में यह भी अनुमान लगाया गया था कि निर्माण के दौरान लगभग 1,450 लोगों को स्थायी रोजगार मिल सकता है। इसके अतिरिक्त लगभग 4,98,546 मानव-दिवस के अस्थायी रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना जताई गई थी। हालांकि, इन आर्थिक और रोजगार संबंधी संभावनाओं के बावजूद समिति ने गैर-वन भूमि के वैकल्पिक स्थलों की पर्याप्त तलाश किए जाने के प्रमाणों को महत्वपूर्ण माना।

अधिवक्ताओं की आपत्ति के बाद रिपोर्ट सामने आई

बेलबाबा क्षेत्र में उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का प्रस्ताव नैनीताल के जिलाधिकारी के माध्यम से शासन को भेजा गया था। इस प्रस्ताव पर उच्च न्यायालय के अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की थी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया था।

अब क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट अधिवक्ता कौशल साह जगाती और अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता को प्राप्त हुई है। संबंधित समाचार विवरण के अनुसार, रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है। समिति की रिपोर्ट में प्रस्ताव को अस्वीकार करने के पीछे गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश न किए जाने को प्रमुख आधार बताया गया है।

गैर-वन भूमि की अनुपलब्धता के प्रमाणपत्र पर समिति की आपत्ति

जिला प्रशासन की ओर से गैर-वन भूमि की अनुपलब्धता का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया गया था, लेकिन समिति ने पाया कि प्रस्ताव में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि परियोजना के लिए अन्य संभावित गैर-वन स्थलों की विधिवत तलाश की गई थी या नहीं। समिति ने परियोजना को गैर-विशिष्ट प्रकृति का बताते हुए कहा कि इसके लिए उपयुक्त वैकल्पिक गैर-वन भूमि की संभावनाओं का पूरा परीक्षण किया जाना चाहिए।

इसी आधार पर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया। समिति ने उपयोगकर्ता एजेंसी और राज्य सरकार को परियोजना के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशने के निर्देश दिए हैं।

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क्या अब नैनीताल में ही रहेगा उच्च न्यायालय?

फिलहाल उच्च न्यायालय को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के लिए प्रस्तावित वन भूमि पर निर्माण की अनुमति नहीं मिली है। लेकिन इस निर्णय को स्थानांतरण की योजना पर स्थायी रोक या नैनीताल में उच्च न्यायालय के बने रहने का अंतिम निर्णय मानना सही नहीं होगा। राज्य सरकार यदि उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करती है, तो नए प्रस्ताव पर आगे विचार किया जा सकता है।

इस घटनाक्रम से उच्च न्यायालय को हल्द्वानी ले जाने की योजना की समय-सीमा और आगे की प्रक्रिया पर अनिश्चितता बढ़ गई है। अब प्रमुख प्रश्न यह है कि राज्य सरकार वैकल्पिक भूमि कहां तलाशती है और क्या नई जगह पर परिसर बनाने के लिए आवश्यक सभी प्रशासनिक, न्यायिक और पर्यावरणीय प्रक्रियाएं पूरी हो पाती हैं।

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