नवीन समाचार, देहरादून, 3 अक्टूबर 2026 (Voter Count Dropped in Uttarakhand SIR)। उत्तराखंड (Uttarakhand) में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव (Assembly Election) से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के बाद शनिवार को अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई। अंतिम सूची में प्रदेश के कुल 71,58,949 मतदाता दर्ज हैं। इनमें 37,37,701 पुरुष, 34,21,036 महिलाएं और 212 तृतीय लिंग (Third Gender) मतदाता हैं। SIR शुरू होने से पहले प्रदेश में 79,60,762 मतदाता दर्ज थे। इस आधार पर अंतिम सूची में 8,01,813 मतदाता कम हैं, यानी SIR-पूर्व संख्या की तुलना में लगभग 10.07 प्रतिशत की कमी हुई है।
हालांकि, 2022 विधानसभा चुनाव की अंतिम मतदाता सूची से तुलना करने पर भी तस्वीर लगभग यही है। भारतीय एक्सप्रेस ने 2022 विधानसभा चुनाव की अंतिम सूची का आंकड़ा लगभग 79.58 लाख बताया था। उस आधार पर वर्तमान 71.59 लाख मतदाताओं की संख्या लगभग 8 लाख कम, यानी करीब 10 प्रतिशत कम है। इसलिए इसे सीधे “2022 के मुकाबले ठीक 10.07 प्रतिशत” कहना उचित नहीं होगा; 10.07 प्रतिशत की गणना 79,60,762 के SIR-पूर्व आधार से होती है।
SIR के दौरान बड़ी संख्या में पुराने मतदाता रिकॉर्ड की जांच हुई। इसके बाद अंतिम चरण में 1,29,872 नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए, जबकि 1,04,708 नाम नियमानुसार विलोपित किए गए। इस तरह 14 जुलाई की प्रारूप मतदाता सूची (Draft Electoral Roll) में दर्ज 71,33,785 मतदाताओं की संख्या बढ़कर अंतिम सूची में 71,58,949 हो गई।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रारूप सूची जारी होने के बाद भी निर्वाचन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। दावे-आपत्तियों, सुनवाई और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद हजारों नाम वापस जोड़े गए और नियमानुसार कुछ नाम हटाए गए।
79.60 लाख से 71.58 लाख तक पहुंची मतदाता सूची
SIR की शुरुआत के समय 8 जून 2026 को प्रदेश में 79,60,762 मतदाता दर्ज थे। घर-घर सत्यापन और गणना प्रपत्रों (Enumeration Forms) की प्रक्रिया के बाद 14 जुलाई को प्रारूप मतदाता सूची जारी हुई, जिसमें मतदाताओं की संख्या घटकर 71,33,785 रह गई थी। यह संख्या 2022 विधानसभा चुनाव की अंतिम सूची के लगभग 79.58 लाख मतदाताओं की तुलना में भी करीब 8.25 लाख कम थी।
उस समय निर्वाचन अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि प्रारूप सूची अंतिम नहीं है। जिन लोगों के नाम नहीं थे, वे दावे-आपत्तियों के दौरान नाम जोड़ने, हटाने अथवा सुधार के लिए आवेदन कर सकते थे। इसके बाद ही अंतिम मतदाता सूची तैयार की जानी थी।अब अंतिम सूची जारी होने के बाद तस्वीर यह है—
| चरण | मतदाताओं की संख्या |
|---|---|
| SIR शुरू होने से पहले | 79,60,762 |
| 14 जुलाई की प्रारूप सूची | 71,33,785 |
| अंतिम सूची, 3 अक्टूबर | 71,58,949 |
| SIR-पूर्व आधार से अंतिम कमी | 8,01,813 |
| अंतिम चरण में जुड़े नए मतदाता | 1,29,872 |
| अंतिम चरण में हटाए गए नाम | 1,04,708 |
अर्थात प्रारूप सूची की तुलना में अंतिम सूची में 25,164 मतदाताओं की शुद्ध वृद्धि हुई।
आखिर 8 लाख से ज्यादा मतदाता प्रारूप सूची से बाहर क्यों हुए?
SIR के दौरान निर्वाचन विभाग ने मतदाता सूची में दर्ज प्रत्येक मतदाता के रिकॉर्ड का सत्यापन करने का प्रयास किया। बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर पहुंचे और गणना प्रपत्र भरवाए। उद्देश्य यह पता लगाना था कि संबंधित मतदाता अपने पंजीकृत पते पर मौजूद है या नहीं, उसका रिकॉर्ड सही है या नहीं और वह एक से अधिक स्थानों पर मतदाता के रूप में दर्ज तो नहीं है।
प्रारूप सूची तैयार होने से पहले बड़ी संख्या में ऐसे रिकॉर्ड मिले जिनका मौके पर सत्यापन नहीं हो पाया अथवा जिनमें स्थानांतरण, मृत्यु, अनुपस्थिति या दोहरे पंजीकरण जैसी स्थितियां सामने आईं।
निर्वाचन विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रारूप सूची के समय लगभग 8.26 लाख मतदाताओं को ASD श्रेणी में रखा गया था। व्यापक रूप से इसमें Absent, Shifted और Deceased जैसी श्रेणियां शामिल थीं। प्रारूप सूची में 69,231 मतदाताओं को “Others” श्रेणी में भी रखा गया था, जिसे राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने ऐसे लोगों से जोड़ा था जिन्होंने गणना प्रपत्र जमा या हस्ताक्षर नहीं किए थे।
यहां यह समझना जरूरी है कि प्रारूप सूची में नाम न होना अपने आप में किसी व्यक्ति को स्थायी रूप से मताधिकार से बाहर कर देना नहीं था। दावे-आपत्तियों के दौरान पात्र मतदाताओं को अपना नाम वापस शामिल कराने का अवसर दिया गया था।
दावे-आपत्तियों के बाद 25,164 की शुद्ध वृद्धि
14 जुलाई को प्रारूप मतदाता सूची जारी होने के बाद प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ—दावे और आपत्तियां (Claims and Objections)।
14 जुलाई से 13 अगस्त तक कुल 3,19,309 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें—
- 1,37,146 Form-6 — नाम जोड़ने के लिए,
- 1,30,382 Form-7 — नाम हटाने/हटाने पर आपत्ति से संबंधित,
- 51,781 Form-8 — नाम, पता अथवा अन्य विवरण में सुधार के लिए।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इस चरण की भारी संख्या को देखते हुए अंतिम सूची के प्रकाशन की तारीख बढ़ाई थी। पहले अंतिम सूची 15 सितंबर को प्रकाशित होनी थी, लेकिन दावे-आपत्तियों के निस्तारण के लिए समय बढ़ाकर 28 सितंबर तक किया गया और अंतिम प्रकाशन की तारीख 3 अक्टूबर तय की गई।
7 सितंबर तक 24,30,387 नोटिसों में से 24,29,524 की सुनवाई पूरी होने की जानकारी मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने दी थी, यानी 99.96 प्रतिशत नोटिसों की सुनवाई पूरी हो चुकी थी।
अंतिम सूची में 1,29,872 नए नाम जोड़े गए। दूसरी ओर, 1,04,708 नाम नियमानुसार हटाए गए। इन दोनों को मिलाकर देखा जाए तो प्रारूप सूची के बाद मतदाता संख्या में 25,164 की शुद्ध वृद्धि हुई।
19 लाख मतदाता रिकॉर्ड में मिलीं विसंगतियां
SIR के दौरान केवल यह नहीं देखा गया कि मतदाता अपने पते पर मौजूद है या नहीं। मतदाता रिकॉर्ड के भीतर दर्ज सूचनाओं का तार्किक मिलान (Logical Verification) भी किया गया।
प्रारूप सूची तैयार करते समय 19,04,380 मतदाता रिकॉर्ड में विसंगतियां (Discrepancies) चिन्हित की गई थीं। इनमें नाम, आयु तथा पारिवारिक संबंधों से जुड़े ऐसे अंतर शामिल थे जो रिकॉर्ड में असामान्य दिखाई दे रहे थे।
उदाहरण के लिए किसी परिवार में माता-पिता और बच्चों की दर्ज आयु का अंतर असामान्य होना, भाई-बहनों की उम्र में तार्किक अंतर न होना अथवा रिकॉर्ड में नाम से संबंधित विसंगति जैसे मामले सामने आ सकते थे।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि ऐसी विसंगति मिलना अपने आप में मतदाता को अपात्र घोषित करना नहीं था। संबंधित व्यक्ति को नोटिस देकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने का अवसर दिया गया।
24.30 लाख नोटिस क्यों जारी हुए?
SIR के दौरान करीब 24.30 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। इनमें ऐसे मतदाता शामिल थे जिनके रिकॉर्ड में विसंगति मिली थी अथवा जिनका पुराने रिकॉर्ड से आवश्यक मिलान नहीं हो पाया था।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने बताया था कि नोटिस प्राप्त करने वाले मतदाताओं को सुनवाई का अवसर दिया गया और पात्रता से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने की सुविधा दी गई। अगस्त और सितंबर में अधिकारियों ने बार-बार कहा कि पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर न रहने दिया जाए और जरूरत पड़ने पर पुनः सत्यापन कराया जाए।
यही कारण है कि प्रारूप सूची में बड़ी संख्या में नाम कम होने के बाद भी अंतिम सूची में कुछ नाम वापस जुड़े।
Form-7 के 1.30 लाख आवेदन और 95 हजार ‘इन-एलिजिबल’ मामलों का सवाल
SIR के दावे-आपत्ति चरण में 1,30,382 Form-7 आवेदन प्राप्त हुए। Form-7 किसी मतदाता का नाम हटाने अथवा किसी प्रविष्टि के संबंध में आपत्ति दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 7 सितंबर तक इनमें 44,132 मामलों का निस्तारण हुआ था और 86,250 आवेदन प्रक्रिया में थे। चार जिलों—उधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल—में ही 85 प्रतिशत से अधिक Form-7 आवेदन आए थे।
जिलेवार आंकड़ा भी ध्यान देने योग्य है। उधम सिंह नगर में 43,878 Form-7 आवेदन आए, हरिद्वार में 29,369, देहरादून में 19,402 और नैनीताल में 18,301 आवेदन आए।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया समझना जरूरी है—Form-7 दाखिल हो जाना किसी नाम को स्वतः मतदाता सूची से नहीं हटाता। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को जांच, संबंधित मतदाता को जवाब का अवसर और आवश्यक क्षेत्रीय सत्यापन के बाद निर्णय करना होता है। बूथ लेवल अधिकारियों को भी आवश्यक फील्ड वेरिफिकेशन करना होता है।
आपके दिए निर्वाचन विभाग के आंकड़ों के अनुसार SIR के दौरान 95 हजार से अधिक मामलों को ‘इन-एलिजिबल’ चिह्नित किया गया था। लेकिन यह आंकड़ा और अंतिम रूप से हटाए गए 1,04,708 नाम एक ही चीज नहीं हैं। ‘इन-एलिजिबल’ चिह्नित किया जाना प्रक्रिया का एक चरण था, जबकि अंतिम मतदाता सूची में विलोपन के लिए निर्धारित प्रक्रिया पूरी होना जरूरी था।
चार जिलों में क्यों केंद्रित हुईं नाम हटाने की आपत्तियां?
Form-7 के आंकड़ों में मैदान से जुड़े चार जिलों की हिस्सेदारी विशेष रूप से बड़ी रही।
उधम सिंह नगर—43,878
हरिद्वार—29,369
देहरादून—19,402
नैनीताल—18,301
इन चार जिलों में कुल आवेदन 1,10,950 बैठते हैं, जो राज्य में प्राप्त 1,30,382 Form-7 आवेदनों का 85 प्रतिशत से अधिक है।
उधम सिंह नगर में ही लगभग 34 प्रतिशत Form-7 आवेदन आए। 7 सितंबर तक वहां 43,878 में से 8,975 आवेदन निस्तारित हुए थे और बड़ी संख्या प्रक्रिया में थी। हरिद्वार, नैनीताल और देहरादून में भी बड़ी संख्या में आवेदन लंबित थे।
इसका एक कारण इन जिलों की बड़ी और अपेक्षाकृत गतिशील आबादी, प्रवासन और पते में बदलाव हो सकता है, लेकिन किसी एक कारण को आधिकारिक रूप से पूरी प्रक्रिया का कारण बताना उचित नहीं होगा। निर्वाचन विभाग का उद्देश्य ऐसे रिकॉर्ड की जांच करना और पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखना/वापस जोड़ना है।
देहरादून में सबसे ज्यादा 1.86 लाख मतदाता कम
जिलावार आंकड़ों में देहरादून सबसे आगे है। आपके दिए अंतिम SIR आंकड़ों के अनुसार यहां 1,86,008 मतदाता कम हुए हैं।
इसके बाद—
| जनपद | कम हुए मतदाता | प्रतिशत |
|---|---|---|
| देहरादून | 1,86,008 | 13.51% |
| ऊधम सिंह नगर | 1,77,673 | 13.33% |
| हरिद्वार | 1,30,203 | 9.46% |
| नैनीताल | 71,810 | 9.39% |
| अल्मोड़ा | 55,485 | 10.52% |
| पौड़ी गढ़वाल | 51,359 | 9.26% |
| टिहरी गढ़वाल | 43,625 | 8.60% |
| पिथौरागढ़ | 27,436 | 7.44% |
| चमोली | 23,436 | 7.93% |
| उत्तरकाशी | 18,405 | 7.58% |
| चंपावत | 17,718 | 8.57% |
| बागेश्वर | 13,010 | 6.08% |
| रुद्रप्रयाग | 10,809 | 5.64% |
आपके उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य में प्रारूप सूची के समय कुल 8,26,977 मतदाता कम मिले थे, जो SIR-पूर्व मतदाता संख्या का लगभग 10.39 प्रतिशत था।
बाहरी रिपोर्टों से भी यह पुष्टि होती है कि देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में रिकॉर्ड विसंगतियों की संख्या सबसे अधिक थी। प्रारूप सूची में देहरादून के 11,90,805 मतदाताओं में 3,95,868 रिकॉर्ड में विसंगतियां चिन्हित हुई थीं; हरिद्वार में 12,46,219 में 3,90,312 और ऊधम सिंह नगर में 11,55,672 में 3,36,164 रिकॉर्ड चिन्हित हुए।
नैनीताल में 71,810 मतदाता कम—स्थानीय दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण?
नैनीताल जिले में SIR के दौरान 71,810 मतदाता कम मिले, जो आपके दिए आंकड़ों के अनुसार 9.39 प्रतिशत है।
नैनीताल उन चार जिलों में भी शामिल है जहां Form-7 के आवेदन बड़ी संख्या में आए। यहां 18,301 Form-7 आवेदन प्राप्त हुए थे और 7 सितंबर तक 6,803 का निस्तारण हुआ था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि जिले में भी प्रारूप सूची के बाद नामों को लेकर दावे और आपत्तियां महत्वपूर्ण संख्या में सामने आईं।
हालांकि, केवल मतदाताओं की संख्या कम होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी हटाए गए नाम गलत तरीके से हटे या सभी नाम सही तरीके से हटे। प्रत्येक नाम की स्थिति उसके सत्यापन और निर्वाचन अधिकारी के आदेश पर निर्भर करती है।
SIR की सबसे बड़ी चुनौती: कहीं पात्र मतदाता न छूट जाए
विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है। मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित और दोहरे नाम हटाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नामों की समीक्षा में दूसरी चुनौती भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—कोई वास्तविक और पात्र मतदाता गलती से सूची से बाहर न रह जाए।
इसी कारण निर्वाचन आयोग ने पहले भी कहा था कि प्रारूप सूची से छूटे पात्र मतदाताओं को दावे-आपत्तियों के दौरान नाम शामिल कराने का अवसर दिया जाए। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने बूथ स्तर पर पुनः सत्यापन और पात्र मतदाताओं को जोड़ने पर जोर दिया था।
विपक्ष के सवाल और निर्वाचन विभाग का जवाब
SIR के दौरान बड़ी संख्या में नामों के प्रारूप सूची से बाहर होने और Form-7 के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से सवाल भी उठे हैं। खासकर 95 हजार से अधिक मामलों के ‘इन-एलिजिबल’ चिह्नित होने और नाम हटाने की प्रक्रिया पर विपक्ष ने आपत्तियां जताईं।
वहीं निर्वाचन विभाग का कहना है कि नाम हटाने की प्रक्रिया स्वतः नहीं होती। नोटिस, सुनवाई, दस्तावेज, क्षेत्रीय सत्यापन और सक्षम अधिकारी के निर्णय के बाद ही अंतिम कार्रवाई की जाती है।
भारतीय एक्सप्रेस ने भी स्पष्ट किया है कि Form-7 आवेदन अपने आप नाम नहीं हटाता और ERO को जांच तथा प्रभावित मतदाता को जवाब का अवसर देना होता है।
इसलिए इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम मूल्यांकन केवल “कितने नाम हटे” से नहीं किया जा सकता। यह देखना भी जरूरी होगा कि हटाए गए नामों में कितने मृत, कितने स्थायी रूप से स्थानांतरित, कितने दोहरे पंजीकरण वाले और कितने अन्य श्रेणियों के थे तथा बाद में कितने पात्र मतदाताओं के नाम पुनः जोड़े जाते हैं।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले आंकड़ों का राजनीतिक महत्व
उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। ऐसे में मतदाता सूची में लगभग आठ लाख की शुद्ध कमी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा का विषय है।
लेकिन मतदाता संख्या में कमी को सीधे किसी राजनीतिक दल के लाभ या नुकसान के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।
एक मतदाता का नाम हटने के पीछे मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, दोहरा पंजीकरण, पते पर उपलब्ध न होना, दस्तावेजी समस्या या अन्य कारण हो सकते हैं। इसी तरह अंतिम चरण में 1,29,872 नए नाम जुड़ने से यह भी स्पष्ट है कि SIR के बाद मतदाता सूची स्थिर नहीं रही, बल्कि दावे-आपत्तियों के जरिए उसमें बदलाव हुआ।
इसलिए SIR के आंकड़े चुनावी परिणाम या किसी दल के संभावित प्रदर्शन का अनुमान नहीं देते। वे केवल इस समय उपलब्ध मतदाता सूची में हुए प्रशासनिक बदलाव को दर्शाते हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में तस्वीर
2022 विधानसभा चुनाव की अंतिम मतदाता सूची में उत्तराखंड में लगभग 79.58 लाख मतदाता थे। 14 जुलाई की SIR प्रारूप सूची में यह संख्या घटकर 71.33 लाख रह गई थी—यानी लगभग 8.25 लाख की कमी।
अब अंतिम सूची में संख्या 71.59 लाख है। इसका अर्थ है कि दावे-आपत्तियों के बाद प्रारूप सूची से लगभग 25 हजार मतदाताओं की शुद्ध वृद्धि हुई, लेकिन 2022 के आधार की तुलना में मतदाता संख्या अभी भी लगभग आठ लाख कम है।
इस अंतर को समझने का सही तरीका यह है कि SIR ने मतदाता सूची के आधार को बड़े पैमाने पर पुनः सत्यापित किया है, जबकि नए मतदाता जुड़ने की प्रक्रिया भी साथ चलती रही।
अब छूटे पात्र मतदाताओं को फिर मिलेगा मौका
अंतिम सूची जारी होने के बाद भी मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया बंद नहीं होगी।
निर्वाचन विभाग पात्र लेकिन छूटे लोगों को मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए विशेष अभियान चलाएगा। आपके दिए विवरण के अनुसार 10 अक्टूबर से विशेष अभियान शुरू किया जाना है।
इस अभियान में बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर उन लोगों की पहचान करेंगे जिनके नाम पहले की सूची में थे, लेकिन वर्तमान सूची में नहीं हैं। पात्र पाए जाने पर Form-6 के माध्यम से नाम जोड़ने में सहायता की जाएगी।
पहली बार मतदान करने वाले युवा, छूटे हुए मतदाता, बेघर लोग और अन्य वंचित समूहों के लिए विशेष शिविर लगाए जाने की योजना है। नाइट शेल्टर और श्रमिक बस्तियों (Labour Colonies) में भी शिविर लगाए जाने की बात है।
BLO द्वारा तैयार सूची को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों (BLA) के साथ साझा करने की व्यवस्था भी बताई गई है। इसके बाद ERO स्तर पर भी बूथवार जानकारी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ साझा की जाएगी, ताकि यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम छूट गया हो तो उसे फिर से शामिल कराने का अवसर मिल सके।
अगर आपका नाम अंतिम सूची में नहीं है तो क्या करें?
यदि कोई व्यक्ति स्वयं को पात्र मतदाता मानता है लेकिन अंतिम मतदाता सूची में उसका नाम नहीं है, तो वह Form-6 के माध्यम से नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है।
निर्वाचन आयोग की मतदाता सेवा व्यवस्था के माध्यम से नाम की स्थिति ऑनलाइन जांची जा सकती है। आयोग के पोर्टल पर SIR के अंतिम रोल और पुराने SIR रोल में नाम खोजने की सुविधा भी उपलब्ध है।
मतदाता अपने संबंधित BLO, ERO/AERO अथवा जिला निर्वाचन कार्यालय से भी संपर्क कर सकता है।
भारत निर्वाचन आयोग ने अपनी मतदाता सेवाओं में नए पंजीकरण, आवेदन की स्थिति देखने, मतदाता विवरण में सुधार और इलेक्ट्रॉनिक मतदाता पहचान पत्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं।
अब असली परीक्षा अंतिम सूची की नहीं, उसकी शुद्धता की है
उत्तराखंड में SIR के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची ने राज्य के चुनावी आंकड़ों की एक नई तस्वीर सामने रखी है।
79.60 लाख से घटकर 71.59 लाख मतदाता, प्रारूप सूची में 8.26 लाख की बड़ी कमी, अंतिम चरण में 1.29 लाख नए नाम, 1.04 लाख नामों का विलोपन, 19.04 लाख रिकॉर्ड में विसंगतियां, 24.30 लाख नोटिस और 3.19 लाख दावे-आपत्तियां—ये आंकड़े बताते हैं कि यह सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण से कहीं बड़ा प्रशासनिक अभियान था।
अब इसकी अगली और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा यह होगी कि अंतिम सूची में—
कितने वास्तविक मतदाता मौजूद हैं, कितने मृत अथवा स्थायी रूप से स्थानांतरित नाम हटे हैं, कितने दोहरे रिकॉर्ड समाप्त हुए हैं और कितने पात्र मतदाताओं को दोबारा जोड़ा जाता है।
क्योंकि एक ओर स्वच्छ और अद्यतन मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी जरूरत है, वहीं दूसरी ओर एक भी पात्र मतदाता केवल प्रशासनिक या दस्तावेजी कारण से अपने मताधिकार से वंचित न हो, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अंततः SIR का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि कितने नाम कम हुए, बल्कि इस आधार पर होगा कि अंतिम सूची कितनी सटीक, समावेशी और सत्यापित है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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