डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 मार्च 2026 (Nayna Devi Temple History)। सरोवर नगरी नैनीताल को कभी विश्व भर में अंग्रेजों के घर `छोटी बिलायत´ के रूप में जाना जाता था, और अब नैनीताल के रूप में भी इस नगर की वैश्विक पहचान है। इसका श्रेय केवल नगर की अतुलनीय, नयनाभिराम, अद्भुत, अलौकिक जैसे शब्दों से भी परे यहां की प्राकृतिक सुन्दरता को दिया जाऐ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सरोवरनगरी की पहचान से जुड़ा, नगर की आराध्य माता नयना देवी का प्राचीन मंदिर इसकी अनेकों विशेषताओं में से एक है। पर्वतीय क्षेत्र में होने के बावजूद यह अन्य स्थानीय पर्वतीय मंदिरों से इतर नेपाली, तिब्बती, पैगोडा व कुछ हद तक अंग्रेजी गौथिक व ग्वालियर शैली में बना हुआ है।
इसकी स्थापना नगर के संस्थापकों में शामिल मूलतः नेपाल के निवासी मोती राम शाह के पुत्र अमर नाथ शाह ने अंग्रेजों से एक समझौते के तहत यहां लगभग सवा एकड़ भूमि पर 1883 में माता के जन्म दिन माने जाने वाली ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की नवमी की तिथि को की थी। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित मानसखंड परियोजना में शामिल इस मंदिर में कई कार्य हो रहे हैं।
1772 के आसपास जियारानी ने की थी प्राचीन नयना देवी मंदिर की स्थापना !
कहते हैं कि नैनीताल नगर की अंग्रेजी दौर में बताई जाने वाली स्थापना से करीब एक शताब्दी पहले ही नगर में नगर की आराध्य देवी-नयना देवी के मंदिर की स्थापना हो गई थी। नगर की स्थापना और इसके विकास के चरणों पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय के स्वर्गीय प्रो. जीएल साह द्वारा किये गए विस्तृत शोध अध्ययन के अनुसार नगर में प्राचीन नयना देवी मंदिर की स्थापना 1772 के आसपास ‘कुमाऊँ की लक्ष्मीबाई’ कही जाने वाली कत्यूर राजवंश की रानी-जियारानी ने की थी। यानी एक तरह से बैरन नहीं वरन वास्तव में जिया रानी नैनीताल की संस्थापक कही जा सकती हैं।
प्रो.साह के शोध के अनुसार स्थानीय जागरों व जनगीतों में जिया रानी द्वारा नैनीताल में एक मंदिर की स्थापना का जिक्र आता है। कत्यूरियों के द्वारा गाई जाने वाली एक जागर में कहा गया है,‘उती को बसना को आयो यो नैनीताल, नैनीताल नैना देवी को थापना करी छ…’ यानी जिया रानी द्वारा ही नैनीताल में नगर की आराध्य देवी नयना देवी के मंदिर को थापा यानी स्थापित किया गया था, जिसका जिक्र 1880 के भूस्खलन में दब जाने के लिए भी आता है। कहा जाता है कि वह वर्तमान बोट हाउस क्लब व फव्वारे के बीच के स्थान पर कहीं स्थित था।
शक्तिपीठ है नयना देवी मंदिर
नैनीताल। वर्तमान नयना मंदिर को शक्तिपीठ की मान्यता दी जाती है। कहा जाता है कि देवी भागवत के अनुसार भगवान शिव जब माता सती के दग्ध अंगों को आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जा रहे थे, तभी मां की एक आंख यहां तथा दूसरी हिमांचल प्रदेश के नैना देवी में गिरी थी। तभी से यहां मां की आंख के ही आकार के नैना सरोवर के किनारे प्राचीन मंदिर की उपस्थिति बताई जाती है।
उल्लेखनीय है कि यूं नैनीताल का सर्वप्रथम उल्लेख स्कंद पुराण के मानस खंड में ‘त्रिऋषि सरोवर” के रूप में आता है, कहा जाता है कि अत्रि, पुलस्त्य व पुलह नाम के तीन ऋषि कैलास मानसरोवर झील की यात्रा के मार्ग में इस स्थान से गुजर रहे थे कि उन्हें जोरों की प्यास लग गयी। इस पर उन्होंने अपने तपोबल से यहीं मानसरोवर का स्मरण करते हुए एक गड्ढा खोदा और उसमें मानसरोवर झील का पवित्र जल भर दिया। इस प्रकार नैनी झील का धार्मिक महात्म्य मानसरोवर झील के तुल्य ही माना जाता है।
वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार नैनी झील को देश के 64 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव जब माता सती के दग्ध शरीर को आकाश मार्ग से कैलाश पर्वत की ओर ले जा रहे थे, इस दौरान भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को विभक्त कर दिया था। तभी माता सती की बांयी आँख (नैन या नयन) यहाँ (तथा दांयी आँख हिमांचल प्रदेश के नैना देवी नाम के स्थान पर) गिरी थी, जिस कारण इसे नागनी ताल (Nagni Tal), नयनताल, नयनीताल व कालान्तर में नैनीताल कहा गया। यहाँ नयना देवी का पवित्र मंदिर स्थित है।
पहले कुमाऊं कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल ने कराया जीर्णोद्धार
कहा जाता है कि 1815 से 1830 के बीच संभवतया 1823 में नैनीताल आये पहले कुमाऊं कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल ने नैनीतात में नगर की स्थापना से पूर्व से वर्तमान बोट हाउस क्लब व फव्वारे के बीच के स्थान पर कहीं माता जिया रानी द्वारा स्थापित प्राचीन माता नयना देवी मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए मूल रूप से नेपाल के निवासी तथा उस दौर में अल्मोड़ा के प्रमुख व्यवसायी, अंग्रेज सरकार बहादुर के बैंकर और तत्कालीन बड़े ठेकेदार गुज्जे शाह को कहा।

गुज्जे शाह ने अपनी जगह अपने पुत्र मोती राम शाह को नैनीताल भेजा। मोती राम शाह ही नैनीताल में शुरूआती वर्षों में बने सभी बंगलों व अनेक सार्वजनिक उपयोग के भवनों के शिल्पी और ठेकेदार और नैनीतात में बसने वाले पहले हिंदुस्तानी भी थे। उन्होंने ही पीटर बैरन के लिए नगर का पहला घर पिलग्रिम हाउस का निर्माण भी उन्होंने ही कराया था, और उन्होंने ही प्राचीन माता नयना देवी मंदिर का जीर्णोद्धार किया।
यह मंदिर 18 सितम्बर 1880 को आऐ विनाशकारी भूस्खलन में ध्वस्त हो गया। कहा जाता है कि 1882 में इसके अवशेष वर्तमान मंदिर के करीब स्वप्न में मिले संकेतों के आधार पर मिले। इस पर अंग्रेजों ने मंदिर के लिए पूर्व के स्थान के बदले वर्तमान स्थान पर तगभग सवा एकड़ भूमि हस्तांतरित की। इस पर 1883 में तब तक दिवंगत हो चुके मोती राम शाह जी के ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय अमरनाथ शाह ने माता नयना देवी का वर्तमान मंदिर बनवाया।
मंदिर के लिए मां की मूर्ति काले पत्थर से नेपाली मूर्तिकारों से बनवाई, और उसकी स्थापना 1883 में मां आदि शक्ति के जन्म दिन मानी जाने वाली ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को की। तभी से इसी तिथि को मां नयना देवी का मंदिर का स्थापना दिवस मनाया जाता है, और इसे मां का जन्मोत्सव भी कहा जाता है। मंदिर की व्यवस्था वर्तमान में मां नयना देवी अमर-उदय ट्रस्ट द्वारा की जाती है, और ट्रस्ट की डीड की शर्तों के अनुसार इस परिवार के वंशजों को वर्ष में केवल इसकी स्थापना के दिन आयोजित होने वाले वार्षिकोत्सव के दिन मन्दिर के गर्भगृह में जाने की अनुमति होती है। 
बताते हैं कि शुरू में मंदिर परिसर में केवल तीन मन्दिर ही थे, इनमें से मां नयना देवी व भैरव मन्दिर में नेपाली एवं पैगोडा मूर्तिकला की छाप बताई जाती है, वहीं इसके झरोखों में अंग्रेजों की गौथिक शैली का प्रभाव भी नजर आता है। तीसरा नवग्रह मन्दिर ग्वालियर शैली में बना है। इसका निर्माण विशेष तरीके से पत्थरों को आपस में फंसाकर किया गया और इसमें गारे व मिट्टी का प्रयोग नहीं हुआ। कुछ मंदिरों पर पहाड़ी थानों (पर्वतीय मंदिरों) की झलक भी मिलती है, जबकि आगे यहां दक्षिण भारतीय शैली में बनी मूर्तियों से दशावतार मंदिर का निर्माण भी किया गया है।
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‘डॉ.नवीन जोशी, वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले पत्रकार’ एवं मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 140 मिलियन यानी 1.40 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
