नवीन समाचार, देहरादून, 29 सितंबर 2026 (Fake Certificates for MBBS Admission)। उत्तराखंड (Uttarakhand) में नीट-यूजी (NEET-UG) के माध्यम से एमबीबीएस (MBBS) में प्रवेश में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला लगातार गहराता जा रहा है। हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय (HNB Uttarakhand Medical Education University) ने एक और छात्रा का प्रवेश रद्द कर दिया है। उसके द्वारा एससी (SC) श्रेणी का प्रमाणपत्र कथित रूप से फर्जी तरीके से लगाए जाने की बात सामने आई है। इसके साथ ही फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर निरस्त किए गए एमबीबीएस दाखिलों की संख्या अब 16 हो गई है।
यह मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों के गलत प्रमाणपत्र लगाने तक सीमित नहीं रह गया है। पिछले दिनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के फर्जी प्रमाणपत्रों से शुरू हुई जांच में स्थायी निवास, जाति और अन्य आरक्षण संबंधी प्रमाणपत्र भी जांच के दायरे में आए हैं। पुलिस ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र प्रकरण में एसआईटी (SIT) गठित की है, जबकि शासन स्तर पर पुराने मेडिकल दाखिलों के प्रमाणपत्रों की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है।
दो चरणों की काउंसलिंग के बाद सामने आया प्रमाणपत्रों का खेल
एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय की ओर से नीट-यूजी 2026 की राज्य काउंसलिंग के पहले और दूसरे चरण में एमबीबीएस सीटों का आवंटन किया गया था। बाद में प्रमाणपत्रों के सत्यापन के दौरान अलग-अलग अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में गड़बड़ी सामने आने लगी।
विश्वविद्यालय ने पहले और दूसरे चरण में आवंटित प्रवेशों को प्रोविजनल रखा था। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया था कि स्थायी निवास अथवा आरक्षण से संबंधित प्रमाणपत्र सत्यापन में गलत पाए जाने पर प्रवेश रद्द किया जा सकता है।
अब तीसरे चरण की काउंसलिंग भी शुरू हो गई है। निरस्त किए गए प्रवेशों से खाली हुई सीटों को तीसरे चरण की काउंसलिंग में भरे जाने की तैयारी है।
एचएनबी मेडिकल विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. डॉ. विजय जुयाल के अनुसार प्रमाणपत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया तेजी से चल रही है और अब तक 16 प्रवेश रद्द किए जा चुके हैं।
शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से हुई
मामले की गंभीरता पहली बार तब सामने आई जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत एमबीबीएस में प्रवेश लेने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच में गड़बड़ी मिली।
सितंबर के पहले सप्ताह में देहरादून में ऐसे चार दाखिलों का मामला सामने आया। जांच में संबंधित प्रमाणपत्रों में दर्ज पते और अभिलेखों को लेकर गंभीर विसंगतियां मिलीं। इसके बाद इन दाखिलों को निरस्त किया गया और पुलिस में अभियोग दर्ज किए गए।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के अनुसार शुरुआत में पांच संदिग्ध प्रमाणपत्र सामने आए थे, जिन्हें संबंधित जिला प्रशासन को सत्यापन के लिए भेजा गया था।
इन मामलों में चार छात्राओं और एक अभिभावक सहित पांच लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जानकारी सामने आई। आरोप धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेजों के इस्तेमाल से संबंधित हैं। मामले में दोष सिद्ध होना अभी न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।
प्रमाणपत्र असली दिखे, लेकिन मूल अभिलेखों पर उठे सवाल
इस प्रकरण ने सबसे गंभीर सवाल प्रमाणपत्र जारी करने की सरकारी प्रक्रिया पर खड़ा किया है।
एसआईटी की जांच में यह पड़ताल की जा रही है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र के लिए आवेदन से लेकर सत्यापन और प्रमाणपत्र जारी होने तक फाइल किन-किन स्तरों से गुजरी। एसडीएम सदर और एडीएम कार्यालय से संबंधित पत्रावलियां भी जांच के लिए कब्जे में लिए जाने की जानकारी सामने आई है।
जांच में ऐसे सवाल भी सामने आए हैं कि यदि संबंधित मूल अभिलेख उपलब्ध नहीं था तो प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी हुई। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि दस्तावेज तैयार करने और उन्हें प्रमाणपत्र के रूप में जारी कराने में किस-किस स्तर की भूमिका थी।
45 लाख रुपये में मेडिकल सीट दिलाने के आरोप ने बढ़ाई गंभीरता
पुलिस की जांच में एमबीबीएस दाखिले के नाम पर कथित संगठित नेटवर्क का एक और पहलू सामने आया है।
देहरादून पुलिस के अनुसार नीट-यूजी 2025 में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एमबीबीएस प्रवेश दिलाने के मामले में दो आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। जांच में तीन अभ्यर्थियों के लिए एमबीबीएस दाखिले के एवज में लगभग 45-45 लाख रुपये लेने की बात सामने आने का दावा किया गया। पुलिस के अनुसार अभ्यर्थियों के परिजनों से कथित रूप से 20-20 लाख रुपये अग्रिम लिए गए थे।
पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने, अभ्यर्थियों की तलाश करने, धनराशि लेने और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश कराने के बीच कौन-कौन लोग जुड़े थे।
जांच में पुलिस को ऐसे संकेत मिलने की बात सामने आई है कि कथित नेटवर्क में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिका हो सकती है। एक पक्ष अभ्यर्थियों की तलाश, दूसरा दस्तावेज तैयार कराने और तीसरा दाखिले की प्रक्रिया संभालने से जुड़ा हो सकता है। यह पुलिस जांच में सामने आया आरोप है, जिसकी अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होगी।
एसआईटी ने संभाली जांच, मेडिकल कॉलेजों से दस्तावेज भी लिए
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए देहरादून के एसएसपी प्रमेंद्र सिंह डोबाल ने एसपी जया बलूनी के नेतृत्व में एसआईटी गठित की।
एसआईटी ने मेडिकल कॉलेजों से संबंधित दस्तावेज कब्जे में लेकर जांच आगे बढ़ाई। ऑनलाइन काउंसलिंग होने के कारण आवेदन से लेकर प्रमाणपत्र अपलोड करने तक का डिजिटल रिकॉर्ड भी जांच में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि अभ्यर्थियों ने दस्तावेज कब और किस माध्यम से अपलोड किए तथा आवेदन किस-किस स्तर से आगे बढ़ा।
12 और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र भी फर्जी मिले
इसके बाद जांच का दायरा और बढ़ा। पहले और दूसरे चरण में सीट प्राप्त करने वाले 12 और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र जांच में फर्जी पाए जाने की रिपोर्ट सामने आई। इनका सीट आवंटन विश्वविद्यालय ने रद्द कर दिया। इन 12 अभ्यर्थियों के मामले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे के शुरुआती मामलों से अलग प्रमाणपत्रों से जुड़े बताए गए हैं।
यही वह चरण था जब मामला केवल चार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों तक सीमित न रहकर अन्य श्रेणियों तक फैलता दिखाई दिया।
अब विश्वविद्यालय की ओर से एक और छात्रा का एससी प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के आधार पर प्रवेश रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे विश्वविद्यालय द्वारा निरस्त किए गए दाखिलों की कुल संख्या 16 बताई गई है।
ऊधमसिंह नगर में भी फर्जी प्रमाणपत्रों की जांच
मामले की एक अन्य कड़ी ऊधमसिंह नगर (Udham Singh Nagar) के गदरपुर और बाजपुर क्षेत्र से सामने आई।
गदरपुर में एमबीबीएस प्रवेश के लिए कथित रूप से कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर स्थायी निवास, जाति और अन्य प्रमाणपत्र बनवाने का मामला सामने आया। प्रशासन ने इस मामले में कार्रवाई की और पुलिस जांच शुरू हुई।
बाजपुर में भी एमबीबीएस दाखिले से जुड़े फर्जी जाति प्रमाणपत्र के मामले में पुलिस ने अभियोग दर्ज किया है। एक प्रमाणपत्र में लगाए गए गृहकर संबंधी दस्तावेज का नगर पालिका अभिलेखों में रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात जांच में सामने आई। इससे जांच का दायरा केवल देहरादून तक सीमित नहीं रह गया है।
लेखपालों की भूमिका पर भी उठे सवाल
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान राजस्व विभाग के स्तर पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्टों के अनुसार प्रमाणपत्र तैयार करने की प्रक्रिया में लेखपाल की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होती है और उसके बाद एसडीएम तथा एडीएम स्तर पर जांच और जिलाधिकारी की संस्तुति की प्रक्रिया होती है।
इसी प्रकरण में देहरादून के दो लेखपालों को निलंबित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। उनके निलंबन के विरोध में उत्तराखंड लेखपाल संघ ने कार्य बहिष्कार की घोषणा की।
हालांकि, किसी अधिकारी की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और सक्षम स्तर पर दोष निर्धारित होने के बाद ही निकाला जा सकता है।
अब पुराने MBBS दाखिले भी जांच के घेरे में
मामले की सबसे महत्वपूर्ण अगली कड़ी यह है कि जांच अब केवल नीट-यूजी 2026 की काउंसलिंग तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।
शासन स्तर पर पिछले वर्षों में हुए मेडिकल दाखिलों के प्रमाणपत्रों की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है। यह देखा जा रहा है कि कहीं पहले के वर्षों में भी किसी अभ्यर्थी ने फर्जी या नियमों के विरुद्ध प्रमाणपत्र के आधार पर मेडिकल सीट तो हासिल नहीं की।
यदि पुराने रिकॉर्ड की जांच में भी अनियमितताएं सामने आती हैं तो कार्रवाई का दायरा वर्तमान काउंसलिंग से काफी आगे बढ़ सकता है।
सिर्फ प्रवेश रद्द करना पर्याप्त नहीं, अब प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया भी सवालों में
इस पूरे मामले की सबसे अहम बात यह है कि जांच अब तीन स्तरों पर पहुंच गई है—
पहला—अभ्यर्थी स्तर: क्या किसी अभ्यर्थी ने जानबूझकर गलत या कूटरचित प्रमाणपत्र लगाकर आरक्षण अथवा कोटे का लाभ लिया?
दूसरा—दस्तावेज तैयार करने वाला तंत्र: प्रमाणपत्र कहां तैयार हुए, किसने तैयार किए और क्या किसी संगठित नेटवर्क ने अभ्यर्थियों को दस्तावेज उपलब्ध कराए?
तीसरा—सरकारी सत्यापन व्यवस्था: यदि दस्तावेज फर्जी थे तो वे संबंधित सरकारी अभिलेखों और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में कैसे प्रवेश कर गए और काउंसलिंग के शुरुआती स्तर पर उनकी पहचान क्यों नहीं हो सकी?
इसी तीसरे प्रश्न का उत्तर इस पूरे प्रकरण की जड़ तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
16 प्रवेश रद्द, लेकिन जांच अभी पूरी नहीं
वर्तमान स्थिति में विश्वविद्यालय द्वारा 16 एमबीबीएस दाखिले रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई है। लेकिन यह अंतिम संख्या है या जांच आगे बढ़ने पर और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र संदिग्ध मिलेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
चिकित्सा शिक्षा विभाग प्रमाणपत्रों के सत्यापन को तेज कर रहा है। वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र मामले में एसआईटी दस्तावेजों, आवेदन प्रक्रिया, प्रमाणपत्र जारी करने की सरकारी व्यवस्था और कथित नेटवर्क की भूमिका की जांच कर रही है।
इसलिए फिलहाल इस प्रकरण को केवल 16 छात्रों के प्रवेश रद्द होने की घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जांच का अगला चरण यह तय करेगा कि इसमें केवल अभ्यर्थियों द्वारा कथित रूप से गलत प्रमाणपत्र लगाने का मामला है या प्रमाणपत्र तैयार करने और मेडिकल सीट तक पहुंचाने वाला कोई व्यापक तंत्र भी सक्रिय था।
स्पष्टीकरण : अलग-अलग तिथियों की रिपोर्टों में संख्या अलग दिखाई देती है—पहले 4 स्वतंत्रता सेनानी आश्रित मामलों, फिर 5 संदिग्ध प्रमाणपत्रों, उसके बाद 12 अन्य निरस्त सीटों और अब विश्वविद्यालय के अनुसार कुल 16 निरस्त दाखिलों की बात है। इसलिए मैंने रिपोर्ट में इन्हें अलग-अलग चरणों के रूप में रखा है, ताकि पाठक को यह भ्रम न हो कि सभी संख्याएं एक ही सूची की हैं।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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