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यूथ आईकॉन अवार्ड 2018 से सम्मानित हुईं पत्रकार रोहित सरदाना व अमीश देवगन तथा उत्तराखंड के ललित जोशी सहित कई हस्तियां

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देहरादून, 11  नवंबर 2018। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आईआरडीटी ऑडिटोरियम में रविवार को 9वां यूथ आईकॉन अवार्ड कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उत्तराखंड के वित्त मंत्री प्रकाश पंत और विशिष्ट अतिथि कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के हाथों 9 राज्यों की प्रतिभाओं को ‘यूथ आईकॉन नेशलन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में उत्तराखंड में नशाखोरी के खिलाफ लगभग एक हजार से अधिक विद्यालयों में लगभग पांच लाख से अधिक छात्र-छात्राओं के साथ युवा संवाद के माध्यम से जागरुकता लाने वाले अधिवक्ता ललित जोशी, विभिन्न राज्यों से चयनित 9 बेटियों तथा कवयित्री गौरी मिश्रा एवं मशहूर एंकर रोहित सरदाना व अमीश देवगन आदि भी शामिल रहे।
यूथ आईकॉन अवार्ड का शुभारंभ वित्त मंत्री प्रकाश पंत और कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने किया। अवार्ड समारोह की शुरूआत गणेश वंदना के साथ हुई। हिल फाउंडेशन स्कूल के बच्चों ने शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए देश की प्रसिद्ध कवियत्री गौरी मिश्रा को सम्मानित किया गया। फिल्म जगत में कसम टीवी सीरियल के नायक ऋषि को सम्मानित किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में अमीष देवगन, रोहित सरदाना, राष्ट्रीय सहारा के रजपाल बिष्ट, विनोद मुसान व अविकल थपलियाल को, लोक बोली-भाषा में लेखन और रचनात्मक पत्रकारिता के लिए प्रदीप रावत रवांल्टा को, चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ. मंजरी शाह व डॉ. हरीश घिल्ड़ियाल, पर्यावरण के क्षेत्र में गुलमोहर गर्ल तनुजा जोशी, तिहाड़ जेल में बंद कैदियों के बनाए कपड़ों को पहनकर और खादी इंडिया को प्रमोट करने के लिए तनीषा, गायिकी की क्षेत्र में हरियाणा की बेटी विधि देशवा के साथ ही गुजरात की लेडी बिल्डर से लेकर कश्मीर ही नहीं पूरी दुनिया में यंगेस्ट किक बॉक्सिंग चौंपियन को भी यूथ आईकॉन अवार्ड से सम्मानित किया गया। साथ ही उद्यमिता के क्षेत्र में बेहतर काम करने एवं नशे के आदि हो चुके युवाओं को उनकी भटकी राह से उबारने के लिए उत्तराखंड के ललित जोशी को सम्मानित किया गया।
यूथ आईकॉन अवार्ड के संस्थापक निदेशक शशिभूषण मैठाणी ने कहा कि यूथ आईकॉन अवार्ड उन चुनिंदा लोगों को दिया जाता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में उदाहरण पेश करते हैं। संरक्षक पद्मश्री डॉ. आरके जैन ने कहा कि यूथ आईकॉन का मतलब यह नहीं कि यह पुरस्कार केवल युवाओं को दिया जाएगा। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है, जो युवाओं के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। संस्था अध्यक्ष डॉ. कुड़ियाल ने कहा कि यूथ आईकॉन नेशन अवार्ड पूरे देश में अलग पहचान रखता है। हमारा प्रयास है कि जो भी युवाओं के लिए प्रेरणा का काम कर रहे हैं, उनको इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। आने वाले सालों में पुरस्कार राजनीति के क्षेत्र में भी दिए जाने पर विचार किया जाएगा।
इस अवसर पर कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि समाज में मुकाम हासिल करने वाले ही पुरस्कार के हकदार होते हैं। वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि समाज में काम सभी करते हैं, लेकिन जो सबसे हटकर काम करता है, वहीं श्रेष्ठ होता है और पुरस्कार हासिल करता है। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि यूथ आईकॉन अवार्ड राजनीति के क्षेत्र में भी दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम में मशहूर नृत्यांगना आरुषी पोखरियाल समेत कई गणमान्य हस्तियां मौजूद रहीं।

इन बेटियों को भी मिला सम्मान:

1- ताजमूल इस्लाम – जम्मू एवं कश्मीर

2- विधि देशवाल – हरियाणा (गायिका प्रसिद्धि मिली, बता मेरे यार सुदामा रे…)

3- कुहू गर्ग – उत्तराखंड की अन्तराष्ट्रीय बैडमिन्टन खिलाड़ी।

4- डॉ. मंजरी शाह – दिल्ली, चिकित्सा सेवा में कैंसर विशेषज्ञ।

5- सोनिका (आईएएस) – डीएम टिहरी, टेलीमेडिसिन सेवा पहाड़ में शुरू करने पर।

6- साक्षी विद्यार्थी – कानपुर, देशभर से समाज में शोषित, पीड़ित वंचित महिलाओं की आवाज।

7- तनुजा जोशी – हल्द्वानी, शहर को गुलमोहर से खूबसूरत बनाने की पहल पर्यावरण संरक्षण के लिए।

8- सारा बेन मकवाना – गुजरात, सौराष्ट्र ,लेडी बिल्डर (भवन निर्माण में बड़ा नाम अध्यक्ष चैम्बर ऑफ कॉमर्श।

9- गौरी मिश्रा -कारगिल में सबसे कम उम्र में सैनिकों के बीच काव्य पाठ करने का गौरव, प्रतिष्ठित कवि।

10- तनिषा मानसेरा – डिजायनर, तिहाड़ जेल में कैदियों के द्वारा बनाए कपड़ों को प्रोत्साहन।

11- शिल्पा भट्ट बहुगुणा – विदेश में पढ़ाई छोड़ स्वदेश में काम करना पसंद किया, पिज्जा बाईट स्टोर की मालिक।

इन्हें भी मिले पुरस्कार:

12- शरद मल्होत्रा – टेलीविजन की दुनिया में जाना माना नाम, कम उम्र में बड़ी उपलब्धियां आपके नाम हैं। शरद बोलीवुड में चमकता सितारा हैं।

13- गोविन्द सिंह महर – बदरीनाथ धाम में स्थानीय उत्पादों से परसाद सेवा को बढ़ावा, बंजर खेती को उपजाऊ बनाना।
14- ललित जोशी-उत्तराखण्ड के सैकड़ों स्कूलों में लाखों युवाओं को नशाखोरी के खिलाफ जागरूक कर चुके है।

पूर्व समाचार : बागेश्वर के ललित जोशी को मिलेगा इस वर्ष का यूथ आइकॉन अवार्ड, जानें संघर्ष की दास्तान…

  • अपने विशेष सामाजिक जन-आंदोलन की वजह से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गये हैं ललित
  • आगामी 11 नवम्बर 2018 को देहरादून में होंगे सम्मानित होंगे

नैनीताल, 15  अक्तूबर 2018। बागेश्वर जनपद के छोटे से गांव हरखोला में जन्मे 32 वर्षीय ललित मोहन जोशी पुत्र रमेश चंद्र जोशी को इस वर्ष का यूथ आइकॉन अवार्ड देने की घोषणा हुई है। अपने विशेष सामाजिक जन-आंदोलन की वजह से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गये ललित को आगामी 11 नवम्बर 2018 को देहरादून में सम्मानित किया जाएगा। उनके संघर्ष की कहानी साबित कर रही है कि उन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार क्यों दिया जा रहा है।
बागेश्वर के एक दूरस्थ गांव में साधारण परिवार में जन्मे ललित ने कक्षा 8 तक स्थानीय शिशु मंदिर और विद्यामंदिर से करने के बाद मोती राम बाबू राम इंटर कॉलेज हल्द्वानी से 10वीं एवं 12वीं विज्ञान वर्ग से उत्तीर्ण की, और आगे हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविालय के गुरुरामराय कॉलेज देहरादून से स्नातक तथा बाद में एमबीए आईसीएफएआई यूनिवर्सिटी देहरादून से तथा उत्तराखण्ड टेक्निकल यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई की है।
ललित के संघर्ष की कहानी हाईस्कूल की पढ़ाई से ही शुरू हो जाती है। इस दौरान ही घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण उन्होंने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया। हाईस्कूल की परीक्षा देने के बाद वे टनकपुर में अपने चाचा कांतिबल्लब जोशी के पास आ गये, और अपने घर वालों को बताये बिना यहां पूर्णागिरि मंदिर में प्रसाद बेचना शुरू किया। प्रसाद बेचकर ही उन्होंने पहली बार अपने मेहनत से साइकिल खरीदी। इसके बाद देहरादून आने पर भी वे घर से कोई धनराशि लेने के बजाय स्वयं ट्यूशन पढ़ा कर अपने खर्चे जुटाने लगे। इस दौरान उन्होंने टाइपिंग शॉर्टहैंड भी सीखी और पत्रकारिता से भी जुड़ गये। उनका अपना ‘सजग इंडिया’ नाम का यूट्यूब चैनल भी है, जिसके माध्यम से वह अपने सामाजिक अभियानों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करते हैं।
ललित बताते हैं कि उन्होंने कुछ सालों तक 7 देशों में प्राईवेट नौकरी भी की और बाद में उसे भी छोड़कर अपने प्रदेश के लिए कुछ करने की मंशा के साथ अपने मूल उत्तराखंड लौट आये। मन में था कि अपने प्रदेश के युवाओं का शारारिक व मानसिक स्तर ऊंचा करने के लिए कुछ कर सकें। उनके मन में सबसे बड़ी चिंता यह थी कि उत्तराखंड के अधिसंख्य युवा स्कूल के समय से ही नशे की लत में पड़ रहे हैं जिससे उसकी मानसिक और शारारिक क्षमताएं शून्य की ओर जा रही हैं। लेकिन युवाओं को अपना भविष्य का अंधेरा दिखाई नहीं दे रहा है। यही सोचकर उन्होंने व्यापक स्तर पर युवाओं को नशे के प्रति जागरूक करने के लिए युवाओं के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए प्रेरणास्पद संवाद प्रारम्भ किया।
बताया गया है कि ललित युवाओं में बढ़ती नशाखोरी को लेकर अब तक 800 स्कूलों में जाकर हजारों युवाओं को समाज मे फैल रहे सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ बिगुल फूकने के लिए प्रेरित कर चुके हैं। वह युवाओं को जहां एक ओर व्यशनमुक्त रहने के लिए आह्वान करते हैं, वहीं अभाव में रहकर कठोर परिश्रम, लगन, मेहनत और सकारात्मक ऊर्जा के साथ अनुशासन मे रहकर अपनी मंजिल को पाने के उपाय भी सुझाते हैं। देहरादून में अपना शिक्षण संस्थान खोलकर वे अब तक 700 से अधिक युवाओं को हॉस्पिटैलिटी ओर टूरिज्म के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में रोजगार देने व स्वउद्यमी बनाने का प्रयास भी कर रहे हैं। साथ ही हर साल 30 से अधिक अनाथ बच्चों को निशुल्क पढ़ाकर अभी तक 250 अनाथ बच्चों का सहारा भी बन चुके हैं। अपने सरल व्यक्तित्व और सकारात्मक सोच की वजह से आज राज्य, देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर में अनेक सम्मान प्राप्त कर चुके ललित जोशी 32 वर्ष की आयु में पूरे युवाओं के लिए मिसाल भी बन चुके है। वे पहाड़ की संस्कृति और सभ्यता को बचाने के लिए कूर्मांचल परिषद, गढ़वाल परिषद सहित कई संगठनों से भी जुड़े हुए है और पर्वतीय रामलीला कमेटी देहरादून के बैनर तले 2010 से 2014 तक राम का अभिनय कर उन्होंने देहरादून में अपनी अलग पहचान भी बनाई है। वे हर साल 3 महीने पहाड़ों में स्वयं के खर्चे में स्कूलों में युवाओं को सेना, सरकारी नौकरी, मेडिकल, नेवी, पुलिस व पैरामेडिकल क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित भी करते रहते हैं।

यह भी पढ़ें : दिहाड़ी मजदूर का 6 साल का बेटा अकेले गुलदार से भिड़ गया, मिल सकता है राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार

पौड़ी, 3 सितंबर 2018। उत्तराखंड का एक 6 वर्ष का बच्चा अपनी जान जोखिम में डालकर खूंखार गुलदार से भिड़ गया। अब राज्य ने राज्य से केवल उसका नाम दूसरों की जान बचाने में मदद करने के लिए उत्तराखंड राज्य बाल कल्याण परिषद ने राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार-2018 के लिए दिल्ली भेजा है। खास बात यह भी है कि यह बच्चा दो भाइयों और एक बहन में मंझला है। उसके घर का गुजारा पिता की दिहाड़ी मजदूरी से होता है।
यह बच्चा है राज्य के पौड़ी जिले के दूरस्थ ग्राम मुणगांव पोस्ट ऑफिस भृगुखाल निवासी रमनदीप पुत्र उदयवीर सिंह। इस वर्ष एक अगस्त को अपने घर के बाहर खेलते समय गुलदार ने रमनदीप पर हमला कर दिया था। सूझबूझ और समझदारी का परिचय देते हुए रमनदीप ने शोर मचाकर खुद को गुलदार के चंगुल से छुड़ाया और भगा दिया। इसके बाद रमन को उपचार के लिए कोटद्वार अस्पताल ले जाया गया। बहादुरी और साहस का यह परिचय देने वाले रमनदीप राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए उत्तराखंड से एकमात्र आवेदक बना है। जिसको राज्य बाल कल्याण परिषद की महासचिव पुष्पा मानस ने राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए संस्तुति दी। उल्लेखनीय है कि एक जुलाई 2017 से 30 जून 2018 के बीच वीरता का कार्य करने वाले छह से 18 साल तक के बच्चे इस पुरस्कार के लिए आवेदन कर सकते थे। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार पाने वाले बहादुर बच्चों को राष्ट्रीय पुरस्कार में नकद राशि, प्रशस्ति पत्र के साथ-साथ नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, तीनों सेनाध्यक्ष, दिल्ली के मुख्यमंत्री मिलने का अवसर मिलता है। अब तक उत्तराखंड के 12 बच्चों को राष्ट्रीय स्तर पर वीरता पुरस्कार मिल चुका है। जबकि इधर पिछले चार सालों में केवल 11 बच्चों ने आवेदन किया था। 2015 और 2017 में चार-चार, 2016 में तीन, जबकि इस साल केवल एक बच्चे ने आवेदन किया। 2015 में टिहरी के अर्जुन सिंह, 2016 में देहरादून के सुमित ममगाईं और 2017 में टिहरी के पंकज सेमवाल को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से नवाजा गया है।

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देवप्रयाग, 2 अक्टूबर 2018। राजकीय महाविद्यालय देवप्रयाग एनएसएस का छात्र गणतंत्र दिवस परेड में राजपथ पर कदमताल करते दिखेगा। राष्ट्रीय स्तर पर एनएसएस दल की परेड के लिए उत्तराखंड से चयनित चार स्वयं सेवियों में अजीत सिंह का नाम शामिल किया गया है। राजकीय महाविद्यालय देवप्रयाग में बीए तृतीय सेमिस्टर का छात्र अजीत सिंह देवप्रयाग के निकट रुणासारी (गोर्थीकांड) गांव का निवासी है। सैन्य परिवार से जुड़ा न होने बावजूद अजीत ने कड़ी मेहनत और लगन से यह मुकाम हासिल किया है। अपनी पढ़ाई और रोजी-रोटी का खर्चा जुटाने के लिए अजीत देवप्रयाग स्थित एक होटल में काम करता है। उसके पिता गब्बर सिंह भी यहीं होटल में कुक का कार्य करते हैं। राइंका देवप्रयाग में इंटरमीडियट तक एनसीसी के कैडेट रहे अजीत ने महाविद्यालय में एनसीसी न होने के बावजूद अपना अभ्यास जारी रखा। होटल में काम के साथ पढ़ाई व एनएसएस से जुड़ी सभी गतिविधियों में अजीत पूरी भागीदारी करता है। वह सुबह चार बजे उठकर दौड़ व खेल में भाग लेता है। होटल में साफ-सफाई करने के बाद वह पढ़ाई के लिए करीब आठ किमी. पैदल महाविद्यालय आता-जाता है। कॉलेज के बाद करीब रात 11 बजे तक होटल के कार्यों को निपटाता है। गढ़वाल, कुमांऊ, देहरादून व हरिद्वार के तीनों जोनों के बाद एनएसएस के क्षेत्रीय कार्यालय लखनऊ से अजीत का चयन 26 जनवरी की परेड के लिए हुआ है। परेड के लिए चयनित स्वयं सेवकों को रांची में प्रशिक्षण दिया जाएगा। राजकीय महाविद्यालय देवप्रयाग के एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अशोक मैंदोला को रांची में होने वाली गणत्रंत दिवस अभ्यास परेड का उत्तराखंड टीम लीडर चुना गया है। महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. सुधा भारद्वाज, शिक्षकों, कर्मचारियों व छात्र-छात्राओं ने इसे महाविद्यालय के गौरव की बात बतायी है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष कुमाऊं विश्वविद्यालय से केवल एक, लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय हल्दूचौड़ का छात्र ही एनएसएस पर होने वाली गणतंत्र दिवस परेड के लिये चयनित हुआ है।

राष्ट्रीय सहारा, 14 जून 2018

यह भी पढ़ें : अंतर्राष्ट्रीय छायाकार बृजमोहन जोशी को 6 राष्ट्रीय पुरस्कार

अंतर्राष्ट्रीय छायाकार बृजमोहन जोशी को आईआईपीसी यानी इंडिया इंटरनेशनल फोटोग्राफी काउंसिल नई दिल्ली द्वारा बेंगलुरू, इंदौर, नई दिल्ली, विजयवाड़ा, जोधपुर व गुवाहाटी में आयोजित राष्ट्रीय डिजिटल सर्किट फोटोग्राफी में छह राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार हासिल हुए हैं। आईआईपीसी के सचिव असीम शर्मा ने बताया कि इस प्रतियोगिता में भारत के साथ ही ताइवान, फ्रांस, इंग्लैंड, सिंगापुर, पोलैंड, इटली, हांगकांग, जर्मनी व कनाडा आदि देशों के छायाकारों के चित्र भी शामिल थे।

बृजमोहन जोशी

प्रतियोगिता में जोशी के प्रकृति विषयक चित्र ब्लू एंड व्हाइट व अगेंस्ट लाइट, यात्रा वृत्तांत विषयक फोक डांस, रंग विषयक बोट एंड स्नो, पैकिंग व पत्रकारिता विषयक रिसकिंग लाइफ शीर्षक के चित्रों को पुरस्कार मिले, साथ ही प्रतियोगिता के श्रेष्ठ चित्रों की लगाई गयी प्रदर्शनी में उनके 52 चित्र भी प्रदर्शित किये गये। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004 से आईआईपीसी से जुड़े जोशी को उनकी उपलब्धियों पर वर्ष 2006 में कांस्य, 2007 में रजत, 2008 में स्वर्ण, 2009 में प्लेटिनम व वर्ष 2011 में डायमंड ग्रेडिंग अवार्ड से भी सम्मानित तथा देश के शीर्ष 10 छायाकारों में शामिल किया जा चुका है। 

उत्तराखंड से पहली बार शतरंज के राष्ट्रीय कोच बने नैनीताल के नीरज

  • वर्ल्ड चेस फेडरेशन-फिडे की ओर से जारी किया गया है प्रमाण पत्र
राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 16 मार्च 2018

नैनीताल। सरोवरनगरी के गुदड़ी के एक लाल ने राज्य से पहले शतरंज के राष्ट्रीय कोच बनने का गौरव हासिल किया है। मुख्यालय के नगर पालिका परिषद से संचालित नर्सरी विद्यालय से प्राथमिक तथा भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय व चेत राम साह इंटर कॉलेज यानी सीआरएसटी से इंटर तक की डीएसबी परिसर से स्नातकोत्तर करने वाले नीरज साह को राज्य बनने के बाद पहली बार ऊधमसिंह नगर जनपद के अमित गंगवार के साथ यह उपलब्धि हासिल हुई है। अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड चेस फेडरेशन यानी फिडे के ट्रेनर्स कमीशन की ओर से गत दिवस मोहाली में इंटरनेशनल मास्टर विशाल सरीन व ग्रांड मास्टर आरबी रमेश की उपस्थिति में गत चार से आठ मार्च तक आयोजित फिडे ट्रेनर्स सेमीनार में प्रशिक्षण के बाद उन्हें यह उपाधि प्रदान की गयी है।

नीरज ने बताया कि उन्होंने प्राथमिक कक्षा से ही शतरंज खेलना प्रारंभ कर दिया था, जबकि 17 वर्ष की उम्र में सीआरएसटी में पढ़ने के दौरान वरिष्ठ खिलाड़ियों के बीच शतरंज प्रतियोगिता का खिताब जीतने से प्रोत्साहन प्राप्त किया। आगे 1995 में डीएसबी में प्रवेश लेने के बाद लगातार 7 वर्ष परिसर और तीन बार विश्वविद्यालय के चैंपियन रहे और इस बीच 2010 में कुमाऊं विश्वविद्यालय की टीम के लिए अखिल भारतीय विश्वविद्यालयी शतरंज प्रतियोगिता जीती व इधर गत दिसंबर माह (2017) में लेक सिटी क्लब उदयपुर राजस्थान में राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे स्थान पर रहकर भी उन्होंने प्रदेश का नाम रोशन किया, जबकि इस वर्ष वे कुमाऊं विवि की शतरंज टीम की चयन समिति में भी रहे। अपनी इस बड़ी उपलब्धि पर वह अपने इन विद्यालयों के साथ ही शुरुआती प्रशिक्षक भीम सिंह थापा को श्रेय देना नहीं भूलते। उनकी इस उपलब्धि पर रुचिर साह, मो. जुबेर, अध्यापक शेर सिंह बिष्ट, अधिवक्ता डीके जोशी, भगवत जंतवाल, अनुपम कबडवाल, अरविंद पडियार व दीक्षांत इंटरनेशनल स्कूल हल्द्वानी के प्रबंधक समित टिक्कू, उत्तरांचल राज्य शतरंज संघ के अध्यक्ष धीरज रघुवंशी व सचिव संजीव चौधरी ने उन्हें इस उपलब्धि पर बधाई दी है।

यह भी पढ़ें : नैनीताल के युवाओं ने मोबाइल फोन से बना डाली पूरी फिल्म

-नगर के युवाओं ने किया कारनामा, करीब आठ मिनट की फिल्म ‘एक दूर घटना” को छोटी फिल्मों की श्रेणी के पुरस्कारों के लिए भेजने की कोशिश भी
नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी को कला की नगरी भी यूं ही नहीं कहा जाता। एक अभिनेता होते हुए सात समुंदर पार कांस फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाले स्वर्गीय निर्मल पांडे तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक बीएम शाह तथा गीत एवं नाटक प्रभाग के निदेशक मटियानी की धरती के चार युवाओं ने बीती गुड फ्राइडे की एक दिन की छुट्टी का उपयोग करते हुए अपने मोबाइल फोन से पूरी फिल्म बनाने का संभवतया देश-दुनिया में पहला सफल प्रयोग कर डाला है। सात मिनट की इस फिल्म को अब छोटी फिल्मों की श्रेणी में पुरस्कारों के लिए भेजने की तैयारी चल रही है। 

मुंबई फिल्म उद्योग एवं छोटे परदे में भी अपनी अभिनय कला का प्रदर्शन कर चुके तथा वर्तमान में एनआरएचएम के जिला परियोजना प्रबंधक पद पर कार्यरत मदन मेहरा ने अपने अन्यत्र कार्यरत कलाकार साथियों, मुख्यत: अनवर रजा, मुकेश धस्माना व पवन कुमार के साथ ‘एक दूर घटना” नाम से बनाई गई यह फिल्म केवल सात मिनट 41 सेकेंड की है, और इसकी शूटिंग पूरी तरह से एचटीसी डिजायर-820 मॉडल के मोबाइल फोन से नगर की कैमल्स बैक पहाड़ी के रास्ते पर व कुछ हिस्सा हनुमानगढ़ी के पास की गई है। श्री मेहरा ने बताया कि पूरी फिल्म की शूटिंग एक दिन में ही करीब दो-तीन घंटे शूटिंग करके तथा बाद में कंप्यूटर पर एडिट करके बनाई गई है। फिल्म एक मोटरसाइकिल दुर्घटना से शुरू होती है, जिसमें चालक की मौत हो जाती है। बाद में इस घटना के लिए जिम्मेदार तीन दोस्तों की अपराधबोध के साथ लौटने के दौरान रहस्यमय तरीके से मौत हो जाती है। आखिर में फिल्म संदेश देती है कि कोई भी घटना केवल स्वयं तक सीमित नहीं होती वरन, स्वयं में एक अतीत, वर्तमान और भविष्य भी समेटे रहती है। इस प्रकार छोटी सी फिल्म में रहस्य, रोमांच युक्त दृश्यों के साथ एक कसी हुई कहानी, पटकथा, सिनेमेटोग्राफी तथा संगीत आदि का भी बेहतर तालमेल दिखाई देता है। दिनेश बोरा,अनूप बमोला, एसके श्रीवास्तव आदि ने भी फिल्म निर्माण में सहयोग दिया है।

नैनीताल के नौवीं कक्षा के छात्र ने गलत ठहराए न्यूटन के नियम !

नवीन जोशी नैनीताल। दुनिया को गुरुत्वाकर्षण का वैज्ञानिक सिद्धांत देने वाले सर आइजेक न्यूटन ने वास्तव में बल के कौन से तीन नियम दिये थे, इस पर विवाद हो सकता है। पर बच्चों को स्कूली पुस्तकों में जो पढ़ाया जा रहा है, उस पर नगर के नौवीं कक्षा के एक होनहार छात्र अभिषेक अलिग ने सवाल उठाये हैं। अभिषेक का कहना है कि न्यूटन के पहले यानी ‘जड़त्व के सिद्धांत’ के नियम में बल की दिशा का कोई जिक्र नहीं है, जबकि बल एक सदिश यानी वैक्टर राशि है। बल की दिशा का जिक्र किये बिना न्यूटन के सिद्धांत का प्रयोग किसी भी दशा में नहीं किया जा सकता, जबकि प्रयोग के बिना वैज्ञानिक सिद्धांत का कोई अर्थ ही नहीं है। वहीं तीसरा सिद्धांत निर्वात की स्थिति में लागू नहीं हो सकता है। 
अभिषेक नगर के सेंट जोसफ कालेज का छात्र है। रसायन, भौतिकी और गणित विषयों की उसमें विलक्षण तर्क की क्षमता नजर आती है। वह इन विषयों में हमेशा कक्षा में प्रथम भी रहता है और अपने से बड़ी कक्षाओं के छात्रों से भी तर्क करता है। विज्ञान को तकरे की कसौटी पर कसने की जैसे उसे धुन सवार है। इसके लिए वह विज्ञान की विदेशी भाषाओं की पुस्तकों और इंटरनेट पर भी खूब अध्ययन करता है। 
अपनी आईसीएसई बोर्ड की नौवीं कक्षा की पुस्तक में प्रकाशित न्यूटन के पहले नियम पर सवाल उठाते हुए उसका कहना है कि यह नियम कहता है कि किसी पिंड पर जब तक कोई बाहरी बल न लगाया जाये तब तक उसकी स्थिति में परिवर्तन नहीं आ सकता। यानी यदि पिंड कहीं पर स्थिर रखा है तो वह कोई बल लगाने तक गतिमान नहीं हो सकता, साथ ही यदि वह गतिमान है तो बल लगाये बिना रुक नहीं सकता। अभिषेक के अनुसार इस नियम में बल की दिशा का कोई उल्लेख नहीं है, साथ ही यह भी नहीं कहा गया है कि यह नियम हर दशा में प्रभावी रहता है या निर्वात में। क्योंकि बल बिना दिशा के लगाया ही नहीं जा सकता, क्योंकि बल एक सदिश राशि है। बिना दिशा के बल का कोई औचित्य नहीं है। न्यूटन विज्ञान के इस सामान्य से सिद्धांत से अनभिज्ञ थे अथवा पुस्तकों में गलत पढ़ाया जा रहा है। इंटरनेट पर न्यूटन के नियम में बल की जगह ‘नेट फोर्स’ यानी शुद्ध बल शब्द का प्रयोग किया गया है। यहां शुद्ध शब्द भी बड़ा अंतर पैदा करता है। शुद्ध बल में पिंड पर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण, घर्षण एवं पिंड के स्वयं के भार से उत्पन्न स्थैतिक जैसे सभी बल भी शामिल होते हैं। इन बलों के कारण ही एक दशा तक किसी पिंड को एक कम क्षमता का बल लगाकर भी स्थिर से गतिमान या गतिमान से स्थिर नहीं किया जा सकता। अभिषेक खासकर इस बात पर भी सवाल उठाता है कि किसी स्थिर पिंड पर यदि ऊपर या नीचे की दिशा से बल लगाया जाये तो उसे गतिमान नहीं किया जा सकता है, तो ऐसे में न्यूटन का प्रथम सिद्धांत कैसे माना जा सकता है। वह इस बात से भी इत्तेफाक नहीं रखता कि बल के साथ दिशा का जिक्र ना करना एक सामान्य वैज्ञानिक तथ्य मानकर शामिल न किया जाता हो, क्योंकि न्यूटन के दूसरे सिद्धांत में बल की दिशा का साफ-साफ जिक्र किया जाता रहा है। अभिषेक यह भी मानता है कि न्यूटन ने संभवतया लैटिन भाषा में जो नियम प्रतिपादित किया, उनमें बल के साथ दिशा का भी जिक्र हो, किंतु स्कूली पुस्तकों में यह शब्द हटा दिये गये। यदि ऐसा है तो यह देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाली बात है कि क्यों बच्चों को गलत पढ़ाया जा रहा है। विशेषज्ञ कुछ हद तक सहमत : अभिषेक के तर्क से कुमाऊं विवि के भौतिकी विभागाध्यक्ष प्रो. हरीश चंद्र चंदोला भी काफी हद तक सहमत नजर आते हैं। हालांकि उनका कहना है कि वास्तव में न्यूटन के नियम में बल के साथ दिशा का जिक्र रहा है। वह बताते हैं न्यूटन के नियम ऐसी आदर्श स्थिति के लिए हैं, जिसमें अन्य किसी प्रकार के बलों के न होने की कल्पना की गई है। ऐसा वास्तविक स्थितियों में संभव नहीं होता। उन्होंने माना कि बच्चों के पाठय़क्रम में उन परिस्थितियों का जिक्र किया जाना भी जरूरी है, जिनमें वह लागू होते हैं।

12वीं के छात्र ने जूते में बनाया डायनेमो, 500 रुपये में तैयार हो जाएगा उपकरण 

ल्मोड़ा के रवि टम्टा नैनीताल के राजकीय इंटर कालेज में महज 12वीं के छात्र हैं। पिता एक साधारण से मोटर मैकेनिक। पिता की देखा-देखी गाड़ियों के कल-पुजरे को तोड़ते-जोड़ते उन्होंने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जो बड़े-बड़ों को दांतों तले उंगुली दबाने को मजबूर कर दे। पिछले महीने नैनीताल में बर्फबारी के दौरान बिजली क्या गुल हुई, रवि के दिमाग की बत्ती जल उठी। उन्होंने जूतों में एक ऐसा ‘डायनेमो’ फिट कर दिखाया जिससे चलते-फिरते बिजली पैदा हो सकती है। इस बिजली से मोबाइल को रिचार्ज किया जा सकता है तो 20 वाट का सीएफएल भी रोशन हो सकता है। पांव तले बने इस छोटे से पावर हाउस की बिजली को बैटरी में स्टोर कर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल भी किया जा सकता है।  वह कहता है, मैं दुनिया को ऐसा कुछ देना चाहता हूं जिसके बारे में अब तक किसी ने सोचा तक न हो। पेश है रवि टम्टा से बातचीत के अंश :

सुना है आपने कोई नई खोज की है। क्या खोज की है, विस्तार से बताएं ? 

मैने केवल 500 रुपये खर्च कर जूते में ऐसा प्रबंध किया है कि इससे चलते-फिरते बिजली पैदा की जा सकती है। जूते में स्प्रिंग, घूमती हुई गति से बिजली पैदा करने वाले डायनेमो और चुंबकों को इस तरह लगाया है कि स्प्रिंग चलते समय कदमों से बनने वाले दबाव से डायनेमो को करीब 50 चक्कर घुमा देता है। दो चुंबकों के उत्तरी ध्रुवों को साथ रखकर उनके एक -दूसरे से दूर जाने के गुण का लाभ लेते हुए डायनेमो को पांच-छह अतिरिक्त चक्कर की अधिक गति देने का प्रयोग किया है। इस तरह एक किमी चलने से इतनी बिजली बन जाती है कि मोबाइल फोन रिचार्ज हो सके। जूते में पैदा हुई बिजली को स्टोर करने के लिए रिचार्जेबल बैटरी भी है। इससे बिजली का प्रयोग बाद में किया जा सकता है। 
आपकी यह खोज कितनी उपयोगी हो सकती है ?
हमारे जीवन में बिजली की खपत बढ़ी है। बिजली आपूर्ति के लिए गैर परंपरागत ऊर्जा श्रोतों की लगातार तलाश है। देश में हर व्यक्ति बहुत चलता है। गरीब पेट भरने और अमीर मोटापा रोकने के लिए काफी चलते हैं। ऐसे में मेरा प्रयोग बेहद लाभप्रद हो सकता है। आपको इस खोज का विचार कहां से आया। आपने कितने समय में इसे कर दिखाया ? करीब एक माह पहले नैनीताल में बर्फ गिरी थी। इस दौरान तीन दिन बिजली गायब रही। मेरा मोबाइल डिस्चार्ज हो गया। मैंने सोचा कि जब गाड़ियों में चलते-फिरते बिजली पैदा कर रोशनी और मोबाइल रिचार्ज किया जा सकता है तो पैदल चलने से बिजली पैदा हो सकती है। करीब एक माह के प्रयास से मेरा प्रयोग सफल हो गया। गांवों में महीनों बिजली गायब रहती है। पहाड़ों पर लोगों को बहुत पैदल चलना पड़ता है। मेरे बनाए जूतों से लोग जरूरत की बिजली बना सकते हैं। 
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएं ? 
मैं मूलत: अल्मोड़ा जनपद के काफलीखान का रहने वाला हूं। वहां मेरे पिता श्री हरीश चंद्र टम्टा का ऑटो गैराज है। बचपन से पिता के साथ गैराज में हाथ बंटाता हूं। मेरे पिता ने ऑटोमोबाइल से आईटीआई किया है। वे अक्सर नये प्रयोग करते रहते हैं। उन्हीं की देखा-देखी मैं भी नई-नर्इ खोजों के बारे में सोचता रहता हूं। मैं तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा हूं। बड़े भाई पॉलीटेक्निक से डिप्लोमा कर रहे हैं। बड़ी बहन का विवाह हो चुका है। नैनीताल में चाचा के साथ रहकर मेजर राजेश अधिकारी राजकीय इंटर कालेज में 12वीं में पढ़ रहा हूं। 
और भी नई खोज करने की योजना है ? 
2008 से मैं वाहनों को हादसों से बचाने के प्रयोग पर कार्य कर रहा हूं। इसे मैं प्रायोगिक तौर पर कागज पर साबित कर भी चुका हूं। किसी वाहन पर इसे प्रदर्शित करने के लिए काफी बड़ी धनराशि चाहिए। मैंने ‘घोंघे’ से प्रेरणा ली है। वह दो नाजुक सींग सरीखे अंगों से रास्ते का अनुमान लगाता है और पतली सींक पर नहीं गिरता। मेरी खोजयुक्त गाड़ी के टायरों में ऐसा प्रबंध होगा कि वे कीचड़ या पथरीली सड़कों पर नहीं फिसलेगी। प्रयोग की सफलता तक मैं अधिक खुलासा नहीं कर सकता। मैं ऐसी प्रविधि विकसित करने की राह पर भी हूं जिससे जीवन में काफी कुछ सीख चुके मृत व्यक्तियों के मस्तिष्क को बच्चों में प्रतिस्थापित किया जा सकेगा। इससे बच्चे उस व्यक्ति के बराबर ज्ञानयुक्त होंगे। आगे उनके जीवन में मस्तिष्क लगातार सीखता रहेगा। इस प्रकार मानव मस्तिष्क समृद्ध होता चला जाएगा। मुझे पता चला है कि रोबोट में कुछ इस तरह का प्रयोग किया जा चुका है पर मेरा प्रयोग मनुष्यों में होगा। 
आपको ऐसी नई खोजों की प्रेरणा कहां से मिलती है, कौन मदद करते हैं ?
मेरे पिता मेरे प्रेरणा श्रोत हैं। स्कूल में भौतिकी प्रवक्ता श्याम दत्त चौधरी से भी मदद मिलती है। मैं रात्रि में केवल तीन-चार घंटे ही सोता हूं। स्कूल के अलावा हर रोज दो घंटे होमवर्क आदि के बाद मेरा पूरा समय अपनी खोजों के बारे में सोचने में ही जाता है। कई बार रात में सोते हुए सपने में भी मैं स्वयं को कुछ नया करते हुए पाता हूं। इस कारण हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में मैं केवल 55 फीसद अंक ही प्राप्त कर पाया। 
भविष्य में क्या बनना चाहते हैं, सरकार से कोई अपेक्षा ? 
मैं भविष्य में कुछ नया करना चाहता हूं। पिता का ऑटो गैराज अच्छा चलता है। मुझ पर पैसे कमाने की जिम्मेदारी नहीं है। मैं नौकरी नहीं करना चाहता। मेरा लक्ष्य दुनिया को कुछ नया देना है। अपनी सोच को वहां पहुंचाना चाहता हूं जहां कोई न पहुंचा हो। कोई जूते बनाने वाली कंपनी मेरी बिजली बनाने वाली खोज को आगे बढ़ाए तो ठीक, वरना मैं अपनी ऐसी जूता फैक्टरी खोलने पर विचार कर सकता हूं। सरकार से भी मेरी इस खोज के बाबत कोई अपेक्षा नहीं है। वाहनों को दुर्घटना से बचाने वाली खोज में लाखों रुपये की जरूरत पड़ेगी। उसमें कोई मदद करे तो जरूर स्वीकार करूंगा।
प्रस्तुति :  नवीन जोशी
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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