नवीन समाचार, हल्द्वानी, 9 सितंबर 2026 (Supreme Court-in Banbhoolpura Case)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में प्रस्तावित महत्वपूर्ण सुनवाई टल गई। मामला बुधवार की सूची में तीसरे क्रम पर था, लेकिन संबंधित अधिवक्ताओं के अदालत में उपस्थित नहीं हो पाने के कारण सुनवाई नहीं हो सकी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 सितंबर की तारीख तय हुई है। इस मामले में रेलवे भूमि पर बसे हजारों परिवारों के भविष्य और आगे की बेदखली एवं पुनर्वास प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से न्यायालय के निर्णय का इंतजार है।
इस सुनवाई को लेकर हल्द्वानी में पहले से ही पुलिस-प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। बनभूलपुरा क्षेत्र को जोन, सेक्टर और सुपर जोन में बांटकर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था। प्रांतीय सशस्त्र बल (PAC), आंसू गैस दस्ते, दंगा-रोधी दस्ते और सशस्त्र पुलिस बल के साथ ड्रोन से निगरानी की व्यवस्था की गई थी। पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान नहीं देने और शांति बनाए रखने की अपील की थी। फैसला टालने से आज सभी ने राहत की संस ली होगी। पढ़ें: नैनीताल पुलिस के लिए परीक्षा का दिन : हल्द्वानी में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण मामले में आ सकता है सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सीएम भी कल हल्द्वानी आ रहे
बनभूलपुरा रेलवे भूमि मामले में कब-कब टली सुनवाई, 2025 में लगातार तीन बार आगे बढ़ी तारीख
हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में सुनवाई और अगली तारीखों का सिलसिला कई बार आगे बढ़ चुका है। वर्ष 2023 में उच्च न्यायालय (High Court) के बेदखली आदेश पर रोक लगने के बाद मामले में रेलवे भूमि, प्रभावित परिवारों की पहचान, पुनर्वास और रेलवे परियोजना के लिए आवश्यक भूमि से जुड़े मुद्दों पर लगातार सुनवाई होती रही है। बुधवार 9 सितंबर 2026 को भी प्रस्तावित सुनवाई नहीं हो सकी और अब मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होने की जानकारी सामने आई है।
2023 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
दिसंबर 2022 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इसके बाद प्रभावित लोग सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे। 5 जनवरी 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने बेदखली की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय में चलता रहा।
24 जुलाई 2024 को पुनर्वास की प्रक्रिया पर जोर
24 जुलाई 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की विस्तृत सुनवाई की। उस समय न्यायालय ने रेलवे और केंद्र एवं राज्य सरकार से आवश्यक रेलवे भूमि की पहचान करने, प्रभावित परिवारों की पहचान करने तथा उनके पुनर्वास की योजना तैयार करने को कहा। इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया गया और अगली सुनवाई 11 सितंबर 2024 के लिए तय की गई थी।
इस चरण में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया में प्रभावित लोगों के पुनर्वास के मानवीय पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए।
2 दिसंबर 2025 की सुनवाई टली
लंबे अंतराल के बाद दिसंबर 2025 में मामले को महत्वपूर्ण सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। 2 दिसंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तावित सुनवाई नहीं हो सकी और इसे 10 दिसंबर के लिए आगे बढ़ा दिया गया। उस समय संभावित फैसले को देखते हुए हल्द्वानी में पुलिस-प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी।
10 दिसंबर को भी नहीं आया नंबर
10 दिसंबर 2025 को भी मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। इसके बाद अगली तारीख 16 दिसंबर 2025 बताई गई। 11 दिसंबर की रिपोर्टों में भी बताया गया कि मामला सूचीबद्ध होने के बावजूद अदालत में सुनवाई के लिए नहीं आ सका और 16 दिसंबर की अगली तारीख सामने आई।
16 दिसंबर की तारीख भी आगे बढ़ी
इसके बाद 16 दिसंबर 2025 की प्रस्तावित सुनवाई भी आगे बढ़ गई। 15 दिसंबर की उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के नोटिफिकेशन में मामले को अगली बार 3 फरवरी 2026 के लिए अस्थायी रूप से सूचीबद्ध किया गया था। इस तरह दिसंबर 2025 में 2 दिसंबर से 10 दिसंबर, फिर 16 दिसंबर और उसके बाद 3 फरवरी 2026 तक तारीख आगे बढ़ी।
24 फरवरी 2026 को महत्वपूर्ण सुनवाई
3 फरवरी की सूचीबद्ध तारीख के बाद मामले की महत्वपूर्ण सुनवाई 24 फरवरी 2026 को हुई। इस दिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में दर्ज है कि मामला रेलवे/राज्य सरकार की भूमि पर कथित अतिक्रमण से संबंधित है और करीब 30.040 हेक्टेयर भूमि, लगभग 4,365 मकानों तथा 50 हजार से अधिक आबादी का प्रश्न इससे जुड़ा है। अदालत के सामने रेलवे की ओर से 30.65 हेक्टेयर भूमि को रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए आवश्यक बताया गया।
इसके बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवेदन की प्रक्रिया शुरू कराने सहित कई निर्देश दिए गए।
9 सितंबर 2026 की सुनवाई भी टली
पुनर्वास और आवेदन प्रक्रिया के बाद मामले को 9 सितंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया था। सुनवाई से पहले बनभूलपुरा में पुलिस और प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। क्षेत्र को जोन और सेक्टर में बांटकर पुलिस बल, पीएसी, ड्रोन और अन्य सुरक्षा व्यवस्थाएं की गई थीं। लेकिन बुधवार 9 सितंबर को प्रस्तावित सुनवाई नहीं हो सकी। अब मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर 2026 को होने की जानकारी सामने आई है।
अब तक की प्रमुख तारीखें
- 5 जनवरी 2023 — सर्वोच्च न्यायालय ने बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगाई।
- 24 जुलाई 2024 — रेलवे भूमि और प्रभावित परिवारों की पहचान तथा पुनर्वास योजना तैयार करने के निर्देश; अगली तारीख 11 सितंबर 2024।
- 2 दिसंबर 2025 — प्रस्तावित सुनवाई टली; अगली तारीख 10 दिसंबर।
- 10 दिसंबर 2025 — सुनवाई नहीं हो सकी; अगली तारीख 16 दिसंबर।
- 16 दिसंबर 2025 — सुनवाई आगे बढ़ी; बाद में 3 फरवरी 2026 की अस्थायी सूचीबद्धता सामने आई।
- 24 फरवरी 2026 — महत्वपूर्ण सुनवाई में पुनर्वास, पीएम आवास योजना और रेलवे की आवश्यक भूमि सहित विभिन्न मुद्दों पर आदेश।
- 9 सितंबर 2026 — प्रस्तावित महत्वपूर्ण सुनवाई फिर नहीं हो सकी।
- 17 सितंबर 2026 — अब अगली सुनवाई की तारीख बताई गई है।
इस प्रकार सिर्फ दिसंबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच 2 दिसंबर, 10 दिसंबर, 16 दिसंबर और 9 सितंबर की सुनवाई/तारीखें आगे बढ़ीं या सुनवाई नहीं हो सकी। हालांकि पूरे मुकदमे के इतिहास में “कुल कितनी बार सुनवाई टली” की एक आधिकारिक समेकित संख्या उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे निश्चित रूप से “इतनी बार फैसला टला” कहना उचित नहीं होगा।
2007 से अदालतों में चल रहा विवाद
बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद का मामला वर्ष 2007 से विभिन्न न्यायालयों में चल रहा है। दिसंबर 2022 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) ने रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इसके बाद प्रभावित लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। जनवरी 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए इतने बड़े पैमाने पर लोगों को तत्काल बेदखल करने के मानवीय पहलू पर विचार किया था।
इसके बाद से रेलवे, राज्य सरकार और प्रभावित निवासियों के पक्षों के साथ पुनर्वास तथा भूमि से संबंधित दावों पर सुनवाई चलती रही है। इस दौरान कई अवसरों पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ी या स्थगित हुई। यही कारण है कि बुधवार की सुनवाई को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
करीब 30 हेक्टेयर भूमि और 50 हजार से अधिक आबादी का मामला
यह विवाद हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास के बनभूलपुरा, गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर क्षेत्र से जुड़ा है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड और रिपोर्टों के अनुसार विवादित क्षेत्र में करीब 30.040 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण का मामला है। यहां करीब 4,365 मकान और 50 हजार से अधिक लोगों के प्रभावित होने की बात सामने आई है। क्षेत्र में सरकारी एवं निजी विद्यालयों, मस्जिदों, मदरसों, स्वास्थ्य केंद्र और मंदिर सहित बड़ी संख्या में सार्वजनिक एवं धार्मिक स्थल भी हैं।
रेलवे का कहना है कि हल्द्वानी में प्रस्तावित रेल परियोजना के तहत रेलवे लाइन के रियलाइन्मेंट (Realignment) के लिए करीब 30.65 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है। रेलवे ने अपने दावे के समर्थन में पुराने नक्शों, 1959 की अधिसूचना, 1971 के राजस्व अभिलेख और 2017 के सर्वे सहित विभिन्न दस्तावेजों का हवाला दिया है।
वहीं प्रभावित परिवारों की ओर से लंबे समय से यहां निवास करने तथा नगर निगम के हाउस टैक्स रिकॉर्ड, बिजली-पानी के कनेक्शन और अन्य दस्तावेजों के आधार पर अपने दावे रखे गए हैं।
पुनर्वास के लिए पीएम आवास योजना के आवेदन
सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही के दौरान प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा भी प्रमुख रहा है। फरवरी 2026 में प्रभावित परिवारों की पात्रता निर्धारित करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवेदन कराने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को विशेष शिविर लगाकर आवेदन लेने की जिम्मेदारी दी गई थी और आवेदन प्रक्रिया 31 मार्च 2026 तक पूरी करने को कहा गया था।
बनभूलपुरा क्षेत्र में इस प्रक्रिया के दौरान हजारों आवेदन पत्र वितरित किए गए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में आवेदन जमा भी हुए, जिनकी पात्रता और दस्तावेजों की जांच की गई। जांच के दौरान कुछ ऐसे आवेदकों के सामने आने की भी जानकारी दी गई जिनके पास पहले से मकान या किसी सरकारी आवासीय योजना का लाभ होने की बात सामने आई।
8 फरवरी 2024 की हिंसा से भी जुड़ा है क्षेत्र
बनभूलपुरा क्षेत्र में 8 फरवरी 2024 को अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई के बाद हिंसा हुई थी। घटना के दौरान पुलिस और नगर निगम के कर्मचारियों पर पथराव तथा आगजनी की घटनाएं हुई थीं। इसके बाद क्षेत्र में कर्फ्यू लगाया गया था और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था।
अब रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में सर्वोच्च न्यायालय की अगली सुनवाई 17 सितंबर को प्रस्तावित है। ऐसे में बनभूलपुरा के हजारों प्रभावित परिवारों के साथ ही रेलवे, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
