कैंची धाम में बाबा नीब करौरी हुई वह मुलाकात जिसने हार्वर्ड के एक नशेड़ी-नास्तिक प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट की जिंदगी बदल दी… सच्ची कहानी…

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नवीन समाचार, नैनीताल, 5 सितंबर 2026 (Kainchi Dham-Harvards Richard Alpert)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के  नैनीताल (Nainital) के निकट तब के अल्पज्ञात कैंची धाम (Kainchi Dham) में वर्ष 1967 में हुई अमेरिकी मनोविज्ञान के स्वयं को नास्तिक मानने मानने वाले नशे की गिरफ्त में फंसे एक प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट (Richard Alpert) और की नीब करौरी बाबा (Neem Karoli Baba) (अपभ्रंश नीम करोली (Neem Karoli)) से मुलाकात आज भी बाबा के भक्तों के बीच सबसे चर्चित प्रसंगों में शामिल है। बाबा से मुलाकात के बाद अल्पर्ट का जीवन आध्यात्मिक दिशा में मुड़ा और वे आगे चलकर ‘रामदास’ (Ram Dass) के नाम से प्रसिद्ध हुए। देखें स्वयं प्रोफेसर अल्पर्ट उस मुलाकात पर क्या कहते हैं :  

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पुष्ट तथ्यों के अनुसार रिचर्ड अल्पर्ट वर्ष 1967 में भारत आये थे। उस समय वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) से जुड़े मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे और चेतना तथा मनुष्य के अनुभवों से जुड़े प्रयोगों के कारण चर्चा में थे। भारत यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात नीब करौरी बाबा से हुई, जिन्हें उन्होंने बाद में अपना गुरु माना। रामदास की आधिकारिक संस्था के अनुसार इसी मुलाकात के बाद उनके जीवन में बड़ा आध्यात्मिक परिवर्तन आया और बाबा ने उन्हें ‘रामदास’ नाम दिया, जिसका अर्थ ‘ईश्वर का सेवक’ बताया जाता है। 

जब रिचर्ड इंसानी दिमाग की गहराई को समझने के लिए अमेरिका से भारत और यहाँ उत्तराखंड के कैंची धाम पहुंचे तो उनको लगा कि वह कहां आ गए हैं, उनको वापस अमेरिका चले जाना चाहिए। किताबों की दुनिया में जीने वाले अल्बर्ट भारतीय साधु-संतों को ढोंगी और अंधविश्वासी मानते थे। लेकिन जब उनकी मुलाकात बाबा नीब करौरी से हुई, उनसे मिलते ही रिचर्ड का पूरा जीवन ही बदल गया। उन्होंने 1971 में लिखी ऐतिहासिक किताब ‘बी हियर नाउ’ (Be Here Now) में बाबा से जुड़े कई चमत्कारी किस्सों का जिक्र किया है। 

मां की याद और वह एक शब्द जिसने बदल दिया नजरिया

Kainchi Dham-Harvards Richard Alpert Ram-Dass-with-his-Guru-Neem-Karoli-Baba-Indiaरामदास ने वर्षों बाद अपनी पहली मुलाकात का जो विवरण साझा किया उसमें एक असाधारण प्रसंग सामने आता है। उनके अनुसार नीब करौरी बाबा ने उनसे कहा कि पिछली रात वे खुले आसमान के नीचे तारों को देखते हुए अपनी मां को याद कर रहे थे। इसके बाद बाबा ने उनकी मां के निधन और उनकी बीमारी से जुड़े संकेत दिये। रामदास के आधिकारिक मंच पर उपलब्ध उनके वक्तव्य में बाबा के उस कथन का विवरण है जिसमें उनकी मां के पेट के फूलने और ‘तिल्ली’ से जुड़ी बीमारी का उल्लेख आता है। पूरी बातें हिन्दी में करने के बावजूद बाबाजी ने तिल्ली शब्द के अंग्रेजी में स्प्लीन (Spleen) शब्द का प्रयोग  किया था।

दिमाग का घमंड और कैंची धाम की पहली मुलाकात

वर्ष 1967 की बात है। रिचर्ड अल्पर्ट कोई आम इंसान नहीं थे. वो हार्वर्ड में प्रोफेसर थे, दिमाग और चेतना पर बड़ी-बड़ी रिसर्च कर रहे थे। तर्क, विज्ञान और किताबों की दुनिया में जीने वाले अल्पर्ट को भारतीय साधु-संतों पर बिल्कुल भरोसा नहीं था। वो इसे महज ढोंग और अंधविश्वास मानते थे। जब वह पहली बार नैनीताल के पास कैंची धाम पहुंचे, तो उनका मन वहां बिल्कुल नहीं लगा। उन्हें लगा कि यह सब किसी धार्मिक कैलेंडर की तस्वीर जैसा बनावटी है। उनके मन में सिर्फ एक ही ख्याल चल रहा था, ‘मैं यहां कहां फंस गया, मुझे फौरन वापस अमेरिका लौट जाना चाहिए।’ 

बाबा के एक शब्द ने हिला दी प्रोफेसर की दुनिया

तभी नीम करौली बाबा (जिन्हें भक्त प्यार से महाराज जी कहते हैं) ने अल्पर्ट को अपने पास बुलाया. बाबा ने उनसे कोई धार्मिक उपदेश नहीं दिया, बल्कि सीधे पिछली रात का जिक्र छेड़ दिया। बाबा ने बड़े सहज भाव से कहा, “कल रात तुम खुले आसमान के नीचे तारों को देखते हुए अपनी मां को याद कर रहे थे ना?” 

अल्पर्ट सन्न रह गए। उनकी मां का निधन पिछले ही साल हुआ था और यह बात उन्होंने वहां किसी को नहीं बताई थी। अभी वो संभल भी नहीं पाए थे कि बाबा ने अगला शब्द बोला- “स्प्लीन (तिल्ली)।” 

यह सुनते ही अल्पर्ट के पैरों तले से जमीन खिसक गई। दरअसल, उनकी मां की मौत स्प्लीन की गंभीर बीमारी से हुई थी। एक विदेशी प्रोफेसर, जिसने पूरी जिंदगी विज्ञान और तर्क के सहारे काटी, वो यह समझ ही नहीं पाया कि हजारों मील दूर पहाड़ों में बैठा यह फकीर उसके दिल का सबसे गहरा और दर्दनाक राज कैसे जानता है।

आंसुओं में बहा अहंकार, शुरू हुआ ‘रामदास’ का सफर

उस एक पल ने अल्पर्ट के बौद्धिक घमंड को चकनाचूर कर दिया। वो वहीं बाबा के चरणों में फूट-फूटकर रोने लगे। बाद में अल्पर्ट ने खुद बताया कि वो कई दिनों तक रोते रहे, लेकिन वो आंसू दुख के नहीं थे। वो आंसू उस सुकून के थे, जब इंसान को महसूस होता है कि कोई उसे बिना कुछ कहे अंदर तक पूरी तरह समझ गया है। यहीं से प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट का सफर खत्म हुआ और जन्म हुआ ‘बाबा रामदास’ का। नीम करौली बाबा ने उन्हें नाम दिया रामदास, यानी ‘ईश्वर का सेवक’।

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बाबा नीम करौली से जुड़ा एक और चमत्कारी किस्सा

दरअसल तब रिचर्ड ड्रग्स लेते थे। भारत आने से पहले उन्होंने अपने एक साथी के साथ मिलकर एलएसडी जैसे साइकेडेलिक पदार्थों पर काफी रिसर्च की थी। अल्बर्ट को लगता था कि एलएसडी का सेवन करने से इंसान उच्च चेतना जैसा अनुभव करता है। उनके मन में सवाल था कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना किसी दवा के हमेशा के लिए इस उच्च चेतना की स्थिति में रह सके? 

रिचर्ड ने देखी नीम करौली बाबा की महिमा

बाबा से मिलते ही अल्बर्ट की मन की वैज्ञानिक जिज्ञासाएं भी शांत हो गईं। उनको जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनके पास जो गोलियां हैं, बाबा उनके बारे में पहले से जानते हैं। बाबा ने उनसे अचानक पूछा कि क्या तुम्हारे पास दवा है? ये सुनते ही रिचर्ड चौंक गए। क्योंकि उस वक्त उनके पास बहुत ही हैवी एलएसडी की गोलियां थी। बाबा ने उनसे 3 गोलियां लेकर अपने मुंह में रख लीं। ये दखते ही रिचर्ड घबरा गए। 900 माइक्रोग्राम एलएसडी की मात्रा किसी इंसान को मानसिक रूप से बीमार कर सकती थी। व्यक्ति इसे लेकर कोमा में भी जा सकता था।

एलएसडी का बाबा पर नहीं हुआ असर

रिचर्ड को डर था कि बाबा को कुछ हो न जाए। वह टकटकी बांधे उनके मुंह की तरफ देखते रहे कि तबीयत बिगड़ते ही उनको कुछ करना होगा। लेकिन पूरा दिन निकल गया बाबा तो एकदम ठीक थे। उन पर तो एलएसडी को कोई असर ही नहीं हुआ। वह तो बिल्कुल सामान्य थे। लेकिन रिचर्ज अंदर से विचलित थे, उनके ये भाव बाबा को समझ आ गए थे।

बाबा नीम करौली ने समझाया आनंद की असली मतलब

बाबा ने रिचर्ड से हंसते हुए कहा कि ये गोलियां इंसान को कुछ वक्त के लिए उच्च चेतना में ले जा सकती हैं लेकिन हमेशा के लिए नहीं। हमेशा उच्च चेतना में रहने का असली तरीका प्रेम, भक्ति और ध्यान है। किसी बाहरी चीज से ये संभव नहीं। बाबा ने कहा कि अगर नशा करना ही है तो राम नाम का करो। बस तभी रिचर्ड को समझ आ गया कि कोई भी बाहरी चीज परम आनंद नहीं दे सकती। अब उनको अपने सवालों का जवाब मिल चुका था। इस घटना के बाद रामदास ने ड्रग्स छोड़ दीं और भक्ति, योग और ध्यान के रास्ते पर चल पड़े।

रामदास ने बताया कि इस क्षण ने उनके तर्कप्रधान मन को गहराई से प्रभावित किया। इस मुलाकात ने अल्पर्ट के जीवन की दिशा बदल दी। यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रिचर्ड अल्पर्ट उस दौर में वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चेतना को समझने वाले विद्वान के रूप में पहचाने जाते थे। स्वयं रामदास ने बाद में इस अनुभव को अपने अहंकार और तर्क की सीमाओं से जुड़ा निर्णायक क्षण बताया।

हार्वर्ड के प्रोफेसर से रामदास बनने तक

भारत में नीब करौरी बाबा के संपर्क में आने के बाद रिचर्ड अल्पर्ट ने आध्यात्मिक साधना और सेवा की ओर अपना जीवन मोड़ दिया। रामदास की आधिकारिक जीवनी के अनुसार वे वर्ष 1968 से भक्ति योग, ध्यान और सेवा सहित विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े रहे। बाबा के साथ उनके अनुभवों ने आगे चलकर उनकी शिक्षाओं और लेखन को भी गहराई से प्रभावित किया।

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BE HERE NOW : The Journey of Transformation - Dr. Richard Alpert, Ph.D Into  Baba Ram Dass by Ram Dass | Goodreadsइसी यात्रा का सबसे प्रभावशाली परिणाम वर्ष 1971 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘बी हियर नाउ’ (Be Here Now) रही। पुस्तक में योग, ध्यान और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े विचारों को पश्चिमी पाठकों तक पहुंचाया गया। रामदास की संस्था के अनुसार यह पुस्तक पश्चिमी दुनिया में पूर्वी आध्यात्मिक विचारों को लोकप्रिय बनाने वाली महत्वपूर्ण पुस्तकों में शामिल हुई और इसकी दो करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। 

बीमारी के बाद भी जारी रहा संदेश

वर्ष 1997 में रामदास को मस्तिष्काघात (Stroke) हुआ, जिसके कारण उनके शरीर में लकवे का प्रभाव पड़ा और बोलने की क्षमता भी प्रभावित हुई। इसके बावजूद उन्होंने व्हीलचेयर से शिक्षण, लेखन और आध्यात्मिक संवाद जारी रखा। उनकी आधिकारिक जीवनी के अनुसार वे बाद में दूरस्थ माध्यमों से व्याख्यान देते रहे और साधकों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन जारी रखा।

वर्ष 2004 में रामदास माउई (Maui), हवाई (Hawaii) चले गये। वहां उन्होंने अपेक्षाकृत शांत जीवन बिताते हुए लेखन, साधना और शिक्षण का काम जारी रखा। 22 दिसंबर 2019 को माउई स्थित अपने घर में उनका निधन हुआ। उनकी संस्था के अनुसार उनके जीवन का प्रभाव पांच दशक से अधिक समय तक अमेरिकी आध्यात्मिक संस्कृति में बना रहा। 

आज फिर चर्चा में है कैंची धाम

नीब करौरी बाबा और कैंची धाम से जुड़ी यह कहानी वर्ष 2026 में एक बार फिर व्यापक चर्चा में है। बाबा के जीवन से प्रेरित हिंदी फिल्म ‘हनुमान अंश’ (Hanuman Ansh) 7 अगस्त 2026 को देशभर में प्रदर्शित हुई है। फिल्म की आधिकारिक वेबसाइट इसे नीब करौरी बाबा के जीवन से प्रेरित आध्यात्मिक यात्रा बताती है और स्पष्ट करती है कि यह उनकी सीधी जीवनी नहीं है। (Anupriya Nagar)

फिल्म की चर्चा के साथ नीब करौरी बाबा के जीवन, उनके संदेश और उनसे जुड़े पुराने प्रसंगों में लोगों की रुचि भी बढ़ी है। इनमें रिचर्ड अल्पर्ट का रामदास में परिवर्तन विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि यह घटना केवल किसी प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान की भारत यात्रा की कहानी नहीं रह गयी, बल्कि यह दिखाती है कि एक अनुभव किस तरह किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकता है।

कैंची धाम से जुड़ी रामदास की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है कि विज्ञान और अध्यात्म को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय इसे उनके जीवन में आये परिवर्तन के रूप में देखा जाए। जिस व्यक्ति ने चेतना को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया, वही आगे चलकर ध्यान, सेवा और वर्तमान क्षण में जीने के संदेश का प्रमुख प्रसारक बना। आखिर वह कौन-सा अनुभव था जिसने रिचर्ड अल्पर्ट को रामदास बना दिया और कैंची धाम को उनकी जीवन यात्रा का इतना महत्वपूर्ण पड़ाव बना दिया।

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