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चीमा ने कविताओं से व्यवस्थाओं पर कसे कड़े तंज

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-महादेवी वर्मा सृजन पीठ में फेसबुक लाइव के जरिये ‘मेरी रचना यात्रा और कविताएँ’ विषय पर ऑनलाइन चर्चा व कविता पाठ आयोजित
नवीन समाचार, नैनीताल, 28 अगस्त 2020। कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा बीते कई सप्ताहों से हर सोमवार को फेसबुक लाइव कार्यक्रम में ‘मेरी रचना यात्रा और कविताएँ’ विषय पर ऑनलाइन चर्चा व कविता पाठ आयोजित हो रहे हैं। इस सप्ताह इस कार्यक्रम में प्रदेश के सुप्रसिद्ध जनकवि बल्ली सिंह चीमा ने ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं। इस मौके पर ‘मां’ को समर्पित जनगीत में उन्होंने कहा ‘जंगल रोज उजाड़े हमने पूंजीपतियों की खातिर, ऊँचे बाँध बनाये हमने पूंजीपतियों की खातिर, नोचा-लूटा धरती माँ को उसका बंटाधार किया, माँ कहकर भी हमने उसका जीना दुश्वार किया।’
इस दौरान बाजपुर जिला ऊधमसिंह नगर निवासी श्री चीमा ने शहीदे आजम सरदार भगत सिंह को उनके जन्मदिन पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘हर जवाँ सीने में धड़के भगत सिंह का दिल अभी, रोजी-रोटी की लड़ाई चल रही है चल अभी, जीत भी होगी किसी दिन देख लेगा ये जहान, अब सुबह होने को है जाग ऐ हिंदुस्तान।’ पलायन के दर्द को बयां करते हुए उन्होंने कहा ‘पहाड़ी गाँव-कस्बों से तो गायब हो गई रौनक, सुना है हल्द्वानी-दून आ रहने लगी रौनक, बुढापे की जिन्होंने रौनकें बनना था आंगन में, कनाडा जा बसे वो साथ उनके जा बसी रौनक, ये मँहगाई-भ्रष्टाचार पूंजीवाद का फल है, हर एक इंसान के चेहरे से गायब हो गई रौनक।’ वहीं वर्तमान में चल रहे देशव्यापी किसान आंदोलन को समर्पित गजल सुनाते हुए उन्होंने कहा, ‘वो जो मर रहा कर खुदखुशी इस देश का किसान है, कहो गर्व से कहो शान से मेरा देश फिर भी महान है। जो अमीर था वो अमीर है वही ठाठ हैं वही शान है, जो गरीब था वो गरीब है ये विकास एक समान है। मैं किसान हूँ मेरा हाल क्या मैं तो आसमां की दया पर हूँ, कभी मौसमों ने हंसा दिया कभी मौसमों ने रूला दिया।’ इसके अलावा ‘धूप से सर्दियों में खफा कौन है’ शीर्षक गजल पढ़ते हुए उन्होंने कहा, ‘बह रही हो जहाँ कूलरों की हवा पीपलों को पूछता कौन है, बांटने वाले हों सारे अंधे जहाँ, किसको कितना मिला देखता कौन है?’ इसके अलावा श्री चीमा ने अपनी मशहूर गजल ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के, वे कविताएं, मीर साहब से माजरत के साथ, कभी-कभी बोलते हैं जानवर भी, गरीब उर्फ मजदूर किसान, अमरीका व पुस्तकें आदि गजलों व कविताओं का पाठ भी किया। इससे पूर्व श्री चीमा ने ऑनलाइन जुड़े श्रोताओं से अपनी रचना यात्रा को साझा करते हुए बताया कि वह इन दिनों अपने रचनाकर्म, जीवन संघर्ष, जनांदोलनों में भागीदारी आदि पर केंद्रित आत्मकथा लिख रहे हैं, जो शीघ्र ही पाठकों के सम्मुख होगी। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार कृषक, दिवा भट्ट, रामेश्वर त्रिपाठी, महेश पुनेठा, जहूर आलम, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, रमेश चंद्र पंत सहित अनेक साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : समय की पहचान न होगी तो समय भी नहीं पहचानेगा: शैलेय

नवीन समाचार, नैनीताल, 14 सितंबर 2020। समय की अपने आप में कोई निरपेक्ष सत्ता नहीं होती। देशकाल-परिस्थितियों के अनुसार हम उससे अर्थ ग्रहण करते हैं। एक रचनाकार के लिए देशकाल-परिस्थितियों के अनुरूप ही समय को व्याख्यायित करना या समय की दृष्टि से देशकाल-परिस्थिति को व्याख्यायित करना तथा उनके अंतर्संबंधों-अंतर्विरोधों को पकड़ना नितांत आवश्यक है। क्योंकि यदि समय की पहचान किसी रचनाकार को नहीं होगी तो समय भी उसकी पहचान करने में सहायक नहीं होगी।
यह विचार परम्परा सम्मान, शब्द साधक सम्मान, परिवेश सम्मान, शैलेश मटियानी कथा-स्मृति सम्मान आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित चर्चित कवि व कथाकार, सरदार भगत सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रुद्रपुर (ऊधमसिंह नगर) में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शंभूदत्त पांडे ‘शैलेय’ ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘समय, समाज और रचनाधर्मिता’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमें यह जानना-समझना आवश्यक है कि हम अपने समय में अपनी भूमिका का निर्वहन किस रूप में करते हैं। इसी से ही हमारे समय को भी व्याख्यायित किया जायेगा। उन्होंने जोड़ा कि सदा से ही समाज एक जीवंत सत्ता रहा है और जीवंत सत्ताएं सदैव गतिशील होती हैं। उन्होंने कविता-पाठ की शुरुआत करते हुए प्रश्न किया ‘हताश लोगों से एक सवाल, हिमालय ऊँचा या बछेन्द्री पाल?’ उन्होंने कार्यक्रम में अपने कविता-संग्रह या, तो, कुढब कुबेला और बीच दिसम्बर से क्रमशः जूता, बातचीत, दृष्टि, पहाड़, तुम्हारा जाना, पुलोवर, किसके लिए, संवार, रंग सुंदरतम, बुरांश आदि कविताओं का पाठ भी किया, जिसे ऑनलाइन जुड़े श्रोताओं ने काफी सराहा। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. जितेन्द्र श्रीवास्तव, जहूर आलम, जगदीश जोशी, महेश पुनेठा, दिनेश कर्नाटक, महाबीर रंवाल्टा, रमेश पंत, स्वाति मेलकानी, मुकेश नौटियाल, अमिता प्रकाश, डॉ. अनिल कार्की, खेमकरण सोमन, डॉ. तेजपाल सिंह, दीपा पांडे, शीला पुनेठा, डॉ. कमलेश कुमार मिश्रा सहि अनेक साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : अगली बार धरती नहीं आकाश बनूंगी, दूर से ही देखूंगी तुम्हें..

नवीन समाचार, नैनीताल, 07 सितंबर 2020। ‘अगली बार धरती नहीं आकाश बनूंगी, दूर से ही देखूंगी तुम्हें। देखूंगी कैसे ठिठुरते हो ठंड में या गर्मी में हांफते से फड़कते हो। स्वयं में पेड़ उगाकर जो न दूँ छाँव तो कैसे झुलसते हो तेज दुपहरी धूप में। ‘अगली बार’ शीर्षक से कविता की यह पंक्तियां चर्चित कवयित्री स्वाति मेलकानी ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन कविता-पाठ में प्रस्तुत की।
वहीं ‘बुरांश’ शीर्षक कविता से कविता-पाठ की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा, बुरांश के खिलने से जंगल खिल उठता है। बुरांश आशा है आज के सूरज के वर्षों तक उगने की और अंधेरी रातों में तारों और जुगनू के कभी न बुझने की। बुरांश का खिलना एक भरोसा है कि हवा में पानी, पानी में जीवन और जीवन में प्रेम अब भी शेष है। बुरांश प्रतीक है संभावनाओं का। स्वामी विवेकानंद राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लोहाघाट (चम्पावत) के शिक्षा शास्त्र विभाग में सहायक प्राध्यापक स्वाति मेलकानी ने इसके अलावा लड़कियों की आजादी और सपनों को केंद्र में रखकर लिखी कविता ‘एक खिड़की’ सुनाते हुए कहा, एक ऐसी खिड़की जरूर बनाना घर में जो तुम्हारी पहुँच में हो और जिसे तुम अपनी मर्जी से खोल सको। जब तुम्हारी साँसें फूलने लगती हैं तो उस खिड़की से होकर ताजी हवा आ सके तुम तक और तुम महसूस कर सको कि हवा में तुम्हारा भी हिस्सा है। इसके अलावा उन्होंने तीर्थयात्रियों पर हुए आतंकी हमले को केंद्र में रखकर लिखी कविता ‘अमरनाथ-2017’ तथा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा अनुशंसित एवं प्रकाशित अपने कविता संग्रह ‘जब मैं जिंदा होती हूँ’ से ‘खोजूंगी तुम्हें’, ‘पिक्चर अभी बाकी है’ गत वर्ष पिथौरागढ़ में पुस्तकों के लिए छात्रों द्वारा चलाए गए आंदोलन पर केंद्रित ‘पिथौरागढ़ किताब आंदोलन के नाम’, 15 जुलाई 2016 को फ्रांस के नीस शहर में उत्सव मनाती भीड़ को ट्रक से रौंदे जाने की घटना पर केंद्रित ‘मातम’, पहाड़ में पलायन की समस्या पर ‘लौट आओ’ सहित ‘मुक्ति’, ‘तुम्हारे लिए तुम्हारे आने से पहले’, ‘तुम और मैं’, ‘शहर से गुजरते हुए’, ‘ज्वालामुखी’ और ‘मुझे खोज है त्रास की’ कविताओं का पाठ भी किया। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, हरीश चन्द्र पांडे, जगदीश जोशी, दिवा भट्ट, गीता गैरोला, जहूर आलम, जितेन्द्र श्रीवास्तव, शैलेय, हरि मृदुल, दिनेश कर्नाटक, रेखा चमोली, उदय किरौला, महाबीर रंवाल्टा व अनिल कार्की सहित बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : कविता गहरे दायित्व बोध की सार्थक अभिव्यक्ति: डॉ. त्रिपाठी

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 अगस्त 2020। अब कविता सिर्फ कविता के लिए नहीं बल्कि गहरे दायित्व बोध की सार्थक अभिव्यक्ति है। आज कविता वही रेखांकित कर रही है जो समाज में टूट रहा है। आधुनिक कविता में भविष्य के समाज की स्पष्ट तस्वीर देखी जा सकती है। सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध वह अपना आक्रोश ही व्यक्त नहीं करती बल्कि चेतना जागृत कर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी निर्वाह करती है। आज की हिंदी कविता जहां अतीत से अपने संबंध को व्याख्यायित करती है, वहीं भविष्य के प्रति भी एक दृष्टि देती है। यह विचार कवि व आलोचक तथा जेएनपीजी लखनऊ के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर अनिल त्रिपाठी ने रविवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में ‘हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए हर सप्ताह शनिवार को आयोजित होने वाली ऑनलाइन चर्चा में इस शनिवार को व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शिल्प के बंधनों से मुक्त आज की कविता वैचारिक रूप से अधिक परिपक्व है। जैसी मारक क्षमता आज की हिंदी कविता में है, वैसी पहले कभी नहीं रही।
उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा की शक्ति का अंदाज बिल्कुल नए कवियों की भाषा से लगाया जा सकता है। इन कवियों की कविताओं में जहाँ समय को समझने की कोशिश है, वहीं उनकी कविता अपने समय को बिना किसी आकुलता के पकड़ती है। उन्होंने कहा कि पुस्तकों के बजाय इंटरनेट, फेसबुक और ब्लॉग जैसे माध्यमों के जरिए लोकप्रिय हो रही कविता भाषा और विन्यास की सीमा से परे बिल्कुल एक नए प्रयोग की तरह है जो बहुत कम शब्दों में अपनी गहरी छाप छोड़ जाती है। चर्चा के उपरांत श्री त्रिपाठी ने अपनी विपरयस्तु, पोस्ट ट्रूथ, अब भी, बापू की याद, उजाड़, फूल-सी मीठी, मुझे यकीन है, मेरे गाँव का गडरिया, पिता एक इंतजार का नाम है आदि कविताओं का पाठ किया, जिसे ऑनलाइन जुड़े श्रोताओं ने काफी सराहा। कार्यक्रम में पीठ के पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित केशव तिवारी, वसंत सकरगाए, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, अमित श्रीवास्तव गोविंद नागिला, राहुल पांडे, प्रभा साह, खेमकरण सोमन, अजेय पांडेय, शेखर पाखी, यशपाल कुमार, कन्हैया मिश्र, सत्य प्रकाश शर्मा, डॉ. तेजपाल सिंह, जवाहर मूठा, जितेंद्र यादव, पृथ्वी राज सिंह, शील निगम, सुरेश सिंह, विकलेश पांडे, कमलेश कुमार मिश्रा, इंदु त्रिपाठी, जिग्नेश तिवारी, चंद्रेश धर द्विवेदी, उद्भव मिश्रा, दिलीप कश्यप, कानन त्रिपाठी, अनीता चौहान आदि कवि-साहित्यकार व साहित्य-प्रेमी शामिल रहे।

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-राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी के लिए नैनीताल में जुटे देशभर के बाल साहित्यकार, कहा स्थितियों को बेहतर करने की जिम्मेदारी साहित्यकारों की भी

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जून 2019। मोबाइल ने बच्चों में कल्पनाशीलता, बाहर खेलने व याददाश्त को कम करने के साथ ही आंखों एवं शरीर को काफी नुकसान पहुंचाया है तथा अन्य कारणों के साथ वह भी बच्चों से उनका बचपनी छीनकर उन्हें समय से पहले बड़ा बना रहा है, लेकिन हर दौर के बच्चों के माता-पिता के दृष्टिकोण से ‘अनपेक्षित’ दिशा में जाने के खतरों के साथ ही मोबाइल फोन आज और भविष्य की जरूरत भी है। मोबाइल के प्रयोग में बच्चे बड़ों से आगे भी हैं और घर में अपने बड़ों की मोबाइल संबंधी समस्याओं का समाधान वे ही करते हैं। लेकिन उन्हें मोबाइल उपलब्ध कराने से लेकर स्वयं मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग कर बच्चों में भी इसके प्रति जिज्ञासा बढ़ाने के लिए बड़े अधिक जिम्मेदार हैं। ऐसे में साहित्यकारों व खासकर बाल साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को आकर्षक तरीके से इन स्थितियों के खतरों से दूर रखने, जागरूक करने के लिए ऐसा आकर्षक साहित्य लिखें कि बच्चे उन्हें पढ़ें और जागरूक हों।
यह बात रविवार को अल्मोड़ा से प्रकाशित बच्चों की त्रैमासिक पत्रिका बाल प्रहरी, बालसाहित्य संस्थान तथा नगर के श्री अरविंदो आश्रम के संयुक्त तत्वावधान में नगर के वन निवास अरविंदो आश्रम 14वीं राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में ‘मोबाइल, बच्चे और बाल साहित्य’ विषयक संगोष्ठी में साहित्यकार डा. एलएस बिष्ट ‘बटरोही’, डा. भैरूं लाल गर्ग, स्नेहलता, विजय बिष्ट व डा. हरिदेव धीमान आदि साहित्यकारों ने कही। इस दौरान दामोदर जोशी ‘देवांशु’ की बच्चों की कविताओं की पुस्तक ‘पहाड़ पढ़ो’, डा. अजीत राठौर की ‘चुनमुन चूहा’, राजकुमार सचान की ‘छेना और रसगुल्ले’ तथा चक्रधर शुक्ल की ‘दादी की प्यारी गौरैया’ सहित ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के बाल साहित्य विशेषांक, बाल वाटिका पत्रिका के पर्यावरण विशेषांक तथा जय सिंह आशावत, राजा भैया गुप्ता ‘राजाभ’, डा. रमेश आनंद, गौरी शंकर वैश्य, चद्रभान चंद्र, माधव गिरि ‘मधुवन’ व स्नेहलता सहित 12 साहित्यकारों की पुस्तकों का विमोचन व प्रस्तुतीकरण भी किया गया। साथ ही कविता, देव सिंह, गरिता, नीरज, चित्रा, आस्था, भाष्कर, शंकर, प्रियंका, नितिन, निशा, काजल, खुशी, नीरज व तनूजा आदि बच्चों ने कवि गोष्ठी में अपनी स्वरचित कविताएं भी सुनाईं। साहित्यकारों ने आयोजक बाल प्रहरी पत्रिका के संपादक उदय किरौला की बाल साहित्यकारों के लिए देश का यह प्रमुख आयोजन बिना किसी सहयोग के करने के लिए मुक्त कंठ से प्रशंसा की। अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी आयोजित हुआ। संचालन डा. दीपा कांडपाल ने किया। इस मौके पर डा. राकेश चक्र, केपीएस अधिकारी, संगीता सेठी, हरीश चंद्र बोरकर, डा. करुणा पांडेय, कमलेश चौधरी, शशि ओझा, मेजर शक्तिराज, नरेंद्र परिहार सहित देश भर के लगभग 125 बाल साहित्य के रचनाकार व बच्चे मौजूद रहे। जबकि आयोजन में हिमांशु पांडे ‘मित्र’, मंजू पांडे ‘उदिता’, विमला जोशी ‘विभा’, प्रकाश जोशी, अनिल पुनेठा, प्रमोद तिवारी, डा. रेखा त्रिवेदी, डा. गंगा बिष्ट, डा. सरस्वती खेतवाल, ममता पांडे, डा. बिशना साह व संतोष किरौला आदि ने भी योगदान दिया।

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-1985 से भाकपा माले के केंद्रीय कमेटी सदस्य पुरुषोत्तम शर्मा के पास था, उन्होंने संग्रहालय को सोंपा

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का टाइपराइटर हिमालयन संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा को सोंपते कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा।

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जनवरी 2019। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी का टाइप राइटर सोमवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर नैनीताल स्थित हिमालयन संग्रहालय की शोभा बन गया। भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और ‘विप्लवी किसान संदेश’ पत्रिका के संपादक कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा ने महाकवि ‘निराला’ जी का प्रयोग किया हुआ टाइपराइटर सोमवार को शिक्षक नेता नवेन्दु मठपाल के साथ कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिषर नैनीताल स्थित संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा को सोंप दिया। बताया कि 1988 में इसे एक धरोहर के रूप में लोकप्रिय क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय ने उन्हें सौंपा था। गोरख पांडेय तब दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध कर रहे थे।
गोरख पांडेय खुद टाइप नहीं करते थे और कलम से ही लिखते थे। कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा और गोरख पांडेय एक ही संगठन भाकपा (माले) में थे, और 1985 में जन संस्कृति मंच की दिल्ली में स्थापना की तैयारी के दौरान कई महीने उन्होंने साथ कार्य किया था। उस दौर में भाकपा (माले) बहुत छोटी पार्टी थी और उनके पास कोई कम्प्यूटर या टाइप मशीन नहीं थी, इसलिए कामरेड शर्मा को यह टाइपराइटर मिल गया था। 1990 में संगठन के पास नई टाइप मशीन और एक कम्यूटर आने के बाद से उन्होंने इसे सुरक्षित संभाल कर रखा था। इस मौके पर कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि उन्होंने टाइप करना इसी टाइपराइटर से सीखा। वहीं संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा ने कहा कि यह हमारी अमूल्य धरोहर है जिससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने इसे कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिषर नैनीताल को सौंपने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा का धन्यवाद किया।
उत्तराखंड मूल के साहित्यकार को मिला भारत-भारती सम्मान

लखनऊ, 1 नवंबर 2018।  उप्र हिंदी संस्थान की ओर से लखनऊ में आयोजित हुए भारत-भारती सम्मान में उत्तराखंड के अल्मोड़ा के गंगोला मोहल्ला निवासी साहित्यकार पद्मश्री डॉ. रमेश चंद्र साह को भारत भारती सम्मान से नवाजा गया। उप्र के विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने पुरस्कार स्वरूप उन्हें गंगा प्रतिमा, अंगवस्त्र, ताम्रपत्र और पांच लाख रुपये की धनराशि प्रदान की। मालूम हो कि पद्मश्री साह को पूर्व में साहित्य क्षेत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, मध्य प्रदेश का शिखर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र और मैथलीशरण गुप्त सम्मान भी मिल चुके हैं।

भारत-भारती सम्मान मिलने पर साहित्यकार डॉ. शाह ने कहा कि आज साहित्य पढ़ने और लिखने वालों का अनुपात ठीक नहीं है। डॉ. साह ने निराला सृजन पीठ भोपाल के निदेशक का पद भी सुशोभित किया है। वे अंग्रेजी विषय के प्रोफेसर रहे लेकिन हिंदी में उनकी गहरी पकड़ और अगाध प्रेम उनके साहित्य से ही झलकता है। डॉ. साह के अब तक 11 उपन्यास, 10 निबंध संग्रह, 10 साहित्य लोचन ग्रंथ, नौ काव्य संग्रह, सात कहानी संग्रह, पांच संपादित कृति ग्रंथ, तीन अनुवाद ग्रंथ, यात्रा वृतांत और दो बाल नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा अंग्रेजी भाषा में पांच ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. साह अब तक यूगोस्लाविया, हंगरी, इंग्लैंड, चेकोस्लाविया, आयरलैंड आदि देशों की साहित्य यात्रा कर चुके हैं।

तनुश्री मामले में उतरीं लेखिका शोभा डे, नाना पाटेकर के साथ अमिताभ और पूरे बॉलीवुड को लपेटा

    • पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा-समकालीन का मतलब तात्कालिकता नहीं, वक्त की कसौटी पर कसी जाएगी समकालीन हिंदी कविता
  • समकालीन हिंदी कविता पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारंभ

नैनीताल, 23 फ़रवरी 2018। वरिष्ठ कवि पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने ‘समकालीन हिंदी कविताः 1990 के बाद के नये संदर्भ’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में अपने मुख्य ‘बीज संबोधन’ में कई शब्दों के अर्थों को साफ किया। कहा कि समकालीन का मतलब अखबार की तात्कालिकता नहीं है। कहा कि जो कविता अपने पूर्व कवियों व उनकी कविताओं को साथ लेकर व अपने समय की बात कहती हैं, और भविष्य के लिए दृष्टि दिखाती हैं, वे ही कालजयी बनती हैं। कविता के बाबत उन्होंने कहा कि जिसमें अकथित बात कही गयी हो वह कविता होती है। इस कसौटी पर गद्य भी कविता हो सकता है। आज के दौर में पाठकों की कमी व पठनीयता के ह्रास के बावजूद किताबें छपने की होड़ को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया व पुरस्कार प्राप्त करना आधुनिक कवियों का कार्य हो गया है। जबकि कवियों को अपनी कविता और कवित्व को लगातार ‘मांझने’ की जरूरत है। आचोलक शब्द को भी साफ करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचना करना नहीं बल्कि कविता को समग्र दृष्टिकोण से देखना आलोचक का कार्य है। सोना जिस पत्थर पर उत्पन्न होता है, उसी पत्थर की कसौटी पर घिस कर कसा जाता है। अलबत्ता आलोचकों को नई कसौटी पर भी कविताओं को कसना होगा। कहा कि आज की कविता व अखबारों की भाषा में कोई फर्क नहीं रह गया है। कविता नये शब्द गढ़ रही है। सलाह दी कि विश्वविद्यालयों को नये गढ़े जा रहे शब्दों के संकलन व शब्दकोष बनाने पर कार्य करना चाहिए।

जगूड़ी शुक्रवार को कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में मानव संसाधन विकास केंद्र हरमिटेज परिसर में महादेवी सृजन पीठ रामनगर के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। इससे पूर्व कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल की अध्यक्षता एवं प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित की उपस्थिति में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में संयोजक प्रो. मानवेंद्र पाठक ने संगोष्ठी में आये प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए विभाग के कवि प्रो. शिरीष मौर्य की कविता तसला की सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता वह तोड़ती पत्थर से तुलना करते हुए अमूर्त वस्तुओं के जरिये तत्कालीन संदर्भों के प्रकटीकरण का उल्लेख किया। बताया कि संगोष्ठी का उद्देश्य 1990 से अब तक राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से हुए तमाम परिवर्तनों एवं संचार माध्यमों की उत्तरोत्तर बढ़ती उपलब्धता सहित बदलते हुए परिवेश में हिंदी कविता के संवाद को अकादमिक स्तर पर रेखांकित करना है। संगोष्ठी में देश के पश्चिमी बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, यूपी, उत्तराखंड व दिल्ली आदि राज्यों से समालोचक जीवन सिंह, हरिश्चंद्र पांडे, सुबोध शुक्ल व डा. अमित श्रीवास्तव सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों के अलावा डीएसबी परिसर की प्रो. मुन्नी पडलिया, प्रो. ललित तिवाड़ी, डा. रवि जोशी सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं शोध छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। संचालन प्रो. चंद्रकला रावत ने किया।

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p style=”text-align: justify;”>आदि, व्याधि व उपाधि…
नैनीताल। संगोष्ठी में शब्दों को चुटीले अंदाज में उनके मूल अर्थ में परिभाषित करते हुए पद्मश्री जगूड़ी ने कहा कि विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली ‘उपाधि’ शब्द मूलतः आयुर्वेद से आया है, जहां जन्मजात बीमारियों को आधि, शारीरिक बीमारियों को ब्याधि और मस्तिष्क की बीमारियों का उपाधि कहा गया है।  उन्होंने कहा कि उपाधि धारकों को वास्तव में अपने विषय को मस्तिष्क में किसी बीमारी की तरह ही ग्रहण करना चाहिए।

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p style=”text-align: justify;”>25 से कुमाऊं विवि में शोधार्थियों के लिए दैनिक उपस्थिति लगाना हुआ अनिवार्य
नैनीताल। कुमाऊं विविके स्पांसर्ड रिसर्च एंड इंडस्ट्रियल कंसल्टेंसी सेल के निदेशक प्रो. राजीव उपाध्याय ने कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल के हवाले से बताया कि आगामी 25 फरवरी से कुमाऊं विवि में शोधार्थियों के लिए विभागाध्यक्ष कार्यालय में दैनिक उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य होगा। यह उपस्थिति हर महीने सेल को भेजनी अनिवार्य होगी। इसके अलावा शोधार्थियों को अपनी पीएचडी थीसिस की हार्ड कॉपी के साथ ही सॉफ्ट कॉपी पेन ड्राइव में भी सेल में देनी होगी।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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