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बच्चों के लिए मोबाइल लाभदायक या नुकसानदेह, मंथन के बाद निकली यह बात

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-राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी के लिए नैनीताल में जुटे देशभर के बाल साहित्यकार, कहा स्थितियों को बेहतर करने की जिम्मेदारी साहित्यकारों की भी

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रविवार को अरविंदो आश्रम में आयोजित राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में बच्चों की एक ‘पहाड़ पढ़ो’ का विमोचन करते मंचासीन गणमान्य।

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जून 2019। मोबाइल ने बच्चों में कल्पनाशीलता, बाहर खेलने व याददाश्त को कम करने के साथ ही आंखों एवं शरीर को काफी नुकसान पहुंचाया है तथा अन्य कारणों के साथ वह भी बच्चों से उनका बचपनी छीनकर उन्हें समय से पहले बड़ा बना रहा है, लेकिन हर दौर के बच्चों के माता-पिता के दृष्टिकोण से ‘अनपेक्षित’ दिशा में जाने के खतरों के साथ ही मोबाइल फोन आज और भविष्य की जरूरत भी है। मोबाइल के प्रयोग में बच्चे बड़ों से आगे भी हैं और घर में अपने बड़ों की मोबाइल संबंधी समस्याओं का समाधान वे ही करते हैं। लेकिन उन्हें मोबाइल उपलब्ध कराने से लेकर स्वयं मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग कर बच्चों में भी इसके प्रति जिज्ञासा बढ़ाने के लिए बड़े अधिक जिम्मेदार हैं। ऐसे में साहित्यकारों व खासकर बाल साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को आकर्षक तरीके से इन स्थितियों के खतरों से दूर रखने, जागरूक करने के लिए ऐसा आकर्षक साहित्य लिखें कि बच्चे उन्हें पढ़ें और जागरूक हों।
यह बात रविवार को अल्मोड़ा से प्रकाशित बच्चों की त्रैमासिक पत्रिका बाल प्रहरी, बालसाहित्य संस्थान तथा नगर के श्री अरविंदो आश्रम के संयुक्त तत्वावधान में नगर के वन निवास अरविंदो आश्रम 14वीं राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में ‘मोबाइल, बच्चे और बाल साहित्य’ विषयक संगोष्ठी में साहित्यकार डा. एलएस बिष्ट ‘बटरोही’, डा. भैरूं लाल गर्ग, स्नेहलता, विजय बिष्ट व डा. हरिदेव धीमान आदि साहित्यकारों ने कही। इस दौरान दामोदर जोशी ‘देवांशु’ की बच्चों की कविताओं की पुस्तक ‘पहाड़ पढ़ो’, डा. अजीत राठौर की ‘चुनमुन चूहा’, राजकुमार सचान की ‘छेना और रसगुल्ले’ तथा चक्रधर शुक्ल की ‘दादी की प्यारी गौरैया’ सहित ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के बाल साहित्य विशेषांक, बाल वाटिका पत्रिका के पर्यावरण विशेषांक तथा जय सिंह आशावत, राजा भैया गुप्ता ‘राजाभ’, डा. रमेश आनंद, गौरी शंकर वैश्य, चद्रभान चंद्र, माधव गिरि ‘मधुवन’ व स्नेहलता सहित 12 साहित्यकारों की पुस्तकों का विमोचन व प्रस्तुतीकरण भी किया गया। साथ ही कविता, देव सिंह, गरिता, नीरज, चित्रा, आस्था, भाष्कर, शंकर, प्रियंका, नितिन, निशा, काजल, खुशी, नीरज व तनूजा आदि बच्चों ने कवि गोष्ठी में अपनी स्वरचित कविताएं भी सुनाईं। साहित्यकारों ने आयोजक बाल प्रहरी पत्रिका के संपादक उदय किरौला की बाल साहित्यकारों के लिए देश का यह प्रमुख आयोजन बिना किसी सहयोग के करने के लिए मुक्त कंठ से प्रशंसा की। अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी आयोजित हुआ। संचालन डा. दीपा कांडपाल ने किया। इस मौके पर डा. राकेश चक्र, केपीएस अधिकारी, संगीता सेठी, हरीश चंद्र बोरकर, डा. करुणा पांडेय, कमलेश चौधरी, शशि ओझा, मेजर शक्तिराज, नरेंद्र परिहार सहित देश भर के लगभग 125 बाल साहित्य के रचनाकार व बच्चे मौजूद रहे। जबकि आयोजन में हिमांशु पांडे ‘मित्र’, मंजू पांडे ‘उदिता’, विमला जोशी ‘विभा’, प्रकाश जोशी, अनिल पुनेठा, प्रमोद तिवारी, डा. रेखा त्रिवेदी, डा. गंगा बिष्ट, डा. सरस्वती खेतवाल, ममता पांडे, डा. बिशना साह व संतोष किरौला आदि ने भी योगदान दिया।

यह भी पढ़ें : कुमाऊं विवि के हिमालयन संग्रहालय की शोभा बना महाकवि निराला का अमूल्य यादगार

-1985 से भाकपा माले के केंद्रीय कमेटी सदस्य पुरुषोत्तम शर्मा के पास था, उन्होंने संग्रहालय को सोंपा

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का टाइपराइटर हिमालयन संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा को सोंपते कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा।

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जनवरी 2019। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी का टाइप राइटर सोमवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर नैनीताल स्थित हिमालयन संग्रहालय की शोभा बन गया। भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और ‘विप्लवी किसान संदेश’ पत्रिका के संपादक कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा ने महाकवि ‘निराला’ जी का प्रयोग किया हुआ टाइपराइटर सोमवार को शिक्षक नेता नवेन्दु मठपाल के साथ कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिषर नैनीताल स्थित संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा को सोंप दिया। बताया कि 1988 में इसे एक धरोहर के रूप में लोकप्रिय क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय ने उन्हें सौंपा था। गोरख पांडेय तब दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध कर रहे थे।
गोरख पांडेय खुद टाइप नहीं करते थे और कलम से ही लिखते थे। कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा और गोरख पांडेय एक ही संगठन भाकपा (माले) में थे, और 1985 में जन संस्कृति मंच की दिल्ली में स्थापना की तैयारी के दौरान कई महीने उन्होंने साथ कार्य किया था। उस दौर में भाकपा (माले) बहुत छोटी पार्टी थी और उनके पास कोई कम्प्यूटर या टाइप मशीन नहीं थी, इसलिए कामरेड शर्मा को यह टाइपराइटर मिल गया था। 1990 में संगठन के पास नई टाइप मशीन और एक कम्यूटर आने के बाद से उन्होंने इसे सुरक्षित संभाल कर रखा था। इस मौके पर कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि उन्होंने टाइप करना इसी टाइपराइटर से सीखा। वहीं संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा ने कहा कि यह हमारी अमूल्य धरोहर है जिससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने इसे कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिषर नैनीताल को सौंपने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा का धन्यवाद किया।
उत्तराखंड मूल के साहित्यकार को मिला भारत-भारती सम्मान

लखनऊ, 1 नवंबर 2018।  उप्र हिंदी संस्थान की ओर से लखनऊ में आयोजित हुए भारत-भारती सम्मान में उत्तराखंड के अल्मोड़ा के गंगोला मोहल्ला निवासी साहित्यकार पद्मश्री डॉ. रमेश चंद्र साह को भारत भारती सम्मान से नवाजा गया। उप्र के विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने पुरस्कार स्वरूप उन्हें गंगा प्रतिमा, अंगवस्त्र, ताम्रपत्र और पांच लाख रुपये की धनराशि प्रदान की। मालूम हो कि पद्मश्री साह को पूर्व में साहित्य क्षेत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, मध्य प्रदेश का शिखर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र और मैथलीशरण गुप्त सम्मान भी मिल चुके हैं।

भारत-भारती सम्मान मिलने पर साहित्यकार डॉ. शाह ने कहा कि आज साहित्य पढ़ने और लिखने वालों का अनुपात ठीक नहीं है। डॉ. साह ने निराला सृजन पीठ भोपाल के निदेशक का पद भी सुशोभित किया है। वे अंग्रेजी विषय के प्रोफेसर रहे लेकिन हिंदी में उनकी गहरी पकड़ और अगाध प्रेम उनके साहित्य से ही झलकता है। डॉ. साह के अब तक 11 उपन्यास, 10 निबंध संग्रह, 10 साहित्य लोचन ग्रंथ, नौ काव्य संग्रह, सात कहानी संग्रह, पांच संपादित कृति ग्रंथ, तीन अनुवाद ग्रंथ, यात्रा वृतांत और दो बाल नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा अंग्रेजी भाषा में पांच ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. साह अब तक यूगोस्लाविया, हंगरी, इंग्लैंड, चेकोस्लाविया, आयरलैंड आदि देशों की साहित्य यात्रा कर चुके हैं।

तनुश्री मामले में उतरीं लेखिका शोभा डे, नाना पाटेकर के साथ अमिताभ और पूरे बॉलीवुड को लपेटा

    • पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा-समकालीन का मतलब तात्कालिकता नहीं, वक्त की कसौटी पर कसी जाएगी समकालीन हिंदी कविता
  • समकालीन हिंदी कविता पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारंभ

नैनीताल, 23 फ़रवरी 2018। वरिष्ठ कवि पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने ‘समकालीन हिंदी कविताः 1990 के बाद के नये संदर्भ’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में अपने मुख्य ‘बीज संबोधन’ में कई शब्दों के अर्थों को साफ किया। कहा कि समकालीन का मतलब अखबार की तात्कालिकता नहीं है। कहा कि जो कविता अपने पूर्व कवियों व उनकी कविताओं को साथ लेकर व अपने समय की बात कहती हैं, और भविष्य के लिए दृष्टि दिखाती हैं, वे ही कालजयी बनती हैं। कविता के बाबत उन्होंने कहा कि जिसमें अकथित बात कही गयी हो वह कविता होती है। इस कसौटी पर गद्य भी कविता हो सकता है। आज के दौर में पाठकों की कमी व पठनीयता के ह्रास के बावजूद किताबें छपने की होड़ को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया व पुरस्कार प्राप्त करना आधुनिक कवियों का कार्य हो गया है। जबकि कवियों को अपनी कविता और कवित्व को लगातार ‘मांझने’ की जरूरत है। आचोलक शब्द को भी साफ करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचना करना नहीं बल्कि कविता को समग्र दृष्टिकोण से देखना आलोचक का कार्य है। सोना जिस पत्थर पर उत्पन्न होता है, उसी पत्थर की कसौटी पर घिस कर कसा जाता है। अलबत्ता आलोचकों को नई कसौटी पर भी कविताओं को कसना होगा। कहा कि आज की कविता व अखबारों की भाषा में कोई फर्क नहीं रह गया है। कविता नये शब्द गढ़ रही है। सलाह दी कि विश्वविद्यालयों को नये गढ़े जा रहे शब्दों के संकलन व शब्दकोष बनाने पर कार्य करना चाहिए।

जगूड़ी शुक्रवार को कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में मानव संसाधन विकास केंद्र हरमिटेज परिसर में महादेवी सृजन पीठ रामनगर के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। इससे पूर्व कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल की अध्यक्षता एवं प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित की उपस्थिति में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में संयोजक प्रो. मानवेंद्र पाठक ने संगोष्ठी में आये प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए विभाग के कवि प्रो. शिरीष मौर्य की कविता तसला की सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता वह तोड़ती पत्थर से तुलना करते हुए अमूर्त वस्तुओं के जरिये तत्कालीन संदर्भों के प्रकटीकरण का उल्लेख किया। बताया कि संगोष्ठी का उद्देश्य 1990 से अब तक राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से हुए तमाम परिवर्तनों एवं संचार माध्यमों की उत्तरोत्तर बढ़ती उपलब्धता सहित बदलते हुए परिवेश में हिंदी कविता के संवाद को अकादमिक स्तर पर रेखांकित करना है। संगोष्ठी में देश के पश्चिमी बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, यूपी, उत्तराखंड व दिल्ली आदि राज्यों से समालोचक जीवन सिंह, हरिश्चंद्र पांडे, सुबोध शुक्ल व डा. अमित श्रीवास्तव सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों के अलावा डीएसबी परिसर की प्रो. मुन्नी पडलिया, प्रो. ललित तिवाड़ी, डा. रवि जोशी सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं शोध छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। संचालन प्रो. चंद्रकला रावत ने किया।

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p style=”text-align: justify;”>आदि, व्याधि व उपाधि…
नैनीताल। संगोष्ठी में शब्दों को चुटीले अंदाज में उनके मूल अर्थ में परिभाषित करते हुए पद्मश्री जगूड़ी ने कहा कि विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली ‘उपाधि’ शब्द मूलतः आयुर्वेद से आया है, जहां जन्मजात बीमारियों को आधि, शारीरिक बीमारियों को ब्याधि और मस्तिष्क की बीमारियों का उपाधि कहा गया है।  उन्होंने कहा कि उपाधि धारकों को वास्तव में अपने विषय को मस्तिष्क में किसी बीमारी की तरह ही ग्रहण करना चाहिए।

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p style=”text-align: justify;”>25 से कुमाऊं विवि में शोधार्थियों के लिए दैनिक उपस्थिति लगाना हुआ अनिवार्य
नैनीताल। कुमाऊं विविके स्पांसर्ड रिसर्च एंड इंडस्ट्रियल कंसल्टेंसी सेल के निदेशक प्रो. राजीव उपाध्याय ने कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल के हवाले से बताया कि आगामी 25 फरवरी से कुमाऊं विवि में शोधार्थियों के लिए विभागाध्यक्ष कार्यालय में दैनिक उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य होगा। यह उपस्थिति हर महीने सेल को भेजनी अनिवार्य होगी। इसके अलावा शोधार्थियों को अपनी पीएचडी थीसिस की हार्ड कॉपी के साथ ही सॉफ्ट कॉपी पेन ड्राइव में भी सेल में देनी होगी।

नवीन समाचार

मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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