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साहित्यकार शैलेश मटियानी के 90वें जन्मदिन के अवसर पर विशेष आलेख : उत्तराखंड की अमूल्य धरोहर-शैलेश

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शैलेश मटियानी

कमर में कुल्हाड़ी बांधे एक बालक स्कूल के बगल में अपनी भेड़ बकरियो को चरा रहा है पर उसका ध्यान भेंड़ बकरियों पर कम स्कूल के खुले मैदान में ज्यादा लगा हुआ है जहाँ अध्यापक एक बच्चे को पहाड़ा रटाने का प्रयास कर रहे हैं पर वह बालक बार बार भूल जा रहा है। उसको पहाड़ा भूलते देख वह बालक स्वयं बुदबुदाने लगता है तभी बगल से गुजर रहे स्कूल के प्राध्यापक की नजर बालक पर पड़ती है और वो बालक के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछते हैं- क्यों तुम्हारी भी पढ़ने की इच्छा होती है? उनके ऐसा कहने से ही बालक फूट फूट कर रोने लगता है। रोता हुआ यह बालक कोई और नहीं हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी थे और प्रधानाध्यापक थे उनके प्रथम गुरु लक्ष्मण सिंह गैलाकोटी।

शैलेश मटियानी का जन्म कुमाऊं अंचल के अल्मोड़ा जनपद के बाड़े छीना गांव में हुआ था, जो अल्मोड़ा से लगभग 16 किलोमीटर दूर सुयाल नदी के किनारे स्थित है। आपके बचपन का नाम रमेश चन्द्र मटियानी था। लेखन प्रारंभ करते समय यहरमेश चंद्र मटियानी “शैलेश” से होता हुआ शैलेश मटियानी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शैलेश मटियानी के पिता विशन सिंह मटियानी व बाबा जीत सिंह मटियानी थे। इनके बाबा घी के प्रसिद्ध व्यापारी थे जिनके विषय में यह कहावत प्रसिद्ध थी कि “जितुवा को बोल, तगड़ी को तोल” अर्थात जीत सिंह के मुख से कहा हुआ तराजू के तौले हुए के बराबर होता है। इनके पूर्वज बाड़ेछीना से लगभग 10 किमी दूर मटेला गांव के निवासी थे ,जिसके कारण इन्हें मटियाणी कहा जाता था जो आगे चलकर मटियानी हो गया।
शैलेश के 9 वर्ष की अवस्था मे ही इनके पिता ने एक ईसाई महिला से विवाह कर लिया था तथा उसके साथ बाड़ेछीना से लगभग 50 किमी दूर बेनीनाग के पास रहने लगे थे। इसी बीच इनकी मां को स्तन कैंसर हो गया था जिसकी देखभाल व मवाद से भरे कपड़े धोने का भार भी बालक रमेश पर आ पड़ा था। 14 वर्ष का होते होते रमेश के सर से माता-पिता दोनों का साया उठ चुका था और इस छोरमूल्या जीवन का सहारा दादा-दादी रह गए थे जो इनके चाचा शेर सिंह के साथ रहते थे। छोरमूल्या तीनों बालक (छोटा भाई, बहन, और रमेश मटियानी) अपने चाचा सुंदर सिंह के साथ रहने लगे थे। उस समय घर में 2 नौकर रहा करते थे रमेश की हैसियत तीसरे नौकर की हो गई थी। सुबह उठ कर  ‘नौले’ से पानी भरना, भैसों को दुहना, गोठों का गोबर और घास-फूस  साफ करके, फिर कुल्हाड़ी दराती के साथ जंगलों में भैसों के साथ निकल जाना, शाम को लौटते समय लकड़ी या घास का गट्ठर सिर पर लाना इनकी दिनचर्या का हिस्सा हो गया था ।
गांव से मिडिल परीक्षा पास करने के उपरांत इंटर मीडिएट के लिए ये अल्मोड़ा आ गए और अपने चाचा बहादुर सिंह के साथ रहने लगे थे जो उस समय अल्मोड़ा में गोश्त का व्यापार किया करते थे। यहाँ आकर भी रमेश के जीवन में बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया। अब भी दोनों भाई अपने चाचा का सहयोग किया करते थे। रमेश जहाँ प्रातः काल दो तीन बकरियों की खाल निकाल कर, उनकी आंत धोकर तथा गोश्त दुकान में लगाकर विद्यालय जाया करते थे और विद्यालय से आने के बाद पुनः गोश्त की दुकान पर बैठा करते थे वहीं छोटा भाई रैमजे स्कूल के बाहर दिनभर चूरन और मूगफली बेचा करता था।
साहित्य लेखन की प्रेरणा शैलेश जी को सर्वप्रथम अल्मोड़ा में ही प्राप्त हुई थी, इनके चचेरे भाई नेवी में थे और उनकी कविताएं नेवी की पत्रिकाओं में छपा करती थीं, जिसे छुट्टियों में वे साथ लेकर आते थे जिसे देखकर रमेश सर्वप्रथम काव्य रचना की ओर प्रेरित हुए। दूसरे महत्वपूर्ण प्रेरक इनके मित्र कुँवर तिलारा भी थे जिनकी कविताएं उस समय ‘शक्ति’ और ‘कुमाऊँ राजपूत’ नामक स्थानीय पत्रो में प्रकाशित हो रही थीं। इस समय रमेश कक्षा 9 के विद्यार्थी थे तथा साहित्य रचना में अपना नाम रमेश चंद्र मटियानी “शैलेश “लिखने लगे थे। कई बार प्रयत्नों के बाद भी जब इनकी रचनाएं स्थानीय पत्रों में प्रकाशित नहीं हो पायी तो इन्होंने अपनी रचनाएं दिल्ली में “रंगमहल” और “अमर कहानी” को भेजीं , जिन्होंने इनकी दो कहानियां “शांति ही जीवन है” व “संघर्ष के क्षण” प्रकाशित कीं। 1951 में हाईस्कूल परीक्षा पास करने के उपरांत अल्मोड़ा में अपना कोई साहित्यिक भविष्य ना देखकर मटियानी जी अपने चाचा के घर से चुराये घी को 20 रुपये में बेचकर व भाई को रामजे स्कूल के बाहर मुंगफली और चूरन बेचता छोड़कर एक नयी मंजिल की खोज में निकल पड़े।
लेखक बनने की इस यात्रा में मटियानी जी हल्द्वानी से रानीखेत होते हुए नवंबर 1951 में दिल्ली में रंगमहल के संपादक ओम प्रकाश गुप्त के पास पहुँचे जो इन्हें पत्रों और रचनाओं के माध्यम से जानते थे । जिन्होंने इन्हें एक दुकान पर रखा दिया पर इनका मन यहाँ भी ना लगा और उस समय की साहित्यिक राजधानी इलाहाबद जाने को तैयार हो गए , टिकट खर्च हेतु लाल किले के बगीचे में बैठकर अपना पहला उपन्यास ” दोराहा ” तीन दिनों में पूर्ण कर लिया जिसे ओमप्रकाश जी को 15 रु में बेचकर इलाहाबाद की ट्रेन में बैठ गए । इलाहाबाद में इनकी मुलाकात ” माया ” पत्रिका के उपसंपादक कवि शमशेर से हुई जिन्होंने इनके रहने खाने की व्यवस्था की पर यह भी जीवन यापन की उचित व्यवस्था ना देखकर मुजफ्फरनगर , दिल्ली होते हुए अगस्त 1952 में आप बम्बई चले गए जहाँ  आप लगभग 7 साल तक रहे। बम्बई प्रवास के यह 7 साल मटियानी जी के जीवन संघर्ष और साहित्यिक उदय का समय रहा । जीवन के लिए संघर्ष करते हुए इन्होंने जहाँ फुटपाथों पर रात बिताई, अपना खून बेचा , भीख मांगी वही लगभग साढ़े तीन साल तक स्टेशन के बाहर चन्नी रोड़ पर स्थित श्री कृष्ण पूरी हाउस पर कार्य करते समय अपनी अधिकांश कविताएं व दो प्रसिद्द उपन्यास ” बोरीवली से बोरीबंदर ” व ” कबूतरखाना ” का लेखन कार्य भी किया। 1957 में मटियानी जी का विवाह अल्मोड़े के तलाड गॉव निवासी नाथू सिंह की कन्या नारायणी देवी के साथ हुआ जिसे प्यार से आप ” नीला ” बुलाते थे । 1965 ई में इलाहाबाद के प्रसिद्द प्रकाशक श्रीनिवास अग्रवाल के निमंत्रण पर आप पुनः इलाहाबाद चले गए जहाँ अप्रैल 1992 तक रहे । 1992 से 2001 तक हल्द्वानी में विभिन्न स्थानों पर रहते हुए मानसिक बीमारी की दशा में 24 अप्रैल 2001 को मटियानी जी का स्वर्गवास दिल्ली में हो गया।
शैलेश मटियानी का साहित्य संसार कुमाऊँ की हरी-भरी वादियों से लेकर मुंबई के विशाल समुद्र तट तक फैला हुआ है । इसमें जहाँ अल्मोड़ा , हल्द्वानी , रानीखेत की वादियों , संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज, लोक संसार तथा जीवन शैली के विभिन्न चित्र विद्यमान है वही दूसरी ओर दिल्ली और बम्बई महानगर की भागती – दौड़ती जिंदगी , का चित्र मौजूद है । बचपन में रामलीला में सीता , लक्ष्मण और राम का पाठ करते हुए लोक संगीत का जो ज्ञान प्राप्त हुआ वह ‘डंगरियों’ के साथ रहकर और पुष्ट हो गया जो उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ता है। “बेला हुई अबेर” का यह गीत देखिए ” धिन – ध्यानकुटी – किम क्याना कुटी – हेर वेला हुई अवेर”
भूख , स्त्री और मौत शैलेश मटियानी के साहित्य के केंद्र बिंदु रहे हैं। बचपन में माता-पिता की मृत्यु, भूख की यंत्रणा और अभिभावक के अभाव का जो प्रभाव उन पर पड़ा वह इनके साहित्य में सर्वर्त्र दिखाई पड़ता है । चाहे वह किस्सा नर्मदा बेन गंगूबाई की सेठानी हो या चौथी मुट्ठी की मोतिमा मस्तानी या दो बूंद की रेशमा। बचपन में जानवरों के बीच रहने के कारण पशु इन्हें बहुत प्रिय रहे है जिन्हें इलाहाबाद के परिवेश पर रचित “मैमूद” कहानी में हम देख सकते है , मैमूद के कटने के बाद दुखी जद्दन अपने पति से कहती है “आज ससुरा सवेर-सवेरे से बार-बार कान मुँह में भरे जाता था और मैं थूथना पकड़ कर धक्का देती थी , मैं क्या जानू की बदनसीब चुपके से कान में यही कहना चाहता है कि “अम्मा आज हम चले जायेंगे ” कुमाऊँ की लोक परम्परा से मटियानी जी का घनिष्ठ लगाव रहा है ” मुख सरोवर का हंस ” की भूमिका में मटियानी जी लिखते है – लोक कथा गायन की परंपरा तो मेरे पितरों ( दिवंगत और जीवित लोक गायकों ) की परंपरा है , मैं भी उसी परंपरा का  पूत हूं , किशोरावस्था तक वन का ग्वाला , खेतों का घसियारा बना रहा तो अपने पितरों की इस परंपरा को यथावत किया करता था – वन , खेतों में ठौर – ठौर लोक कथाओं के छंदों को अपना कंठ दिया करता था “
51 वर्षो के अपने साहित्यिक जीवन में शैलेश मटियानी ने 30 उपन्यास , 28 कहानी संग्रह , 9 लोक कथा संग्रह , 16 बाल कथा संग्रह , 1 एकांकी संग्रह तथा 13 निबंध संग्रह का लेखन कार्य किया , इसके अतिरिक्त ‘ विकल्प ‘ और ‘ जनपक्ष ‘ नामक दो पत्रों का संपादन और प्रकाशन कार्य भी किया । इतनी प्रचुर मात्रा में रचना कार्य करने के बाद भी शैलेश मटियानी जी को साहित्य में वह स्थान नही मिला जिसके वे हकदार थे , इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण शैलेश जी का किसी लेखक संगठन का सदस्य ना होना भी रहा । शैलेश जी लेखक संगठनों को ” गिरोह ” की संज्ञा दिया करते थे जिसके कारण प्रायः सभी लेखक संघो ने इनसे दूरी बनाए रखी और इनका मौन बहिष्कार किया ।
कागज की खेती करने वाला यह खेतिहर जीवन के अंत तक लेखक की अस्मिता और स्वत्रंतता के लिए संघर्ष करता रहा । जीवन के अंतिम समय में भी दो- चार बड़ी कहानियां , एक बड़ा उपन्यास और आत्मकथा लिखने का सपना संजोए रहा । अगर शैलेश जी को इसके लिए अवकाश मिला होता तो निश्चय ही भारतीय साहित्य की यह अमूल्य निधि होती । हिंदी के इस महान साहित्यकार और उत्तराखंड के लाल का आज तक एक स्मारक भी नही बन पाया जबकि होना यह था कि मटियानी के साहित्य का अध्ययन करने के लिए एक ” मटियानी साहित्य पीठ ” स्थापित की जाती ताकि आने वाले समय में हिंदी व उत्तराखंड की संस्कृति के अध्येता व व साहित्य प्रेमी शैलेश मटियानी के साहित्य का अध्ययन कर पाते।
-अरविन्द कुमार मौर्य, वरिष्ठ शोध अध्येता, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल, Mob- 9936453665

यह भी पढ़ें : हिन्दी के देश में गूगल से अनुवाद कर तैयार हुआ प्रश्न पत्र, परीक्षार्थियों को प्रश्न समझ नहीं आए, परीक्षा रद्द करने की मांग

नवीन समाचार, हल्द्वानी, 23 सितंबर 2021। हिन्दी के देश हिन्दुस्तान में उच्च स्तर पर भी हिन्दी की सामग्री अंग्रेजी से गूगल से अनुवाद करके तैयार की जा रही है। ऐसा शायद तब से हो रहा है, जब से गूगल ट्रांसलेट की सुविधा आई और शायद तभी से प्रश्नपत्रों को अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी देने की परंपरा शुरू हुई है। ऐसा केवल परीक्षाओं में ही नहीं, दोनों भाषाओं मंे अन्यत्र प्रकाशित होने वाली हर तरह की सामग्री में भी कमोबेश यही किया जाता है। यह अलग बात है कि अब तक किसी ने इस पर प्रश्न नहीं उठाए, लेकिन शायद पहली बार है जब इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। देखें विडियो :

दूसरी ओर यह भी है कि देश की नई शिक्षा व्यवस्था से तैयार हो रही युवा पीढ़ी भी पढ़ना व बोलना तो अंग्रेजी में चाहती है, और लिखने-पढ़ने में अंग्रेजी के अधिक से अधिक शब्दों का प्रयोग करती है और प्रश्नों को समझने के लिए हिन्दी प्रारूप की ओर झांकती है। सच्चाई यह है कि उनकी न हिन्दी अच्छी है और न ही अंग्रेजी।

अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की ओर से आयोजित कराई गई सहायक लेखाकार की परीक्षा के अभ्यर्थी इस पर प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी कड़ी में बृहस्पतिवार को हल्द्वानी के तिकोनिया स्थित श्री राय बहादुर पार्क में आयोग के सचिव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी कर परीक्षा रद्द करने की मांग की गई।

अभ्यर्थी विकास यादव ने बताया कि 12 से 14 सितंबर तक हुई सहायक लेखाकार की परीक्षा का पैटर्न पूरी तरह नया था। इसकी किताबें बाजार में उपलब्ध नहीं थी। कोरोना काल के दौरान फरवरी में परीक्षा का 80 फीसद पाठ्यक्रम बढ़ाया गया। परीक्षा का प्रारूप भी सीए जैसी परीक्षाओं से भी अधिक स्तर का दिया गया। जिसका अभ्यर्थी अनुमान तक नहीं लगा पाए। इससे सालों से तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों का मनोबल टूटा है। उन्होंने यह भी बताया कि परीक्षा में हिंदी माध्यम में वाक्यों में अनेक गलतियां थीं, जिससे हिंदी के छात्र विश्लेषणात्मक प्रश्नों को समझ तक नहीं पाए।

अभ्यर्थियों का कहना था कि आयोग ने उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। छह महीने इस परीक्षा की तैयारी में देने के बाद अब किसी अन्य परीक्षा की तैयारी का भी समय नहीं बचा है। इस परीक्षा में आयोग अभ्यर्थियों के साथ साजिश जैसी नीति अपनाएगा इसका अनुमान नहीं था। अभ्यर्थियों ने एकमुश्त होकर परीक्षा रद्द करके पुराने पैटर्न पर ऑफलाइन कराने की मांग की। इस दौरान मुख्यमंत्री के लिए ज्ञापन भी भेजा गया। विरोध में छात्र नेता विशाल भोजक, समाजसेवी शैलेंद्र दानू के साथ उदित कुशवाहा, भूपेंद्र बिष्ट, रोहित दानी, हिमांशु पाठक, आकांशा जोशी, दिलीप, सूरज मिश्र, कमल सिंह, ललित, त्रिभुवन बगड़वाल, देवेंद्र, उमेश, विनोद, विमल, दलीप सिंह आदि मौजूद रहे। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : हिंदी को दुनिया ने अपनाया, पर अपने आज भी नहीं अपना पाए, हिंदी दिवस पर विचार गोष्ठी में आई बात..

-महादेवी वर्मा सृजन पीठ में हिंदी दिवस पर आयोजित हुआ ‘वैश्विक परिदृश्य में हिंदी’ विषय पर आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान
डॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 14 सितंबर 2021। कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में हिंदी दिवस पर ‘वैश्विक परिदृश्य में हिंदी’ विषय पर आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित हुआ। इस अवसर पर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में अधिष्ठाता कला संकाय और हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि हिंदी शिक्षण, अध्ययन, अनुवाद, लेखन आदि के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों में तो पहुँची लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी दूतावासों, सरकारी उच्चायोगों, केंद्रीय मंत्रालयों के कार्यालयों के कामकाज की भाषा हिंदी नहीं बन पाई है।

हिंदी दिवस पर ऑनलाइन व्याख्यान देते प्रो. नवीन चंद्र लोहनी।

उन्होंने कहा कि विश्व भर में हमारे शासकीय कार्यालयों की भाषा हिंदी होनी चाहिए क्योंकि यह कार्यालय दुनिया के विभिन्न देशों में हमारा प्रतिनिधित्व करते हैं। वैश्विक स्तर पर भाषा का सवाल हमारे लिए एक बड़ा संकट है। उन्होंने तकनीकी विषयों की स्तरीय पुस्तकों का लेखन हिंदी में होने और गूगल की तरह हिंदी भाषा में अपना सर्च इंजन विकसित किए जाने की वकालत भी की। बताया गया कि प्रो. लोहनी हिंदी अध्यापन में 32 वर्षों से अधिक समय से जुड़े हैं। उन्होंने शंघाई अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन में आईसीसीआर चेयर और स्विट्जरलैंड के लौजान विश्वविद्यालय में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर चेयर में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर कार्य किया है। वह विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में न्यूयॉर्क, जोहानसवर्ग, भोपाल तथा मारीशस में प्रतिभागी रहे हैं तथा ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, हंगरी, स्पेन, अमेरिका, चीन, दक्षिण अफ्रीका सहित विश्व के अनेक देशों में संगोष्ठी, कार्यशालाओं में प्रतिभागिता कर चुके हैं।

कार्यक्रम में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. सुधारानी पांडेय, महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. दिवा भट्ट, गीता गैरोला, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, जहूर आलम, शशिभूषण बडोनी, डाॅ. शशांक शुक्ला, प्रबोध उनियाल, डाॅ. गिरीश चन्द्र पंत, प्रो. सत्यप्रकाश शर्मा, खेमकरण सोमन, शिवप्रकाश त्रिपाठी, डाॅ. कमलेश कुमार मिश्रा, डाॅ. अमिता प्रकाश, डाॅ. प्रीति आर्या, गोविंद नागिला, डाॅ. नेहा पालनी, मेधा नैलवाल, लक्ष्मण वृजमुख, डाॅ. मनीषा पाण्डेय, डाॅ. विवेकानंद पाठक, विशाल पाण्डेय, डाॅ.शांति चन्द, कुसुमलता, डाॅ. बंदना चन्द, हेमा तिवारी, अभय कुमार गुप्ता, देवकी नंदन जोशी, बीना तिवारी, दिनेश चन्द्र भट्ट, ममता रावत, लक्ष्मण बिष्ट, जया पाण्डे, सुनीता बिष्ट, चन्द्रशेखर पाण्डे, विपनेश पाण्डे, ख्याली राम पाण्डे, वंदना शर्मा, अनीता पवार, दीपक वर्मा, सुरेश पाण्डे, त्रिभुवन जोशी, डाॅ. नरेन्द्र पाण्डे, रेखा उप्रेती, गोपाल राम आर्य, दीप तिवारी, ओमलता उज्जवल, दौलत कुँवर, अमित सिंह, के.पी.शुक्ल, संजय पाण्डे, मिकी जोशी, महेन्द्र राणा, डाॅ. प्रेमलता त्रिपाठी व अलका चौधरी सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : विश्व कविता पर हुई ऑनलाइन चर्चा, दुनिया भर के रचनाकार हुए शामिल, बताया कविता का फलक बहुत व्यापक

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 23 अगस्त 2021। विश्व कविता का फलक बहुत व्यापक है। विषयों की विविधता इन कविताओं की बड़ी विशेषता है। इनमें जहाँ बगावत का भाव है, वहीं बहुत-सी मनोवैज्ञानिक परतें हैं। विश्व कविता में जीवन की गहरी व्याख्या है। जीवन को कैसे जिया जाये, उस पर एक सैद्धांतिक दार्शनिक दृष्टि है। इन कविताओं में दर्शन का बहुत सारा नुस्खा है। यह विचार युवा लेखिका पंखुरी सिन्हा ने कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘विश्व कविता: एक दृष्टि’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा में व्यक्त किए।

आनलाइन चर्चा, कहानी एवं कविता पाठ करती युवा लेखिका पंखुरी सिन्हा।

इस दौरान उन्होंने चेक रिपब्लिक की जाना और लोवा, जर्मनी की ऐन्तजे स्तेहन, स्वीडन के फ्रेके राइहा, ग्रीस के जैनती हौन्ड्रऊ हिल, इटली की लुचिल्ला त्रपैजो, सिलवानो बार्तोलाजी व क्लौडिया पिचिनो, रोमानिया की मिरसिया दानदूता, सर्बिया की दैनिजेला त्राजकोविक व नेनाद त्राजकोविक, ब्रिटेन के टॉम फिलिप्स व डॉमिनिक विलियम्स, स्कॉटलैंड के फिन हौल, चीन के तियान यू, बुल्गारिया के इवान हृस्तोव, आयरलैंड के डेरेक कोयल, पोलैंड के अलिक्जा कुबेर्स्का व आना मरिया स्तेफेन, यूक्रेन के यूरी बोत्वींकीन, तुर्की के ओस्मान बोज्कुर्त आदि विश्व कवियों की कविताओं का उल्लेख करते हुए उनकी विशेषताओं को रेखांकित किया।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में कवयित्री पंखुरी सिन्हा ने अपने कविता संग्रह ‘बहस पार की लम्बी धूप’ से ‘मेरी बेटी के पैदा होने का साल’ शीर्षक से कविता और सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर चोट करती व्यंग्यात्मक कहानी ‘मर्डर मिस्ट्री और दस्तखत’ का पाठ भी किया। उल्लेखनीय है कि मुजफ्फरपुर (बिहार) निवासी युवा लेखिका पंखुरी सिन्हा के दो हिंदी कथा संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से तथा 5 हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह प्रकाशित तथा कई किताबें प्रकाशनाधीन हैं। उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत, जर्मनी से ऐन्तेज स्तेहन, पोलैंड से आना मरिया स्तेफेन, नाइजीरिया से चिका उदेकवे, न्यूयार्क से ड्रियू योर्कर सहित वरिष्ठ साहित्यकार सुभाष पन्त, प्रो. दिवा भट्ट, महेश पुनेठा, जहूर आलम, मुकेश नौटियाल, अनिल घिल्डियाल, प्रो. सत्यप्रकाश शर्मा, डाॅ. अमिता प्रकाश, शिव प्रकाश त्रिपाठी, डाॅ. कमलेश कुमार मिश्रा, डाॅ. भावना जोशी पाठक, गोविंद नागिला, डाॅ. विवेकानंद पाठक, डाॅ. मनीषा पाण्डेय, मेधा नैलवाल, डाॅ. गिरीश पाण्डेय ‘प्रतीक’, ममता रावत, डाॅ. राजविंदर कौर, बीना तिवारी, शरद जोशी, नलिनी पंत, लक्ष्मण वृजमुख, कामिनी भाटिया मेहता, आनंद स्वरूप श्रीवास्तव, आशालता सिंह, गार्गीं तिवारी, दीपा गोरखा, नंद कुमार मिश्रा, कुमार प्रसन्ना, विनय कुमार सिंह, अनोज सिंह, कमलेश वर्मा, अरविंद मूले, शरत चन्द्र उपमन्यु, पुष्पा पुनेठा, प्रियदर्शिनी पाण्डे, जितेन्द्र आत्रेय, डाॅ. शशिकांत राय, देवानंद बोरकर, विपुला पाण्डे, प्रणीता गोगोई, शिव कोहली, प्रमोद ठाकुर, अनवर सुहैल, अर्चना ढोलकिया, उदय देशप्रभु, भुवन जोशी, आयुष हेम लोहनी, पंकज यादव आदि साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : 89 वर्षीय पंत की पुस्तक में ‘यादों के गलियारे से’ कुड़बुद्धियों से लेकर बुड़्यांकाल के रंग

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 16 अगस्त 2021। नगर के वरिष्ठ नागरिक, पूर्व शिक्षक एवं खिलाड़ी व साहित्यकार कृष्ण चंद्र पंत ‘किशन’ ने 89 वर्ष की उम्र में ‘यादों के गलियारे से’ नाम से पुस्तक लिखी है। सोमवार को श्रीराम सेवक सभा के सभागार में पुस्तक का विमोचन इतिहासकार पद्मश्री अनूप साह व रंजीत भार्गव, प्रो. शेखर पाठक, पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जंतवाल तथा कूर्मांचल नगर सहकारी बैंक के अध्यक्ष विनय साह के हाथों हुआ।

पुस्तक का विमोचन करते हुए गणमान्यजन।

पुस्तक में बकौल लेखक बचपन की ढीढता से शुरुआत की गई है। वहीं पुस्तक में कुड़बुद्धि के अभयारण्य में, मलकोट में, स्कूल से कॉलेज का सफर, गोत्र की गुत्थी, गौं की नराई, बाटुली, सिङडू़, ब्या बरात पकास, रंग बुड्यांकाल, दरिंदों का धमार, चीरहरणा, गणतंत्र के इलेक्शन का फंक्शन, फिरि मोदी ज्यू ऊनेर छू, कुछ सुना-कुछ देखा, चीख की चुभन, चांदी का पहरा, उत्तर प्रदेश की कोख से निकले उत्तराखंड की धुंधकारियां, क्वे-क्वे यास छी हो अंग्रेज और भाभियां आदि भी हैं, और पठनीय हैं।

इस अवसर पर श्री पंत ने बताया कि पुस्तक हिंदी व कुमाउनी में गद्य व पद्य विधा में उनके गांव से लेकर नैनीताल में बिताए 84 वर्षों की स्मृतियां व जीवन यात्रा संग्रहीत है। पुस्तक में अंग्रेजी दौर की यादों का काफी हिस्सा भी शामिल है। इसका वर्णन करते हुए श्री पंत ने कहा कि अंग्रेजों में काफी खराबियां होने के साथ अनुशासन जैसा काफी कुछ सीखने को था। उस दौर में चुनिंदा बाहरी लोग ही नैनीताल आ सकते थे, और खुले में लघुशंका करने पर भी कोड़े पड़ते थे। उन्होंने यह टिप्पणी भी की कि अंग्रेज तो चले गए पर काले अंग्रेज काबिज हो गए। जबकि अब मनमर्जी से शहर की हालत खराब हो रही है।

इस दौरान वक्ताओं ने इस उम्र में भी श्री पंत द्वारा पुस्तक लिखने और उनकी जिंदादिली व जिजीविशा की प्रशंसा की और उनके शतायु होने की कामना की। कार्यक्रम में श्री पंत की धर्मपत्नी उमा भट्ट, पुत्र पंकज, पुत्री डॉ. भावना पंत व रेनू पंत, भाई गिरिजा शंकर पंत, डॉ. उमा भट्ट, केपी साह, केसी साह, डॉ. रेखा त्रिवेदी, गोपाल रावत, जगदीश बवाड़ी, दुर्गा साह, दया बिष्ट, तारा राणा, विश्वकेतु वैद्य, डीडी साह, अशोक कंसल व केसी उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। संचालन किशन गुरुरानी ने किया। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

कुमाऊं विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ‘काव्यांत्रिकी’ नाम से अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। शोध एवं प्रसार निदेशालय, राष्ट्रीय सेवा योजना प्रकोष्ठ, डॉ. वाईपीएस पांगती फाउडेशन तथा इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के द्वारा आयोजित काव्यांत्रिकी का पीयूष शुक्ल के संचालन एवं डॉ.नीलम लोहिया के संयोजन में शोध एवं प्रसार निदेशक प्रो.ललित तिवारी ने शुभारंभ किया।

इस दौरान मास्को रूस से प्रवासी कवि श्वेता सिंह ‘उमा’, वशिगंटन डीसी से विनीता, यूएसए से लिपिका मित्तल, रुड़की से डॉ. मीरा चौरसिया, वाराणसी से दिव्या, कुणाल मिश्र, मुंबई से प्रशातं बेबार, गायत्री, डॉ. अंजू भट्ट, अश्वनी, पीयूष शुक्ला सहित 60 से अधिक कवियों ने अपनी रचनाओं को प्रस्तुत किया तथा 100 से अधिक प्रतिभागियों, शोधार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में डॉ. नीलू लोधियाल, डॉ.शालिनी शर्मा, डॉ. मधुमति जोशी, डॉ. एचएन पनेरू, डॉ. नंदन मेहरा, पल्लवी शर्मा, डॉ. संतोष उपाध्याय, डॉ. पैनी जोशी, डॉ. गीता तिवारी, डॉ. शशि बाला उनियाल, डॉ.अनीता पटेल, डॉ. लक्ष्मी किरोला, दिव्या साह, मनोज बिष्ट, डॉ. सुरेश पांडे, डॉ. लक्ष्मी देवी, डॉ. हरीश कांडपाल व डॉ.निस्त्रा साह इत्यादि भी उपस्थित रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : ‘गोदान’ भारतीय किसान जीवन की राष्ट्रीय करूणगाथा: डॉ. जीवन सिंह

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अगस्त 2021। प्रेमचंद लिखित ‘गोदान’ भारतीय किसान जीवन की ऐसी राष्ट्रीय करूणगाथा है जिसमें बनते हुए राष्ट्र की टूटी-बिखरी हुई छवि और उसके भीतर लुटते-पिटते हुए किसान को देखा जा सकता है। यह किसान जीवन की मर्मांतक दर्दगाथा है जिसमें आदर्श की बजाय यथार्थ को बहुत पास से देखा जा सकता है। यह एक व्यक्ति और उसके परिवार को केंद्र में रखकर किसान की संपूर्ण जीवनधारा और यथार्थ को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन प्रवाह के साथ आजीवन चलता है। इसका देशकाल अपनी गतिशीलता में जीवन की हर ध्वनि को अपने भीतर समाहित करने का प्रयत्न करता है।

यह विचार युगदृष्टा उपन्यासकार प्रेमचंद के 141वें जन्मदिन पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘गोदान: किसान-जीवन की अंतहीन कष्टगाथा’ विषय पर आयोजित ऑनलाइन व्याख्यान में अलवर निवासी 7 पुस्तकों का प्रकाशन व 3 पुस्तकों का संपादन कर चुके वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जीवन सिंह ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद आदर्श से ज्यादा हकीकत दिखाने को अपने साहित्य का उद्देश्य मानकर लिख रहे थे। इसीलिए गोदान उनकी अपनी ही पुरानी रचना-प्रक्रिया की लीक से हटा हुआ ज्यादा सहज और स्वाभाविक एवं कलात्मक लेखन का नया उदाहरण बन गया है जिसमें जो है वही दिखाने का प्रयास किया गया है।

वर्ष 1935 में लिखा गया गोदान प्रेमचंद के जीवन के आखिरी पड़ाव में लिखा हुआ आखिरी लेकिन पहले से ज्यादा परिपक्व, पूर्ण और कलात्मक उपन्यास है।यह किसी एक बिन्दु पर ठहरकर एक स्थिति या किसी एक संकट या समस्या के लिए लिखा गया उपन्यास नहीं है। सच तो यह है कि यह समस्या को नहीं वरन समस्या की जड़ को पकड़ने वाला उपन्यास है। आयोजन में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, शैलेय, किरण अग्रवाल, केशव तिवारी, महेश पुनेठा, प्रो. मंजुला राणा, महाबीर रंवाल्टा, प्रबोध उनियाल, डॉ. शशांक शुक्ला सहित बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमी शामिल हुए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : रावत उत्तराखंड भाषा संस्थान में सदस्य नामित

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जुलाई 2021। कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में कार्यरत मोहन सिंह रावत को राज्य सरकार ने उत्तराखंड भाषा संस्थान में सदस्य नामित किया है। इस आशय का आदेश भाषा विभाग के सचिव विनोद प्रसाद रतूड़ी ने जारी किया है। श्री रावत 1996 से जिलाधिकारी, नैनीताल की अध्यक्षता में गठित महादेवी साहित्य संग्रहालय समिति के उपसचिव, वर्ष 2002 से महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अकादमिक विस्तार केंद्र में शोध सहायक तथा वर्ष 2006 से कुमाऊं विवि. की महादेवी सृजन पीठ में प्रभारी शोध अधिकारी के तौर पर योगदान कर रहे हैं। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी लेख, कहानी, कविताएं, रिपोर्ट आदि प्रकाशित एवं वर्ष 1986 से नियमित रूप से आकाशवाणी से प्रसारित होती रही हैं। उन्होंने स्मारिका, त्रैमासिक पत्रिका और शोध आलेखों पर केंद्रित पुस्तकों का भी संपादन किया है। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड भाषा संस्थान की नवगठित तीन वर्षीय कार्यकारिणी में श्री रावत के साथ ही सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. देव सिंह पोखरिया, प्रो. गोविन्द सिंह, कौस्तुभानंद चंदोला, लोक मर्मज्ञ महाबीर रंवाल्टा, डॉ. सुशील कोटनाला, उर्दू भाषा के साहित्यकार अम्बर खरबंदा और पंजाबी भाषा के साहित्यकार गुरदीप सिंह सहोटा को शामिल किया गया है। साथ ही संस्थान की प्रबंधकारिणी समिति में साहित्यकार सुनील पाठक, गढ़वाल विश्वविद्यालय की प्रो. मंजुला राणा और प्रो. मृदुला जुगरान को स्थान दिया गया है। भाषा संस्थान की उपर्युक्त 12 सदस्यीय कार्यकारिणी का कार्यकाल तीन वर्ष होगा। उत्तराखंड भाषा संस्थान का सदस्य नामित होने पर श्री रावत को महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, पूर्व निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया, पूर्व विदेश सचिव शशांक, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. दिवा भट्ट, डॉ. वाचस्पति, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, जहूर आलम, आदि ने बधाई दी है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : ‘उत्तराखंड के साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में अवदान’ विषय पर आयोजित हुई ई-संगोष्ठी

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 08 जुलाई 2021। अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तराखंड की नैनीताल इकाई ने ‘उत्तराखंड के साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में अवदान’ विषय पर ई-संगोष्ठी आयोजित की। संगोष्ठी का शुभारंभ किरन मौर्या द्वारा सरस्वती वंदना तथा सृष्टि गंगवार द्वारा परिषद गीत के साथ हुआ। आगे कार्यक्रम की मुख्य संयोजक डीएसबी परिसर के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. चंद्रकला रावत ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए परिषद के गठन, संगोष्ठी के शीर्षक व उद्देश्यों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के साहित्यकारों ने जितना गद्य एवं पद्य साहित्य को बराबर पोषित किया है।

मुख्य वक्ता पूर्व सहायक निदेशक (राजभाषा) भारत सरकार डॉ. राजेश्वर उनियाल ने प्राचीन काल से उत्तराखंड के साहित्यकारों द्वारा साहित्य में दिए गए योगदान के विषय में जानकारी दी। देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नरेंद्र कुमार सिंह ने चंद्रकुंवर बड़थ्वाल के साहित्य पर बोलते हुए कहा कि उनकी व्यंजना शक्ति में अद्भुत आकर्षण है। आगे डॉ. याचना मैथाणी द्वारा हिमांशु जोशी और उनका साहित्य में अवदान पर, डॉ. जसपाल खत्री ने साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी के आलोचनात्मक साहित्यिक पक्ष पर, अध्यक्षता कर रहे प्रदेश अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तराखंड डॉ. सुनील पाठक ने वैदिक व पौराणिक काल से ही उत्तराखंड के साहित्य में योगदान के विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कालिदास के ग्रंथों व अभिज्ञानशाकुंतलम के जर्मनी अनुवाद के साथ ही साहित्यकार इलाचंद्र जोशी, उनके अग्रज भाषा वैज्ञानिक डॉ. हेम चंद्र जोशी के हिंदी साहित्य में अप्रतिम योगदान पर चर्चा की। कहा कि यदि उनको हिंदी व्याकरण का महर्षि पाणिनि कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने शैलेश मटियानी, चंद्रकुंवर बड़थ्वाल के साहित्य पर भी चर्चा की।

संगोष्ठी के सह संयोजक शोधार्थी अरविंद कुमार मौर्य ने शैलेश मटियानी के साहित्य पर नए मूल्यांकन की मांग की। संगोष्ठी का समापन अमिता मिश्रा के राष्ट्रीय गीत के गायन से हुआ। संगोष्ठी में हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन, प्रो. मानवेन्द्र पाठक, प्रो. निर्मला ढैला बोरा, प्रो. शिरीष मौर्य, डॉ. शुभा मटियानी, डॉ. शशि पांडेय, मेधा नैनवाल, मोहन रावत, महादेवी पीठ और विभाग के शोधार्थी समर यादव, चंद्रमा प्रसाद, धनंजय, जया बरनवाल आदि छात्र-छात्राएं भी उपस्थित रहीं। संगोष्ठी का संचालन रश्मि रस्तोगी व अरविन्द कुमार मौर्य ने संयुक्त रूप से किया। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : कविताओं में रची गई कोरोना काल की विभीषिका

-कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में कोरोना में रची गई कविताओं पर हुई ऑनलाइन चर्चा
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 29 जून 2021। दुनियाभर में फैली बीमारी या महामारी हमेशा से साहित्य की विषय-वस्तु रही है। इतिहास उतनी बारीकी से बीमारियों के उपजने-फैलने का विश्लेषण नहीं कर पाता जितना साहित्य करता है। विभिन्न वेब पोर्टल, फेसबुक आदि सोशल मीडिया में कोरोनाकाल के संत्रास एवं साहस दोनों तरह की कविताओं को देखा जा सकता है। यह कविताएँ कोरोना काल की छटपटाहट को बखूबी बयां करती हैं। उक्त विचार युवा कवि एवं लेखकए राजकीय इंटर कालेज, ढिकुली (रामनगर) में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत संतोष तिवारी ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘कोरोनाकाल में हिंदी कविता’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा में व्यक्त किए।

इस दौरान उन्होंने कोरोना काल में अशोक वाजपेयी, रामदरश मिश्र, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेंद्र पति, ओम निश्चल, लीलाधर मंडलोई, एसआर हरनोट, बोधिसत्व, संजय कुंदन, मदन कश्यप, देवी प्रसाद मिश्र, श्रीप्रकाश शुक्ल, सुभाष राय, शैलेय, हरि मृदुल, व्योमेश शुक्ल आदि द्वारा लिखी कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि सदी की इस विभीषिका में साहित्य में जो कुछ दर्ज हुआ, वह मुश्किल समय में मनुष्य की जिजीविषा की अमिट गाथा है। कोरोनाकाल में अवसाद और तनाव के बीच जन्मी कविता ने मनुष्य को आत्मबल प्रदान किया है। कार्यक्रम के दूसरे चरण में श्री तिवारी ने अपनी कविताओं-दिन में तीन बार काढ़ा पी रही प्रेमिकाएँ, घास काटती औरतें, हमें नहीं पता, तुम्हें मुबारक, ये किसानों की आत्महत्या का मौसम है, कोसी माँ है, फिलहाल सो रहा था ईश्वर, केदारनाथ, पिता घड़ी थे, खास महामंडलेश्वर, माँ की पीठ, मोहल्ला, सारे फूल, मुश्किल दिनों में, एक दिया इनके नाम का, प्रेम में डूबना तथा बच्चों के खेल का पाठ किया। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित प्रो. दिवा भट्ट, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, महेश पुनेठा, डॉ. अमित श्रीवास्तव, मुकेश नौटियाल, महाबीर रंवाल्टा, अनिल घिल्डियाल, मोती प्रसाद साहू, खेमकरण सोमन, शिव प्रकाश त्रिपाठी, ममता रावत, डॉ. कमलेश कुमार मिश्रा, मेधा नैलवाल, रमेश द्विवेदी, मोनिका गौड़, अल्पना सिंह, प्रदीप बहराइची, सुभाषित श्रीवास्तव, अभिसार तिवारी, सत्य प्रकाश शर्मा, डॉ. कल्पना शाह, गोविंद नागिला, डॉ. गिरीश पाण्डेय श्प्रतीकश्, चिंतामणि जोशी, डॉ. भावना जोशी पाठक, दिनेश रावत, लक्ष्मण बिष्ट, डॉ. विवेकानंद पाठक, डॉ. भावना अग्रवाल, आशा जोशी, राजनंदन शर्मा विमलेंदु, सुमन कुकरेती, दिनेश चंद्र भट्ट, बीना तिवारी, इन्दु त्रिपाठी, दीपा गोरखा, गीता तिवारी, भानुप्रकाश रघुवंशी, दिनेश सेमवाल, नवीन तिवारी, संजय पाण्डे, तरूण जोशी, डॉ. शशिशेखर मिश्र वात्स्यायन, परेश पाण्डे, दीप चन्द, अजीत सक्सेना, रजनी रानी, नीलम पारीक, सुब्रत प्रकाश, विंथ्य मणि, मनोज पुनेठा आदि साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह भी पढ़ें : एक्टिंग तो हर कोई सुबह से शाम तक करता है, पर…: डॉ. सुवर्ण रावत

-कहा, एक्टिंग हर मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति, लोग सुबह उठने से लेकर रात्रि तक अभिनय करते हैं, पर नाटक सिर्फ मंच या फिल्म-टीवी शो के लिए ही की जा सकती है, बताया साहित्य और रंगमंच में है बहुत गहरा सम्बन्ध
नवीन समाचार, नैनीताल, 01 दिसम्बर 2020। नाटक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। नाटक यदि प्रचार का माध्यम न बने तो वह समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकता है। नुक्कड़ नाटक तकनीकी बाध्यता से हटकर सादगी के साथ लोगों से जुड़ते हैं। इस जुड़ाव में कथ्य अधिक महत्वपूर्ण होता है। साहित्य और रंगमंच का संबंध बहुत गहरा है। अच्छे साहित्य के बिना अच्छे रंगमंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हिंदी सहित भारतीय और विदेशी साहित्य की प्रमुख कृतियों को रंगमंच ने जीवंत रूप में दर्शकों तक पहुंचाया है। साहित्य को प्रभावशाली ढंग से दर्शकों तक पहुंचाने का जरिया नाटक बनते हैं। उन्होंने कहा कि आदमी नाटक सिर्फ तभी नहीं करता है, जब वह मंच पर होता है या फिर वह कोई फिल्म या टेलीविजन शो कर रहा होता है। जबकि हर व्यक्ति सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक एक्टिंग ही करते हैं। यह मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति है।
यह विचार वरिष्ठ रंगकर्मी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से परास्नातक तथा उत्तरकाशी व दिल्ली की नाट्य संस्था कला दर्पण के संस्थापक व कला निदेशक डॉ. सुवर्ण रावत ने कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘मेरी रंग यात्रा के साहित्यिक पड़ाव’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा में मंगलवार को व्यक्त किए। इस दौरान डॉ. रावत ने अपनी रंग यात्रा के दौरान साहित्यिक कृतियों पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियों की विस्तार से चर्चा की, जिसमें शुरूआती दिनों में रंगकर्मी सुरेश गुरूरानी की नाट्य संस्था ‘नैनी लोक कलाकार संघ’ के अंतर्गत नैनीताल शरदोत्सव में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कृति ‘लॉन की घास’ पर आधारित डॉ. मधुसूदन मत्तर के निर्देशन में की गई प्रस्तुति सहित डेनमार्क के लेखक हैन्स क्रिश्चियन एंडरसन की डैनिश कहानी का घुघूती गाँधीनगर गुजरात में हुआ लफड़ा पहन के कपड़ा सहित अनेक प्रस्तुतियों के मंचन के बारे मे जानकारी दी, साथ ही कोरोनाकाल में सावधानी बरतने की हिदायत देती अपनी कविता ‘नमस्ते’ का पाठ भी किया। उल्लेखनीय है कि डॉ. रावत द्वारा तैयार नाटकों का मंचन सभी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नाट्य महोत्सवों में किया जा चुका है। उन्होंने भारतीय फिल्म प्रशिक्षण संस्थान पुणे से फिल्म सम्बन्धी प्रशिक्षण तथा रंगमंच का शिक्षा में महत्व विषय पर पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने लंदन-इंग्लैंड तथा वरसाव-पोलैंड में आयोजित इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिसुमन बिष्ट, नवीन नैथानी, जहूर आलम, प्रभात उप्रेती, कुसुम भट्ट सहित बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : कवि, लेखक, उद्घोषक हेमंत बिष्ट ने प्रस्तुत की अपनी रचना यात्रा व कविताएं

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 नवम्बर 2020। ‘ये आलीशान कोठी और विशाल गेट के नीचे दफन हुई है मेरे ककाज्यू की कानली, ये हरियाली और सौंधी माटी के ऊपर क्यों काँच-लोहा-पाथर ने चादर-सी तान ली, ये रॉक-पॉप संगीत बजते हैं आज यहाँ, भटकती है न्यौली के गीतों की आत्मा, थिरकते हैं जोड़े करते हैं बॉल डांस आज यहाँ, हुड़किया बौल चलते हुड़के की थाप में, जाम यों खनकते हैं हाथों में आज जहाँ, लाटी काकी की छुड़ंकती थी दराती, ऊँची अट्टालिका के पीछे सिसकती है बाँहे फैलाये ये पुरखों की बाखली..’ पहाड़ों में जमीन बेचकर कुछ दिन ऐशो-आराम की जिंदगी बिताने के बाद अपनी ही जमीन पर बनी कोठी में माली या चौकीदार की नौकरी करने को विवश पहाड़ियों की व्यथा व्यक्त करती ‘ककाज्यू की कानली’ शीर्षक से यह कविता उत्तराखंड राज्य गीत के रचनाकार वरिष्ठ साहित्यकार हेमंत बिष्ट ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘मेरी रचना यात्रा और कविताएँ’ शीर्षक से फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा व कविता पाठ में मंगलवार को प्रस्तुत की।

गीतकार हेमंत बिष्ट को सम्मानित करते मुख्यमंत्री (File Photo)।

इस दौरान उन्होंने पहाड़ की अनदेखी कर लोगों का आह्वान इन शब्दों के माध्यम से किया ‘क्यों जमा हुई है भीड़ आज पगडंडी में, हलचल है क्यों गंभीर आज पगडंडी में, बूढ़ी माँ की क्यों आँख टिकी पगडंडी में, खूब पढ़ाया पहला बेटा, खून-पसीना खूब बहा, महानगर में जाकर अफसर बन बैठा वो वहीं रहा, भूला माया किया है छल पाखंडी ने, इंतजार में नजर टिकी पगडंडी में, चौथा ऐसा गिरा कि अपना, न धरती न गगन रहा, खेती बेची खुद को बेचा, सदा सुरा में मगन रहा, व्यर्थ में प्राण गंवा डाले दंभी ने, लाश मिली है आज यहाँ पगडंडी में, उतरी कितनी ही याद आज पगडंडी में..’
देश राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से सम्मानित सुप्रसिद्ध उदघोषक हेमंत बिष्ट ने पहाड़ की माँ को समर्पित ‘ईजा’ कविता प्रस्तुत करते हुए कहा ‘मुँह अंधेरे उठना, करना पूजा-अर्चना, गौशाला जा सानी बना गायों को है दुहना, सोए हुए बच्चों के माथों को चूमना, फिर जाल-दराती लिए जंगल चले जाना और उसके बाद ही हो लाल पूरब दिशा, ऐसी सुबह बिताती मेरे गाँव की ईजा, पहाड़ की ईजाकृ।’ किस प्रकार हमारे शिल्प, हमारी परंपराओं और रीति-रिवाजों का ह्रास हो रहा है, इसी पर केंद्रित ‘धनदा लुहार’ शीर्षक कविता का पाठ भी उन्होंने किया। इसके अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन सहित देशभर के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर कविता-पाठ कर चुके हेमंत बिष्ट ने अपनी रचना-यात्रा की चर्चा भी की। उन्होंने स्वयं को सौभाग्यशाली बताया कि उन्हें मंच पर स्व. काका हाथरसी, केपी सक्सेना, हुल्लड़ मुरादाबादी व ब्रजेन्द्र अवस्थी आदि लब्ध प्रतिष्ठित कवियों के साथ कविता-पाठ का अवसर मिला। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार देवेन मेवाड़ी, जहूर आलम, दिनेश कर्नाटक, मुकेश नौटियाल, प्रबोध उनियाल, खेमकरण सोमन, शिव प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. कमलेश कुमार मिश्रा, चिंतामणि जोशी, गोविंद नागिला, शीला पुनेठा, डॉ. गिरीश पाण्डेय ‘प्रतीक’, अनिल बिनवाल, डॉ. अर्चिता सिंह, भुवन फुलारा, लक्ष्मण वृजमुख, अरविंद शाक्य, राजविंदर कौर, चंपा उपाध्याय, प्रफुल्ल कुमार पंत, हेमा हर्बोला, जगदीश कुमुद, लता कुंजवाल, अनिल कुमार, कृपाल सिंह शीला, प्रेमा बिष्ट, रूपा छाछरा, महेन्द्र जोशी, इन्दु श्री, रमेश सोनी, कामिनी भाटिया मेहता, कौशल्या चुनियाल, विकलेश पाण्डे, कविता शर्मा, वंदना सिंह शाही, ऋषभ जोशी, शिवांगी पाठक साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : साहित्य के लोकतंत्र को बचाए रखने में लघु पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका: पल्लव

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 नवम्बर 2020। साहित्य के लोकतंत्र में लघु पत्रिकाएँ वही काम करती हैं, जो राजनीति के लोकतंत्र में जागरूक मीडिया के द्वारा किया जाता है। साहित्य के लोकतंत्र को बचाए रखने में लघु पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका है। सही बात को कहते जाना साहित्य का कर्त्तव्य है और लघु पत्रिकाएँ इस काम को करने की कोशिश करती हैं। उक्त विचार ‘बनास जन’ पत्रिका के संपादक और आलोचक पल्लव ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘लघु पत्रिकाओं का संसार और बनास जन’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि लघु पत्रिकाओं से जनधर्मी साहित्य की व्याप्ति हुई। जिस आदर्श समाज की कल्पना हमारे मन में है, उसकी बात करने वाले विचार के लिए लघु पत्रिकाओं ने जमीन तैयार की। साहित्य की तमाम विधाओं के लिए लघु पत्रिकाओं ने जिस जनपक्षधरता के साथ खुद को समर्पित किया है, उस विचारधारा ने हिंदी साहित्य को जनधर्मी बनाए रखा है।
हिन्दू कॉलेज, दिल्ली के हिंदी विभाग में प्राध्यापक पल्लव ने कहा कि नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण का हमारे जीवन में आना बहुत बड़ी घटना है। सोवियत संघ के विघटन के बाद पूरी दुनिया पर विश्व बैंक ने भूमंडलीकरण की नीतियों को एक तरह से थोपने की कोशिश की। इसके बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत का बाजार खुलता चला गया। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों पर बाजारवाद ने कुठाराघात किया। उपभोक्तावाद हमें वस्तुमोही, लालची और एकलखोरा बनाता है। सारी चीजें मेरे पास आ जाएँ और मैं ही उनका उपभोग करूँ। यह सामूहिकता को खत्म करने वाली प्रवृत्ति है। ऐसे देश में जहाँ साझेदारी सबसे बड़ा मूल्य होता था, वहाँ इस विचार ने भारतीय समाज को पूरी तरह बदल दिया। इस घटना का सबसे मुखर विरोध साहित्यकारों के तबके ने किया। लघु पत्रिकाओं के माध्यम से यह विरोध आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी शक्तियों या समाजविरोधी शक्तियों के समक्ष हम शरणागत हो चुके हैं। साहित्य का एक ऐसा मोर्चा है, जहाँ यह शरणागति नहीं हुई है और न होगी। साहित्य मनुष्य का ही विचार है, वह मनुष्यता के विरोध में नहीं जा सकता। यदि वह मनुष्यता के विरोध में जाएगा तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के युवा साहित्य पुरस्कार, वनमाली सम्मान, आचार्य निरंजननाथ सम्मान, राजस्थान पत्रिका सृजन पुरस्कार आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार पल्लव ने कहा कि लघु पत्रिकाएँ एक तरह से साहित्य का हरावल दस्ता हैं। बड़े संसाधनों और पूँजी वाली पत्रिकाएँ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नंदन आदि धीरे-धीरे बंद हो गई। वहीं बीते वर्षों में छोटी पूँजी और छोटे प्रयासों वाली एक लघु पत्रिका यदि बंद होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। फिनिक्स पक्षी की तरह लघु पत्रिकाएँ अपना काम निरंतर जारी रखती हैं।
साहित्य में अकादमिक घालमेल पर अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री पल्लव ने कहा कि एक तरह का कैरियरवाद साहित्यिक गतिविधियों में देखने को मिलता है। कुछ लघु पत्रिकाएँ शोध-पत्र छापने का काम करती हैं और यह दावा भी करती हैं कि वह साहित्यिक पत्रिका हैं। लघु पत्रिकाएँ इस उद्देश्य से नहीं निकाली जाती कि वह किसी के कैरियर में सहायक हों। साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रतिबद्धता अपने पाठकों के साथ है, किसी के कैरियर के साथ नहीं। इस घालमेल से कहीं हम हिंदी साहित्य के पाठकों को न खो दें। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग अकादमिक क्षेत्र में योगदान के लिए शोध-पत्र अथवा शोध सामग्री छापने का काम कर सकते हैं। उन्होंने साहित्य के पाठकों का आह्वान किया कि लघु पत्रिकाएँ जरूर पढ़ें। लघु पत्रिकाओं को बचाए रखने की जिम्मेदारी उन सबकी है जो साहित्य के प्रति अपनी किसी न किसी जिम्मेदारी को समझते हैं। कार्यक्रम के दूसरे चरण में श्री पल्लव ने उनके संपादन में प्रकाशित साहित्य-संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका ‘बनास जन’ की विगत दस वर्षों की यात्रा को विस्तार से साझा किया।
कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार गीता गैरोला, प्रो. जितेन्द्र श्रीवास्तव, कृष्ण कुमार भगत, महेश पुनेठा सहित क्षमा सिसोदिया, चिंतामणि जोशी, लक्ष्मण वृजमुख, उर्मिला शुक्ल, गोविंद नागिला, खेमकरण सोमन, डॉ. कमलेश कुमार मिश्रा, गंगा सिंह रावत, मनीषा पाण्डे, डॉ. गिरीश पाण्डे श्प्रतीकश्, कविता अप्रेती, अजेय पाण्डेय, शीला पुनेठा, डॉ. ऋषि शर्मा, मृदुल जोशी, आशीष तिवारी, कृष्ण मोहन प्रसाद, पूजा गंगा कोली, मनोज जोशी, मीना पाण्डे, विपिन चौधरी, शुभ्रा मिश्रा कनक, रघुवीर शर्मा, अनिल कुमार, देवांशु पाल, मीना झा, प्रियंका मेहता, प्रदीप सिंह, यशवंत कुमार, तनुजा प्रजापति, नीरज कुमार, डॉ. के.के.लाल यादव, श्रेयस श्रीवास्तव, अमन कुमार, पुष्पा ठाकुर, जुगेश मुकेश गुप्ता, जयराम पासवान आदि साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : ‘सौंप दी है हमने अपनी नींद पिस्सुओं और खटमलों को, सौंप दिया है उन्हें अपना खून-अपनी तमाम मेहनतों का निचोड़…. ’: डा. दिवा

-कुमाऊँ विश्वविद्यालय की महादेवी वर्मा सृजन पीठ रामगढ़ द्वारा फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन रचना-पाठ

कहानी एवं कविता-पाठ करती कवयित्री व कथाकार दिवा भट्ट।

नवीन समाचार, नैनीताल, 19 अक्टूबर 2020। ‘सौंप दी है हमने अपनी नींद पिस्सुओं और खटमलों को, सौंप दिया है उन्हें अपना खून-अपनी तमाम मेहनतों का निचोड़, इंसानियत और इंसानी सपनों का वे बनाते हैं पायदान-फुटमैट और पाँव रगड़कर बढ़ जाते हैं आगे। जिंदगी नहीं मजबूरियाँ जीते हैं लोग, जली हुई देहों की मरी हुई त्वचा में इंसानियत ढूंढते हैं लोग, आजादी का नाम रटकर गुलामियाँ जीते हैं लोग…।’ कविता की यह पंक्तियां कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर के हिन्दी विभाग में आचार्य पद से सेवानिवृत्त हुईं वरिष्ठ कथाकार एवं कवयित्री डा. दिवा भट्ट ने कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन रचना-पाठ में प्रस्तुत की।
इसके अलावा उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर काण्ड पर लिखी कविता ‘काले दिन’ सुनाते हुए कहा, ‘रखवाले का जामा पहनकर आती है मौत, अर्थों पर चढ़े शब्दों के वस्त्र छीन लिए जाते हैं, शब्द नंगा हो जाता है, अर्थ नंगा हो जाता है पहरेदारों के वहशी हाथों में। छटपटा रही है लज्जा, चीर नहीं पाता सन्नाटे की दीवार-चीत्कार, सुबह होते-होते, और काली हो गई रात की कालिमा, काले दिन लगातार काले दिन, सूरज उगता है रोज और कलंकित होकर मुँह छिपा लेता है अपने ही बदरंगी आकाश में, हम क्या करें इन काले दिन का और इन कीचड़ सनी रातों का। इसके साथ ही उन्होंने अपनी अंधेरा, खिड़की, हादसे व भाषण के साथ ही चल लौट चलें अपने-अपने गाँव, चौमांस अपनी गुजराती व कुमाउनी कविताओं का पाठ हिंदी भावनुवाद के साथ प्रस्तुत किया। साथ ही अपनी मार्मिक कहानी ‘अ-रचित’ भी सुनाई।
उल्लेखनीय है कि जनपद पिथौरागढ़ के बेलकोट, बेरीनाग में जन्मी दिवा भट्ट गुजराती साहित्य परिषद के भगिनी निवेदिता पुरस्कार, मारीशस में आधारशिला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के महादेवी वर्मा सम्मान, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के उत्कृष्ट सेवा व सारिका सम्मान आदि प्रतिष्ठिति पुरस्कारों से सम्मानित हैं। उनके दो कहानी संग्रह, 1 उपन्यास, 2 हिंदी व 2 गुजराती कविता संग्रह, 5 आलोचनात्मक पुस्तकें, 4 सम्पादित पुस्तकें तथा 4 सह-सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्होंनें सरदार पटेल की जीवनी पर आधारित एक पुस्तक का गुजराती से हिंदी में भी अनुवाद किया है। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार हरीश चंद्र पाण्डे, डॉ. हरिसुमन बिष्ट सहित बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

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-कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में ऑनलाइन रचना-पाठ कार्यक्रम

कहानी पाठ करते वरिष्ठ कथाकार डॉ. हरिसुमन बिष्ट।

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अक्टूबर 2020। सैलानियों के लिए पहाड़ों की प्राकृतिक छटा भले ही मंत्रमुग्ध करने वाली हो लेकिन स्थानीय लोग जानते हैं कि पहाड़ों का जीवन-संघर्ष कितना कठोर और निर्मम है। प्रमुख पर्यटन स्थल कौसानी अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य, कविवर सुमित्रानंदन पंत और महात्मा गांधी की स्मृतियों से जुड़ा होने के कारण सदा पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है लेकिन कौसानी के सौंदर्य और चकाचौंध के पीछे यहाँ के ग्रामीण जनजीवन का संघर्ष कहीं छिपकर रह जाता है। पहाड़ अपने संघर्ष में इसी वेदना को समेटे हैं। हमारी दृष्टि सौंदर्य तक तो जाती है लेकिन उसके पीछे के दर्द को हम महसूस नहीं कर पाते। यह बातें कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के ऑनलाइन रचना-पाठ कार्यक्रम में अल्मोड़ा के दूरस्थ गाँव कुन्हील में जन्मे, हिंदी अकादमी दिल्ली के सचिव रहे वरिष्ठ कथाकार एवं उपन्यासकार डॉ. हरिसुमन बिष्ट ने अपनी कहानी ‘कौसानी में जैली फिश’ पर चर्चा करते हुए कही।
इस दौरान उन्होंने प्रश्न किया-‘कहां हो प्रकृति पुत्र, कहां है सुकुमार कवि, क्या कवि का होना ही कौसानी का होना है या कौसानी का होना ही कवि का होना है?
इस दौरान उन्होंने बहुचर्चित निठारी कांड पर आधारित अपने चर्चित उपन्यास ‘बसेरा’ के अंश का पाठ भी किया। उन्होंने कहा कि इस सनसनीखेज घटनाक्रम ने तब समूची मानवता को शर्मसार किया था लेकिन स्थितियों में आज भी बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। उपन्यास के प्रमुख पात्र आलोकी, वीणा और महेन्द्र के माध्यम से उन्होंने औरत की वेदना व्यक्त करते हुए कहा- दुनिया भूखे भेड़ियों से अटी पड़ी है। जाने कभी किसी के नाखून लग गए तो ? इस बात को यहाँ बढ़ाने का समय नहीं है। इस समय हमें पैसे की जरूरत है। पेट की आग बुझाने की जरूरत है। जीवित रहने भर की जरूरत है। तुम यह सोच लो, हम लोगों का जन्म ही इन लोगों के लिए हुआ है। तुम ना-नुकुर करोगी तो कोई और जाकर रह लेगी और कोई तुम्हें यहाँ आकर खाने को रोटी और खर्च के लिए पैसे नहीं दे जाएगा। उल्लेखनीय है कि डा. बिष्ट की रचनाओं का अंग्रेजी, ओड़िया, बांग्ला, मराठी और नेपाली में अनुवाद हो चुका है। जोहानिसबर्ग एवं भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। वह ताशकंद, समरकंद, इजिप्ट, इण्डोनेशिया, मलेशिया, मास्को, सेंटपीटर्सबर्ग एथेंस (ग्रीस) में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्याख्यान तथा रचनाओं का पाठ करते रहे हैं। मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली के सचिव पद पर रहते हुए उन्होंने हिंदी को भारतीय भाषाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके 6 उपन्यास, 7 कहानी संग्रह, 6 नाटक सहित यात्रा वृतांत, अनुवाद व संपादित पुस्तकें प्रकाशित हैं। वह आंतोव चेखव सम्मान, एथेंस, ग्रीस में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर अंतरराष्ट्रीय सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित अनेक वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

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-महादेवी वर्मा सृजन पीठ में फेसबुक लाइव के जरिये ‘मेरी रचना यात्रा और कविताएँ’ विषय पर ऑनलाइन चर्चा व कविता पाठ आयोजित
नवीन समाचार, नैनीताल, 28 अगस्त 2020। कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा बीते कई सप्ताहों से हर सोमवार को फेसबुक लाइव कार्यक्रम में ‘मेरी रचना यात्रा और कविताएँ’ विषय पर ऑनलाइन चर्चा व कविता पाठ आयोजित हो रहे हैं। इस सप्ताह इस कार्यक्रम में प्रदेश के सुप्रसिद्ध जनकवि बल्ली सिंह चीमा ने ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं। इस मौके पर ‘मां’ को समर्पित जनगीत में उन्होंने कहा ‘जंगल रोज उजाड़े हमने पूंजीपतियों की खातिर, ऊँचे बाँध बनाये हमने पूंजीपतियों की खातिर, नोचा-लूटा धरती माँ को उसका बंटाधार किया, माँ कहकर भी हमने उसका जीना दुश्वार किया।’
इस दौरान बाजपुर जिला ऊधमसिंह नगर निवासी श्री चीमा ने शहीदे आजम सरदार भगत सिंह को उनके जन्मदिन पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘हर जवाँ सीने में धड़के भगत सिंह का दिल अभी, रोजी-रोटी की लड़ाई चल रही है चल अभी, जीत भी होगी किसी दिन देख लेगा ये जहान, अब सुबह होने को है जाग ऐ हिंदुस्तान।’ पलायन के दर्द को बयां करते हुए उन्होंने कहा ‘पहाड़ी गाँव-कस्बों से तो गायब हो गई रौनक, सुना है हल्द्वानी-दून आ रहने लगी रौनक, बुढापे की जिन्होंने रौनकें बनना था आंगन में, कनाडा जा बसे वो साथ उनके जा बसी रौनक, ये मँहगाई-भ्रष्टाचार पूंजीवाद का फल है, हर एक इंसान के चेहरे से गायब हो गई रौनक।’ वहीं वर्तमान में चल रहे देशव्यापी किसान आंदोलन को समर्पित गजल सुनाते हुए उन्होंने कहा, ‘वो जो मर रहा कर खुदखुशी इस देश का किसान है, कहो गर्व से कहो शान से मेरा देश फिर भी महान है। जो अमीर था वो अमीर है वही ठाठ हैं वही शान है, जो गरीब था वो गरीब है ये विकास एक समान है। मैं किसान हूँ मेरा हाल क्या मैं तो आसमां की दया पर हूँ, कभी मौसमों ने हंसा दिया कभी मौसमों ने रूला दिया।’ इसके अलावा ‘धूप से सर्दियों में खफा कौन है’ शीर्षक गजल पढ़ते हुए उन्होंने कहा, ‘बह रही हो जहाँ कूलरों की हवा पीपलों को पूछता कौन है, बांटने वाले हों सारे अंधे जहाँ, किसको कितना मिला देखता कौन है?’ इसके अलावा श्री चीमा ने अपनी मशहूर गजल ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के, वे कविताएं, मीर साहब से माजरत के साथ, कभी-कभी बोलते हैं जानवर भी, गरीब उर्फ मजदूर किसान, अमरीका व पुस्तकें आदि गजलों व कविताओं का पाठ भी किया। इससे पूर्व श्री चीमा ने ऑनलाइन जुड़े श्रोताओं से अपनी रचना यात्रा को साझा करते हुए बताया कि वह इन दिनों अपने रचनाकर्म, जीवन संघर्ष, जनांदोलनों में भागीदारी आदि पर केंद्रित आत्मकथा लिख रहे हैं, जो शीघ्र ही पाठकों के सम्मुख होगी। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार कृषक, दिवा भट्ट, रामेश्वर त्रिपाठी, महेश पुनेठा, जहूर आलम, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, रमेश चंद्र पंत सहित अनेक साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : समय की पहचान न होगी तो समय भी नहीं पहचानेगा: शैलेय

नवीन समाचार, नैनीताल, 14 सितंबर 2020। समय की अपने आप में कोई निरपेक्ष सत्ता नहीं होती। देशकाल-परिस्थितियों के अनुसार हम उससे अर्थ ग्रहण करते हैं। एक रचनाकार के लिए देशकाल-परिस्थितियों के अनुरूप ही समय को व्याख्यायित करना या समय की दृष्टि से देशकाल-परिस्थिति को व्याख्यायित करना तथा उनके अंतर्संबंधों-अंतर्विरोधों को पकड़ना नितांत आवश्यक है। क्योंकि यदि समय की पहचान किसी रचनाकार को नहीं होगी तो समय भी उसकी पहचान करने में सहायक नहीं होगी।
यह विचार परम्परा सम्मान, शब्द साधक सम्मान, परिवेश सम्मान, शैलेश मटियानी कथा-स्मृति सम्मान आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित चर्चित कवि व कथाकार, सरदार भगत सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रुद्रपुर (ऊधमसिंह नगर) में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शंभूदत्त पांडे ‘शैलेय’ ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘समय, समाज और रचनाधर्मिता’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन चर्चा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमें यह जानना-समझना आवश्यक है कि हम अपने समय में अपनी भूमिका का निर्वहन किस रूप में करते हैं। इसी से ही हमारे समय को भी व्याख्यायित किया जायेगा। उन्होंने जोड़ा कि सदा से ही समाज एक जीवंत सत्ता रहा है और जीवंत सत्ताएं सदैव गतिशील होती हैं। उन्होंने कविता-पाठ की शुरुआत करते हुए प्रश्न किया ‘हताश लोगों से एक सवाल, हिमालय ऊँचा या बछेन्द्री पाल?’ उन्होंने कार्यक्रम में अपने कविता-संग्रह या, तो, कुढब कुबेला और बीच दिसम्बर से क्रमशः जूता, बातचीत, दृष्टि, पहाड़, तुम्हारा जाना, पुलोवर, किसके लिए, संवार, रंग सुंदरतम, बुरांश आदि कविताओं का पाठ भी किया, जिसे ऑनलाइन जुड़े श्रोताओं ने काफी सराहा। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. जितेन्द्र श्रीवास्तव, जहूर आलम, जगदीश जोशी, महेश पुनेठा, दिनेश कर्नाटक, महाबीर रंवाल्टा, रमेश पंत, स्वाति मेलकानी, मुकेश नौटियाल, अमिता प्रकाश, डॉ. अनिल कार्की, खेमकरण सोमन, डॉ. तेजपाल सिंह, दीपा पांडे, शीला पुनेठा, डॉ. कमलेश कुमार मिश्रा सहि अनेक साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : अगली बार धरती नहीं आकाश बनूंगी, दूर से ही देखूंगी तुम्हें..

नवीन समाचार, नैनीताल, 07 सितंबर 2020। ‘अगली बार धरती नहीं आकाश बनूंगी, दूर से ही देखूंगी तुम्हें। देखूंगी कैसे ठिठुरते हो ठंड में या गर्मी में हांफते से फड़कते हो। स्वयं में पेड़ उगाकर जो न दूँ छाँव तो कैसे झुलसते हो तेज दुपहरी धूप में। ‘अगली बार’ शीर्षक से कविता की यह पंक्तियां चर्चित कवयित्री स्वाति मेलकानी ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित ऑनलाइन कविता-पाठ में प्रस्तुत की।
वहीं ‘बुरांश’ शीर्षक कविता से कविता-पाठ की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा, बुरांश के खिलने से जंगल खिल उठता है। बुरांश आशा है आज के सूरज के वर्षों तक उगने की और अंधेरी रातों में तारों और जुगनू के कभी न बुझने की। बुरांश का खिलना एक भरोसा है कि हवा में पानी, पानी में जीवन और जीवन में प्रेम अब भी शेष है। बुरांश प्रतीक है संभावनाओं का। स्वामी विवेकानंद राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लोहाघाट (चम्पावत) के शिक्षा शास्त्र विभाग में सहायक प्राध्यापक स्वाति मेलकानी ने इसके अलावा लड़कियों की आजादी और सपनों को केंद्र में रखकर लिखी कविता ‘एक खिड़की’ सुनाते हुए कहा, एक ऐसी खिड़की जरूर बनाना घर में जो तुम्हारी पहुँच में हो और जिसे तुम अपनी मर्जी से खोल सको। जब तुम्हारी साँसें फूलने लगती हैं तो उस खिड़की से होकर ताजी हवा आ सके तुम तक और तुम महसूस कर सको कि हवा में तुम्हारा भी हिस्सा है। इसके अलावा उन्होंने तीर्थयात्रियों पर हुए आतंकी हमले को केंद्र में रखकर लिखी कविता ‘अमरनाथ-2017’ तथा भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा अनुशंसित एवं प्रकाशित अपने कविता संग्रह ‘जब मैं जिंदा होती हूँ’ से ‘खोजूंगी तुम्हें’, ‘पिक्चर अभी बाकी है’ गत वर्ष पिथौरागढ़ में पुस्तकों के लिए छात्रों द्वारा चलाए गए आंदोलन पर केंद्रित ‘पिथौरागढ़ किताब आंदोलन के नाम’, 15 जुलाई 2016 को फ्रांस के नीस शहर में उत्सव मनाती भीड़ को ट्रक से रौंदे जाने की घटना पर केंद्रित ‘मातम’, पहाड़ में पलायन की समस्या पर ‘लौट आओ’ सहित ‘मुक्ति’, ‘तुम्हारे लिए तुम्हारे आने से पहले’, ‘तुम और मैं’, ‘शहर से गुजरते हुए’, ‘ज्वालामुखी’ और ‘मुझे खोज है त्रास की’ कविताओं का पाठ भी किया। कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, हरीश चन्द्र पांडे, जगदीश जोशी, दिवा भट्ट, गीता गैरोला, जहूर आलम, जितेन्द्र श्रीवास्तव, शैलेय, हरि मृदुल, दिनेश कर्नाटक, रेखा चमोली, उदय किरौला, महाबीर रंवाल्टा व अनिल कार्की सहित बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

यह भी पढ़ें : कविता गहरे दायित्व बोध की सार्थक अभिव्यक्ति: डॉ. त्रिपाठी

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 अगस्त 2020। अब कविता सिर्फ कविता के लिए नहीं बल्कि गहरे दायित्व बोध की सार्थक अभिव्यक्ति है। आज कविता वही रेखांकित कर रही है जो समाज में टूट रहा है। आधुनिक कविता में भविष्य के समाज की स्पष्ट तस्वीर देखी जा सकती है। सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध वह अपना आक्रोश ही व्यक्त नहीं करती बल्कि चेतना जागृत कर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी निर्वाह करती है। आज की हिंदी कविता जहां अतीत से अपने संबंध को व्याख्यायित करती है, वहीं भविष्य के प्रति भी एक दृष्टि देती है। यह विचार कवि व आलोचक तथा जेएनपीजी लखनऊ के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर अनिल त्रिपाठी ने रविवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय की रामगढ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में ‘हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए हर सप्ताह शनिवार को आयोजित होने वाली ऑनलाइन चर्चा में इस शनिवार को व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शिल्प के बंधनों से मुक्त आज की कविता वैचारिक रूप से अधिक परिपक्व है। जैसी मारक क्षमता आज की हिंदी कविता में है, वैसी पहले कभी नहीं रही।
उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा की शक्ति का अंदाज बिल्कुल नए कवियों की भाषा से लगाया जा सकता है। इन कवियों की कविताओं में जहाँ समय को समझने की कोशिश है, वहीं उनकी कविता अपने समय को बिना किसी आकुलता के पकड़ती है। उन्होंने कहा कि पुस्तकों के बजाय इंटरनेट, फेसबुक और ब्लॉग जैसे माध्यमों के जरिए लोकप्रिय हो रही कविता भाषा और विन्यास की सीमा से परे बिल्कुल एक नए प्रयोग की तरह है जो बहुत कम शब्दों में अपनी गहरी छाप छोड़ जाती है। चर्चा के उपरांत श्री त्रिपाठी ने अपनी विपरयस्तु, पोस्ट ट्रूथ, अब भी, बापू की याद, उजाड़, फूल-सी मीठी, मुझे यकीन है, मेरे गाँव का गडरिया, पिता एक इंतजार का नाम है आदि कविताओं का पाठ किया, जिसे ऑनलाइन जुड़े श्रोताओं ने काफी सराहा। कार्यक्रम में पीठ के पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित केशव तिवारी, वसंत सकरगाए, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, अमित श्रीवास्तव गोविंद नागिला, राहुल पांडे, प्रभा साह, खेमकरण सोमन, अजेय पांडेय, शेखर पाखी, यशपाल कुमार, कन्हैया मिश्र, सत्य प्रकाश शर्मा, डॉ. तेजपाल सिंह, जवाहर मूठा, जितेंद्र यादव, पृथ्वी राज सिंह, शील निगम, सुरेश सिंह, विकलेश पांडे, कमलेश कुमार मिश्रा, इंदु त्रिपाठी, जिग्नेश तिवारी, चंद्रेश धर द्विवेदी, उद्भव मिश्रा, दिलीप कश्यप, कानन त्रिपाठी, अनीता चौहान आदि कवि-साहित्यकार व साहित्य-प्रेमी शामिल रहे।

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-राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी के लिए नैनीताल में जुटे देशभर के बाल साहित्यकार, कहा स्थितियों को बेहतर करने की जिम्मेदारी साहित्यकारों की भी

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जून 2019। मोबाइल ने बच्चों में कल्पनाशीलता, बाहर खेलने व याददाश्त को कम करने के साथ ही आंखों एवं शरीर को काफी नुकसान पहुंचाया है तथा अन्य कारणों के साथ वह भी बच्चों से उनका बचपनी छीनकर उन्हें समय से पहले बड़ा बना रहा है, लेकिन हर दौर के बच्चों के माता-पिता के दृष्टिकोण से ‘अनपेक्षित’ दिशा में जाने के खतरों के साथ ही मोबाइल फोन आज और भविष्य की जरूरत भी है। मोबाइल के प्रयोग में बच्चे बड़ों से आगे भी हैं और घर में अपने बड़ों की मोबाइल संबंधी समस्याओं का समाधान वे ही करते हैं। लेकिन उन्हें मोबाइल उपलब्ध कराने से लेकर स्वयं मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग कर बच्चों में भी इसके प्रति जिज्ञासा बढ़ाने के लिए बड़े अधिक जिम्मेदार हैं। ऐसे में साहित्यकारों व खासकर बाल साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को आकर्षक तरीके से इन स्थितियों के खतरों से दूर रखने, जागरूक करने के लिए ऐसा आकर्षक साहित्य लिखें कि बच्चे उन्हें पढ़ें और जागरूक हों।
यह बात रविवार को अल्मोड़ा से प्रकाशित बच्चों की त्रैमासिक पत्रिका बाल प्रहरी, बालसाहित्य संस्थान तथा नगर के श्री अरविंदो आश्रम के संयुक्त तत्वावधान में नगर के वन निवास अरविंदो आश्रम 14वीं राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में ‘मोबाइल, बच्चे और बाल साहित्य’ विषयक संगोष्ठी में साहित्यकार डा. एलएस बिष्ट ‘बटरोही’, डा. भैरूं लाल गर्ग, स्नेहलता, विजय बिष्ट व डा. हरिदेव धीमान आदि साहित्यकारों ने कही। इस दौरान दामोदर जोशी ‘देवांशु’ की बच्चों की कविताओं की पुस्तक ‘पहाड़ पढ़ो’, डा. अजीत राठौर की ‘चुनमुन चूहा’, राजकुमार सचान की ‘छेना और रसगुल्ले’ तथा चक्रधर शुक्ल की ‘दादी की प्यारी गौरैया’ सहित ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के बाल साहित्य विशेषांक, बाल वाटिका पत्रिका के पर्यावरण विशेषांक तथा जय सिंह आशावत, राजा भैया गुप्ता ‘राजाभ’, डा. रमेश आनंद, गौरी शंकर वैश्य, चद्रभान चंद्र, माधव गिरि ‘मधुवन’ व स्नेहलता सहित 12 साहित्यकारों की पुस्तकों का विमोचन व प्रस्तुतीकरण भी किया गया। साथ ही कविता, देव सिंह, गरिता, नीरज, चित्रा, आस्था, भाष्कर, शंकर, प्रियंका, नितिन, निशा, काजल, खुशी, नीरज व तनूजा आदि बच्चों ने कवि गोष्ठी में अपनी स्वरचित कविताएं भी सुनाईं। साहित्यकारों ने आयोजक बाल प्रहरी पत्रिका के संपादक उदय किरौला की बाल साहित्यकारों के लिए देश का यह प्रमुख आयोजन बिना किसी सहयोग के करने के लिए मुक्त कंठ से प्रशंसा की। अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी आयोजित हुआ। संचालन डा. दीपा कांडपाल ने किया। इस मौके पर डा. राकेश चक्र, केपीएस अधिकारी, संगीता सेठी, हरीश चंद्र बोरकर, डा. करुणा पांडेय, कमलेश चौधरी, शशि ओझा, मेजर शक्तिराज, नरेंद्र परिहार सहित देश भर के लगभग 125 बाल साहित्य के रचनाकार व बच्चे मौजूद रहे। जबकि आयोजन में हिमांशु पांडे ‘मित्र’, मंजू पांडे ‘उदिता’, विमला जोशी ‘विभा’, प्रकाश जोशी, अनिल पुनेठा, प्रमोद तिवारी, डा. रेखा त्रिवेदी, डा. गंगा बिष्ट, डा. सरस्वती खेतवाल, ममता पांडे, डा. बिशना साह व संतोष किरौला आदि ने भी योगदान दिया।

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-1985 से भाकपा माले के केंद्रीय कमेटी सदस्य पुरुषोत्तम शर्मा के पास था, उन्होंने संग्रहालय को सोंपा

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का टाइपराइटर हिमालयन संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा को सोंपते कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा।

नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जनवरी 2019। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी का टाइप राइटर सोमवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर नैनीताल स्थित हिमालयन संग्रहालय की शोभा बन गया। भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और ‘विप्लवी किसान संदेश’ पत्रिका के संपादक कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा ने महाकवि ‘निराला’ जी का प्रयोग किया हुआ टाइपराइटर सोमवार को शिक्षक नेता नवेन्दु मठपाल के साथ कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिषर नैनीताल स्थित संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा को सोंप दिया। बताया कि 1988 में इसे एक धरोहर के रूप में लोकप्रिय क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय ने उन्हें सौंपा था। गोरख पांडेय तब दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध कर रहे थे।
गोरख पांडेय खुद टाइप नहीं करते थे और कलम से ही लिखते थे। कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा और गोरख पांडेय एक ही संगठन भाकपा (माले) में थे, और 1985 में जन संस्कृति मंच की दिल्ली में स्थापना की तैयारी के दौरान कई महीने उन्होंने साथ कार्य किया था। उस दौर में भाकपा (माले) बहुत छोटी पार्टी थी और उनके पास कोई कम्प्यूटर या टाइप मशीन नहीं थी, इसलिए कामरेड शर्मा को यह टाइपराइटर मिल गया था। 1990 में संगठन के पास नई टाइप मशीन और एक कम्यूटर आने के बाद से उन्होंने इसे सुरक्षित संभाल कर रखा था। इस मौके पर कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया कि उन्होंने टाइप करना इसी टाइपराइटर से सीखा। वहीं संग्रहालय के संचालक बीसी शर्मा ने कहा कि यह हमारी अमूल्य धरोहर है जिससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने इसे कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिषर नैनीताल को सौंपने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा का धन्यवाद किया।
उत्तराखंड मूल के साहित्यकार को मिला भारत-भारती सम्मान

लखनऊ, 1 नवंबर 2018।  उप्र हिंदी संस्थान की ओर से लखनऊ में आयोजित हुए भारत-भारती सम्मान में उत्तराखंड के अल्मोड़ा के गंगोला मोहल्ला निवासी साहित्यकार पद्मश्री डॉ. रमेश चंद्र साह को भारत भारती सम्मान से नवाजा गया। उप्र के विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने पुरस्कार स्वरूप उन्हें गंगा प्रतिमा, अंगवस्त्र, ताम्रपत्र और पांच लाख रुपये की धनराशि प्रदान की। मालूम हो कि पद्मश्री साह को पूर्व में साहित्य क्षेत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, मध्य प्रदेश का शिखर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र और मैथलीशरण गुप्त सम्मान भी मिल चुके हैं।

भारत-भारती सम्मान मिलने पर साहित्यकार डॉ. शाह ने कहा कि आज साहित्य पढ़ने और लिखने वालों का अनुपात ठीक नहीं है। डॉ. साह ने निराला सृजन पीठ भोपाल के निदेशक का पद भी सुशोभित किया है। वे अंग्रेजी विषय के प्रोफेसर रहे लेकिन हिंदी में उनकी गहरी पकड़ और अगाध प्रेम उनके साहित्य से ही झलकता है। डॉ. साह के अब तक 11 उपन्यास, 10 निबंध संग्रह, 10 साहित्य लोचन ग्रंथ, नौ काव्य संग्रह, सात कहानी संग्रह, पांच संपादित कृति ग्रंथ, तीन अनुवाद ग्रंथ, यात्रा वृतांत और दो बाल नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा अंग्रेजी भाषा में पांच ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. साह अब तक यूगोस्लाविया, हंगरी, इंग्लैंड, चेकोस्लाविया, आयरलैंड आदि देशों की साहित्य यात्रा कर चुके हैं।

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    • पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा-समकालीन का मतलब तात्कालिकता नहीं, वक्त की कसौटी पर कसी जाएगी समकालीन हिंदी कविता
  • समकालीन हिंदी कविता पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारंभ

नैनीताल, 23 फ़रवरी 2018। वरिष्ठ कवि पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने ‘समकालीन हिंदी कविताः 1990 के बाद के नये संदर्भ’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में अपने मुख्य ‘बीज संबोधन’ में कई शब्दों के अर्थों को साफ किया। कहा कि समकालीन का मतलब अखबार की तात्कालिकता नहीं है। कहा कि जो कविता अपने पूर्व कवियों व उनकी कविताओं को साथ लेकर व अपने समय की बात कहती हैं, और भविष्य के लिए दृष्टि दिखाती हैं, वे ही कालजयी बनती हैं। कविता के बाबत उन्होंने कहा कि जिसमें अकथित बात कही गयी हो वह कविता होती है। इस कसौटी पर गद्य भी कविता हो सकता है। आज के दौर में पाठकों की कमी व पठनीयता के ह्रास के बावजूद किताबें छपने की होड़ को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया व पुरस्कार प्राप्त करना आधुनिक कवियों का कार्य हो गया है। जबकि कवियों को अपनी कविता और कवित्व को लगातार ‘मांझने’ की जरूरत है। आचोलक शब्द को भी साफ करते हुए उन्होंने कहा कि आलोचना करना नहीं बल्कि कविता को समग्र दृष्टिकोण से देखना आलोचक का कार्य है। सोना जिस पत्थर पर उत्पन्न होता है, उसी पत्थर की कसौटी पर घिस कर कसा जाता है। अलबत्ता आलोचकों को नई कसौटी पर भी कविताओं को कसना होगा। कहा कि आज की कविता व अखबारों की भाषा में कोई फर्क नहीं रह गया है। कविता नये शब्द गढ़ रही है। सलाह दी कि विश्वविद्यालयों को नये गढ़े जा रहे शब्दों के संकलन व शब्दकोष बनाने पर कार्य करना चाहिए।

जगूड़ी शुक्रवार को कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में मानव संसाधन विकास केंद्र हरमिटेज परिसर में महादेवी सृजन पीठ रामनगर के सहयोग से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। इससे पूर्व कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल की अध्यक्षता एवं प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित की उपस्थिति में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में संयोजक प्रो. मानवेंद्र पाठक ने संगोष्ठी में आये प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए विभाग के कवि प्रो. शिरीष मौर्य की कविता तसला की सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता वह तोड़ती पत्थर से तुलना करते हुए अमूर्त वस्तुओं के जरिये तत्कालीन संदर्भों के प्रकटीकरण का उल्लेख किया। बताया कि संगोष्ठी का उद्देश्य 1990 से अब तक राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से हुए तमाम परिवर्तनों एवं संचार माध्यमों की उत्तरोत्तर बढ़ती उपलब्धता सहित बदलते हुए परिवेश में हिंदी कविता के संवाद को अकादमिक स्तर पर रेखांकित करना है। संगोष्ठी में देश के पश्चिमी बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, यूपी, उत्तराखंड व दिल्ली आदि राज्यों से समालोचक जीवन सिंह, हरिश्चंद्र पांडे, सुबोध शुक्ल व डा. अमित श्रीवास्तव सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों के अलावा डीएसबी परिसर की प्रो. मुन्नी पडलिया, प्रो. ललित तिवाड़ी, डा. रवि जोशी सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं शोध छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। संचालन प्रो. चंद्रकला रावत ने किया।

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p style=”text-align: justify;”>आदि, व्याधि व उपाधि…
नैनीताल। संगोष्ठी में शब्दों को चुटीले अंदाज में उनके मूल अर्थ में परिभाषित करते हुए पद्मश्री जगूड़ी ने कहा कि विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली ‘उपाधि’ शब्द मूलतः आयुर्वेद से आया है, जहां जन्मजात बीमारियों को आधि, शारीरिक बीमारियों को ब्याधि और मस्तिष्क की बीमारियों का उपाधि कहा गया है।  उन्होंने कहा कि उपाधि धारकों को वास्तव में अपने विषय को मस्तिष्क में किसी बीमारी की तरह ही ग्रहण करना चाहिए।

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p style=”text-align: justify;”>25 से कुमाऊं विवि में शोधार्थियों के लिए दैनिक उपस्थिति लगाना हुआ अनिवार्य
नैनीताल। कुमाऊं विविके स्पांसर्ड रिसर्च एंड इंडस्ट्रियल कंसल्टेंसी सेल के निदेशक प्रो. राजीव उपाध्याय ने कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल के हवाले से बताया कि आगामी 25 फरवरी से कुमाऊं विवि में शोधार्थियों के लिए विभागाध्यक्ष कार्यालय में दैनिक उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य होगा। यह उपस्थिति हर महीने सेल को भेजनी अनिवार्य होगी। इसके अलावा शोधार्थियों को अपनी पीएचडी थीसिस की हार्ड कॉपी के साथ ही सॉफ्ट कॉपी पेन ड्राइव में भी सेल में देनी होगी।

नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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