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आज ‘पराक्रम पर्व’ पर जरा याद करो अपने सपूतों की कुर्बानी : जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर..

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पत्नी के हाथों की मेहंदी के सूखने से पहले ही देश पर कुर्बान हो गया मेजर राजेश

शहीद राजेश अधिकारी

नवीन जोशी, नैनीताल। करगिल शहीद दिवस जब भी आता है, वीरों की भूमि उत्तराखंड का नैनीताल शहर भी गर्व की अनुभूति के साथ अपने एक बेटे, भाई की यादों में खोये बिना नहीं रह पाता। नगर का यह होनहार बेटा देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र विजेता मेजर राजेश अधिकारी था, जो मां के बुढ़ापे का सहारा बनने व नाती-पोतों को गोद में खिलाने के सपनों और शादी के नौ माह के भीतर ही पत्नी के हाथों की हजार उम्मीदों की गीली मेंहदी को सूखने से पहले ही एक झटके में तोड़कर चला गया।

मेजर राजेश अधिकारी ने जिस तरह देश के लिये अपने प्राणों का सर्वोच्च उत्सर्ग किया, उसकी अन्यत्र मिसाल मिलनी कठिन है। 29 वर्षीय राजेश 18 ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में तैनात थे। वह मात्र 10 सैनिकों की टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए 15 हजार फीट की ऊंचाई पर तोलोलिंग चोटी पर पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा स्थापित की गई पोस्ट को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराने के इरादे से आगे बढ़े थे। इस दौरान सैनिकों से कई फीट आगे रहते हुऐ चल रहे थे, और इस कारण घायल हो गये। इसके बावजूद वह अपने घावों की परवाह किये बगैर आगे बढ़ते रहे। वह 30 मई 1999 का दिन था, जब मेजर राजेश प्वाइंट 4590 चोटी पर कब्जा करने में सफल रहे, इसी दौरान उनके सीने में दुश्मन की एक गोली आकर लगी, और उन्होंने बंकर के पास ही देश के लिये असाधारण शौर्य और पराक्रम के साथ सर्वोच्च बलिदान दे दिया। युद्ध और गोलीबारी की स्थितियां इतनी बिकट थीं कि उनका पार्थिव शरीर करीब एक सप्ताह बाद युद्ध भूमि से लेकर नैनीताल भेजा जा सका। राजेश ने नगर के सेंट जोसफ कालेज से हाईस्कूल, जीआईसी (जिसके नाम में अब उनका नाम भी जोड़ दिया गया है) से इंटर तथा डीएसबी परिसर से बीएससी की पढ़ाई की थी। पूर्व परिचित किरन से उनका विवाह हुआ था। परिजनों के अनुसार यह ‘लव कम अरेंज्ड’ विवाह था। लेकिन शादी के नौ माह के भीतर ही वह देश के लिये शहीद हो गये। उनकी शहादत के बाद परिजनों ने उनकी पत्नी को उसके मायके जाने के लिये स्वतंत्र कर दिया। वर्तमान में सैनिक कल्याण विभाग के अनुसार किरन ने पुर्नविवाह कर लिया। उनकी माता मालती अधिकारी अपने पुत्र की शहादत को जीवंत रखने के लिये लगातार संघर्ष करती रहीं, जिसके बावजूद उन्हें व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक दोनों स्तरों पर कुछ खास हासिल नहीं हो पाया है। वर्तमान में वह अपनी बेटी के पास किच्छा में रह रही हैं।
शहीद राजेश अधिकारी की पत्नी किरन

रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर शहीद मेजर राजेश अधिकारी के पार्थिव शरीर को आखिरी प्रणाम करते कृतज्ञ राष्ट्रवासी.

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नैनीताल, 20 मई 2018। कुमाऊं रेजीमेंट के एक जवान के शहीद होने की दुःखद खबर आ रही है। नैनीताल जनपद के ओखलकांडा विकासखंड के ग्राम भद्रकोट का निवासी मात्र 22 वर्ष की उम्र के जवान योगेश परगाई उर्फ यश 20 मई की रात्रि नागालैंड के सीमावर्ती जखामा क्षेत्र में तैनाती के दौरान पेट्रोलिंग करते हुए नक्सली हमले में गोली लगने से शहीद हो गये हैं। वे 4 कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात थे। उनका परिवार पिछले 2 वर्षों से हल्द्वानी के बिठौरिया नंबर 1, बिष्ट धड़ा तिवाड़ी नगर में रहता है। नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश सहित कई नेता उनके घर शोक संतप्त परिवार को सांत्वना देने पहुंच रहे हैं। यश पांच भाईयों व तीन बहनों में सबसे छोटे थे। जब वह पांच माह के थे, तभी उनके सिर से पिता चन्द्र सिंह परगाई का साया उठ गया था। वह 2014 में 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करके ही सेना में भर्ती हो गए थे। उनके शव के शुक्रवार तक हल्द्वानी स्थित आवास पर पहुँचने की संभावना है।

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पिता की मौत के आंसू पोंछ, एमसीए छोड़ सीआरपीएफ में भर्ती हुआ था मनोज नौंगाई
  •  मां की इकलौती उम्मीद एवं पत्नी के हाथों की गीली मेंहदी के साथ कोख के अजन्मे शिशु के सपने भी तोड़ गया शहीद

नवीन जोशी, नैनीताल। परिजनों के एमसीए कराने के स्वप्न से इतर उसके मन में कुमाऊं रेजीमेंट में रहकर देश के लिए तीन लड़ाइयां लड़ने वाले दादाजी और बड़े चाचा से संस्कारों में मिले बोल `ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं….´ गूंज रहे थे, ऐसे में हाईस्कूल व इंटर में अपने कालेज को टॉप कर बीएससी कर रहा वह होनहार मौका मिलते ही सीआरपीएफ की ओर मुड़ गया। आज वह अपनी बूढ़ी मां की आंखिरी उम्मीदों और पत्नी को हाथों की हजार उम्मीदों की गीली मेंहदी को सूखने से पहले ही एक पल में झटक छोड़ चला है। वह तो शायद देश के लिए उसकी कुर्बानी से अपना मन मना भी लें, लेकिन उसका क्या जिसका भाग्य अभी मां की कोख में शायद विधाता ठीक से लिख भी न पाऐ हों, और उस अजन्मा आत्मा ने अपने भाग्य विधाता को ही खो दिया है।

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड की एक और पहचान है। यहां आजादी के पूर्व से अब तक यह परंपरा अनवरत जारी है कि हर घर में कम से कम एक व्यक्ति जरूर फौज में रहकर देश की सेवा करता है। लेकिन प्रकृति के स्वर्ग कहे जाने वाले नैनीताल जनपद के भीमताल कस्बे के निकट सांगुड़ीगांव में रहने वाले एक परिवार के एक नहीं दो लोगों ने कुमाऊं रेजीमेंट में रहकर देश की सेवा की। दादाजी भैरव दत्त नौगाई ने पाकिस्तान व चीन से देश की तीन लड़ाइयां लड़ीं तो पिता के चचेरे भाई यानी बड़े चाचा लक्ष्मी दत्त नौगांई ने भी केआरसी की 20वीं बटालियन में रहकर देश की लंबी सेवा की। यह दोनों ही हमेशा मनोज के आदर्श रहे। 

मनोज में गजब की इच्छा शक्ति थी। वह बेहद मेधावी होने के बावजूद किसी कारण हाईस्कूल में गणित में कम अंक आने के कारण फेल हो गया था, लेकिन इस ठोकर को उसने अपने पथ का पाथेय बना लिया। अगले वर्ष ही हाईस्कूल में उसने अपने कालेज एलपी इंटर कालेज को टॉप कर दिया, 11वीं में पढ़ने के दौरान 2001 में विधाता ने उसके सिर से पिता भुवन नौगांई का साया छीन लिया था, बावजूद इंटर में भी उसने कालेज टॉप किया। 2003 में उसने कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर में बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया ही था, कि देहरादून में सीआरपीएफ के साक्षात्कार का `कॉल´ आ गया। भाई की मौत के सदमे से उबर न पाऐ बिड़ला संस्थान में चालक के पद से परिवार की गाड़ी चला रहे चाचा विनोद नौगांई ने मना किया, कहा “इस खतरे की नौकरी में न जा, मैं जमीन बेचकर भी तुझे एमसीए कराउंगा”। लेकिन वह न माना। परीक्षा दी और उत्तीर्ण हो खुशी खुशी `ज़िन्दा रहने के मौसम…..´ गुनगुनाता नौकरी पर चला गया। 

इधर गत वर्ष वेलेंटाइन डे 14 फरवरी 09 के दिन उसने हल्द्वानी की मात्र 21 साल की सोनिका भगत को अपनी वेलेंटाइन के साथ ही पत्नी बनाया था। बीते माह ही वह सीआरपीएफ में उपनिरीक्षक पद की परीक्षा उत्तीर्ण कर पदोन्नत हुआ था। यूँ, सीआरपीएफ की नौकरी में रहते कई बार उसका मौत से सामना हुआ था। प्रशिक्षण के दौरान एक मित्रा ने तो उसकी गोद में ही दम तोड़ दिया था, बावजूद देश सेवा की रह में बड़ी से बड़ी दुश्वारियां उसे डिगा नहीं पाई थीं। लेकिन बीती छह अप्रैल मंगलवार को छत्तीसगढ़ के दन्तेवाड़ा में हुऐ `अमंगल´ में वह दिलेर भी अपने 83 साथियों के साथ धोखे का शिकार हो गया। आज उसके परिवार को उसकी शहादत पर गर्व है। बावजूद दुखों का पारावार भी नहीं। मां व पत्नी की सूनी मांग और आंखों से झरते आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे। उसके पार्थिव शरीर को देखने की बेताबी में कोख के अजन्मे शिशु को लेकर पत्नी सोनिका दूसरी मंजिल से कूद कर घायल हो गई। उसका पांव जल्द ठीक हो जाऐगा, किन्तु उसकी आत्मा के घाव को भरने और आगे ऐसा दूसरी किसी सोनिका के साथ न होगा, इस हेतु क्या कुछ किया जाऐगा, यह बड़ा अनुत्तरित सवाल है। 

उसके दादा, दोनों चाचा, मित्रा और जीजा ललित फुलारा…सबकी मानें तो नक्सली समस्या का हल भी आतंकवाद की तरह बिना फौजी कार्रवाई के सम्भव नहीं है। वह कहते हैं “सेना को चढ़ जाने दीजिऐ। देश की आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा के मसले पर राजनीति बन्द कीजिऐ।”
(यह खबर सहारा समय के इस लिंक पर भी देख सकते हैं : http://www.samaylive.com/nation-hindi/79581.html)

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

2 thoughts on “आज ‘पराक्रम पर्व’ पर जरा याद करो अपने सपूतों की कुर्बानी : जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर..

  • June 21, 2018 at 7:49 PM
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    देशसेवा का जो जज्बा हमारे उत्तराखंडी भाइयों में होता है वह अन्यत्र दुर्लभ है, बड़ा दुःख होता है ऐसी खबरे पढ़कर जब एक छोटी से उम्र में शहीद नाम सुनने को, देखने को मिलता है, आंखे नाम हुए बिना नहीं रहती। हम पहाड़ियों को जाने कितनी बार अपना दिल भी पहाड़ जैसा करना होता है

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