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उत्तराखंड का एक ओर लाल जम्मू-कश्मीर में शहीद

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ग्लेशियर में फंसने से शहीद हुआ उत्तराखंड का ITBP जवान सूर्यकांत पंवारनवीन समाचार, नई दिल्ली, 7 मार्च 2019। उत्तराखंड का एक ओर लाल जम्मू-कश्मीर में शहीद हो गया है। मिली जानकारी के मुताबिक, आईटीबीपी जवान सूर्यकांत पंवार लेह-लद्दाख क्षेत्र के ग्लेशियर में फंसने के कारण शहीद हो गए। वे रुद्रप्रयाग के जखोली बड़मा गांव के रहने वाले थे और भारत-तिब्बतियन बॉर्डर पुलिस बल (आईटीबीपी) में लेह-लद्दाख क्षेत्र में तैनात थे। घटना करीब 2 दिन पूर्व की है। आगामी शनिवार तक शहीद सूर्यकांत पंवार का शव उनके पैतृक गांव जखोली बड़मा लाये जाने की सूचना है। उनके दिल्ली स्थित परिजनों को सूचना दे दी गयी है, जिसके बाद उनका परिवार दिल्ली से उनके पैतृक गांव जखोली बड़मा पहुंच रहा है।

शहीद को अंतिम यात्रा पर विदा करते हुए पत्नी बोली ‘जय हिंद ! आई लव यू विभू, तुमने ईमानदारी से देश की सेवा की…

शहीद मेजर विभूतिवीन समाचार, देहरादून, 19 फरवरी 2019। जम्मू के पुलवामा में शनिवार को आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद देहरादून निवासी मेजर विभूति शंकर ढोंडियाल का पार्थिव शरीर मंगलवार सुबह उनके निवास डंगवाल मार्ग पर अंतिम दर्शन को रखा गया। शहीद की पत्नी निकिता, मां, दादी और बहनों का रो-रो कर बुरा हाल था। इस दौरान शहीद की वीरांगना पत्नी निकिता ने कहा, ‘जयहिंद’। साथ ही पार्थिव शरीर को सैल्‍यूट किया। बोली ‘आई लव यू विभू’। पत्‍नी ने खुद शवयात्रा की अगुआई की। पत्नी बोली, तुमने देश की इमानदारी से सेवा की तुम्हें सलाम हर हर किसी को अपने फील्ड में ईमानदारी से काम करना चाहिए।’ उल्लेखनीय है कि निकिता कश्मीरी पंडित हैं और उनका मायका दिल्ली में है। वह दिल्ली में ही नौकरी करती हैं।

इस दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल समेत कई मंत्री, विधायक, सेना, शासन प्रशासन के आला अधिकारी मौजूद रहे। सैन्य सम्मान के साथ शहीद को अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान हजारों का जन सैलाब मौजूद रहा। लोगों ने पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाए। लोग भारत माता की जय, पाकिस्तान मुर्दाबाद और शहीद विभूति अमर रहे के नारे भी लगते रहे। इसके बाद शहीद की अंतिम यात्रा हरिद्वार के लिए प्रस्थान कर गई।

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वीन समाचार, देहरादून, 18 फरवरी 2019। उत्तराखंड अपने एक बेटे मेजर चित्रेश बिष्ट को अंतिम विदाई भी नहीं दे पाया कि पुलवामा से देश और खासकर उत्तराखंड के लिए एक और हृदयविदारक समाचार आ गया है। दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले के पिंगलिन इलाके में रविवार को आधी रात के बाद शुरू हुई मुठभेड़ में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मेजर वीएस ढौंडियाल शहीद हो गए हैं। उनका आवास देहरादून के चुक्कुवाला में नेश्विवला रोड के डंगवाल मार्ग पर है। 55 राष्ट्रीय रायफल्स में तैनात 31 वर्षीय मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल तीन बहनों के इकलौते भाई थे। डेढ साल पहले ही उनकी शादी हुई थी। उनके पिताजी स्व. केएन ढौडियाल सीडीओ आफिस में थे। घर में अभी दादी व मां मौजूद हैं। अभी उन्हें किसी तरह की जानकारी नहीं है। मेजर ढौंडियाल पौड़ी जिले के बैजरो ढौंड गांव के मूल निवासी हैं। विभूति ने सेंट जोजफ कॉलेज से साल 2000 में दसवीं और 2002 में पाइन हाल स्कूल से बारहवीं करने के बाद डीएवी कॉलेज से स्नातक किया। यह कोर्स पूरा करने के बाद उनका ओटीए के जरिए सेना में चयन हुआ था।

इस मुठभेड़ में 4 अन्य जवान भी शहीद हो गए जबकि 1 जवान घायल है। पूरे इलाके को घेरकर सेना द्वारा ऑपरेशन को अंजाम दिया जा रहा है। आयबशहीदों की पहचान हेड कांस्टेबल सेवाराम, सिपाही अजय कुमार और सिपाही हरि सिंह के रूप में हुई है। जबकि गंभीर रूप से घायल जवान गुलजार मोहम्मद को 92 बेस हॉस्पिटल में इलाज के लिए ले जाया गया है। इसके अलावा एक स्थानीय नागरिक मुस्ताक अहमद भी इस दौरान घायल हो गया। इस दौरान एक आम नागरिक के मारे जाने की भी खबर है। घटना स्थल पर मोर्चा संभालने के लिए पैरा कमांडो के दस्ते को बुलाया गया है।

यह भी पढ़ें : शादी के 18 दिन ही शेष रहते सेहरे की जगह तिरंगे में लिपट कर दून पहुंची शहीद मेजर की पार्थिव देह, कल तक कर सकेंगे दर्शन

नवीन समाचार, देहरादून, 17 फरवरी 2019। शनिवार को राजौरी में आईईडी को डिफ्यूज करने के दौरान हुए धमाके में शहीद हुए मेजर चित्रेश बिष्ट की पार्थिव देह शादी के 18 दिन ही शेष रहते सेहरे की जगह तिरंगे में लिपट कर देहरादून पहुंच गयी है। उन्हें पहले वायुसेना के विमान से पहले जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और वहां से सेना के हेलीकॉप्टर से देहरादून लाया गया, और यहां मिलिट्री हॉस्पिटल में ही रखा गया है। आगे सोमवार दोपहर को पार्थिव देह को राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ उन्हें उनके नेहरू कॉलोनी क्षेत्र में स्थित घर पर लाया जाएगा। जानकारी के अनुसार, इसके बाद सोमवार को ही शहीद का अंतिम संस्कार किया जाएगा। इसलिए शहीद की पार्थिव देह को एयरपोर्ट से सीधे सेना के अस्पताल में ले जाया गया है। ऐसे में उनके अंतिक दर्शन कल तक किये जा सकेंगे।शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट का पार्थिव शरीर पहुंचा देहरादून

सेना की इंजीनियरिंग कोर में तैनात मेजर चित्रेश भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून से ही वर्ष 2010 में पासआउट हुए थे। वे उत्तराखंड पुलिस के सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर एसएस बिष्ट के बेटे थे। उनकी 18 दिन बाद ही शादी होनी तय थी। बेटे के शहीद होने की खबर के बाद शादी की तैयारियां मातम में बदल गई हैं। कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत भी उनके आवास पर परिवार को ढांढस बंधाने पहुंचे हैं।

‘वर्दी का फर्ज’ निभाने को नहीं मानी ‘पिता की नसीहत’

वर्दी का फर्ज निभाने पिता की नसीहतें भी मेजर चित्रेश के कदम नहीं रोक पाईं। शुक्रवार रात ही मेजर चित्रेश बिष्ट ने पिता को उनकी जन्मदिन की शुभकामनाएं फोन पर दीं और बताया कि आगे जाना पड़ रहा है, ऊपर से ऑर्डर आए हैं। पिता ने शादी का हवाला देकर हेडक्वार्टर में ही रहने की  नसीहत दी। लेकिन बेटे चित्रेश ने बात अनसुनी कर फोन मां को देने के लिए कह दिया। बेटे चित्रेश से 24 घंटे पहले हुई बातों को पिता एसएस बिष्ट बार-बार दोहरा रहे हैं। एसएस बिष्ट पुलिस में दंबग इंस्पेक्टर के तौर पर जाने जाते रहे हैं। इस तरह के हालात उन्होंने कई बार संभाले हैं, लेकिन आज वह बुरी तरह टूट चुके हैं। बार-बार कह रहे हैं कि मैंने कभी किसी का बुरा तो किया नहीं, लेकिन ऐसा क्या हुआ। एक बार मेरी सुन लेता। कल रात जन्मदिन की बधाई दे रहा था। कह रहा था हेडक्वार्टर से एक ऑपरेशन के लिए भेज रहे हैं। मैंने साफ कह दिया था कि तेरी शादी होने वाली है, अब इधर-उधर जाने की जरूरत नहीं है। हेडक्वार्टर को बता दे। लेकिन उसने पूरी बात नहीं सुनी और मां से बात करने लगा। मां से भी शादी की तैयारी पर बात की और आखिर में कहा कि एक काम के लिए आगे जा रहा हूं। मैं पीछे से कहता रह गया, लेकिन उसने मां से वापस लौटकर बात करता हूं कहकर फोन काट दिया। मैंने रेखा को भी कहा कि उसे समझाती तो सही, लेकिन चित्रेश ने एक नहीं सुनी। जिद्दी जो था, एक बार सुन तो सकता था, कुछ बात समझ में आती तो उसकी, लेकिन कहां कुछ सोचते तो हैं नहीं।

पूर्व समाचार : पिता गए थे बेटे की शादी के कार्ड बांटने और आई ऐसी मनहूस खबर कि ‘उत्तराखंड के मेजर हो गए शहीद…’

नवीन समाचार, देहरादून, 16 फरवरी 2019। देश-प्रदेश 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले के गम और गुस्से में डूबा था, और इधर सेना में एक मेजर के पिता अगले महीने उसकी तय शादी के कार्ड बांटने जा रहे थे कि तभी एक ऐसी मनहूस खबर आई कि पिता के साथ ही पूरा प्रदेश और देश स्तब्ध रह गया। देहरादून निवासी मेजर चित्रेश सिंह बिष्ट कश्मीर के राजौरी में आईईडी धमाके में शहीद हो गए। धमाका उस वक्त हुआ जब वे आईईडी को डिफ्यूज कर रहे थे।

मेजर चित्रेश भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून से वर्ष 2010 में पासआउट हुए थे। वर्तमान में वह सेना की इंजीनियरिंग कोर में थे। वे उत्तराखंड पुलिस के सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर एसएस बिष्ट के बेटे थे। मूल रूप से एसएस बिष्ट रानीखेत के पीपली गांव के रहने वाले हैं। परिवार के लोगों ने बताया कि मेजर चित्रेश की सात मार्च को शादी होने वाली थी। इसके लिए शादी के निमंत्रण पत्र भी बंट चुके थे। शनिवार को भी एसएस बिष्ट अपने पैतृक गांव शादी के कार्ड बांटने गए थे। वहां से लौटकर आए तो शाम करीब साढ़े पांच बजे एसएस बिष्ट के फोन पर मेजर चित्रेश के साथी का फोन आया। एसएस बिष्ट फोन नहीं उठा सके तो उनकी पत्नी के फोन पर कॉल आई। साथी ने उनसे कहा कि चित्रेश की तबीयत खराब है। इस पर वे घबरा गईं और फोन रख दिया। एसएस बिष्ट को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने चित्रेश के साथी को फोन कर बात सच-सच कहने को कहा, उसके बाद साथी ने उन्हें चित्रेश के शहीद होने की खबर बताई। उनकी शहादत की सूचना मिलते ही परिवार में शोक की लहर दौड़ गई है। गमगीन परिवार को ढांढस बंधाने के लिए उनके घर पर लोगों का तांता लगा हुआ है। खबर सुनते ही घर में मातम छा गया। जिसने भी खबर सुनी वह गमगीन परिवार को ढांढस बंधाने बिष्ट परिवार के घर पहुंचने लगा। उनके घर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, विधायक उमेश शर्मा काऊ, विनोद चमोली, आईजी गढ़वाल अजय रौतेला समेत पुलिस के कई उच्चाधिकारी पहुंचे। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मेजर चित्रेश बिष्ट की शहादत पर दुख जताया है।

यह भी पढ़ें : बेटी ने ऐसे किया पिता को आखिरी सैल्यूट कि कठोर दिल भी नहीं रोक पाए आंसू, जागेश्वर ज्योतिर्लिंग धाम में भी दी गयी खास श्रद्धांजलि

इधर देश के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक माने जाने वाले जागेश्वर धाम में भी पुलवामा आतंकी हमले के शहीदों को वहां के पंडितों के द्वारा दिये जलाकर व मौन रखकर खास श्रद्धांजलि दी गयी।

martyr mohal lal raturiनवीन समाचार, देहरादून/खटीमा, 16 फरवरी 2019। बीती 14 फरवरी को जब देश का एक हिस्सा कथित प्रेम का पर्व मना रहा था, तब आतंकियों द्वारा पुलवामा में आतंकियों द्वारा खेले गये खूनी हिंसा के खेल में सड़क से गुजर रही सीआरपीएफ की कॉनवॉय पर 200 किलो से अधिक विष्फोटकों से भरी कार के टकराने से देश के 44 जवान शहीद हो गये थे। इन शहीदों में सैन्य बहुल-वीर सैनिकों की भूमि देवभूमि उत्तराखंड के दो जवान भी शामिल हैं। शनिवार को दोनों शहीदों के शव उनके घर पहुंच गये। इससे उनके घरों के साथ ही पूरे राज्य में जबर्दस्त शोक के साथ ही आतंकियों और पड़ोसी दुश्मन देश पाकिस्तान के खिलाफ जबर्दस्त गुस्से और आक्रोश का माहौल है। खटीमा के मोहम्मदपुर भुड़िया निवासी शहीद वीरेंद्र सिंह राणा (36) क्षेत्र के मोहम्मदपुर भुड़िया निवासी दीवान सिंह (80) के पांच बेटों और बेटियों में सबसे छोटे थे। वे अपने पीछे 80 वर्षीय पिता दीवान सिंह, पत्नी व दो बच्चों रोही (4) और ढाई वर्षीय पुत्र बयान सिंह को रोता-बिलखता छोड़ गये हैं।

शहीद पिता मोहन लाल के शव को सलामी देती बेटी

शनिवार की सुबह सबसे पहले देहरादून में मूलतः उत्तरकाशी के बनकोट गांव निवासी शहीद एएसआई मोहन लाल रतूड़ी का शव पहुंचा तो देश पर मर मिटने व सर्वोच्च प्राणोत्सर्ग देने के गर्व, गम व आक्रोश को एक साथ देखा गया। शहीद की बेटी ने एक वीरांगना की तरह वीरोचित तरीके से अपने पिता को आखिरी सैल्यूट किया तो कठोर दिल लोग भी अपनी आंखों में नमी लाने से खुद को रोक नहीं पाये। इसके बाद शहीद की बेटी भी बेहोश हो गयी। वहीं पारिवारिक सदस्यों ने बताया कि शहीद मोहन लाल सेवानिवृत्ति के बाद भी देश की सेवा करना चाहते थे। उनके तिरंगे से लिपटे शव को अंतिम यात्रा के लिए राज्य के मुख्यमंत्री ने भी कंधा दिया और राज्य के दोनों शहीदों के परिजनों को 25-25 लाख रुपये और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की। बताया कि इस संबंध में संबंधित जिलाधिकारियों को निर्देश दे दिये गये हैं। इस मौके पर डीजीपी अनिल रतूड़ी, डीजी अशोक कुमार, विधायक विनोद चमोली, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी शहीद के घर पहुंचे और शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की।
Related imageऐसा ही माहौल खटीमा में भी था। यहां शहीद वीरेंद्र सिंह का पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचते ही पूरे इलाकों में केवल चीख पुकार सुनाई देने लगी। उनके पिता पिता दीवान सिंह और पत्नी रेनू (26), उनकी भाभियां और दोनों बहनें रित्छा और पुष्पा बेसुध हो गईं। परिजनों ने बताया कि वीरेंद्र 23 जनवरी को छुट्टी पर घर आए थे और दो दिन पहले (12 फरवरी को) ही ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे। तब उन्होंने जल्द घर पहुंचने का वादा किया था। वीरेंद्र घर जल्दी लौटे जरूर लेकिन शहीद होक…. इसके बाद पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनकी अंतिम यात्रा रवाना हुई। केंद्रीय कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा ने उनके तिरंगे से लिपटे पार्थिव शरीर को कंधा दिया।

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कुमाऊं रेजिमेंट के जवान की मौत
मृतक कुमाऊं रेजिमेंट के जवान
कैलाश भट्ट @ नवीन समाचार, जागेश्वर, 7 फरवरी 2019। पठानकोट में तैनात 19 कुमाऊँ के जवान सुशील तिवारी का पार्थिव शरीर गुरुवार को उनके पैतृक तोली गांव पहुंचा, तोली बर्तोली निवासी सेना के जवान सुशील तिवारी उम्र 30 वर्ष गत 4 फरवरी को एक दुर्घटना में घायल हो गए थे। और 5 फरवरी को उनका निधन हो गया था।
आज गुरुवार को सेना के माध्यम से तिरंगे में लिपटा सुशील का शव घर पहुचा, पूरे क्षेत्र के लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़े। उनका 6 वर्ष का एक बच्चा है। घर में माता पिता व पत्नी सहित पूरे क्षेत्रवासियों में गम, कोहराम व शोक की लहर दौड़ गई। अंतिम दर्शनों के बाद पार्थिव शरीर को जागेश्वर धाम ले जाया गया, जहां शहीद को अंतिम सलामी देने के साथ सैन्य अधिकारियों ने पुष्प चक्र अर्पित किए जबकि गणमान्य लोगों ने भी श्रद्धांजलि दी। जागेश्वर धाम स्थित शमशानघाट पर शहीद का अंतिम संस्कार किया गया। दन्या से पुलिस टीम भी पहुँची थी। धौलादेवी के ब्लाँक प्रमुख पीतांबर पांडे, भाजपा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सुभाष पांडे, कनिष्ठ उप प्रमुख प्रकाश भट्ट, जागेश्वर के मुख्य पुजारी हेमंत भट्ट, मंदिर समिति के प्रबंंधक भगवान भट्ट, शेखर पांडेय सहित अनेक कई गणमान्य व्यक्ति व स्थानीय लोग मौजूद रहे। गमगीन माहौल के बीच रिमझिम बारिश भी हुई मानो नियति भी इस घटना पर रो रही हो।

पूर्व समाचार : दुःखद समाचार : कुमाऊं रेजीमेंट के सैनिक की पठानकोट में मौत

नवीन समाचार, अल्मोड़ा, 6 फरवरी 2019। पठानकोट के पास ड्यूटी के दौरान कुमाऊं रेजीमेंट के सैनिक की दुखद मौत का समाचार है। मौत का कारण साफ नहीं है अलबत्ता करंट लगने से मौत होने की आशंका जताई गई है।
अल्मोड़ा की तहसीलदार खुशबू आर्या के अनुसार जागेश्वर के तोली गांव निवासी नंदकिशोर तिवारी के बेटे सुशील तिवारी (30) थलसेना की 19 कुमाऊं रेजीमेंट में नायक के पद पर आजकल पंजाब में पठानकोट के पास तैनात थे।  उनकी पत्नी मीना तिवारी चार साल के बेटे लक्ष्य के साथ हल्दुचौर के निकट दुर्गापालपुर परमा गांव में रहती हैं। लक्ष्य वहीं वीर सैनिक स्कूल में एलकेजी का छात्र है। बताया गया है कि सैनिक का पार्थिव शरीर पठानकोट से हल्दूचौड़ और वहां से पैतृक गांव लाया जा रहा है, जहां जागेश्वर धाम के घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

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वीन समाचार, नैनीताल, 2 जून 2018। उत्तराखंड के मूल रूप से गांव जजौली, पोस्ट दशाईथल तहसील गंगोलीहाट जिला पिथौरागढ़ के निवासी एवं वर्तमान में थाना दिनेशपुर के गांव उदयनगर में रहने वाले असम राइफल्स के जवान गोपाल सिंह मेहरा (49) बुधवार तड़के चार बजे नागालैंड में लोबरा के पास आतंकियों से हुई मुठभेड़ में गोली लगने से गोपाल सिंह शहीद हो गए। उनका पार्थिव शरीर बृहस्पतिवार शाम तक उनके गंगोलीहाट के पैतृक गांव पहुंचने की संभावना है। वहीं उनका अंतिम संस्कार होगा। समाचार मिलते ही परिजन गंगोलीहाट रवाना हो गए।

जवान गोपाल सिंह मेहरा 24 असम राइफल्स में हवलदार के पद पर थे। वह वर्तमान में नागालैंड में तैनात थे। गोपाल सिंह के बड़े भाई निर्मल सिंह भी असम राइफल्स (नगालैंड) में ही तैनात हैं।

पूर्व समाचार :  एलओसी पर उत्तराखंड के दो जवान हुए शहीद

म्मू, 2 दिसंबर  2018। जम्मू कश्मीर में एलओसी से बुरी खबर आयी है।  यहाँ राजौरी जिले के अखनूर सेक्टर में खौड़ थाने के अंतर्गत कलीठ फील्ड फायरिंग रेंज पर पलांवाला के चपरेयाल क्षेत्र में शनिवार को अभ्यास के दौरान माइन ब्लास्ट हुआ था। इसकी चपेट में आने से भारतीय सेना के उत्तराखंड निवासी दो जवान सुरजीत सिंह राणा और लांस नायक सूरज सिंह शहीद हो गए हैं।  इनमें से सूरज सिंह पुत्र नारायण सिंह 8 कुमाऊं रेजीमेंट के जवान और अल्मोड़ा जिले के जिगोनी गांव के रहने वाले थे।वहीँ शहीद सुरजीत सिंह पुत्र स्वर्गीय प्रेम सिंह राणा चमोली के स्यूंण गांव के रहने वाले थे। जो 10वी गढ़वाल में सेवारत थे। रजौरी में अभियान के दौरान माइन ब्लास्ट की चपेट में आने से मौके पर ही शहीद हो गए।

सूचना मिलने के बाद से शहीदों के परिवार सदमे में हैं। एक साल पहले सुरजीत की पत्नी का भी देहांत हो चुका था। उनके कोई बच्चे नही हैं। शहीद सुरजीत की चार  बहने हैं, सुरजीत उनमें सबसे छोटे थे। सुरजीत का बड़ा भाई महाबीर सिंह घर पर ही रहते हैं। सुरजीत के पिता का देहांत लगभग 22 साल पहले  हो गया था, किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी कर सेना में भर्ती हो गया, अभी घर सम्भला ही था कि बहादुर भाई शहीद हो गया। सुरजीत सिंह राणा कुछ दिन पहले ही छुट्टी पूरी कर ड्यूटी पर लौटे थे। शनिवार की शाम सैन्य अधिकारी की ओर से परिजनों को फोन पर सुरजीत सिंह राणा के शहीद होने की जानकारी दी। इसके बाद से परिजनों का रो रोकर बुरा हाल है।

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शहीद राजेश अधिकारी

नवीन जोशी, नैनीताल। करगिल शहीद दिवस जब भी आता है, वीरों की भूमि उत्तराखंड का नैनीताल शहर भी गर्व की अनुभूति के साथ अपने एक बेटे, भाई की यादों में खोये बिना नहीं रह पाता। नगर का यह होनहार बेटा देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र विजेता मेजर राजेश अधिकारी था, जो मां के बुढ़ापे का सहारा बनने व नाती-पोतों को गोद में खिलाने के सपनों और शादी के नौ माह के भीतर ही पत्नी के हाथों की हजार उम्मीदों की गीली मेंहदी को सूखने से पहले ही एक झटके में तोड़कर चला गया।

मेजर राजेश अधिकारी ने जिस तरह देश के लिये अपने प्राणों का सर्वोच्च उत्सर्ग किया, उसकी अन्यत्र मिसाल मिलनी कठिन है। 29 वर्षीय राजेश 18 ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में तैनात थे। वह मात्र 10 सैनिकों की टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए 15 हजार फीट की ऊंचाई पर तोलोलिंग चोटी पर पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा स्थापित की गई पोस्ट को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराने के इरादे से आगे बढ़े थे। इस दौरान सैनिकों से कई फीट आगे रहते हुऐ चल रहे थे, और इस कारण घायल हो गये। इसके बावजूद वह अपने घावों की परवाह किये बगैर आगे बढ़ते रहे। वह 30 मई 1999 का दिन था, जब मेजर राजेश प्वाइंट 4590 चोटी पर कब्जा करने में सफल रहे, इसी दौरान उनके सीने में दुश्मन की एक गोली आकर लगी, और उन्होंने बंकर के पास ही देश के लिये असाधारण शौर्य और पराक्रम के साथ सर्वोच्च बलिदान दे दिया। युद्ध और गोलीबारी की स्थितियां इतनी बिकट थीं कि उनका पार्थिव शरीर

शहीद राजेश अधिकारी की पत्नी किरन

करीब एक सप्ताह बाद युद्ध भूमि से लेकर नैनीताल भेजा जा सका। राजेश ने नगर के सेंट जोसफ कालेज से हाईस्कूल, जीआईसी (जिसके नाम में अब उनका नाम भी जोड़ दिया गया है) से इंटर तथा डीएसबी परिसर से बीएससी की पढ़ाई की थी। पूर्व परिचित किरन से उनका विवाह हुआ था।

रानीबाग में गार्गी (गौला) नदी के तट पर शहीद मेजर राजेश अधिकारी के पार्थिव शरीर को आखिरी प्रणाम करते कृतज्ञ राष्ट्रवासी

परिजनों के अनुसार यह ‘लव कम अरेंज्ड’ विवाह था। लेकिन शादी के नौ माह के भीतर ही वह देश के लिये शहीद हो गये। उनकी शहादत के बाद परिजनों ने उनकी पत्नी को उसके मायके जाने के लिये स्वतंत्र कर दिया। वर्तमान में सैनिक कल्याण विभाग के अनुसार किरन ने पुर्नविवाह कर लिया। उनकी माता मालती अधिकारी अपने पुत्र की शहादत को जीवंत रखने के लिये लगातार संघर्ष करती रहीं, जिसके बावजूद उन्हें व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक दोनों स्तरों पर कुछ खास हासिल नहीं हो पाया है। वर्तमान में वह अपनी बेटी के पास किच्छा में रह रही हैं।

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नैनीताल, 20 मई 2018। कुमाऊं रेजीमेंट के एक जवान के शहीद होने की दुःखद खबर आ रही है। नैनीताल जनपद के ओखलकांडा विकासखंड के ग्राम भद्रकोट का निवासी मात्र 22 वर्ष की उम्र के जवान योगेश परगाई उर्फ यश 20 मई की रात्रि नागालैंड के सीमावर्ती जखामा क्षेत्र में तैनाती के दौरान पेट्रोलिंग करते हुए नक्सली हमले में गोली लगने से शहीद हो गये हैं। वे 4 कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात थे। उनका परिवार पिछले 2 वर्षों से हल्द्वानी के बिठौरिया नंबर 1, बिष्ट धड़ा तिवाड़ी नगर में रहता है। नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश सहित कई नेता उनके घर शोक संतप्त परिवार को सांत्वना देने पहुंच रहे हैं। यश पांच भाईयों व तीन बहनों में सबसे छोटे थे। जब वह पांच माह के थे, तभी उनके सिर से पिता चन्द्र सिंह परगाई का साया उठ गया था। वह 2014 में 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करके ही सेना में भर्ती हो गए थे। उनके शव के शुक्रवार तक हल्द्वानी स्थित आवास पर पहुँचने की संभावना है।

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पिता की मौत के आंसू पोंछ, एमसीए छोड़ सीआरपीएफ में भर्ती हुआ था मनोज नौंगाई
  •  मां की इकलौती उम्मीद एवं पत्नी के हाथों की गीली मेंहदी के साथ कोख के अजन्मे शिशु के सपने भी तोड़ गया शहीद

नवीन जोशी, नैनीताल। परिजनों के एमसीए कराने के स्वप्न से इतर उसके मन में कुमाऊं रेजीमेंट में रहकर देश के लिए तीन लड़ाइयां लड़ने वाले दादाजी और बड़े चाचा से संस्कारों में मिले बोल `ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं….´ गूंज रहे थे, ऐसे में हाईस्कूल व इंटर में अपने कालेज को टॉप कर बीएससी कर रहा वह होनहार मौका मिलते ही सीआरपीएफ की ओर मुड़ गया। आज वह अपनी बूढ़ी मां की आंखिरी उम्मीदों और पत्नी को हाथों की हजार उम्मीदों की गीली मेंहदी को सूखने से पहले ही एक पल में झटक छोड़ चला है। वह तो शायद देश के लिए उसकी कुर्बानी से अपना मन मना भी लें, लेकिन उसका क्या जिसका भाग्य अभी मां की कोख में शायद विधाता ठीक से लिख भी न पाऐ हों, और उस अजन्मा आत्मा ने अपने भाग्य विधाता को ही खो दिया है।

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड की एक और पहचान है। यहां आजादी के पूर्व से अब तक यह परंपरा अनवरत जारी है कि हर घर में कम से कम एक व्यक्ति जरूर फौज में रहकर देश की सेवा करता है। लेकिन प्रकृति के स्वर्ग कहे जाने वाले नैनीताल जनपद के भीमताल कस्बे के निकट सांगुड़ीगांव में रहने वाले एक परिवार के एक नहीं दो लोगों ने कुमाऊं रेजीमेंट में रहकर देश की सेवा की। दादाजी भैरव दत्त नौगाई ने पाकिस्तान व चीन से देश की तीन लड़ाइयां लड़ीं तो पिता के चचेरे भाई यानी बड़े चाचा लक्ष्मी दत्त नौगांई ने भी केआरसी की 20वीं बटालियन में रहकर देश की लंबी सेवा की। यह दोनों ही हमेशा मनोज के आदर्श रहे। 

मनोज में गजब की इच्छा शक्ति थी। वह बेहद मेधावी होने के बावजूद किसी कारण हाईस्कूल में गणित में कम अंक आने के कारण फेल हो गया था, लेकिन इस ठोकर को उसने अपने पथ का पाथेय बना लिया। अगले वर्ष ही हाईस्कूल में उसने अपने कालेज एलपी इंटर कालेज को टॉप कर दिया, 11वीं में पढ़ने के दौरान 2001 में विधाता ने उसके सिर से पिता भुवन नौगांई का साया छीन लिया था, बावजूद इंटर में भी उसने कालेज टॉप किया। 2003 में उसने कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर में बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया ही था, कि देहरादून में सीआरपीएफ के साक्षात्कार का `कॉल´ आ गया। भाई की मौत के सदमे से उबर न पाऐ बिड़ला संस्थान में चालक के पद से परिवार की गाड़ी चला रहे चाचा विनोद नौगांई ने मना किया, कहा “इस खतरे की नौकरी में न जा, मैं जमीन बेचकर भी तुझे एमसीए कराउंगा”। लेकिन वह न माना। परीक्षा दी और उत्तीर्ण हो खुशी खुशी `ज़िन्दा रहने के मौसम…..´ गुनगुनाता नौकरी पर चला गया। 

इधर गत वर्ष वेलेंटाइन डे 14 फरवरी 09 के दिन उसने हल्द्वानी की मात्र 21 साल की सोनिका भगत को अपनी वेलेंटाइन के साथ ही पत्नी बनाया था। बीते माह ही वह सीआरपीएफ में उपनिरीक्षक पद की परीक्षा उत्तीर्ण कर पदोन्नत हुआ था। यूँ, सीआरपीएफ की नौकरी में रहते कई बार उसका मौत से सामना हुआ था। प्रशिक्षण के दौरान एक मित्रा ने तो उसकी गोद में ही दम तोड़ दिया था, बावजूद देश सेवा की रह में बड़ी से बड़ी दुश्वारियां उसे डिगा नहीं पाई थीं। लेकिन बीती छह अप्रैल मंगलवार को छत्तीसगढ़ के दन्तेवाड़ा में हुऐ `अमंगल´ में वह दिलेर भी अपने 83 साथियों के साथ धोखे का शिकार हो गया। आज उसके परिवार को उसकी शहादत पर गर्व है। बावजूद दुखों का पारावार भी नहीं। मां व पत्नी की सूनी मांग और आंखों से झरते आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे। उसके पार्थिव शरीर को देखने की बेताबी में कोख के अजन्मे शिशु को लेकर पत्नी सोनिका दूसरी मंजिल से कूद कर घायल हो गई। उसका पांव जल्द ठीक हो जाऐगा, किन्तु उसकी आत्मा के घाव को भरने और आगे ऐसा दूसरी किसी सोनिका के साथ न होगा, इस हेतु क्या कुछ किया जाऐगा, यह बड़ा अनुत्तरित सवाल है। 

उसके दादा, दोनों चाचा, मित्रा और जीजा ललित फुलारा…सबकी मानें तो नक्सली समस्या का हल भी आतंकवाद की तरह बिना फौजी कार्रवाई के सम्भव नहीं है। वह कहते हैं “सेना को चढ़ जाने दीजिऐ। देश की आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा के मसले पर राजनीति बन्द कीजिऐ।”
(यह खबर सहारा समय के इस लिंक पर भी देख सकते हैं : http://www.samaylive.com/nation-hindi/79581.html)

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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